बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥
bahu bidhi saṃbhu sāsa samujhāī| gavanī bhavana carana siru nāī||
jananīṃ umā boli taba līnhī| lai uchaṃga suṃdara sikha dīnhī||
Meaning शिवजीने बहुत तरहसे अपनी सासको समझाया। तब वे शिवजीके चरणोंमें सिर नवाकर घर गयीं। फिर माताने पार्वतीको बुला लिया और गोदमें बैठाकर यह सुन्दर सीख दी--॥१॥
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥
karehu sadā saṃkara pada pūjā| nāridharamu pati deu na dūjā||
bacana kahata bhare locana bārī| bahuri lāi ura līnhi kumārī||
Meaning हे पार्वती ! तू सदा शिवजीके चरणकी पूजा करना, नारियोंका यही धर्म है। उनके लिये पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकारकी बातें कहते-कहते उनकी आँखोंमें आँसू भर आये और उन्होंने कन्याको छातीसे चिपटा लिया॥ २॥
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥
kata bidhi sṛjīṃ nāri jaga māhīṃ| parādhīna sapanehum̐ sukhu nāhīṃ||
bhai ati prema bikala mahatārī| dhīraju kīnha kusamaya bicārī||
Meaning [ फिर बोलीं कि] विधाताने जगतमें स्त्रीजातिको क्यों पैदा किया ? पराधीनको सपनेमें भी सुख नहीं मिलता। यों कहती हुई माता प्रेममें अत्यन्त विकल हो गयी, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करनेका अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा॥ ३॥
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना॥
सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥
puni puni milati parati gahi caranā| parama prema kachu jāi na baranā||
saba nārinha mili bheṭi bhavānī| jāi janani ura puni lapaṭānī||
Meaning मैना बार-बार मिलती हैं और [ पार्वतीके] चरणोंको पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियोंसे मिल-भेंटकर फिर अपनी माताके हृदयसे जा लिपटीं॥ ४॥
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब खीं सर ले सिव पहिं गईं॥
जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरघि निसान नभ बाजे भले॥
jananihi bahuri mili calī ucita asīsa saba kāhūm̐ daīṃ|
phiri phiri bilokati mātu tana taba khīṃ sara le siva pahiṃ gaīṃ||
jācaka sakala saṃtoṣi saṃkaru umā sahita bhavana cale|
saba amara haraṣe sumana baraghi nisāna nabha bāje bhale||
Meaning पार्वतीजी मातासे फिर मिलकर चलीं, सब किसीने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिये। पार्वतीजी फिर-फिरकर माताकी ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजीके पास ले गयीं। महादेवजी सब याचकोंको सन्तुष्ट कर पार्वतीके साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाशमें सुन्दर नगाड़े बजने लगे।
चले संग हिमवंतु तब पहुंचावन अति हेतु।
बिबिध भांति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥ १०२॥
cale saṃga himavaṃtu taba pahuṃcāvana ati hetu|
bibidha bhāṃti paritoṣu kari bidā kīnha bṛṣaketu|| 102||
Meaning तब हिमवान् अत्यन्त प्रेमसे शिवजीको पहुँचानेके लिये साथ चले। वृषकेतु (शिवजी ) ने बहुत तरहसे उन्हें सन्तोष कराकर विदा किया॥ १०२॥
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥
आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥
turata bhavana āe girirāī| sakala saila sara lie bolāī||
ādara dāna binaya bahumānā| saba kara bidā kīnha himavānā||
Meaning पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आये और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरोंको बुलाया। हिमवानने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की॥ १॥
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी॥
jabahiṃ saṃbhu kailāsahiṃ āe| sura saba nija nija loka sidhāe||
jagata mātu pitu saṃbhu bhavānī| tehī siṃgāru na kahaum̐ bakhānī||
Meaning जब शिवजी कैलास पर्वतपर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकोंको चले गये। [ तुलसीदासजी कहते हैं कि] पार्वतीजी और शिवजी जगत्के माता-पिता हैं, इसलिये मैं उनके शरुज्वारका वर्णन नहीं करता॥ २॥
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥
karahiṃ bibidha bidhi bhoga bilāsā| gananha sameta basahiṃ kailāsā||
hara girijā bihāra nita nayaū| ehi bidhi bipula kāla cali gayaū||
Meaning शिव-पार्वती विविध प्रकारके भोग-विलास करते हुए अपने गणोंसहित कैलासपर रहने लगे। वे नित्य नये विहार करते थे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया॥ ३॥
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥
taba janameu ṣaṭabadana kumārā| tāraku asura samara jehiṃ mārā||
āgama nigama prasiddha purānā| ṣanmukha janmu sakala jaga jānā||
Meaning तब छः मुखवाले पुत्र (स्वामिकार्तिक) का जन्म हुआ, जिन्होंने [बड़े होनेपर] युद्धमें तारकासुरको मारा। वेद, शास्त्र और पुराणोंमें स्वामिकार्तिकके जन्मकी कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत् उसे जानता है॥ ४॥
छ० -ज्जगु जान पन्पुख जन्मु कर्म प्रतापु पुरुषारथु महा।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुख पावहीं
cha0 -jjagu jāna panpukha janmu karma pratāpu puruṣārathu mahā|
tehi hetu maiṃ bṛṣaketu suta kara carita saṃchepahiṃ kahā||
yaha umā saṃbhu bibāhu je nara nāri kahahiṃ je gāvahīṃ|
kalyāna kāja bibāha maṃgala sarbadā sukha pāvahīṃ
Meaning षडानन (स्वामिकार्तिक)के जन्म, कर्म, प्रताप और महान् पुरुषार्थको सारा जगत् जानता है। इसलिये मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्रका चरित्र संक्षेपसे ही कहा है। शिव-पार्वतीके विवाहकी इस कथाको जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याणके कार्यों और विवाहादि मज़लोंमें सदा सुख पावेंगे।
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।
बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवॉँरु॥ १०३॥
carita siṃdhu girijā ramana beda na pāvahiṃ pāru|
