सुनु सुभ कथा भवानि बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड॥ १२० ( ख )॥
sunu subha kathā bhavāni bimala|
kahā bhusuṃḍi bakhāni sunā bihaga nāyaka garuḍa|| 120 ( kha )||
Meaning हे पार्वती ! निर्मल रामचरितमानसकी वह मज़लमयी कथा सुनो जिसे काकभुशुण्डिने विस्तारसे कहा और पक्षियोंके राजा गरुड़जीने सुना था॥ १२० (ख)॥
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ॥ १२० (ग )॥
so saṃbāda udāra jehi bidhi bhā āgeṃ kahaba|
sunahu rāma avatāra carita parama suṃdara anagha|| 120 (ga )||
Meaning वह श्रेष्ठ संवाद जिस प्रकार हुआ, वह मैं आगे कहूँगा। अभी तुम श्रीरामचन्द्रजीके अवतारका परम सुन्दर और पवित्र (पापनाशक) चरित्र सुनो॥ १२० (ग)॥
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु॥ १२० (घ )॥
hari guna nāma apāra kathā rūpa aganita amita|
maiṃ nija mati anusāra kahaum̐ umā sādara sunahu|| 120 (gha )||
Meaning श्रीहरिके गुण, नाम, कथा और रूप सभी अपार, अगणित और असीम हैं। फिर भी हे पार्वती ! मैं अपनी बुद्धिकि अनुसार कहता हूँ, तुम आदरपूर्वक सुनो॥ १२० (घ)॥
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥
sunu girijā haricarita suhāe| bipula bisada nigamāgama gāe||
hari avatāra hetu jehi hoī| idamitthaṃ kahi jāi na soī||
Meaning हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रोंने श्रीहरिके सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्रोंका गान किया है। हरिका अवतार जिस कारणसे होता है, वह कारण ' बस यही है ' ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)॥ १॥
राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥
rāma artakya buddhi mana bānī| mata hamāra asa sunahi sayānī||
tadapi saṃta muni beda purānā| jasa kachu kahahiṃ svamati anumānā||
Meaning हे सयानी ! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणीसे श्रीरामचन्द्रजीकी तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण--अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा कुछ कहते हैं,॥ २॥
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी॥
tasa maiṃ sumukhi sunāvaum̐ tohī| samujhi parai jasa kārana mohī||
jaba jaba hoi dharama kai hānī| bāḍhahiṃ asura adhama abhimānī||
Meaning और जैसा कुछ मेरी समझमें आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ। जब- जब धर्मका हास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं॥ ३॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा॥
karahiṃ anīti jāi nahiṃ baranī| sīdahiṃ bipra dhenu sura dharanī||
taba taba prabhu dhari bibidha sarīrā| harahi kṛpānidhi sajjana pīrā||
Meaning और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँतिके [दिव्य] शरीर धारण कर सज्जनोंकी पीड़ा हरते हैं॥ ४॥
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥ १२१॥
asura māri thāpahiṃ suranha rākhahiṃ nija śruti setu|
jaga bistārahiṃ bisada jasa rāma janma kara hetu|| 121||
Meaning वे असुरोंको मारकर देवताओंको स्थापित करते हैं, अपने [श्वासरूप] वेदोंकी मर्यादाकी रक्षा करते हैं और जगत्में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके अवतारका यह कारण है॥ १२१॥
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥
soi jasa gāi bhagata bhava tarahīṃ| kṛpāsiṃdhu jana hita tanu dharahīṃ||
rāma janama ke hetu anekā| parama bicitra eka teṃ ekā||
Meaning उसी यशको गा-गाकर भक्तजन भवसागरसे तर जाते हैं। कृपासागर भगवान् भक्तोंके हितके लिये शरीर धारण करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके जन्म लेनेके अनेक कारण हैं, जो एक-से-एक बढ़कर विचित्र हैं॥ १॥
जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥
janama eka dui kahaum̐ bakhānī| sāvadhāna sunu sumati bhavānī||
dvārapāla hari ke priya doū| jaya aru bijaya jāna saba koū||
Meaning हे सुन्दर बुद्धिवाली भवानी ! मैं उनके दो-एक जन्मोंका विस्तारसे वर्णन करता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। श्रीहरिकि जय और विजय दो प्यारे द्वारपाल हैं, जिनको सब कोई जानते हैं॥ २॥
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥
bipra śrāpa teṃ dūnau bhāī| tāmasa asura deha tinha pāī||
kanakakasipu aru hāṭaka locana| jagata bidita surapati mada mocana||
Meaning उन दोनों भाइयोंने ब्राह्मण (सनकादि) के शापसे असुरोंका तामसी शरीर पाया। एकका नाम था हिरण्यकशिपु और दूसरेका हिरण्याक्ष। ये देवराज इन्द्रके गर्वको छुड़ानेवाले सारे जगतमें प्रसिद्ध हुए॥ ३॥
बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥
bijaī samara bīra bikhyātā| dhari barāha bapu eka nipātā||
hoi narahari dūsara puni mārā| jana prahalāda sujasa bistārā||
Meaning वे युद्धमें विजय पानेवाले विख्यात वीर थे। इनमेंसे एक (हिरण्याक्ष) को भगवान्ने वराह (सूअर)का शरीर धारण करके मारा; फिर दूसरे ( हिरण्यकशिपु) का नरसिंहरूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रह्वादका सुन्दर यश फैलाया॥ ४॥
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान॥ १२२॥
bhae nisācara jāi tei mahābīra balavāna|
kuṃbhakarana rāvaṇa subhaṭa sura bijaī jaga jāna|| 122||
Meaning वे ही [दोनों ] जाकर देवताओंको जीतनेवाले तथा बड़े योद्धा, रावण और कुम्भकर्ण नामक बड़े बलवान्ू और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत् जानता है॥ १२२॥
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥
mukuta na bhae hate bhagavānā| tīni janama dvija bacana pravānā||
eka bāra tinha ke hita lāgī| dhareu sarīra bhagata anurāgī||
Meaning भगवान्के द्वारा मारे जानेपर भी वे (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) इसीलिये मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मणके वचन (शाप) का प्रमाण तीन जन्मके लिये था। अत: एक बार उनके कल्याणके लिये भक्तप्रेमी भगवानूने फिर अवतार लिया॥ १॥
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा॥
kasyapa aditi tahām̐ pitu mātā| dasaratha kausalyā bikhyātā||
eka kalapa ehi bidhi avatārā| caritra pavitra kie saṃsārā||
Meaning वहाँ (उस अवतारमें ) कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौसल्याके नामसे प्रसिद्ध थे। एक कल्पमें इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसारमें पवित्र लीलाएँ कीं॥ २॥
एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥
संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥
eka kalapa sura dekhi dukhāre| samara jalaṃdhara sana saba hāre||
saṃbhu kīnha saṃgrāma apārā| danuja mahābala marai na mārā||
Meaning एक कल्पमें सब देवताओंको जलन्धर दैत्यसे युद्धमें हार जानेके कारण दु:खी देखकर शिवजीने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया; पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता था॥ ३॥
परम सती असुराधिप नारी।
तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी॥
parama satī asurādhipa nārī| tehi bala tāhi na jitahiṃ purārī||
Meaning उस दैत्यराजकी स्त्री परम सती (बड़ी ही पतिव्रता) थी। उसीके प्रतापसे त्रिपुरासुर [ जैसे अजेय शत्रु का विनाश करनेवाले शिवजी भी उस दैत्यको नहीं जीत सके॥ '४॥
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥ १२३॥
chala kari ṭāreu tāsu brata prabhu sura kāraja kīnha|
jaba tehi jāneu marama taba śrāpa kopa kari dīnha|| 123||
Meaning प्रभुने छलसे उस स्त्रीका व्रत भड़ कर देवताओंका काम किया। जब उस स्त्रीने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान्को शाप दिया॥ १२३॥
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥
तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥
tāsu śrāpa hari dīnha pramānā| kautukanidhi kṛpāla bhagavānā||
tahām̐ jalaṃdhara rāvana bhayaū| rana hati rāma parama pada dayaū||
Meaning लीलाओंके भण्डार कृपालु हरिने उस स्त्रीके शापको प्रामाण्य दिया (स्वीकार किया)। वही जलन्धर उस कल्पमें रावण हुआ, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें मारकर परमपद दिया॥ १॥
एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥
eka janama kara kārana ehā| jehi lāgi rāma dharī naradehā||
prati avatāra kathā prabhu kerī| sunu muni baranī kabinha ghanerī||
