परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥
pareu muruchi mahi lāgata sāyaka| sumirata rāma rāma raghunāyaka||
suni priya bacana bharata taba dhāe| kapi samīpa ati ātura āe||
Meaning बाण लगते ही हनुमानजी ' राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूर््छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये॥ १॥
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥
मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥
bikala biloki kīsa ura lāvā| jāgata nahiṃ bahu bhām̐ti jagāvā||
mukha malīna mana bhae dukhārī| kahata bacana bhari locana bārī||
Meaning हनुमानूजीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया। बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [विषादके आँसुओंका] जल भरकर ये वचन बोले--॥ २॥
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥
जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥
jehiṃ bidhi rāma bimukha mohi kīnhā| tehiṃ puni yaha dāruna dukha dīnhā||
jauṃ moreṃ mana baca aru kāyā| prīti rāma pada kamala amāyā||
Meaning जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो,॥ ३॥
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥
tau kapi hou bigata śrama sūlā| jauṃ mo para raghupati anukūlā||
sunata bacana uṭhi baiṭha kapīsā| kahi jaya jayati kosalādhīsā||
Meaning और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न ' हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमानजी कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे॥ ४॥
लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥ ५९॥
līnha kapihi ura lāi pulakita tanu locana sajala|
prīti na hṛdayam̐ samāi sumiri rāma raghukula tilaka|| 59||
Meaning भरतजीने वानर (हनुमानजी ) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी॥ ५९॥
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥
कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥
tāta kusala kahu sukhanidhāna kī| sahita anuja aru mātu jānakī||
kapi saba carita samāsa bakhāne| bhae dukhī mana mahum̐ pachitāne||
Meaning [ भरतजी बोले--] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर (हनुमानजी ) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछताने लगे॥ १॥
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥
जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥
ahaha daiva maiṃ kata jaga jāyaum̐| prabhu ke ekahu kāja na āyaum̐||
jāni kuavasaru mana dhari dhīrā| puni kapi sana bole balabīrā||
Meaning हा दैव! मैं जगतमें क्यों जनमा ? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमानूजीसे बोले--॥ २॥
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥
tāta gaharu hoihi tohi jātā| kāju nasāihi hota prabhātā||
caṛhu mama sāyaka saila sametā| paṭhavauṃ tohi jaham̐ kṛpāniketā||
Meaning हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [अतः] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं॥ ३॥
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥
राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥
suni kapi mana upajā abhimānā| moreṃ bhāra calihi kimi bānā||
rāma prabhāva bicāri bahorī| baṃdi carana kaha kapi kara jorī||
Meaning भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमानूजीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा ? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--॥ ४॥
तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥ ६० (क )॥
tava pratāpa ura rākhi prabhu jehaum̐ nātha turaṃta|
asa kahi āyasu pāi pada baṃdi caleu hanumaṃta|| 60 (ka )||
Meaning हे नाथ! हे प्रभो ! मैं आपका प्रताप हदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमानूजी चले॥ ६० (क)॥
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥ ६० (ख )॥
bharata bāhu bala sīla guna prabhu pada prīti apāra|
mana mahum̐ jāta sarāhata puni puni pavanakumāra|| 60 (kha )||
Meaning भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही- मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमानूजी चले जा रहे हैं॥ ६० (ख)॥
उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥
uhām̐ rāma lachimanahiṃ nihārī| bole bacana manuja anusārī||
ardha rāti gai kapi nahiṃ āyau| rāma uṭhāi anuja ura lāyau||
Meaning वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले-आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये। यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया॥ १॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥
sakahu na dukhita dekhi mohi kāū| baṃdhu sadā tava mṛdula subhāū||
mama hita lāgi tajehu pitu mātā| sahehu bipina hima ātapa bātā||
