मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥
meghanāda ke murachā jāgī| pitahi biloki lāja ati lāgī||
turata gayau giribara kaṃdarā| karauṃ ajaya makha asa mana dharā||
Meaning मेघनादकी मूर्व्छा छूटी, [तब] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय (अजेय होनेको) यज्ञ करूँ, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया॥ १॥
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥
मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥
ihām̐ bibhīṣana maṃtra bicārā| sunahu nātha bala atula udārā||
meghanāda makha karai apāvana| khala māyāvī deva satāvana||
Meaning यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [ और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा--] हे अतुलनीय बलवान् उदार प्रभो ! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है॥ २॥
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥
jauṃ prabhu siddha hoi so pāihi| nātha begi puni jīti na jāihi||
suni raghupati atisaya sukha mānā| bole aṃgadādi kapi nānā||
Meaning हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [और कहा--]॥ ३॥
लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥
lachimana saṃga jāhu saba bhāī| karahu bidhaṃsa jagya kara jāī||
tumha lachimana mārehu rana ohī| dekhi sabhaya sura dukha ati mohī||
Meaning हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है॥ ४॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥
जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥
mārehu tehi bala buddhi upāī| jehiṃ chījai nisicara sunu bhāī||
jāmavaṃta sugrīva bibhīṣana| sena sameta rahehu tīniu jana||
Meaning हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो। हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [इनके] साथ रहना॥ ५॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥
प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥
jaba raghubīra dīnhi anusāsana| kaṭi niṣaṃga kasi sāji sarāsana||
prabhu pratāpa ura dhari ranadhīrā| bole ghana iva girā gam̐bhīrā||
Meaning [इस प्रकार] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर (चढ़ाकर) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले--॥ ६॥
जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥
जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥
jauṃ tehi āju badheṃ binu āvauṃ| tau raghupati sevaka na kahāvauṃ||
jauṃ sata saṃkara karahiṃ sahāī| tadapi hataum̐ raghubīra dohāī||
Meaning यदि मैं आज उसे बिना मारे आरऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों श्र भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा॥ ७॥
रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।
अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥ ७५॥
raghupati carana nāi siru caleu turaṃta anaṃta|
aṃgada nīla mayaṃda nala saṃga subhaṭa hanumaṃta|| 75||
Meaning श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे॥ ७५॥
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥
jāi kapinha so dekhā baisā| āhuti deta rudhira aru bhaiṃsā||
kīnha kapinha saba jagya bidhaṃsā| jaba na uṭhai taba karahiṃ prasaṃsā||
Meaning वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसेकी आहुति दे रहा है। वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे॥ १॥
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥
लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥
tadapi na uṭhai dharenhi kaca jāī| lātanhi hati hati cale parāī||
lai trisula dhāvā kapi bhāge| āe jaham̐ rāmānuja āge||
Meaning इतनेपर भी वह न उठा, [तब] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातोंसे मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे॥ २॥
आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥
कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥
āvā parama krodha kara mārā| garja ghora rava bārahiṃ bārā||
kopi marutasuta aṃgada dhāe| hati trisūla ura dharani girāe||
Meaning वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति ( हनुमानू) और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया॥ ३॥
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥
उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥
prabhu kaham̐ chām̐ṛesi sūla pracaṃḍā| sara hati kṛta anaṃta juga khaṃḍā||
uṭhi bahori māruti jubarājā| hatahiṃ kopi tehi ghāu na bājā||
Meaning फिर उसने प्रभु श्रीलकष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा। अनन्त ( श्रीलक््मणजी) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमानजी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी॥ ४॥
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥
आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥
phire bīra ripu marai na mārā| taba dhāvā kari ghora cikārā||
āvata dekhi kruddha janu kālā| lachimana chāṛe bisikha karālā||
Meaning शत्रु (मेघनाद) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े॥५॥
देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥
बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥
dekhesi āvata pabi sama bānā| turata bhayau khala aṃtaradhānā||
bibidha beṣa dhari karai larāī| kabahum̐ka pragaṭa kabahum̐ duri jāī||
Meaning व्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति- भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था॥ ६॥
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥
dekhi ajaya ripu ḍarape kīsā| parama kruddha taba bhayau ahīsā||
lachimana mana asa maṃtra dṛṛhāvā| ehi pāpihi maiṃ bahuta khelāvā||
Meaning शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी ( लक्ष्मणजी ) बहुत ही क्रोधित हुए। लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।]॥७॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥
छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥
sumiri kosalādhīsa pratāpā| sara saṃdhāna kīnha kari dāpā||
chāṛā bāna mājha ura lāgā| maratī bāra kapaṭu saba tyāgā||
Meaning कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्प करके बाणका सन्धान किया। बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीचमें लगा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया॥ ८॥
रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥ ७६॥
rāmānuja kaham̐ rāmu kaham̐ asa kahi chām̐ṛesi prāna|
dhanya dhanya tava jananī kaha aṃgada hanumāna|| 76||
Meaning रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं ? राम कहाँ हैं ? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान् कहने लगे--तेरी माता धन्य है, धन्य है, [जो तू लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके नामोंका उच्चारण किया।]॥ ७६॥
बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥
तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥
binu prayāsa hanumāna uṭhāyo| laṃkā dvāra rākhi puni āyo||
tāsu marana suni sura gaṃdharbā| caṛhi bimāna āe nabha sarbā||
Meaning हनुमानूजीने उसको बिना ही परिश्रमके उठा लिया और लड़्ाके दरवाजेपर रखकर वे लौट आये। उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आये॥ १॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥
जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥
baraṣi sumana duṃdubhīṃ bajāvahiṃ| śrīraghunātha bimala jasu gāvahiṃ||
jaya anaṃta jaya jagadādhārā| tumha prabhu saba devanhi nistārā||
Meaning वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश गाते हैं। हे अनन्त! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो ! आपने सब देवताओंका [ महान् विपत्तिसे] उद्धार किया॥ २॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिन्धु पहिं आए॥
सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं॥
astuti kari sura siddha sidhāe| lachimana kṛpāsindhu pahiṃ āe||
suta badha sunā dasānana jabahīṃ| muruchita bhayau pareu mahi tabahīṃ||
Meaning देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपाके समुद्र श्रीरामजीके पास आये। रावणने ज्यों ही पुत्रवधका समाचार सुना, त्यों ही वह मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३॥
मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥
नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा॥
maṃdodarī rudana kara bhārī| ura tāṛana bahu bhām̐ti pukārī||
nagara loga saba byākula socā| sakala kahahiṃ dasakaṃdhara pocā||
Meaning मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकारसे पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो गये। सभी रावणको नीच कहने लगे॥ ४॥
तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥ ७७॥
taba dasakaṃṭha bibidha bidhi samujhāīṃ saba nāri|
nasvara rūpa jagata saba dekhahu hṛdayam̐ bicāri|| 77||
Meaning तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का यह (दृश्य) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो॥ '७७॥
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
tinhahi gyāna upadesā rāvana| āpuna maṃda kathā subha pāvana||
para upadesa kusala bahutere| je ācarahiṃ te nara na ghanere||
Meaning रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं॥ १॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥
सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला॥
nisā sirāni bhayau bhinusārā| lage bhālu kapi cārihum̐ dvārā||
subhaṭa bolāi dasānana bolā| rana sanmukha jā kara mana ḍolā||
Meaning रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर [फिर] चारों दरवाजोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर दशमुख रावणने कहा--लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डाँवाडोल हो,॥ २॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥
निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥
so abahīṃ baru jāu parāī| saṃjuga bimukha bhaem̐ na bhalāī||
nija bhuja bala maiṃ bayaru baṛhāvā| dehaum̐ utaru jo ripu caṛhi āvā||
Meaning अच्छा है वह अभी भाग जाय। युद्धमें जाकर विमुख होने ( भागने ) में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [ अपने ही] उत्तर दे लूँगा॥ ३॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥
चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥
asa kahi maruta bega ratha sājā| bāje sakala jujhāū bājā||
cale bīra saba atulita balī| janu kajjala kai ām̐dhī calī||
Meaning ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाईके ) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो॥ ४॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला।
गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला॥
asaguna amita hohiṃ tehi kālā| ganai na bhujabala garba bisālā||
Meaning उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओंके बलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है॥ ५॥
अति गर्ब गनड़ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥
ati garba ganaṛa na saguna asaguna stravahiṃ āyudha hātha te|
bhaṭa girata ratha te bāji gaja cikkarata bhājahiṃ sātha te||
gomāya gīdha karāla khara rava svāna bolahiṃ ati ghane|
janu kāladūta ulūka bolahiṃ bacana parama bhayāvane||
Meaning अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनका विचार नहीं करता। हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं। योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो कालके दूत हों (मृत्युका सँदेशा सुना रहे हों)।
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुं मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥ ७८॥
tāhi ki saṃpati saguna subha sapanehuṃ mana biśrāma|
bhūta droha rata mohabasa rāma bimukha rati kāma|| 78||
Meaning जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वपनमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है ?॥ ७८॥
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥
बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥
caleu nisācara kaṭaku apārā| caturaṃginī anī bahu dhārā||
bibidha bhām̐ti bāhana ratha jānā| bipula barana patāka dhvaja nānā||
Meaning राक्षसोंकी अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं॥ १॥
चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥
बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥
cale matta gaja jūtha ghanere| prābiṭa jalada maruta janu prere||
barana barada biradaita nikāyā| samara sūra jānahiṃ bahu māyā||
Meaning मतवाले हाथियोंके बहुत-से झुंड चले। मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं॥ २॥
