कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।
मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः॥ १॥
kundendīvarasundarāvatibalau vijñānadhāmāvubhau śobhāḍhyau varadhanvinau śrutinutau govipravṛndapriyau|
māyāmānuṣarūpiṇau raghuvarau saddharmavarmau hitau sītānveṣaṇatatparau pathigatau bhaktipradau tau hi naḥ|| 1||
Meaning कुन्दपुष्प और नील कमलके समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान, विज्ञानके धाम, शोभासम्पन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदोंके द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मणोंके समूहके प्रिय [ अथवा प्रेमी।, मायासे मनुष्यरूप धारण किये हुए, श्रेष्ठ धर्मके लिये कवचस्वरूप, सबके हितकारी, श्रीसीताजीकी खोजमें लगे हुए, पथिकरूप रघुकुलके श्रेष्ठ श्रीरामजी और श्रीलक्ष्मणजी दोनों भाई निश्चय ही हमें भक्तिप्रद हों॥ १॥
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा।
संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्॥ २॥
brahmāmbhodhisamudbhavaṃ kalimalapradhvaṃsanaṃ cāvyayaṃ śrīmacchambhumukhendusundaravare saṃśobhitaṃ sarvadā|
saṃsārāmayabheṣajaṃ sukhakaraṃ śrījānakījīvanaṃ dhanyāste kṛtinaḥ pibanti satataṃ śrīrāmanāmāmṛtam|| 2||
Meaning वे सुकृती ( पुण्यात्मा पुरुष) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [ के मथने] से उत्पन्न हुए कलियुगके मलको सर्वथा नष्ट कर देनेवाले, अविनाशी, भगवान् श्रीशम्भुके सुन्दर एवं श्रेष्ठ मुखरूपी चन्द्रमामें सदा शोभायमान, जन्म-मरणरूपी रोगके औषध, सबको सुख देनेवाले और श्रीजानकीजीके जीवनस्वरूप श्रीरामनामरूपी अमृतका निरन्तर पान करते रहते हैं॥२॥
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न॥
mukti janma mahi jāni gyāna khāni agha hāni kara|
jaham̐ basa saṃbhu bhavāni so kāsī seia kasa na||
Meaning जहाँ श्रीशिव-पार्वती बसते हैं, उस काशीको मुक्तिकी जन्मभूमि, ज्ञानकी खान और पापोंका नाश करनेवाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाय?
जरत सकल सुर बूंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥
jarata sakala sura būṃda biṣama garala jehiṃ pāna kiya|
tehi na bhajasi mana maṃda ko kṛpāla saṃkara sarisa||
Meaning जिस भीषण हलाहल विषसे सब देवतागण जल रहे थे उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन! तू उन शड्रजीको क्यों नहीं भजता ? उनके समान कृपालु [और] कौन है?
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥
āgeṃ cale bahuri raghurāyā| riṣyamūka paravata niarāyā||
taham̐ raha saciva sahita sugrīvā| āvata dekhi atula bala sīṃvā||
Meaning श्रीरघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ (ऋष्यमूक पर्वतपर) मन्त्रियोंसहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बलकी सीमा श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीको आते देखकर--॥ १॥
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना॥
धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई॥
ati sabhīta kaha sunu hanumānā| puruṣa jugala bala rūpa nidhānā||
dhari baṭu rūpa dekhu taiṃ jāī| kahesu jāni jiyam̐ sayana bujhāī||
Meaning सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले--हे हनुमान् ! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूपके निधान हैं। तुम ब्रह्मचारीका रूप धारण करके जाकर देखो। अपने हृदयमें उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारेसे समझाकर कह देना॥ २॥
पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला॥
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥
paṭhae bāli hohiṃ mana mailā| bhāgauṃ turata tajauṃ yaha sailā||
bipra rūpa dhari kapi taham̐ gayaū| mātha nāi pūchata asa bhayaū||
Meaning यदि वे मनके मलिन बालिके भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वतको छोड़कर भाग जाऊँ। [यह सुनकर। हनुमानजी ब्राह्मणका रूप धरकर वहाँ गये और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे--॥ ३॥
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा॥
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥
ko tumha syāmala gaura sarīrā| chatrī rūpa phirahu bana bīrā||
kaṭhina bhūmi komala pada gāmī| kavana hetu bicarahu bana svāmī||
Meaning हे वीर! साँवले और गोरे शरीरवाले आप कौन हैं, जो क्षत्रियके रूपमें वनमें फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमिपर कोमल चरणोंसे चलनेवाले आप किस कारण वनमें विचर रहे हैं ?॥ ४॥
मृदुल मनोहर सुंदर गाता।
सहत दुसह बन आतप बाता॥ की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ।
नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥
mṛdula manohara suṃdara gātā| sahata dusaha bana ātapa bātā|| kī tumha tīni deva maham̐ koū| nara nārāyana kī tumha doū||
Meaning मनको हरण करनेवाले आपके सुन्दर, कोमल अंग हैं, और आप वनके दु:सह धूप और वायुको सह रहे हैं। क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश--इन तीन देवताओंमेंसे कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण हैं॥ ५॥
जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥ १॥
jaga kārana tārana bhava bhaṃjana dharanī bhāra|
kī tumha akila bhuvana pati līnha manuja avatāra|| 1||
Meaning अथवा आप जगत्के मूल कारण और सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी स्वयं भगवान् हैं, जिन्होंने लोगोंको भवसागरसे पार उतारने तथा पृथ्वीका भार नष्ट करनेके लिये मनुष्य-रूपमें अवतार लिया है ?॥ १॥
कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥
नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥
kosalesa dasaratha ke jāe| hama pitu bacana māni bana āe||
nāma rāma lachimana dauu bhāī| saṃga nāri sukumāri suhāī||
Meaning [ श्रीरामचन्द्रजीने कहा--] हम कोसलराज दशरथजीके पुत्र हैं और पिताका वचन मानकर वन आये हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी॥ १॥
इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥
ihām̐ hari nisicara baidehī| bipra phirahiṃ hama khojata tehī||
āpana carita kahā hama gāī| kahahu bipra nija kathā bujhāī||
Meaning यहाँ (वनमें ) राक्षसने [ मेरी पत्नी] जानकीको हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिये॥ २॥
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना॥
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना॥