Meaning एक जन्मका कारण यह था, जिससे श्रीरामचन्द्रजीने मनुष्यदेह धारण किया। हे भरद्वाज मुनि! सुनो, प्रभुके प्रत्येक अवतारकी कथाका कवियोंने नाना प्रकारसे वर्णन किया है॥ २॥
नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥
गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि॥
nārada śrāpa dīnha eka bārā| kalapa eka tehi lagi avatārā||
girijā cakita bhaī suni bānī| nārada biṣnubhagata puni gyāni||
Meaning एक बार नारदजीने शाप दिया, अत: एक कल्पमें उसके लिये अवतार हुआ। यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुई [और बोलीं कि] नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी हैं॥ ३॥
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥
kārana kavana śrāpa muni dīnhā| kā aparādha ramāpati kīnhā||
yaha prasaṃga mohi kahahu purārī| muni mana moha ācaraja bhārī||
Meaning मुनिने भगवान्ूको शाप किस कारणसे दिया ? लक्ष्मीपति भगवान्ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि (शड्भरजी ) ! यह कथा मुझसे कहिये। मुनि नारदके मनमें मोह होना बड़े आश्चर्यकी बात है॥ ४॥
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥ १२४ ( क )॥
bole bihasi mahesa taba gyānī mūṛha na koi|
jehi jasa raghupati karahiṃ jaba so tasa tehi chana hoi|| 124 ( ka )||
Meaning तब महादेवजीने हँसकर कहा--न कोई ज्ञानी है न मूर्ख। श्रीरघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है॥ १२४ (क)॥
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥ १२४ ( ख )॥
kahaum̐ rāma guna gātha bharadvāja sādara sunahu|
bhava bhaṃjana raghunātha bhaju tulasī taji māna mada|| 124 ( kha )||
Meaning [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] हे भरद्वाज! मैं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा कहता हूँ, तुम आदरसे सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं--मान और मदको छोड़कर आवागमनका नाश करनेवाले रघुनाथजीको भजो॥ १२४ (ख)॥
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥
himagiri guhā eka ati pāvani| baha samīpa surasarī suhāvani||
āśrama parama punīta suhāvā| dekhi devariṣi mana ati bhāvā||
Meaning हिमालय पर्वतमें एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुन्दर गड़ाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुन्दर आश्रम देखनेपर नारदजीके मनको बहुत ही सुहावना लगा॥ १॥
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥
nirakhi saila sari bipina bibhāgā| bhayau ramāpati pada anurāgā||
sumirata harihi śrāpa gati bādhī| sahaja bimala mana lāgi samādhī||
Meaning पर्वत, नदी और वनके [सुन्दर] विभागोंको देखकर नारदजीका लक्ष्मीकान्त भगवान्के चरणोंमें प्रेम हो गया। भगवान्का स्मरण करते ही उन (नारद मुनि) के शापकी (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापतिने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थानपर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गयी और मनके स्वाभाविक ही निर्मल होनेसे उनकी समाधि लग गयी॥ २॥
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥
muni gati dekhi suresa ḍerānā| kāmahi boli kīnha sanamānā||
sahita sahāya jāhu mama hetū| cakeu haraṣi hiyam̐ jalacaraketū||
Meaning नारद मुनिकी [यह तपोमयी] स्थिति देखकर देवराज इन्द्र डर गया। उसने कामदेवको बुलाकर उसका आदर-सत्कार किया [और कहा कि] मेरे [हितके] लिये तुम अपने सहायकोंसहित [ नारदकी समाधि भड़ करनेको] जाओ। [यह सुनकर] मीनध्वज कामदेव मनमें प्रसन्न होकर चला॥ ३॥
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥
sunāsīra mana mahum̐ asi trāsā| cahata devariṣi mama pura bāsā||
je kāmī lolupa jaga māhīṃ| kuṭila kāka iva sabahi ḍerāhīṃ||
Meaning इन्द्रके मनमें यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी (अमरावती ) का निवास (राज्य) चाहते हैं। जगत्में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौएकी तरह सबसे डरते हैं॥ ४॥
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥ १२५॥
sukha hāṛa lai bhāga saṭha svāna nirakhi mṛgarāja|
chīni lei jani jāna jaṛa timi surapatihi na lāja|| 125||
