शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥ १॥
śāntaṃ śāśvatamaprameyamanaghaṃ nirvāṇaśāntipradaṃ brahmāśambhuphaṇīndrasevyamaniśaṃ vedāntavedyaṃ vibhum|
rāmākhyaṃ jagadīśvaraṃ suraguruṃ māyāmanuṣyaṃ hariṃ vande'haṃ karuṇākaraṃ raghuvaraṃ bhūpālacūḍāmaṇim|| 1||
Meaning शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २॥
nānyā spṛhā raghupate hṛdaye'smadīye satyaṃ vadāmi ca bhavānakhilāntarātmā|
bhaktiṃ prayaccha raghupuṅgava nirbharāṃ me kāmādidoṣarahitaṃ kuru mānasaṃ ca|| 2||
Meaning हे रघुनाथजी ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं ) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये॥ २॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३॥
atulitabaladhāmaṃ hemaśailābhadehaṃ danujavanakṛśānuṃ jñānināmagragaṇyam|
sakalaguṇanidhānaṃ vānarāṇāmadhīśaṃ raghupatipriyabhaktaṃ vātajātaṃ namāmi|| 3||
Meaning अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने] के लिये अग्रिरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान, वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमानूजीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
jāmavaṃta ke bacana suhāe| suni hanumaṃta hṛdaya ati bhāe||
taba lagi mohi parikhehu tumha bhāī| sahi dukha kaṃda mūla phala khāī||
Meaning जाम्बवानूके सुन्दर वचन सुनकर हनुमानूजीके हृदयको बहुत ही भाये। [वे बोले-] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तबतक मेरी राह देखना॥ १॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
jaba lagi āvauṃ sītahi dekhī| hoihi kāju mohi haraṣa biseṣī||
yaha kahi nāi sabanhi kahum̐ māthā| caleu haraṣi hiyam̐ dhari raghunāthā||
Meaning जबतक मैं सीताजीको देखकर [लौट] न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
siṃdhu tīra eka bhūdhara suṃdara| kautuka kūdi caṛheu tā ūpara||
bāra bāra raghubīra sam̐bhārī| tarakeu pavanatanaya bala bhārī||
Meaning समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमानजी खेलसे ही ( अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमानजी उसपरसे बड़े वेगसे उछले॥ ३॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
jehiṃ giri carana dei hanumaṃtā| caleu so gā pātāla turaṃtā||
jimi amogha raghupati kara bānā| ehī bhām̐ti caleu hanumānā||
Meaning जिस पर्वतपर हनुमानजी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे उछले), वह तुरंत ही पातालमें धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजीका अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले॥ ४॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
jalanidhi raghupati dūta bicārī| taiṃ maināka hohi śramahārī||
Meaning समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे कहा कि हे मैनाक ! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो (अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥ ५॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ १॥
hanūmāna tehi parasā kara puni kīnha pranāma|
rāma kāju kīnheṃ binu mohi kahām̐ biśrāma|| 1||
Meaning हनुमान्ूजीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा--भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥ १॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
jāta pavanasuta devanha dekhā| jānaiṃ kahum̐ bala buddhi biseṣā||
surasā nāma ahinha kai mātā| paṭhainhi āi kahī tehiṃ bātā||
Meaning देवताओंने पवनपुत्र हनुमानूजीको जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमानूजीसे यह बात कही--॥ १॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
āju suranha mohi dīnha ahārā| sunata bacana kaha pavanakumārā||
rāma kāju kari phiri maiṃ āvauṃ| sītā kai sudhi prabhuhi sunāvauṃ||
Meaning आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार. हनुमान्जीने कहा--श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ.॥ २॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
taba tava badana paiṭhihaum̐ āī| satya kahaum̐ mohi jāna de māī||
kabanehum̐ jatana dei nahiṃ jānā| grasasi na mohi kaheu hanumānā||
Meaning तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्ूजीने कहा--तो फिर मुझे खा न ले॥ ३॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
jojana bhari tehiṃ badanu pasārā| kapi tanu kīnha duguna bistārā||
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
soraha jojana mukha tehiṃ ṭhayaū| turata pavanasuta battisa bhayaū||
