समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥
samācāra saba saṃkara pāe| bīrabhadru kari kopa paṭhāe||
jagya bidhaṃsa jāi tinha kīnhā| sakala suranha bidhivata phalu dīnhā||
Meaning ये सब समाचार शिवजीको मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्रको भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओंको यथोचित फल (दण्ड) दिया॥ १॥
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई॥
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥
bhe jagabidita daccha gati soī| jasi kachu saṃbhu bimukha kai hoī||
yaha itihāsa sakala jaga jānī| tāte maiṃ saṃchepa bakhānī||
Meaning दक्षकी जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोहीकी हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया॥ २॥
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥
satīṃ marata hari sana baru māgā| janama janama siva pada anurāgā||
tehi kārana himagiri gṛha jāī| janamīṃ pārabatī tanu pāī||
Meaning सतीने मरते समय भगवान् हरिसे यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्ममें शिवजीके चरणोंमें अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचलके घर जाकर पार्वतीके शरीरसे जन्म लिया॥ ३॥
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥
jaba teṃ umā saila gṛha jāīṃ| sakala siddhi saṃpati taham̐ chāī||
jaham̐ taham̐ muninha suāśrama kīnhe| ucita bāsa hima bhūdhara dīnhe||
Meaning जबसे उमाजी हिमाचलके घर जनमीं तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं। मुनियोंने जहाँ-तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचलने उनको उचित स्थान दिये॥ ४॥
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥ ६५॥
sadā sumana phala sahita saba druma nava nānā jāti|
pragaṭīṃ suṃdara saila para mani ākara bahu bhām̐ti|| 65||
Meaning उस सुन्दर पर्वतपर बहुत प्रकारके सब नये-नये वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरहकी मणियोंकी खानें प्रकट हो गयीं॥ ६५॥
सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥
saritā saba punita jalu bahahīṃ| khaga mṛga madhupa sukhī saba rahahīṃ||
sahaja bayaru saba jīvanha tyāgā| giri para sakala karahiṃ anurāgā||
Meaning सारी नदियोंमें पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवोंने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वतपर सभी परस्पर प्रेम करते हैं॥ १॥
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥
soha saila girijā gṛha āem̐| jimi janu rāmabhagati ke pāem̐||
nita nūtana maṃgala gṛha tāsū| brahmādika gāvahiṃ jasu jāsū||
Meaning पार्वतीजीके घर आ जानेसे पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्तिको पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस (पर्वतराज) के घर नित्य नये-नये मज़लोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं॥ २॥
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥
nārada samācāra saba pāe| kautukahīṃ giri geha sidhāe||
sailarāja baṛa ādara kīnhā| pada pakhāri bara āsanu dīnhā||
Meaning जब नारदजीने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुकहीसे हिमाचलके घर पधारे। पर्वतराजने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया॥ ३॥
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥
nāri sahita muni pada siru nāvā| carana salila sabu bhavanu siṃcāvā||
nija saubhāgya bahuta giri baranā| sutā boli melī muni caranā||
Meaning फिर अपनी स्त्रीसहित मुनिके चरणोंमें सिर नवाया और उनके चरणोदकको सारे घरमें छिड़काया। हिमाचलने अपने सौभाग्यका बहुत बखान किया और पुत्रीको बुलाकर मुनिके चरणोंपर डाल दिया॥ ४॥
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥ ६६॥
trikālagya sarbagya tumha gati sarbatra tumhāri|
kahahu sutā ke doṣa guna munibara hṛdayam̐ bicāri|| 66||
Meaning [ और कहा--] हे मुनिवर ! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अत: आप हृदयमें विचारकर कन्याके दोष-गुण कहिये॥ ६६॥
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥
kaha muni bihasi gūṛha mṛdu bānī| sutā tumhāri sakala guna khānī||
suṃdara sahaja susīla sayānī| nāma umā aṃbikā bhavānī||
Meaning नारद मुनिने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणीसे कहा--तुम्हारी कन्या सब गुणोंकी खान है। यह स्वभावसे ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं॥ १॥
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥
saba lacchana saṃpanna kumārī| hoihi saṃtata piyahi piārī||
sadā acala ehi kara ahivātā| ehi teṃ jasu paihahiṃ pitu mātā||