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥
चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥
ati bicitra bāhinī birājī| bīra basaṃta sena janu sājī||
calata kaṭaka digasidhuṃra ḍagahīṃ| chubhita payodhi kudhara ḍagamagahīṃ||
Meaning अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे॥ ३॥
उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥
पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥
uṭhī renu rabi gayau chapāī| maruta thakita basudhā akulāī||
panava nisāna ghora rava bājahiṃ| pralaya samaya ke ghana janu gājahiṃ||
Meaning इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [फिर सहसा] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों॥ ४॥
भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥
केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं॥
bheri naphīri bāja sahanāī| mārū rāga subhaṭa sukhadāī||
kehari nāda bīra saba karahīṃ| nija nija bala pauruṣa uccarahīṃ||
Meaning भेरी, नफीरी (तुरही ) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारू राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं॥ ५॥
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥
हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥
kahai dasānana sunahu subhaṭṭā| mardahu bhālu kapinha ke ṭhaṭṭā||
hauṃ mārihaum̐ bhūpa dvau bhāī| asa kahi sanmukha phauja reṃgāī||
Meaning रावणने कहा--हे उत्तम योद्धाओ ! सुनो। तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो। और मैं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी॥ ६॥
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई।
धाए करि रघुबीर दोहाई॥
yaha sudhi sakala kapinha jaba pāī| dhāe kari raghubīra dohāī||
Meaning जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े॥७॥
धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।
मानहूँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बूंद नाना बान ते॥
नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।
जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं
dhāe bisāla karāla markaṭa bhālu kāla samāna te|
mānahūm̐ sapaccha uṛāhiṃ bhūdhara būṃda nānā bāna te||
nakha dasana saila mahādrumāyudha sabala saṃka na mānahīṃ|
jaya rāma rāvana matta gaja mṛgarāja sujasu bakhānahīṃ
Meaning वे विशाल और कालके समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णोंके हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान् हैं और किसीका भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका बखान करते हैं।
दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।
भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥ ७९॥
duhu disi jaya jayakāra kari nija nija jorī jāni|
bhire bīra ita rāmahi uta rāvanahi bakhāni|| 79||
Meaning दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान (चुन)-कर इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये॥ ७९॥
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥
अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥
rāvanu rathī biratha raghubīrā| dekhi bibhīṣana bhayau adhīrā||
adhika prīti mana bhā saṃdehā| baṃdi carana kaha sahita sanehā||
Meaning रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें सन्देह हो गया [कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे ]। श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्त्रेहपूर्वक कहने लगे॥ १॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
nātha na ratha nahiṃ tana pada trānā| kehi bidhi jitaba bīra balavānā||
sunahu sakhā kaha kṛpānidhānā| jehiṃ jaya hoi so syaṃdana ānā||
Meaning हे नाथ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा ? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा--हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है॥ २॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥
sauraja dhīraja tehi ratha cākā| satya sīla dṛṛha dhvajā patākā||
bala bibeka dama parahita ghore| chamā kṛpā samatā raju jore||
Meaning शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियोंका वशमें होना) और परोपकार--ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं॥३॥
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
īsa bhajanu sārathī sujānā| birati carma saṃtoṣa kṛpānā||
dāna parasu budhi sakti pracaṃṛā| bara bigyāna kaṭhina kodaṃḍā||
Meaning ईश्वरका भजन ही [उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥ ४॥
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
amala acala mana trona samānā| sama jama niyama silīmukha nānā||
kavaca abheda bipra gura pūjā| ehi sama bijaya upāya na dūjā||
Meaning निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है। शम (मनका वशगमें होना), [ अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम--ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है॥ ५॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥
sakhā dharmamaya asa ratha jākeṃ| jītana kaham̐ na katahum̐ ripu tākeṃ||
Meaning हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है॥ ६॥
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥ ८० (क,)॥
mahā ajaya saṃsāra ripu jīti sakai so bīra|
jākeṃ asa ratha hoi dṛṛha sunahu sakhā matidhīra|| 80 (ka,)||
Meaning हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु)- रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [रावणकी तो बात ही क्या है]॥ ८० (क)॥
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥ ८०(ख )॥
suni prabhu bacana bibhīṣana haraṣi gahe pada kaṃja|
ehi misa mohi upadesehu rāma kṛpā sukha puṃja|| 80(kha )||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [और कहा--] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी ! आपने इसी बहाने मुझे [ महान्] उपदेश दिया॥ ८० (ख)॥
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥ ८० (ग)॥
uta pacāra dasakaṃdhara ita aṃgada hanumāna|
larata nisācara bhālu kapi kari nija nija prabhu āna|| 80 (ga)||
Meaning उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अगंद और हनुमान्। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं॥ ८० (ग)॥
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥
हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥
sura brahmādi siddha muni nānā| dekhata rana nabha caṛhe bimānā||
hamahū umā rahe tehi saṃgā| dekhata rāma carita rana raṃgā||
Meaning ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानोंपर चढ़े हुए आकाशसे युद्ध देख रहे हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! मैं भी उस समाजमें था और श्रीरामजीके रण-रंग (रणोत्साह )की लीला देख रहा था॥ १॥
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥
एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥
subhaṭa samara rasa duhu disi māte| kapi jayasīla rāma bala tāte||
eka eka sana bhirahiṃ pacārahiṃ| ekanha eka mardi mahi pārahiṃ||
Meaning दोनों ओरके योद्धा रण-रसमें मतवाले हो रहे हैं। वानरोंको श्रीरामजीका बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं)। एक दूसरेसे भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरेको मसल- मसलकर पृथ्वीपर डाल देते हैं॥ २॥
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥
उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥
mārahiṃ kāṭahiṃ dharahiṃ pachārahiṃ| sīsa tori sīsanha sana mārahiṃ||
udara bidārahiṃ bhujā upārahiṃ| gahi pada avani paṭaki bhaṭa ḍārahiṃ||
Meaning वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरोंसे दूसरोंको मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओंको पैर पकड़कर पृथ्वीपर पटक देते हैं॥३॥
निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥
बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥
nisicara bhaṭa mahi gāṛahi bhālū| ūpara ḍhāri dehiṃ bahu bālū||
bīra balimukha juddha biruddhe| dekhiata bipula kāla janu kruddhe||
Meaning राक्षस योद्धाओंको भालू पृथ्वीमें गाड़ देते हैं और ऊपरसे बहुत-सी बालू डाल देते हैं। युद्धमें शत्रुओंसे विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों॥ ४॥
क्रद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं।
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल जहीं छी॥
kraddhe kṛtāṃta samāna kapi tana stravata sonita rājahīṃ|
mardahiṃ nisācara kaṭaka bhaṭa balavaṃta ghana jimi gājahīṃ||
mārahiṃ capeṭanhi ḍāṭi dātanha kāṭi lātanha mījahīṃ|
cikkarahiṃ markaṭa bhālu chala bala karahiṃ jehiṃ khala jahīṃ chī||
Meaning क्रोधित हुए कालके समान वे वानर खून बहते हुए शरीरोंसे शोभित हो रहे हैं। वे बलवानू् वीर राक्षसोंकी सेनाके योद्धाओंको मसलते और मेघकी तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटोंसे मारते, दाँतोंसे काटकर लातोंसे पीस डालते हैं। वानर-भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँँ॥ १॥
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
प्रह्वादपति जनु बिलबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥
धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥
dhari gāla phārahiṃ ura bidārahiṃ gala am̐tāvari melahīṃ|
prahvādapati janu bilabidha tanu dhari samara aṃgana khelahīṃ||
dharu māru kāṭu pachāru ghora girā gagana mahi bhari rahī|
jaya rāma jo tṛna te kulisa kara kulisa te kara tṛna sahī||
Meaning वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्मादके स्वामी श्रीनूसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वत्र और वद्र्से तृण कर देते हैं (निर्बललको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं)॥ २॥
निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥ ८१॥
nija dala bicalata dekhesi bīsa bhujām̐ dasa cāpa|
ratha caṛhi caleu dasānana phirahu phirahu kari dāpa|| 81||
Meaning अपनी सेनाको विचलित ' होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके लौटो', '*लौटो' कहता हुआ चला॥ ८१॥
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर॥
गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा॥
dhāyau parama kruddha dasakaṃdhara| sanmukha cale hūha dai baṃdara||
gahi kara pādapa upala pahārā| ḍārenhi tā para ekahiṃ bārā||
Meaning रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा। वानर हुंकार करते हुए [लड़नेके लिये] उसके सामने चले। उन्होंने हाथोंमें वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावणपर एक ही साथ डाले॥ १॥
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥
चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी॥
lāgahiṃ saila bajra tana tāsū| khaṃḍa khaṃḍa hoi phūṭahiṃ āsū||
calā na acala rahā ratha ropī| rana durmada rāvana ati kopī||
Meaning पर्वत उसके वज़्तुल्य शरीरमें लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [ अपने स्थानसे] जरा भी नहीं हिला॥ २॥
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥
चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना॥
ita uta jhapaṭi dapaṭi kapi jodhā| mardai lāga bhayau ati krodhā||
cale parāi bhālu kapi nānā| trāhi trāhi aṃgada hanumānā||
Meaning उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओंको मसलने लगा। अनेकों वानर-भालू 'हे अंगद! हे हनुमान्! रक्षा करो, रक्षा करो' [पुकारते हुए भाग चले॥ ३॥
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई॥
तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने॥
pāhi pāhi raghubīra gosāī| yaha khala khāi kāla kī nāī||
tehi dekhe kapi sakala parāne| dasahum̐ cāpa sāyaka saṃdhāne||
Meaning हे रघुवीर! हे गोसाई! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। यह दुष्ट कालकी भाँति हमें खा रहा है। उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे। तब [रावणने] दसों धनुषोंपर बाण सन्धान किये॥ ४॥
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहें कपि भागहीं॥
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।
रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥
saṃdhāni dhanu sara nikara chāṛesi uraga jimi uṛi lāgahīṃ|
rahe pūri sara dharanī gagana disi bidisi kaheṃ kapi bhāgahīṃ||
bhayo ati kolāhala bikala kapi dala bhālu bolahiṃ āture|
raghubīra karunā siṃdhu ārata baṃdhu jana racchaka hare||
Meaning उसने धनुषपर सन्धान करके बाणोंके समूह छोड़े। वे बाण सर्पकी तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ ? अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानर-भालुओंकी सेना व्याकुल होकर आर्तत पुकार करने लगी--हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे पीड़ितोंके बन्धु! हे सेवकोंकी रक्षा करके उनके दुःख हरनेवाले हरि!
निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।
लछिमन चले क़ुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥ ८२॥
nija dala bikala dekhi kaṭi kasi niṣaṃga dhanu hātha|
lachimana cale quddha hoi nāi rāma pada mātha|| 82||
Meaning अपनी सेनाको व्याकुल देखकर कमरमें तरकस कसकर और हाथमें धनुष लेकर श्रीरघुनाथजी के चरणोंपर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले॥ ८२॥
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥
खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥
re khala kā mārasi kapi bhālū| mohi biloku tora maiṃ kālū||
khojata raheum̐ tohi sutaghātī| āju nipāti juṛāvaum̐ chātī||
Meaning [ लक्ष्मणजीने पास जाकर कहा--] आओरे दुष्ट! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है ? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ ? [रावणने कहा--] आरे मेरे पुत्रके घातक! मैं तुझीको ढूँढ़ रहा था। आज तुझे मारकर [अपनी] छाती ठंडी करूँगा॥ १॥
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा॥
कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे॥
asa kahi chāṛesi bāna pracaṃḍā| lachimana kie sakala sata khaṃḍā||
koṭinha āyudha rāvana ḍāre| tila pravāna kari kāṭi nivāre||
Meaning ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड बाण छोड़े। लक्ष्मणजीने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये। लक्ष्मणजीने उनको तिलके बराबर करके काटकर हटा दिया॥ २॥
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा॥
सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला॥
puni nija bānanha kīnha prahārā| syaṃdanu bhaṃji sārathī mārā||
sata sata sara māre dasa bhālā| giri sṛṃganha janu prabisahiṃ byālā||
Meaning फिर अपने बाणोंसे [उसपर] प्रहार किया और [उसके] रथको तोड़कर सारथिको मार डाला। [ रावणके] दसों मस्तकोंमें सौ-सौ बाण मारे। वे सिरोंमें ऐसे पैठ गये मानो पहाड़के शिखारोंमें सर्प प्रवेश कर रहे हों॥ ३॥
पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥
उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥
puni sata sara mārā ura māhīṃ| pareu dharani tala sudhi kachu nāhīṃ||
uṭhā prabala puni muruchā jāgī| chāṛisi brahma dīnhi jo sām̐gī||
Meaning फिर सौ बाण उसकी छातीमें मारे। वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटनेपर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी॥ ४॥
सो ब्रहमा दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।
परथो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥
ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।
तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥
so brahamā datta pracaṃḍa sakti anaṃta ura lāgī sahī|
paratho bīra bikala uṭhāva dasamukha atula bala mahimā rahī||
brahmāṃḍa bhavana birāja jākeṃ eka sira jimi raja kanī|
tehi caha uṭhāvana mūṛha rāvana jāna nahiṃ tribhuana dhanī||
Meaning वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीकी ठीक छातीमें लगी। वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े। तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी (व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका)। जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माप्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनोंके स्वामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता।
देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।
आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥ ८३॥
dekhi pavanasuta dhāyau bolata bacana kaṭhora|
āvata kapihi hanyo tehiṃ muṣṭi prahāra praghora|| 83||
Meaning यह देखकर पवनपुत्र हनुमानजी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमानूजीके आते ही रावणने उनपर अत्यन्त भयड्भर घूँसेका प्रहार किया॥ ८३॥
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥
मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥
jānu ṭeki kapi bhūmi na girā| uṭhā sam̐bhāri bahuta risa bharā||
muṭhikā eka tāhi kapi mārā| pareu saila janu bajra prahārā||
Meaning हनुमानूजी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं। और फिर क्रोधसे भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमानूजीने रावणको एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो॥ १॥
मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही॥
muruchā gai bahori so jāgā| kapi bala bipula sarāhana lāgā||
dhiga dhiga mama pauruṣa dhiga mohī| jauṃ taiṃ jiata rahesi suradrohī||
Meaning मूर्च्छा भंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमानूजीके बड़े भारी बलको सराहने लगा। [ हनुमानूजीने कहा--] मेरे पौरुषको धिककार है, धिक्कार है और मुझे भी धिककार है,जो हे देवद्रोही ! तू अब भी जीता रह गया॥ २॥
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥
कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥
asa kahi lachimana kahum̐ kapi lyāyo| dekhi dasānana bisamaya pāyo||
kaha raghubīra samujhu jiyam̐ bhrātā| tumha kṛtāṃta bhacchaka sura trātā||
Meaning ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमानजी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये। यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीरने [ लक्ष्मणजीसे। कहा--हे भाई! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो॥ ३॥
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥
पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥
sunata bacana uṭhi baiṭha kṛpālā| gaī gagana so sakati karālā||
puni kodaṃḍa bāna gahi dhāe| ripu sanmukha ati ātura āe||
Meaning ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बेैठे। वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे॥ ४॥
आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो।
गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥
सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका ले गयो।
रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥
ātura bahori bibhaṃji syaṃdana sūta hati byākula kiyo|
giryo dharani dasakaṃdhara bikalatara bāna sata bedhyo hiyo||
sārathī dūsara ghāli ratha tehi turata laṃkā le gayo|
raghubīra baṃdhu pratāpa puṃja bahori prabhu carananhi nayo||
Meaning फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूरकर और सारथिको मारकर उसे (रावणको ) व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत ही लंकाको ले गया। प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया।
उहाँ दसानन जागि करि करे लाग कछ जग्य।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥ ८४॥
uhām̐ dasānana jāgi kari kare lāga kacha jagya|
rāma birodha bijaya caha saṭha haṭha basa ati agya|| 84||
Meaning वहाँ (लंकामें ) रावण मूरच्छासि जागकर कुछ यज्ञ करने लगा। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है॥ ८४॥
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई॥
नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा॥
ihām̐ bibhīṣana saba sudhi pāī| sapadi jāi raghupatihi sunāī||
nātha karai rāvana eka jāgā| siddha bhaem̐ nahiṃ marihi abhāgā||
Meaning यहाँ विभीषणजीने सब खबर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजीको कह सुनायी कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है। उसके सिद्ध होनेपर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा॥ १॥
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर॥
प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए॥
paṭhavahu nātha begi bhaṭa baṃdara| karahiṃ bidhaṃsa āva dasakaṃdhara||
prāta hota prabhu subhaṭa paṭhāe| hanumadādi aṃgada saba dhāe||
Meaning हे नाथ! तुरंत वानर योद्धाओंको भेजिये; जो यज्ञका विध्वंस करें, जिससे रावण युद्धमें आवे। प्रात:काल होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेजा। हनुमान् और अंगद आदि सब [प्रधान वीर] दौड़े॥ २॥
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका॥
जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा॥
kautuka kūdi caṛhe kapi laṃkā| paiṭhe rāvana bhavana asaṃkā||
jagya karata jabahīṃ so dekhā| sakala kapinha bhā krodha biseṣā||
Meaning वानर खेलसे ही कूदकर लंकापर जा चढ़े और निर्भय रावणके महलमें जा घुसे। ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरोंको बहुत क्रोध हुआ॥ ३॥
रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा॥
अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता॥
rana te nilaja bhāji gṛha āvā| ihām̐ āi baka dhyāna lagāvā||
asa kahi aṃgada mārā lātā| citava na saṭha svāratha mana rātā||
Meaning [उन्होंने कहा--] अरे ओ निर्लज! रणभूमिसे घर भाग आया और यहाँ आकर बगुलेका- सा ध्यान लगाकर बैठा है ? ऐसा कहकर अंगदने लात मारी। पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्टका मन स्वार्थमें अनुरक्त था॥ ४॥
नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि द्सन लातन्ह मारहीं।
धरि केस नारि निकारि बाहेर ते5तिदीन पुकारहीं॥
तब उठेउ क़्य्द्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महूँ हारई॥
nahiṃ citava jaba kari kopa kapi gahi dsana lātanha mārahīṃ|
dhari kesa nāri nikāri bāhera te5tidīna pukārahīṃ||
taba uṭheu qyddha kṛtāṃta sama gahi carana bānara ḍāraī|
ehi bīca kapinha bidhaṃsa kṛta makha dekhi mana mahūm̐ hāraī||
Meaning जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतोंसे पकड़कर [काटने और] लातोंसे मारने लगे। स्त्रियोंको बाल पकड़कर घरसे बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं। तब रावण कालके समान क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा। इसी बीचमें वानरोंने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मनमें हारने लगा (निराश होने लगा)।
जग्य बिधं॑ंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
चलेउ निसाचर क्रुद्ध होड़ त्यागि जिवन के आस॥ ८५॥
jagya bidhaṃṃsi kusala kapi āe raghupati pāsa|
caleu nisācara kruddha hoṛa tyāgi jivana ke āsa|| 85||
Meaning यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनाथजीके पास आ गये। तब रावण जीनेकी आशा छोड़कर क्रोधित होकर चला॥ ८५॥
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥
भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥
calata hohiṃ ati asubha bhayaṃkara| baiṭhahiṃ gīdha uṛāi siranha para||
bhayau kālabasa kāhu na mānā| kahesi bajāvahu juddha nisānā||
Meaning चलते समय अत्यन्त भयड्टर अमज्ल (अपशकुन) होने लगे। गीध उड़-उड़कर उसके सिरोंपर बैठने लगे। किन्तु वह कालके वश था, इससे किसी भी अपशकुनको नहीं मानता था। उसने कहा-- युद्धका डंका बजाओ॥ १॥
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा॥
प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें॥
calī tamīcara anī apārā| bahu gaja ratha padāti asavārā||
prabhu sanmukha dhāe khala kaiṃseṃ| salabha samūha anala kaham̐ jaiṃseṃ||
Meaning निशाचरोंकी अपार सेना चली। उसमें बहुत-से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं। वे दुष्ट प्रभुके सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगोंके समूह अग्रिकी ओर [ जलनेके लिये] दौड़ते हैं॥ २॥
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥
अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥
ihām̐ devatanha astuti kīnhī| dāruna bipati hamahi ehiṃ dīnhī||
aba jani rāma khelāvahu ehī| atisaya dukhita hoti baidehī||
Meaning इधर देवताओंने स्तुति की कि हे श्रीरामजी! इसने हमको दारुण दुःख दिये हैं। अब आप इसे [अधिक] न खेलाइये। जानकीजी बहुत ही दुखी हो रही हैं॥ ३॥
देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना॥
जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे॥
deva bacana suni prabhu musakānā| uṭhi raghubīra sudhāre bānā||
jaṭā jūṭa dṛṛha bām̐dhai māthe| sohahiṃ sumana bīca bica gāthe||