prabhu pahicāni pareu gahi caranā| so sukha umā nahiṃ baranā||
pulakita tana mukha āva na bacanā| dekhata rucira beṣa kai racanā||
Meaning प्रभुको पहचानकर हनुमानजी उनके चरण पकड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े (उन्होंने साष्टाज़ दण्डवत्त्-प्रणाम किया)। [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती ! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। शरीर पुलकित है, मुखसे वचन नहीं निकलता। वे प्रभुके सुन्दर वेषकी रचना देख रहे हैं!॥३॥
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥
puni dhīraju dhari astuti kīnhī| haraṣa hṛdayam̐ nija nāthahi cīnhī||
mora nyāu maiṃ pūchā sāīṃ| tumha pūchahu kasa nara kī nāīṃ||
Meaning फिर धीरज धरकर स्तुति की। अपने नाथको पहचान लेनेसे हृदयमें हर्ष हो रहा है। [फिर हनुमानूजीने कहा--] हे स्वामी ! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, [वर्षोके बाद आपको देखा, वह भी तपस्वीके वेषमें और मेरी वानरी-बुद्धि, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थितिके अनुसार मैंने आपसे पूछा] परन्तु आप मनुष्यकी तरह कैसे पूछ रहे हैं ?॥ ४॥
तव माया बस फिरउँ भुलाना।
ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना॥
tava māyā basa phiraum̐ bhulānā| tā te maiṃ nahiṃ prabhu pahicānā||
Meaning मैं तो आपकी मायाके वश भूला फिरता हूँ; इसीसे मैंने अपने स्वामी ( आप) को नहीं पहचाना॥ ५॥
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥ २॥
eku maiṃ maṃda mohabasa kuṭila hṛdaya agyāna|
puni prabhu mohi bisāreu dīnabaṃdhu bhagavāna|| 2||
Meaning एक तो मैं यों ही मन्द हूँ, दूसरे मोहके वशमें हूँ, तीसरे हदयका कुटिल और अआज्ञान हूँ, फिर हे दीनबन्धु भगवान्! प्रभु (आप) ने भी मुझे भुला दिया!॥ २॥
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥
jadapi nātha bahu avaguna moreṃ| sevaka prabhuhi parai jani bhoreṃ||
nātha jīva tava māyām̐ mohā| so nistarai tumhārehiṃ chohā||
Meaning हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े (आप उसे न भूल जायेँ) हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है। वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है॥ १॥
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥
tā para maiṃ raghubīra dohāī| jānaum̐ nahiṃ kachu bhajana upāī||
sevaka suta pati mātu bharoseṃ| rahai asoca banai prabhu poseṃ||
Meaning उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई (शपथ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामीके और पुत्र माताके भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभुको सेवकका पालन-पोषण करते ही बनता है (करना ही पड़ता है)॥ २॥
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥
तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥
asa kahi pareu carana akulāī| nija tanu pragaṭi prīti ura chāī||
taba raghupati uṭhāi ura lāvā| nija locana jala sīṃci juṛāvā||
Meaning ऐसा कहकर हनुमानूजी अकुलाकर प्रभुके चरणोंपर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। उनके हृदयमें प्रेम छा गया। तब श्रीरघुनाथजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया और अपने नेत्रोंके जलसे सींचकर शीतल किया॥ ३॥
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ॥
sunu kapi jiyam̐ mānasi jani ūnā| taiṃ mama priya lachimana te dūnā||
samadarasī mohi kaha saba koū| sevaka priya ananyagati soū||
Meaning [ फिर कहा-- हे कपि! सुनो, मनमें ग्लानि मत मानना ( मन छोटा न करना)। तुम मुझे लक्ष्मणसे भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं ( मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता)॥ ४॥
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ ३॥
so ananya jākeṃ asi mati na ṭarai hanumaṃta|
maiṃ sevaka sacarācara rūpa svāmi bhagavaṃta|| 3||
Meaning और हे हनुमान् ! अनन्य वही है जिसकी * किष्किन्धाकाण्ड ऐसी बुद्धि कभी * नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ ६८५ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान्का रूप है॥ ३॥
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥
dekhi pavana suta pati anukūlā| hṛdayam̐ haraṣa bītī saba sūlā||
nātha saila para kapipati rahaī| so sugrīva dāsa tava ahaī||
Meaning स्वामीको अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवनकुमार हनुमान्ूजीके हृदयमें हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। [ उन्होंने कहा--] हे नाथ! इस पर्वतपर वानरराज सुग्रीव रहता है, वह आपका दास है॥ १॥
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे।
दीन जानि तेहि अभय करीजे॥
tehi sana nātha mayatrī kīje| dīna jāni tehi abhaya karīje||
सो सीता कर खोज कराइहि।
जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥
so sītā kara khoja karāihi| jaham̐ taham̐ marakaṭa koṭi paṭhāihi||
Meaning हे नाथ! उससे मित्रता कीजिये और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। वह सीताजीकी खोज करावेगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरोंको भेजेगा॥ २॥
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥
ehi bidhi sakala kathā samujhāī| lie duau jana pīṭhi caṛhāī||
jaba sugrīvam̐ rāma kahum̐ dekhā| atisaya janma dhanya kari lekhā||
Meaning इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान्जीने ( श्रीराम-लक्ष्मण) दोनों जनोंको पीठपर चढ़ा लिया। जब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको देखा तो अपने जन्मको अत्यन्त धन्य समझा॥ ३॥
सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा॥
कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती॥
sādara mileu nāi pada māthā| bhaiṃṭeu anuja sahita raghunāthā||
kapi kara mana bicāra ehi rītī| karihahiṃ bidhi mo sana e prītī||
Meaning सुग्रीव चरणोंमें मस्तक नवाकर आदरसहित मिले। श्रीरघुनाथजी भी छोटे भाईसहित उनसे गले लगकर मिले। सुग्रीव मनमें इस प्रकार सोच रहे हैं कि हे विधाता! क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे ?॥ ४॥
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ॥ ४॥
taba hanumaṃta ubhaya disi kī saba kathā sunāi|
pāvaka sākhī dei kari jorī prītī dṛṛhāi|| 4||
Meaning तब हनुमान्जीने दोनों ओरकी सब कथा सुनाकर अप्रिको साक्षी देकर परस्पर दूढ़ करके प्रीति जोड़ दी (अर्थात् अग्रिकी साक्षी देकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मैत्री करवा दी)॥ ४॥
