संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा॥
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी॥
saṃbhu samaya tehi rāmahi dekhā| upajā hiyam̐ ati harapu biseṣā||
bhari locana chabisiṃdhu nihārī| kusamaya jānina kīnhi cinhārī||
Meaning श्रीशिवजीने उसी अवसरपर श्रीरामजीको देखा और उनके हृदयमें बहुत भारी आनन्द उत्पन्न हुआ। उन शोभाके समुद्र ( श्रीरामचन्द्रजी ) को शिवजीने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया॥ १॥
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥
jaya saccidānaṃda jaga pāvana| asa kahi caleu manoja nasāvana||
cale jāta siva satī sametā| puni puni pulakata kṛpāniketā||
Meaning जगत्के पवित्र करनेवाले सच्चिदानन्दकी जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेवका नाश करनेवाले श्रीशिवजी चल पड़े। कृपानिधान शिवजी बार-बार आनन्दसे पुलकित होते हुए सतीजीके साथ चले जा रहे थे॥ २॥
सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥
satīṃ so dasā saṃbhu kai dekhī| ura upajā saṃdehu biseṣī||
saṃkaru jagatabaṃdya jagadīsā| sura nara muni saba nāvata sīsā||
Meaning सतीजीने शड्डरजीको वह दशा देखी तो उनके मनमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हो गया। [वे मन-ही-मन कहने लगीं कि] शज्भरजीकी सारा जगत् वन्दना करता है, वे जगत्के ईश्वर हैं; देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं॥ ३॥
तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥
tinha nṛpasutahi naha paranāmā| kahi saccidānaṃda paradhamā||
bhae magana chabi tāsu bilokī| ajahum̐ prīti ura rahati na rokī||
Meaning उन्होंने एक राजपुत्रको सच्चिदानन्द परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अबतक उनके हृदयमें प्रीति रोकनेसे भी नहीं रुकती॥ ४॥
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
brahma jo vyāpaka biraja aja akala anīha abheda|
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद॥ ५०॥
so ki deha dhari hoi nara jāhi na jānata veda|| 50||
Meaning जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेद्रहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है ?॥५०॥
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥
biṣnu jo sura hita naratanu dhārī| sou sarbagya jathā tripurārī||
khojai so ki agya iva nārī| gyānadhāma śrīpati asurārī||
Meaning देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करनेवाले जो विष्णुभगवान् हैं, वे भी शिवजीकी ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञानके भण्डार, लक्ष्मीपति और असुरोंके शत्रु भगवान् विष्णु क्या अज्ञानीकी तरह स्त्रीको खोजेंगे 2॥ १॥
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥
saṃbhugirā puni mṛṣā na hoī| siva sarbagya jāna sabu koī||
asa saṃsaya mana bhayau apārā| hoī na hṛdayam̐ prabodha pracārā||
Meaning फिर शिवजीके वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं। सतीके मनमें इस प्रकारका अपार सन्देह उठ खड़ा हुआ, किसी तरह भी उनके हृदयमें ज्ञानका प्रादुर्भाव नहीं होता था॥ २॥
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥
jadyapi pragaṭa na kaheu bhavānī| hara aṃtarajāmī saba jānī||
sunahi satī tava nāri subhāū| saṃsaya asa na dharia ura kāū||
Meaning यद्यपि भवानीजीने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी शिवजी सब जान गये। वे बोले-- हे सती! सुनो, तुम्हारा स्त्रीस्वभाव है। ऐसा सन्देह मनमें कभी न रखना चाहिये॥ ३॥
जासु कथा कुभंज रिषि गाई।
भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥
jāsu kathā kubhaṃja riṣi gāī| bhagati jāsu maiṃ munihi sunāī||
सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा।
सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥
sou mama iṣṭadeva raghubīrā| sevata jāhi sadā muni dhīrā||
Meaning जिनकी कथाका अगस्त्य ऋषिने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनिको सुनायी, ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं॥ ४॥
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
muni dhīra jogī siddha saṃtata bimala mana jehi dhyāvahīṃ|
kahi neti nigama purāna āgama jāsu kīrati gāvahīṃ||
इ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुक़ुलमनी॥
i rāmu byāpaka brahma bhuvana nikāya pati māyā dhanī|
avatareu apane bhagata hita nijataṃtra nita raghuqulamanī||
Meaning ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरन्तर निर्मल चित्तसे जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र 'नेति-नेति' कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतन्त्र ब्रहारूप भगवान् श्रीरामजीने अपने भक्तोंके हितके लिये [ अपनी इच्छासे] रघुकुलके मणिरूपमें अवतार लिया है।