Meaning जैसे मूर्ख कुत्ता सिंहको देखकर सूखी हड़ी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं उस हड्डीको सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्रको [ नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते] लाज नहीं आयी॥ १२५॥
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा॥
tehi āśramahiṃ madana jaba gayaū| nija māyām̐ basaṃta niramayaū||
kusumita bibidha biṭapa bahuraṃgā| kūjahiṃ kokila guṃjahi bhṛṃgā||
Meaning जब कामदेव उस आश्रममें गया, तब उसने अपनी मायासे वहाँ वसन्त-ऋतुको उत्पन्न किया। तरह-तरहके वृक्षोंपर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उनपर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे॥ १॥
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥
रंभादिक सुरनारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥
calī suhāvani tribidha bayārī| kāma kṛsānu baṛhāvanihārī||
raṃbhādika suranāri nabīnā| sakala asamasara kalā prabīnā||
Meaning कामाग्निको भड़कानेवाली तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द और सुगन्ध) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवाड़नाएँ, जो सब-की-सब कामकलामें निपुण थीं,॥ २॥
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥
karahiṃ gāna bahu tāna taraṃgā| bahubidhi krīṛahi pāni pataṃgā||
dekhi sahāya madana haraṣānā| kīnhesi puni prapaṃca bidhi nānā||
Meaning वे बहुत प्रकारकी तानोंकी तरज़के साथ गाने लगीं और हाथमें गेंद लेकर नाना प्रकारके खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने नाना प्रकारके मायाजाल किये॥ ३॥
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू॥
kāma kalā kachu munihi na byāpī| nija bhayam̐ ḍareu manobhava pāpī||
sīma ki cām̐pi sakai kou tāsu| baṛa rakhavāra ramāpati jāsū||
Meaning परन्तु कामदेवकी कोई भी कला मुनिपर असर न कर सकी। तब तो पापी कामदेव अपने ही [नाशके] भयसे डर गया। लक्ष्मीपति भगवान् जिसके बड़े रक्षक हों, भला, उसकी सीमा (मर्यादा)को कोई दबा सकता है?॥ ४॥
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥ १२६॥
sahita sahāya sabhīta ati māni hāri mana maina|
gahesi jāi muni carana taba kahi suṭhi ārata baina|| 126||
Meaning तब अपने सहायकों समेत कामदेवने बहुत डरकर और अपने मनमें हार मानकर बहुत ही आर्त (दीन) वचन कहते हुए मुनिके चरणोंको जा पकड़ा॥ १२६॥
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥
bhayau na nārada mana kachu roṣā| kahi priya bacana kāma paritoṣā||
nāi carana siru āyasu pāī| gayau madana taba sahita sahāī||
Meaning नारदजीके मनमें कुछ भी क्रोध न आया। उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेवका समाधान किया। तब मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और उनकी आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकोंसहित लौट गया॥ १॥
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥
muni susīlatā āpani karanī| surapati sabhām̐ jāi saba baranī||
suni saba keṃ mana acaraju āvā| munihi prasaṃsi harihi siru nāvā||
Meaning देवराज इन्द्रकी सभामें जाकर उसने मुनिकी सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मनमें आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनिकी बड़ाई करके श्रीहरिको सिर नवाया॥ २॥
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥
मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥
taba nārada gavane siva pāhīṃ| jitā kāma ahamiti mana māhīṃ||
māra carita saṃkarahiṃ sunāe| atipriya jāni mahesa sikhāe||
Meaning तब नारदजी शिवजीके पास गये। उनके मनमें इस बातका अहंकार हो गया कि हमने कामदेवको जीत लिया। उन्होंने कामदेवके चरित्र शिवजीको सुनाये और महादेवजीने उन (नारदजी) को अत्यन्त प्रिय जानकर [इस प्रकार] शिक्षा दी--॥३॥
बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ॥
bāra bāra binavaum̐ muni tohīṃ| jimi yaha kathā sunāyahu mohīṃ||
timi jani harihi sunāvahu kabahūm̐| calehum̐ prasaṃga durāeḍu tabahūm̐||
