अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
asa prabhu chāṛi bhajahiṃ je ānā| te nara pasu binu pūm̐cha biṣānā||
nija jana jāni tāhi apanāvā| prabhu subhāva kapi kula mana bhāvā||
Meaning ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं। अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [बहुत] भाया॥ १॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
puni sarbagya sarba ura bāsī| sarbarūpa saba rahita udāsī||
bole bacana nīti pratipālaka| kārana manuja danuja kula ghālaka||
Meaning फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप (सब रूपोंमें प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारणसे ( भक्तोंपर कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश करनेवाले श्रीरामजी नीतिकी रक्षा करनेवाले वचन बोले--॥ २॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
sunu kapīsa laṃkāpati bīrā| kehi bidhi taria jaladhi gaṃbhīrā||
saṃkula makara uraga jhaṣa jātī| ati agādha dustara saba bhām̐tī||
Meaning हे वीर वानरराज सुग्रीव और लड्डापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्रको किस प्रकार पार किया जाय? अनेक जातिके मगर, साँप और मछलियोंसे भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र पार करनेमें सब प्रकारसे कठिन है॥ ३॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥
kaha laṃkesa sunahu raghunāyaka| koṭi siṃdhu soṣaka tava sāyaka||
jadyapi tadapi nīti asi gāī| binaya karia sāgara sana jāī||
Meaning विभीषणजीने कहा--हे रघुनाथजी! सुनिये, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रोंको सोखनेवाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि [पहले। जाकर समुद्रसे प्रार्थथा की जाय॥ ४॥
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ ५०॥
prabhu tumhāra kulagura jaladhi kahihi upāya bicāri|
binu prayāsa sāgara tarihi sakala bhālu kapi dhāri|| 50||
Meaning हे प्रभु! समुद्र आपके कुलमें बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरोंकी सारी सेना बिना ही परिश्रमके समुद्रके पार उतर जायगी॥ ५०॥
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥
sakhā kahī tumha nīki upāī| karia daiva jauṃ hoi sahāī||
maṃtra na yaha lachimana mana bhāvā| rāma bacana suni ati dukha pāvā||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके मनको अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया॥ १॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
nātha daiva kara kavana bharosā| soṣia siṃdhu karia mana rosā||
kādara mana kahum̐ eka adhārā| daiva daiva ālasī pukārā||
Meaning [ लक्ष्मणजीने कहा--] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा! मनमें क्रोध कीजिये (ले आइये) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव तो कायरके मनका एक आधार (तसल्ली देनेका उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥ २॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥
sunata bihasi bole raghubīrā| aisehiṃ karaba dharahu mana dhīrā||
asa kahi prabhu anujahi samujhāī| siṃdhu samīpa gae raghurāī||
Meaning यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले-ऐसे ही करेंगे, मनमें धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुद्रके समीप गये॥ ३॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥
prathama pranāma kīnha siru nāī| baiṭhe puni taṭa darbha ḍasāī||
jabahiṃ bibhīṣana prabhu pahiṃ āe| pācheṃ rāvana dūta paṭhāe||
Meaning उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारेपर कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभुके पास आये थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे दूत भेजे थे॥ ४॥
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१॥
sakala carita tinha dekhe dhareṃ kapaṭa kapi deha|
prabhu guna hṛdayam̐ sarāhahiṃ saranāgata para neha|| 51||
Meaning कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्तरेहकी सराहना करने लगे॥ ५१॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
pragaṭa bakhānahiṃ rāma subhāū| ati saprema gā bisari durāū||
ripu ke dūta kapinha taba jāne| sakala bām̐dhi kapīsa pahiṃ āne||
Meaning फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये॥ १॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥
kaha sugrīva sunahu saba bānara| aṃga bhaṃga kari paṭhavahu nisicara||
suni sugrīva bacana kapi dhāe| bām̐dhi kaṭaka cahu pāsa phirāe||
Meaning सुग्रीवने कहा--सब वानरो! सुनो, राक्षसोंके अज्-भड़ करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया॥ २॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥
bahu prakāra mārana kapi lāge| dīna pukārata tadapi na tyāge||
jo hamāra hara nāsā kānā| tehi kosalādhīsa kai ānā||
Meaning वानर उन्हें बहुत तरहसे मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरोंने उन्हें नहीं छोड़ा। [ तब दूतोंने पुकारकर कहा--] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामजीकी सौगंध है॥ ३॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥
suni lachimana saba nikaṭa bolāe| dayā lāgi ham̐si turata choḍāe||
rāvana kara dījahu yaha pātī| lachimana bacana bācu kulaghātī||
Meaning यह सुनकर लक्ष्मणजीने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसोंको तुरंत ही छुड़ा दिया। [और उनसे कहा-] रावणके हाथमें यह चिट्ठी देना [और कहना--] हे कुलघातक! लक्ष्मणके शब्दों (सँदेसे) को बाँचो॥ ४॥
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार॥
kahehu mukhāgara mūṛha sana mama saṃdesu udāra|
sītā dei milehu na ta āvā kāla tumhāra||
Meaning फिर उस मूर्खसे जबानी यह मेरा उदार (कृपासे भरा हुआ) सन्देश कहना कि सीताजीको देकर उनसे (श्रीरामजीसे) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो]॥ ५२॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
turata nāi lachimana pada māthā| cale dūta baranata guna gāthā||
kahata rāma jasu laṃkām̐ āe| rāvana carana sīsa tinha nāe||
Meaning लक्ष्मणजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामजीके गुणोंकी कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजीका यश कहते हुए वे लड्ामें आये और उन्होंने रावणके चरणोंमें सिर नवाये॥ १॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥
bihasi dasānana pūm̐chī bātā| kahasi na suka āpani kusalātā||
puni kahu khabari bibhīṣana kerī| jāhi mṛtyu āī ati nerī||
Meaning दशमुख रावणने हँसकर बात पूछी--अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता ? फिर उस विभीषणका समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥ २॥
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥
karata rāja laṃkā saṭha tyāgī| hoihi jaba kara kīṭa abhāgī||
puni kahu bhālu kīsa kaṭakāī| kaṭhina kāla prerita cali āī||
Meaning मूर्खने राज्य करते हुए लड्ाको त्याग दिया। अभागा अब जौका कीड़ा (घुन) बनेगा (जौके साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर-वानरोंके साथ वह भी मारा जायगा); फिर भालु और वानरोंकी सेनाका हाल कह, जो कठिन कालकी प्रेरणासे यहाँ चली आयी है॥ ३॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥
jinha ke jīvana kara rakhavārā| bhayau mṛdula cita siṃdhu bicārā||
kahu tapasinha kai bāta bahorī| jinha ke hṛdayam̐ trāsa ati morī||
Meaning और जिनके जीवनका रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसोंके बीचमें यदि समुद्र न होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन तपस्वियोंकी बात बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा डर है॥ ४॥
-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३॥
-kī bhai bheṃṭa ki phiri gae śravana sujasu suni mora|
kahasi na ripu dala teja bala bahuta cakita cita tora|| 53||
Meaning उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानोंसे मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये ? शत्रुसेनाका तेज और बल बताता क्यों नहीं ? तेरा चित्त बहुत ही चकित ( भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ ५३॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
nātha kṛpā kari pūm̐chehu jaiseṃ| mānahu kahā krodha taji taiseṃ||
milā jāi jaba anuja tumhārā| jātahiṃ rāma tilaka tehi sārā||
Meaning [ दूतने कहा--] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिये (मेरी बातपर विश्वास कीजिये)। जब आपका छोटा भाई श्रीरामजीसे जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामजीने उसको राजतिलक कर दिया॥ १॥
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥
rāvana dūta hamahi suni kānā| kapinha bām̐dhi dīnhe dukha nānā||
śravana nāsikā kāṭai lāge| rāma sapatha dīnhe hama tyāge||
Meaning हम रावणके दूत हैं, यह कानोंसे सुनकर वानरोंने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँतक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे। श्रीरामजीकी शपथ दिलानेपर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा॥ २॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥
pūm̐chihu nātha rāma kaṭakāī| badana koṭi sata barani na jāī||
nānā barana bhālu kapi dhārī| bikaṭānana bisāla bhayakārī||