Meaning उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमानूजीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका मुख किया। हनुमानूजी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये॥ ४॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
jasa jasa surasā badanu baṛhāvā| tāsu dūna kapi rūpa dekhāvā||
sata jojana tehiṃ ānana kīnhā| ati laghu rūpa pavanasuta līnhā||
Meaning जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमानूजी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोसका) मुख किया। तब हनुमान्ूजीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा॥
badana paiṭhi puni bāhera āvā| māgā bidā tāhi siru nāvā||
mohi suranha jehi lāgi paṭhāvā| budhi bala maramu tora mai pāvā||
Meaning और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा--] मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था॥ ६॥
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २॥
rāma kāju sabu karihahu tumha bala buddhi nidhāna|
āsiṣa deha gaī so haraṣi caleu hanumāna|| 2||
Meaning तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिकि भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
nisicari eka siṃdhu mahum̐ rahaī| kari māyā nabhu ke khaga gahaī||
jīva jaṃtu je gagana uṛāhīṃ| jala biloki tinha kai parichāhīṃ||
Meaning समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाईं देखकर॥ १॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
gahai chāham̐ saka so na uṛāī| ehi bidhi sadā gaganacara khāī||
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
soi chala hanūmāna kaham̐ kīnhā| tāsu kapaṭu kapi turatahiṃ cīnhā||
Meaning उस परछाईंको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जलमें गिर पड़ते थे] इस प्रकार वह सदा आकाशगमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्जीसे भी किया। हनुमान्जीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
tāhi māri mārutasuta bīrā| bāridhi pāra gayau matidhīrā||
tahām̐ jāi dekhī bana sobhā| guṃjata caṃcarīka madhu lobhā||
Meaning पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमानूजी उसको मारकर समुद्रके पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु (पुष्परस) के लोभसे भौंरे गुज्ार कर रहे थे॥ ३॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें॥
nānā taru phala phūla suhāe| khaga mṛga bṛṃda dekhi mana bhāe||
saila bisāla dekhi eka āgeṃ| tā para dhāi caḍheu bhaya tyāgeṃ||
Meaning अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े॥ ४॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
umā na kachu kapi kai adhikāī| prabhu pratāpa jo kālahi khāī||
giri para caḍhi laṃkā tehiṃ dekhī| kahi na jāi ati durga biseṣī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! इसमें वानर हनुमानूकी कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लड्ठा देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥
ati utaṃga jalanidhi cahu pāsā| kanaka koṭa kara parama prakāsā||
Meaning वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके परकोटे (चहारदीवारी ) का परम प्रकाश हो रहा है॥ ६॥
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
kanaka koṭa bicitra mani kṛta suṃdarāyatanā ghanā|
cauhaṭṭa haṭṭa subaṭṭa bīthīṃ cāru pura bahu bidhi banā||
gaja bāji khaccara nikara padacara ratha barūthinha ko ganai|
bahurūpa nisicara jūtha atibala sena baranata nahiṃ banai||
Meaning विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है! अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती॥ १॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
bana bāga upabana bāṭikā sara kūpa bāpīṃ sohahīṃ|
nara nāga sura gaṃdharba kanyā rūpa muni mana mohahīṃ||
kahum̐ māla deha bisāla saila samāna atibala garjahīṃ|
nānā akhārenha bhirahiṃ bahu bidhi eka ekanha tarjahīṃ||
Meaning वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं॥ २॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
kari jatana bhaṭa koṭinha bikaṭa tana nagara cahum̐ disi racchahīṃ|
kahum̐ mahiṣa mānaṣu dhenu khara aja khala nisācara bhacchahīṃ||
ehi lāgi tulasīdāsa inha kī kathā kachu eka hai kahī|
raghubīra sara tīratha sarīranhi tyāgi gati paihahiṃ sahī||
Meaning भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे ) नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३॥
pura rakhavāre dekhi bahu kapi mana kīnha bicāra|
ati laghu rūpa dharauṃ nisi nagara karauṃ paisāra|| 3||