Meaning हे मुनि! मैं तुमसे बार-बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनायी है, उस तरह भगवान् श्रीहरिको कभी मत सुनाना। चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना॥ ४॥
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥ १२७॥
saṃbhu dīnha upadesa hita nahiṃ nāradahi sohāna|
bhāradvāja kautuka sunahu hari icchā balavāna|| 127||
Meaning यद्यपि शिवजीने यह हितकी शिक्षा दी, पर नारदजीको वह अच्छी न लगी। हे भरद्वाज ! अब कौतुक (तमाशा) सुनो। हरिकी इच्छा बड़ी बलवान् है॥ १२७॥
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥
rāma kīnha cāhahiṃ soi hoī| karai anyathā asa nahiṃ koī||
saṃbhu bacana muni mana nahiṃ bhāe| taba biraṃci ke loka sidhāe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। श्रीशिवजीके वचन नारदजीके मनको अच्छे नहीं लगे, तब वे वहाँसे ब्रहालोकको चल दिये॥ १॥
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥
eka bāra karatala bara bīnā| gāvata hari guna gāna prabīnā||
chīrasiṃdhu gavane munināthā| jaham̐ basa śrīnivāsa śrutimāthā||
Meaning एक बार गानविद्यामें निपुण मुनिनाथ नारदजी हाथमें सुन्दर वीणा लिये, हरिगुण गाते हुए क्षीरसागरको गये, जहाँ वेदोंके मस्तकस्वरूप ( मूर्तिमान् वेदान्ततत्त्व ) लक्ष्मीनिवास भगवान् नारायण रहते हैं॥ २॥
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥
haraṣi mile uṭhi ramāniketā| baiṭhe āsana riṣihi sametā||
bole bihasi carācara rāyā| bahute dinana kīnhi muni dāyā||
Meaning रमानिवास भगवान् उठकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और ऋषि (नारदजी) के साथ आसनपर बैठ गये। चराचरके स्वामी भगवान् हँसकर बोले--हे मुनि ! आज आपने बहुत दिनोंपर दया की॥ ३॥
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥
kāma carita nārada saba bhāṣe| jadyapi prathama baraji sivam̐ rākhe||
ati pracaṃḍa raghupati kai māyā| jehi na moha asa ko jaga jāyā||
Meaning यद्यपि श्रीशिवजीने उन्हें पहलेसे ही बरज रखा था, तो भी नारदजीने कामदेवका सारा चरित्र भगवान्को कह सुनाया। श्रीरघुनाथजीकी माया बड़ी ही प्रबल है। जगत्में ऐसा कौन जनमा है जिसे वह मोहित न कर दे॥ ४॥
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥ १२८॥
rūkha badana kari bacana mṛdu bole śrībhagavāna|
tumhare sumirana teṃ miṭahiṃ moha māra mada māna|| 128||
Meaning भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले--हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [ फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है ?]॥ १२८॥
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥
sunu muni moha hoi mana tākeṃ| gyāna birāga hṛdaya nahiṃ jāke||
brahmacaraja brata rata matidhīrā| tumhahi ki karai manobhava pīrā||
Meaning हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यब्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है ?॥ १॥
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥
nārada kaheu sahita abhimānā| kṛpā tumhāri sakala bhagavānā||
karunānidhi mana dīkha bicārī| ura aṃkureu garaba taru bhārī||
Meaning नारदजीने अभिमानके साथ कहा--भगवन् ! यह सब आपकी कृपा है। करुणानिधान भगवान्ने मनमें विचारकर देखा कि इनके मनमें गर्वके भारी वृक्षका अंकुर पैदा हो गया है॥ २॥
बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई॥
begi so mai ḍārihaum̐ ukhārī| pana hamāra sevaka hitakārī||
muni kara hita mama kautuka hoī| avasi upāya karabi mai soī||
Meaning मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकोंका हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे मुनिका कल्याण और मेरा खेल हो॥ ३॥
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥
taba nārada hari pada sira nāī| cale hṛdayam̐ ahamiti adhikāī||
śrīpati nija māyā taba prerī| sunahu kaṭhina karanī tehi kerī||
Meaning तब नारदजी भगवान्के चरणोंमें सिर नवाकर चले। उनके हृदयमें अभिमान और भी बढ़ गया। तब लक्ष्मीपति भगवान्ने अपनी मायाको प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो॥ ४॥
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥ १२९॥
biraceu maga mahum̐ nagara tehiṃ sata jojana bistāra|