Meaning हे नाथ! आपने श्रीरामजीकी सेना पूछी; सो वह तो सौ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगोंके भालु और वानरोंकी सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं॥ ३॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥
jehiṃ pura daheu hateu suta torā| sakala kapinha maham̐ tehi balu thorā||
amita nāma bhaṭa kaṭhina karālā| amita nāga bala bipula bisālā||
Meaning जिसने नगरको जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको मारा, उसका बल तो सब वानरोंमें थोड़ा है। असंख्य नामोंवाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियोंका बल है और वे बड़े ही विशाल हैं॥ ४॥
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४॥
dvibida mayaṃda nīla nala aṃgada gada bikaṭāsi|
dadhimukha kehari nisaṭha saṭha jāmavaṃta balarāsi|| 54||
Meaning द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दथिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवानू--ये सभी बलकी राशि हैं॥ ५४॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥
e kapi saba sugrīva samānā| inha sama koṭinha ganai ko nānā||
rāma kṛpām̐ atulita bala tinhahīṃ| tṛna samāna trelokahi ganahīṃ||
Meaning ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे [ एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत- सोंको गिन ही कौन सकता है ? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकोंको तृणके समान [तुच्छ] समझते हैं॥ १॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥
asa maiṃ sunā śravana dasakaṃdhara| paduma aṭhāraha jūthapa baṃdara||
nātha kaṭaka maham̐ so kapi nāhīṃ| jo na tumhahi jītai rana māhīṃ||
Meaning हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके॥ २॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
parama krodha mījahiṃ saba hāthā| āyasu pai na dehiṃ raghunāthā||
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।
पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला॥
soṣahiṃ siṃdhu sahita jhaṣa byālā| pūrahīṃ na ta bhari kudhara bisālā||
Meaning सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको सोख लेंगे। नहीं तो, बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर (पाट) देंगे॥ ३॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥
mardi garda milavahiṃ dasasīsā| aisei bacana kahahiṃ saba kīsā||
garjahiṃ tarjahiṃ sahaja asaṃkā| mānahu grasana cahata hahiṃ laṃkā||
Meaning और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लड्ठाको निगल ही जाना चाहते हैं॥ ४॥
-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम॥ ५५॥
-sahaja sūra kapi bhālu saba puni sira para prabhu rāma|
rāvana kāla koṭi kahu jīti sakahiṃ saṃgrāma|| 55||
Meaning सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु (सर्वेश्वर ) श्रीरामजी हैं। हे रावण ! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको जीत सकते हैं॥ ५५॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥
rāma teja bala budhi bipulāī| seṣa sahasa sata sakahiṃ na gāī||
saka sara eka soṣi sata sāgara| taba bhrātahi pūm̐cheu naya nāgara||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धिकी अधिकताको लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंको सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजीने [ नीतिकी रक्षाके लिये] आपके भाईसे उपाय पूछा॥ १॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥
tāsu bacana suni sāgara pāhīṃ| māgata paṃtha kṛpā mana māhīṃ||
sunata bacana bihasā dasasīsā| jauṃ asi mati sahāya kṛta kīsā||
Meaning उनके (आपके भाईके) वचन सुनकर वे ( श्रीरामजी ) समुद्रसे राह माँग रहे हैं, उनके मनमें कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते नहीं ]। दूतके ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [और बोला--] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरोंको सहायक बनाया है॥ २॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥
sahaja bhīru kara bacana dṛṛhāī| sāgara sana ṭhānī macalāī||
mūṛha mṛṣā kā karasi baṛāī| ripu bala buddhi thāha maiṃ pāī||
Meaning स्वाभाविक ही डरपोक विभीषणके वचनको प्रमाण करके उन्होंने समुद्रसे मचलना ( बालहठ ) ठाना है। अरे मूर्ख ! झूठी बड़ाई कया करता है ! बस, मैंने शत्रु (राम ) के बल और बुद्धिकी थाह पा ली॥ ३॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥
saciva sabhīta bibhīṣana jākeṃ| bijaya bibhūti kahām̐ jaga tākeṃ||
suni khala bacana dūta risa bāṛhī| samaya bicāri patrikā kāṛhī||
Meaning जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगतमें विजय और विभूति (ऐश्र्य) कहाँ ! दुष्ट रावणके वचन सुनकर दूतको क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली॥ ४॥