Meaning [और बोले--] हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया॥ २॥
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥
so anurāga kahām̐ aba bhāī| uṭhahu na suni mama baca bikalāī||
jauṃ janateum̐ bana baṃdhu bichohū| pitā bacana manateum̐ nahiṃ ohū||
Meaning हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं ? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [ जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था] उसे भी न मानता॥ ३॥
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥
suta bita nāri bhavana parivārā| hohiṃ jāhiṃ jaga bārahiṃ bārā||
asa bicāri jiyam̐ jāgahu tātā| milai na jagata sahodara bhrātā||
Meaning पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार--ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो॥ ४॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥
jathā paṃkha binu khaga ati dīnā| mani binu phani karibara kara hīnā||
asa mama jivana baṃdhu binu tohī| jauṃ jaṛa daiva jiāvai mohī||
Meaning जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा॥ ५॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥
jaihaum̐ avadha kavana muhu lāī| nāri hetu priya bhāi gam̐vāī||
baru apajasa sahateum̐ jaga māhīṃ| nāri hāni biseṣa chati nāhīṃ||
Meaning स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा ? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे)। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी॥ ६॥
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥
aba apaloku soku suta torā| sahihi niṭhura kaṭhora ura morā||
nija jananī ke eka kumārā| tāta tāsu tumha prāna adhārā||
Meaning अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो॥ ७॥
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥
sauṃpesi mohi tumhahi gahi pānī| saba bidhi sukhada parama hita jānī||
utaru kāha daihaum̐ tehi jāī| uṭhi kina mohi sikhāvahu bhāī||
Meaning सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं ?॥ ८॥
बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥
bahu bidhi sicata soca bimocana| stravata salila rājiva dala locana||
umā eka akhaṃḍa raghurāī| nara gati bhagata kṛpāla dekhāī||
Meaning सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं। उनके कमलकी पँखुड़ीके समान नेत्रोंसे [विषादके आँसुओंका] जल बह रहा है। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! श्रीरघुनाथजी एक ( अद्वितीय) और अखण्ड (वियोगरहित) हैं। भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवानूने [ लीला करके] मनुष्यकी दशा दिखलायी है॥ ९॥
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥ ६९॥
prabhu pralāpa suni kāna bikala bhae bānara nikara|
āi gayau hanumāna jimi karunā maham̐ bīra rasa|| 69||
Meaning प्रभुके [लीलाके लिये किये गये] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गये। [इतनेमें ही] हनुमानजी आ गये, जैसे करुणरस [के प्रसड्ध। में वीररस [का प्रसड्] आ गया हो॥ ६१॥
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥
haraṣi rāma bheṃṭeu hanumānā| ati kṛtagya prabhu parama sujānā||
turata baida taba kīnha upāī| uṭhi baiṭhe lachimana haraṣāī||
Meaning श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमानूजीसे गले लगकर मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, [जिससे] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे॥ १॥
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥
hṛdayam̐ lāi prabhu bheṃṭeu bhrātā| haraṣe sakala bhālu kapi brātā||
kapi puni baida tahām̐ pahum̐cāvā| jehi bidhi tabahiṃ tāhi lai āvā||
Meaning प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले। भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गये। फिर हनुमान्ूजीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आये थे॥ २॥
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषअद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥
yaha bṛttāṃta dasānana suneū| ati biṣaada puni puni sira dhuneū||
byākula kuṃbhakarana pahiṃ āvā| bibidha jatana kari tāhi jagāvā||
Meaning यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा। वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने उसको जगाया॥ ३॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥
jāgā nisicara dekhia kaisā| mānahum̐ kālu deha dhari baisā||
kuṃbhakarana būjhā kahu bhāī| kāhe tava mukha rahe sukhāī||
Meaning कुम्भकर्ण जगा (उठ बैठा)। वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुम्भकर्णने पूछा-हे भाई! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं ?॥ ४॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे॥
kathā kahī saba tehiṃ abhimānī| jehi prakāra sītā hari ānī||