Meaning नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूँ॥ ३॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
masaka samāna rūpa kapi dharī| laṃkahi caleu sumiri naraharī||
nāma laṃkinī eka nisicarī| so kaha calesi mohi niṃdarī||
Meaning हनुमानजी मच्छड़के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लड्डाको चले। [ लड्ठाके द्वारपर] लड़िनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। वह बोली-मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?॥ १॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥
jānehi nahīṃ maramu saṭha morā| mora ahāra jahām̐ lagi corā||
muṭhikā eka mahā kapi hanī| rudhira bamata dharanīṃ ḍhanamanī||
Meaning हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना ? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्ूजीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
puni saṃbhāri uṭhi so laṃkā| jori pāni kara binaya saṃsakā||
jaba rāvanahi brahma bara dīnhā| calata biraṃci kahā mohi cīnhā||
Meaning वह लड़िनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली--] रावणको जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि--॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥
bikala hosi taiṃ kapi keṃ māre| taba jānesu nisicara saṃghāre||
tāta mora ati punya bahūtā| dekheum̐ nayana rāma kara dūtā||
Meaning जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप) को नेत्रोंसे देख पायी॥ ४॥
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ '४॥
tāta svarga apabarga sukha dharia tulā eka aṃga|
tūla na tāhi sakala mili jo sukha lava satasaṃga|| '4||
Meaning हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) -मात्रके सत्सद्भसे होता है॥ ४॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
prabisi nagara kīje saba kājā| hṛdayam̐ rākhi kausalapura rājā||
garala sudhā ripu karahiṃ mitāī| gopada siṃdhu anala sitalāī||
Meaning अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्िमें शीतलता आ जाती है॥ श॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
garuṛa sumeru renū sama tāhī| rāma kṛpā kari citavā jāhī||
ati laghu rūpa dhareu hanumānā| paiṭhā nagara sumiri bhagavānā||
Meaning और हे गरुड़जी ! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमान्ूजीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया॥ २॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
maṃdira maṃdira prati kari sodhā| dekhe jaham̐ taham̐ aganita jodhā||
gayau dasānana maṃdira māhīṃ| ati bicitra kahi jāta so nāhīṃ||
Meaning उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महलकी खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावणके महलमें गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ ३॥
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥
sayana kie dekhā kapi tehī| maṃdira mahum̐ na dīkhi baidehī||
bhavana eka puni dīkha suhāvā| hari maṃdira taham̐ bhinna banāvā||
Meaning हनुमानूजीने उस (रावण) को शयन किये देखा; परन्तु महलमें जानकीजी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें ) भगवानका एक अलग मन्दिर बना हुआ था॥ ४॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥ ५॥
rāmāyudha aṃkita gṛha sobhā barani na jāi|
nava tulasikā bṛṃda taham̐ dekhi haraṣi kapirāi|| 5||
Meaning वह महल श्रीरामजीके आयुध ( धनुष-बाण) के चिह्लोंसे अड्ित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसीके वृक्ष-समूहोंको देखकर कपिराज श्रीहनुमान्जी हर्षित हुए॥ ५॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
laṃkā nisicara nikara nivāsā| ihām̐ kahām̐ sajjana kara bāsā||
mana mahum̐ taraka karai kapi lāgā| tehīṃ samaya bibhīṣanu jāgā||
Meaning लड्डा तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ ? हनुमानजी मनमें इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
rāma rāma tehiṃ sumirana kīnhā| hṛdayam̐ haraṣa kapi sajjana cīnhā||
ehi sana haṭhi karihaum̐ pahicānī| sādhu te hoi na kāraja hānī||
Meaning उन्होंने (विभीषणने ) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमान्ूजीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [ हनुमानूजीने विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है]॥ २॥
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
bipra rupa dhari bacana sunāe| sunata bibhīṣaṇa uṭhi taham̐ āe||
kari pranāma pūm̐chī kusalāī| bipra kahahu nija kathā bujhāī||
