एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥
ehi bidhi saba saṃsaya kari dūrī| sira dhari gura pada paṃkaja dhūrī||
puni sabahī binavaum̐ kara jorī| karata kathā jehiṃ lāga na khorī||
Meaning इस प्रकार सब संदेहोंको दूर करके और श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजको सिरपर धारण करके मैं पुन: हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथाकी रचनामें कोई दोष स्पर्श न करने पावे॥ १॥
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥
संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥
sādara sivahi nāi aba māthā| baranaum̐ bisada rāma guna gāthā||
saṃbata soraha sai ekatīsā| karaum̐ kathā hari pada dhari sīsā||
Meaning अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजीको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी निर्मल कथा कहता हूँ। श्रीहरिकि चरणोंपर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथाका आरम्भ करता हूँ॥ २॥
नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥
naumī bhauma bāra madhu māsā| avadhapurīṃ yaha carita prakāsā||
jehi dina rāma janama śruti gāvahiṃ| tīratha sakala tahām̐ cali āvahiṃ||
Meaning चैत्र मासकी नवमी तिथि मंगलवारको श्रीअयोध्याजीमें यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीरामजीका जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ ( श्रीअयोध्याजीमें ) चले आते हैं॥ ३॥
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥
asura nāga khaga nara muni devā| āi karahiṃ raghunāyaka sevā||
janma mahotsava racahiṃ sujānā| karahiṃ rāma kala kīrati gānā||
Meaning असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजीमें आकर श्रीरघुनाथजीकी सेवा करते हैं। बुद्धिमान् लोग जन्मका महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजीकी सुन्दर कीर्तिका गान करते हैं॥ ४॥
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥ ३
majjahi sajjana bṛṃda bahu pāvana sarajū nīra|
japahiṃ rāma dhari dhyāna ura suṃdara syāma sarīra|| 3
Meaning सज्जनोंके बहुत-से समूह उस दिन श्रीसरयूजीके पवित्र जलमें स्नान करते हैं और हृदयमें सुन्दर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीका ध्यान करके उनके नामका जप करते हैं॥ ३४॥
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥
नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति॥
darasa parasa majjana aru pānā| harai pāpa kaha beda purānā||
nadī punīta amita mahimā ati| kahi na sakai sārada bimalamati||
Meaning वेद-पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजीका दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापोंको हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धिवाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं॥ १॥
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥
चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा॥
rāma dhāmadā purī suhāvani| loka samasta bidita ati pāvani||
cāri khāni jaga jīva apārā| avadha taje tanu nahi saṃsārā||
Meaning यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजीके परमधामकी देनेवाली है, सब लोकोंमें प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है। जगत्में [ अण्डज, स्वेदज, उद्धिज्ज और जरायुज] चार खानि (प्रकार) के अनन्त जीव हैं, इनमेंसे जो कोई भी अयोध्याजीमें शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसारमें नहीं आते ( जन्म-मृत्युके चक्करसे छूटकर भगवान्के परमधाममें निवास करते हैं)॥ २॥
सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी॥
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा॥
saba bidhi purī manohara jānī| sakala siddhiprada maṃgala khānī||
bimala kathā kara kīnha araṃbhā| sunata nasāhiṃ kāma mada daṃbhā||
Meaning इस अयोध्यापुरीको सब प्रकारसे मनोहर, सब सिद्धियोंकी देनेवाली और कल्याणकी खान समझकर मैंने इस निर्मल कथाका आरम्भ किया, जिसके सुननेसे काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं॥ ३॥
एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥
मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई॥
ehi nāmā| sunata śravana pāia biśrāmā||
mana kari viṣaya anala bana jaraī| hoi sukhī jau ehiṃ sara paraī||
Meaning इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानोंसे सुनते ही शान्ति मिलती है। मनरूपी हाथी विषय- रूपी दावानलमें जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानसरूपी सरोवरमें आ पड़े तो सुखी हो जाय॥ ४॥
मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन॥
muni bhāvana| biraceu saṃbhu suhāvana pāvana||
tribidha doṣa dukha dārida dāvana| kali kucāli kuli kaluṣa nasāvana||
Meaning यह रामचरितमानस मुनियोंका प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानसकी शिवजीने रचना की। यह तीनों प्रकारके दोषों, दुःखों और दरिद्रताको तथा कलियुगकी कुचालों और सब पापोंका नाश करनेवाला है॥ ५॥
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥
तातें बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥
raci mahesa nija mānasa rākhā| pāi susamau sivā sana bhāṣā||
tāteṃ bara| dhareu nāma hiyam̐ heri haraṣi hara||
