सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा॥
sukhī mīna je nīra agādhā| jimi hari sarana na ekau bādhā||
phūleṃ kamala soha sara kaisā| nirguna bramha saguna bhaem̐ jaisā||
Meaning जो मछलियाँ अथाह जलमें हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरिके शरणमें चले जानेपर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलोंके फूलनेसे तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होनेपर शोभित होता है॥ १॥
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥
guṃjata madhukara mukhara anūpā| suṃdara khaga rava nānā rūpā||
cakrabāka mana dukha nisi paikhī| jimi durjana para saṃpati dekhī||
Meaning भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, * किष्किन्धाकाण्ड तथा पक्षियोंके नाना * प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं। ६९९ रात्रि देखकर चकवेके मनमें वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरेकी सम्पत्ति देखकर दुष्टको होता है॥ २॥
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही॥
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥
cātaka raṭata tṛṣā ati ohī| jimi sukha lahai na saṃkaradrohī||
saradātapa nisi sasi apaharaī| saṃta darasa jimi pātaka ṭaraī||
Meaning पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशड्टरजीका द्रोही सुख नहीं पाता (सुखके लिये झीखता रहता है)। शरद्-ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोंके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं॥ ३॥
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥
dekhi iṃdu cakora samudāī| citavatahiṃ jimi harijana hari pāī||
masaka daṃsa bīte hima trāsā| jimi dvija droha kiem̐ kula nāsā||
Meaning चकोरोंके समुदाय चन्द्रमाको देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्धक्त भगवान्को पाकर उनके [ निर्निमेष नेत्रोंसे] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़ेके डरसे इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मणके साथ वैर करनेसे कुलका नाश हो जाता है॥ ४॥
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥ २७॥
bhūmi jīva saṃkula rahe gae sarada ritu pāi|
sadagura mile jāhiṃ jimi saṃsaya bhrama samudāi|| 27||
Meaning [वर्षा-ऋतुके कारण] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरदू-ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं॥ १७॥
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं॥
baraṣā gata nirmala ritu āī| sudhi na tāta sītā kai pāī||
eka bāra kaisehum̐ sudhi jānauṃ| kālahu jīta nimiṣa mahum̐ ānauṃ||
Meaning वर्षा बीत गयी, निर्मल शरदू-ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीताकी कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो कालको भी जीतकर पलभरमें जानकीको ले आऊँ॥ १॥
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥
katahum̐ rahau jauṃ jīvati hoī| tāta jatana kari āneum̐ soī||
sugrīvahum̐ sudhi mori bisārī| pāvā rāja kosa pura nārī||
Meaning कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात! यत्र करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीवने भी मेरी सुधि भुला दी॥ २॥
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥
जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥
jehiṃ sāyaka mārā maiṃ bālī| tehiṃ sara hatauṃ mūṛha kaham̐ kālī||
jāsu kṛpām̐ chūṭahīṃ mada mohā| tā kahum̐ umā ki sapanehum̐ kohā||
Meaning जिस बाणसे मैंने बालिको मारा था, उसी बाणसे कल उस मूढ़को मारूँ! [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिनकी कृपासे मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्रमें भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है]॥ ३॥
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥
jānahiṃ yaha caritra muni gyānī| jinha raghubīra carana rati mānī||
lachimana krodhavaṃta prabhu jānā| dhanuṣa caṛhāi gahe kara bānā||
Meaning ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रीति मान ली है (जोड़ ली है), वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजीने जब प्रभुको क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथमें ले लिये॥ ४॥
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥ २१८॥
taba anujahi samujhāvā raghupati karunā sīṃva|
bhaya dekhāi lai āvahu tāta sakhā sugrīva|| 218||
Meaning तब दयाकी सीमा श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीवको केवल भय दिखलाकर ले आओ [उसे मारनेकी बात नहीं है]॥ १८॥
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥
ihām̐ pavanasuta hṛdayam̐ bicārā| rāma kāju sugrīvam̐ bisārā||
nikaṭa jāi carananhi siru nāvā| cārihu bidhi tehi kahi samujhāvā||