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सितें बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियें॥ ५१॥
lāga na ura upadesu jadapi kaheu siteṃ bāra bahu|
bole bihasi mahesu harimāyā balu jāni jiyeṃ|| 51||
Meaning यद्यपि शिवजीने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजीके हृदयमें उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मनमें भगवान्की मायाका बल जानकर मुसकराते हुए बोले--॥ ५१॥
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही॥
jauṃ tumhareṃ mana ati saṃdehū| tau kina jāi parīchā lehū||
taba lagi baiṭha ahaum̐ baṭachāhiṃ| jaba lagi tumha aihahu mohi pāhī||
Meaning जो तुम्हारे मनमें बहुत सन्देह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती ? जबतक तुम मेरे पास लौट आओगी तबतक मैं इसी बड़की छाँहमें बैठा हूँ॥ १॥
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥
jaiseṃ jāi moha bhrama bhārī| karehu so jatanu bibeka bicārī||
calīṃ satī siva āyasu pāī| karahiṃ bicāru karauṃ kā bhāī||
Meaning जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी श्रम दूर हो, [ भली भाँति] विवेकके द्वारा सोच- समझकर तुम वही करना। शिवजीकी आज्ञा पाकर सती चलीं और मनमें सोचने लगीं कि भाई! क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ) ?॥ २॥
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं॥
ihām̐ saṃbhu asa mana anumānā| dacchasutā kahum̐ nahiṃ kalyānā||
morehu kaheṃ na saṃsaya jāhīṃ| bidhī biparīta bhalāī nāhīṃ||
Meaning इधर शिवजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि दक्षकन्या सतीका कल्याण नहीं है। जब मेरे समझानेसे भी सन्देह दूर नहीं होता तब [ मालूम होता है] विधाता ही उलटे हैं, अब सतीका कुशल नहीं है॥ ३॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
hoihi soi jo rāma raci rākhā| ko kari tarka baṛhāvai sākhā||
asa kahi lage japana harināmā| gaī satī jaham̐ prabhu sukhadhāmā||
Meaning जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। [ मनमें ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे॥ ४॥
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।
आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप॥ ५२॥
puni puni hṛdayam̐ vicāru kari dhari sītā kara rupa|
āgeṃ hoi cali paṃtha tehi jehiṃ āvata narabhūpa|| 52||
Meaning सती बार-बार मनमें विचारकर सीताजीका रूप धारण करके उस मार्गकी ओर आगे होकर चलीं, जिससे [सतीजीके विचारानुसार] मनुष्योंके राजा रामचन्द्रजी आ रहे थे॥ ५२॥
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हदयें बिसेषा॥
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥
lachimana dīkha umākṛta beṣā| cakita bhae bhrama hadayeṃ biseṣā||
kahi na sakata kachu ati gaṃbhīrā| prabhu prabhāu jānata matidhīrā||
Meaning सतीजीके बनावटी वेषको देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गये और उनके हृदयमें बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके। धीरबुद्धि लक्ष्मण प्रभु रघुनाथजीके प्रभावको जानते थे॥ १॥
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥
satī kapaṭu jāneu surasvāmī| sabadarasī saba aṃtarajāmī||
sumirata jāhi miṭai agyānā| soi sarabagya rāmu bhagavānā||
Meaning सब कुछ देखनेवाले और सबके हृदयकी जाननेवाले देवताओंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सतीके कपटको जान गये; जिनके स्मरणमात्रसे अज्ञानका नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं॥ २॥
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥
निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥
satī kīnha caha taham̐hum̐ durāū| dekhahu nāri subhāva prabhāū||
nija māyā balu hṛdayam̐ bakhānī| bole bihasi rāmu mṛdu bānī||
Meaning स्त्रीस्वभावका असर तो देखो कि वहाँ (उन सर्वज्ञ भगवान्के सामने) भी सतीजी छिपाव करना चाहती हैं। अपनी मायाके बलको हदयमें बखानकर, श्रीरामचन्द्रजी हँसकर कोमल वाणीसे बोले॥ ३॥
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥
jori pāni prabhu kīnha pranāmū| pitā sameta līnha nija nāmū||
kaheu bahori kahām̐ bṛṣaketū| bipina akeli phirahu kehi hetū||
Meaning पहले प्रभुने हाथ जोड़कर सतीको प्रणाम किया और पितासहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं ? आप यहाँ वनमें अकेली किसलिये फिर रही हैं 2?॥ ४॥
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥ ५३॥
