जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥
तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥
jeṃhi samāja baiṃṭhe muni jāī| hṛdayam̐ rūpa ahamiti adhikāī||
taham̐ baiṭha mahesa gana doū| biprabeṣa gati lakhai na koū||
Meaning नारदजी अपने हृदयमें रूपका बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजीके दोनों गण भी वहीं बैठ गये। ब्राह्मणके वेषमें होनेके कारण उनकी इस चालकों कोई न जान सका॥ १॥
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥
karahiṃ kūṭi nāradahi sunāī| nīki dīnhi hari suṃdaratāī||
rījhahi rājakuam̐ri chabi dekhī| inhahi barihi hari jāni biseṣī||
Meaning वे नारदजीको सुना-सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे--भगवान्ने इनको अच्छी ' सुन्दरता' दी है। इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जायगी और 'हरि' (वानर) जानकर इन्हींको खास तौरसे वरेगी॥ २॥
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥
munihi moha mana hātha parāem̐| ham̐sahiṃ saṃbhu gana ati sacu pāem̐||
jadapi sunahiṃ muni aṭapaṭi bānī| samujhi na parai buddhi bhrama sānī||
Meaning नारद मुनिको मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरेके हाथ (मायाके वश) में था। शिवजीके गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रममें सनी हुई होनेके कारण वे बातें उनकी समझमें नहीं आती थीं (उनकी बातोंको वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे)॥ ३॥
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥
मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥
kāhum̐ na lakhā so carita biseṣā| so sarūpa nṛpakanyām̐ dekhā||
markaṭa badana bhayaṃkara dehī| dekhata hṛdayam̐ krodha bhā tehī||
Meaning इस विशेष चरितको और किसीने नहीं जाना, केवल राजकन्याने [ नारदजीका] वह रूप देखा। उनका बन्दरका-सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्याके हदयमें क्रोध उत्पन्न हो गया॥ ४॥
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥ १३४॥
sakhīṃ saṃga lai kuam̐ri taba cali janu rājamarāla|
dekhata phirai mahīpa saba kara saroja jayamāla|| 134||
Meaning तब राजकुमारी सखियोंको साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है। वह अपने कमल-जैसे हाथोंमें जयमाला लिये सब राजाओंको देखती हुई घूमने लगी॥ १३४॥
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं॥
jehi disi baiṭhe nārada phūlī| so disi dehi na bilokī bhūlī||
puni puni muni ukasahiṃ akulāhīṃ| dekhi dasā hara gana musakāhīṃ||
Meaning जिस ओर नारदजी [रूपके गर्वमें ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजीके गण मुसकराते हैं॥ १॥
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥
dhari nṛpatanu taham̐ gayau kṛpālā| kuam̐ri haraṣi meleu jayamālā||
dulahini lai ge lacchinivāsā| nṛpasamāja saba bhayau nirāsā||
Meaning कृपालु भगवान् भी राजाका शरीर धारण कर वहाँ जा पहुँचे। राजकुमारीने हर्षित होकर उनके गलेमें जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान् दुलहिनको ले गये। सारी राजमण्डली निराश हो गयी॥ २॥
मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥
तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥
muni ati bikala moṃham̐ mati nāṭhī| mani giri gaī chūṭi janu gām̐ṭhī||
taba hara gana bole musukāī| nija mukha mukura bilokahu jāī||
Meaning मोहके कारण मुनिकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारीको गयी देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठसे छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजीके गणोंने मुसकराकर कहा-- जाकर दर्पणमें अपना मुँह तो देखिये!॥ ३॥
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥
asa kahi dou bhāge bhayam̐ bhārī| badana dīkha muni bāri nihārī||
beṣu biloki krodha ati bāṛhā| tinhahi sarāpa dīnha ati gāṛhā||
Meaning ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया॥ ४॥
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥ १३५॥
hohu nisācara jāi tumha kapaṭī pāpī dou|
ham̐sehu hamahi so lehu phala bahuri ham̐sehu muni kou|| 135||
Meaning तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनिकी हँसी करना॥ १३५॥
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥
फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं॥
puni jala dīkha rūpa nija pāvā| tadapi hṛdayam̐ saṃtoṣa na āvā||
pharakata adhara kopa mana māhīṃ| sapadī cale kamalāpati pāhīṃ||
Meaning मुनिने फिर जलमें देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मनमें क्रोध [भरा] था। तुरंत ही वे भगवान् कमलापतिके पास चले॥ १॥
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥
dehaum̐ śrāpa ki marihaum̐ jāī| jagata mora upahāsa karāī||
bīcahiṃ paṃtha mile danujārī| saṃga ramā soi rājakumārī||
Meaning [ मनमें सोचते जाते थे--] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगतमें मेरी हँसी करायी। दैत्योंके शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्तेमें ही मिल गये। साथमें लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं॥ २॥
बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥
bole madhura bacana surasāīṃ| muni kaham̐ cale bikala kī nāīṃ||
sunata bacana upajā ati krodhā| māyā basa na rahā mana bodhā||
Meaning देवताओंके स्वामी भगवान्ने मीठी वाणीमें कहा--हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले ? ये शब्द सुनते ही नारदको बड़ा क्रोध आया; मायाके वशीभूत होनेके कारण मनमें चेत नहीं रहा॥ ३॥
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु॥
para saṃpadā sakahu nahiṃ dekhī| tumhareṃ iriṣā kapaṭa biseṣī||
mathata siṃdhu rudrahi baurāyahu| suranha prerī biṣa pāna karāyahu||
Meaning [ मुनिने कहा--] तुम दूसरोंकी सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय तुमने शिवजीको बावला बना दिया और देवताओंको प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया॥ ४॥
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ १३६॥
asura surā biṣa saṃkarahi āpu ramā mani cāru|
svāratha sādhaka kuṭila tumha sadā kapaṭa byavahāru|| 136||
Meaning असुरोंको मदिरा और शिवजीको विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [कौस्तुभ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपटका व्यवहार करते हो॥ १३६॥
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥
parama svataṃtra na sira para koī| bhāvai manahi karahu tumha soī||
bhalehi maṃda maṃdehi bhala karahū| bisamaya haraṣa na hiyam̐ kachu dharahū||
Meaning तुम परम स्वतन्त्र हो, सिरपर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मनको भाता है, [ स्वच्छन्दतासे ] वही करते हो। भलेको बुरा और बुरेको भला कर देते हो। हृदयमें हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते॥ १॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥
ḍahaki ḍahaki paricehu saba kāhū| ati asaṃka mana sadā uchāhū||
karama subhāsubha tumhahi na bādhā| aba lagi tumhahi na kāhūm̐ sādhā||
Meaning सबको ठग-ठगकर परक गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसीसे [ठगनेके काममें ] मनमें सदा उत्साह रहता है। शुभ-अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते। अबतक तुमको किसीने ठीक नहीं किया था॥ २॥
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥
bhale bhavana aba bāyana dīnhā| pāvahuge phala āpana kīnhā||
baṃcehu mohi javani dhari dehā| soi tanu dharahu śrāpa mama ehā||
Meaning अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है (मेरे-जैसे जबर्दस्त आदमीसे छेड़खानी की है)। अत: अपने कियेका फल अवश्य पाओगे। जिस शरीरको धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है॥ ३॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥
kapi ākṛti tumha kīnhi hamārī| karihahiṃ kīsa sahāya tumhārī||
mama apakāra kīnhī tumha bhārī| nārī biraham̐ tumha hoba dukhārī||
Meaning तुमने हमारा रूप बन्दरका-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। [मैं जिस स्त्रीको चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्रीके वियोगमें दुःखी होगे॥ ४॥
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥ १३७॥
śrāpa sīsa dharī haraṣi hiyam̐ prabhu bahu binatī kīnhi|
nija māyā kai prabalatā karaṣi kṛpānidhi līnhi|| 137||
Meaning शापको सिरपर चढ़ाकर, हदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान्ने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली॥ १३७॥
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥
jaba hari māyā dūri nivārī| nahiṃ taham̐ ramā na rājakumārī||
taba muni ati sabhīta hari caranā| gahe pāhi pranatārati haranā||
Meaning जब भगवान्ने अपनी मायाको हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनिने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरिकि चरण पकड़ लिये और कहा--हे शरणागतके दु:खोंको हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये॥ १॥
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥
mṛṣā hou mama śrāpa kṛpālā| mama icchā kaha dīnadayālā||
maiṃ durbacana kahe bahutere| kaha muni pāpa miṭihiṃ kimi mere||
Meaning हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनोंपर दया करनेवाले भगवान्ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [से हुआ] है। मुनिने कहा--मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे 2॥ २॥
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥
japahu jāi saṃkara sata nāmā| hoihi hṛdayam̐ turaṃta biśrāmā||
kou nahiṃ siva samāna priya moreṃ| asi paratīti tajahu jani bhoreṃ||
Meaning [ भगवान्ने कहा-- ] जाकर शड्भरजीके शतनामका जप करो, इससे हदयमें तुरंत शान्ति होगी। शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना॥ ३॥
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥
jehi para kṛpā na karahiṃ purārī| so na pāva muni bhagati hamārī||
asa ura dhari mahi bicarahu jāī| aba na tumhahi māyā niarāī||
Meaning हे मुनि! पुरारि (शिवजी) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता। हृदयमें ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो। अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी॥ ४॥
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥ १३८॥