tāta kapinha saba nisicara māre| mahāmahā jodhā saṃghāre||
Meaning उस अभिमानी (रावण) -ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [ तबसे अबतककी। सारी कथा कही। [फिर कहा-- ] हे तात! वानरोंने सब राक्षस मार डाले। बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला॥ ५॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥
durmukha suraripu manuja ahārī| bhaṭa atikāya akaṃpana bhārī||
apara mahodara ādika bīrā| pare samara mahi saba ranadhīrā||
Meaning दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये॥ ६॥
सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥ ६२॥
suni dasakaṃdhara bacana taba kuṃbhakarana bilakhāna|
jagadaṃbā hari āni aba saṭha cāhata kalyāna|| 62||
Meaning तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला--अरे मूर्ख ! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ?॥ ६२॥
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥
bhala na kīnha taiṃ nisicara nāhā| aba mohi āi jagāehi kāhā||
ajahūm̐ tāta tyāgi abhimānā| bhajahu rāma hoihi kalyānā||
Meaning हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा॥ १॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥
haiṃ dasasīsa manuja raghunāyaka| jāke hanūmāna se pāyaka||
ahaha baṃdhu taiṃ kīnhi khoṭāī| prathamahiṃ mohi na sunāehi āī||
Meaning हे रावण! जिनके हनुमान्ू-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं ? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥ २॥
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा॥
kīnhehu prabhū birodha tehi devaka| siva biraṃci sura jāke sevaka||
nārada muni mohi gyāna jo kahā| kahateum̐ tohi samaya nirabahā||
Meaning हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा॥ ३॥
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥
aba bhari aṃka bheṃṭu mohi bhāī| locana sūphala karau maiṃ jāī||
syāma gāta sarasīruha locana| dekhauṃ jāi tāpa traya mocana||
Meaning हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ॥ ४॥
राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥ ६३॥
rāma rūpa guna sumirata magana bhayau chana eka|
rāvana māgeu koṭi ghaṭa mada aru mahiṣa aneka|| 63||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये॥ ६३॥
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥
mahiṣa khāi kari madirā pānā| garjā bajrāghāta samānā||
kuṃbhakarana durmada rana raṃgā| calā durga taji sena na saṃgā||
Meaning भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज़्घात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली॥ १॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥
dekhi bibhīṣanu āgeṃ āyau| pareu carana nija nāma sunāyau||
anuja uṭhāi hṛdayam̐ tehi lāyo| raghupati bhakta jāni mana bhāyo||
Meaning उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे॥ २॥
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥
tāta lāta rāvana mohi mārā| kahata parama hita maṃtra bicārā||
tehiṃ galāni raghupati pahiṃ āyaum̐| dekhi dīna prabhu ke mana bhāyaum̐||
Meaning [विभीषणने कहा--] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [बहुत] प्रिय लगा॥ ३॥
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥
sunu suta bhayau kālabasa rāvana| so ki māna aba parama sikhāvana||
dhanya dhanya taiṃ dhanya bibhīṣana| bhayahu tāta nisicara kula bhūṣana||
Meaning [ कुम्भकर्णने कहा--] हे पुत्र ! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है (उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया॥ ४॥
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर।
भजेहु राम सोभा सुख सागर॥
baṃdhu baṃsa taiṃ kīnha ujāgara| bhajehu rāma sobhā sukha sāgara||
Meaning हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा॥ ५॥
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥ ६४॥
bacana karma mana kapaṭa taji bhajehu rāma ranadhīra|
jāhu na nija para sūjha mohi bhayaum̐ kālabasa bīra|| 64||
Meaning मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ॥ ६४॥
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥
नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥
baṃdhu bacana suni calā bibhīṣana| āyau jaham̐ trailoka bibhūṣana||
nātha bhūdharākāra sarīrā| kuṃbhakarana āvata ranadhīrā||
Meaning भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे। [विभीषणने कहा--] हे नाथ ! पर्वतके समान [ विशाल] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है॥ १॥
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥
etanā kapinha sunā jaba kānā| kilakilāi dhāe balavānā||
lie uṭhāi biṭapa aru bhūdhara| kaṭakaṭāi ḍārahiṃ tā ūpara||