Meaning यहाँ (किष्किन्धानगरीमें ) पवनकुमार श्रीहनुमानूजीने विचार किया कि सुग्रीवने श्रीरामजीके कार्यको भुला दिया। उन्होंने सुप्रीवके पास जाकर चरणोंमें सिर नवाया। [साम, दान, दण्ड, भेद] चारों प्रकारकी नीति कहकर उन्हें समझाया॥ १॥
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥
अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥
suni sugrīvam̐ parama bhaya mānā| biṣayam̐ mora hari līnheu gyānā||
aba mārutasuta dūta samūhā| paṭhavahu jaham̐ taham̐ bānara jūhā||
Meaning हनुमानूजीके वचन सुनकर सुग्रीवने बहुत ही भय माना। [और कहा-] विषयोंने मेरे ज्ञानको हर लिया। अब हे पवनसुत! जहाँ-तहाँ वानरोंके यूथ रहते हैं; वहाँ दूतोंके समूहोंको भेजो॥ २॥
कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥
तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता॥
kahahu pākha mahum̐ āva na joī| moreṃ kara tā kara badha hoī||
taba hanumaṃta bolāe dūtā| saba kara kari sanamāna bahūtā||
Meaning और कहला दो कि एक पखवाड़ेमें (पंद्रह दिनोंमें) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों वध होगा। तब हनुमान्ूजीने दूतोंको बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके--॥ ३॥
भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥
bhaya aru prīti nīti dekhāī| cale sakala carananhi sira nāī||
ehi avasara lachimana pura āe| krodha dekhi jaham̐ taham̐ kapi dhāe||
Meaning सबको भय, प्रीति और नीति दिखलायी। सब बंदर चरणोंमें सिर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगरमें आये। उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे॥ ४॥
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥ १९॥
dhanuṣa caṛhāi kahā taba jāri karaum̐ pura chāra|
byākula nagara dekhi taba āyau bālikumāra|| 19||
Meaning तदनन्तर लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगरको जलाकर अभी राख कर दूँगा। तब नगरभरको व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये॥ १९॥
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना॥
carana nāi siru binatī kīnhī| lachimana abhaya bām̐ha tehi dīnhī||
krodhavaṃta lachimana suni kānā| kaha kapīsa ati bhayam̐ akulānā||
Meaning अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर विनती की ( क्षमायाचना की)। तब लक्ष्मणजीने उनको अभय बाँह दी ( भुजा उठाकर कहा कि डरो मत)। सुग्रीवने अपने कानोंसे लक्ष्मणजीको क्रो धयुक्त सुनकर भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर कहा--॥ १॥
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥
तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥
sunu hanumaṃta saṃga lai tārā| kari binatī samujhāu kumārā||
tārā sahita jāi hanumānā| carana baṃdi prabhu sujasa bakhānā||
Meaning हे हनुमान्! सुनो, तुम ताराको साथ ले जाकर विनती करके राजकुमारको समझाओ (समझा- बुझाकर शान्त करो)। हनुमानूजीने तारासहित जाकर लक्ष्मणजीके चरणोंकी वन्दना की और प्रभुके सुन्दर यशका बखान किया॥ २॥
करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए॥
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा॥
kari binatī maṃdira lai āe| carana pakhāri palam̐ga baiṭhāe||
taba kapīsa carananhi siru nāvā| gahi bhuja lachimana kaṃṭha lagāvā||
Meaning वे विनती करके उन्हें महलमें ले आये तथा चरणोंको धोकर उन्हें पलैँगपर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीवने उनके चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने हाथ पकड़कर उनको गलेसे लगा लिया॥ ३॥
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥
सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥
nātha biṣaya sama mada kachu nāhīṃ| muni mana moha karai chana māhīṃ||
sunata binīta bacana sukha pāvā| lachimana tehi bahu bidhi samujhāvā||
Meaning [ सुग्रीवने कहा--] हे नाथ! विषयके समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियोंके मनमें भी क्षणमात्रमें मोह उत्पन्न कर देता है [फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा]। सुग्रीवके विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजीने सुख पाया और उनको बहुत प्रकारसे समझाया॥ '४॥
पवन तनय सब कथा सुनाई।
जेहि बिधि गए दूत समुदाई॥
pavana tanaya saba kathā sunāī| jehi bidhi gae dūta samudāī||
Meaning तब पवनसुत हनुमान्जीने जिस प्रकार सब दिशाओंमें दूतोंके समूह गये थे वह सब हाल सुनाया॥ ५॥
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।
रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ॥ २०॥
haraṣi cale sugrīva taba aṃgadādi kapi sātha|
rāmānuja āgeṃ kari āe jaham̐ raghunātha|| 20||
Meaning तब अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर और श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणजीको आगे करके ( अर्थात् उनके पीछे-पीछे) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये॥ २०॥
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥
अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥
nāi carana siru kaha kara jorī| nātha mohi kachu nāhina khorī||
atisaya prabala deva taba māyā| chūṭai rāma karahu jauṃ dāyā||
Meaning ७०२ श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर हाथ * रामचरितमानस जोड़कर सुग्रीवने * कहा--हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव ! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम ! तभी यह छूटती है॥ १॥
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी॥
नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥
biṣaya basya sura nara muni svāmī| maiṃ pāvam̐ra pasu kapi ati kāmī||
nāri nayana sara jāhi na lāgā| ghora krodha tama nisi jo jāgā||
Meaning हे स्वामी ! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयोंके वशभमें हैं। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओंमें भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्रीका नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयड्र क्रोधरूपी अँधेरी रातमें भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता)॥ २॥
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥
यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई॥
lobha pām̐sa jehiṃ gara na bam̐dhāyā| so nara tumha samāna raghurāyā||
yaha guna sādhana teṃ nahiṃ hoī| tumharī kṛpām̐ pāva koi koī||
Meaning और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है। ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते। आपकी कृपासे ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं॥ ३॥
तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥
अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई॥
taba raghupati bole musakāī| tumha priya mohi bharata jimi bhāī||
aba soi jatanu karahu mana lāī| jehi bidhi sītā kai sudhi pāī||
Meaning तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले--हे भाई! तुम मुझे भरतके समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपायसे सीताकी खबर मिले॥ ४॥
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ॥ २१॥
ehi bidhi hota batakahī āe bānara jūtha|
nānā barana sakala disi dekhia kīsa barutha|| 21||
Meaning इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरोंके यूथ (झुंड) आ गये। अनेक रंगोंके वानरोंके दल सब दिशाओंमें दिखायी देने लगे॥ २१॥
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा॥
bānara kaṭaka umā meṃ dekhā| so mūrukha jo karana caha lekhā||
āi rāma pada nāvahiṃ māthā| nirakhi badanu saba hohiṃ sanāthā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! वानरोंकी वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजीके. चरणोंमें मस्तक नवाते हैं और [सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] श्रीमुखके दर्शन करके कृतार्थ होते हैं॥ १॥
अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं॥
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई॥
asa kapi eka na senā māhīṃ| rāma kusala jehi pūchī nāhīṃ||
yaha kachu nahiṃ prabhu kai adhikāī| bisvarūpa byāpaka raghurāī||
Meaning सेनामें एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजीने कुशल न पूछी हो। प्रभुके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं ( सारे रूपों और सब स्थानोंमें हैं)॥ २॥
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई॥
राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा॥
ṭhāṛhe jaham̐ taham̐ āyasu pāī| kaha sugrīva sabahi samujhāī||
rāma kāju aru mora nihorā| bānara jūtha jāhu cahum̐ orā||
Meaning आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गये। तब सुग्रीवने सबको समझाकर कहा कि हे वानरोंके समूहों ! यह श्रीरामचन्द्रजीका कार्य है और मेरा निहोरा (अनुरोध) है; तुम चारों ओर जाओ॥ ३॥
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई॥
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ॥
janakasutā kahum̐ khojahu jāī| māsa divasa maham̐ āehu bhāī||
avadhi meṭi jo binu sudhi pāem̐| āvai banihi so mohi marāem̐||
Meaning और जाकर जानकीजीको खोजो। हे भाई! महीनेभरमें वापस आ जाना। जो [महीनेभरकी ] अवधि बिताकर बिना पता लगाये ही लौट आवेगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा (अर्थात् मुझे उसका वध करवाना ही पड़ेगा)॥ ४॥
बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत।
तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत॥ २२॥
bacana sunata saba bānara jaham̐ taham̐ cale turaṃta|
taba sugrīvam̐ bolāe aṃgada nala hanumaṃta|| 22||
Meaning सुग्रीवके वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ (भिन्न-भिन्न दिशाओंमें) चल दिये। तब सुग्रीवने अंगदु, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओंको बुलाया [और कहा--]॥ २२॥
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू॥
sunahu nīla aṃgada hanumānā| jāmavaṃta matidhīra sujānā||