Meaning कन्या सब सुलक्षणोंसे सम्पन्न है, यह अपने पतिको सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे॥ २॥
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा॥
hoihi pūjya sakala jaga māhīṃ| ehi sevata kachu durlabha nāhīṃ||
ehi kara nāmu sumiri saṃsārā| triya caṛhahahiṃ patibrata asidhārā||
Meaning यह सारे जगतमें पूज्य होगी और इसकी सेवा करनेसे कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसारमें स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतित्रतरूपी तलवारकी धारपर चढ़ जायँगी॥ ३॥
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥
saila sulacchana sutā tumhārī| sunahu je aba avaguna dui cārī||
aguna amāna mātu pitu hīnā| udāsīna saba saṃsaya chīnā||
Meaning हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता-विहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह ),॥ ४॥
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥ ६७॥
jogī jaṭila akāma mana nagana amaṃgala beṣa|
asa svāmī ehi kaham̐ milihi parī hasta asi rekha|| 67||
Meaning योगी, जटाधारी, निष्कामहदय, नंगा और अमज़ल वेषवाला, ऐसा पति इसको मिलेगा। इसके हाथमें ऐसी ही रेखा पड़ी है॥ ६७॥
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥
नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥
suni muni girā satya jiyam̐ jānī| dukha daṃpatihi umā haraṣānī||
nāradahum̐ yaha bhedu na jānā| dasā eka samujhaba bilagānā||
Meaning नारद मुनिकी वाणी सुनकर और उसको हृदयमें सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुई। नारदजीने भी इस रहस्यको नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक-सी होनेपर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी॥ १॥
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥
sakala sakhīṃ girijā giri mainā| pulaka sarīra bhare jala nainā||
hoi na mṛṣā devariṣi bhāṣā| umā so bacanu hṛdayam̐ dhari rākhā||
Meaning सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभीके शरीर पुलकित थे और सभीके नेत्रोंगें जल भरा था। देवर्षिके वचन असत्य नहीं हो सकते, [यह विचारकर] पार्वतीने उन वचनों को हृदयमें धारण कर लिया॥ २॥
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥
upajeu siva pada kamala sanehū| milana kaṭhina mana bhā saṃdehū||
jāni kuavasaru prīti durāī| sakhī ucham̐ga baiṭhī puni jāī||
Meaning उन्हें शिवजीके चरणकमलोंमें स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मनमें यह सन्देह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमाने अपने प्रेमको छिपा लिया और फिर वे सखीकी गोदमें जाकर बैठ गयीं॥ ३॥
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥
jhūṭhi na hoi devariṣi bānī| socahi daṃpati sakhīṃ sayānī||
ura dhari dhīra kahai girirāū| kahahu nātha kā karia upāū||
Meaning देवर्षिकी वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हदयमें धीरज धरकर पर्वतराजने कहा--हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय ?॥ ४॥
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥ ६८॥
kaha munīsa himavaṃta sunu jo bidhi likhā lilāra|
deva danuja nara nāga muni kou na meṭanihāra|| 68||
Meaning मुनी श्वरने कहा--हे हिमवान् ! सुनो, विधाताने ललाटपर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते॥ ६८॥
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं॥
tadapi eka maiṃ kahaum̐ upāī| hoi karai jauṃ daiu sahāī||
jasa baru maiṃ baraneum̐ tumha pāhīṃ| milahi umahi tasa saṃsaya nāhīṃ||
Meaning तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमाको वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है॥ १॥
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने॥
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥
je je bara ke doṣa bakhāne| te saba siva pahi maiṃ anumāne||
jauṃ bibāhu saṃkara sana hoī| doṣau guna sama kaha sabu koī||
Meaning परन्तु मैंने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमानसे वे सभी शिवजीमें हैं। यदि शिवजीके साथ विवाह हो जाय तो दोषोंको भी सब लोग गुणोंके समान ही कहेंगे॥ २॥
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥
jauṃ ahi seja sayana hari karahīṃ| budha kachu tinha kara doṣu na dharahīṃ||
bhānu kṛsānu sarba rasa khāhīṃ| tinha kaham̐ maṃda kahata kou nāhīṃ||
Meaning जैसे विष्णुभगवान् शेषनागकी शय्यापर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्रिदेव अच्छे-बुरे सभी रसोंका भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता॥ ३॥
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई॥