Meaning ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्जीने उन्हें वचन सुनाये ( पुकारा )। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके कुशल पूछी [ और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव ! अपनी कथा समझाकर कहिये॥ ३॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥
kī tumha hari dāsanha maham̐ koī| moreṃ hṛdaya prīti ati hoī||
kī tumha rāmu dīna anurāgī| āyahu mohi karana baṛabhāgī||
Meaning क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं ? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर- बेठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं ?॥ '४॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥
taba hanumaṃta kahī saba rāma kathā nija nāma|
sunata jugala tana pulaka mana magana sumiri guna grāma|| 6||
Meaning तब हनुमानूजीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और आनन्दमें] मगर हो गये॥ ६॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
sunahu pavanasuta rahani hamārī| jimi dasananhi mahum̐ jībha bicārī||
tāta kabahum̐ mohi jāni anāthā| karihahiṃ kṛpā bhānukula nāthā||
Meaning [विभीषणजीने कहा--] हे पवनपुत्र ! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतों के बीचमें बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे ?॥ १॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
tāmasa tanu kachu sādhana nāhīṃ| prīti na pada saroja mana māhīṃ||
aba mohi bhā bharosa hanumaṃtā| binu harikṛpā milahiṃ nahiṃ saṃtā||
Meaning मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान् ! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते॥ २॥
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
jau raghubīra anugraha kīnhā| tau tumha mohi darasu haṭhi dīnhā||
sunahu bibhīṣana prabhu kai rītī| karahiṃ sadā sevaka para prītī||
Meaning जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [ हनुमानूजीने कहा--] हे विभीषणजी ! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं॥ ३॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
kahahu kavana maiṃ parama kulīnā| kapi caṃcala sabahīṃ bidhi hīnā||
prāta lei jo nāma hamārā| tehi dina tāhi na milai ahārā||
Meaning भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ ? [ जातिका] चज्नल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रात:काल जो हमलोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७॥
asa maiṃ adhama sakhā sunu mohū para raghubīra|
kīnhī kṛpā sumiri guna bhare bilocana nīra|| 7||
Meaning हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ ७॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
jānatahūm̐ asa svāmi bisārī| phirahiṃ te kāhe na hohiṃ dukhārī||
ehi bidhi kahata rāma guna grāmā| pāvā anirbācya biśrāmā||
Meaning जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी ( श्रीरघुनाथजी ) को भुलाकर [ विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों ? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की॥ १॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
puni saba kathā bibhīṣana kahī| jehi bidhi janakasutā taham̐ rahī||
taba hanumaṃta kahā sunu bhrātā| dekhī cahaum̐ jānakī mātā||
Meaning फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लड्ामें) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमानूजीने कहा--हे भाई! सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ॥ २॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
juguti bibhīṣana sakala sunāī| caleu pavanasuta bidā karāī||
kari soi rūpa gayau puni tahavām̐| bana asoka sītā raha jahavām̐||
Meaning विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं। तब हनुमानजी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके जिस भागमें ) सीताजी रहती थीं॥ ३॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
dekhi manahi mahum̐ kīnha pranāmā| baiṭhehiṃ bīti jāta nisi jāmā||
kṛsa tana sīsa jaṭā eka benī| japati hṛdayam̐ raghupati guna śrenī||
Meaning सीताजीको देखकर हनुमानूजीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥ ४॥
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८॥
nija pada nayana diem̐ mana rāma pada kamala līna|
parama dukhī bhā pavanasuta dekhi jānakī dīna|| 8||
Meaning श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत ही दुखी हुए॥ ८॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
taru pallava mahum̐ rahā lukāī| karai bicāra karauṃ kā bhāī||