bahubidhi munihi prabodhi prabhu taba bhae aṃtaradhāna|
satyaloka nārada cale karata rāma guna gāna|| 138||
Meaning बहुत प्रकारसे मुनिको समझा-बुझाकर (ढाढ़स देकर) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारदजी श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान करते हुए सत्यलोक (ब्रहालोक) को चले॥ १३८॥
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी॥
अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥
hara gana munihi jāta patha dekhī| bigatamoha mana haraṣa biseṣī||
ati sabhīta nārada pahiṃ āe| gahi pada ārata bacana sunāe||
Meaning शिवजीके गणोंने जब मुनिको मोहरहित और मनमें बहुत प्रसन्न होकर मार्गमें जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजीके पास आये और उनके चरण पकड़कर दीन वचन बोले--॥ १॥
हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥
hara gana hama na bipra munirāyā| baṛa aparādha kīnha phala pāyā||
śrāpa anugraha karahu kṛpālā| bole nārada dīnadayālā||
Meaning हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिवजीके गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु ! अब शाप दूर करनेकी कृपा कीजिये। दीनोंपर दया करनेवाले नारदजीने कहा--॥ २॥
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥
nisicara jāi hohu tumha doū| baibhava bipula teja bala hoū||
bhujabala bisva jitaba tumha jahiā| dharihahiṃ biṣnu manuja tanu tahiā||
Meaning तुम दोनों जाकर राक्षस होओ; तुम्हें महान् ऐश्वर्य, तेज और बलकी प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओंके बलसे जब सारे विश्वको जीत लोगे, तब भगवान् विष्णु मनुष्यका शरीर धारण करेंगे॥ ३॥
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥
samara marana hari hātha tumhārā| hoihahu mukuta na puni saṃsārā||
cale jugala muni pada sira nāī| bhae nisācara kālahi pāī||
Meaning युद्धमें श्रीहरिके हाथसे तुम्हारी मृत्यु होगी, जिससे तुम मुक्त हो जाओगे और फिर संसारमें जन्म नहीं लोगे। वे दोनों मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर चले और समय पाकर राक्षस हुए॥ ४॥
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥ १३९॥
eka kalapa ehi hetu prabhu līnha manuja avatāra|
sura raṃjana sajjana sukhada hari bhaṃjana bhubi bhāra|| 139||
Meaning देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, सज्जनोंको सुख देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्ने एक कल्पमें इसी कारण मनुष्यका अवतार लिया था॥ १३९॥
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥
ehi bidhi janama karama hari kere| suṃdara sukhada bicitra ghanere||
kalapa kalapa prati prabhu avatarahīṃ| cāru carita nānābidhi karahīṃ||
Meaning इस प्रकार भगवान्के अनेकों सुन्दर, सुखदायक और अलौकिक जन्म और कर्म हैं। प्रत्येक कल्पमें जब-जब भगवान् अवतार लेते हैं और नाना प्रकारकी सुन्दर लीलाएँ करते हैं,॥ १॥
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥
taba taba kathā munīsanha gāī| parama punīta prabaṃdha banāī||
bibidha prasaṃga anūpa bakhāne| karahiṃ na suni ācaraju sayāne||
Meaning तब-तब मुनीश्वरोंने परम पवित्र काव्यरचना करके उनकी कथाओंका गान किया है और भाँति- भाँतिके अनुपम प्रसंगोंका वर्णन किया है, जिनको सुनकर समझदार (विवेकी) लोग आश्चर्य नहीं करते॥ २॥
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
hari anaṃta harikathā anaṃtā| kahahiṃ sunahiṃ bahubidhi saba saṃtā||
rāmacaṃdra ke carita suhāe| kalapa koṭi lagi jāhiṃ na gāe||
Meaning श्रीहरि अनन्त हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते-सुनते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पोंमें भी गाये नहीं जा सकते॥ ३॥
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुख हारी॥
yaha prasaṃga maiṃ kahā bhavānī| harimāyām̐ mohahiṃ muni gyānī||
prabhu kautukī pranata hitakārī| sevata sulabha sakala dukha hārī||
Meaning [शिवजी कहते हैं कि] हे पार्वती ! मैंने यह बतलानेके लिये इस प्रसंगको कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान्की मायासे मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी (लीलामय) हैं और शरणागतका हित करनेवाले हैं। वे सेवा करनेमें बहुत सुलभ और सब दुःखोंके हरनेवाले हैं॥ ४॥
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥ १४०॥
sura nara muni kou nāhiṃ jehi na moha māyā prabala|
asa bicāri mana māhiṃ bhajia mahāmāyā patihi|| 140||
Meaning देवता, मनुष्य और मुनियोंमें ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान्की महान् बलवती माया मोहित न कर दे। मनमें ऐसा विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवानका भजन करना चाहिये॥ १४०॥
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥
apara hetu sunu sailakumārī| kahaum̐ bicitra kathā bistārī||
jehi kārana aja aguna arūpā| brahma bhayau kosalapura bhūpā||
Meaning हे गिरिराजकुमारी ! अब भगवान्के अवतारका वह दूसरा कारण सुनो--मैं उसकी विचित्र कथा विस्तार करके कहता हूँ- जिस कारणसे जन्मरहित, निर्गुण और रूपरहित ( अव्यक्त सच्चिदानन्दघन) ब्रह्म अयोध्यापुरीके राजा हुए॥ १॥
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥
jo prabhu bipina phirata tumha dekhā| baṃdhu sameta dhareṃ munibeṣā||
jāsu carita avaloki bhavānī| satī sarīra rahihu baurānī||
Meaning जिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको तुमने भाई लक्ष्मणजीके साथ मुनियोंका-सा वेष धारण किये वनमें फिरते देखा था और हे भवानी! जिनके चरित्र देखकर सतीके शरीरमें तुम ऐसी बावली हो गयी थीं कि-॥२॥
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥
ajahum̐ na chāyā miṭati tumhārī| tāsu carita sunu bhrama ruja hārī||
līlā kīnhi jo tehiṃ avatārā| so saba kahihaum̐ mati anusārā||
Meaning अब भी तुम्हारे उस बावलेपनकी छाया नहीं मिटती, उन्हींके शभ्रमरूपी रोगके हरण करनेवाले चरित्र सुनो। उस अवतारमें भगवान्ने जो-जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हें कहूँगा॥ ३॥
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी॥
लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥
bharadvāja suni saṃkara bānī| sakuci saprema umā musakānī||
lage bahuri barane bṛṣaketū| so avatāra bhayau jehi hetū||
Meaning [ याज्ञवल्क्यजीने कहा--] हे भरद्वाज ! शड्रजीके वचन सुनकर पार्वतीजी सकुचाकर प्रेमसहित मुसकरायीं। फिर वृषकेतु शिवजी जिस कारणसे भगवान्का वह अवतार हुआ था, उसका वर्णन करने लगे॥ ४॥
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई।
राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥ १४९॥
so maiṃ tumha sana kahaum̐ sabu sunu munīsa mana lāī|
rāma kathā kali mala harani maṃgala karani suhāi|| 149||
Meaning हे मुनीश्वर भरद्वाज ! मैं वह सब तुमसे कहता हूँ, मन लगाकर सुनो। श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कलियुगके पापोंको हरनेवाली, कल्याण करनेवाली और बड़ी सुन्दर है॥ १४१॥
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥
दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥
svāyaṃbhū manu aru satarūpā| jinha teṃ bhai narasṛṣṭi anūpā||
daṃpati dharama ācarana nīkā| ajahum̐ gāva śruti jinha kai līkā||
Meaning स्वायम्भुव मनु और [उनकी पत्नी] शतरूपा, जिनसे मनुष्योंकी यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति-पत्नीके धर्म और आचरण बहुत अच्छे थे। आज भी वेद जिनकी मर्यादाका गान करते हैं॥ १॥
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू॥
लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही॥
nṛpa uttānapāda suta tāsū| dhruva hari bhagata bhayau suta jāsū||
laghu suta nāma priyrabrata tāhī| beda purāna prasaṃsahi jāhī||
Meaning राजा उत्तानपाद उनके पुत्र थे, जिनके पुत्र [प्रसिद्ध] हरिभक्त ध्रुवजी हुए। उन (मनुजी) के छोटे लड़केका नाम प्रियव्रत था, जिसकी प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं॥ २॥
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥
आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥
devahūti puni tāsu kumārī| jo muni kardama kai priya nārī||
ādideva prabhu dīnadayālā| jaṭhara dhareu jehiṃ kapila kṛpālā||
Meaning पुन: देवहूति उनकी कन्या थी, जो कर्दम मुनिकी प्यारी पत्नी हुई और जिन्होंने आदिदेव, दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ एवं कृपालु भगवान् कपिलको गर्भमें धारण किया॥ ३॥
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥
sāṃkhya sāstra jinha pragaṭa bakhānā| tatva bicāra nipuna bhagavānā||
tehiṃ manu rāja kīnha bahu kālā| prabhu āyasu saba bidhi pratipālā||
Meaning तत्त्वोंका विचार करनेमें अत्यन्त निपुण जिन (कपिल) भगवान्ने सांख्यशास्त्रका प्रकटरूपमें वर्णन किया, उन (स्वायम्भुव) मनुजीने बहुत समयतक राज्य किया और सब प्रकारसे भगवान्की आज्ञा [रूप शास्त्रोंकी मर्यादा] का पालन किया॥ ४॥
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥ १४२॥
hoi na biṣaya birāga bhavana basata bhā cauthapana|
hṛdayam̐ bahuta dukha lāga janama gayau haribhagati binu|| 142||
Meaning घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [इस बातको सोचकर] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया॥ १४२॥
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥
barabasa rāja sutahi taba dīnhā| nāri sameta gavana bana kīnhā||
tīratha bara naimiṣa bikhyātā| ati punīta sādhaka sidhi dātā||
Meaning तब मनुजीने अपने पुत्रको जबर्दस्ती राज्य देकर स्वयं स्त्रीसहित वनको गमन किया। अत्यन्त पवित्र और साधकोंको सिद्धि देनेवाला तीर्थोंमें श्रेष्ठ नैमिषारण्य प्रसिद्ध है॥ १॥
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥
basahiṃ tahām̐ muni siddha samājā| taham̐ hiyam̐ haraṣi caleu manu rājā||
paṃtha jāta sohahiṃ matidhīrā| gyāna bhagati janu dhareṃ sarīrā||
Meaning वहाँ मुनियों और सिद्धोंके समूह बसते हैं। राजा मनु हृदयमें हर्षित होकर वहीं चले। वे धीर बुद्धिवाले राजा-रानी मार्गमें जाते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ही शरीर धारण किये जा रहे हों॥ २॥
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥
pahum̐ce jāi dhenumati tīrā| haraṣi nahāne niramala nīrā||
āe milana siddha muni gyānī| dharama dhuraṃdhara nṛpariṣi jānī||
Meaning [ चलते-चलते] वे गोमतीके किनारे जा पहुँचे। हर्षित होकर उन्होंने निर्मल जलमें स्नान किया। उनको धर्मधुरन्धर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आये॥ ३॥
जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥
कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥
jaham̐ jam̐ha tīratha rahe suhāe| muninha sakala sādara karavāe||
kṛsa sarīra munipaṭa paridhānā| sata samāja nita sunahiṃ purānā||
Meaning जहाँ-जहाँ सुन्दर तीर्थ थे, मुनियोंने आदरपूर्वक सभी तीर्थ उनको करा दिये। उनका शरीर दुर्बल हो गया था, वे मुनियोंके-से (वल्कल) वस्त्र धारण करते थे और संतोंके समाजमें नित्य पुराण सुनते थे॥ ४॥
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥ १४३॥
dvādasa acchara maṃtra puni japahiṃ sahita anurāga|
bāsudeva pada paṃkaruha daṃpati mana ati lāga|| 143||
Meaning और द्वादशाक्षर मन्त्र (3 नमो भगवते वासुदेवाय) का प्रेमसहित जप करते थे। भगवान् वासुदेवके चरणकमलोंमें उन राजा-रानीका मन बहुत ही लग गया॥ १४३॥
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥
karahiṃ ahāra sāka phala kaṃdā| sumirahiṃ brahma saccidānaṃdā||
puni hari hetu karana tapa lāge| bāri adhāra mūla phala tyāge||
Meaning वे साग, फल और कन्दका आहार करते थे और सच्चिदानन्द ब्रह्मका स्मरण करते थे। फिर वे श्रीहरिके लिये तप करने लगे और मूल-फलको त्यागकर केवल जलके आधारपर रहने लगे॥ १॥
उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई॥
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥
ura abhilāṣa niṃraṃtara hoī| dekhaa nayana parama prabhu soī||
aguna akhaṃḍa anaṃta anādī| jehi ciṃtahiṃ paramārathabādī||
Meaning हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [कैसे] उन परम प्रभुको अंँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रहमज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं॥ २॥
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥
neti neti jehi beda nirūpā| nijānaṃda nirupādhi anūpā||
saṃbhu biraṃci biṣnu bhagavānā| upajahiṃ jāsu aṃsa teṃ nānā||
Meaning जिन्हें वेद ' नेति-नेति' (यह भी नहीं, यह भी नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं। जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंशसे अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णुभगवान् प्रकट होते हैं॥ ३॥
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा॥
aiseu prabhu sevaka basa ahaī| bhagata hetu līlātanu gahaī||
jauṃ yaha bacana satya śruti bhāṣā| tau hamāra pūjahi abhilāṣā||
Meaning ऐसे [महान्] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [दिव्य] लीलाविग्रह धारण करते हैं। यदि वेदोंगें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी॥ ४॥
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार॥ १४४॥
ehi bidhi bīteṃ baraṣa ṣaṭa sahasa bāri āhāra|
saṃbata sapta sahastra puni rahe samīra adhāra|| 144||
Meaning इस प्रकार जलका आहार [करके तप] करते छः: हजार वर्ष बीत गये। फिर सात हजार वर्ष वे वायुके आधारपर रहे॥ १४४॥
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥
बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥
baraṣa sahasa dasa tyāgeu soū| ṭhāṛhe rahe eka pada doū||
bidhi hari tapa dekhi apārā| manu samīpa āe bahu bārā||
Meaning दस हजार वर्षतक उन्होंने वायुका आधार भी छोड़ दिया। दोनों एक पैरसे खड़े रहे। उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी कई बार मनुजीके पास आये॥ १॥
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥
māgahu bara bahu bhām̐ti lobhāe| parama dhīra nahiṃ calahiṃ calāe||
asthimātra hoi rahe sarīrā| tadapi manāga manahiṃ nahiṃ pīrā||
Meaning उन्होंने इन्हें अनेक प्रकारसे ललचाया और कहा कि कुछ वर माँगो। पर ये परम धैर्यवान् [राजा-रानी अपने तपसे किसीके] डिगाये नहीं डिगे। यद्यपि उनका शरीर हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया था, फिर भी उनके मनमें जरा भी पीड़ा नहीं थी॥ २॥
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥
मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥
prabhu sarbagya dāsa nija jānī| gati ananya tāpasa nṛpa rānī||
māgu māgu baru bhai nabha bānī| parama gabhīra kṛpāmṛta sānī||
Meaning सर्वज्ञ प्रभुने अनन्य गति (आश्रय) वाले तपस्वी राजा-रानीको ' निज दास' जाना। तब परम गम्भीर और कृपारूपी अमृतसे सनी हुई यह आकाशवाणी हुई कि “वर माँगो'॥ ३॥
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई॥
ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥
mṛtaka jiāvani girā suhāī| śrabana raṃdhra hoi ura jaba āī||
hraṣṭapuṣṭa tana bhae suhāe| mānahum̐ abahiṃ bhavana te āe||
Meaning मुर्देको भी जिला देनेवाली यह सुन्दर वाणी कानोंके छेदोंसे होकर जब हदयमें आयी, तब राजा-रानीके शरीर ऐसे सुन्दर और हृष्ट-पुष्ठ हो गये, मानो अभी घरसे आये हैं॥ ४॥
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥ २४५॥
śravana sudhā sama bacana suni pulaka praphullita gāta|
bole manu kari daṃḍavata prema na hṛdayam̐ samāta|| 245||
Meaning कानोंमें अमृतके समान लगनेवाले वचन सुनते ही उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। तब मनुजी दण्डवत् करके बोले, प्रेम हृदयमें समाता न था--॥ १४५॥
