अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥
तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥
asa kahi ratha raghunātha calāvā| bipra carana paṃkaja siru nāvā||
taba laṃkesa krodha ura chāvā| garjata tarjata sanmukha dhāvā||
Meaning ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा॥ १॥
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥
रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥
jītehu je bhaṭa saṃjuga māhīṃ| sunu tāpasa maiṃ tinha sama nāhīṃ||
rāvana nāma jagata jasa jānā| lokapa jākeṃ baṃdīkhānā||
Meaning [ उसने कहा--] अरे तपस्वी ! सुनो, तुमने युद्धमें जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं॥ २॥
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥
निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥
khara dūṣana birādha tumha mārā| badhehu byādha iva bāli bicārā||
nisicara nikara subhaṭa saṃghārehu| kuṃbhakarana ghananādahi mārehu||
Meaning तुमने खर, दूषण और विराधको मारा। बेचारे बालिका व्याधकी तरह वध किया। बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनादको भी मारा॥ ३॥
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं॥
आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥
āju bayaru sabu leum̐ nibāhī| jauṃ rana bhūpa bhāji nahiṃ jāhīṃ||
āju karaum̐ khalu kāla havāle| parehu kaṭhina rāvana ke pāle||
Meaning अरे राजा! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [वह] सारा वैर निकाल लूँगा। आज मैं तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूँगा। तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो॥ ४॥
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥
suni durbacana kālabasa jānā| biham̐si bacana kaha kṛpānidhānā||
satya satya saba tava prabhutāī| jalpasi jani dekhāu manusāī||
Meaning रावणके दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह वचन कहा--तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है। पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ॥ ५॥
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।
संसार महेँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलड़ केवल लागहीं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
jani jalpanā kari sujasu nāsahi nīti sunahi karahi chamā|
saṃsāra mahem̐ pūruṣa tribidha pāṭala rasāla panasa samā||
eka sumanaprada eka sumana phala eka phalaṛa kevala lāgahīṃ|
eka kahahiṃ kahahiṃ karahiṃ apara eka karahiṃ kahata na bāgahīṃ||
Meaning व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं--पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान। एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [ पुरुषोंमें] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं।
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥ ९०॥
rāma bacana suni biham̐sā mohi sikhāvata gyāna|
bayaru karata nahiṃ taba ḍare aba lāge priya prāna|| 90||
Meaning श्रीरीमजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला--) मुझे ज्ञान सिखाते हो ? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं॥ ९०॥
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर॥
नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए॥
kahi durbacana kruddha dasakaṃdhara| kulisa samāna lāga chām̐ṛai sara||
nānākāra silīmukha dhāe| disi aru bidisa gagana mahi chāe||
Meaning दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर व्रके समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकारके बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें, सब जगह छा गये॥ १॥
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा॥
छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई॥
pāvaka sara chām̐ṛeu raghubīrā| chana mahum̐ jare nisācara tīrā||
chāṛisi tībra sakti khisiāī| bāna saṃga prabhu pheri calāī||
Meaning श्रीरघुवीरने अग्रिबाण छोड़ा, [जिससे। रावणके सब बाण क्षणभरमें भस्म हो गये। तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [किन्तु] श्रीरामचन्द्रजीने उसको बाणके साथ वापस भेज दिया॥ २॥
कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै॥
निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें॥
koṭika cakra trisūla pabārai| binu prayāsa prabhu kāṭi nivārai||
niphala hohiṃ rāvana sara kaiseṃ| khala ke sakala manoratha jaiseṃ||
Meaning वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ !॥ ३॥
तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥
राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥
taba sata bāna sārathī māresi| pareu bhūmi jaya rāma pukāresi||
rāma kṛpā kari sūta uṭhāvā| taba prabhu parama krodha kahum̐ pāvā||
Meaning तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे। वह श्रीरामजीकी जय पुकारकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया। तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए॥ ४॥
भए क्ुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।
कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥
मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।
चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हैंसे॥
bhae kुddha juddha biruddha raghupati trona sāyaka kasamase|
kodaṃḍa dhuni ati caṃḍa suni manujāda saba māruta grase||
maṃdodarī ura kaṃpa kaṃpati kamaṭha bhū bhūdhara trase|
cikkarahiṃ diggaja dasana gahi mahi dekhi kautuka sura haiṃse||
Meaning युद्धमें शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलनेको आतुर होने लगे)। उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (ट्ड्लार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरीका हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोंसे पकड़कर चिग्घाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हैँसे।
तानेउ चाप श्रवन लगि छॉड़े बिसिख कराल।
राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याला॥ ९४॥
tāneu cāpa śravana lagi chôṛe bisikha karāla|
rāma māragana gana cale lahalahāta janu byālā|| 94||
Meaning धनुषको कानतक तानकर श्रीरामचन्द्रजीने भयानक बाण छोड़े। श्रीरामजीके बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते (लहराते) हुए जा रहे हों॥ ९१॥
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥
रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥
cale bāna sapaccha janu uragā| prathamahiṃ hateu sārathī turagā||
ratha bibhaṃji hati ketu patākā| garjā ati aṃtara bala thākā||
Meaning बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला। फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया। तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था॥ १॥
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥
बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥
turata āna ratha caṛhi khisiānā| astra sastra chām̐ṛesi bidhi nānā||
biphala hohiṃ saba udyama tāke| jimi paradroha nirata manasā ke||
Meaning तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोहमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्यके होते हैं॥ २॥
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥
taba rāvana dasa sūla calāvā| bāji cāri mahi māri girāvā||
turaga uṭhāi kopi raghunāyaka| khaiṃci sarāsana chām̐ṛe sāyaka||
Meaning तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया। घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े॥ ३॥
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥
दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥
rāvana sira saroja banacārī| cali raghubīra silīmukha dhārī||
dasa dasa bāna bhāla dasa māre| nisari gae cale rudhira panāre||
Meaning रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी श्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले॥ ४॥
स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥
तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥
stravata rudhira dhāyau balavānā| prabhu puni kṛta dhanu sara saṃdhānā||
tīsa tīra raghubīra pabāre| bhujanhi sameta sīsa mahi pāre||
Meaning रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया। श्रीरघुवीरने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये॥ ५॥
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥
kāṭatahīṃ puni bhae nabīne| rāma bahori bhujā sira chīne||
prabhu bahu bāra bāhu sira hae| kaṭata jhaṭiti puni nūtana bhae||
Meaning [सिर और हाथ] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया। इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये॥ ६॥
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥
रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥
puni puni prabhu kāṭata bhuja sīsā| ati kautukī kosalādhīsā||
rahe chāi nabha sira aru bāhū| mānahum̐ amita ketu aru rāhū||
Meaning प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाशमें सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों॥ ७॥
जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं।
रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं॥
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।
जनु कोपि दिनकर कर निकर जहेँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥
janu rāhu ketu aneka nabha patha stravata sonita dhāvahīṃ|
raghubīra tīra pracaṃḍa lāgahiṃ bhūmi girana na pāvahīṃ||
eka eka sara sira nikara chede nabha uṛata imi sohahīṃ|
janu kopi dinakara kara nikara jahem̐ taham̐ bidhuṃtuda pohahīṃ||
Meaning मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [ बार-बार] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते। एक-एक बाणसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओंको पिरो रही हों।
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२॥
jimi jimi prabhu hara tāsu sira timi timi hohiṃ apāra|
sevata biṣaya bibardha jimi nita nita nūtana māra|| 92||
Meaning जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम (उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है॥ ९२॥
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥
गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥
dasamukha dekhi siranha kai bāṛhī| bisarā marana bhaī risa gāṛhī||