tehi avasara rāvanu taham̐ āvā| saṃga nāri bahu kiem̐ banāvā||
Meaning हनुमानजी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दु:ख कैसे दूर करूँ) ? उसी समय बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
bahu bidhi khala sītahi samujhāvā| sāma dāna bhaya bheda dekhāvā||
kaha rāvanu sunu sumukhi sayānī| maṃdodarī ādi saba rānī||
Meaning उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा--हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको--॥ २॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
tava anucarīṃ karaum̐ pana morā| eka bāra biloku mama orā||
tṛna dhari oṭa kahati baidehī| sumiri avadhapati parama sanehī||
Meaning मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स््रेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं--॥ ३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
sunu dasamukha khadyota prakāsā| kabahum̐ ki nalinī karai bikāsā||
asa mana samujhu kahati jānakī| khala sudhi nahiṃ raghubīra bāna kī||
Meaning हे दशमुख ! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल सकती है ? जानकीजी फिर कहती हैं-- तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट ! तुझे श्रीरघुबीरके बाणकी खबर नहीं है॥ ४॥
सठ सूने हरि आनेहि मोहि।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
saṭha sūne hari ānehi mohi| adhama nilajja lāja nahiṃ tohī||
Meaning रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निर्लज! तुझे लज्जा नहीं आती ?॥५॥
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९॥
āpuhi suni khadyota sama rāmahi bhānu samāna|
paruṣa bacana suni kāṛhi asi bolā ati khisiāna|| 9||
Meaning अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला--॥ ९॥
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
sītā taiṃ mama kṛta apamānā| kaṭihaum̐ tava sira kaṭhina kṛpānā||
nāhiṃ ta sapadi mānu mama bānī| sumukhi hoti na ta jīvana hānī||
Meaning सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा!॥ १॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
syāma saroja dāma sama suṃdara| prabhu bhuja kari kara sama dasakaṃdhara||
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
so bhuja kaṃṭha ki tava asi ghorā| sunu saṭha asa pravāna pana morā||
Meaning [ सीताजीने कहा--] हे दशग्रीव ! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥ २॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
caṃdrahāsa haru mama paritāpaṃ| raghupati biraha anala saṃjātaṃ||
sītala nisita bahasi bara dhārā| kaha sītā haru mama dukha bhārā||
Meaning सीताजी कहती हैं--हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्रिसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दु:ःखके बोझको हर ले॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
sunata bacana puni mārana dhāvā| mayatanayām̐ kahi nīti bujhāvā||
kahesi sakala nisicarinha bolāī| sītahi bahu bidhi trāsahu jāī||
Meaning सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
māsa divasa mahum̐ kahā na mānā| tau maiṃ mārabi kāṛhi kṛpānā||
Meaning यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद॥ १०॥
bhavana gayau dasakaṃdhara ihām̐ pisācini bṛṃda|
sītahi trāsa dekhāvahi dharahiṃ rūpa bahu maṃda|| 10||
Meaning [यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
trijaṭā nāma rācchasī ekā| rāma carana rati nipuna bibekā||
sabanhau boli sunāesi sapanā| sītahi sei karahu hita apanā||
Meaning उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबोंको बुलाकर अपना स्वप्र सुनाया और कहा--सीताजीकी सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥ १॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
sapaneṃ bānara laṃkā jārī| jātudhāna senā saba mārī||
khara ārūṛha nagana dasasīsā| muṃḍita sira khaṃḍita bhuja bīsā||
Meaning स्वप्रमें [ मैंने देखा कि] एक बंदरने लड्ठा जला दी। राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नज्जा है और गदहेपर सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥ २॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
ehi bidhi so dacchina disi jāī| laṃkā manahum̐ bibhīṣana pāī||
nagara phirī raghubīra dohāī| taba prabhu sītā boli paṭhāī||
Meaning इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी ) दिशाको जा रहा है और मानो लड्डा विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥ ३॥