Meaning वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [उखाडइ़कर] उठा लिये और [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे॥ २॥
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥
मुर् यो न मन तनु टर् यो न टार् यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥
koṭi koṭi giri sikhara prahārā| karahiṃ bhālu kapi eka eka bārā||
mur yo na mana tanu ṭar yo na ṭār yo| jimi gaja arka phalani ko māryo||
Meaning रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता!॥ ३॥
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर् यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥
taba mārutasuta muṭhikā hanyo| par yo dharani byākula sira dhunyo||
puni uṭhi tehiṃ māreu hanumaṃtā| ghurmita bhūtala pareu turaṃtā||
Meaning तब हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्ूजीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ४॥
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥
puni nala nīlahi avani pachāresi| jaham̐ taham̐ paṭaki paṭaki bhaṭa ḍāresi||
calī balīmukha sena parāī| ati bhaya trasita na kou samuhāī||
Meaning फिर उसने नल-नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक- पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली। सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता॥ ५॥
अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥ ६५॥
aṃgadādi kapi muruchita kari sameta sugrīva|
kām̐kha dābi kapirāja kahum̐ calā amita bala sīṃva|| 65||
Meaning सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला॥ ६५॥
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥
umā karata raghupati naralīlā| khelata garuṛa jimi ahigana mīlā||
bhṛkuṭi bhaṃga jo kālahi khāī| tāhi ki sohai aisi larāī||
Meaning (शिवजी कहते हैं--) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ सर्पोके समूहमें मिलकर खेलता हो। जो भौंहके इशारेमात्रसे (बिना परिश्रमके) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है ?॥ १॥
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥
jaga pāvani kīrati bistarihahiṃ| gāi gāi bhavanidhi nara tarihahiṃ||
muruchā gai mārutasuta jāgā| sugrīvahi taba khojana lāgā||
Meaning भगवान् [ इसके द्वारा] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायँगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमानजी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे॥ २॥
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलउ तेहिं जाना॥
sugrīvahu kai muruchā bītī| nibuka gayau tehi mṛtaka pratītī||
kāṭesi dasana nāsikā kānā| garaji akāsa calau tehiṃ jānā||
Meaning सुग्रीवकी भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [मुर्दे-से होकर] खिसक गये (काँखसे नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना॥ ३॥
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥
पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥
gaheu carana gahi bhūmi pachārā| ati lāghavam̐ uṭhi puni tehi mārā||
puni āyasu prabhu pahiṃ balavānā| jayati jayati jaya kṛpānidhānā||
Meaning उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा। और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले--कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो॥ ४॥
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥
nāka kāna kāṭe jiyam̐ jānī| phirā krodha kari bhai mana glānī||
sahaja bhīma puni binu śruti nāsā| dekhata kapi dala upajī trāsā||
Meaning नाक-कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति) -से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कानका होनेसे और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया॥ ५॥
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥ ६६॥
jaya jaya jaya raghubaṃsa mani dhāe kapi dai hūha|
ekahi bāra tāsu para chāṛenhi giri taru jūha|| 66||
Meaning 'रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो' ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े॥ ६६॥
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥
kuṃbhakarana rana raṃga biruddhā| sanmukha calā kāla janu kruddhā||
koṭi koṭi kapi dhari dhari khāī| janu ṭīṛī giri guhām̐ samāī||
Meaning रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [उनके] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वतकी गुफामें टिडियाँ समा रही हों॥ १॥
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥
koṭinha gahi sarīra sana mardā| koṭinha mīji milava mahi gardā||
mukha nāsā śravananhi kīṃ bāṭā| nisari parāhiṃ bhālu kapi ṭhāṭā||
Meaning करोड़ों (वानरों )-को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला। करोड़ोंको हाथोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया। [ पेठमें गये हुए] भालू और वानरोंके ठट्ट-के-ठट्ठ उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल-निकलकर भाग रहे हैं॥ २॥