subha aru asubha salila saba bahaī| surasari kou apunīta na kahaī||
samaratha kahum̐ nahiṃ doṣu gosāī| rabi pāvaka surasari kī nāī||
Meaning गड़ाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्रि और गड़ाजीकी भाँति समर्थकों कुछ दोष नहीं लगता॥ ४॥
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥ ६९॥
jauṃ asa hisiṣā karahiṃ nara jaṛi bibeka abhimāna|
parahiṃ kalapa bhari naraka mahum̐ jīva ki īsa samāna|| 69||
Meaning यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान (सर्वथा स्वतन्त्र) हो सकता है ?॥ ६९॥
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥
surasari jala kṛta bāruni jānā| kabahum̐ na saṃta karahiṃ tehi pānā||
surasari mileṃ so pāvana jaiseṃ| īsa anīsahi aṃtaru taiseṃ||
Meaning गड़ाजलसे भी बनायी हुई मदिराको जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गड़ाजीमें मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईधर और जीवमें भी वैसा ही भेद है॥ १॥
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥
saṃbhu sahaja samaratha bhagavānā| ehi bibāham̐ saba bidhi kalyānā||
durārādhya pai ahahiṃ mahesū| āsutoṣa puni kiem̐ kalesū||
Meaning शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं। इसलिये इस विवाहमें सब प्रकार कल्याण है। परन्तु महादेवजीकी आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करनेसे वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं॥ २॥
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥
jauṃ tapu karai kumāri tumhārī| bhāviu meṭi sakahiṃ tripurārī||
jadyapi bara aneka jaga māhīṃ| ehi kaham̐ siva taji dūsara nāhīṃ||
Meaning यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहारको मिटा सकते हैं। यद्यपि संसारमें वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिवजीको छोड़कर दूसरा वर नहीं है॥ ३॥
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥
bara dāyaka pranatārati bhaṃjana| kṛpāsiṃdhu sevaka mana raṃjana||
icchita phala binu siva avarādhe| lahia na koṭi joga japa sādheṃ||
Meaning शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दु:खोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं। शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाज्छित फल नहीं मिलता॥ ४॥
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥ ७०॥
asa kahi nārada sumiri hari girijahi dīnhi asīsa|
hoihi yaha kalyāna aba saṃsaya tajahu girīsa|| 70||
Meaning ऐसा कहकर भगवान्का स्मरण करके नारदजीने पार्वतीको आशीर्वाद दिया। [और कहा कि--] हे पर्वतराज! तुम सन्देहका त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा॥ ७०॥
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥
kahi asa brahmabhavana muni gayaū| āgila carita sunahu jasa bhayaū||
patihi ekāṃta pāi kaha mainā| nātha na maiṃ samujhe muni bainā||
Meaning यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो। पतिको एकान्तमें पाकर मैनाने कहा--हे नाथ! मैंने मुनिके वचनोंका अर्थ नहीं समझा॥ १॥
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥
jauṃ gharu baru kulu hoi anūpā| karia bibāhu sutā anurupā||
na ta kanyā baru rahau kuārī| kaṃta umā mama prānapiārī||
Meaning जो हमारी कन्याके अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वरके साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन् ! पार्वती मुझको प्राणोंके समान प्यारी है॥ २॥
जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू।
गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥
jauṃ na milahi baru girijahi jogū| giri jaṛa sahaja kahihi sabu logū||
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू।
जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥
soi bicāri pati karehu bibāhū| jehiṃ na bahori hoi ura dāhū||
Meaning यदि पार्वतीके योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभावसे ही जड (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी ! इस बातको विचारकर ही विवाह कोजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदयमें सन्ताप न हो॥ ३॥
अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥
asa kahi pari carana dhari sīsā| bole sahita saneha girīsā||
baru pāvaka pragaṭai sasi māhīṃ| nārada bacanu anyathā nāhīṃ||
Meaning इस प्रकार कहकर मैना पतिके चरणोंपर मस्तक रखकर गिर पड़ीं। तब हिमवान्ने प्रेमसे कहा--चाहे चन्द्रमामें अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजीके वचन झूठे नहीं हो सकते॥ ४॥