baranai tulasīdāsu kimi ati matimaṃda gavôm̐ru|| 103||
Meaning गिरिजापति महादेवजीका चरित्र समुद्रके समान (अपार) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते। तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है!॥ १०३॥
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा॥
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥
saṃbhu carita suni sarasa suhāvā| bharadvāja muni ati sukha pāvā||
bahu lālasā kathā para bāṛhī| nayananhi nīru romāvali ṭhāṛhī||
Meaning शिवजीके रसीले और सुहावने चरित्रको सुनकर मुनि भरद्वाजजीने बहुत ही सुख पाया। कथा सुननेकी उनकी लालसा बहुत बढ़ गयी। नेत्रोंगें जल भर आया तथा रोमावली खड़ी हो गयी॥ १॥
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥
prema bibasa mukha āva na bānī| dasā dekhi haraṣe muni gyānī||
aho dhanya tava janmu munīsā| tumhahi prāna sama priya gaurīsā||
Meaning वे प्रेममें मुग्ध हो गये, मुखसे वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए [ और बोले-] हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है; तुमको गौरीपति शिवजी प्राणोंके समान प्रिय हैं॥ २॥
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥
siva pada kamala jinhahi rati nāhīṃ| rāmahi te sapanehum̐ na sohāhīṃ||
binu chala bisvanātha pada nehū| rāma bhagata kara lacchana ehū||
Meaning शिवजीके चरणकमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्रीशिवजीके चरणोंमें निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्तका लक्षण है॥ ३॥
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥
siva sama ko raghupati bratadhārī| binu agha tajī satī asi nārī||
panu kari raghupati bhagati dekhāī| ko siva sama rāmahi priya bhāī||
Meaning शिवजीके समान रघुनाथजी [की भक्ति] का ब्रत धारण करनेवाला कौन है ? जिन्होंने बिना ही पापके सती-जैसी स्त्रीको त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको दिखा दिया। हे भाई ! श्रीरामचन्द्रजीको शिवजीके समान और कौन प्यारा है ?॥ ४॥
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥ २०४॥
prathamahiṃ mai kahi siva carita būjhā maramu tumhāra|
suci sevaka tumha rāma ke rahita samasta bikāra|| 204||
Meaning मैंने पहले ही शिवजीका चरित्र कहकर तुम्हारा भेद समझ लिया। तुम श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र सेवक हो और समस्त दोषोंसे रहित हो॥ १०४॥
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥
maiṃ jānā tumhāra guna sīlā| kahaum̐ sunahu aba raghupati līlā||
sunu muni āju samāgama toreṃ| kahi na jāi jasa sukhu mana moreṃ||
Meaning मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्रीरघुनाथजीकी लीला कहता हूँ, सुनो। हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलनेसे मेरे मनमें जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता॥ १॥
राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥
rāma carita ati amita munisā| kahi na sakahiṃ sata koṭi ahīsā||
tadapi jathāśruta kahaum̐ bakhānī| sumiri girāpati prabhu dhanupānī||
Meaning हे मुनीश्वर ! रामचरित्र अत्यन्त अपार है। सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणीके स्वामी (प्रेरक) और हाथमें धनुष लिये हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके कहता हूँ॥ २॥
सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
sārada dārunāri sama svāmī| rāmu sūtradhara aṃtarajāmī||
jehi para kṛpā karahiṃ janu jānī| kabi ura ajira nacāvahiṃ bānī||
Meaning सरस्वतीजी कठपुतलीके समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्रीरामचन्द्रजी [सूत पकड़कर कठपुतलीको नचानेवाले] सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कविपर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगनमें सरस्वतीको वे नचाया करते हैं॥ ३॥
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥
परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥
pranavaum̐ soi kṛpāla raghunāthā| baranaum̐ bisada tāsu guna gāthā||
parama ramya giribaru kailāsū| sadā jahām̐ siva umā nivāsū||
Meaning उन्हीं कृपालु श्रीरघुनाथजीको मैं प्रणाम करता हूँ और उन्हींके निर्मल गुणोंकी कथा कहता हूँ। कैलास पर्वतोंमें श्रेष्ठ और बहुत ही रमणीय है, जहाँ शिव-पार्वतीजी सदा निवास करते हैं॥ ४॥
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद॥ १०५॥
siddha tapodhana jogijana sūra kiṃnara munibṛṃda|
basahiṃ tahām̐ sukṛtī sakala sevahiṃ siba sukhakaṃda|| 105||
Meaning सिद्ध, तपस्वी, योगीगण, देवता, किन्नर और मुनियोंके समूह उस पर्वतपर रहते हैं। वे सब बड़े पुण्यात्मा हैं और आनन्दकन्द श्रीमहादेवजीकी सेवा करते हैं॥ १०५॥
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥
hari hara bimukha dharma rati nāhīṃ| te nara taham̐ sapanehum̐ nahiṃ jāhīṃ||
tehi giri para baṭa biṭapa bisālā| nita nūtana suṃdara saba kālā||
Meaning जो भगवान् विष्णु और महादेवजीसे विमुख हैं और जिनकी धर्ममें प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्रमें भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वतपर एक विशाल बरगदका पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुन्दर रहता है॥ १॥
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥
tribidha samīra susītali chāyā| siva biśrāma biṭapa śruti gāyā||
eka bāra tehi tara prabhu gayaū| taru biloki ura ati sukhu bhayaū||
Meaning वहाँ तीनों प्रकारकी (शीतल, मन्द और सुगन्ध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजीके विश्राम करनेका वृक्ष है, जिसे वेदोंने गाया है। एक बार प्रभु श्रीशिवजी उस वृक्षके नीचे गये और उसे देखकर उनके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ॥ २॥
निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला॥
कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥
nija kara ḍāsi nāgaripu chālā| baiṭhai sahajahiṃ saṃbhu kṛpālā||
kuṃda iṃdu dara gaura sarīrā| bhuja pralaṃba paridhana municīrā||
Meaning अपने हाथसे बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभावसे ही (बिना किसी खास प्रयोजनके ) वहाँ बैठ गये। कुन्दके पुष्प, चन्द्रमा और शंखके समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियोंके-से (वल्कल) वस्त्र धारण किये हुए थे॥ ३॥
तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥
taruna aruna aṃbuja sama caranā| nakha duti bhagata hṛdaya tama haranā||
bhujaga bhūti bhūṣana tripurārī| ānanu sarada caṃda chabi hārī||
Meaning उनके चरण नये (पूर्णरूपसे खिले हुए) लाल कमलके समान थे, नखोंकी ज्योति भक्तोंके हदयका अन्धकार हरनेवाली थी। साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुरके शत्रु शिवजीका मुख शरद् ( पूर्णिमा) के चन्द्रमाकी शोभाको भी हरनेवाला (फीकी करनेवाला) था॥ ४॥
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।
नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल॥ १०६॥
jaṭā mukuṭa surasarita sira locana nalina bisāla|
nīlakaṃṭha lāvanyanidhi soha bālabidhu bhāla|| 106||
Meaning उनके सिरपर जटाओंका मुकुट और गड़ाजी [ शोभायमान] थीं। कमलके समान बड़े-बड़े नेत्र थे। उनका नील कण्ठ था और वे सुन्दरताके भण्डार थे। उनके मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्रमा शोभित था॥ १०६॥
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥
पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी॥
baiṭhe soha kāmaripu kaiseṃ| dhareṃ sarīru sāṃtarasu jaiseṃ||
pārabatī bhala avasaru jānī| gaī saṃbhu pahiṃ mātu bhavānī||
Meaning कामदेवके शत्रु शिवजी वहाँ बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो शान्तरस ही शरीर धारण किये बैठा हो। अच्छा मौका जानकर शिवपत्नी माता पार्वतीजी उनके पास गयीं॥ १॥
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥
बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई॥
jāni priyā ādaru ati kīnhā| bāma bhāga āsanu hara dīnhā||
baiṭhīṃ siva samīpa haraṣāī| pūruba janma kathā cita āī||
Meaning अपनी प्यारी पत्नी जानकर शिवजीने उनका बहुत आदर-सत्कार किया और अपनी बायीं ओर बेठनेके लिये आसन दिया। पार्वतीजी प्रसन्न होकर शिवजीके पास बैठ गयीं। उन्हें पिछले जन्मकी कथा स्मरण हो आयी॥ २॥
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥
कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी॥
pati hiyam̐ hetu adhika anumānī| bihasi umā bolīṃ priya bānī||
kathā jo sakala loka hitakārī| soi pūchana caha sailakumārī||
Meaning स्वामीके हृदयमें [ अपने ऊपर पहलेकी अपेक्षा] अधिक प्रेम समझकर पार्वतीजी हँसकर प्रिय वचन बोलीं। [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं कि ] जो कथा सब लोगोंका हित करनेवाली है, उसे ही पार्वतीजी पूछना चाहती हैं॥ ३॥
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥
चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा॥
bisvanātha mama nātha purārī| tribhuvana mahimā bidita tumhārī||
cara aru acara nāga nara devā| sakala karahiṃ pada paṃkaja sevā||
Meaning [ पार्वतीजीने कहा--_] हे संसारके स्वामी ! हे मेरे नाथ ! हे त्रिपुरासुरका वध करनेवाले ! आपकी महिमा तीनों लोकोंमें विख्यात है। चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सभी आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं॥ ४॥
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम॥ १०४॥
prabhu samaratha sarbagya siva sakala kalā guna dhāma|
joga gyāna bairāgya nidhi pranata kalapataru nāma|| 104||
Meaning हे प्रभो ! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं। सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं। आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है॥ १०७॥
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥
तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥
jauṃ mo para prasanna sukharāsī| jānia satya mohi nija dāsī||
tauṃ prabhu harahu mora agyānā| kahi raghunātha kathā bidhi nānā||
Meaning हे सुखकी राशि! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी [या अपनी सच्ची दासी] जानते हैं, तो हे प्रभो ! आप श्रीरघुनाथजीकी नाना प्रकारकी कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कोजिये॥ १॥
जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥
jāsu bhavanu surataru tara hoī| sahi ki daridra janita dukhu soī||
sasibhūṣana asa hṛdayam̐ bicārī| harahu nātha mama mati bhrama bhārī||
Meaning जिसका घर कल्पवृक्षके नीचे हो, वह भला दखितासे उत्पन्न दुःखको क्यों सहेगा? हे. शशिभूषण! हे. नाथ! हृदयमें ऐसा विचारकर मेरी बुद्धिकि भारी श्रमको दूर कीजिये॥ २॥
प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी॥
सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना॥
prabhu je muni paramārathabādī| kahahiṃ rāma kahum̐ brahma anādī||
sesa sāradā beda purānā| sakala karahiṃ raghupati guna gānā||
Meaning हे प्रभो ! जो परमार्थतत््व (ब्रह्म) के ज्ञाता और वक्ता मुनि हैं, वे श्रीरामचन्द्रजीको अनादि ब्रह्म कहते हैं; और शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सभी श्रीरघुनाथजीका गुण गाते हैं॥ ३॥
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥
tumha puni rāma rāma dina rātī| sādara japahu anam̐ga ārātī||
rāmu so avadha nṛpati suta soī| kī aja aguna alakhagati koī||
Meaning और हे कामदेवके शत्रु! आप भी दिन-रात आदरपूर्वक राम-राम जपा करते हैं। ये राम वही अयोध्याके राजाके पुत्र हैं ? या अजन्मा, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं ?॥ ४॥
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि॥ १०८॥