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा॥
कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी॥
kīnhī prīti kachu bīca na rākhā| lachamina rāma carita saba bhāṣā||
kaha sugrīva nayana bhari bārī| milihi nātha mithilesakumārī||
Meaning दोनोंने [हृदयसे] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा। तब लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीका सारा इतिहास कहा। सुग्रीवने नेत्रोंमें जल भरकर कहा--हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायँगी॥ १॥
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा॥
गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता॥
maṃtrinha sahita ihām̐ eka bārā| baiṭha raheum̐ maiṃ karata bicārā||
gagana paṃtha dekhī maiṃ jātā| parabasa parī bahuta bilapātā||
Meaning मैं एक बार यहाँ मन्त्रियोंके साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था। तब मैंने पराये (शत्रु) के वशमें पड़ी बहुत विलाप करती हुई सीताजीको आकाशमार्गसे जाते देखा था॥ २॥
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥
rāma rāma hā rāma pukārī| hamahi dekhi dīnheu paṭa ḍārī||
māgā rāma turata tehiṃ dīnhā| paṭa ura lāi soca ati kīnhā||
Meaning हमें देखकर उन्हों ने ' राम ! राम ! हा राम !' पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था। श्रीरामजीने उसे माँगा, तब सुग्रीवने तुरंत ही दे दिया। वस्त्रको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने बहुत ही सोच किया॥ ३॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥
kaha sugrīva sunahu raghubīrā| tajahu soca mana ānahu dhīrā||
saba prakāra karihaum̐ sevakāī| jehi bidhi milihi jānakī āī||
Meaning सुग्रीवने कहा-हे रघुवीर! सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मनमें धीरज लाइये। मैं सब प्रकारसे आपकी सेवा करूँगा, जिस उपायसे जानकीजी आकर आपको मिलें॥ ४॥
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥ ५॥
sakhā bacana suni haraṣe kṛpāsidhu balasīṃva|
kārana kavana basahu bana mohi kahahu sugrīva|| 5||
Meaning कृपाके समुद्र और बलकी सीमा श्रीरामजी सखा सुग्रीवके वचन सुनकर हर्षित हुए। [ और बोले- हे सुग्रीव ! मुझे बताओ, तुम वनमें किस कारण रहते हो ?॥५॥
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥
मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥
nāta bāli aru maiṃ dvau bhāī| prīti rahī kachu barani na jāī||
maya suta māyāvī tehi nāūm̐| āvā so prabhu hamareṃ gāūm̐||
Meaning [ सुप्रीवने कहा--] हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं। हम दोनोंमें ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती। हे प्रभो ! मय दानवका एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। एक बार वह हमारे गाँवमें आया॥ १॥
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा॥
धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा॥
ardha rāti pura dvāra pukārā| bālī ripu bala sahai na pārā||
dhāvā bāli dekhi so bhāgā| maiṃ puni gayaum̐ baṃdhu sam̐ga lāgā||
Meaning उसने आधी रातको नगरके फाटकपर आकर पुकारा (ललकारा)। बालि शत्रुके बल (ललकार) को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाईके सड्भ लगा चला गया॥ २॥
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई॥
परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥
giribara guhām̐ paiṭha so jāī| taba bālīṃ mohi kahā bujhāī||
parikhesu mohi eka pakhavārā| nahiṃ āvauṃ taba jānesu mārā||
Meaning वह मायावी एक पर्वतकी गुफामें * जा किष्किन्धाकाण्ड घुसा। तब बालिने * मुझे समझाकर कहा--तुम ६८७ एक पखवाड़े (पंद्रह दिन) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं उतने दिनोंमें न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया॥ ३॥
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥
māsa divasa taham̐ raheum̐ kharārī| nisarī rudhira dhāra taham̐ bhārī||
bāli hatesi mohi mārihi āī| silā dei taham̐ caleum̐ parāī||
Meaning हे खरारि! मैं वहाँ महीनेभरतक रहा। वहाँ (उस गुफामेंसे ) रक्तकी बड़ी भारी धारा निकली। तब [मैंने समझा कि] उसने बालिको मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ (गुफाके द्वारपर) एक शिला लगाकर भाग आया॥ ४॥
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई॥
बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥
maṃtrinha pura dekhā binu sāīṃ| dīnheu mohi rāja bariāī||
bāli tāhi māri gṛha āvā| dekhi mohi jiyam̐ bheda baṛhāvā||
Meaning मन्त्रियोंने नगरको बिना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे [ राजसिंहासनपर] देखकर उसने जीमें भेद बढ़ाया (बहुत ही विरोध माना)। [उसने समझा कि यह राज्यके लोभसे ही गुफाके द्वारपर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा]॥ ५॥
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी॥
ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥
ripu sama mohi māresi ati bhārī| hari līnhesi sarbasu aru nārī||
tākeṃ bhaya raghubīra kṛpālā| sakala bhuvana maiṃ phireum̐ bihālā||
Meaning उसने मुझे शत्रुके समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्रीको भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भयसे समस्त लोकोंमें बेहाल होकर फिरता रहा॥ ६॥
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥
ihām̐ sāpa basa āvata nāhīṃ| tadapi sabhīta rahaum̐ mana māhīṃ||
suni sevaka dukha dīnadayālā| pharaki uṭhīṃ dvai bhujā bisālā||
Meaning वह शापके कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मनमें भयभीत रहता हूँ। सेवकका दुःख सुनकर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरघुनाथजीकी दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं॥ ७॥
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥ ६१॥
sunu sugrīva mārihaum̐ bālihi ekahiṃ bāna|
bramha rudra saranāgata gaem̐ na ubarihiṃ prāna|| 61||
Meaning [उन्होंने कहा-- हे सुग्रीव ! सुनो, मैं एक ही बाणसे बालिको मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्रकी शरणमें जानेपर भी उसके प्राण न बचेंगे॥ ६॥
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
je na mitra dukha hohiṃ dukhārī| tinhahi bilokata pātaka bhārī||
nija dukha giri sama raja kari jānā| mitraka dukha raja meru samānā||