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥ ७१॥
priyā socu pariharahu sabu sumirahu śrībhagavāna|
pārabatihi niramayau jehiṃ soi karihi kalyāna|| 71||
Meaning हे प्रिय! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान्ूका स्मरण करो। जिन्होंने पार्वतीको रचा है, वे ही कल्याण करेंगे॥ ७१॥
अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहि कलेसू॥
aba jau tumhahi sutā para nehū| tau asa jāi sikhāvana dehū||
karai so tapu jehiṃ milahiṃ mahesū| āna upāyam̐ na miṭahi kalesū||
Meaning अब यदि तुम्हें कन्यापर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जायेँ। दूसरे उपायसे यह क्लेश नहीं मिटेगा॥ १॥
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥
nārada bacana sagarbha sahetū| suṃdara saba guna nidhi bṛṣaketū||
asa bicāri tumha tajahu asaṃkā| sabahi bhām̐ti saṃkaru akalaṃkā||
Meaning नारदजीके वचन रहस्यसे युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणोंके भण्डार हैं। यह विचारकर तुम [मिथ्या] सन्देहको छोड़ दो। शिवजी सभी तरहसे निष्कलड् हैं॥ २॥
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥
suni pati bacana haraṣi mana māhīṃ| gaī turata uṭhi girijā pāhīṃ||
umahi biloki nayana bhare bārī| sahita saneha goda baiṭhārī||
Meaning पतिके वचन सुन मनमें प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वतीके पास गयीं। पार्वतीको देखकर उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसे स्नेहके साथ गोदमें बैठा लिया॥ ३॥
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥
bārahiṃ bāra leti ura lāī| gadagada kaṃṭha na kachu kahi jāī||
jagata mātu sarbagya bhavānī| mātu sukhada bolīṃ mṛdu bānī||
Meaning फिर बार-बार उसे हृदयसे लगाने लरगीं। प्रेमसे मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [ माताके मनकी दशाको जानकर] वे माताको सुख देनेवाली कोमल वाणीसे बोलीं--॥ ४॥
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥ ७२॥
sunahi mātu maiṃ dīkha asa sapana sunāvaum̐ tohi|
suṃdara gaura subiprabara asa upadeseu mohi|| 72||
Meaning मा! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैंने ऐसा स्वप्र देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणने ऐसा उपदेश दिया है--॥७२॥
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥
karahi jāi tapu sailakumārī| nārada kahā so satya bicārī||
mātu pitahi puni yaha mata bhāvā| tapu sukhaprada dukha doṣa nasāvā||
Meaning हे पार्वती ! नारदजीने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिताको भी अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है॥ १॥
तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥
tapabala racai prapaṃca bidhātā| tapabala biṣnu sakala jaga trātā||
tapabala saṃbhu karahiṃ saṃghārā| tapabala seṣu dharai mahibhārā||
Meaning तपके बलसे ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तपके बलसे ही विष्णु सारे जगत्का पालन करते हैं। तपके बलसे ही शम्भु [ रुद्रूपसे जगत्का] संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं॥ २॥
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥
tapa adhāra saba sṛṣṭi bhavānī| karahi jāi tapu asa jiyam̐ jānī||
sunata bacana bisamita mahatārī| sapana sunāyau girihi ham̐kārī||
Meaning हे भवानी! सारी सृष्टि तपके ही आधारपर है। ऐसा जीमें जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माताको बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान्को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया॥ ३॥
मातु पितुहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥
mātu pituhi bahubidhi samujhāī| calīṃ umā tapa hita haraṣāī||
priya parivāra pitā aru mātā| bhae bikala mukha āva na bātā||
Meaning माता-पिताको बहुत तरहसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करनेके लिये चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसीके मुँहसे बात नहीं निकलती॥ ४॥
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥ ७३॥
bedasirā muni āi taba sabahi kahā samujhāi|
pārabatī mahimā sunata rahe prabodhahi pāi|| 73||
Meaning तब वेदशिरा मुनिने आकर सबको समझाकर कहा। पार्वतीजीकी महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया॥ ७३॥
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥
ura dhari umā prānapati caranā| jāi bipina lāgīṃ tapu karanā||
ati sukumāra na tanu tapa jogū| pati pada sumiri tajeu sabu bhogū||
Meaning प्राणपति (शिवजी) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजीका अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणोंका स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको तज दिया॥ १॥