jauṃ nṛpa tanaya ta brahma kimi nāri biraham̐ mati bhori|
dekha carita mahimā sunata bhramati buddhi ati mori|| 108||
Meaning यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे ? [ और यदि ब्रह्म हैं तो] स्त्रीके विरहमें उनकी मति बावली कैसे हो गयी ? इधर उनके ऐसे चरित्र देखकर और उधर उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यन्त चकरा रही है॥ १०८॥
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥
jauṃ anīha byāpaka bibhu koū| kabahu bujhāi nātha mohi soū||
agya jāni risa ura jani dharahū| jehi bidhi moha miṭai soi karahū||
Meaning यदि इच्छारहित, व्यापक, समर्थ ब्रह्म कोई और है, तो हे नाथ! मुझे उसे समझाकर कहिये। मुझे नादान समझकर मनमें क्रोध न लाइये। जिस तरह मेरा मोह दूर हो, वही कीजिये॥ १॥
मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥
तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥
mai bana dīkhi rāma prabhutāī| ati bhaya bikala na tumhahi sunāī||
tadapi malina mana bodhu na āvā| so phalu bhalī bhām̐ti hama pāvā||
Meaning मैंने [ पिछले जन्ममें] वनमें श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुता देखी थी, परन्तु अत्यन्त भयभीत होनेके कारण मैंने वह बात आपको सुनायी नहीं। तो भी मेरे मलिन मनको बोध न हुआ। उसका फल भी मैंने अच्छी तरह पा लिया॥ २॥
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥
ajahūm̐ kachu saṃsau mana more| karahu kṛpā binavaum̐ kara joreṃ||
prabhu taba mohi bahu bhām̐ti prabodhā| nātha so samujhi karahu jani krodhā||
Meaning अब भी मेरे मनमें कुछ सन्देह है। आप कृपा कीजिये, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। हे प्रभो ! आपने उस समय मुझे बहुत तरहसे समझाया था [फिर भी मेरा सन्देह नहीं गया], हे नाथ! यह सोचकर मुझपर क्रोध न कीजिये॥ ३॥
तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं॥
कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा॥
taba kara asa bimoha aba nāhīṃ| rāmakathā para ruci mana māhīṃ||
kahahu punīta rāma guna gāthā| bhujagarāja bhūṣana suranāthā||
Meaning मुझे अब पहले-जैसा मोह नहीं है, अब तो मेरे मनमें रामकथा सुननेकी रुचि है। हे शेषनागको अलंकारूुूपमें धारण करनेवाले देवताओंके नाथ! आप श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी पवित्र कथा कहिये॥ ४॥
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि॥ १०९॥
baṃdau pada dhari dharani siru binaya karaum̐ kara jori|
baranahu raghubara bisada jasu śruti siddhāṃta nicori|| 109||
Meaning मैं पृथ्वीपर सिर टेककर आपके चरणोंकी वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। आप वेदोंके सिद्धान्तको निचोड़कर श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन कीजिये॥ १०९॥
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥
गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥
jadapi joṣitā nahiṃ adhikārī| dāsī mana krama bacana tumhārī||
gūṛhau tatva na sādhu durāvahiṃ| ārata adhikārī jaham̐ pāvahiṃ||
Meaning यद्यपि स्त्री होनेके कारण मैं उसे सुननेकी अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्मसे आपकी दासी हूँ। संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते॥ १॥
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी॥
ati ārati pūchaum̐ surarāyā| raghupati kathā kahahu kari dāyā||
prathama so kārana kahahu bicārī| nirguna brahma saguna bapu dhārī||
Meaning हे देवताओंके स्वामी! मैं बहुत ही आर्तभाव (दीनता) से पूछती हूँ, आप मुझपर दया करके श्रीरघुनाथजीकी कथा कहिये। पहले तो वह कारण विचारकर बतलाइये जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है॥ २॥
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥
कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं॥
puni prabhu kahahu rāma avatārā| bālacarita puni kahahu udārā||
kahahu jathā jānakī bibāhīṃ| rāja tajā so dūṣana kāhīṃ||
Meaning फिर हे प्रभु ! श्रीरामचन्द्रजीके अवतार (जन्म) की कथा कहिये तथा उनका उदार बालचरित्र कहिये। फिर जिस प्रकार उन्होंने श्रीजनकीजीसे विवाह किया, वह कथा कहिये और फिर यह बतलाइये कि उन्होंने जो राज्य छोड़ा सो किस दोषसे॥ ३॥
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला॥
bana basi kīnhe carita apārā| kahahu nātha jimi rāvana mārā||
rāja baiṭhi kīnhīṃ bahu līlā| sakala kahahu saṃkara sukhalīlā||
Meaning हे नाथ! फिर उन्होंने वनमें रहकर जो अपार चरित्र किये तथा जिस तरह रावणको मारा, वह कहिये। हे सुखस्वरूप श्र ! फिर आप उन सारी लीलाओंको कहिये जो उन्होंने राज्य [ सिंहासन। पर बैठकर की थीं॥ ४॥
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम॥ ११०॥
bahuri kahahu karunāyatana kīnha jo acaraja rāma|
prajā sahita raghubaṃsamani kimi gavane nija dhāma|| 110||
Meaning हे कृपाधाम! फिर वह अद्भुत चरित्र कहिये जो श्रीरामचन्द्रजीने किया--वे रघुकुलशिरोमणि प्रजासहित किस प्रकार अपने धामको गये ?॥ ११०॥
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा॥
puni prabhu kahahu so tatva bakhānī| jehiṃ bigyāna magana muni gyānī||
bhagati gyāna bigyāna birāgā| puni saba baranahu sahita bibhāgā||
Meaning हे प्रभु! फिर आप उस तत््वको समझाकर कहिये, जिसकी अनुभूतिमें ज्ञानी मुनिगण सदा मग्र रहते हैं; और फिर भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यका विभागसहित वर्णन कीजिये॥ १॥
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥
जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई॥
aurau rāma rahasya anekā| kahahu nātha ati bimala bibekā||
jo prabhu maiṃ pūchā nahi hoī| sou dayāla rākhahu jani goī||