Meaning जो लोग मित्रके दुःखसे दु:खी नहीं होते, उन्हें देखनेसे ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वतके समान दु:ःखको धूलके समान और मित्रके धूलके समान दु:ःखको सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥ १॥
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा॥
jinha keṃ asi mati sahaja na āī| te saṭha kata haṭhi karata mitāī||
kupatha nivāri supaṃtha calāvā| guna pragaṭe avagunanhi durāvā||
Meaning जिन्हें स्वभावसे ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसीसे मित्रता करते हैं ? मित्रका धर्म है कि वह मित्रको बुरे मार्गसे रोककर अच्छे मार्गपर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणोंको छिपावे॥ २॥
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
deta leta mana saṃka na dharaī| bala anumāna sadā hita karaī||
bipati kāla kara sataguna nehā| śruti kaha saṃta mitra guna ehā||
Meaning देने-लेनेमें मनमें शंका न रखे। अपने बलके अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्तिके समयमें तो सदा सौगुना स्रेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्रके गुण (लक्षण) ये हैं॥ ३॥
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई॥
āgeṃ kaha mṛdu bacana banāī| pācheṃ anahita mana kuṭilāī||
jā kara cita ahi gati sama bhāī| asa kumitra pariharehi bhalāī||
Meaning जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मनमें कुटिलता रखता है-हे भाई! [इस तरह] जिसका मन साँपकी चालके समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्रको तो त्यागनेमें ही भलाई है॥ ४॥
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥
sevaka saṭha nṛpa kṛpana kunārī| kapaṭī mitra sūla sama cārī||
sakhā soca tyāgahu bala moreṃ| saba bidhi ghaṭaba kāja maiṃ toreṃ||
Meaning मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र-ये चारों शूलके समान [ पीड़ा देनेवाले] हैं। हे सखा ! मेरे बलपर अब तुम चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकारसे तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा)॥ ५॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥
kaha sugrīva sunahu raghubīrā| bāli mahābala ati ranadhīrā||
duṃdubhī asthi tāla dekharāe| binu prayāsa raghunātha ḍhahāe||
Meaning सुग्रीवने कहा--हे रघुवीर ! सुनिये, बालि महान् बलवान् और अत्यन्त रणधीर है। फिर सुग्रीवने श्रीरामजीको दुन्दुभि राक्षसकी हड़डियाँ और तालके वृक्ष दिखलाये। श्रीरघुनाथजीने उन्हें बिना ही परिश्रमके (आसानीसे) ढहा दिया॥ ६॥
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥
बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा॥
dekhi amita bala bāṛhī prītī| bāli badhaba inha bhai paratītī||
bāra bāra nāvai pada sīsā| prabhuhi jāni mana haraṣa kapīsā||
Meaning श्रीरामजीका अपरिमित बल देखकर सुग्रीवकी प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालिका वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणोंमें सिर नवाने लगे। प्रभुको पहचानकर सुग्रीव मनमें हर्षित हो रहे थे॥ ७॥
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला॥
सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥
upajā gyāna bacana taba bolā| nātha kṛpām̐ mana bhayau alolā||
sukha saṃpati parivāra baṛāī| saba parihari karihaum̐ sevakāī||
Meaning जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा॥ ८॥
ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक॥
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं॥
e saba rāmabhagati ke bādhaka| kahahiṃ saṃta taba pada avarādhaka||
satru mitra sukha dukha jaga māhīṃ| māyā kṛta paramāratha nāhīṃ||
Meaning क्योंकि आपके चरणोंकी आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्तिके विरोधी हैं। जगत्में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [ आदि द्न्द्र] हैं, सब-के- सब मायारचित हैं, परमार्थत: (वास्तवमें ) नहीं हैं॥ ९॥
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥
सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥
bāli parama hita jāsu prasādā| milehu rāma tumha samana biṣādā||
sapaneṃ jehi sana hoi larāī| jāgeṃ samujhata mana sakucāī||
Meaning हे श्रीरामजी ! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपासे शोकका नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्रमें भी लड़ाई हो तो जागनेपर उसे समझकर मनमें संकोच होगा [कि स्वप्रमें भी मैं उससे क्यों लड़ा]॥ १०॥
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥
सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी॥
aba prabhu kṛpā karahu ehi bhām̐tī| saba taji bhajanu karauṃ dina rātī||
suni birāga saṃjuta kapi bānī| bole biham̐si rāmu dhanupānī||
Meaning हे प्रभो ! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिये कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ। सुग्रीवकी वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर (उसके क्षणिक वैराग्यको देखकर) हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकराकर बोले--॥ ११॥
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥
नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥
jo kachu kahehu satya saba soī| sakhā bacana mama mṛṣā na hoī||
naṭa marakaṭa iva sabahi nacāvata| rāmu khagesa beda asa gāvata||
Meaning तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता ( अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि--] हे पक्षियोंके राजा गरुड़! नट (मदारी) के बंदरकी तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं॥ १२॥
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा॥
तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा॥
lai sugrīva saṃga raghunāthā| cale cāpa sāyaka gahi hāthā||
taba raghupati sugrīva paṭhāvā| garjesi jāi nikaṭa bala pāvā||
Meaning ६९० तदनन्तर सुग्रीवको साथ लेकर और * हाथोंमें रामचरितमानस धनुष-बाण * धारण करके श्रीरघुनाथजी चले। तब श्रीरघुनाथजीने सुप्रीवको बालिके पास भेजा। वह श्रीरामजीका बल पाकर बालिके निकट जाकर गरजा॥ १३॥
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा॥
sunata bāli krodhātura dhāvā| gahi kara carana nāri samujhāvā||
sunu pati jinhahi mileu sugrīvā| te dvau baṃdhu teja bala sīṃvā||