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।
nita nava carana upaja anurāgā| bisarī deha tapahiṃ manu lāgā||
saṃbata sahasa mūla phala khāe| sāgu khāi sata baraṣa gavām̐e|
Meaning स्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तपमें ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्षतक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये॥ २॥
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई॥
kachu dina bhojanu bāri batāsā| kie kaṭhina kachu dina upabāsā||
bela pātī mahi parai sukhāī| tīni sahasa saṃbata soī khāī||
Meaning कुछ दिन जल और वायुका भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वीपर गिरते थे, तीन हजार वर्षतक उन्हींको खाया॥ ३॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना॥
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥
puni parihare sukhāneu paranā| umahi nāma taba bhayau aparanā||
dekhi umahi tapa khīna sarīrā| brahmagirā bhai gagana gabhīrā||
Meaning फिर सूखे पर्ण (पत्ते) भी छोड़ दिये, तभी पार्वतीका नाम * अपर्णा! हुआ। तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई--॥ ४॥
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥ ७४॥
bhayau manoratha suphala tava sunu girijākumāri|
pariharu dusaha kalesa saba aba milihahiṃ tripurāri|| 74||
Meaning हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशोंको (कठिन तपको) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे॥ ७४॥
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी॥
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥
asa tapu kāhum̐ na kīnha bhavānī| bhau aneka dhīra muni gyānī||
aba ura dharahu brahma bara bānī| satya sadā saṃtata suci jānī||
Meaning हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा (कठोर) तप किसीने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्माकी वाणीको सदा सत्य और निरन्तर पवित्र जानकर अपने हृदयमें धारण कर॥ १॥
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥
āvai pitā bolāvana jabahīṃ| haṭha parihari ghara jāehu tabahīṃ||
milahiṃ tumhahi jaba sapta riṣīsā| jānehu taba pramāna bāgīsā||
Meaning जब तेरे पिता बुलानेको आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणीको ठीक समझना॥ २॥
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥
उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥
sunata girā bidhi gagana bakhānī| pulaka gāta girijā haraṣānī||
umā carita suṃdara maiṃ gāvā| sunahu saṃbhu kara carita suhāvā||
Meaning [इस प्रकार ] आकाशसे कही हुई ब्रह्माकी वाणीको सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [हर्षके मारे] उनका शरीर पुलकित हो गया। [ याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजीसे बोले कि] मैंने पार्वतीका सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजीका सुहावना चरित्र सुनो॥ ३॥
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा॥
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥
jaba teṃ satī jāi tanu tyāgā| taba seṃ siva mana bhayau birāgā||
japahiṃ sadā raghunāyaka nāmā| jaham̐ taham̐ sunahiṃ rāma guna grāmā||
Meaning जबसे सतीने जाकर शरीरत्याग किया, तबसे शिवजीके मनमें वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजीका नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथाएँ सुनने लगे॥ ४॥
चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥ '७५॥
cidānanda sukhadhāma siva bigata moha mada kāma|
bicarahiṃ mahi dhari hṛdayam̐ hari sakala loka abhirāma|| '75||
Meaning चिदानन्द, सुखके धाम, मोह, मद और कामसे रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकोंको आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीहरि ( श्रीरामचन्द्रजी ) को हृदयमें धारण कर ( भगवान्के ध्यानमें मस्त हुए) पृथ्वीपर विचरने लगे॥ ७५॥
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥
katahum̐ muninha upadesahiṃ gyānā| katahum̐ rāma guna karahiṃ bakhānā||
jadapi akāma tadapi bhagavānā| bhagata biraha dukha dukhita sujānā||
Meaning वे कहीं मुनियोंको ज्ञानका उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान् अपने भक्त (सती) के वियोगके दुःखसे दुःखी हैं॥ १॥
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥
नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥
ehi bidhi gayau kālu bahu bītī| nita nai hoi rāma pada prītī||
naimu premu saṃkara kara dekhā| abicala hṛdayam̐ bhagati kai rekhā||