sakala subhaṭa mili dacchina jāhū| sītā sudhi pūm̐cheu saba kāhū||
Meaning हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशाको जाओ और सब किसीसे सीताजीका पता पूछना॥ १॥
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥
भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी॥
mana krama bacana so jatana bicārehu| rāmacaṃdra kara kāju sam̐vārehu||
bhānu pīṭhi seia ura āgī| svāmihi sarba bhāva chala tyāgī||
Meaning मन, वचन तथा कर्मसे उसीका ( सीताजीका पता लगानेका) उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न (सफल) करना। सूर्यको पीठसे और अग़्िको हृदयसे (सामनेसे ) सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे (मन, वचन, कर्मसे) करनी चाहिये॥ २॥
तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका॥
देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई॥
taji māyā seia paralokā| miṭahiṃ sakala bhava saṃbhava sokā||
deha dhare kara yaha phalu bhāī| bhajia rāma saba kāma bihāī||
Meaning माया (विषयोंकी ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोकका सेवन ( भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिकि लिये भगवत्सेवारूप साधन) करना चाहिये, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ। हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय॥ ३॥
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी॥
आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई॥
soi gunagya soī baṛabhāgī| jo raghubīra carana anurāgī||
āyasu māgi carana siru nāī| cale haraṣi sumirata raghurāī||
Meaning सद्गुणोंको पहचाननेवाला (गुणवान्) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणों में फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले॥ ४॥
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥
pācheṃ pavana tanaya siru nāvā| jāni kāja prabhu nikaṭa bolāvā||
parasā sīsa saroruha pānī| karamudrikā dīnhi jana jānī||
Meaning सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमानूजीने सिर नवाया। कार्यका विचार करके प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमलसे उनके सिरका स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथकी अँगूठी उतारकर दी॥ ५॥
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥
हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना॥
bahu prakāra sītahi samujhāehu| kahi bala biraha begi tumha āehu||
hanumata janma suphala kari mānā| caleu hṛdayam̐ dhari kṛpānidhānā||
Meaning [ और कहा-] बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना। हनुमानूजीने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभुको हृदयमें धारण करके वे चले॥ ६॥
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता।
राजनीति राखत सुरत्राता॥
jadyapi prabhu jānata saba bātā| rājanīti rākhata suratrātā||
Meaning यद्यपि देवताओंकी रक्षा करनेवाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीतिकी रक्षा कर रहे हैं। (नीतिकी मर्यादा रखनेके लिये सीताजीका पता लगानेको जहाँ-तहाँ वानरोंको भेज रहे हैं)॥७॥
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥ २३॥
cale sakala bana khojata saritā sara giri khoha|
rāma kāja layalīna mana bisarā tana kara choha|| 23||
Meaning सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतोंकी कन्दराओंमें खोजते हुए चले जा रहे हैं। मन श्रीरामजीके कार्यमें लवलीन है। शरीरतकका प्रेम (ममत्व) भूल गया है॥ २३॥
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा॥
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं॥
katahum̐ hoi nisicara saiṃ bheṭā| prāna lehiṃ eka eka capeṭā||
bahu prakāra giri kānana herahiṃ| kou muni milata tāhi saba gherahiṃ||
Meaning कहीं किसी राक्षससे भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपतमें ही उसके प्राण ले लेते हैं। पर्वतों और वनोंको बहुत प्रकारसे खोज रहे हैं। कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछनेके लिये उसे सब घेर लेते हैं॥ १॥
लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने॥
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना॥
lāgi tṛṣā atisaya akulāne| milai na jala ghana gahana bhulāne||
mana hanumāna kīnha anumānā| marana cahata saba binu jala pānā||
Meaning इतनेमें ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, * किष्किन्धाकाण्ड जिससे सब अत्यन्त * ही व्याकुल हो गये। किन्तु ७०५ जल कहीं नहीं मिला। घने जंगलमें सब भुला गये। हनुमान्ूजीने मनमें अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं॥ २॥
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा॥
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं॥
caṛhi giri sikhara cahūm̐ disi dekhā| bhūmi bibira eka kautuka pekhā||
cakrabāka baka haṃsa uṛāhīṃ| bahutaka khaga prabisahiṃ tehi māhīṃ||