rāma bacana mṛdu gūṛha suni upajā ati saṃkocu|
satī sabhīta mahesa pahiṃ calīṃ hṛdayam̐ baṛa socu|| 53||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके कोमल और रहस्यभरे वचन सुनकर सतीजीको बड़ा संकोच हुआ। वे डरती हुई (चुपचाप) शिवजीके पास चलीं, उनके हृदयमें बड़ी चिन्ता हो गयी--॥ ५३॥
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥
maiṃ saṃkara kara kahā na mānā| nija agyānu rāma para ānā||
jāi utaru aba dehaum̐ kāhā| ura upajā ati dāruna dāhā||
Meaning -गकि मैंने शड्टरजीका कहना न माना और अपने अज्ञानका श्रीरामचन्द्रजीपर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजीको क्या उत्तर दूँगी ? [यों सोचते-सोचते] सतीजीके हृदयमें अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गयी॥ १॥
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥
jānā rāma satīṃ dukhu pāvā| nija prabhāu kachu pragaṭi janāvā||
satīṃ dīkha kautuku maga jātā| āgeṃ rāmu sahita śrī bhrātā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने जान लिया कि सतीजीको दुःख हुआ; तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके उन्हें दिखिलाया। सतीजीने मार्गमें जाते हुए यह कौतुक देखा कि श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित आगे चले जा रहे हैं। [इस अवसरपर सीताजीको इसलिये दिखाया कि सतीजी श्रीरामके सच्चिदानन्दमय रूपको देखें, वियोग और दुःखकी कल्पना जो उन्हें हुई थी वह दूर हो जाय तथा वे प्रकृतिस्थ हों]॥ २॥
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा॥
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥
phiri citavā pācheṃ prabhu dekhā| sahita baṃdhu siya suṃdara veṣā||
jaham̐ citavahiṃ taham̐ prabhu āsīnā| sevahiṃ siddha munīsa prabīnā||
Meaning [तब उन्होंने] पीछेकी ओर फिरकर देखा, तो वहाँ भी भाई लक्ष्मणजी और सीताजीके साथ श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर वेषमें दिखायी दिये। वे जिधर देखती हैं, उधर ही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं और सुचतुर सिद्ध मुनीश्वर उनकी सेवा कर रहे हैं॥३॥
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥
dekhe siva bidhi biṣnu anekā| amita prabhāu eka teṃ ekā||
baṃdata carana karata prabhu sevā| bibidha beṣa dekhe saba devā||
Meaning सतीजीने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक-से-एक बढ़कर असीम प्रभाववाले थे। [उन्होंने देखा कि] भाँति-भाँतिके वेष धारण किये सभी देवता श्रीरामचन्द्रजीकी चरणवन्दना और सेवा कर रहे हैं॥ ४॥
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥ ५४॥
satī bidhātrī iṃdirā dekhīṃ amita anūpa|
jehiṃ jehiṃ beṣa ajādi sura tehi tehi tana anurūpa|| 54||
Meaning उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। जिस-जिस रूपमें ब्रह्मा आदि देवता थे, उसीके अनुकूल रूपमें [उनकी] ये सब [शक्तियाँ] भी थीं॥ ५४॥
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥
dekhe jaham̐ taham̐ raghupati jete| saktinha sahita sakala sura tete||
jīva carācara jo saṃsārā| dekhe sakala aneka prakārā||
Meaning सतीजीने जहाँ-तहाँ जितने रघुनाथजी देखे, शक्तियोंसहित वहाँ उतने ही सारे देवताओंको भी देखा। संसारमें जो चराचर जीव हैं, वे भी अनेक प्रकारसे सब देखे॥ १॥
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥
pūjahiṃ prabhuhi deva bahu beṣā| rāma rūpa dūsara nahiṃ dekhā||
avaloke raghupati bahutere| sītā sahita na beṣa ghanere||
Meaning [उन्होंने देखा कि] अनेकों वेष धारण करके देवता प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी पूजा कर रहे हैं। परन्तु श्रीरामचन्द्रजीका दूसरा रूप कहीं नहीं देखा। सीतासहित श्रीरघुनाथजी बहुत-से देखे, परन्तु उनके वेष अनेक नहीं थे॥ २॥
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥
soi raghubara soi lachimanu sītā| dekhi satī ati bhaī sabhītā||
hṛdaya kaṃpa tana sudhi kachu nāhīṃ| nayana mūdi baiṭhīṃ maga māhīṃ||
Meaning [सब जगह] वही रघुनाथजी, वही लक्ष्मण और वही सीताजी--सती ऐसा देखकर बहुत ही डर गयीं। उनका हृदय काँपने लगा और देहकी सारी सुध-बुध जाती रही। वे आँख मूँदकर मार्गमें बैठ गयीं॥ ३॥
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥
bahuri bilokeu nayana ughārī| kachu na dīkha taham̐ dacchakumārī||
puni puni nāi rāma pada sīsā| calīṃ tahām̐ jaham̐ rahe girīsā||
Meaning फिर आँख खोलकर देखा, तो वहाँ दक्षकुमारी (सतीजी) को कुछ भी न दीख पड़ा। तब वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ श्रीशिवजी थे॥ ४॥
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥ ५५॥