Meaning देवताओंके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर श्रीरघुवीरने उठकर बाण सुधारे। मस्तकपर जटाओंके जूड़ेको कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच-बीचमें पुष्प गूँथे हुए शोभित हो रहे हैं॥ ४॥
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा॥
कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा॥
aruna nayana bārida tanu syāmā| akhila loka locanābhirāmā||
kaṭitaṭa parikara kasyo niṣaṃgā| kara kodaṃḍa kaṭhina sāraṃgā||
Meaning लाल नेत्र और मेघके समान श्याम शरीरवाले और सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं। प्रभुने कमरमें फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथमें कठोर शार्धनुष ले लिया॥ ५॥
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥
sāraṃga kara suṃdara niṣaṃga silīmukhākara kaṭi kasyo|
bhujadaṃḍa pīna manoharāyata ura dharāsura pada lasyo||
kaha dāsa tulasī jabahiṃ prabhu sara cāpa kara pherana lage|
brahmāṃḍa diggaja kamaṭha ahi mahi siṃdhu bhūdhara ḍagamage||
Meaning प्रभुने हाथमें शा धनुष लेकर कमरमें बाणोंकी खान ( अक्षय) सुन्दर तरकस कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ठ हैं और मनोहर चौड़ी छातीपर ब्राह्मण ( भृगुजी) के चरणका चिह्न शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथमें लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओंके हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे।
सोभा देखि हरघि सुर बरषहिं सुमन अपार।
जय जय जय करुनानिधि छवि बल गुन आगार॥ ८६॥
sobhā dekhi haraghi sura baraṣahiṃ sumana apāra|
jaya jaya jaya karunānidhi chavi bala guna āgāra|| 86||
Meaning [ भगवान्की] शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणोंके धाम करुणानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो [ऐसा पुकारने लगे ]॥ ८६॥
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी॥
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा॥
ehīṃ bīca nisācara anī| kasamasāta āī ati ghanī||
dekhi cale sanmukha kapi bhaṭṭā| pralayakāla ke janu ghana ghaṭṭā||
Meaning इसी बीचमें निशाचरोंकी अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई (आपसभमें टकराती हुई) आयी। उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार [उसके] सामने चले जैसे प्रलयकालके बादलोंके समूह हों॥ १॥
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं॥
गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा॥
bahu kṛpāna taravāri camaṃkahiṃ| janu daham̐ disi dāminīṃ damaṃkahiṃ||
gaja ratha turaga cikāra kaṭhorā| garjahiṃ manahum̐ balāhaka ghorā||
Meaning बहुत-से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं। मानो दसों दिशाओं में बिजलियाँ चमक रही हों। हाथी, रथ और घोड़ोंका कठोर चिग्घाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों॥ २॥
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥
kapi laṃgūra bipula nabha chāe| manahum̐ iṃdradhanu ue suhāe||
uṭhai dhūri mānahum̐ jaladhārā| bāna buṃda bhai bṛṣṭi apārā||
Meaning वानरोंकी बहुत-सी पूँछें आकाशमें छायी हुई हैं। [वे ऐसी शोभा दे रही हैं] मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों। धूल ऐसी उठ रही है मानो जलकी धारा हो। बाणरूपी बूँदोंकी अपार वृष्टि हुई॥ ३॥
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥
रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥
duhum̐ disi parbata karahiṃ prahārā| bajrapāta janu bārahiṃ bārā||
raghupati kopi bāna jhari lāī| ghāyala bhai nisicara samudāī||
Meaning दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंका प्रहार करते हैं। मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके बाणोंकी झड़ी लगा दी, [जिससे] राक्षसोंकी सेना घायल हो गयी॥ ४॥
लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं॥
स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी॥
lāgata bāna bīra cikkarahīṃ| ghurmi ghurmi jaham̐ taham̐ mahi parahīṃ||
stravahiṃ saila janu nirjhara bhārī| sonita sari kādara bhayakārī||
Meaning बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। उनके शरीरोंसे ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वतके भारी झरनोंसे जल बह रहा हो। इस प्रकार डरपोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली रुधिरकी नदी बह चली॥ ५॥
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।
kādara bhayaṃkara rudhira saritā calī parama apāvanī|
उ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी॥
जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥
u kūla dala ratha reta cakra abarta bahati bhayāvanī||
jalajaṃtu gaja padacara turaga khara bibidha bāhana ko gane|
sara sakti tomara sarpa cāpa taraṃga carma kamaṭha ghane||
Meaning डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भैँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुवे हैं।
बीर परहिं जनु तीर तरु मज़ा बहु बह फेन।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन॥ ८७॥
bīra parahiṃ janu tīra taru mazā bahu baha phena|
kādara dekhi ḍarahiṃ taham̐ subhaṭanha ke mana cena|| 87||
Meaning वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है॥ ८७॥
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला॥
काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥
majjahi bhūta pisāca betālā| pramatha mahā jhoṭiṃga karālā||
kāka kaṃka lai bhujā uṛāhīṃ| eka te chīni eka lai khāhīṃ||
Meaning भूत, पिशाच और बैताल, बड़े-बड़े झोटोंवाले महान् भयड्भर झोटिंग और प्रमथ (शिवगण) उस नदीमें स्रान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं॥ १॥
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥
कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥
eka kahahiṃ aisiu sauṃghāī| saṭhahu tumhāra daridra na jāī||
kaham̐rata bhaṭa ghāyala taṭa gire| jaham̐ taham̐ manahum̐ ardhajala pare||