Meaning उन्होंने पहाड़की चोटीपर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वीके अंदर एक गुफामें उन्हें एक कौतुक (आश्चर्य) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत- से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं॥ ३॥
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा॥
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा॥
giri te utari pavanasuta āvā| saba kahum̐ lai soi bibara dekhāvā||
āgeṃ kai hanumaṃtahi līnhā| paiṭhe bibara bilaṃbu na kīnhā||
Meaning पवनकुमार हनुमानजी पर्वतसे उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमानूजीको आगे कर लिया और वे गुफामें घुस गये, देर नहीं की॥ ४॥
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥ २४॥
dīkha jāi upavana bara sara bigasita bahu kaṃja|
maṃdira eka rucira taham̐ baiṭhi nāri tapa puṃja|| 24||
Meaning अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपवन (बगीचा) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है॥ २४॥
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा॥
तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना॥
dūri te tāhi sabanhi sira nāvā| pūcheṃ nija bṛttāṃta sunāvā||
tehiṃ taba kahā karahu jala pānā| khāhu surasa suṃdara phala nānā||
Meaning दूरसे ही सबने उसे सिर नवाया और पूछनेपर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब उसने कहा-जलपान करो और भाँति-भाँतिके रसीले सुन्दर फल खाओ॥ १॥
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए॥
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥
majjanu kīnha madhura phala khāe| tāsu nikaṭa puni saba cali āe||
tehiṃ saba āpani kathā sunāī| maiṃ aba jāba jahām̐ raghurāī||
Meaning [ आज्ञा पाकर] सबने स्रान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [ और कहा--] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं॥ २॥
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा॥
mūdahu nayana bibara taji jāhū| paihahu sītahi jani pachitāhū||
nayana mūdi puni dekhahiṃ bīrā| ṭhāṛhe sakala siṃdhu keṃ tīrā||
Meaning तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफाको छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजीको पा जाओगे, पछताओ नहीं (निराश न होओ)। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्रके तीरपर खड़े हैं॥३॥
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा॥
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही॥
so puni gaī jahām̐ raghunāthā| jāi kamala pada nāesi māthā||
nānā bhām̐ti binaya tehiṃ kīnhī| anapāyanī bhagati prabhu dīnhī||
Meaning और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभुके चरणकमलों में मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की। प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी (अचल) भक्ति दी॥४॥
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस॥ २५॥
badarībana kahum̐ so gaī prabhu agyā dhari sīsa|
ura dhari rāma carana juga je baṃdata aja īsa|| 25||
Meaning प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारणकर और श्रीरामजीके युगल चरणोंको, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदयमें धारणकर वह (स्वयंप्रभा) बदरिकाश्रमको चली गयी॥ २५॥
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं॥
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता॥
ihām̐ bicārahiṃ kapi mana māhīṃ| bītī avadhi kāja kachu nāhīṃ||
saba mili kahahiṃ paraspara bātā| binu sudhi laem̐ karaba kā bhrātā||
Meaning यहाँ वानरगण मनमें विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपसभमें बात करने लगे कि हे भाई ! अब तो सीताजीकी खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे 2॥ १॥
कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥
इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई॥
kaha aṃgada locana bhari bārī| duhum̐ prakāra bhai mṛtyu hamārī||
ihām̐ na sudhi sītā kai pāī| uhām̐ gaem̐ mārihi kapirāī||
Meaning अंगदने नेत्रोंगें जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकारसे हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजीकी सुध नहीं मिली और वहाँ जानेपर वानरराज सुग्रीव मार डालेंगे॥ २॥
पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही॥
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं॥
pitā badhe para mārata mohī| rākhā rāma nihora na ohī||
puni puni aṃgada kaha saba pāhīṃ| marana bhayau kachu saṃsaya nāhīṃ||
Meaning वे तो पिताके वध होनेपर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजीने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीवका कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥ ३॥
अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा॥
छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए॥