gaī samīpa mahesa taba ham̐si pūchī kusalāta|
līnhī parīchā kavana bidhi kahahu satya saba bāta|| 55||
Meaning जब पास पहुँची, तब श्रीशिवजीने हँसकर कुशल-प्रश्न करके कहा कि तुमने रामजीकी किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो॥ ५५॥
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई॥
satīṃ samujhi raghubīra prabhāū| bhaya basa siva sana kīnha durāū||
kachu na parīchā līnhi gosāī| kīnha pranāmu tumhārihi nāī||
Meaning सतीजीने श्रीरघुनाथजीके प्रभावको समझकर डरके मारे शिवजीसे छिपाव किया और कहा-- हे स्वामिन् ! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, [वहाँ जाकर] आपकी ही तरह प्रणाम किया॥ १॥
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना॥
jo tumha kahā so mṛṣā na hoī| moreṃ mana pratīti ati soī||
taba saṃkara dekheu dhari dhyānā| satīṃ jo kīnha carita saba jānā||
Meaning आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मनमें यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजीने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया॥ २॥
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥
bahuri rāmamāyahi siru nāvā| preri satihi jehiṃ jhūm̐ṭha kahāvā||
hari icchā bhāvī balavānā| hṛdayam̐ bicārata saṃbhu sujānā||
Meaning फिर श्रीरामचन्द्रजीकी मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सतीके मुँहसे भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजीने मनमें विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥
satīṃ kīnha sītā kara beṣā| siva ura bhayau biṣāda biseṣā||
jauṃ aba karaum̐ satī sana prītī| miṭai bhagati pathu hoi anītī||
Meaning सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है॥ ४॥
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥ ५६॥
parama punīta na jāi taji kiem̐ prema baṛa pāpu|
pragaṭi na kahata mahesu kachu hṛdayam̐ adhika saṃtāpu|| 56||
Meaning सती परम पतित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप है॥ ५६॥
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥
taba saṃkara prabhu pada siru nāvā| sumirata rāmu hṛdayam̐ asa āvā||
ehiṃ tana satihi bheṭa mohi nāhīṃ| siva saṃkalpu kīnha mana māhīṃ||
Meaning तब शिवजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया और श्रीरामजीका स्मरण करते ही उनके मनमें यह आया कि सतीके इस शरीरसे मेरी [ पति-पत्नीरूपमें] भेंट नहीं हो सकती और शिवजीने अपने मनमें यह सड्ल्प कर लिया॥ १॥
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥
asa bicāri saṃkaru matidhīrā| cale bhavana sumirata raghubīrā||
calata gagana bhai girā suhāī| jaya mahesa bhali bhagati dṛṛhāī||
Meaning स्थिरबुद्धि शड्टरजी ऐसा विचारकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए अपने घर (कैलास) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्तिकी अच्छी दृढ़ता की॥ २॥
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥
asa pana tumha binu karai ko ānā| rāmabhagata samaratha bhagavānā||
suni nabhagirā satī ura socā| pūchā sivahi sameta sakocā||
Meaning आपको छोड़कर दूसरा कौन ऐसी प्रतिज्ञा कर सकता है ? आप श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान् हैं। इस आकाशवाणीको सुनकर सतीजीके मनमें चिन्ता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजीसे पूछा--॥ ३॥
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥
kīnha kavana pana kahahu kṛpālā| satyadhāma prabhu dīnadayālā||
jadapi satīṃ pūchā bahu bhām̐tī| tadapi na kaheu tripura ārātī||
Meaning हे कृपालु! कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है ? हे प्रभो ! आप सत्यके धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजीने बहुत प्रकारसे पूछा, परन्तु त्रिपुरारि शिवजीने कुछ न कहा॥ ४॥
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥ ५७ ( क )॥
satīṃ hṛdaya anumāna kiya sabu jāneu sarbagya|
kīnha kapaṭu maiṃ saṃbhu sana nāri sahaja jaṛa agya|| 57 ( ka )||
Meaning सतीजीने हृदयमें अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजीसे कपट किया, स्त्री स्वभावसे ही मूर्ख और बेसमझ होती हैं॥ ५७ (क)॥
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ ५७ ( ख )॥
jalu paya sarisa bikāi dekhahu prīti ki rīti bhali|
bilaga hoi rasu jāi kapaṭa khaṭāī parata puni|| 57 ( kha )||
Meaning प्रीतिकौ सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूधके साथ मिलकर] दूधके समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है॥ ५७ (ख)॥