Meaning इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजीके [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम और उनके हृदयमें भक्तिकी अटल टेकको [जब श्रीरामचन्द्रजीने। देखा,॥ २॥
प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥
बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥
pragaṭai rāmu kṛtagya kṛpālā| rūpa sīla nidhi teja bisālā||
bahu prakāra saṃkarahi sarāhā| tumha binu asa bratu ko nirabāhā||
Meaning तब कृतज्ञ (उपकार माननेवाले), कृपालु, रूप और शीलके भण्डार, महान् तेजपुज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरहसे शिवजीकी सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है॥ ३॥
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥
bahubidhi rāma sivahi samujhāvā| pārabatī kara janmu sunāvā||
ati punīta girijā kai karanī| bistara sahita kṛpānidhi baranī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने बहुत प्रकारसे शिवजीको समझाया और पार्वतीजीका जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने विस्तारपूर्वक पार्वतीजीकी अत्यन्त पवित्र करनीका वर्णन किया॥ ४॥
अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥ ७६॥
aba binatī mama sunehu siva jauṃ mo para nija nehu|
jāi bibāhahu sailajahi yaha mohi māgeṃ dehu|| 76||
Meaning [ फिर उन्होंने शिवजीसे कहा--] हे शिवजी! यदि मुझपर आपका स्त्रेह है तो अब आप मेरी विनती सुनिये। मुझे यह माँगे दीजिये कि आप जाकर पार्वतीके साथ विवाह कर लें॥ ७६॥
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥
kaha siva jadapi ucita asa nāhīṃ| nātha bacana puni meṭi na jāhīṃ||
sira dhari āyasu karia tumhārā| parama dharamu yaha nātha hamārā||
Meaning शिवजीने कहा--यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामीकी बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञाको सिरपर रखकर उसका पालन करूँ॥ १॥
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥
mātu pitā gura prabhu kai bānī| binahiṃ bicāra karia subha jānī||
tumha saba bhām̐ti parama hitakārī| agyā sira para nātha tumhārī||
Meaning माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये। फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है॥ २॥
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥
prabhu toṣeu suni saṃkara bacanā| bhakti bibeka dharma juta racanā||
kaha prabhu hara tumhāra pana raheū| aba ura rākhehu jo hama kaheū||
Meaning शिवजीकी भक्ति, ज्ञान और धर्मसे युक्त वचनरचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी सन्तुष्ट हो गये। प्रभुने कहा--हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गयी। अब हमने जो कहा है उसे हृदयमें रखना॥ ३॥
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥
aṃtaradhāna bhae asa bhāṣī| saṃkara soi mūrati ura rākhī||
tabahiṃ saptariṣi siva pahiṃ āe| bole prabhu ati bacana suhāe||
Meaning इस प्रकार कहकर श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गये। शिवजीने उनकी वह मूर्ति अपने हृदयमें रख ली। उसी समय ससर्षि शिवजीके पास आये। प्रभु महादेवजीने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे--॥ ४॥
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥ ७७॥
pārabatī pahiṃ jāi tumha prema paricchā lehu|
girihi preri paṭhaehu bhavana dūri karehu saṃdehu|| 77||
Meaning आपलोग पार्वतीके पास जाकर उनके प्रेमकी परीक्षा लीजिये और हिमाचलको कहकर [उन्हें पार्वतीको लिवा लानेके लिये भेजिये तथा] पार्वतीको घर भिजवाइये और उनके सन्देहको दूर कीजिये॥ ७७॥
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥
riṣinha gauri dekhī taham̐ kaisī| mūratimaṃta tapasyā jaisī||
bole muni sunu sailakumārī| karahu kavana kārana tapu bhārī||
Meaning ऋषियोंने [वहाँ जाकर] पार्वतीको कैसी देखा, मानो मूर्तिमान्ू तपस्या ही हो। मुनि बोले-- हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो?॥ १॥
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥
कहत बचत मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥
kehi avarādhahu kā tumha cahahū| hama sana satya maramu kina kahahū||
kahata bacata manu ati sakucāī| ham̐sihahu suni hamāri jaṛatāī||
Meaning तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो ? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं ? [पार्वतीने कहा--] बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आपलोग मेरी मूर्खता सुनकर हैँसेंगे॥ २॥
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥
manu haṭha parā na sunai sikhāvā| cahata bāri para bhīti uṭhāvā||
