ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।
जिपमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥ १०१ क॥
tāke guna gana kachu kahe jaṛamati tulasīdāsa|
jipami nija bala anurūpa te māchī uṛai akāsa|| 101 ka||
Meaning उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशगें उड़ती है॥ १०१ (क)॥
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥ १०१ ख॥
kāṭe sira bhuja bāra bahu marata na bhaṭa laṃkesa|
prabhu krīṛata sura siddha muni byākula dekhi kalesa|| 101 kha||
Meaning सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर ( प्रभुको क्लेश पाते समझकर ) व्याकुल हैं॥ १०१ (ख)॥
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥
kāṭata baṛhahiṃ sīsa samudāī| jimi prati lābha lobha adhikāī||
marai na ripu śrama bhayau biseṣā| rāma bibhīṣana tana taba dekhā||
Meaning काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा॥ १॥
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥
सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥
umā kāla mara jākīṃ īchā| so prabhu jana kara prīti parīchā||
sunu sarabagya carācara nāyaka| pranatapāla sura muni sukhadāyaka||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजीने कहा-] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी ! हे शरणागतके पालन करनेवाले ! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले ! सुनिये--॥ २॥
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥
nābhikuṃḍa piyūṣa basa yākeṃ| nātha jiata rāvanu bala tākeṃ||
sunata bibhīṣana bacana kṛpālā| haraṣi gahe kara bāna karālā||
Meaning इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये॥ ३॥
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥
बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥
asubha hona lāge taba nānā| rovahiṃ khara sṛkāla bahu svānā||
bolahi khaga jaga ārati hetū| pragaṭa bhae nabha jaham̐ taham̐ ketū||
Meaning उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्के दुःख (अशुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ -तहाँ केतु ( पुच्छल तारे ) प्रकट हो गये॥ ४॥
दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥
मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी॥
dasa disi dāha hona ati lāgā| bhayau paraba binu rabi uparāgā||
maṃdodari ura kaṃpati bhārī| pratimā stravahiṃ nayana maga bārī||
Meaning दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं॥ ५॥
प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥
pratimā rudahiṃ pabipāta nabha ati bāta baha ḍolati mahī|
baraṣahiṃ balāhaka rudhira kaca raja asubha ati saka ko kahī||
utapāta amita biloki nabha sura bikala bolahiṃ jaya jae|
sura sabhaya jāni kṛpāla raghupati cāpa sara jorata bhae||
Meaning मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्पात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमड़ल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है ? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशगें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।
खेैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहूँं काल फनीस॥ १०२॥
kheैṃci sarāsana śravana lagi chāṛe sara ekatīsa|
raghunāyaka sāyaka cale mānahūm̐ṃ kāla phanīsa|| 102||
Meaning कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों॥ १०२॥
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥
sāyaka eka nābhi sara soṣā| apara lage bhuja sira kari roṣā||
lai sira bāhu cale nārācā| sira bhuja hīna ruṃḍa mahi nācā||
Meaning एक बाणने नाभिके अमृतकुण्डको सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओंमें लगे। बाण सिरों और भुजाओंको लेकर चले। सिरों और भुजाओंसे रहित रुण्ड ( धड़) पृथ्वीपर नाचने लगा॥ १॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥
dharani dhasai dhara dhāva pracaṃḍā| taba sara hati prabhu kṛta dui khaṃḍā||
garjeu marata ghora rava bhārī| kahām̐ rāmu rana hatauṃ pacārī||
Meaning धड़ प्रचण्ड वेगसे दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभुने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते समय रावण बड़े घोर शब्दसे गरजकर बोला--राम कहाँ हैं ? मैं ललकारकर उनको युद्धमें मारूँ!॥ २॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥
ḍolī bhūmi girata dasakaṃdhara| chubhita siṃdhu sari diggaja bhūdhara||
dharani pareu dvau khaṃḍa baṛhāī| cāpi bhālu markaṭa samudāī||
Meaning रावणके गिरते ही पृथ्वी हिल गयी। समुद्र, नदियाँ, दिशाओंके हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़के दोनों टुकड़ोंको फैलाकर भालू और वानरोंके समुदायको दबाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३॥
मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥
प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥
maṃdodari āgeṃ bhuja sīsā| dhari sara cale jahām̐ jagadīsā||
prabise saba niṣaṃga mahu jāī| dekhi suranha duṃdubhīṃ bajāī||
Meaning रावणकी भुजाओं और सिरोंको मन्दोदरीके सामने रखकर राम-बाण वहाँ चले, जहाँ जगदी धर श्रीरामजी थे। सब बाण जाकर तरकसमें प्रवेश कर गये। यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये॥ ४॥
तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥
tāsu teja samāna prabhu ānana| haraṣe dekhi saṃbhu caturānana||
jaya jaya dhuni pūrī brahmaṃḍā| jaya raghubīra prabala bhujadaṃḍā||
Meaning रावणका तेज प्रभुके मुखमें समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माप्डभरमें जय-जयकी ध्वनि भर गयी। प्रबल भुजदण्डोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो॥ ५॥
बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा।
जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥
baraṣahi sumana deva muni bṛṃdā| jaya kṛpāla jaya jayati mukuṃdā||
Meaning देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं--कृपालुकी जय हो, मुकुन्दकी जय हो, जय हो!॥ ६॥
जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुशि गहगही।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥
jaya kṛpā kaṃda mukuṃda dvaṃda harana sarana sukhaprada prabho|
khala dala bidārana parama kārana kārunīka sadā bibho||
sura sumana baraṣahiṃ haraṣa saṃkula bāja duṃduśi gahagahī|
saṃgrāma aṃgana rāma aṃga anaṃga bahu sobhā lahī||