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
yaha sapanā meṃ kahaum̐ pukārī| hoihi satya gaem̐ dina cārī||
tāsu bacana suni te saba ḍarīṃ| janakasutā ke carananhi parīṃ||
Meaning मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्र चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं॥ ४॥
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११॥
jaham̐ taham̐ gaīṃ sakala taba sītā kara mana soca|
māsa divasa bīteṃ mohi mārihi nisicara poca|| 11||
Meaning तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा॥ ११॥
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
trijaṭā sana bolī kara jorī| mātu bipati saṃgini taiṃ morī||
tajauṃ deha karu begi upāī| dusahu birahu aba nahiṃ sahi jāī||
Meaning सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं--हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्न हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
āni kāṭha racu citā banāī| mātu anala puni dehi lagāī||
satya karahi mama prīti sayānī| sunai ko śravana sūla sama bānī||
Meaning काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने ?॥ २॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
sunata bacana pada gahi samujhāesi| prabhu pratāpa bala sujasu sunāesi||
nisi na anala mila sunu sukumārī| asa kahi so nija bhavana sidhārī||
Meaning सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने कहा-- हे सुकुमारी ! सुनो, रात्रिकि समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
kaha sītā bidhi bhā pratikūlā| milahi na pāvaka miṭihi na sūlā||
dekhiata pragaṭa gagana aṃgārā| avani na āvata ekau tārā||
Meaning सीताजी [ मन-ही-मन] कहने लगीं--[क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अज्ारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता॥ ४॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
pāvakamaya sasi stravata na āgī| mānahum̐ mohi jāni hatabhāgī||
sunahi binaya mama biṭapa asokā| satya nāma karu haru mama sokā||
Meaning चन्द्रमा अग्िमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
nūtana kisalaya anala samānā| dehi agini jani karahi nidānā||
dekhi parama birahākula sītā| so chana kapihi kalapa sama bītā||
Meaning तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्िके समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमानूजीको कल्पके समान बीता॥ ६॥
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥ १२॥
kapi kari hṛdayam̐ bicāra dīnhi mudrikā ḍārī taba|
janu asoka aṃgāra dīnhi haraṣi uṭhi kara gaheu|| 12||
Meaning तब हनुमानूजीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने आड्ञारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
taba dekhī mudrikā manohara| rāma nāma aṃkita ati suṃdara||
cakita citava mudarī pahicānī| haraṣa biṣāda hṛdayam̐ akulānī||
Meaning तब उन्होंने राम-नामसे अड्ित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
jīti ko sakai ajaya raghurāī| māyā teṃ asi raci nahiṃ jāī||
sītā mana bicāra kara nānā| madhura bacana boleu hanumānā||
Meaning [वे सोचने लगीं--] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमानजी मधुर वचन बोले--॥ २॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
rāmacaṃdra guna baranaiṃ lāgā| sunatahiṃ sītā kara dukha bhāgā||
lāgīṃ sunaiṃ śravana mana lāī| ādihu teṃ saba kathā sunāī||
Meaning वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमानूजीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी॥ ३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥
śravanāmṛta jehiṃ kathā suhāī| kahi so pragaṭa hoti kina bhāī||
taba hanumaṃta nikaṭa cali gayaū| phiri baiṃṭhīṃ mana bisamaya bhayaū||
Meaning [ सीताजी बोलीं-- ] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमानजी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
rāma dūta maiṃ mātu jānakī| satya sapatha karunānidhāna kī||
yaha mudrikā mātu maiṃ ānī| dīnhi rāma tumha kaham̐ sahidānī||
Meaning [ हनुमानूजीने कहा--.] हे माता जानकी ! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कहि कथा भइ संगति जैसें॥
nara bānarahi saṃga kahu kaiseṃ| kahi kathā bhai saṃgati jaiseṃ||
Meaning [ सीताजीने पूछा--] नर और वानरका सड्ध कहो कैसे हुआ ? तब हनुमानूजीने जैसे सड् हुआ था, वह सब कथा कही॥ ६॥
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
kapi ke bacana saprema suni upajā mana bisvāsa|
jānā mana krama bacana yaha kṛpāsiṃdhu kara dāsa||