aṃgada bacana sunata kapi bīrā| boli na sakahiṃ nayana baha nīrā||
chana eka soca magana hoi rahe| puni asa vacana kahata saba bhae||
Meaning वानर वीर अंगदके वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रोंसे जल बह रहा है। एक क्षणके लिये सब सोचमें मग्र हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे--॥ ४॥
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना॥
अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई॥
hama sītā kai sudhi linheṃ binā| nahiṃ jaiṃhaiṃ jubarāja prabīnā||
asa kahi lavana siṃdhu taṭa jāī| baiṭhe kapi saba darbha ḍasāī||
Meaning हे सुयोग्य युवराज! हमलोग सीताजीकी खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागरके तटपर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये॥ ५॥
जामवंत अंगद दुख देखी।
कहिं कथा उपदेस बिसेषी॥ तात राम कहुँ नर जनि मानहु।
निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु॥
jāmavaṃta aṃgada dukha dekhī| kahiṃ kathā upadesa biseṣī|| tāta rāma kahum̐ nara jani mānahu| nirguna bramha ajita aja jānahu||
Meaning जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं। [वे बोले--] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो॥ ६॥
हम सब सेवक अति बड़भागी।
संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥
hama saba sevaka ati baṛabhāgī| saṃtata saguna brahma anurāgī||
Meaning हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म ( श्रीरामजी ) में प्रीति रखते हैं॥ ७॥
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥ २६॥
nija icchā prabhu avatarai sura mahi go dvija lāgi|
saguna upāsaka saṃga taham̐ rahahiṃ moccha saba tyāgi|| 26||
Meaning देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [ किसी कर्मबन्धनसे नहीं।] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [ भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं॥ २६॥
एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदरोाँ सुनी संपाती॥
बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥
ehi bidhi kathā kahahiṃ bahu bhām̐tī| giri kaṃdaroाm̐ sunī saṃpātī||
bāhera hoi dekhi bahu kīsā| mohi ahāra dīnha jagadīsā||
Meaning इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकारसे कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वतकी कन्दरामें सम्पातीने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [तब वह बोला--] जगदीथ्वरने मुझको घर बेठे बहुत-सा आहार भेज दिया!॥ १॥
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा॥
āju sabahi kaham̐ bhacchana karaūm̐| dina bahu cale ahāra binu maraūm̐||
kabahum̐ na mila bhari udara ahārā| āju dīnha bidhi ekahiṃ bārā||
Meaning आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजनके बिना मर रहा था। पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाताने एक ही बारमें बहुत-सा भोजन दे दिया॥ २॥
डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥
कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥
ḍarape gīdha bacana suni kānā| aba bhā marana satya hama jānā||
kapi saba uṭhe gīdha kaham̐ dekhī| jāmavaṃta mana soca biseṣī||
Meaning गीधके वचन कानोंसे सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध (सम्पाती) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान्के मनमें विशेष सोच हुआ॥ ३॥
कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥
राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़ भागी॥
kaha aṃgada bicāri mana māhīṃ| dhanya jaṭāyū sama kou nāhīṃ||
rāma kāja kārana tanu tyāgī| hari pura gayau parama baṛa bhāgī||
Meaning अंगदने मनमें विचारकर कहा--अहा! जटायुके समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजीके कार्यके लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान्के परमधामको चला गया॥ ४॥
सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥
suni khaga haraṣa soka juta bānī| āvā nikaṭa kapinha bhaya mānī||
tinhahi abhaya kari pūchesi jāī| kathā sakala tinha tāhi sunāī||
Meaning हर्ष और शोकसे युक्त वाणी (समाचार) सुनकर वह पक्षी (सम्पाती) वानरोंके पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके (अभय-वचन देकर) उसने पास जाकर जटायुका वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी॥ ५॥
सुनि संपाति बंधु कै करनी।
रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी॥
suni saṃpāti baṃdhu kai karanī| raghupati mahimā badhubidhi baranī||
Meaning भाई जटयुकी करनी सुनकर सम्पातीने बहुत प्रकारसे श्रीरघुनाथजीकी महिमा वर्णन की॥ ६॥
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि।
बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि॥ २७॥
mohi lai jāhu siṃdhutaṭa deum̐ tilāṃjali tāhi|
bacana sahāi karavi maiṃ paihahu khojahu jāhi|| 27||