Meaning हे कृपाके कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द ! हे [ राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्वोंके हरनेवाले ! हे शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो ! हे दुष्ट-दलको विदीर्ण करनेवाले ! हे कारणोंके भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्षमें भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके अड्डोंने बहुत-से कामदेवोंकी शोभा प्राप्त की॥ १॥
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन शभ्वाजहीं॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥
sira jaṭā mukuṭa prasūna bica bica ati manohara rājahīṃ|
janu nīlagiri para taṛita paṭala sameta uḍugana śabhvājahīṃ||
bhujadaṃḍa sara kodaṃḍa pherata rudhira kana tana ati bane|
janu rāyamunīṃ tamāla para baiṭhīṃ bipula sukha āpane||
Meaning सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीचमें अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वतपर बिजलीके समूहसहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डोंसे बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीरपर रुधिरके कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान् सुखमें मग्र हुई निश्चल बैठी हों॥ २॥
कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बूंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॒॥ १०३॥
kṛpādṛṣṭi kari bṛṣṭi prabhu abhaya kie sura būṃda|
bhālu kīsa saba haraṣe jaya sukha dhāma mukuṃda|| 103||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्दकी जय हो, ऐसा पुकारने लगे॥ १०३॥
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आई॥
pati sira dekhata maṃdodarī| muruchita bikala dharani khasi parī||
jubati bṛṃda rovata uṭhi dhāīṃ| tehi uṭhāi rāvana pahiṃ āī||
Meaning पतिके सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूर््छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ीं और उस (मन्दोदरी) को उठाकर रावणके पास आयीं॥ १॥
पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥
उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥
pati gati dekhi te karahiṃ pukārā| chūṭe kaca nahiṃ bapuṣa sam̐bhārā||
ura tāṛanā karahiṃ bidhi nānā| rovata karahiṃ pratāpa bakhānā||
Meaning पतिकी दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं। उनके बाल खुल गये, देहकी सँभाल नहीं रही। वे अनेकों प्रकारसे छाती पीटती हैं और रोती हुई रावणके प्रतापका बखान करती हैं॥ २॥
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥
tava bala nātha ḍola nita dharanī| teja hīna pāvaka sasi taranī||
seṣa kamaṭha sahi sakahiṃ na bhārā| so tanu bhūmi pareu bhari chārā||
Meaning [वे कहती हैं--] हे नाथ! तुम्हारे बलसे पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्रि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें भरा हुआ पृथ्वीपर पड़ा है!॥ ३॥
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥
भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥
baruna kubera suresa samīrā| rana sanmukha dhari kāhum̐ na dhīrā||
bhujabala jitehu kāla jama sāīṃ| āju parehu anātha kī nāīṃ||
Meaning वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमेंसे किसीने भी रणमें तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबलसे काल और यमराजको भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथकोी तरह पड़े हो॥ ४॥
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई॥
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥
jagata bidita tumhārī prabhutāī| suta parijana bala barani na jāī||
rāma bimukha asa hāla tumhārā| rahā na kou kula rovanihārā||
Meaning तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियोंके बलका हाय ! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्रजीके विमुख होनेसे ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी न रह गया॥ ५॥
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥
tava basa bidhi prapaṃca saba nāthā| sabhaya disipa nita nāvahiṃ māthā||
aba tava sira bhuja jaṃbuka khāhīṃ| rāma bimukha yaha anucita nāhīṃ||
Meaning हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वशमें थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुखके लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है)॥ ६॥
काल बिबस पति कहा न माना।
अग जग नाथु मनुज करि जाना॥
kāla bibasa pati kahā na mānā| aga jaga nāthu manuja kari jānā||
Meaning हे पति! कालके पूर्ण वशमें होनेसे तुमने [किसीका] कहना नहीं माना और चराचरके नाथ परमात्माको मनुष्य करके जाना॥७॥
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रहमा निरामयं॥
jānyo manuja kari danuja kānana dahana pāvaka hari svayaṃ|
jehi namata siva brahmādi sura piya bhajehu nahiṃ karunāmayaṃ||
ājanma te paradroha rata pāpaughamaya tava tanu ayaṃ|
tumhahū diyo nija dhāma rāma namāmi brahamā nirāmayaṃ||
Meaning दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम ! तुमने नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बूंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥ १०४॥
ahaha nātha raghunātha sama kṛpāsiṃdhu nahiṃ āna|
jogi būṃda durlabha gati tohi dīnhi bhagavāna|| 104||
Meaning अहह! नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान कृपाका समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान्ने तुमको वह गति दी जो योगिसमाजको भी दुर्लभ है॥ १०४॥
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥
अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी॥
maṃdodarī bacana suni kānā| sura muni siddha sabanhi sukha mānā||
aja mahesa nārada sanakādī| je munibara paramārathabādī||
Meaning मन्दोद्रीके वचन कानोंसे सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी ( परमात्माके तत्त्वको जानने और कहनेवाले) श्रेष्ठ मुनि थे॥ १॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥
रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥
bhari locana raghupatihi nihārī| prema magana saba bhae sukhārī||
rudana karata dekhīṃ saba nārī| gayau bibhīṣanu mana dukha bhārī||
Meaning वे सभी श्रीरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्र हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घरकी सब स्त्रियोंको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा भारी दु:ख हुआ और वे उनके पास गये॥ २॥
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥
baṃdhu dasā biloki dukha kīnhā| taba prabhu anujahi āyasu dīnhā||