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥
hṛdayam̐ socu samujhata nija karanī| ciṃtā amita jāi nahi baranī||
kṛpāsiṃdhu siva parama agādhā| pragaṭa na kaheu mora aparādhā||
Meaning अपनी करनीको याद करके सतीजीके हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकटमें उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा॥ १॥
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥
saṃkara rukha avaloki bhavānī| prabhu mohi tajeu hṛdayam̐ akulānī||
nija agha samujhi na kachu kahi jāī| tapai avām̐ iva ura adhikāī||
Meaning शिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामीने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदयमें व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [ भीतर-ही-भीतर; कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा॥ २॥
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥
satihi sasoca jāni bṛṣaketū| kahīṃ kathā suṃdara sukha hetū||
baranata paṃtha bibidha itihāsā| bisvanātha pahum̐ce kailāsā||
Meaning वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे॥ ३॥
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥
संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥
taham̐ puni saṃbhu samujhi pana āpana| baiṭhe baṭa tara kari kamalāsana||
saṃkara sahaja sarupa samhārā| lāgi samādhi akhaṃḍa apārā||
Meaning वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्यासन लगाकर बैठ गये। शिवजीने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी॥ ४॥
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥ ५८॥
satī basahi kailāsa taba adhika socu mana māhiṃ|
maramu na koū jāna kachu juga sama divasa sirāhiṃ|| 58||
Meaning तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था॥ ५८॥
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना॥
nita nava socu satīṃ ura bhārā| kaba jaihaum̐ dukha sāgara pārā||
maiṃ jo kīnha raghupati apamānā| punipati bacanu mṛṣā kari jānā||
Meaning सतीजीके हृदयमें नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दु:ःख-समुद्रके पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना--॥ १॥
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥
अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥
so phalu mohi bidhātām̐ dīnhā| jo kachu ucita rahā soi kīnhā||
aba bidhi asa būjhia nahi tohī| saṃkara bimukha jiāvasi mohī||
Meaning उसका फल विधाताने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शड्धरसे विमुख होनेपर भी मुझे जिला रहा है॥ २॥
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामाहि सुमिर सयानी॥
जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥
kahi na jāī kachu hṛdaya galānī| mana mahum̐ rāmāhi sumira sayānī||
jau prabhu dīnadayālu kahāvā| āratī harana beda jasu gāvā||
Meaning सतीजीके हृदयकी ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजीने मनमें श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया और कहा--हे प्रभो ! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदोंने आपका यह यश गाया है कि आप दु:खको हरनेवाले हैं,॥ ३॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥
जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥
tau maiṃ binaya karaum̐ kara jorī| chūṭau begi deha yaha morī||
jauṃ more siva carana sanehū| mana krama bacana satya bratu ehū||
Meaning तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजीके चरणोंमें प्रेम है और मेरा यह [ प्रेमका] व्रत मन, वचन और कर्म (आचरण) से सत्य है,॥ ४॥
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥ ५९॥
tau sabadarasī sunia prabhu karau so begi upāi|
hoi maranu jehī binahiṃ śrama dusaha bipatti bihāi|| 59||
Meaning तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [ पति-परित्यागरूपी ] असह्य विपत्ति दूर हो जाय॥ ५९॥
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥
ehi bidhi dukhita prajesakumārī| akathanīya dāruna dukhu bhārī||
bīteṃ saṃbata sahasa satāsī| tajī samādhi saṃbhu abināsī||
Meaning दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जानेपर अविनाशी शिवजीने समाधि खोली॥ १॥
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥
rāma nāma siva sumirana lāge| jāneu satīṃ jagatapati jāge||
jāi saṃbhu pada baṃdanu kīnhī| sanamukha saṃkara āsanu dīnhā||