Meaning बालि सुनते ही क्रोधमें भरकर वेगसे दौड़ा। उसकी स्त्री ताराने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिये, सुप्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बलकी सीमा हैं॥ १४॥
कोसलेस सुत लछिमन रामा।
कालहु जीति सकहिं संग्रामा॥
kosalesa suta lachimana rāmā| kālahu jīti sakahiṃ saṃgrāmā||
Meaning वे कोसलाधीश दशरथजीके पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राममें कालको भी जीत सकते हैं॥ १५॥
कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥ ७॥
kaha bāli sunu bhīru priya samadarasī raghunātha|
jauṃ kadāci mohi mārahiṃ tau puni houm̐ sanātha|| 7||
Meaning बालिने कहा--हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्रीरघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मरेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परमपद पा जाऊँगा)॥७॥
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥
asa kahi calā mahā abhimānī| tṛna samāna sugrīvahi jānī||
bhire ubhau bālī ati tarjā| muṭhikā māri mahādhuni garjā||
Meaning ऐसा कहकर वह महान् अभिमानी बालि सुग्रीवको तिनकेके समान जानकर चला। दोनों भिड़ गये। बालिने सुग्रीवको बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोरसे गरजा॥ १॥
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥
taba sugrīva bikala hoi bhāgā| muṣṭi prahāra bajra sama lāgā||
maiṃ jo kahā raghubīra kṛpālā| baṃdhu na hoi mora yaha kālā||
Meaning तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा। घूँसेकी चोट उसे वत्रके समान लगी। [सुग्रीवने आकर कहा-] हे कृपालु रघुवीर ! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है॥ २॥
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥
ekarūpa tumha bhrātā doū| tehi bhrama teṃ nahiṃ māreum̐ soū||
kara parasā sugrīva sarīrā| tanu bhā kulisa gaī saba pīrā||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] तुम दोनों भाइयोंका एक-सा ही रूप है। इसी श्रमसे मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीरामजीने सुग्रीवके शरीरको हाथसे स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वत्रके समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही॥ ३॥
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥
melī kaṃṭha sumana kai mālā| paṭhavā puni bala dei bisālā||
puni nānā bidhi bhaī larāī| biṭapa oṭa dekhahiṃ raghurāī||
Meaning तब श्रीरामजीने सुग्रीवके गलेमें फूलोंकी माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनोंगें पुन: अनेक प्रकारसे युद्ध हुआ। श्रीरघुनाथजी वृक्षकी आडइसे देख रहे थे॥ ४॥
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥ ८॥
bahu chala bala sugrīva kara hiyam̐ hārā bhaya māni| mārā bāli rāma taba hṛdaya mājha sara tāni|| 8||
Meaning सुग्रीवने बहुत-से छल-बल किये, किन्तु [ अन्तमें] भय मानकर हृदयसे हार गया। तब श्रीरामजीने तानकर बालिके हृदयमें बाण मारा॥ ८॥
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥
स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥
parā bikala mahi sara ke lāgeṃ| puni uṭhi baiṭha dekhi prabhu āgeṃ||
syāma gāta sira jaṭā banāem̐| aruna nayana sara cāpa caṛhāem̐||
Meaning बाणके लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। किन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको आगे देखकर वह फिर उठ बैठा। भगवान्का श्याम शरीर है, सिरपर जटा बनाये हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाये हैं॥ १॥
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥
puni puni citai carana cita dīnhā| suphala janma mānā prabhu cīnhā||
hṛdayam̐ prīti mukha bacana kaṭhorā| bolā citai rāma kī orā||
Meaning बालिने बार-बार भगवान्की ओर देखकर चित्तको उनके चरणोंमें लगा दिया। प्रभुको पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदयमें प्रीति थी, पर मुखमें कठोर वचन थे। वह श्रीरामजीकी ओर देखकर बोला--॥ २॥
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई॥
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा॥
dharma hetu avatarehu gosāī| mārehu mohi byādha kī nāī||
maiṃ bairī sugrīva piārā| avaguna kabana nātha mohi mārā||
Meaning हे गोसाई! आपने धर्मकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और मुझे व्याधकी तरह (छिपकर) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोषसे आपने मुझे मारा ?॥ ३॥
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥
anuja badhū bhaginī suta nārī| sunu saṭha kanyā sama e cārī||
inhahi kuddaṣṭi bilokai joī| tāhi badheṃ kachu pāpa na hoī||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे मूर्ख! सुन, छोटे भाईकी स्त्री, बहिन, पुत्रकी स्त्री और कन्या-ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टिसे देखता है, उसे मारनेमें कुछ भी पाप नहीं होता॥ ४॥
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥
muṛha tohi atisaya abhimānā| nāri sikhāvana karasi na kānā||
mama bhuja bala āśrita tehi jānī| mārā cahasi adhama abhimānī||
Meaning हे मूढ़ ! तुझे अत्यन्त अभिमान है। तूने अपनी स्त्रीकी सीखपर भी कान ( ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीवको मेरी भुजाओंके बलका आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी ! तूने उसको मारना चाहा!॥ ५॥
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥ ९॥
sunahu rāma svāmī sana cala na cāturī mori|
prabhu ajahūm̐ maiṃ pāpī aṃtakāla gati tori|| 9||
Meaning ६९२ [ बालिने कहा--] हे श्रीरामजी ! सुनिये, * रामचरितमानस स्वामी (आप) * से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो ! अन्तकालमें आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा?॥ १॥
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥
sunata rāma ati komala bānī| bāli sīsa paraseu nija pānī||
acala karauṃ tanu rākhahu prānā| bāli kahā sunu kṛpānidhānā||
Meaning बालिकी अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजीने उसके सिरको अपने हाथसे स्पर्श किया [और कहा--] मैं तुम्हारे शरीरको अचल कर दूँ, तुम प्राणोंको रखो। बालिने कहा-शहे कृपानिधान! सुनिये--॥ १॥
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी॥
janma janma muni jatanu karāhīṃ| aṃta rāma kahi āvata nāhīṃ||
jāsu nāma bala saṃkara kāsī| deta sabahi sama gati avināsī||