lachimana tehi bahu bidhi samujhāyo| bahuri bibhīṣana prabhu pahiṃ āyo||
Meaning उन्होंने भाईकी दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको आज्ञा दी [कि जाकर विभीषणको धैर्य बँधाओ]। लक्ष्मणजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया तब विभीषण प्रभुके पास लौट आये॥ ३॥
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥
kṛpādṛṣṭi prabhu tāhi bilokā| karahu kriyā parihari saba sokā||
kīnhi kriyā prabhu āyasu mānī| bidhivata desa kāla jiyam̐ jānī||
Meaning प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा [ और कहा--] सब शोक त्यागकर रावणकी अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर और हृदयमें देश और कालका विचार करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की॥ ४॥
मंदोदरी आदि सब देड़ तिलांजलि ताहि।
भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥ १०५॥
maṃdodarī ādi saba deṛa tilāṃjali tāhi|
bhavana gaīṃ raghupati guna gana baranata mana māhi|| 105||
Meaning मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे (रावणको ) तिलाझलि देकर मनमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन करती हुई महलको गयीं॥ १०५॥
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥
āi bibhīṣana puni siru nāyo| kṛpāsiṃdhu taba anuja bolāyo||
tumha kapīsa aṃgada nala nīlā| jāmavaṃta māruti nayasīlā||
saba mili jāhu bibhīṣana sāthā| sārehu tilaka kaheu raghunāthā||
pitā bacana maiṃ nagara na āvaum̐| āpu sarisa kapi anuja paṭhāvaum̐||
Meaning सब क्रिया-कर्म करनेके बाद विभीषणने आकर पुन: सिर नवाया। तब कृपाके समुद्र श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको बुलाया। श्रीरघुनाथजीने कहा कि तुम, वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषणके साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजीके वचनोंके कारण मैं नगरमें नहीं आ सकता। पर अपने ही समान वानर और छोटे भाईको भेजता हूँ॥ १-२॥
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना॥
सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी॥
turata cale kapi suni prabhu bacanā| kīnhī jāi tilaka kī racanā||
sādara siṃhāsana baiṭhārī| tilaka sāri astuti anusārī||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलककी सारी व्यवस्था की। आदरके साथ विभीषणको सिंहासनपर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की॥ ३॥
जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए॥
तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे॥
jori pāni sabahīṃ sira nāe| sahita bibhīṣana prabhu pahiṃ āe||
taba raghubīra boli kapi līnhe| kahi priya bacana sukhī saba kīnhe||
Meaning सभीने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाये। तदनन्तर विभीषणजीसहित सब प्रभुके पास आये। तब श्रीरघुवीरने वानरोंको बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया॥ ४॥
किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।
पायो बिभीषन राज तिहूँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो॥
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइटहैं।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं॥
kie sukhī kahi bānī sudhā sama bala tumhāreṃ ripu hayo|
pāyo bibhīṣana rāja tihūm̐ pura jasu tumhāro nita nayo||
mohi sahita subha kīrati tumhārī parama prīti jo gāiṭahaiṃ|
saṃsāra siṃdhu apāra pāra prayāsa binu nara pāihaiṃ||
Meaning भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया। इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा। जो लोग मेरेसहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायूँगे।
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥ १०६॥
prabhu ke bacana śravana suni nahiṃ aghāhiṃ kapi puṃja|
bāra bāra sira nāvahiṃ gahahiṃ sakala pada kaṃja|| 106||
Meaning प्रभुके वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त नहीं होते। वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलोंको पकड़ते हैं॥ १०६॥
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥
समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥
puni prabhu boli liyau hanumānā| laṃkā jāhu kaheu bhagavānā||
samācāra jānakihi sunāvahu| tāsu kusala lai tumha cali āvahu||
Meaning फिर प्रभुने हनुमानूजीको बुला लिया। भगवान्ने कहा--तुम लड्डठा जाओ। जानकोको सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ॥ १॥
तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए॥
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥
taba hanumaṃta nagara mahum̐ āe| suni nisicarī nisācara dhāe||
bahu prakāra tinha pūjā kīnhī| janakasutā dekhāi puni dīnhī||
Meaning तब हनुमानजी नगरमें आये। यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [उनके सत्कारके लिये] दौड़े। उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमानूजीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला दिया॥ २॥
दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकीं चीन्हा॥
कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥
dūrahi te pranāma kapi kīnhā| raghupati dūta jānakīṃ cīnhā||
kahahu tāta prabhu kṛpāniketā| kusala anuja kapi sena sametā||
Meaning हनुमान्ूजीने [। सीताजीको] दूरसे ही प्रणाम किया। जानकीजीने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [ और पूछा--] हे तात! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं 2?॥ ३॥
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥
अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥
saba bidhi kusala kosalādhīsā| mātu samara jītyo dasasīsā||
abicala rāju bibhīṣana pāyo| suni kapi bacana haraṣa ura chāyo||
Meaning [ हनुमानूजीने कहा--] हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल हैं। उन्होंने संग्राममें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमानूजीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया॥ ४॥
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउें तोहि त्रेलोक महूँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥
सुनु मातु में पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥
ati haraṣa mana tana pulaka locana sajala kaha puni puni ramā|
kā deuेṃ tohi treloka mahūm̐ kapi kimapi nahiṃ bānī samā||
sunu mātu meṃ pāyo akhila jaga rāju āju na saṃsayaṃ|
rana jīti ripudala baṃdhu juta pasyāmi rāmamanāmayaṃ||