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥
rāmānuja dīnhī yaha pātī| nātha bacāi juṛāvahu chātī||
bihasi bāma kara līnhī rāvana| saciva boli saṭha lāga bacāvana||
Meaning [ और कहा--] श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावणने हँसकर उसे बायें हाथसे लिया और मन्त्रीको बुलवाकर वह मूर्ख उसे बँचाने लगा॥ ५॥
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ ५६ ( क )॥
bātanha manahi rijhāi saṭha jani ghālasi kula khīsa|
rāma birodha na ubarasi sarana biṣnu aja īsa|| 56 ( ka )||
Meaning [ पत्रिकामें लिखा था--] 3रे मूर्ख! केवल बातोंसे ही मनको रिझाकर अपने कुलको नष्ट- भ्रष्ट न कर! श्रीरामजीसे विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेशकी शरण जानेपर भी नहीं बचेगा॥ ५६॥ (क)॥
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ ५६ ( ख )॥
kī taji māna anuja iva prabhu pada paṃkaja bhṛṃga|
hohi ki rāma sarānala khala kula sahita pataṃga|| 56 ( kha )||
Meaning या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषणकी भाँति प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट ! श्रीरामजीके बाणरूपी आअग्रिमें परिवारसहित पतिंगा हो जा (दोनोंमेंसे जो अच्छा लगे सो कर)॥ ५६ (ख)॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥
sunata sabhaya mana mukha musukāī| kahata dasānana sabahi sunāī||
bhūmi parā kara gahata akāsā| laghu tāpasa kara bāga bilāsā||
Meaning पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो गया, परन्तु मुखसे (ऊपरसे) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा-जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़नेकी चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है)॥ १॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥
kaha suka nātha satya saba bānī| samujhahu chāṛi prakṛti abhimānī||
sunahu bacana mama parihari krodhā| nātha rāma sana tajahu birodhā||
Meaning शुक (दूत) ने कहा-हे नाथ! अभिमानी स्वभावको छोड़कर [इस पत्रमें लिखी। सब बातोंको सत्य समझिये। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये॥ २॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥
ati komala raghubīra subhāū| jadyapi akhila loka kara rāū||
milata kṛpā tumha para prabhu karihī| ura aparādha na ekau dharihī||
Meaning यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकोंके स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यन्त ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदयमें नहीं रखेंगे॥ ३॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥
janakasutā raghunāthahi dīje| etanā kahā mora prabhu kīje||
jaba tehiṃ kahā dena baidehī| carana prahāra kīnha saṭha tehī||
Meaning जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिये। जब उस (दूत) ने जानकीजीको देनेके लिये कहा, तब दुष्ट रावणने उसको लात मारी॥ ४॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
nāi carana siru calā so tahām̐| kṛpāsiṃdhu raghunāyaka jahām̐||
kari pranāmu nija kathā sunāī| rāma kṛpām̐ āpani gati pāī||
Meaning वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपासे अपनी गति ( मुनिका स्वरूप) पायी॥ ५॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥
riṣi agasti kīṃ sāpa bhavānī| rāchasa bhayau rahā muni gyānī||
baṃdi rāma pada bārahiṃ bārā| muni nija āśrama kahum̐ pagu dhārā||
Meaning (शिवजी कहते हैं--) हे भवानी ! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको चला गया॥ ६॥
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ ५७॥
binaya na mānata jaladhi jaṛa gae tīna dina bīti|
bole rāma sakopa taba bhaya binu hoi na prīti|| 57||
Meaning इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोधसहित बोले-वबिना भयके प्रीति नहीं होती !॥ ५७॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
lachimana bāna sarāsana ānū| soṣauṃ bāridhi bisikha kṛsānū||
saṭha sana binaya kuṭila sana prītī| sahaja kṛpana sana suṃdara nītī||
Meaning हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्रिबाणसे समुद्रको सोख डालूँ। मूर्खसे विनय, कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश),॥ १॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
mamatā rata sana gyāna kahānī| ati lobhī sana birati bakhānī||
krodhihi sama kāmihi hari kathā| ūsara bīja baem̐ phala jathā||
Meaning ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति) की बात और कामीसे भगवान्की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)॥ २॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