śrīnivāsapura teṃ adhika racanā bibidha prakāra|| 129||
Meaning उस (हरिमाया) ने रास्तेमें सौ योजन (चार सौ कोस) का एक नगर रचा। उस नगरकी भाँति- भाँतिकी रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णुके नगर (वैकुण्ठ) से भी अधिक सुन्दर थीं॥ १२९॥
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥
basahiṃ nagara suṃdara nara nārī| janu bahu manasija rati tanudhārī||
tehiṃ pura basai sīlanidhi rājā| aganita haya gaya sena samājā||
Meaning उस नगरमें ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य-शरीर धारण किये हुए हों। उस नगरमें शीलनिधि नामका राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेनाके समूह (टुकड़ियाँ) थे॥ १॥
सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥
बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥
sata suresa sama bibhava bilāsā| rūpa teja bala nīti nivāsā||
bisvamohanī tāsu kumārī| śrī bimoha jisu rūpu nihārī||
Meaning उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रोंके समान था। वह रूप, तेज, बल और नीतिका घर था। उसके विश्वमोहिनी नामकी एक [ ऐसी रूपवती] कन्या थी, जिसके रूपको देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायेँ॥ २॥
सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥
करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥
soi harimāyā saba guna khānī| sobhā tāsu ki jāi bakhānī||
karai svayaṃbara so nṛpabālā| āe taham̐ aganita mahipālā||
Meaning वह सब गुणोंकी खान भगवान्की माया ही थी। उसकी शोभाका वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे॥ ३॥
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥
muni kautukī nagara tehiṃ gayaū| purabāsinha saba pūchata bhayaū||
suni saba carita bhūpagṛham̐ āe| kari pūjā nṛpa muni baiṭhāe||
Meaning खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगरमें गये और नगरवासियोंसे उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजाके महलमें आये। राजाने पूजा करके मुनिको [आसनपर] बैठाया॥ ४॥
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥ १३०॥
āni dekhāī nāradahi bhūpati rājakumāri|
kahahu nātha guna doṣa saba ehi ke hṛdayam̐ bicāri|| 130||
Meaning [ फिर] राजाने राजकुमारीको लाकर नारदजीको दिखलाया [और पूछा कि--] हे नाथ! आप अपने हृदयमें विचारकर इसके सब गुण-दोष कहिये॥ १३०॥
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥
dekhi rūpa muni birati bisārī| baṛī bāra lagi rahe nihārī||
lacchana tāsu biloki bhulāne| hṛdayam̐ haraṣa nahiṃ pragaṭa bakhāne||
Meaning उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा॥ १॥
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥
सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥
jo ehi barai amara soi hoī| samarabhūmi tehi jīta na koī||
sevahiṃ sakala carācara tāhī| barai sīlanidhi kanyā jāhī||
Meaning [लक्षणोंको सोचकर वे मनमें कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमिमें कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधिको कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे॥ २॥
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥
lacchana saba bicāri ura rākhe| kachuka banāi bhūpa sana bhāṣe||
sutā sulacchana kahi nṛpa pāhīṃ| nārada cale soca mana māhīṃ||
Meaning सब लक्षणोंको विचारकर मुनिने अपने हृदयमें रख लिया और राजासे कुछ अपनी ओरसे बनाकर कह दिया। राजासे लड़कीके सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मनमें यह चिन्ता थी कि--॥ ३॥
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥
karauṃ jāi soi jatana bicārī| jehi prakāra mohi barai kumārī||
japa tapa kachu na hoi tehi kālā| he bidhi milai kavana bidhi bālā||
Meaning मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी ?॥ ४॥
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥ १३१॥
ehi avasara cāhia parama sobhā rūpa bisāla|
jo biloki rījhai kuam̐ri taba melai jayamāla|| 131||