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥
sunu sevaka surataru suradhenu| bidhi hari hara baṃdita pada renū||
sevata sulabha sakala sukha dāyaka| pranatapāla sacarācara nāyaka||
Meaning हे प्रभो ! सुनिये, आप सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। आपकी चरण-रजकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं। आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं। आप शरणागतके रक्षक और जड-चेतनके स्वामी हैं॥ १॥
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥
jauṃ anātha hita hama para nehū| tau prasanna hoi yaha bara dehū||
jo sarūpa basa siva mana māhīṃ| jehi kārana muni jatana karāhīṃ||
Meaning हे अनाथोंका कल्याण करनेवाले ! यदि हमलोगोंपर आपका स्त्रेह है, तो प्रसन्न होकर यह वर दीजिये कि आपका जो स्वरूप शिवजीके मनमें बसता है और जिस [की प्राप्ति] के लिये मुनिलोग यत्र करते हैं॥ २॥
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥
jo bhusuṃḍi mana mānasa haṃsā| saguna aguna jehi nigama prasaṃsā||
dekhahiṃ hama so rūpa bhari locana| kṛpā karahu pranatārati mocana||
Meaning जो काकभुशुण्डिके मनरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाला हंस है, सगुण और निर्गुण कहकर वेद जिसकी प्रशंसा करते हैं, हे शरणागतके दु:ख मिटानेवाले प्रभो ! ऐसी कृपा कीजिये कि हम उसी रूपको नेत्र भरकर देखें॥ ३॥
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥
daṃpati bacana parama priya lāge| mudula binīta prema rasa pāge||
bhagata bachala prabhu kṛpānidhānā| bisvabāsa pragaṭe bhagavānā||
Meaning राजा-रानीके कोमल, विनययुक्त और प्रेमरसमें पगे हुए वचन भगवान्को बहुत ही प्रिय लगे। भक्तवत्सल, कृपानिधान, सम्पूर्ण विश्वके निवासस्थान (या समस्त विश्वमें व्यापक), सर्वसमर्थ भगवान् प्रकट हो गये॥ ४॥
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥ १४६॥
nīla saroruha nīla mani nīla nīradhara syāma|
lājahiṃ tana sobhā nirakhi koṭi koṭi sata kāma|| 146||
Meaning भगवान्के नीले कमल, नीलमणि और नीले (जलयुक्त) मेघके समान [ कोमल, प्रकाशमय और सरस] श्यामवर्ण [ चिन्मय] शरीरकी शोभा देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाते हैं॥ १४६॥
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥
अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥
sarada mayaṃka badana chabi sīṃvā| cāru kapola cibuka dara grīvā||
adhara aruna rada suṃdara nāsā| bidhu kara nikara biniṃdaka hāsā||
Meaning उनका मुख शरद [पूर्णिमा] के चन्द्रमाके समान छविकी सीमास्वरूप था। गाल और ठोड़ी बहुत सुन्दर थे, गला श्गके समान (त्रिखायुक्त, चढ़ाव-उतारवाला) था। लाल ओठ, दाँत और नाक अत्यन्त सुन्दर थे। हँसी चन्द्रमाकी किरणावलीको नीचा दिखानेवाली थी॥ १॥
नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥
भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥
nava abuṃja aṃbaka chabi nīkī| citavani lalita bhāvam̐tī jī kī||
bhukuṭi manoja cāpa chabi hārī| tilaka lalāṭa paṭala dutikārī||
Meaning नेत्रोंकी छवि नये [खिले हुए] कमलके समान बड़ी सुन्दर थी। मनोहर चितवन जीको बहुत प्यारी लगती थी। टेढ़ी भौंहिं कामदेवके धनुषकी शोभाको हरनेवाली थीं। ललाटपटलपर प्रकाशमय तिलक था॥ २॥
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥
उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥
kuṃḍala makara mukuṭa sira bhrājā| kuṭila kesa janu madhupa samājā||
ura śrībatsa rucira banamālā| padika hāra bhūṣana manijālā||
Meaning कानोंमें मकराकृत (मछलीके आकारके) कुण्डल और सिरपर मुकुट सुशोभित था। टेढ़े (घुँघराले) काले बाल ऐसे सघन थे, मानो भौंरोंके झुंड हों। हदयपर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रब्जटित हार और मणियोंके आभूषण सुशोभित थे॥ ३॥
केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥
करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥
kehari kaṃdhara cāru janeu| bāhu bibhūṣana suṃdara teū||
kari kara sari subhaga bhujadaṃḍā| kaṭi niṣaṃga kara sara kodaṃḍā||
Meaning सिंहकी-सी गर्दन थी, सुन्दर जनेऊ था। भुजाओंमें जो गहने थे, वे भी सुन्दर थे। हाथीकी सूँडके समान (उतार-चढ़ाववाले) सुन्दर भुजदण्ड थे। कमरमें तरकस और हाथमें बाण और धनुष [शोभा पा रहे] थे॥ ४॥
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥ १४७॥
taḍita biniṃdaka pīta paṭa udara rekha bara tīni|
nābhi manohara leti janu jamuna bhavam̐ra chabi chīni|| 147||
Meaning [ स्वर्ण-वर्णका प्रकाशमय] पीताम्बर बिजलीको लजानेवाला था। पेटपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) थीं। नाभि ऐसी मनोहर थी, मानो यमुनाजीके भँवरोंकी छबिको छीने लेती हो॥ १४७॥
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥
pada rājīva barani nahi jāhīṃ| muni mana madhupa basahiṃ jenha māhīṃ||
bāma bhāga sobhati anukūlā| ādisakti chabinidhi jagamūlā||
Meaning जिनमें मुनियोंके मनरूपी भौरे बसते हैं, भगवानूके उन चरणकमलोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। भगवान्के बायें भागमें सदा अनुकूल रहनेवाली, शोभाको राशि, जगत्की मूलकारणरूपा आदिशक्ति श्रीजानकीजी सुशोभित हैं॥ १॥
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥
jāsu aṃsa upajahiṃ gunakhānī| aganita lacchi umā brahmānī||
bhṛkuṭi bilāsa jāsu jaga hoī| rāma bāma disi sītā soī||
Meaning जिनके अंशसे गुणोंकी खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी (त्रिदेवोंकी शक्तियाँ ) उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंहके इशारेसे ही जगत्की रचना हो जाती है, वही [ भगवान्की स्वरूपा- शक्ति] श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर स्थित हैं॥ २॥
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥
chabisamudra hari rūpa bilokī| ekaṭaka rahe nayana paṭa rokī||
citavahiṃ sādara rūpa anūpā| tṛpti na mānahiṃ manu satarūpā||
Meaning शोभाके समुद्र श्रीहरिकि रूपको देखकर मनु-शतरूपा नेत्रोंके पट (पलकें) रोके हुए एकटक (स्तब्ध) रह गये। उस अनुपम रूपको वे आदरसहित देख रहे थे और देखते-देखते अघाते ही नथे॥३॥
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥
haraṣa bibasa tana dasā bhulānī| pare daṃḍa iva gahi pada pānī||
sira parase prabhu nija kara kaṃjā| turata uṭhāe karunāpuṃjā||
Meaning आनन्दके अधिक वशमें हो जानेके कारण उन्हें अपने देहकी सुधि भूल गयी। वे हाथोंसे भगवान्के चरण पकड़कर दण्डकी तरह (सीधे) भूमिपर गिर पड़े। कृपाकी राशि प्रभुने अपने करकमलोंसे उनके मस्तकोंका स्पर्श किया और उन्हें तुरंत ही उठा लिया॥ ४॥
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥ १४८॥
bole kṛpānidhāna puni ati prasanna mohi jāni|
māgahu bara joi bhāva mana mahādāni anumāni|| 148||
Meaning फिर कृपानिधान भगवान् बोले--मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर और बड़ा भारी दानी मानकर, जो मनको भाये वही वर माँग लो॥ १४८॥
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥
suni prabhu bacana jori juga pānī| dhari dhīraju bolī mṛdu bānī||
nātha dekhi pada kamala tumhāre| aba pūre saba kāma hamāre||
Meaning प्रभुके वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर और धीरज धरकर राजाने कोमल वाणी कही-- हे नाथ! आपके चरणकमलोंको देखकर अब हमारी सारी मन:कामनाएँ पूरी हो गयीं॥ १॥
एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं॥
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥
eka lālasā baṛi ura māhī| sugama agama kahi jāta so nāhīṃ||
tumhahi deta ati sugama gosāīṃ| agama lāga mohi nija kṛpanāīṃ||
Meaning फिर भी मनमें एक बड़ी लालसा है। उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसीसे उसे कहते नहीं बनता। हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता (दीनता) के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है॥ २॥
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥
तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥
jathā daridra bibudhataru pāī| bahu saṃpati māgata sakucāī||
tāsu prabhā jāna nahiṃ soī| tathā hṛdayam̐ mama saṃsaya hoī||
Meaning जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्षको पाकर भी अधिक द्रव्य माँगनेमें संकोच करता है, क्योंकि वह उसके प्रभावको नहीं जानता, वैसे ही मेरे हदयमें संशय हो रहा है॥३॥
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥
सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥
so tumha jānahu aṃtarajāmī| puravahu mora manoratha svāmī||
sakuca bihāi māgu nṛpa mohi| moreṃ nahiṃ adeya kachu tohī||
Meaning हे स्वामी ! आप अन्तयमि हैं, इसलिये उसे जानते ही हैं। मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिये। [ भगवान्ने कहा--] हे राजन् ! संकोच छोड़कर मुझसे माँगो। तुम्हें न दे सकूँ ऐसा मेरे पास कुछ भी नहीं है॥ ४॥
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥ १४९॥
dāni siromani kṛpānidhi nātha kahaum̐ satibhāu|
cāhaum̐ tumhahi samāna suta prabhu sana kavana durāu|| 149||
Meaning [ राजाने कहा--] हे दानियोंके शिरोमणि! हे कृपानिधान! हे नाथ! मैं अपने मनका सच्चा भाव कहता हूँ कि मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ। प्रभुसे भला क्या छिपाना!॥ १४९॥
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥
dekhi prīti suni bacana amole| evamastu karunānidhi bole||
āpu sarisa khojauṃ kaham̐ jāī| nṛpa tava tanaya hoba maiṃ āī||
Meaning राजाकी प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान भगवान् बोले--ऐसा ही हो। हे राजन्! मैं अपने समान [दूसरा] कहाँ जाकर खोजूँ। अतः: स्वयं ही आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा॥ १॥
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे॥
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥
satarūpahi biloki kara joreṃ| debi māgu baru jo ruci tore||
jo baru nātha catura nṛpa māgā| soi kṛpāla mohi ati priya lāgā||
Meaning शतरूपाजीको हाथ जोड़े देखकर भगवान्ने कहा--हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो। [शतरूपाने कहा--] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा॥ २॥
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥
prabhu paraṃtu suṭhi hoti ḍhiṭhāī| jadapi bhagata hita tumhahi sohāī||
tumha brahmādi janaka jaga svāmī| brahma sakala ura aṃtarajāmī||