Meaning [इसके सिवा] श्रीरामचन्द्रजीके और भी जो अनेक रहस्य (छिपे हुए भाव अथवा चरित्र) हैं, उनको कहिये। हे नाथ! आपका ज्ञान अत्यन्त निर्मल है। हे प्रभो! जो बात मैंने न भी पूछी हो, हे दयालु! उसे भी आप छिपा न रखियेगा॥ २॥
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना॥
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई॥
tumha tribhuvana gura beda bakhānā| āna jīva pām̐vara kā jānā||
prasna umā kai sahaja suhāī| chala bihīna suni siva mana bhāī||
Meaning वेदोंने आपको तीनों लोकोंका गुरु कहा है। दूसरे पामर जीव इस रहस्यको क्या जानें ! पार्वतीजीके सहज सुन्दर और छलरहित (सरल) प्रश्न सुनकर शिवजीके मनको बहुत अच्छे लगे॥ ३॥
हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए॥
श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा॥
hara hiyam̐ rāmacarita saba āe| prema pulaka locana jala chāe||
śrīraghunātha rūpa ura āvā| paramānaṃda amita sukha pāvā||
Meaning श्रीमहादेवजीके हृदयमें सारे रामचरित्र आ गये। प्रेमके मारे उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें जल भर आया। श्रीरघुनाथजीका रूप उनके हृदयमें आ गया, जिससे स्वयं परमानन्दस्वरूप शिवजीने भी अपार सुख पाया॥ ४॥
मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।
रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह॥ १११॥
magana dhyānarasa daṃḍa juga puni mana bāhera kīnha|
raghupati carita mahesa taba haraṣita baranai līnha|| 111||
Meaning शिवजी दो घड़ीतक ध्यानके रस (आनन्द) में डूबे रहे; फिर उन्होंने मनको बाहर खींचा और तब वे प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजीका चरित्र वर्णन करने लगे॥ १११॥
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥
jhūṭheu satya jāhi binu jāneṃ| jimi bhujaṃga binu raju pahicāneṃ||
jehi jāneṃ jaga jāi herāī| jāgeṃ jathā sapana bhrama jāī||
Meaning जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सीमें साँपका भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेनेपर जगत्का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागनेपर स्वप्रका भ्रम जाता रहता है॥ १॥
बंदउँ बालरूप सोई रामू।
सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
baṃdaum̐ bālarūpa soī rāmū| saba sidhi sulabha japata jisu nāmū maṃgala bhavana amaṃgala hārī| dravau so dasaratha ajira bihārī||
Meaning मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीके बालरूपकी वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपनेसे सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मज़लके धाम, अमड़लके हरनेवाले और श्रीदशरथजीके आँगनमें खेलनेवाले वे (बालरूप) श्रीरामचन्द्रजी मुझपर कृपा करें॥ २॥
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥
kari pranāma rāmahi tripurārī| haraṣi sudhā sama girā ucārī||
dhanya dhanya girirājakumārī| tumha samāna nahiṃ kou upakārī||
Meaning त्रिपुरासुरका वध करनेवाले शिवजी श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके आनन्दमें भरकर अमृतके समान वाणी बोले--हे गिरिराजकुमारी पार्वती! तुम धन्य हो! धन्य हो! ! तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है॥ ३॥
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा॥
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित लागी॥
pūm̐chehu raghupati kathā prasaṃgā| sakala loka jaga pāvani gaṃgā||
tumha raghubīra carana anurāgī| kīnhahu prasna jagata hita lāgī||
Meaning जो तुमने श्रीरघुनाथजीकी कथाका प्रसड़ पूछा है, जो कथा समस्त लोकोंके लिये जगत्को पवित्र करनेवाली गड़ाजीके समान है। तुमने जगत्के कल्याणके लिये ही प्रश्न पूछे हैं। तुम श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम रखनेवाली हो॥ ४॥
रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।
rāmakṛpā teṃ pārabati sapanehum̐ tava mana māhiṃ|
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं॥ ११२॥
soka moha saṃdeha bhrama mama bicāra kachu nāhiṃ|| 112||
Meaning हे पार्वती! मेरे विचारमें तो श्रीरामजीकी कृपासे तुम्हारे मनमें स्वप्रमें भी शोक, मोह, सन्देह और भ्रम कुछ भी नहीं है॥ ११२॥
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥
tadapi asaṃkā kīnhihu soī| kahata sunata saba kara hita hoī||
jinha hari kathā sunī nahiṃ kānā| śravana raṃdhra ahibhavana samānā||
Meaning फिर भी तुमने इसीलिये वही (पुरानी) शड्जा की है कि इस प्रसड्के कहने-सुननेसे सबका कल्याण होगा। जिन्होंने अपने कानोंसे भगवान्की कथा नहीं सुनी, उनके कानोंके छिद्र साँपके बिलके समान हैं॥ १॥
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥
ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥
nayananhi saṃta darasa nahiṃ dekhā| locana morapaṃkha kara lekhā||
te sira kaṭu tuṃbari samatūlā| je na namata hari gura pada mūlā||
Meaning जिन्होंने अपने नेत्रोंसे संतोंके दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोरके पंखोंपर दीखनेवाली नकली आँखोंकी गिनतीमें हैं। वे सिर कड़वी तूँबीके समान हैं, जो श्रीहरि और गुरुके चरणतलपर नहीं झुकते॥ २॥
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥
जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥
jinha haribhagati hṛdayam̐ nahiṃ ānī| jīvata sava samāna tei prānī||
jo nahiṃ karai rāma guna gānā| jīha so dādura jīha samānā||
Meaning जिन्होंने भगवान्की भक्तिको अपने हृदयमें स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीते हुए ही मुर्देके समान हैं। जो जीभ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान है॥ ३॥
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥
kulisa kaṭhora niṭhura soi chātī| suni haricarita na jo haraṣātī||
girijā sunahu rāma kai līlā| sura hita danuja bimohanasīlā||