Meaning श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंगें [ आनन्दाश्रुओंका] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं--हे हनुमान्! मैं तुझे कया दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं है! [ हनुमानूजीने कहा--] हे माता! सुनिये, मैंने आज निः:सन्देह सारे जगत्का राज्य पा लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ।
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयें बसहुँ हनुमंत।
सानुकूल कोसलपति रहहूं समेत अनंत॥ १०७॥
sunu suta sadaguna sakala tava hṛdayeṃ basahum̐ hanumaṃta|
sānukūla kosalapati rahahūṃ sameta anaṃta|| 107||
Meaning [ जानकीजीने कहा--] हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदयमें बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी ) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें॥ १०७॥
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥
तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥
aba soi jatana karahu tumha tātā| dekhauṃ nayana syāma mṛdu gātā||
taba hanumāna rāma pahiṃ jāī| janakasutā kai kusala sunāī||
Meaning हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमानूजीने जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया॥ १॥
सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥
मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥
suni saṃdesu bhānukulabhūṣana| boli lie jubarāja bibhīṣana||
mārutasuta ke saṃga sidhāvahu| sādara janakasutahi lai āvahu||
Meaning सूर्यकुलभूषण श्रीरामजीने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [और कहा--] पवनपुत्र हनुमानके साथ जाओ और जानकीको आदरके साथ ले आओ॥ २॥
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥
बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥
turatahiṃ sakala gae jaham̐ sītā| sevahiṃ saba nisicarīṃ binītā||
begi bibhīṣana tinhahi sikhāyo| tinha bahu bidhi majjana karavāyo||
Meaning वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्रान कराया,॥ ३॥
बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥
ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥
bahu prakāra bhūṣana pahirāe| sibikā rucira sāji puni lyāe||
tā para haraṣi caṛhī baidehī| sumiri rāma sukhadhāma sanehī||
Meaning बहुत प्रकारके गहने पहनाये और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथ चढ़ीं॥ ४॥
बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥
देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥
betapāni racchaka cahum̐ pāsā| cale sakala mana parama hulāsā||
dekhana bhālu kīsa saba āe| racchaka kopi nivārana dhāe||
Meaning चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले। सबके मनोंमें परम उल्लास (उमंग) है। रीछ-वानर सब दर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े॥ ५॥
कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥
देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई॥
kaha raghubīra kahā mama mānahu| sītahi sakhā payādeṃ ānahu||
dekhahum̐ kapi jananī kī nāīṃ| bihasi kahā raghunātha gosāī||
Meaning श्रीरघुवीरने कहा--हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माताकी तरह देखें। गोसाईं श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा॥ ६॥
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥
सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥
suni prabhu bacana bhālu kapi haraṣe| nabha te suranha sumana bahu baraṣe||
sītā prathama anala mahum̐ rākhī| pragaṭa kīnhi caha aṃtara sākhī||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये। आकाशसे देवताओंने बहुत-से फूल बरसाये। सीताजी [ के असली स्वरूप] को पहले अग्रिमें रखा था। अब भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं॥ ७॥
तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करे बिषाद॥ २०८॥
tehi kārana karunānidhi kahe kachuka durbāda|
sunata jātudhānīṃ saba lāgīṃ kare biṣāda|| 208||
Meaning इसी कारण करुणाके भण्डार श्रीरामजीने लीलासे कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं॥ १०८॥
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥
prabhu ke bacana sīsa dhari sītā| bolī mana krama bacana punītā||
lachimana hohu dharama ke negī| pāvaka pragaṭa karahu tumha begī||
Meaning प्रभुके वचनोंको सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्मसे पवित्र श्रीसीताजी बोलीं--हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मके नेगी ( धर्माचरणमें सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो॥ १॥
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥
suni lachimana sītā kai bānī| biraha bibeka dharama niti sānī||
locana sajala jori kara doū| prabhu sana kachu kahi sakata na oū||
Meaning श्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रों में [विषादके अँसुओंका] जल भर आया। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते॥ २॥
देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥
पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥
dekhi rāma rukha lachimana dhāe| pāvaka pragaṭi kāṭha bahu lāe||
pāvaka prabala dekhi baidehī| hṛdayam̐ haraṣa nahiṃ bhaya kachu tehī||
Meaning फिर श्रीरामजीका रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये। अग्रिको खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजीके हदयमें हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥ ३॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥
jauṃ mana baca krama mama ura māhīṃ| taji raghubīra āna gati nāhīṃ||
tau kṛsānu saba kai gati jānā| mo kahum̐ hou śrīkhaṃḍa samānā||
Meaning [ सीताजीने लीलासे कहा--] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसीका आश्रय) नहीं है, तो अग्रिदेव जो सबके मनकी गति जानते हैं, [ मेरे भी मनकी गति जानकर] मेरे लिये चन्दनके समान शीतल हो जायेँ॥ ४॥
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।
प्रभुचरित काहूँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥
śrīkhaṃḍa sama pāvaka prabesa kiyo sumiri prabhu maithilī|
jaya kosalesa mahesa baṃdita carana rati ati nirmalī||
pratibiṃba aru laukika kalaṃka pracaṃḍa pāvaka mahum̐ jare|
prabhucarita kāhūm̐ na lakhe nabha sura siddha muni dekhahiṃ khare||