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥
rana mada matta nisācara darpā| bisva grasihi janu ehi bidhi arpā||
mure subhaṭa saba phirahiṃ na phere| sūjha na nayana sunahiṃ nahiṃ ṭere||
Meaning रणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं!॥ ३॥
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥
देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥
kuṃbhakarana kapi phauja biḍārī| suni dhāī rajanīcara dhārī||
dekhi rāma bikala kaṭakāī| ripu anīka nānā bidhi āī||
Meaning कुम्भकर्णने वानर-सेनाको तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस-सेना भी दौड़ी। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना आ गयी है॥ ४॥
सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥ ६७॥
sunu sugrīva bibhīṣana anuja sam̐bhārehu saina|
maiṃ dekhaum̐ khala bala dalahi bole rājivanaina|| 67||
Meaning तब कमलनयन श्रीरामजी बोले--हे सुग्रीव ! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेनाको सँभालना। मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ॥ ६७॥
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥
kara sāraṃga sāji kaṭi bhāthā| ari dala dalana cale raghunāthā||
prathama kīnha prabhu dhanuṣa ṭam̐korā| ripu dala badhira bhayau suni sorā||
Meaning हाथमें शा धनुष और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले। प्रभुने पहले तो धनुषका टंकार किया जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रुदुल बहरा हो गया॥ १॥
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥
satyasaṃdha chām̐ṛe sara lacchā| kālasarpa janu cale sapacchā||
jaham̐ taham̐ cale bipula nārācā| lage kaṭana bhaṭa bikaṭa pisācā||
Meaning फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल-सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत-से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे॥ २॥
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥
kaṭahiṃ carana ura sira bhujadaṃḍā| bahutaka bīra hohiṃ sata khaṃḍā||
ghurmi ghurmi ghāyala mahi parahīṃ| uṭhi saṃbhāri subhaṭa puni larahīṃ||
Meaning उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से वीरोंके सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं॥ ३॥
लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं॥
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं॥
lāgata bāna jalada jimi gājahīṃ| bahutaka dekhī kaṭhina sara bhājahiṃ||
ruṃḍa pracaṃḍa muṃḍa binu dhāvahiṃ| dharu dharu mārū māru dhuni gāvahiṃ||
Meaning बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और *पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो' का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं॥ ४॥
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥ ६८॥
chana mahum̐ prabhu ke sāyakanhi kāṭe bikaṭa pisāca|
puni raghubīra niṣaṃga mahum̐ prabise saba nārāca|| 68||
Meaning प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोंको काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये॥ ६८॥
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी॥
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥
kuṃbhakarana mana dīkha bicārī| hati dhana mājha nisācara dhārī||
bhā ati kruddha mahābala bīrā| kiyo mṛganāyaka nāda gam̐bhīrā||
Meaning कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया॥ १॥
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥
आवत देखि सैल प्रभू भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥
kopi mahīdhara lei upārī| ḍārai jaham̐ markaṭa bhaṭa bhārī||
āvata dekhi saila prabhū bhāre| saranhi kāṭi raja sama kari ḍāre||
Meaning वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान (चूर-चूर) कर डाला॥ २॥
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥
puni dhanu tāni kopi raghunāyaka| chām̐ṛe ati karāla bahu sāyaka||
tanu mahum̐ prabisi nisari sara jāhīṃ| jimi dāmini ghana mājha samāhīṃ||
Meaning फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [पीछेसे इस प्रकार] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं॥ ३॥
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥
बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥
sonita stravata soha tana kāre| janu kajjala giri geru panāre||
bikala biloki bhālu kapi dhāe| biham̐sā jabahiṃ nikaṭa kapi āe||
Meaning उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा॥ ४॥
महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥ ६९॥
mahānāda kari garjā koṭi koṭi gahi kīsa|
mahi paṭakai gajarāja iva sapatha karai dasasīsa|| 69||