garjeu mūṛha mahā abhimānī| dhāyau dasahu sarāsana tānī||
Meaning सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान् अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा॥ १॥
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥
दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥
samara bhūmi dasakaṃdhara kopyo| baraṣi bāna raghupati ratha topyo||
daṃḍa eka ratha dekhi na pareū| janu nihāra mahum̐ dinakara dureū||
Meaning रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया। एक दण्ड (घड़ी ) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो॥ २॥
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥
सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे॥
hāhākāra suranha jaba kīnhā| taba prabhu kopi kāramuka līnhā||
sara nivāri ripu ke sira kāṭe| te disi bidisa gagana mahi pāṭe||
Meaning जब देवताओंने हाहाकार किया, तब प्रभुने क्रोध करके धनुष उठाया। और शत्रुके बाणोंको हटाकर उन्होंने शत्रुके सिर काटे और उनसे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया॥ ३॥
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥
kāṭe sira nabha māraga dhāvahiṃ| jaya jaya dhuni kari bhaya upajāvahiṃ||
kaham̐ lachimana sugrīva kapīsā| kaham̐ raghubīra kosalādhīsā||
Meaning काटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। "लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं ? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं ?'॥ ४॥
करहें रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।
संधानि धनु रघुबंसमनि हँंसि सरन्हि सिर बेधे भले॥
सिर मालिका कर कालिका गहि बूंद बूंदन्हि बहु मिलीं।
करि रुधिर ?' सरि मज्जनु मनहूुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥
karaheṃ rāmu kahi sira nikara dhāe dekhi markaṭa bhaji cale|
saṃdhāni dhanu raghubaṃsamani ham̐ṃsi saranhi sira bedhe bhale||
sira mālikā kara kālikā gahi būṃda būṃdanhi bahu milīṃ|
kari rudhira ?' sari majjanu manahūुm̐ saṃgrāma baṭa pūjana calīṃ||
Meaning 'राम कहाँ हैं यह कहकर सिरोंके समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले। तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजीने हँसकर बाणोंसे उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला। हाथोंमें मुण्डोंकी मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-की-झुंड मिलकर इकट्ठी हुई और वे रुधिरकी नदीमें स्रान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों।
पुनि दसकंठ क़द्ध होड़ छॉड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहूं काल कर दंड॥ ९३॥
puni dasakaṃṭha qaddha hoṛa chôṛī sakti pracaṃḍa|
calī bibhīṣana sanmukha manahūṃ kāla kara daṃḍa|| 93||
Meaning फिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो॥ ९३॥
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥
āvata dekhi sakti ati ghorā| pranatārati bhaṃjana pana morā||
turata bibhīṣana pācheṃ melā| sanmukha rāma saheu soi selā||
Meaning अत्यन्त भयानक शक्तिको आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागतके दुःखका नाश करना है, श्रीरामजीने तुरंत ही विभीषणको पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली॥ १॥
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥
lāgi sakti muruchā kachu bhaī| prabhu kṛta khela suranha bikalaī||
dekhi bibhīṣana prabhu śrama pāyo| gahi kara gadā kruddha hoi dhāyo||
Meaning शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्च्छां हो गयी। प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई। प्रभुको श्रम (शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े॥ २॥
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥
re kubhāgya saṭha maṃda kubuddhe| taiṃ sura nara muni nāga biruddhe||
sādara siva kahum̐ sīsa caṛhāe| eka eka ke koṭinha pāe||
Meaning [ और बोले--] अरे अभागे! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि ! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभीसे विरोध किया। तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये। इसीसे एक-एकके बदलेमें करोड़ों पाये॥ ३॥
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥
राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥
tehi kārana khala aba lagi bām̐cyo| aba tava kālu sīsa para nācyo||
rāma bimukha saṭha cahasi saṃpadā| asa kahi hanesi mājha ura gadā||
Meaning उसी कारणसे आरे दुष्ट! तू अबतक बचा है। [किन्तु] अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। अरे मूर्ख! तू रामविमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचो-बीच गदा मारी॥ ४॥
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि परो।
दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भरथो॥
द्व भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एक एकहि हने।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहूँ गने॥
ura mājha gadā prahāra ghora kaṭhora lāgata mahi paro|
dasa badana sonita stravata puni saṃbhāri dhāyo risa bharatho||
dva bhire atibala mallajuddha biruddha eka ekahi hane|
raghubīra bala darpita bibhīṣanu ghāli nahiṃ tā kahūm̐ gane||