Meaning प्रभु श्रीराीमजीका स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजीके द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजीकी अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चन्दनके समान शीतल हुई अग्रिमें प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजीकी छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्िमें जल गये। प्रभुके इन चरित्रोंको किसीने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े देखते हैं॥ १॥
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥
dhari rūpa pāvaka pāni gahi śrī satya śruti jaga bidita jo|
jimi chīrasāgara iṃdirā rāmahi samarpī āni so||
राम बाम विभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहूँ कनक पंकज की कली॥
rāma bāma vibhāga rājati rucira ati sobhā bhalī|
nava nīla nīraja nikaṭa mānahūm̐ kanaka paṃkaja kī kalī||
Meaning तब अग्िने शरीर धारण करके वेदोंमें और जगतमें प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजीको वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागरने विष्णुभगवानूको लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके वाम भागमें विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो॥ २॥
बरपहिं सुमन हरघषि सुर बाजहिं गगन निसान।
गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥ १०९ ( क )॥
barapahiṃ sumana haraghaṣi sura bājahiṃ gagana nisāna|
gāvahiṃ kiṃnara surabadhū nācahiṃ caṛhīṃ bimāna|| 109 ( ka )||
Meaning देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाशमें डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥ १०९ (क)॥
जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥ १०९ ( ख )॥
janakasutā sameta prabhu sobhā amita apāra|
dekhi bhālu kapi haraṣe jaya raghupati sukha sāra|| 109 ( kha )||
Meaning श्रीजानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गये और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय बोलने लगे॥ १०९ (ख)॥
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥
taba raghupati anusāsana pāī| mātali caleu carana siru nāī||
āe deva sadā svārathī| bacana kahahiṃ janu paramārathī||
Meaning तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर [रथ लेकर] चला गया। तदनन्तर सदाके स्वार्थी देवता आये। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों॥ १॥
दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥
dīna baṃdhu dayāla raghurāyā| deva kīnhi devanha para dāyā||
bisva droha rata yaha khala kāmī| nija agha gayau kumāragagāmī||
Meaning हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव ! आपने देवताओंपर बड़ी दया की। विश्वके द्रोहमें तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्गपर चलनेवाला रावण अपने ही पापसे नष्ट हो गया॥ २॥
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥
tumha samarūpa brahma abināsī| sadā ekarasa sahaja udāsī||
akala aguna aja anagha anāmaya| ajita amoghasakti karunāmaya||
Meaning आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभावसे ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित ), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणोंसे रहित ), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं॥ ३॥
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥
mīna kamaṭha sūkara naraharī| bāmana parasurāma bapu dharī||
jaba jaba nātha suranha dukhu pāyo| nānā tanu dhari tumhaim̐ nasāyo||
Meaning आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुरामके शरीर धारण किये। हे नाथ ! जब- जब देवताओंने दुःख पाया, तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया॥ ४॥
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही॥
अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरे मन बिसमय आवा॥
yaha khala malina sadā suradrohī| kāma lobha mada rata ati kohī||
adhama siromani tava pada pāvā| yaha hamare mana bisamaya āvā||
Meaning यह दुष्ट मलिनहदय, देवताओंका नित्य शत्रु, काम, लोभ और मदके परायण तथा अत्यन्त क्रोधी था। ऐसे अधमोंके शिरोमणिने भी आपका परमपद पा लिया। इस बातका हमारे मनमें आश्चर्य हुआ॥ ५॥
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥
भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥
hama devatā parama adhikārī| svāratha rata prabhu bhagati bisārī||
bhava prabāham̐ saṃtata hama pare| aba prabhu pāhi sarana anusare||
Meaning हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह ( जन्म-मृत्युके चक्र) में पड़े हैं। अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये॥ ६॥ ल
करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहेँ तह कर जोरि।
अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥ ११०॥
kari binatī sura siddha saba rahe jahem̐ taha kara jori|
ati saprema tana pulaki bidhi astuti karata bahori|| 110||
Meaning विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे। तब अत्यन्त प्रेमसे पुलकितशरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे--॥ ११०॥
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥
भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥
jaya rāma sadā sukhadhāma hare| raghunāyaka sāyaka cāpa dhare||
bhava bārana dārana siṃha prabho| guna sāgara nāgara nātha bibho||
Meaning हे नित्य सुखधाम और [दुःखोंको हरनेवाले] हरि! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी ! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथीको विदीर्ण करनेके लिये सिंहके समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक ! आप गुणोंके समुद्र और परम चतुर हैं॥ १॥
तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥
जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥
tana kāma aneka anūpa chabī| guna gāvata siddha munīṃdra kabī||
jasu pāvana rāvana nāga mahā| khaganātha jathā kari kopa gahā||
Meaning आपके शरीरकी अनेकों कामदेवोंके समान, परन्तु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्पको गरुड़की तरह क्रोध करके पकड़ लिया॥ २॥
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥
अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥ ३॥
jana raṃjana bhaṃjana soka bhayaṃ| gatakrodha sadā prabhu bodhamayaṃ||
avatāra udāra apāra gunaṃ| mahi bhāra bibhaṃjana gyānaghanaṃ|| 3||
Meaning हे प्रभो ! आप सेवकोंको आनन्द देनेवाले, शोक और भयका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वीका भार उतारनेवाला और ज्ञानका समूह है॥ ३॥
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥
रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥ ४॥