Meaning [उसने कहा--] मुझे समुद्रके किनारे ले चलो, मैं जटायुको तिलाजलि दे दूँ। इस सेवाके बदले मैं तुम्हारी वचनसे सहायता करूँगा ( अर्थात् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा) जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे॥ २७॥
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा॥
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उडाई॥
anuja kriyā kari sāgara tīrā| kahi nija kathā sunahu kapi bīrā||
hama dvau baṃdhu prathama tarunāī| gagana gae rabi nikaṭa uḍāī||
Meaning समुद्रके तीरपर छोटे भाई जटायुकी क्रिया (श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा--हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानीमें एक बार आकाशमें उड़कर सूर्यके निकट चले गये॥ १॥
तेज न सहि सक सो फिरि आवा। मै अभिमानी रबि निअरावा॥
जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥
teja na sahi saka so phiri āvā| mai abhimānī rabi niarāvā||
jare paṃkha ati teja apārā| pareum̐ bhūmi kari ghora cikārā||
Meaning वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। (किन्तु) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्यके पास चला गया। अत्यन्त अपार तेजसे मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोरसे चीख मारकर जमीनपर गिर पड़ा॥ २॥
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही॥
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा। देहि जनित अभिमानी छड़ावा॥
muni eka nāma caṃdramā ohī| lāgī dayā dekhī kari mohī||
bahu prakāra teṃhi gyāna sunāvā| dehi janita abhimānī chaṛāvā||
Meaning वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमानको छुड़ा दिया॥ ३॥
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही॥
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता॥
tretām̐ brahma manuja tanu dharihī| tāsu nāri nisicara pati harihī||
tāsu khoja paṭhaihi prabhū dūtā| tinhahi mileṃ taiṃ hoba punītā||
Meaning [ उन्होंने कहा-- त्रेतायुगमें साक्षात् * परब्रहम किष्किन्धाकाण्ड मनुष्यशरीर * धारण करेंगे। उनकी स्त्रीको राक्षसोंका ७०९ राजा हर ले जायगा। उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा॥ ४॥
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता॥
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥
jamihahiṃ paṃkha karasi jani ciṃtā| tinhahi dekhāi dehesu taiṃ sītā||
muni kai girā satya bhai ājū| suni mama bacana karahu prabhu kājū||
Meaning और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजीको दिखा देना। मुनिकी वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभुका कार्य करो॥ ५॥
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका॥
तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई॥
giri trikūṭa ūpara basa laṃkā| taham̐ raha rāvana sahaja asaṃkā||
taham̐ asoka upabana jaham̐ rahaī| sītā baiṭhi soca rata ahaī||
Meaning त्रिकूट पर्वतपर लड़ा बसी हुई है। वहाँ स्वभावहीसे निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नामका उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [इस समय भी] वे सोचमें मगर बैठी हैं॥ ६॥
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार॥ २८॥
maiṃ dekhaum̐ tumha nāhi gīghahi daṣṭi apāra|
būḍha bhayaum̐ na ta karateum̐ kachuka sahāya tumhāra|| 28||
Meaning मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीधकी दृष्टि अपार होती है (बहुत दूरतक जाती है)। क्या करूँ ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता॥ २८॥
जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥
jo nāghai sata jojana sāgara| karai so rāma kāja mati āgara||
mohi biloki dharahu mana dhīrā| rāma kṛpām̐ kasa bhayau sarīrā||
Meaning जो सौ योजन (चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजीका कार्य कर सकेगा। [ निराश होकर घबराओ मत ] मुझे देखकर मनमें धीरज धरो। देखो, श्रीरामजीकी कृपासे [ देखते- ही-देखते] मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँखका बेहाल था, पाँख उगनेसे सुन्दर हो गया) !॥ १॥
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं॥
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई॥
pāpiu jā kara nāma sumirahīṃ| ati apāra bhavasāgara tarahīṃ||
tāsu dūta tumha taji kadarāī| rāma hṛdayam̐ dhari karahu upāī||
Meaning पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः: कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो॥ २॥
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ॥
निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा॥
asa kahi garuṛa gīdha jaba gayaū| tinha keṃ mana ati bisamaya bhayaū||
nija nija bala saba kāhūm̐ bhāṣā| pāra jāi kara saṃsaya rākhā||