Meaning वह हृदय वज्रके समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान्के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजीकी लीला सुनो, यह देवताओंका कल्याण करनेवाली और दैत्योंको विशेषरूपसे मोहित करनेवाली है॥ ४॥
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि॥ ११३॥
rāmakathā suradhenu sama sevata saba sukha dāni|
satasamāja suraloka saba ko na sunai asa jāni|| 113||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कामधेनुके समान सेवा करनेसे सब सुखोंको देनेवाली है, और सत्पुरुषोंके समाज ही सब देवताओंके लोक हैं, ऐसा जानकर इसे कौन न सुनेगा!॥ ११३॥
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी॥
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥
rāmakathā suṃdara kara tārī| saṃsaya bihaga uḍāvanihārī||
rāmakathā kali biṭapa kuṭhārī| sādara sunu girirājakumārī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी कथा हाथकी सुन्दर ताली है, जो सन्देहरूपी पक्षियोंको उड़ा देती है। फिर रामकथा कलियुगरूपी वृक्षको काटनेके लिये कुल्हाड़ी है। हे गिरिराजकुमारी! तुम इसे आदरपूर्वक सुनो॥ १॥
राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए॥
जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥
rāma nāma guna carita suhāe| janama karama aganita śruti gāe||
jathā anaṃta rāma bhagavānā| tathā kathā kīrati guna nānā||
Meaning वेदोंने श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर नाम, गुण, चरित्र, जन्म और कर्म सभी अनगिनत कहे हैं। जिस प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उसी तरह उनकी कथा, कीर्ति और गुण भी अनन्त हैं॥ २॥
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी॥
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई॥
tadapi jathā śruta jasi mati morī| kahihaum̐ dekhi prīti ati torī||
umā prasna tava sahaja suhāī| sukhada saṃtasaṃmata mohi bhāī||
Meaning तो भी तुम्हारी अत्यन्त प्रीति देखकर, जैसा कुछ मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसीके अनुसार मैं कहूँगा। हे पार्वती ! तुम्हारा प्रश्न स्वाभाविक ही सुन्दर, सुखदायक और संतसम्मत है और मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा है॥ ३॥
एक बात नहि मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥
तुम जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥
eka bāta nahi mohi sohānī| jadapi moha basa kahehu bhavānī||
tuma jo kahā rāma kou ānā| jehi śruti gāva dharahiṃ muni dhyānā||
Meaning परन्तु हे पार्वती ! एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि वह तुमने मोहके वश होकर ही कही है। तुमने जो यह कहा कि वे राम कोई और हैं, जिन्हें वेद गाते और मुनिजन जिनका ध्यान धरते हैं--॥ ४॥
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच॥ ११४॥
kahahi sunahi asa adhama nara grase je moha pisāca|
pāṣaṃḍī hari pada bimukha jānahiṃ jhūṭha na sāca|| 114||
Meaning जो मोहरूपी पिशाचके द्वारा ग्रस्त हैं, पाखण्डी हैं, भगवान्के चरणोंसे विमुख हैं और जो झूठ- सच कुछ भी नहीं जानते, ऐसे अधम मनुष्य ही इस तरह कहते-सुनते हैं॥ ११४॥
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी॥
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥
agya akobida aṃdha abhāgī| kāī biṣaya mukara mana lāgī||
laṃpaṭa kapaṭī kuṭila biseṣī| sapanehum̐ saṃtasabhā nahiṃ dekhī||
Meaning जो आज्ञानी, मूर्ख, अंधे और भाग्यहीन हैं और जिनके मनरूपी दर्पणपर विषयरूपी काई जमी हुई है; जो व्यभिचारी, छली और बड़े कुटिल हैं और जिन्होंने कभी स्वप्रमें भी संत-समाजके दर्शन नहीं किये;॥ १॥
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥
kahahiṃ te beda asaṃmata bānī| jinha keṃ sūjha lābhu nahiṃ hānī||
mukara malina aru nayana bihīnā| rāma rūpa dekhahiṃ kimi dīnā||
Meaning और जिन्हें अपनी लाभ-हानि नहीं सूझती, वे ही ऐसी वेदविरुद्ध बातें कहा करते हैं। जिनका हृदयरूपी दर्पण मैला है और जो नेत्रोंसे हीन हैं, वे बेचारे श्रीरामचन्द्रजीका रूप कैसे देखें!॥ २॥
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥
jinha keṃ aguna na saguna bibekā| jalpahiṃ kalpita bacana anekā||
harimāyā basa jagata bhramāhīṃ| tinhahi kahata kachu aghaṭita nāhīṃ||
Meaning जिनको निर्गुण-सगुणका कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें बका करते हैं, जो श्रीहरिकी मायाके वशमें होकर जगतमें (जन्म-मृत्युके चक्रमें) भ्रमते फिरते हैं, उनके लिये कुछ भी कह डालना असम्भव नहीं है॥ ३॥
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन् कर कहा करिअ नहिं काना॥
bātula bhūta bibasa matavāre| te nahiṃ bolahiṃ bacana bicāre||
jinha kṛta mahāmoha mada pānā| tin kara kahā karia nahiṃ kānā||
Meaning जिन्हें वायुका रोग (सन्निपात, उन्माद आदि) हो गया हो, जो भूतके वश हो गये हैं और जो नशेमें चूर हैं, ऐसे लोग विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोहरूपी मदिरा पी रखी है, उनके कहनेपर कान न देना चाहिये॥ ४॥
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम॥ २१५॥
asa nija hṛdayam̐ bicāri taju saṃsaya bhaju rāma pada|
sunu girirāja kumāri bhrama tama rabi kara bacana mama|| 215||
Meaning अपने हृदयमें ऐसा विचारकर सन्देह छोड़ दो और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको भजो। हे पार्वती ! भ्रमरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके समान मेरे वचनोंको सुनो!॥ ११५॥
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥
sagunahi agunahi nahiṃ kachu bhedā| gāvahiṃ muni purāna budha bedā||
aguna arupa alakha aja joī| bhagata prema basa saguna so hoī||
Meaning सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है--मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख ( अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है॥ १॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥
jo guna rahita saguna soi kaiseṃ| jalu hima upala bilaga nahiṃ jaiseṃ||
jāsu nāma bhrama timira pataṃgā| tehi kimi kahia bimoha prasaṃgā||
Meaning जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है ? जैसे जल और ओलेमें भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।) जिसका नाम श्रमरूपी अन्धकारके मिटानेके लिये सूर्य है, उसके लिये मोहका प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है?॥ २॥
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥
सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥
rāma saccidānaṃda dinesā| nahiṃ taham̐ moha nisā lavalesā||
sahaja prakāsarupa bhagavānā| nahiṃ taham̐ puni bigyāna bihānā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोहरूपी रात्रिका लवलेश भी नहीं है। वे स्वभावसे ही प्रकाशरूप और [षडैथ्चर्ययुक्त] भगवान् हैं, वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रात:काल भी नहीं होता। (अज्ञानरूपी रात्रि हो तब तो विज्ञानरूपी प्रात:काल हो; भगवान् तो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं।)॥ ३॥
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना॥
haraṣa biṣāda gyāna agyānā| jīva dharma ahamiti abhimānā||
rāma brahma byāpaka jaga jānā| paramānanda paresa purānā||
Meaning हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान--ये सब जीवके धर्म हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराणपुरुष हैं। इस बातको सारा जगत् जानता है॥ ४॥
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥ ११६॥
puruṣa prasiddha prakāsa nidhi pragaṭa parāvara nātha|
raghukulamani mama svāmi soi kahi sivam̐ nāyau mātha|| 116||
Meaning जो [पुराण] पुरुष प्रसिद्ध हैं, प्रकाशके भण्डार हैं, सब रूपोंमें प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् सबके स्वामी हैं, वे ही रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं--ऐसा कहकर शिवजीने उनको मस्तक नवाया॥ ११६॥
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ मानु कहहिं कुबिचारी॥
nija bhrama nahiṃ samujhahiṃ agyānī| prabhu para moha dharahiṃ jaṛa prānī||
jathā gagana ghana paṭala nihārī| jhām̐peu mānu kahahiṃ kubicārī||
Meaning अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रमको तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्रीरामचन्द्रजीपर उसका आरोप करते हैं, जैसे आकाशमें बादलोंका पर्दा देखकर कुविचारी ( अज्ञानी) लोग कहते हैं कि बादलोंने सूर्यको ढक लिया॥ १॥
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥
citava jo locana aṃguli lāem̐| pragaṭa jugala sasi tehi ke bhāem̐||
umā rāma biṣaika asa mohā| nabha tama dhūma dhūri jimi sohā||
Meaning जो मनुष्य आँखमें उँगली लगाकर देखता है, उसके लिये तो दो चन्द्रमा प्रकट (प्रत्यक्ष) हैं। हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें इस प्रकार मोहकी कल्पना करना वैसा ही है जैसा आकाशमें अन्धकार, धूएँ और धूलका सोहना (दीखना)। [ आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं]॥ २॥
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥
biṣaya karana sura jīva sametā| sakala eka teṃ eka sacetā||
saba kara parama prakāsaka joī| rāma anādi avadhapati soī||
Meaning विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके देवता और जीवात्मा--ये सब एककी सहायतासे एक चेतन होते हैं। (अर्थात् विषयोंका प्रकाश इन्द्रियोंसे, इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके देवताओंसे और इन्द्रियदेवताओंका चेतन जीवात्मासे प्रकाश होता है।) इन सबका जो परम प्रकाशक है (अर्थात् जिससे इन सबका प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं॥ ३॥
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
जासु सत्यता तें जड माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥
jagata prakāsya prakāsaka rāmū| māyādhīsa gyāna guna dhāmū||
jāsu satyatā teṃ jaḍa māyā| bhāsa satya iva moha sahāyā||
Meaning यह जगत् प्रकाश्य है और श्रीरामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे मायाके स्वामी और ज्ञान तथा गुणोंके धाम हैं। जिनकी सत्तासे, मोहकी सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य-सी भासित होती है॥ ४॥
रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥ ११७॥
rajata sīpa mahum̐ māsa jimi jathā bhānu kara bāri|
jadapi mṛṣā tihum̐ kāla soi bhrama na sakai kou ṭāri|| 117||
Meaning जैसे सीपमें चाँदीकी और सूर्यकी किरणोंमें पानीकी [बिना हुए भी प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालोंमें झूठ है, तथापि इस श्रमको कोई हटा नहीं सकता॥ ११७॥
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥
जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥
ehi bidhi jaga hari āśrita rahaī| jadapi asatya deta dukha ahaī||
jauṃ sapaneṃ sira kāṭai koī| binu jāgeṃ na dūri dukha hoī||
Meaning इसी तरह यह संसार भगवान्के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दु:ख तो देता ही है; जिस तरह स्वप्रमें कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता॥ १॥
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥
आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥
jāsu kṛpām̐ asa bhrama miṭi jāī| girijā soi kṛpāla raghurāī||
ādi aṃta kou jāsu na pāvā| mati anumāni nigama asa gāvā||
Meaning हे पार्वती ! जिनकी कृपासे इस प्रकारका श्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अन्त किसीने नहीं [जान] पाया। वेदोंने अपनी बुद्धिसे अनुमान करके इस प्रकार (नीचे लिखे अनुसार) गाया है--॥ २॥
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
binu pada calai sunai binu kānā| kara binu karama karai bidhi nānā||
ānana rahita sakala rasa bhogī| binu bānī bakatā baṛa jogī||