Meaning परन्तु हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तोंका हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है। आप ब्रह्मा आदिके भी पिता (उत्पन्न करनेवाले), जगत्के स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ब्रह्म हैं॥ ३॥
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥
asa samujhata mana saṃsaya hoī| kahā jo prabhu pravāna puni soī||
je nija bhagata nātha tava ahahīṃ| jo sukha pāvahiṃ jo gati lahahīṃ||
Meaning ऐसा समझनेपर मनमें सन्देह होता है, फिर भी प्रभुने जो कहा वही प्रमाण (सत्य) है। [मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो (अलौकिक, अखण्ड) सुख पाते हैं और जिस परम गतिको प्राप्त होते हैं॥ ४॥
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।
soi sukha soi gati soi bhagati soi nija carana sanehu|
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥ १५०॥
soi bibeka soi rahani prabhu hamahi kṛpā kari dehu|| 150||
Meaning हे प्रभो ! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणोंमें प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिये॥ १५०॥
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥
sunu mṛdu gūṛha rucira bara racanā| kṛpāsiṃdhu bole mṛdu bacanā||
jo kachu ruci tumhera mana māhīṃ| maiṃ so dīnha saba saṃsaya nāhīṃ||
Meaning [ रानीकी] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपाके समुद्र भगवान् कोमल वचन बोले--तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना॥ १॥
मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी॥
mātu bibeka alokika toreṃ| kabahum̐ na miṭihi anugraha moreṃ||
baṃdi carana manu kaheu bahorī| avara eka binati prabhu morī||
Meaning हे माता! मेरी कृपासे तुम्हारा अलौकिक ज्ञान कभी नष्ट न होगा। तब मनुने भगवान्के चरणोंकी वन्दना करके फिर कहा->हे प्रभु! मेरी एक विनती और है--॥ २॥
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥
suta biṣaika tava pada rati hoū| mohi baṛa mūṛha kahai kina koū||
mani binu phani jimi jala binu mīnā| mama jīvana timi tumhahi adhīnā||
Meaning आपके चरणोंमें मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्रके लिये पिताकी होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे। जैसे मणिके बिना साँप और जलके बिना मछली [नहीं रह सकती], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे (आपके बिना न रह सके)॥ ३॥
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥
asa baru māgi carana gahi raheū| evamastu karunānidhi kaheū||
aba tumha mama anusāsana mānī| basahu jāi surapati rajadhānī||
Meaning ऐसा वर माँगकर राजा भगवान्के चरण पकड़े रह गये। तब दयाके निधान भगवानूने कहा-ऐसा ही हो। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर देवराज इन्द्रकी राजधानी ( अमरावती) में जाकर वास करो॥ ४॥
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥ १५१॥
taham̐ kari bhoga bisāla tāta gaum̐ kachu kāla puni|
hoihahu avadha bhuāla taba maiṃ hoba tumhāra suta|| 151||
Meaning हे तात! वहाँ [स्वर्गके] बहुत-से भोग भोगकर, कुछ काल बीत जानेपर, तुम अवधके राजा होगे। तब मैं तुम्हारा पुत्र होऊँगा॥ १५१॥
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥
icchāmaya narabeṣa sam̐vāreṃ| hoihaum̐ pragaṭa niketa tumhāre||
aṃsanha sahita deha dhari tātā| karihaum̐ carita bhagata sukhadātā||
Meaning इच्छानिर्मित मनुष्यरूप सजकर मैं तुम्हारे घर प्रकट होऊँगा। हे तात! मैं अपने अंशोंसहित देह धारण करके भक्तोंको सुख देनेवाले चरित्र करूँगा॥ श॥
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥
je suni sādara nara baṛabhāgī| bhava tarihahiṃ mamatā mada tyāgī||
ādisakti jehiṃ jaga upajāyā| sou avatarihi mori yaha māyā||
Meaning जिन (चरित्रों) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागरसे तर जायेँगे। आदिशक्ति यह मेरी [स्वरूपभूता] माया भी, जिसने जगत्को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी॥ २॥
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥
purauba maiṃ abhilāṣa tumhārā| satya satya pana satya hamārā||
puni puni asa kahi kṛpānidhānā| aṃtaradhāna bhae bhagavānā||
Meaning इस प्रकार मैं तुम्हारी अभिलाषा पूरी करूँगा। मेरा प्रण सत्य है, सत्य है, सत्य है। कृपानिधान भगवान् बार-बार ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ ३॥
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥
daṃpati ura dhari bhagata kṛpālā| tehiṃ āśrama nivase kachu kālā||
samaya pāi tanu taji anayāsā| jāi kīnha amarāvati bāsā||
Meaning वे स्त्री-पुरुष (राजा-रानी) भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्को हृदयमें धारण करके कुछ कालतक उस आश्रममें रहे। फिर उन्होंने समय पाकर, सहज ही (बिना किसी कष्टके) शरीर छोड़कर, आअमरावती (इन्द्रकी पुरी) में जाकर वास किया॥ ४॥
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु॥ १५२॥
yaha itihāsa punīta ati umahi kahī bṛṣaketu|
bharadvāja sunu apara puni rāma janama kara hetu|| 152||
Meaning [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] हे भरद्वाज ! इस अत्यन्त पवित्र इतिहासको शिवजीने पार्वतीसे कहा था। अब श्रीरामके अवतार लेनेका दूसरा कारण सुनो॥ १५२॥