aja byāpakamekamanādi sadā| karunākara rāma namāmi mudā||
raghubaṃsa bibhūṣana dūṣana hā| kṛta bhūpa bibhīṣana dīna rahā|| 4||
Meaning [ किन्तु अवतार लेनेपर भी ] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणाकी खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्षके साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके आभूषण! हे दूषण राक्षसको मारनेवाले तथा समस्त दोषोंको हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [लंकाका] राजा बना दिया॥ ४॥
गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥ ५॥
guna gyāna nidhāna amāna ajaṃ| nita rāma namāmi bibhuṃ birajaṃ||
bhujadaṃḍa pracaṃḍa pratāpa balaṃ| khala bṛṃda nikaṃda mahā kusalaṃ|| 5||
Meaning हे गुण और ज्ञानके भण्डार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारोंसे रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डोंका प्रताप और बल प्रचण्ड है। दुष्टसमूहके नाश करनेमें आप परम निपुण हैं॥ ५॥
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥
भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥ ६॥
binu kārana dīna dayāla hitaṃ| chabi dhāma namāmi ramā sahitaṃ||
bhava tārana kārana kāja paraṃ| mana saṃbhava dāruna doṣa haraṃ|| 6||
Meaning हे बिना ही कारण दीनोंपर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभाके धाम! मैं श्रीजनकीजीसहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागरसे तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनोंसे परे हैं और मनसे उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषोंको हरनेवाले हैं॥ ६॥
सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं॥
सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥ ७॥
sara cāpa manohara trona dharaṃ| jarajāruna locana bhūpabaraṃ||
sukha maṃdira suṃdara śrīramanaṃ| mada māra mudhā mamatā samanaṃ|| 7||
Meaning आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं। [ लाल] कमलके समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओंगें श्रेष्ठ, सुखके मन्दिर, सुन्दर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहड्ार), काम और झूठी ममताके नाश करनेवाले हैं॥ ७॥
अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो॥
इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥ ८॥
anavadya akhaṃḍa na gocara go| sabarūpa sadā saba hoi na go||
iti beda badaṃti na daṃtakathā| rabi ātapa bhinnamabhinna jathā|| 8||
Meaning आप अनिन््द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दन्तकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं॥ ८ १॥
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥
धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥
kṛtakṛtya bibho saba bānara e| nirakhaṃti tavānana sādara e||
dhiga jīvana deva sarīra hare| tava bhakti binā bhava bhūli pare||
Meaning हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [और] हे हरे! हमारे [अमर] जीवन और देव (दिव्य) शरीरको धिक्कार है, जो हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें (सांसारिक विषयोंमें) भूले पड़े हैं॥९॥
अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥ १०॥
aba dīna dayāla dayā kariai| mati mori bibhedakarī hariai||
jehi te biparīta kriyā kariai| dukha so sukha māni sukhī cariai|| 10||
Meaning हे दीनदयालु ! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ॥ १०॥
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥
नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं॥ ११॥
khala khaṃḍana maṃḍana ramya chamā| pada paṃkaja sevita saṃbhu umā||
nṛpa nāyaka de baradānamidaṃ| caranāṃbuja prema sadā subhadaṃ|| 11||
Meaning आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वतीद्वारा सेवित हैं। हे राजाओंके महाराज! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [ अनन्य] प्रेम हो॥ १४॥
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
binaya kīnhi caturānana prema pulaka ati gāta|
भासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ २११॥
bhāsiṃdhu bilokata locana nahīṃ aghāta|| 211||
Meaning इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीरसे विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे॥ १११॥
तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥
अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥
tehi avasara dasaratha taham̐ āe| tanaya biloki nayana jala chāe||
anuja sahita prabhu baṃdana kīnhā| āsirabāda pitām̐ taba dīnhā||
Meaning उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्र ( श्रीरामजी ) को देखकर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया॥ १॥
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥
सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥
tāta sakala tava punya prabhāū| jītyoṃ ajaya nisācara rāū||
suni suta bacana prīti ati bāṛhī| nayana salila romāvali ṭhāṛhī||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे तात! यह सब आपके पुण्योंका प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रोंगें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी॥ २॥
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥
raghupati prathama prema anumānā| citai pitahi dīnheu dṛṛha gyānā||
tāte umā moccha nahiṃ pāyo| dasaratha bheda bhagati mana lāyo||
Meaning श्रीरघुनाथजीने पहलेके (जीवित कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [ कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया॥ ३॥
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥
sagunopāsaka moccha na lehīṃ| tinha kahum̐ rāma bhagati nija dehīṃ||
bāra bāra kari prabhuhi pranāmā| dasaratha haraṣi gae suradhāmā||
Meaning [ मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त ] सगुणस्वरूपकी उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभुको [ इष्टबुद्धिसे] बार- बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये॥ ४॥
अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।
anuja jānakī sahita prabhu kusala kosalādhīsa|
भा देखि हरघषि मन अस्तुति कर सुर इंस॥ ११२॥
bhā dekhi haraghaṣi mana astuti kara sura iṃsa|| 112||
Meaning छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इन्द्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे--॥ ११२॥
जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम॥
धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप॥ १॥
jaya rāma sobhā dhāma| dāyaka pranata biśrāma||
dhṛta trona bara sara cāpa| bhujadaṃḍa prabala pratāpa|| 1||
Meaning शोभाके धाम, शरणागतको विश्राम देनेवाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किये हुए, प्रबल प्रतापी भुजदण्डोंवाले श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो!॥ १॥
जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥
यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥ २॥
jaya dūṣanāri kharāri| mardana nisācara dhāri||
yaha duṣṭa māreu nātha| bhae deva sakala sanātha|| 2||
Meaning हे खर और दूषणके शत्रु और राक्षसोंकी सेनाके मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्टको मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गये॥ २॥
जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥
जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥ ३॥
jaya harana dharanī bhāra| mahimā udāra apāra||
jaya rāvanāri kṛpāla| kie jātudhāna bihāla|| 3||
Meaning हे भूमिका भार हरनेवाले! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपकी जय हो। हे रावणके शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो। आपने राक्षसोंको बेहाल (तहस-नहस) कर दिया॥ ३॥
लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब॥
मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग॥ ४॥
laṃkesa ati bala garba| kie basya sura gaṃdharba||
muni siddha nara khaga nāga| haṭhi paṃtha saba keṃ lāga|| 4||
Meaning लंकापति रावणको अपने बलका बहुत घमंड था। उसने देवता और गन्धर्व सभीको अपने वशभगें कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभीके हठपूर्वक (हाथ धोकर) पीछे पड़ गया था॥ ४॥
परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥
अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥ ५॥
paradroha rata ati duṣṭa| pāyo so phalu pāpiṣṭa||
aba sunahu dīna dayāla| rājīva nayana bisāla|| 5||
Meaning वह दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था। उस पापीने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनॉपर दया करनेवाले ! हे कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले! सुनिये॥ ५॥
मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥
अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥ ६॥
mohi rahā ati abhimāna| nahiṃ kou mohi samāna||
aba dekhi prabhu pada kaṃja| gata māna prada dukha puṃja|| 6||
Meaning मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु (आप) के चरणकमलों के दर्शन करनेसे दुःख-समूहका देनेवाला मेरा वह अभिमान जाता रहा॥ ६॥
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥
मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥ ७॥
kou brahma nirguna dhyāva| abyakta jehi śruti gāva||
mohi bhāva kosala bhūpa| śrīrāma saguna sarūpa|| 7||
Meaning कोई उन निर्गुन ब्रह्मका ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं। परन्तु हे रामजी! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है॥७॥
बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत॥
मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास॥ ८॥
baidehi anuja sameta| mama hṛdayam̐ karahu niketa||
mohi jānie nija dāsa| de bhakti ramānivāsa|| 8||
Meaning श्रीजनकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हदयमें अपना घर बनाइये। हे रमानिवास ! मुझे अपना दास समझिये और अपनी भक्ति दीजिये॥ ८॥
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥
सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं।
ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥
de bhakti ramānivāsa trāsa harana sarana sukhadāyakaṃ|
sukha dhāma rāma namāmi kāma aneka chabi raghunāyakaṃ||
sura bṛṃda raṃjana dvaṃda bhaṃjana manuja tanu atulitabalaṃ|
brahmādi saṃkara sebya rāma namāmi karunā komalaṃ||
Meaning हे रमानिवास! हे शरणागतके भयको हरनेवाले और उसे सब प्रकारका सुख देनेवाले ! मुझे अपनी भक्ति दीजिये। हे सुखके धाम! हे अनेकों कामदेवोंकी छबिवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूहको आनन्द देनेवाले, [ जन्म-मृत्यु, हर्ष- विषाद, सुख-दु:ःख आदि] द्वन्द्रोंकें नाश करनेवाले, मनुष्यशरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदिसे सेवनीय, करुणासे कोमल श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।
काह करों सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल॥ ११३॥
aba kari kṛpā biloki mohi āyasu dehu kṛpāla|
kāha karoṃ suni priya bacana bole dīnadayāla|| 113||
Meaning हे कृपालु ! अब मेरी ओर कृपा करके (कृपादृष्टिसे) देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं कया [सेवा] करूँ! इन्द्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले--॥ ११३॥
सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे॥
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥
sunu surapati kapi bhālu hamāre| pare bhūmi nisacaranhi je māre||
mama hita lāgi taje inha prānā| sakala jiāu suresa sujānā||
Meaning हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरोंने मार डाला है, पृथ्वीपर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हितके लिये अपने प्राण त्याग दिये। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो॥ १॥
सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥
sunu khagesa prabhu kai yaha bānī| ati agādha jānahiṃ muni gyānī||
prabhu saka tribhuana māri jiāī| kevala sakrahi dīnhi baṛāī||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़! सुनिये, प्रभुके ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकीको मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्रको बड़ाई दी है॥ २॥
सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥
sudhā baraṣi kapi bhālu jiāe| haraṣi uṭhe saba prabhu pahiṃ āe||
sudhābṛṣṭi bhai duhu dala ūpara| jie bhālu kapi nahiṃ rajanīcara||
Meaning इन्द्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आये। अमृतकी वर्षा दोनों ही दलोंपर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं॥ ३॥
रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥
सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥
rāmākāra bhae tinha ke mana| mukta bhae chūṭe bhava baṃdhana||
sura aṃsika saba kapi aru rīchā| jie sakala raghupati kīṃ īchā||