Meaning मुनिगण जन्म-जन्ममें ' (प्रत्येक जन्ममें ) [ अनेकों प्रकारका] साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकालमें उन्हें राम' नहीं कह आता (उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नामके बलसे शड्धरजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं॥ २॥
मम लोचन गोचर सोइ आवा।
बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥
mama locana gocara soi āvā| bahuri ki prabhu asa banihi banāvā||
Meaning वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रोंके सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा?॥ ३॥
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
जिति पवन मन गो निरस करे मुनि ध्यान कबहुंक पावहीं॥
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
अस ' कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥
so nayana gocara jāsu guna nita neti kahi śruti gāvahīṃ|
jiti pavana mana go nirasa kare muni dhyāna kabahuṃka pāvahīṃ||
mohi jāni ati abhimāna basa prabhu kaheu rākhu sarīrahī|
asa ' kavana saṭha haṭhi kāṭi surataru bāri karihi babūrahī||
Meaning श्रुतियाँ नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [विषयोंके रससे सर्वथा] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यानमें जिनकी कभी क्लचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरके बाड़ लगावेगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा)?॥ १॥
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहिं जोनि जन्मों कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ।
गहि बॉँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिएऐ॥
aba nātha kari karunā bilokahu dehu jo bara māgaūm̐|
jehiṃ joni janmoṃ karma basa taham̐ rāma pada anurāgaūm̐||
yaha tanaya mama sama binaya bala kalyānaprada prabhu lījiai|
gahi bôm̐ha sura nara nāha āpana dāsa aṃgada kījieai||
Meaning हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये * किष्किन्धाकाण्ड और मैं जो वर माँगता * हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश ६९३ जिस योनिमें जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी (आप) के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो ! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बलमें मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्योंके नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये॥ २॥
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कौीन्ह तनु त्याग।
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानड़ नाग॥ १०॥
rāma carana dṛṛha prīti kari bāli kauीnha tanu tyāga|
sumana māla jimi kaṃṭha te girata na jānaṛa nāga|| 10||
Meaning श्रीरामजीके चरणोंमें दृढ़ प्रीति करके बालिने शरीरको वैसे ही (आसानीसे) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गलेसे फूलोंकी मालाका गिरना न जाने॥ १०॥
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥
rāma bāli nija dhāma paṭhāvā| nagara loga saba byākula dhāvā||
nānā bidhi bilāpa kara tārā| chūṭe kesa na deha sam̐bhārā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने बालिको अपने परम धाम भेज दिया। नगरके सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालिकी स्त्री तारा अनेकों प्रकारसे विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देहकी सँभाल नहीं है॥ १॥
तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥
tārā bikala dekhi raghurāyā| dīnha gyāna hari līnhī māyā||
chiti jala pāvaka gagana samīrā| paṃca racita ati adhama sarīrā||
Meaning ताराको व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजीने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा--] पृथ्वी, जल, अग्रि, आकाश और वायु--इन पाँच तत्त्वोंसे यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है॥ २॥
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥
pragaṭa so tanu tava āgeṃ sovā| jīva nitya kehi lagi tumha rovā||
upajā gyāna carana taba lāgī| līnhesi parama bhagati bara māgī||
Meaning वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो ? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्के चरणों लगी और उसने परम भक्तिका वर माँग लिया॥ ३॥
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई॥
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा॥
umā dāru joṣita kī nāī| sabahi nacāvata rāmu gosāī||
taba sugrīvahi āyasu dīnhā| mṛtaka karma bidhibata saba kīnhā||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतलीकी तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजीने सुग्रीवको आज्ञा दी और सुग्रीवने विधिपूर्वक बालिका सब मृतक-कर्म किया॥ ४॥
राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई॥
रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा॥
rāma kahā anujahi samujhāī| rāja dehu sugrīvahi jāī||
raghupati carana nāi kari māthā| cale sakala prerita raghunāthā||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाई लक्ष्मणको समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीवको राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजीकी प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले॥ ५॥
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥ ११॥
lachimana turata bolāe purajana bipra samāja|
rāju dīnha sugrīva kaham̐ aṃgada kaham̐ jubarāja|| 11||
Meaning लक्ष्मणजीने तुरंत ही सब नगरनिवासियोंको और ब्राह्मणोंके समाजको बुला लिया और [उनके सामने] सुग्रीवको राज्य और अंगदको युवराज-पद दिया॥ ११॥
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥
umā rāma sama hita jaga māhīṃ| guru pitu mātu baṃdhu prabhu nāhīṃ||
sura nara muni saba kai yaha rītī| svāratha lāgi karahiṃ saba prītī||
Meaning हे पार्वती ! जगतमें श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं॥ १॥
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती।
तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती॥
bāli trāsa byākula dina rātī| tana bahu brana ciṃtām̐ jara chātī||
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ।
अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ॥
soi sugrīva kīnha kapirāū| ati kṛpāla raghubīra subhāū||