Meaning और बड़ा घोर शब्द करके गरजा। तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा॥ ६९॥
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा॥
चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥
bhāge bhālu balīmukha jūthā| bṛku biloki jimi meṣa barūthā||
cale bhāgi kapi bhālu bhavānī| bikala pukārata ārata bānī||
Meaning यह देखकर रीछ-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़ियिको देखकर भेड़ोंके झुंड। [ शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले॥ १॥
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥
yaha nisicara dukāla sama ahaī| kapikula desa parana aba cahaī||
kṛpā bāridhara rāma kharārī| pāhi pāhi pranatārati hārī||
Meaning [वे कहने लगे-] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!॥ २॥
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥
राम सेन निज पाछैं घाली। चले सकोप महा बलसाली॥
sakaruna bacana sunata bhagavānā| cale sudhāri sarāsana bānā||
rāma sena nija pāchaiṃ ghālī| cale sakopa mahā balasālī||
Meaning करुणाभरे वचन सुनते ही भगवान् धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्रीरामजीने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [अकेले] क्रोधपूर्वक चले (आगे बढ़े)॥ ३॥
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥
लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥
khaiṃci dhanuṣa sara sata saṃdhāne| chūṭe tīra sarīra samāne||
lāgata sara dhāvā risa bharā| kudhara ḍagamagata ḍolati dharā||
Meaning उन्होंने धनुषको खींचकर सौ बाण सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीरमें समा गये। बाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा। उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी॥ ४॥
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥
līnha eka tehiṃ saila upāṭī| raghukula tilaka bhujā soi kāṭī||
dhāvā bāma bāhu giri dhārī| prabhu sou bhujā kāṭi mahi pārī||
Meaning उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा। प्रभुने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वीपर गिरा दी॥ ५॥
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका॥
kāṭeṃ bhujā soha khala kaisā| pacchahīna maṃdara giri jaisā||
ugra bilokani prabhuhi bilokā| grasana cahata mānahum̐ trelokā||
Meaning भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा। मानो तीनों लोकोंको निगल जाना चाहता हो॥६॥
करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥ ७०॥
kari cikkāra ghora ati dhāvā badanu pasāri|
gagana siddha sura trāsita hā hā heti pukāri|| 70||
Meaning वह बड़े जोरसे चिग्घाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे॥ ७०॥
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो॥
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥
sabhaya deva karunānidhi jānyo| śravana prajaṃta sarāsanu tānyo||
bisikha nikara nisicara mukha bhareū| tadapi mahābala bhūmi na pareū||
Meaning करुणानिधान भगवानूने देवताओंको भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुषको कानतक तानकर राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा॥ १॥
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥
saranhi bharā mukha sanmukha dhāvā| kāla trona sajīva janu āvā||
taba prabhu kopi tībra sara līnhā| dhara te bhinna tāsu sira kīnhā||
Meaning मुखमें बाण भरे हुए वह [प्रभुके] सामने दौड़ा। मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया॥ २॥
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥
so sira pareu dasānana āgeṃ| bikala bhayau jimi phani mani tyāgeṃ||
dharani dhasai dhara dhāva pracaṃḍā| taba prabhu kāṭi kīnha dui khaṃḍā||
Meaning वह सिर रावणके आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प। कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये॥ ३॥
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥
pare bhūmi jimi nabha teṃ bhūdhara| heṭha dābi kapi bhālu nisācara||
tāsu teja prabhu badana samānā| sura muni sabahiṃ acaṃbhava mānā||
Meaning वानर-भालू और निशाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया। [यह देखकर] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना॥ ४॥
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥
sura duṃdubhīṃ bajāvahiṃ haraṣahiṃ| astuti karahiṃ sumana bahu baraṣahiṃ||
kari binatī sura sakala sidhāe| tehī samaya devariṣi āe||
Meaning देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गये। उसी समय देवर्षि नारद आये॥ ५॥
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥
gaganopari hari guna gana gāe| rucira bīrarasa prabhu mana bhāe||
begi hatahu khala kahi muni gae| rāma samara mahi sobhata bhae||