Meaning क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव- बन्धन छूट गये। किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश ( भगवान्की लीलाके परिकर) थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजीकी इच्छासे जीवित हो गये॥ ४॥
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥
खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥
rāma sarisa ko dīna hitakārī| kīnhe mukuta nisācara jhārī||
khala mala dhāma kāma rata rāvana| gati pāī jo munibara pāva na||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके समान दीनोंका हित करनेवाला कौन है ? जिन्होंने सारे राक्षसोंको मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर और कामी रावणने भी वह गति पायी जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते॥ ५॥
सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।
देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ सभु सुजान॥ ११७ (क,॥
sumana baraṣi saba sura cale caṛhi caṛhi rucira bimāna|
dekhi suavasara prabhu pahiṃ āyau sabhu sujāna|| 117 (ka,||
Meaning फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानोंपर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर जानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास आये--॥ ११४ (क)॥
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
पुलकित तन गदगद गिरा बिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ ( ख )॥
parama prīti kara jori juga nalina nayana bhari bāri|
pulakita tana gadagada girā binaya karata tripurāri|| 114 ( kha )||
Meaning और परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमलके समान नेत्रोंगें जल भरकर, पुलकित शरीर और गदूगद वाणीसे त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे--॥ ११४ (ख)॥
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥
māmabhirakṣaya raghukula nāyaka| dhṛta bara cāpa rucira kara sāyaka||
moha mahā ghana paṭala prabhaṃjana| saṃsaya bipina anala sura raṃjana||
Meaning हे रघुकुलके स्वामी! सुन्दर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूहके [उड़ानेके] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वनके [ भस्म करनेके] लिये अग्ि हैं और देवताओंको आनन्द देनेवाले हैं॥ १॥
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥
काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥
aguna saguna guna maṃdira suṃdara| bhrama tama prabala pratāpa divākara||
kāma krodha mada gaja paṃcānana| basahu niraṃtara jana mana kānana||
Meaning आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं। भ्रमरूपी अन्धकारके [ नाशके ] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [वधके] लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये॥ २॥
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥
भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥
biṣaya manoratha puṃja kaṃja bana| prabala tuṣāra udāra pāra mana||
bhava bāridhi maṃdara paramaṃ dara| bāraya tāraya saṃsṛti dustara||
Meaning विषयकामनाओंके समूहरूपी कमलवनके [ नाशके] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मनसे परे हैं। भवसागर [को मथने] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भयको दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागरसे पार कीजिये॥ ३॥
स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥
मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥
syāma gāta rājīva bilocana| dīna baṃdhu pranatārati mocana||
anuja jānakī sahita niraṃtara| basahu rāma nṛpa mama ura aṃtara||
muni raṃjana mahi maṃḍala maṃḍana| tulasidāsa prabhu trāsa bikhaṃḍana||
Meaning हे श्यामसुन्दर-शरीर ! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु ! हे शरणागतको दुःखसे छुड़ानेवाले ! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजीसहित निरन्तर मेरे हृदयके अंदर निवास कीजिये। आप मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डलके भूषण, तुलसीदासके प्रभु और भयका नाश करनेवाले हैं॥ ४-५॥
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइ़हि तिलक तुम्हार।
कृपासिंधु में आउब देखन चरित उदार॥ ११५॥
nātha jabahiṃ kosalapurīṃ hoihi tilaka tumhāra|
kṛpāsiṃdhu meṃ āuba dekhana carita udāra|| 115||
Meaning हे नाथ! जब अयोध्यापुरीमें आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा॥ ११५॥
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥
नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥
kari binatī jaba saṃbhu sidhāe| taba prabhu nikaṭa bibhīṣanu āe||
nāi carana siru kaha mṛdu bānī| binaya sunahu prabhu sāram̐gapānī||
Meaning जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीसे बोले--हे शा धनुषके धारण करनेवाले प्रभो ! मेरी विनती सुनिये--॥ १॥
सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो॥
दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥
sakula sadala prabhu rāvana mār yo| pāvana jasa tribhuvana bistār yo||
dīna malīna hīna mati jātī| mo para kṛpā kīnhi bahu bhām̐tī||
Meaning आपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की॥ २॥
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥
देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥
aba jana gṛha punīta prabhu kīje| majjanu karia samara śrama chīje||
dekhi kosa maṃdira saṃpadā| dehu kṛpāla kapinha kahum̐ mudā||
Meaning अब हे प्रभु ! इस दासके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्त्रान कीजिये, जिससे युद्धकी थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्तिका निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको दीजिये॥ ३॥
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥
सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥
saba bidhi nātha mohi apanāia| puni mohi sahita avadhapura jāia||
sunata bacana mṛdu dīnadayālā| sajala bhae dvau nayana bisālā||
Meaning हे नाथ! मुझे सब प्रकारसे अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरीको पधारिये। विभीषणजीके कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके दोनों विशाल नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया॥ ४॥
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥ ११६ ( क )॥
tora kosa gṛha mora saba satya bacana sunu bhrāta|
bharata dasā sumirata mohi nimiṣa kalpa sama jāta|| 116 ( ka )||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है। पर भरतकी दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्पके समान बीत रहा है॥ ११६ (क)॥