Meaning बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा; वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोधमें भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक दूसरेके विरुद्ध होकर मारने लगे। श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको (रावण-जैसे जगद्विजयी योद्धाको ) पासंगके बराबर भी नहीं समझते।
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।
umā bibhīṣanu rāvanahi sanmukha citava ki kāu|
अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥ ९४॥
aba bhirata kāla jyoṃ śrīraghubīra prabhāu|| 94||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है। यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है॥ ९४॥
देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥
रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥
dekhā śramita bibhīṣanu bhārī| dhāyau hanūmāna giri dhārī||
ratha turaṃga sārathī nipātā| hṛdaya mājha tehi māresi lātā||
Meaning विभीषणको बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किये हुए दौड़े। उन्होंने उस पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिका संहार कर डाला और उसके सीनेपर लात मारी॥ १॥
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥
ṭhāṛha rahā ati kaṃpita gātā| gayau bibhīṣanu jaham̐ janatrātā||
puni rāvana kapi hateu pacārī| caleu gagana kapi pūm̐cha pasārī||
Meaning रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ सेवकोंके रक्षक श्रीरामजी थे। फिर रावणने ललकारकर हनुमान्जीको मारा। वे पूँछ फैलाकर आकाशमें चले गये॥ २॥
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना॥
लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा॥
gahisi pūm̐cha kapi sahita uṛānā| puni phiri bhireu prabala hanumānā||
larata akāsa jugala sama jodhā| ekahi eku hanata kari krodhā||
Meaning रावणने पूँछ पकड़ ली, हनुमानजी उसको साथ लिये हुए ऊपर उड़े। फिर लौटकर महाबलवान् हनुमानूजी उससे भिड़ गये। दोनों समान योद्धा आकाशमें लड़ते हुए एक-दूसरेको क्रोध करके मारने लगे॥ ३॥
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं॥
बुधि बल निसिचर परइ न पार् यो। तब मारुत सुत प्रभु संभार् यो॥
sohahiṃ nabha chala bala bahu karahīṃ| kajjala giri sumeru janu larahīṃ||
budhi bala nisicara parai na pār yo| taba māruta suta prabhu saṃbhār yo||
Meaning दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बलसे राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमान्जीने प्रभुको स्मरण किया॥ ४॥
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥
हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।
रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥
saṃbhāri śrīraghubīra dhīra pacāri kapi rāvanu hanyo|
mahi parata puni uṭhi larata devanha jugala kahum̐ jaya jaya bhanyo||
hanumaṃta saṃkaṭa dekhi markaṭa bhālu krodhātura cale|
rana matta rāvana sakala subhaṭa pracaṃḍa bhuja bala dalamale||
Meaning श्रीरघुवीरका स्मरण करके धीर हनुमानूजीने ललकारकर रावणको मारा। वे दोनों पृथ्वीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओंने दोनोंकी 'जय-जय' पुकारी। हनुमान्ूजीपर सड्ूट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मद-माते रावणने सब योद्धाओंको अपने प्रचण्ड भुजाओंके बलसे कुचल और मसल डाला।
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।
कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥ ९५॥
taba raghubīra pacāre dhāe kīsa pracaṃḍa|
kapi bala prabala dekhi tehiṃ kīnha pragaṭa pāṣaṃḍa|| 95||
Meaning तब श्रीरघुवीरके ललकारनेपर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े। वानरोंके प्रबल दलको देखकर रावणने माया प्रकट को॥ ९५॥
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥
रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥
aṃtaradhāna bhayau chana ekā| puni pragaṭe khala rūpa anekā||
raghupati kaṭaka bhālu kapi jete| jaham̐ taham̐ pragaṭa dasānana tete||
Meaning क्षण भरके लिये वह अदृश्य हो गया। फिर उस दुष्टने अनेकों रूप प्रकट किये। श्रीरघुनाथजी की सेनामें जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ (चारों ओर) प्रकट हो गये॥ १॥
देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥
भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥
dekhe kapinha amita dasasīsā| jaham̐ taham̐ bhaje bhālu aru kīsā||
bhāge bānara dharahiṃ na dhīrā| trāhi trāhi lachimana raghubīrā||
Meaning वानरोंने अपरिमित रावण देखे। भालू और वानर सब जहाँ-तहाँ (इधर-उधर) भाग चले। वानर धीरज नहीं धरते। हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइये, बचाइये, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं॥२॥
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥
डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई॥
daham̐ disi dhāvahiṃ koṭinha rāvana| garjahiṃ ghora kaṭhora bhayāvana||
ḍare sakala sura cale parāī| jaya kai āsa tajahu aba bhāī||
Meaning दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर भयानक गर्जन कर रहे हैं। सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जयकी आशा छोड़ दो!॥ ३॥
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥
रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥
saba sura jite eka dasakaṃdhara| aba bahu bhae takahu giri kaṃdara||
rahe biraṃci saṃbhu muni gyānī| jinha jinha prabhu mahimā kachu jānī||
Meaning एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़की गुफाओंका आश्रय लो (अर्थात् उनमें छिप रहो)। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी कुछ महिमा जानी थी॥ ४॥
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।
चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥
हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाॉकुरे।
मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥
jānā pratāpa te rahe nirbhaya kapinha ripu māne phure|
cale bicali markaṭa bhālu sakala kṛpāla pāhi bhayāture||
hanumaṃta aṃgada nīla nala atibala larata rana bāॉkure|
mardahiṃ dasānana koṭi koṭinha kapaṭa bhū bhaṭa aṃkure||
Meaning जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरोंने शत्रुओं (बहुत-से रावणों) को सच्चा ही मान लिया। [इससे] सब वानर-भालू विचलित होकर ' हे कृपालु! रक्षा कीजिये' [यों पुकारते हुए] भयसे व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान् रणबाँकुरे हनुमानजी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमिसे अड्डरकी भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणोंको मसलते हैं।
सुर बानर देखे बिकल हैँस्यो कोसलाधीस।
सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥ ९६॥
sura bānara dekhe bikala haim̐syo kosalādhīsa|
saji sāraṃga eka sara hate sakala dasasīsa|| 96||
Meaning देवताओं और वानरोंको विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी हँसे और शा धनुषपर एक बाण चढ़ाकर [ मायाके बने हुए] सब रावणोंको मार डाला॥ ९६॥
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥
रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥
prabhu chana mahum̐ māyā saba kāṭī| jimi rabi uem̐ jāhiṃ tama phāṭī||
rāvanu eku dekhi sura haraṣe| phire sumana bahu prabhu para baraṣe||
Meaning प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली। जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है)। अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत-से पुष्प बरसाये॥ १॥
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥
प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥
bhuja uṭhāi raghupati kapi phere| phire eka ekanha taba ṭere||
prabhu balu pāi bhālu kapi dhāe| tarala tamaki saṃjuga mahi āe||
Meaning श्रीरघुनाथजीने भुजा उठाकर सब वानरोंको लौटाया। तब वे एक दूसरेको पुकार-पुकारकर लौट आये। प्रभुका बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े। जल््दीसे कूदकर वे रणभूमिमें आ गये॥ २॥
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥
सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥
astuti karata devatanhi dekheṃ| bhayaum̐ eka maiṃ inha ke lekheṃ||
saṭhahu sadā tumha mora marāyala| asa kahi kopi gagana para dhāyala||
Meaning देवताओंको श्रीरामजीकी स्तुति करते देखकर रावणने सोचा, मैं इनकी समझमें एक हो गया। [परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ ] और कहा--अआरे मूर्खों ! तुम तो सदाके ही मेरे मल (मेरी मार खानेवाले) हो। ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाशपर [देवताओंकी ओर] दौड़ा॥ ३॥
हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥
देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥
hāhākāra karata sura bhāge| khalahu jāhu kaham̐ moreṃ āge||
dekhi bikala sura aṃgada dhāyo| kūdi carana gahi bhūmi girāyo||
Meaning देवता हाहाकार करते हुए भागे। [रावणने कहा-] दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ जा सकोगे? देवताओंको व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़कर [उन्होंने] उसको पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ४॥
गहि भूमि पारथो लात मारो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।
संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥
करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।
किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषढ॥
gahi bhūmi pāratho lāta māro bālisuta prabhu pahiṃ gayo|
saṃbhāri uṭhi dasakaṃṭha ghora kaṭhora rava garjata bhayo||
kari dāpa cāpa caṛhāi dasa saṃdhāni sara bahu baraṣaī|
kie sakala bhaṭa ghāyala bhayākula dekhi nija bala haraṣaḍha||
Meaning उसे पकड़कर पृथ्वीपर गिराकर लात मारकर बालिपुत्र अंगद प्रभुके पास चले गये। रावण सँभलकर उठा और बड़े भयड्टर कठोर शब्दसे गरजने लगा। वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बहुत-से बाण सन्धान करके बरसाने लगा। उसने सब योद्धाओंको घायल और भयसे व्याकुल कर दिया और अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा।
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥ ९७॥
taba raghupati rāvana ke sīsa bhujā sara cāpa|
kāṭe bahuta baṛhe puni jimi tīratha kara pāpa|| 97||
Meaning तब श्रीरघुनाथजीने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले। पर वे फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थमें किये हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं) !॥ ९७॥