Meaning [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन (वानरों ) के मनमें अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसीने अपना-अपना बल कहा! पर समुद्रके पार जानेमें सभीने सन्देह प्रकट किया॥ ३॥
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥
jaraṭha bhayaum̐ aba kahai richesā| nahiṃ tana rahā prathama bala lesā||
jabahiṃ tribikrama bhae kharārī| taba maiṃ taruna raheum̐ bala bhārī||
Meaning ऋशक्षराज जाम्बवान् कहने लगे--मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा। जब खरारि ( खरके शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था॥ ४॥
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ॥ २९॥
bali bām̐dhata prabhu bāḍheu so tanu barani na jāī|
ubhaya dharī maham̐ dīnhī sāta pradacchina dhāi|| 29||
Meaning बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [उस शरीरकी] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं॥ २९॥
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक॥
aṃgada kahai jāum̐ maiṃ pārā| jiyam̐ saṃsaya kachu phiratī bārā||
jāmavaṃta kaha tumha saba lāyaka| paṭhaia kimi saba hī kara nāyaka||
Meaning अंगदने कहा--मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है। जाम्बवानूने कहा--तुम सब प्रकारसे योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय 2॥ १॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
kahai rīchapati sunu hanumānā| kā cupa sādhi rahehu balavānā||
pavana tanaya bala pavana samānā| budhi bibeka bigyāna nidhānā||
Meaning ऋशक्षराज जाम्बवानने श्रीहनुमानूजीसे कहा--हे हनुमान् ! हे बलवान् ! सुनो, तुमने यह कया चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञानकी खान हो॥ २॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा॥
kavana so kāja kaṭhina jaga māhīṃ| jo nahiṃ hoi tāta tumha pāhīṃ||
rāma kāja lagi taba avatārā| sunatahiṃ bhayau parvatākārā||
Meaning जगत्में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात ! तुमसे न हो सके। श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वतके आकारके ( अत्यन्त विशालकाय) हो गये॥ ३॥
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा॥
kanaka barana tana teja birājā| mānahu apara girinha kara rājā||
siṃhanāda kari bārahiṃ bārā| līlahīṃ nāṣaum̐ jalanidhi khārā||
Meaning उनका सोनेका-सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो। हनुमान्ूजीने बार-बार सिंहनाद करके कहा--मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ॥ '४॥
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥
sahita sahāya rāvanahi mārī| ānaum̐ ihām̐ trikūṭa upārī||
jāmavaṃta maiṃ pūm̐chaum̐ tohī| ucita sikhāvanu dījahu mohī||
Meaning और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान् ! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [कि मुझे क्या करना चाहिये]॥ ५॥
एतना करहु तात तुम्ह जाई। किष्किन्धाकाएड सीतहि देखि कहह सुधि आई ७9१४॥
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥
etanā karahu tāta tumha jāī| kiṣkindhākāeḍa sītahi dekhi kahaha sudhi āī 7914||
taba nija bhuja bala rājiva nainā| kautuka lāgi saṃga kapi senā||
Meaning [ जाम्बवानूने कहा--]] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजीको देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबलसे [ही राक्षसोंका संहार कर सीताजीको ले आयेंगे, केवल] खेलके लिये ही वे वानरोंकी सेना साथ लेंगे॥ ६॥
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
kapi sena saṃga sam̐ghāri nisicara rāmu sītahi ānihaiṃ|
trailoka pāvana sujasu sura muni nāradādi bakhānihaiṃ||
jo sunata gāvata kahata samujhata parama pada nara pāvaī|
raghubīra pada pāthoja madhukara dāsa tulasī gāvaī||
Meaning वानरोंकी सेना साथ लेकर राक्षसोंका संहार करके श्रीरामजी सीताजीको ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्के तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले सुन्दर यशका बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझनेसे मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीरके चरणकमलका मधुकर ( भ्रमर) तुलसीदास गाता है।
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि॥ ३० (क )॥
bhava bheṣaja raghunātha jasu sunahi je nara aru nāri|
tinha kara sakala manoratha siddha karihi trisirāri|| 30 (ka )||
Meaning श्रीरघुबीरका यश भव (जन्म-मरण) -रूपी रोगकी [ अचूक] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे॥ ३० (क)॥
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥ ३० ( ख )॥
nīlotpala tana syāma kāma koṭi sobhā adhika|
sunia tāsu guna grāma jāsu nāma agha khaga badhika|| 30 ( kha )||
Meaning जिनका नीले कमलके समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियोंको मारनेके लिये बधिक (व्याध) के समान है, उन श्रीरामके गुणोंके समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिये॥ ३० (ख)॥