Meaning आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये। [उस समय; श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [ अत्यन्त] सुशोभित हुए॥ ६॥
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।
श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥
saṃgrāma bhūmi birāja raghupati atula bala kosala dhanī|
śrama biṃdu mukha rājīva locana aruna tana sonita kanī||
bhuja jugala pherata sara sarāsana bhālu kapi cahu disi bane|
kaha dāsa tulasī kahi na saka chabi seṣa jehi ānana ghane||
Meaning अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं। मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से (हजार) मुख हैं।
निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गणिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥ ७१॥
nisicara adhama malākara tāhi dīnha nija dhāma|
gaṇirijā te nara maṃdamati je na bhajahiṃ śrīrāma|| 71||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अत: वे मनुष्य [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते॥ ७१॥
दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥
dina keṃ aṃta phirīṃ dou anī| samara bhaī subhaṭanha śrama ghanī||
rāma kṛpām̐ kapi dala bala bāṛhā| jimi tṛna pāi lāga ati ḍāṛhā||
Meaning दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [ आजके युद्धमें। योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है॥ १॥
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥
chījahiṃ nisicara dinu aru rātī| nija mukha kaheṃ sukṛta jehi bhām̐tī||
bahu bilāpa dasakaṃdhara karaī| baṃdhu sīsa puni puni ura dharaī||
Meaning उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई ( कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है॥ २॥
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥
मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥
rovahiṃ nāri hṛdaya hati pānī| tāsu teja bala bipula bakhānī||
meghanāda tehi avasara āyau| kahi bahu kathā pitā samujhāyau||
Meaning स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया॥ ३॥
देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥
dekhehu kāli mori manusāī| abahiṃ bahuta kā karauṃ baṛāī||
iṣṭadeva saiṃ bala ratha pāyaum̐| so bala tāta na tohi dekhāyaum̐||
Meaning [ और कहा-] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [ और रथ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था॥ ४॥
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥
इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥
ehi bidhi jalpata bhayau bihānā| cahum̐ duāra lāge kapi nānā||
ita kapi bhālu kāla sama bīrā| uta rajanīcara ati ranadhīrā||
Meaning इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत-से वानर आ डटे। इधर कालके समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस॥ ५॥
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू।
बरनि न जाइ समर खगकेतू॥
larahiṃ subhaṭa nija nija jaya hetū| barani na jāi samara khagaketū||
Meaning दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़ ! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ६॥
मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥ ७२॥
meghanāda māyāmaya ratha caṛhi gayau akāsa|garjeu aṭṭahāsa kari bhai kapi kaṭakahi trāsa|| 72||
Meaning मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्रहास करके गरजा, जिससे वानरोंको सेनामें भय छा गया॥ ७२॥
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥
डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥
sakti sūla taravāri kṛpānā| astra sastra kulisāyudha nānā||
ḍāraha parasu parigha pāṣānā| lāgeu bṛṣṭi karai bahu bānā||
Meaning वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शस्त्र एवं वज्र आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १॥
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥
dasa disi rahe bāna nabha chāī| mānahum̐ maghā megha jhari lāī||
dharu dharu māru sunia dhuni kānā| jo mārai tehi kou na jānā||
Meaning आकाशमें दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। 'पकड़ो, पकड़ो, मारो! ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता॥ २॥
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥
अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥
gahi giri taru akāsa kapi dhāvahiṃ| dekhahi tehi na dukhita phiri āvahiṃ||
avaghaṭa ghāṭa bāṭa giri kaṃdara| māyā bala kīnhesi sara paṃjara||
Meaning पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं--मेघनादने मायाके बलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत- कन्दराओंको बाणोंके पिंजरे बना दिये (बाणोंसे छा दिया)॥ ३॥
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥
मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥
jāhiṃ kahām̐ byākula bhae baṃdara| surapati baṃdi pare janu maṃdara||
mārutasuta aṃgada nala nīlā| kīnhesi bikala sakala balasīlā||
Meaning अब कहाँ जाये, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गये। मानो पर्वत इन्द्रकी कैदमें पड़े हों। मेघनादने मारुति हनुमान, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया॥ ४॥
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥
पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥
puni lachimana sugrīva bibhīṣana| saranhi māri kīnhesi jarjara tana||
puni raghupati saiṃ jūjhe lāgā| sara chām̐ṛai hoi lāgahiṃ nāgā||
Meaning फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको चलनी कर दिया। फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं॥ ५॥
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥
नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥
byāla pāsa basa bhae kharārī| svabasa anaṃta eka abikārī||
naṭa iva kapaṭa carita kara nānā| sadā svataṃtra eka bhagavānā||
Meaning जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [ लीलासे ] नागपाशके वशमें हो गये (उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक, ( अद्वितीय) भगवान् हैं। वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र करते हैं॥ ६॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो।
नागपास देवन्ह भय पायो॥
rana sobhā lagi prabhuhiṃ bam̐dhāyo| nāgapāsa devanha bhaya pāyo||
Meaning रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओंको बड़ा भय हुआ॥ ७॥
गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।
girijā jāsu nāma japi muni kāṭahiṃ bhava pāsa|
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥ ७३॥
so ki baṃdha tara āvai byāpaka bisva nivāsa|| 73||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे ! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास (विश्वके आधार) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं ?॥ ७३॥
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥
carita rāma ke saguna bhavānī| tarki na jāhiṃ buddhi bala bānī||
asa bicāri je tagya birāgī| rāmahi bhajahiṃ tarka saba tyāgī||
Meaning हे भवानी ! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क ( निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं॥ १॥
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥
byākula kaṭaku kīnha ghananādā| puni bhā pragaṭa kahai durbādā||
jāmavaṃta kaha khala rahu ṭhāṛhā| suni kari tāhi krodha ati bāṛhā||
Meaning मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा। इसपर जाम्बवानूने कहा--3रे दुष्ट! खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा॥ २॥
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥
būṛha jāni saṭha chām̐ṛeum̐ tohī| lāgesi adhama pacārai mohī||
asa kahi tarala trisūla calāyo| jāmavaṃta kara gahi soi dhāyo||
Meaning आरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझीको ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान् उसी त्रिशूलको हाथसे पकड़कर दौड़ा॥ ३॥
मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥
पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो॥
mārisi meghanāda kai chātī| parā bhūmi ghurmita suraghātī||
puni risāna gahi carana phirāyau| mahi pachāri nija bala dekharāyo||
Meaning और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा। वह देवताओंका शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। जाम्बवानूने फिर क्रोधमें भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वीपर पटककर उसे अपना बल दिखलाया॥ ४॥
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥
bara prasāda so marai na mārā| taba gahi pada laṃkā para ḍārā||
ihām̐ devariṣi garuṛa paṭhāyo| rāma samīpa sapadi so āyo||
Meaning [ किन्तु] वरदानके प्रतापसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवानूने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया। इधर देवर्षि नारदजीने गरुड़को भेजा। वे तुरंत ही श्रीरामजीके पास आ पहुँचे॥ ५॥
खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥ ७४ (क)॥
khagapati saba dhari khāe māyā nāga barūtha|
māyā bigata bhae saba haraṣe bānara jūtha|| 74 (ka)||
Meaning पक्षिराज गरुड़जी सब माया-स्पोंके समूहोंको पकड़कर खा गये। तब सब वानरोंके झुंड मायासे रहित होकर हर्षित हुए॥ ७४ (क)॥
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥ ७४( ख )॥
gahi giri pādapa upala nakha dhāe kīsa risāi|
cale tamīcara bikalatara gaṛha para caṛhe parāi|| 74( kha )||
Meaning पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किये वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किलेपर चढ़ गये॥ ७४ (ख)॥