nārada kahā satya soi jānā| binu paṃkhanha hama cahahiṃ uṛānā||
Meaning मनने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जलपर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजीने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँखके उड़ना चाहती हूँ॥ ३॥
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा।
चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥
dekhahu muni abibeku hamārā| cāhia sadā sivahi bharatārā||
Meaning हे मुनियो! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजीको ही पति बनाना चाहती हूँ॥ ४॥
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहह बसेउ किसु गेह॥ ७८॥
sunata bacana bihase riṣaya girisaṃbhava tava deha|
nārada kara upadesu suni kahaha baseu kisu geha|| 78||
Meaning पार्वतीजीकी बात सुनते ही ऋषिलोग हँस पड़े और बोले--तुम्हारा शरीर पर्वतसे ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारदका उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है ?॥ ७८॥
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥
dacchasutanha upadesenhi jāī| tinha phiri bhavanu na dekhā āī||
citraketu kara gharu una ghālā| kanakakasipu kara puni asa hālā||
Meaning उन्होंने जाकर दक्षके पुत्रोंको उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घरका मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतुके घरको नारदने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपुका हुआ॥ १॥
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥
nārada sikha je sunahiṃ nara nārī| avasi hohiṃ taji bhavanu bhikhārī||
mana kapaṭī tana sajjana cīnhā| āpu sarisa sabahī caha kīnhā||
Meaning जो स्त्री-पुरुष नारदकी सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीरपर सज्जनोंके चिह्न हैं। वे सभीको अपने समान बनाना चाहते हैं॥ २॥
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥
tehi keṃ bacana māni bisvāsā| tumha cāhahu pati sahaja udāsā||
nirguna nilaja kubeṣa kapālī| akula ageha digaṃbara byālī||
Meaning उनके वचनोंपर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभावसे ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्, बुरे वेषवाला, नर-कपालोंकी माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बारका, नंगा और शरीरपर साँपोंको लपेटे रखनेवाला है॥ ३॥
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥
पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥
kahahu kavana sukhu asa baru pāem̐| bhala bhūlihu ṭhaga ke baurāem̐||
paṃca kaheṃ sivam̐ satī bibāhī| puni avaḍeri marāenhi tāhī||
Meaning ऐसे वरके मिलनेसे कहो, तुम्हें क्या सुख होगा ? तुम उस ठग (नारद) के बहकावेमें आकर खूब भूलीं। पहले पंचोंके कहनेसे शिवने सतीसे विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला॥ ४॥
अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥ ७९॥
aba sukha sovata socu nahi bhīkha māgi bhava khāhiṃ|
sahaja ekākinha ke bhavana kabahum̐ ki nāri khaṭāhiṃ|| 79||
Meaning अब शिवको कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुखसे सोते हैं। ऐसे स्वभावसे ही अकेले रहनेवालोंके घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं ?॥ ७९॥
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥
ajahūm̐ mānahu kahā hamārā| hama tumha kahum̐ baru nīka bicārā||
ati suṃdara suci sukhada susīlā| gāvahiṃ beda jāsu jasa līlā||
Meaning अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं॥ १॥
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥
dūṣana rahita sakala guna rāsī| śrīpati pura baikuṃṭha nivāsī||
asa baru tumhahi milāuba ānī| sunata bihasi kaha bacana bhavānī||
Meaning वह दोषोंसे रहित, सारे सदुणोंकी राशि, लक्ष्मीका स्वामी और वैकुण्ठपुरीका रहनेवाला है। हम ऐसे वरको लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं--॥ २॥
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥
कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥
satya kahehu giribhava tanu ehā| haṭha na chūṭa chūṭai baru dehā||
kanakau puni paṣāna teṃ hoī| jārehum̐ sahaju na parihara soī||
Meaning आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वतसे उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय। सोना भी पत्थरसे ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाये जानेपर भी अपने स्वभाव (सुवर्णत्व) को नहीं छोड़ता॥ ३॥
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥
nārada bacana na maiṃ pariharaūm̐| basau bhavanu ujarau nahiṃ ḍaraūm̐||