Meaning इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल(सुन्दर)रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझपर रीझ जाय और तब जयमाल [मेरे गलेमें] डाल दे॥ १३१॥
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥
hari sana māgauṃ suṃdaratāī| hoihi jāta gaharu ati bhāī||
moreṃ hita hari sama nahiṃ koū| ehi avasara sahāya soi hoū||
Meaning [एक काम करूँ कि] भगवानसे सुन्दरता माँगूँ; पर भाई! उनके पास जानेमें तो बहुत देर हो जायगी। किन्तु श्रीहरिके समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों॥ १॥
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥
bahubidhi binaya kīnhi tehi kālā| pragaṭeu prabhu kautukī kṛpālā||
prabhu biloki muni nayana juṛāne| hoihi kāju hiem̐ haraṣāne||
Meaning उस समय नारदजीने भगवान्की बहुत प्रकारसे विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [वहीं। प्रकट हो गये। स्वामीको देखकर नारदजीके नेत्र शीतल हो गये और वे मनमें बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जायगा॥ २॥
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥
आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥
ati ārati kahi kathā sunāī| karahu kṛpā kari hohu sahāī||
āpana rūpa dehu prabhu mohī| āna bhām̐ti nahiṃ pāvauṃ ohī||
Meaning नारदजीने बहुत आर्त (दीन) होकर सब कथा कह सुनायी [और प्रार्थथा की कि] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता॥ ३॥
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥
jehi bidhi nātha hoi hita morā| karahu so begi dāsa maiṃ torā||
nija māyā bala dekhi bisālā| hiyam̐ ham̐si bole dīnadayālā||
Meaning हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये। मैं आपका दास हूँ। अपनी मायाका विशाल बल देख दीनदयालु भगवान् मन-ही-मन हँसकर बोले--॥ ४॥
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
jehi bidhi hoihi parama hita nārada sunahu tumhāra|
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥
soi hama karaba na āna kachu bacana na mṛṣā hamāra||
Meaning हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता॥ १३२॥
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥
kupatha māga ruja byākula rogī| baida na dei sunahu muni jogī||
ehi bidhi hita tumhāra maiṃ ṭhayaū| kahi asa aṃtarahita prabhu bhayaū||
Meaning हे योगी मुनि! सुनिये, रोगसे व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करनेकी ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये॥ १॥
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥
māyā bibasa bhae muni mūṛhā| samujhī nahiṃ hari girā nigūṛhā||
gavane turata tahām̐ riṣirāī| jahām̐ svayaṃbara bhūmi banāī||
Meaning [ भगवान्की ] मायाके वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान्की अगूढ़ (स्पष्ट ) वाणीको भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवरकी भूमि बनायी गयी थी॥ २॥
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें॥
nija nija āsana baiṭhe rājā| bahu banāva kari sahita samājā||
muni mana haraṣa rūpa ati moreṃ| mohi taji ānahi bārihi na bhoreṃ||
Meaning राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसनपर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही- मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरेको न वरेगी॥ ३॥
मुनि हित कारन कृपानिधाना।
दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥
muni hita kārana kṛpānidhānā| dīnha kurūpa na jāi bakhānā||
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा।
नारद जानि सबहिं सिर नावा॥
so caritra lakhi kāhum̐ na pāvā| nārada jāni sabahiṃ sira nāvā||
Meaning कृपानिधान भगवान्ने मुनिके कल्याणके लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया॥ ४॥
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥ १३३॥
rahe tahām̐ dui rudra gana te jānahiṃ saba bheu|
biprabeṣa dekhata phirahiṃ parama kautukī teu|| 133||
Meaning वहाँ दो शिवजीके गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मणका वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे॥ १३३॥