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥
मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥
sira bhuja bāṛhi dekhi ripu kerī| bhālu kapinha risa bhaī ghanerī||
marata na mūṛha kaṭeu bhuja sīsā| dhāe kopi bhālu bhaṭa kīsā||
Meaning शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़ती देखकर रीछ-वानरोंको बहुत ही क्रोध हुआ। यह मूर्ख भुजाओंके और सिरोंके कटनेपर भी नहीं मरता, [ऐसा कहते हुए] भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े॥ १॥
बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला॥
बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा॥
bālitanaya māruti nala nīlā| bānararāja dubida balasīlā||
biṭapa mahīdhara karahiṃ prahārā| soi giri taru gahi kapinha so mārā||
Meaning बालिपुत्र अंगद, मारुति हनुमानजी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान् उसपर वृक्ष और पर्वतोंका प्रहार करते हैं। वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षोंको पकड़कर वानरोंको मारता है॥ २॥
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भअगि चलहिं एक लातन्ह मारी॥
तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ॥
eka nakhanhi ripu bapuṣa bidārī| bhaagi calahiṃ eka lātanha mārī||
taba nala nīla siranhi caṛhi gayaū| nakhanhi lilāra bidārata bhayaū||
Meaning कोई एक वानर नखोंसे शत्रुके शरीरको फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातोंसे मारकर। तब नल और नील रावणके सिरोंपर चढ़ गये और नखोंसे उसके ललाटको फाड़ने लगे॥ ३॥
रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥
गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥
rudhira dekhi biṣāda ura bhārī| tinhahi dharana kahum̐ bhujā pasārī||
gahe na jāhiṃ karanhi para phirahīṃ| janu juga madhupa kamala bana carahīṃ||
Meaning खून देखकर उसे हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। उसने उनको पकड़नेके लिये हाथ फैलाये, पर वे पकड़में नहीं आते, हाथोंके ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं मानो दो भौरे कमलोंके वनमें विचरण कर रहे हों॥ ४॥
कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी॥
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे॥
kopi kūdi dvau dharesi bahorī| mahi paṭakata bhaje bhujā marorī||
puni sakopa dasa dhanu kara līnhe| saranhi māri ghāyala kapi kīnhe||
Meaning तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनोंको पकड़ लिया। पृथ्वीपर पटकते समय वे उसकी भुजाओंको मरोड़कर भाग छूटे। उसने क्रोध करके हाथोंमें दसों धनुष लिये और वानरोंको बाणोंसे मारकर घायल कर दिया॥ ५॥
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर॥
मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा॥
hanumadādi muruchita kari baṃdara| pāi pradoṣa haraṣa dasakaṃdhara||
muruchita dekhi sakala kapi bīrā| jāmavaṃta dhāyau ranadhīrā||
Meaning हनुमानूजी आदि सब वानरोंको मूर््छित करके और सन्ध्याका समय पाकर रावण हर्षित हुआ। समस्त वानर-वीरोंको मूर्च्छित देखकर रणधीर जाम्बवान् दौड़े॥ ६॥
संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी॥
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना॥
saṃga bhālu bhūdhara taru dhārī| mārana lage pacāri pacārī||
bhayau kruddha rāvana balavānā| gahi pada mahi paṭakai bhaṭa nānā||
Meaning जाम्बवान्के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावणको ललकार-ललकारकर मारने लगे। बलवान् रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेकों योद्धाओंको पृथ्वीपर पटकने लगा॥ ७॥
देखि भालुपति निज दल घाता।
कोपि माझ उर मारेसि लाता॥
dekhi bhālupati nija dala ghātā| kopi mājha ura māresi lātā||
Meaning जाम्बवानूने अपने दलका विध्वंस देखकर क्रोध करके रावणकी छातीमें लात मारी॥ ८॥
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
गहि भालु बीसहूँ कर मनहूँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥
मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो।
निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो॥
ura lāta ghāta pracaṃḍa lāgata bikala ratha te mahi parā|
gahi bhālu bīsahūm̐ kara manahūm̐ kamalanhi base nisi madhukarā||
muruchita biloki bahori pada hati bhālupati prabhu pahiṃ gayo|
nisi jāni syaṃdana ghāli tehi taba sūta jatanu karata bhayo||
Meaning छातीमें लातका प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको पकड़ रखा था। [ऐसा जान पड़ता था] मानो रात्रिकेि समय भौरे कमलोंमें बसे हुए हों। उसे मूच्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जाम्बवान् प्रभुके पास चले गये। रात्रि जानकर सारथि रावणको रथमें डालकर उसे होशमें लानेका उपाय करने लगा।
मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।
निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास॥ ९८॥
muruchā bigata bhālu kapi saba āe prabhu pāsa|
nisicara sakala rāvanahi gheri rahe ati trāsa|| 98||
Meaning मूर्च्छा दूर होनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास आये। उधर सब राक्षसोंने बहुत ही भयभीत होकर रावणको घेर लिया॥ ९८॥
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥
tehī nisi sītā pahiṃ jāī| trijaṭā kahi saba kathā sunāī||
sira bhuja bāṛhi sunata ripu kerī| sītā ura bhai trāsa ghanerī||