Meaning हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्मसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥ १३॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना॥
harijana jāni prīti ati gāṛhī| sajala nayana pulakāvali bāṛhī||
būṛata biraha jaladhi hanumānā| bhayau tāta moṃ kahum̐ jalajānā||
Meaning भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रोंमें। प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [ सीताजीने कहा--] हे तात हनुमान् ! विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
aba kahu kusala jāum̐ balihārī| anuja sahita sukha bhavana kharārī||
komalacita kṛpāla raghurāī| kapi kehi hetu dharī niṭhurāī||
Meaning मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मडज़ल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमलहदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान् ! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥ २॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता॥
sahaja bāni sevaka sukha dāyaka| kabahum̐ka surati karata raghunāyaka||
kabahum̐ nayana mama sītala tātā| hoihahi nirakhi syāma mṛdu gātā||
Meaning सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अड्ञोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे ?॥ ३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
bacanu na āva nayana bhare bārī| ahaha nātha hauṃ nipaṭa bisārī||
dekhi parama birahākula sītā| bolā kapi mṛdu bacana binītā||
Meaning [मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंगें [ विरहके आँसुओंका] जल भर आया। [ बड़े दुःखसे वे बोलीं--] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर हनुमानूजी कोमल और विनीत वचन बोले--॥ ४॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥
mātu kusala prabhu anuja sametā| tava dukha dukhī sukṛpā niketā||
jani jananī mānahu jiyam̐ ūnā| tumha te premu rāma keṃ dūnā||
Meaning हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित [शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुखी हैं। हे माता! मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है॥ ५॥
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४॥
raghupati kara saṃdesu aba sunu jananī dhari dhīra|
asa kahi kapi gada gada bhayau bhare bilocana nīra|| 14||
Meaning हे माता ! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये। ऐसा कहकर हनुमानजी प्रेमसे गदद हो गये। उनके नेत्रोंमें। प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया॥ १४॥
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
kaheu rāma biyoga tava sītā| mo kahum̐ sakala bhae biparītā||
nava taru kisalaya manahum̐ kṛsānū| kālanisā sama nisi sasi bhānū||
Meaning [ हनुमानूजी बोले--] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्रिके समान, रात्रि कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान॥ १॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
kubalaya bipina kuṃta bana sarisā| bārida tapata tela janu barisā||
je hita rahe karata tei pīrā| uraga svāsa sama tribidha samīrā||
Meaning और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँपके श्वासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥ २॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
kahehū teṃ kachu dukha ghaṭi hoī| kāhi kahauṃ yaha jāna na koī||
tatva prema kara mama aru torā| jānata priyā eku manu morā||
Meaning मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे ? यह दु:ख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ ३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
so manu sadā rahata tohi pāhīṃ| jānu prīti rasu etenahi māhīṃ||
prabhu saṃdesu sunata baidehī| magana prema tana sudhi nahiṃ tehī||
Meaning और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेममें मग्र हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥
kaha kapi hṛdayam̐ dhīra dharu mātā| sumiru rāma sevaka sukhadātā||
ura ānahu raghupati prabhutāī| suni mama bacana tajahu kadarāī||
Meaning हनुमानूजीने कहा--हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो॥ ५॥
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५॥
nisicara nikara pataṃga sama raghupati bāna kṛsānu|
jananī hṛdayam̐ dhīra dharu jare nisācara jānu|| 15||
Meaning राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग़्िके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