Meaning वह (ब्रह्म) बिना ही पैरके चलता है, बिना ही कानके सुनता है, बिना ही हाथके नाना प्रकारके काम करता है, बिना मुँह (जिह्ला) के ही सारे (छहों) रसोंका आनन्द लेता है और बिना ही वाणीके बहुत योग्य वक्ता है॥ ३॥
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥
tanu binu parasa nayana binu dekhā| grahai ghrāna binu bāsa aseṣā||
asi saba bhām̐ti alaukika karanī| mahimā jāsu jāi nahiṃ baranī||
Meaning वह बिना ही शरीर (त्वचा) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखोंके देखता है और बिना ही नाकके सब गन्धोंको ग्रहण करता है (सूँघता है )। उस ब्रह्मकी करनी सभी प्रकारसे ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती॥ ४॥
जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
jehi imi gāvahi beda budha jāhi dharahiṃ muni dhyāna|
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥ २१८॥
soi dasaratha suta bhagata hita kosalapati bhagavāna|| 218||
Meaning जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनन्दन, भक्तोंके हितकारी, अयोध्याके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं॥ ११८॥
कासीं मरत जंतु अवलोकी।
जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥
kāsīṃ marata jaṃtu avalokī| jāsu nāma bala karaum̐ bisokī||
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी।
रघुबर सब उर अंतरजामी॥
soi prabhu mora carācara svāmī| raghubara saba ura aṃtarajāmī||
Meaning [ हे पार्वती !] जिनके नामके बलसे काशीमें मरते हुए प्राणीको देखकर मैं उसे [ राममन्त्र देकर] शोकरहित कर देता हूँ (मुक्त कर देता हूँ), वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़-चेतनके स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं॥ १॥
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥
bibasahum̐ jāsu nāma nara kahahīṃ| janama aneka racita agha dahahīṃ||
sādara sumirana je nara karahīṃ| bhava bāridhi gopada iva tarahīṃ||
Meaning विवश होकर (बिना इच्छाके) भी जिनका नाम लेनेसे मनुष्योंके अनेक जन्मोंमें किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [दुस्तर] समुद्रको गायके खुरसे बने हुए गड्ढ़ेके समान (अर्थात् बिना किसी परिश्रमके) पार कर जाते हैं॥ २॥
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥
rāma so paramātamā bhavānī| taham̐ bhrama ati abihita tava bānī||
asa saṃsaya ānata ura māhīṃ| gyāna birāga sakala guna jāhīṃ||
Meaning हे पार्वती ! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं। उनमें भ्रम [ देखनेमें आता है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है। इस प्रकारका सन्देह मनमें लाते ही मनुष्यके ज्ञान, वैराग्य आदि सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं॥ ३॥
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥
suni siva ke bhrama bhaṃjana bacanā| miṭi gai saba kutaraka kai racanā||
bhai raghupati pada prīti pratītī| dāruna asaṃbhāvanā bītī||
Meaning शिवजीके श्रमनाशक वचनोंको सुनकर पार्वतीजीके सब कुतरकॉँकी रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना (जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिध्या कल्पना) जाती रही॥ ४॥
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥ ११९॥
puni puni prabhu pada kamala gahi jori paṃkaruha pāni|
bolī girijā bacana bara manahum̐ prema rasa sāni|| 119||
Meaning बार-बार स्वामी (शिवजी ) के चरणकमलोंको पकड़कर और अपने कमलके समान हाथोंको जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरसमें सानकर सुन्दर वचन बोलीं॥ ११९॥
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ॥
sasi kara sama suni girā tumhārī| miṭā moha saradātapa bhārī||
tumha kṛpāla sabu saṃsau hareū| rāma svarupa jāni mohi pareū||
Meaning आपकी चन्द्रमाकी किरणोंके समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञानरूपी शरद्ू ऋतु ( कवार) की धूपका भारी ताप मिट गया। हे कृपालु! आपने मेरा सब सन्देह हर लिया, अब श्रीरामचन्द्रजीका यथार्थ स्वरूप मेरी समझमें आ गया॥ १॥
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा॥
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी॥
nātha kṛpām̐ aba gayau biṣādā| sukhī bhayaum̐ prabhu carana prasādā||
aba mohi āpani kiṃkari jānī| jadapi sahaja jaḍa nāri ayānī||
Meaning हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणोंके अनुग्रहसे मैं सुखी हो गयी। यद्यपि मैं स्त्री होनेके कारण स्वभावसे ही मूर्ख और ज्ञानहीन हूँ, तो भी अब आप मुझे अपनी दासी जानकर--॥ २॥
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी॥
prathama jo maiṃ pūchā soi kahahū| jauṃ mo para prasanna prabhu ahahū||
rāma brahma cinamaya abināsī| sarba rahita saba ura pura bāsī||
Meaning हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये। [यह सत्य है कि ] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं॥ ३॥
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता॥
nātha dhareu naratanu kehi hetū| mohi samujhāi kahahu bṛṣaketū||
umā bacana suni parama binītā| rāmakathā para prīti punītā||
Meaning फिर हे नाथ! उन्होंने मनुष्यका शरीर किस कारणसे धारण किया? हे धर्मकी ध्वजा धारण करनेवाले प्रभो! यह मुझे समझाकर कहिये। पार्वतीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीकी कथामें उनका विशुद्ध प्रेम देखकर--॥ ४॥
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान।
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान॥ १२० ( क )॥
hiṃyam̐ haraṣe kāmāri taba saṃkara sahaja sujāna|
bahu bidhi umahi prasaṃsi puni bole kṛpānidhāna|| 120 ( ka )||
Meaning तब कामदेवके शत्रु, स्वाभाविक ही सुजान, कृपानिधान शिवजी मनमें बहुत ही हर्षित हुए और बहुत प्रकारसे पार्वतीकी बड़ाई करके फिर बोले--॥ १२० (क)॥