asa kahi raghupati cāpa caṛhāvā| yaha mata lachimana ke mana bhāvā||
saṃghāneu prabhu bisikha karālā| uṭhī udadhi ura aṃtara jvālā||
Meaning ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजीके मनको बहुत अच्छा लगा। प्रभुने भयानक [ अग्नि ] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्रके हृदयके अंदर अग्रिकी ज्वाला उठी॥ ३॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
makara uraga jhaṣa gana akulāne| jarata jaṃtu jalanidhi jaba jāne||
kanaka thāra bhari mani gana nānā| bipra rūpa āyau taji mānā||
Meaning मगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें आया॥ ४॥
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥ ५८॥
kāṭehiṃ pai kadarī pharai koṭi jatana kou sīṃca|
binaya na māna khagesa sunu ḍāṭehiṃ pai nava nīca|| 58||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी ! सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाँटनेपर ही झुकता है (रास्तेपर आता है)॥ ५८॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
sabhaya siṃdhu gahi pada prabhu kere| chamahu nātha saba avaguna mere||
gagana samīra anala jala dharanī| inha kai nātha sahaja jaṛa karanī||
Meaning समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा--हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्ि, जल और पृथ्वी-इन सबकी करनी स्वभावसे ही जड है॥ १॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥
tava prerita māyām̐ upajāe| sṛṣṭi hetu saba graṃthani gāe||
prabhu āyasu jehi kaham̐ jasa ahaī| so tehi bhām̐ti rahe sukha lahaī||
Meaning आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है॥ २॥
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
prabhu bhala kīnhī mohi sikha dīnhī| marajādā puni tumharī kīnhī||
ḍhola gavām̐ra sūdra pasu nārī| sakala tāṛanā ke adhikārī||
Meaning प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा (जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री-ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं॥ ३॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई॥
prabhu pratāpa maiṃ jāba sukhāī| utarihi kaṭaku na mori baṛāī||
prabhu agyā apela śruti gāī| karauṃ so begi jau tumhahi sohāī||
Meaning प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लड्न नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥ ४॥
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९॥
sunata binīta bacana ati kaha kṛpāla musukāi|
jehi bidhi utarai kapi kaṭaku tāta so kahahu upāi|| 59||
Meaning समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा--हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर जाय, वह उपाय बताओ॥ ५९॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
nātha nīla nala kapi dvau bhāī| larikāī riṣi āsiṣa pāī||
tinha ke parasa kiem̐ giri bhāre| tarihahiṃ jaladhi pratāpa tumhāre||
Meaning [समुद्रने कहा--] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायँगे॥ १॥
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
maiṃ puni ura dhari prabhutāī| karihaum̐ bala anumāna sahāī||
ehi bidhi nātha payodhi bam̐dhāia| jehiṃ yaha sujasu loka tihum̐ gāia||
Meaning मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकों में आपका सुन्दर यश गाया जाय॥ २॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
ehi sara mama uttara taṭa bāsī| hatahu nātha khala nara agha rāsī||
suni kṛpāla sāgara mana pīrā| turatahiṃ harī rāma ranadhīrā||
Meaning इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया ( अर्थात् बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया)॥ ३॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥
dekhi rāma bala pauruṣa bhārī| haraṣi payonidhi bhayau sukhārī||
sakala carita kahi prabhuhi sunāvā| carana baṃdi pāthodhi sidhāvā||
Meaning श्रीराीमजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया॥ ४॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
nija bhavana gavaneu siṃdhu śrīraghupatihi yaha mata bhāyaū|
yaha carita kali malahara jathāmati dāsa tulasī gāyaū||
sukha bhavana saṃsaya samana davana biṣāda raghupati guna ganā|
taji sakala āsa bharosa gāvahi sunahi saṃtata saṭha manā||
Meaning समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६०॥
sakala sumaṃgala dāyaka raghunāyaka guna gāna|
sādara sunahiṃ te tarahiṃ bhava siṃdhu binā jalajāna|| 60||
Meaning श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मज़लोंका देनेवाला है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायूँगे॥ ६०॥