Meaning जो सुग्रीव दिन-रात बालिके भयसे व्याकुल रहता था, जिसके शरीरमें बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ताके मारे जला करती थी, उसी सुग्रीवको उन्होंने वानरोंका राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है॥ २॥
जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं॥
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई॥
jānatahum̐ asa prabhu pariharahīṃ| kāhe na bipati jāla nara parahīṃ||
puni sugrīvahi līnha bolāī| bahu prakāra nṛpanīti sikhāī||
Meaning जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्तिके जालमें फँसें ? फिर श्रीरामजीने सुग्रीवको बुला लिया और बहुत प्रकारसे उन्हें राजनीतिकी शिक्षा दी॥ ३॥
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा॥
गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई॥
kaha prabhu sunu sugrīva harīsā| pura na jāum̐ dasa cāri barīsā||
gata grīṣama baraṣā ritu āī| rahihaum̐ nikaṭa saila para chāī||
Meaning फिर प्रभुने कहा-हे वानरपति सुग्रीव ! सुनो, मैं चौदह वर्षतक गाँव (बस्ती ) में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म-ऋतु बीतकर वर्षा-ऋतु आ गयी। अत: मैं यहाँ पास ही पर्वतपर टिक रहूँगा॥ ४॥
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू॥
जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए॥
aṃgada sahita karahu tumha rājū| saṃtata hṛdaya dharehu mama kājū||
jaba sugrīva bhavana phiri āe| rāmu prabaraṣana giri para chāe||
Meaning तुम अंगदसहित राज्य करो। मेरे कामका हृदयमें सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वतपर जा टिके॥ ५॥
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ॥ १२॥
prathamahiṃ devanha giri guhā rākheu rucira banāi|
rāma kṛpānidhi kachu dina bāsa karahiṃge āi|| 12||
Meaning देवताओंने पहलेसे ही उस पर्वतकी एक गुफाको सुन्दर बना (सजा) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपाकी खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे॥ १२॥
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा।
गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥ कंद मूल फल पत्र सुहाए।
भए बहुत जब ते प्रभु आए॥
suṃdara bana kusumita ati sobhā| guṃjata madhupa nikara madhu lobhā|| kaṃda mūla phala patra suhāe| bhae bahuta jaba te prabhu āe||
Meaning सुन्दर वन फूला हुआ अत्यन्त सुशोभित है। मधुके लोभसे भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं। जब्से प्रभु आये, तबसे वनमें सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्तोंकी बहुतायत हो गयी॥ १॥
देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥
dekhi manohara saila anūpā| rahe taham̐ anuja sahita surabhūpā||
madhukara khaga mṛga tanu dhari devā| karahiṃ siddha muni prabhu kai sevā||
Meaning मनोहर और अनुपम पर्वतको देखकर देवताओंके सम्राट श्रीरामजी छोटे भाईसहित वहाँ रह गये। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओंके शरीर धारण करके प्रभुकी सेवा करने लगे॥ २॥
मंगलरुप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते॥
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥
maṃgalarupa bhayau bana taba te| kīnha nivāsa ramāpati jaba te||
phaṭika silā ati subhra suhāī| sukha āsīna tahām̐ dvau bhāī||
Meaning जबसे रमापति श्रीरामजीने वहाँ निवास किया तबसे वन मज़लस्वरूप हो गया। सुन्दर स्फटिकमणिकी एक अत्यन्त उज्ज्वल शिला है, उसपर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं॥ ३॥
कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका॥
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥
kahata anuja sana kathā anekā| bhagati birati nṛpanīti bibekā||
baraṣā kāla megha nabha chāe| garajata lāgata parama suhāe||
Meaning श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसे भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञानकी अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकालमें आकाशमें छाये हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं॥ ४॥
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि॥ १३॥
lachimana dekhu mora gana nācata bārida paikhi|
gṛhī birati rata haraṣa jasa biṣnu bhagata kahum̐ dekhi|| 13||
Meaning [ श्रीरामजी कहने लगे--] हे लक्ष्मण! देखो, मोरोंके झुंड बादलोंको देखकर नाच रहे हैं। जैसे वैराग्यमें अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्तको देखकर हर्षित होते हैं॥ १३॥
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥
ghana ghamaṃḍa nabha garajata ghorā| priyā hīna ḍarapata mana morā||
dāmini damaka raha na ghana māhīṃ| khala kai prīti jathā thira nāhīṃ||
Meaning आकाशमें बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी ) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजलीकी चमक बादलोंमें ठहरती नहीं, जैसे दुष्टकी प्रीति स्थिर नहीं रहती॥ १॥
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें। खल के बचन संत सह जैसें॥
baraṣahiṃ jalada bhūmi niarāem̐| jathā navahiṃ budha bidyā pāem̐||
būm̐da aghāta sahahiṃ giri kaiṃseṃ| khala ke bacana saṃta saha jaiseṃ||
Meaning बादल पृथ्वीके समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान नम्र हो जाते हैं। बूँदोंकी चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टोंकें वचन संत सहते हैं॥ २॥
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥
chudra nadīṃ bhari calīṃ torāī| jasa thorehum̐ dhana khala itarāī||
bhūmi parata bhā ḍhābara pānī| janu jīvahi māyā lapaṭānī||
Meaning छोटी नदियाँ भरकर [किनारोंको] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धनसे भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादाका त्याग कर देते हैं )। पृथ्वीपर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीवके माया लिपट गयी हो॥ ३॥
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई॥
samiṭi samiṭi jala bharahiṃ talāvā| jimi sadaguna sajjana pahiṃ āvā||
saritā jala jalanidhi mahum̐ jāī| hoī acala jimi jiva hari pāī||
Meaning जल एकत्र हो-होकर तालाबोंमें भर रहा है, जैसे सद्गुण [ एक-एककर] सज्जनके पास चले आते हैं। नदीका जल समुद्रमें जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरिको पाकर अचल (आवागमनसे मुक्त) हो जाता है॥ ४॥
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ १४॥