gura keṃ bacana pratīti na jehī| sapanehum̐ sugama na sukha sidhi tehī||
Meaning अत: मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोड़ेंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्रमें भी सुगम नहीं होती॥ ४॥
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ ८०॥
mahādeva avaguna bhavana biṣnu sakala guna dhāma|
jehi kara manu rama jāhi sana tehi tehī sana kāma|| 80||
Meaning माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सदुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है॥ ८०॥
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥
jauṃ tumha milatehu prathama munīsā| sunatium̐ sikha tumhāri dhari sīsā||
aba maiṃ janmu saṃbhu hita hārā| ko guna dūṣana karai bicārā||
Meaning हे मुनीश्वरो! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे ?॥ १॥
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥
jauṃ tumhare haṭha hṛdayam̐ biseṣī| rahi na jāi binu kiem̐ bareṣī||
tau kautukianha ālasu nāhīṃ| bara kanyā aneka jaga māhīṃ||
Meaning यदि आपके हृदयमें बहुत ही हठ है और विवाहकी बातचीत (बरेखी) किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसारमें वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करनेवालोंको आलस्य तो होता नहीं [और कहीं जाकर कीजिये]॥ २॥
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू॥
janma koṭi lagi ragara hamārī| baraum̐ saṃbhu na ta rahaum̐ kuārī||
tajaum̐ na nārada kara upadesū| āpu kahahi sata bāra mahesū||
Meaning मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोड़ूँगी॥ ३॥
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥
maiṃ pā paraum̐ kahai jagadaṃbā| tumha gṛha gavanahu bhayau bilaṃbā||
dekhi premu bole muni gyānī| jaya jaya jagadaṃbike bhavānī||
Meaning जगज्जननी पार्वतीजीने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [शिवजीमें पार्वतीजीका ऐसा] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले--हे जगज्जननी! हे भवानी! आपको जय हो! जय हो! !॥ ४॥
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥ ८१॥
tumha māyā bhagavāna siva sakala jagata pitu mātu|
nāi carana sira muni cale puni puni haraṣata gātu|| 81||
Meaning आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनों समस्त जगत्के माता-पिता हैं। [यह कहकर] मुनि पार्वतीजीके चरणोंमें सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे॥ ८१॥
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥
jāi muninha himavaṃtu paṭhāe| kari binatī girajahiṃ gṛha lyāe||
bahuri saptariṣi siva pahiṃ jāī| kathā umā kai sakala sunāī||
Meaning मुनियोंने जाकर हिमवान्को पार्वतीजीके पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर ससर्षियोंने शिवजीके पास जाकर उनको पार्वतीजीकी सारी कथा सुनायी॥ १॥
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥
bhae magana siva sunata sanehā| haraṣi saptariṣi gavane gehā||
manu thira kari taba saṃbhu sujānā| lage karana raghunāyaka dhyānā||
Meaning पार्वतीजीका प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्र हो गये। ससर्षि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक )को चले गये। तब सुजान शिवजी मनको स्थिर करके श्रीरघुनाथजीका ध्यान करने लगे॥ २॥
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥
तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥
tāraku asura bhayau tehi kālā| bhuja pratāpa bala teja bisālā||
teṃhi saba loka lokapati jīte| bhae deva sukha saṃpati rīte||
Meaning उसी समय तारक नामका असुर हुआ, जिसकी भुजाओंका बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालोंको जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्तिसे रहित हो गये॥ ३॥
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥
ajara amara so jīti na jāī| hāre sura kari bibidha larāī||
taba biraṃci sana jāi pukāre| dekhe bidhi saba deva dukhāre||
Meaning वह अजर-अमर था, इसलिये किसीसे जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरहकी लड़ाइयाँ लड़कर हार गये। तब उन्होंने ब्रह्माजीके पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्माजीने सब देवताओंको दुःखी देखा॥ ४॥
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥ ८२॥
saba sana kahā bujhāi bidhi danuja nidhana taba hoi|
saṃbhu sukra saṃbhūta suta ehi jītai rana soi|| 82||
Meaning ब्रह्माजीने सबको समझाकर कहा--इस दैत्यकी मृत्यु तब होगी जब शिवजीके वीर्यसे पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्धमें वही जीतेगा॥ ८२॥