Meaning उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी। शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ॥ १॥
मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥
होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥
mukha malīna upajī mana ciṃtā| trijaṭā sana bolī taba sītā||
hoihi kahā kahasi kina mātā| kehi bidhi marihi bisva dukhadātā||
Meaning [उनका] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी त्रिजटासे बोरलीं-- हे माता! बताती क्यों नहीं ? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा 2॥ २॥
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही॥
raghupati sara sira kaṭehum̐ na maraī| bidhi biparīta carita saba karaī||
mora abhāgya jiāvata ohī| jehiṃ hau hari pada kamala bichohī||
Meaning श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है। [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है॥ ३॥
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा॥
जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥
jehiṃ kṛta kapaṭa kanaka mṛga jhūṭhā| ajahum̐ so daiva mohi para rūṭhā||
jehiṃ bidhi mohi dukha dusaha sahāe| lachimana kahum̐ kaṭu bacana kahāe||
Meaning जिसने कपटका झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा हुआ है। जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कड़वे वचन कहलाये,॥ ४॥
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥
raghupati biraha sabiṣa sara bhārī| taki taki māra bāra bahu mārī||
aisehum̐ dukha jo rākha mama prānā| soi bidhi tāhi jiāva na ānā||
Meaning जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विषैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दु:खमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं॥ ५॥
बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥
bahu bidhi kara bilāpa jānakī| kari kari surati kṛpānidhāna kī||
kaha trijaṭā sunu rājakumārī| ura sara lāgata marai surārī||
Meaning कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं। त्रिजटाने कहा--हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा॥ ६॥
प्रभु ताते उर हतइ न तेही।
एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥
prabhu tāte ura hatai na tehī| ehi ke hṛdayam̐ basati baidehī||
Meaning परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हदयमें जानकीजी (आप) बसती हैं॥ ७॥
एहि के हदयें बस जानकी जानकी उर मम बास है।
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥
ehi ke hadayeṃ basa jānakī jānakī ura mama bāsa hai|
mama udara bhuana aneka lāgata bāna saba kara nāsa hai||
suni bacana haraṣa biṣāda mana ati dekhi puni trijaṭām̐ kahā|
aba marihi ripu ehi bidhi sunahi suṃdari tajahi saṃsaya mahā||
Meaning [वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं। अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा--हे सुन्दरी! महान् सन्देहका त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा--
काटत सिर होइ़हि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।
तब रावनहि हृदय महूँ मरिहहिं रामु सुजान॥ ९९॥
kāṭata sira hoihi bikala chuṭi jāihi tava dhyāna|
taba rāvanahi hṛdaya mahūm̐ marihahiṃ rāmu sujāna|| 99||
Meaning सिरोंके बार-बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान (अन्तर्यामी ) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे॥ ९९॥
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥
asa kahi bahuta bhām̐ti samujhāī| puni trijaṭā nija bhavana sidhāī||
rāma subhāu sumiri baidehī| upajī biraha bithā ati tehī||
Meaning ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहव्यथा उत्पन्न हुई॥ १॥
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥
करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥
nisihi sasihi niṃdati bahu bhām̐tī| juga sama bhaī sirāti na rātī||
karati bilāpa manahiṃ mana bhārī| rāma biraham̐ jānakī dukhārī||
Meaning वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निनन््दा कर रही हैं [और कह रही हैं--] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं॥ २॥
जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥
सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥
jaba ati bhayau biraha ura dāhū| pharakeu bāma nayana aru bāhū||
saguna bicāri dharī mana dhīrā| aba milihahiṃ kṛpāla raghubīrā||
Meaning जब विरहके मारे हदयमें दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे। शकुन समझकर उन्होंने मनमें धे्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे॥ ३॥
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥
ihām̐ ardhanisi rāvanu jāgā| nija sārathi sana khījhana lāgā||
saṭha ranabhūmi chaṛāisi mohī| dhiga dhiga adhama maṃdamati tohī||
Meaning यहाँ आधी रातको रावण [मूर्च्छासि] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा--औओरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिककार है!॥ ४॥
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥
सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥
tehiṃ pada gahi bahu bidhi samujhāvā| bhauru bhaem̐ ratha caṛhi puni dhāvā||
suni āgavanu dasānana kerā| kapi dala kharabhara bhayau ghanerā||
Meaning सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी॥ ५॥
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी।
धाए कटकटाइ भट भारी॥
jaham̐ taham̐ bhūdhara biṭapa upārī| dhāe kaṭakaṭāi bhaṭa bhārī||
Meaning वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [ क्रोधसे] दाँत कटकटाकर दौड़े॥ ६॥
धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥
बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।
चहूँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥
dhāe jo markaṭa bikaṭa bhālu karāla kara bhūdhara dharā|
ati kopa karahiṃ prahāra mārata bhaji cale rajanīcarā||
bicalāi dala balavaṃta kīsanha gheri puni rāvanu liyo|
cahūm̐ disi capeṭanhi māri nakhanhi bidāri tanu byākula kiyo||
Meaning विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।
देखि महा मर्कट प्रबल रावन कौीन्ह बिचार।
अंतरहित होड़ निमिष महूँ कृत माया बिस्तार॥ १००॥
dekhi mahā markaṭa prabala rāvana kauीnha bicāra|
aṃtarahita hoṛa nimiṣa mahūm̐ kṛta māyā bistāra|| 100||
Meaning वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी॥ १००॥
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।
बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥ १॥
jaba kīnha tehiṃ pāṣaṃḍa| bhae pragaṭa jaṃtu pracaṃḍa|
betāla bhūta pisāca| kara dhareṃ dhanu nārāca|| 1||
Meaning जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयड्भर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए!॥ १॥
जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल।
करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान॥ २॥
jogini gaheṃ karabāla| eka hātha manuja kapāla|
kari sadya sonita pāna| nācahiṃ karahiṃ bahu gāna|| 2||
Meaning योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं॥ २॥
धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर।
मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान॥ ३॥
dharu māru bolahiṃ ghora| rahi pūri dhuni cahum̐ ora|
mukha bāi dhāvahiṃ khāna| taba lage kīsa parāna|| 3||
Meaning वे 'पकड़ो, मारो' आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे॥ ३॥
जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि।
भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु॥ ४॥
jaham̐ jāhiṃ markaṭa bhāgi| taham̐ barata dekhahiṃ āgi|
bhae bikala bānara bhālu| puni lāga baraṣai bālu|| 4||
Meaning वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा॥ ४॥
जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस।
लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत॥ ५॥
jaham̐ taham̐ thakita kari kīsa| garjeu bahuri dasasīsa|
lachimana kapīsa sameta| bhae sakala bīra aceta|| 5||
Meaning वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी वीर अचेत हो गये॥ ५॥
हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ।
एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥ ६॥
hā rāma hā raghunātha| kahi subhaṭa mījahiṃ hātha|
ehi bidhi sakala bala tori| tehiṃ kīnha kapaṭa bahori|| 6||
Meaning हा राम ! हा रघुनाथ ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते ( पछताते) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची॥ ६॥
प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान।
तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥ ७॥
pragaṭesi bipula hanumāna| dhāe gahe pāṣāna|
tinha rāmu ghere jāi| cahum̐ disi barūtha banāi|| 7||
Meaning उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा॥ ७॥
मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ।
दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज॥ ८॥
mārahu dharahu jani jāi| kaṭakaṭahiṃ pūm̐cha uṭhāi|
daham̐ disi lam̐gūra birāja| tehiṃ madhya kosalarāja|| 8||
Meaning वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, मारो, पकड़ो, जाने न पावे।' उनके लंगूर (पूँछ ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं॥ ८॥
तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥
tehiṃ madhya kosalarāja suṃdara syāma tana sobhā lahī|
janu iṃdradhanuṣa aneka kī bara bāri tuṃga tamālahī||
prabhu dekhi haraṣa biṣāda ura sura badata jaya jaya jaya karī|
raghubīra ekahi tīra kopi nimeṣa mahum̐ māyā harī||
Meaning उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी ' श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) बनायी गयी हो। प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हदयसे जय, जय, जय' ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली॥ १॥
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥
māyā bigata kapi bhālu haraṣe biṭapa giri gahi saba phire|
sara nikara chāṛe rāma rāvana bāhu sira puni mahi gire||
śrīrāma rāvana samara carita aneka kalpa jo gāvahīṃ|
sata seṣa sārada nigama kabi teu tadapi pāra na pāvahīṃ||
Meaning माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े। श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते॥ २॥