Meaning शिवजी रामनामका स्मरण करने लगे, तब सतीजीने जाना कि अब जगत्के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजीके चरणोंमें प्रणाम किया। शिवजीने उनको बैठनेके लिये सामने आसन दिया॥ २॥
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥
lage kahana harikathā rasālā| daccha prajesa bhae tehi kālā||
dekhā bidhi bicāri saba lāyaka| dacchahi kīnha prajāpati nāyaka||
Meaning शिवजी भगवान् हरिकी रसमयी कथाएँ कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजीने सब प्रकारसे योग्य देख-समझकर दक्षको प्रजापतियोंका नायक बना दिया॥ ३॥
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥
baṛa adhikāra daccha jaba pāvā| ati abhimānu hṛdayam̐ taba āvā||
nahiṃ kou asa janamā jaga māhīṃ| prabhutā pāi jāhi mada nāhīṃ||
Meaning जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया। जगतमें ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो॥ ४॥
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥ ६०॥
daccha lie muni boli saba karana lage baṛa jāga|
nevate sādara sakala sura je pāvata makha bhāga|| 60||
Meaning दक्षने सब मुनियोंको बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञका भाग पाते हैं, दक्षने उन सबको आदरसहित निमन्त्रित किया॥ ६०॥
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥
kiṃnara nāga siddha gaṃdharbā| badhunha sameta cale sura sarbā||
biṣnu biraṃci mahesu bihāī| cale sakala sura jāna banāī||
Meaning [ दक्षका निमन्त्रण पाकर] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीको छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले॥ १॥
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥
satīṃ biloke byoma bimānā| jāta cale suṃdara bidhi nānā||
sura suṃdarī karahiṃ kala gānā| sunata śravana chūṭahiṃ muni dhyānā||
Meaning सतीजीने देखा अनेकों प्रकारके सुन्दर विमान आकाशमें चले जा रहे हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियोंका ध्यान छूट जाता है॥ २॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥
pūcheu taba sivam̐ kaheu bakhānī| pitā jagya suni kachu haraṣānī||
jauṃ mahesu mohi āyasu dehīṃ| kucha dina jāi rahauṃ misa ehīṃ||
Meaning सतीजीने [विमानोंमें देवताओंके जानेका कारण] पूछा, तब शिवजीने सब बातें बतलायीं। पिताके यज्ञकी बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुई और सोचने लीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ॥ ३॥
पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥
pati parityāga hṛdaya dukhu bhārī| kahai na nija aparādha bicārī||
bolī satī manohara bānī| bhaya saṃkoca prema rasa sānī||
Meaning क्योंकि उनके हृदयमें पतिद्वारा त्यागी जानेका बड़ा भारी दु:ख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरसमें सनी हुई मनोहर वाणीसे बोलीं--॥ ४॥
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥ ६१॥
pitā bhavana utsava parama jauṃ prabhu āyasu hoi|
tau mai jāum̐ kṛpāyatana sādara dekhana soi|| 61||
Meaning हे प्रभो! मेरे पिताके घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ॥ ६१॥
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई॥
kahehu nīka morehum̐ mana bhāvā| yaha anucita nahiṃ nevata paṭhāvā||
daccha sakala nija sutā bolāī| hamareṃ bayara tumhau bisarāī||
Meaning शिवजीने कहा--तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मनको भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्षने अपनी सब लड़कियोंको बुलाया है; किन्तु हमारे वैरके कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया॥ १॥
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥
brahmasabhām̐ hama sana dukhu mānā| tehi teṃ ajahum̐ karahiṃ apamānā||
jauṃ binu boleṃ jāhu bhavānī| rahai na sīlu sanehu na kānī||
Meaning एक बार ब्रह्माकी सभामें हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। है भवानी ! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्त्रेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी॥ २॥
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥
jadapi mitra prabhu pitu gura gehā| jāia binu bolehum̐ na sam̐dehā||
tadapi birodha māna jaham̐ koī| tahām̐ gaem̐ kalyānu na hoī||
Meaning यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता॥ ३॥
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥
bhām̐ti aneka saṃbhu samujhāvā| bhāvī basa na gyānu ura āvā||
kaha prabhu jāhu jo binahiṃ bolāem̐| nahiṃ bhali bāta hamāre bhāem̐||