Meaning एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खों ! ऐसी सस्ती (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती ? घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (वे व्यक्ति जो मरनेके समय आधे जलमें रखे जाते हैं) पड़े हों॥२॥
खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥
बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥
khaiṃcahiṃ gīdha ām̐ta taṭa bhae| janu baṃsī khelata cita dae||
bahu bhaṭa bahahiṃ caṛhe khaga jāhīṃ| janu nāvari khelahiṃ sari māhīṃ||
Meaning गीध आंतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तटपरसे चित्त लगाये हुए (ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों (बंसीसे मछली पकड़ रहे हों )। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदीमें नावरि (नौकाक्रीड़ा) खेल रहे हों॥ ३॥
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं॥
भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं॥
jogini bhari bhari khappara saṃcahiṃ| bhūta pisāca badhū nabha naṃcahiṃ||
bhaṭa kapāla karatāla bajāvahiṃ| cāmuṃḍā nānā bidhi gāvahiṃ||
Meaning योगिनियाँ खप्परोंमें भर-भरकर खून जमा कर रही हैं। भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं। चामुण्डाएँ योद्धाओंकी खोपड़ियोंका करताल बजा रही हैं और नाना प्रकारसे गा रही हैं॥ ४॥
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥
कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥
jaṃbuka nikara kaṭakkaṭa kaṭṭahiṃ| khāhiṃ huāhiṃ aghāhiṃ dapaṭṭahiṃ||
koṭinha ruṃḍa muṃḍa binu ḍollahiṃ| sīsa pare mahi jaya jaya bollahiṃ||
Meaning गीदड़ोंके समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदोंको काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक दूसरेको डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं॥ ५॥
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।
खणप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥
तब्वानर निसाचर निकर मर्दहनिं राम बल दर्पित भण।
संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥
bollahiṃ jo jaya jaya muṃḍa ruṃḍa pracaṃḍa sira binu dhāvahīṃ|
khaṇapparinha khagga alujjhi jujjhahiṃ subhaṭa bhaṭanha ḍhahāvahīṃ||
tabvānara nisācara nikara mardahaniṃ rāma bala darpita bhaṇa|
saṃgrāma aṃgana subhaṭa sovahiṃ rāma sara nikaranhi hae||
Meaning मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (धड़) बिना सिरके दौड़ते हैं। पक्षी खोपड़ियोंगें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीके बलसे दर्पित हुए वानर राक्षसोंके झुण्डोंको मसले डालते हैं। श्रीरामजीके बाणसमूहोंसे मरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं।
रावन हृदयें बिचारा भा निसिचर संघार।
में अकेल कपि भालु बहु माया करों अपार॥ ८८॥
rāvana hṛdayeṃ bicārā bhā nisicara saṃghāra|
meṃ akela kapi bhālu bahu māyā karoṃ apāra|| 88||
Meaning रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ॥ ८८॥
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥
सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥
devanha prabhuhi payādeṃ dekhā| upajā ura ati chobha biseṣā||
surapati nija ratha turata paṭhāvā| haraṣa sahita mātali lai āvā||
Meaning देवताओंने प्रभुको पैदल (बिना सवारीके युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी क्षोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ। [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया। [उसका सारथधि] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया॥ १॥
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥
चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥
teja puṃja ratha dibya anūpā| haraṣi caṛhe kosalapura bhūpā||
caṃcala turaga manohara cārī| ajara amara mana sama gatikārī||
Meaning उस दिव्य अनुपम और तेजके पुझ (तेजोमय) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चज्नल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले (देवलोकके) घोड़े जुते थे॥ २॥
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥
सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥
rathārūṛha raghunāthahi dekhī| dhāe kapi balu pāi biseṣī||
sahī na jāi kapinha kai mārī| taba rāvana māyā bistārī||
Meaning श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरोंकी मार सही नहीं जाती। तब रावणने माया फैलायी॥ ३॥
सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥
देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥
so māyā raghubīrahi bām̐cī| lachimana kapinha so mānī sām̐cī||
dekhī kapinha nisācara anī| anuja sahita bahu kosaladhanī||
Meaning एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया। वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक््मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा॥ ४॥
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहें सो तहँ चितवहिं खरे॥
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी।
माया हरी हरि निमिष महूँ हरषी सकल मर्कट अनी॥
bahu rāma lachimana dekhi markaṭa bhālu mana ati apaḍare|
janu citra likhita sameta lachimana jaheṃ so taham̐ citavahiṃ khare||
nija sena cakita biloki ham̐si sara cāpa saji kosaladhanī|
māyā harī hari nimiṣa mahūm̐ haraṣī sakala markaṭa anī||
Meaning बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि (दु:खोंके हरनेवाले श्रीरामजी ) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली। वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।
बहुरि राम सब तन चितड़ बोले बचन गंभीर।
टद्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥ ८९॥
bahuri rāma saba tana citaṛa bole bacana gaṃbhīra|
ṭadvaṃdajuddha dekhahu sakala śramita bhae ati bīra|| 89||
Meaning फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले--हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [मेरा और रावणका] द्वन्द्रयुद्ध देखो॥ ८९॥