harita bhūmi tṛna saṃkula samujhi parahiṃ nahiṃ paṃtha|
jimi pākhaṃḍa bāda teṃ gupta hohiṃ sadagraṃtha|| 14||
Meaning पृथ्वी घाससे परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड- मतके प्रचारसे सद्ग्रन्थ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं॥ १४॥
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥
dādura dhuni cahu disā suhāī| beda paṛhahiṃ janu baṭu samudāī||
nava pallava bhae biṭapa anekā| sādhaka mana jasa mileṃ bibekā||
Meaning चारों दिशाओंमें मेढकोंकी ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियोंके समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षोंमें नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधकका मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होनेपर हो जाता है॥ १॥
अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥
arka jabāsa pāta binu bhayaū| jasa surāja khala udyama gayaū||
khojata katahum̐ milai nahiṃ dhūrī| karai krodha jimi dharamahi dūrī||
Meaning मदार और जवासा बिना पत्तेके हो गये (उनके पत्ते झड़ गये)। जैसे श्रेष्ठ राज्यमें दुष्ठोंका उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजनेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्मको दूर कर देता है (अर्थात् क्रोधका आवेश होनेपर धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता)॥ २॥
ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥
sasi saṃpanna soha mahi kaisī| upakārī kai saṃpati jaisī||
nisi tama ghana khadyota birājā| janu daṃbhinha kara milā samājā||
Meaning अन्नसे युक्त (लहलहाती हुई खेतीसे हरी-भरी ) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुषकी सम्पत्ति। रातके घने अन्धकारमें जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियोंका समाज आ जुटा हो॥३॥
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥
mahābṛṣṭi cali phūṭi kiārīṃ| jimi sutaṃtra bhaem̐ bigarahiṃ nārīṃ||
kṛṣī nirāvahiṃ catura kisānā| jimi budha tajahiṃ moha mada mānā||
Meaning भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं (उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं॥ ४॥
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥
dekhiata cakrabāka khaga nāhīṃ| kalihi pāi jimi dharma parāhīṃ||
ūṣara baraṣai tṛna nahiṃ jāmā| jimi harijana hiyam̐ upaja na kāmā||
Meaning चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती। जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता॥ ५॥
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥
bibidha jaṃtu saṃkula mahi bhrājā| prajā bāṛha jimi pāi surājā||
jaham̐ taham̐ rahe pathika thaki nānā| jimi iṃdriya gana upajeṃ gyānā||
Meaning पृथ्वी अनेक तरहके जीवोंसे भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजाकी वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर उठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयोंकी ओर जाना छोड़ देती हैं ]॥ ६॥
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥ १५ ( क )॥
kabahum̐ prabala baha māruta jaham̐ taham̐ megha bilāhiṃ|
jimi kapūta ke upajeṃ kula saddharma nasāhiṃ|| 15 ( ka )||
Meaning कभी-कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं॥ १५ (क)॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ १५ ( ख )॥
kabahum̐ divasa maham̐ nibiṛa tama kabahum̐ka pragaṭa pataṃga|
binasai upajai gyāna jimi pāi kusaṃga susaṃga|| 15 ( kha )||
Meaning कभी [बादलोंके कारण] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है॥ १५ (ख)॥
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥
baraṣā bigata sarada ritu āī| lachimana dekhahu parama suhāī||
phūleṃ kāsa sakala mahi chāī| janu baraṣām̐ kṛta pragaṭa buṛhāī||
Meaning हे लक्ष्मण ! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरदू-ऋतु आ गयी। फूले हुए काससे सारी पृथ्वी छा गयी। मानो वर्षा-ऋतुने [ कासरूपी सफेद बालोंके रूपमें। अपना बुढ़ापा प्रकट किया है॥ १॥
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥
udita agasti paṃtha jala soṣā| jimi lobhahi soṣai saṃtoṣā||
saritā sara nirmala jala sohā| saṃta hṛdaya jasa gata mada mohā||
Meaning ६९८ अगस्त्यके तारेने उदय होकर मार्गके जलको * रामचरितमानस सोख लिया, * जैसे सन्तोष लोभको सोख लेता है। नदियों और तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोहसे रहित संतोंका हृदय !॥ २॥
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥
rasa rasa sūkha sarita sara pānī| mamatā tyāga karahiṃ jimi gyānī||
jāni sarada ritu khaṃjana āe| pāi samaya jimi sukṛta suhāe||
Meaning नदी और तालाबोंका जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी ) पुरुष ममताका त्याग करते हैं। शरदू-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुक़ृत आ जाते हैं (पुण्य प्रकट हो जाते हैं)॥ ३॥
पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥
paṃka na renu soha asi dharanī| nīti nipuna nṛpa kai jasi karanī||
jala saṃkoca bikala bhaim̐ mīnā| abudha kuṭuṃbī jimi dhanahīnā||
Meaning न कीचड़ है न धूल; इससे धरती [ निर्मल होकर] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजाकी करनी! जलके कम हो जानेसे मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेकशून्य ) कुटुम्बी (गृहस्थ) धनके बिना व्याकुल होता है॥ ४॥
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥
binu dhana nirmala soha akāsā| harijana iva parihari saba āsā||
kahum̐ kahum̐ bṛṣṭi sāradī thorī| kou eka pāva bhagati jimi morī||
Meaning बिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्धक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानोंमें ) शरदू-ऋतुकी थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥ ५॥
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि॥ १६॥
cale haraṣi taji nagara nṛpa tāpasa banika bhikhāri|
jimi haribhagata pāi śrama tajahi āśramī cāri|| 16||
Meaning [शरदू-ऋतु पाकर] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी [ क्रमश: विजय, तप, व्यापार और भिक्षाके लिये] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्रीहरिकी भक्ति पाकर चारों आश्रमवाले [नाना प्रकारके साधनरूपी] श्रमोंको त्याग देते हैं॥ १६॥