Meaning शिवजीने बहुत प्रकारसे समझाया, पर. होनहारवश सतीके. हदयमें बोध नहीं हुआ। फिर शिवजीने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझमें अच्छी बात न होगी॥ ४॥
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥ ६२॥
kahi dekhā hara jatana bahu rahai na dacchakumāri|
die mukhya gana saṃga taba bidā kīnha tripurāri|| 62||
Meaning शिवजीने बहुत प्रकारसे कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजीने अपने मुख्य गणोंको साथ देकर उनको विदा कर दिया॥ ६२॥
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥
pitā bhavana jaba gaī bhavānī| daccha trāsa kāhum̐ na sanamānī||
sādara bhalehiṃ milī eka mātā| bhaginīṃ milīṃ bahuta musukātā||
Meaning भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँचीं, तब दक्षके डरके मारे किसीने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदरसे मिली। बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं॥ १॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥
daccha na kachu pūchī kusalātā| satihi biloki jare saba gātā||
satīṃ jāi dekheu taba jāgā| katahum̐ na dīkha saṃbhu kara bhāgā||
Meaning दक्षने तो उनकी कुछ कुशलतक नहीं पूछी, सतीजीको देखकर उलटे उनके सारे अड्ज जल उठे। तब सतीने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजीका भाग दिखायी नहीं दिया॥ २॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥
taba cita caṛheu jo saṃkara kaheū| prabhu apamānu samujhi ura daheū||
pāchila dukhu na hṛdayam̐ asa byāpā| jasa yaha bhayau mahā paritāpā||
Meaning तब शिवजीने जो कहा था वह उनकी समझमें आया। स्वामीका अपमान समझकर सतीका हृदय जल उठा। पिछला (पतिपरित्यागका) दुःख उनके हृदयमें उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय (पति-अपमानके कारण) हुआ॥ ३॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥
jadyapi jaga dāruna dukha nānā| saba teṃ kaṭhina jāti avamānā||
samujhi so satihi bhayau ati krodhā| bahu bidhi jananīṃ kīnha prabodhā||
Meaning यद्यपि जगत्में अनेक प्रकारके दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजीको बड़ा क्रोध हो आया। माताने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया- बुझाया॥ ४॥
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥ ६३॥
siva apamānu na jāi sahi hṛdayam̐ na hoi prabodha|
sakala sabhahi haṭhi haṭaki taba bolīṃ bacana sakrodha|| 63||
Meaning परन्तु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं--॥ ६३॥
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा।
कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥
sunahu sabhāsada sakala muniṃdā| kahī sunī jinha saṃkara niṃdā||
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ।
भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥
so phalu turata lahaba saba kāhūm̐| bhalī bhām̐ti pachitāba pitāhūm̐||
Meaning हे सभासदो और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगोंने यहाँ शिवजीकी निन््दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछतायँगे॥ १॥
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥
saṃta saṃbhu śrīpati apabādā| sunia jahām̐ taham̐ asi marajādā||
kāṭia tāsu jībha jo basāī| śravana mūdi na ta calia parāī||
Meaning जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्की निन््दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निन्दा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर वहाँसे भाग जाय॥ २॥
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥
jagadātamā mahesu purārī| jagata janaka saba ke hitakārī||
pitā maṃdamati niṃdata tehī| daccha sukra saṃbhava yaha dehī||
Meaning त्रिपुर दैत्यको मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षहीके वीर्यसे उत्पन्न है॥ ३॥
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥
tajihaum̐ turata deha tehi hetū| ura dhari caṃdramauli bṛṣaketū||
asa kahi joga agini tanu jārā| bhayau sakala makha hāhākārā||
Meaning इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजीको हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्रिमें अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया॥ ४॥
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥ ६४॥
satī maranu suni saṃbhu gana lage karana makha khīsa|
jagya bidhaṃsa biloki bhṛgu racchā kīnhi munīsa|| 64||
Meaning सतीका मरण सुनकर शिवजीके गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीधर भृगुजीने उसकी रक्षा की॥ ६४॥