Meaning श्रीमहादेवजीने इसको रचकर अपने मनमें रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजीसे ' कहा। इसीसे शिवजीने इसको अपने हृदयमें देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर रामचरितमानस' नाम रखा॥ ६॥
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई।
सादर सुनहु सुजन मन लाई॥
kahaum̐ kathā soi sukhada suhāī| sādara sunahu sujana mana lāī||
Meaning मैं उसी सुख देनेवाली सुहावनी रामकथाको कहता हूँ, हे सज्जनो! आदरपूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये॥ ७॥
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥ ३५॥
jasa mānasa jehi bidhi bhayau jaga pracāra jehi hetu|
aba soi kahaum̐ prasaṃga saba sumiri umā bṛṣaketu|| 35||
Meaning यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतुसे जगत्में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्रीउमा-महेश्वरका स्मरण करके कहता हूँ॥ ३५॥
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। कबि तुलसी॥
करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥
saṃbhu prasāda sumati hiyam̐ hulasī| kabi tulasī||
karai manohara mati anuhārī| sujana sucita suni lehu sudhārī||
Meaning श्रीशिवजीकी कृपासे उसके हृदयमें सुन्दर बुद्धिका विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानसका कवि हुआ। अपनी बुद्धिकि अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है। किंतु फिर भी हे सज्जनो! सुन्दर चित्तसे सुनकर इसे आप सुधार लीजिये॥ १॥
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥
बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥
sumati bhūmi thala hṛdaya agādhū| beda purāna udadhi ghana sādhū||
baraṣahiṃ rāma sujasa bara bārī| madhura manohara maṃgalakārī||
Meaning सुन्दर (सात्तविकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीरामजीके सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मज़्लकारी जलकी वर्षा करते हैं॥ २॥
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥
līlā saguna jo kahahiṃ bakhānī| soi svacchatā karai mala hānī||
prema bhagati jo barani na jāī| soi madhuratā susītalatāī||
Meaning सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जलकी मधुरता और सुन्दर शीतलता है॥ ३॥
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥
मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥
so jala sukṛta sāli hita hoī| rāma bhagata jana jīvana soī||
medhā mahi gata so jala pāvana| sakili śravana maga caleu suhāvana||
bhareu sumānasa suthala thirānā| sukhada sīta ruci cāru cirānā||
Meaning वह (राम-सुयशरूपी ) जल सत्कर्मरूपी धानके लिये हितकर है और श्रीरामजीके भक्तोंका तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वीपर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्गसे चला और मानस (हृदय) रूपी श्रेष्ठ स्थानमें भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया॥ ४-५॥
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥ ३६॥
suṭhi suṃdara saṃbāda bara birace buddhi bicāri|
tei ehi pāvana subhaga sara ghāṭa manohara cāri|| 36||
Meaning इस कथामें बुद्धिसि विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद ( भुशुण्डि-गरुड़ू, शिव- पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुन्दर सरोवरके चार मनोहर घाट हैं॥ ३६॥
रघुपति महिमा अगुन अबाधा।
बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥
raghupati mahimā aguna abādhā| baranaba soi bara bāri agādhā||
Meaning सात काण्ड ही इस मानस-सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्रीरघुनाथजीकी निर्गुण (प्राकृतिक गुणोंसे अतीत) और निर्वाध (एकरस) महिमाका जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है॥ १॥
राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥
पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥
rāma sīya jasa salila sudhāsama| upamā bīci bilāsa manorama||
puraini saghana cāru caupāī| juguti maṃju mani sīpa suhāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीका यश अमृतके समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरड्डोंका मनोहर विलास है। सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविताकी युक्तियाँ सुन्दर मणि (मोती) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं॥ २॥
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥
अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥
chaṃda soraṭhā suṃdara dohā| soi bahuraṃga kamala kula sohā||
aratha anūpa sumāva subhāsā| soi parāga makaraṃda subāsā||
Meaning जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलोंके समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग (पुष्परज), मकरन्द (पुष्परस) और सुगन्ध हैं॥ ३॥
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥
धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥
sukṛta puṃja maṃjula ali mālā| gyāna birāga bicāra marālā||
dhuni avareba kabita guna jātī| mīna manohara te bahubhām̐tī||
Meaning सत्कर्मों (पुण्यों) के पुज्न भौंरोंकी सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविताकी ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकारकी मनोहर मछलियाँ हैं॥ ४॥
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥
नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥
aratha dharama kāmādika cārī| kahaba gyāna bigyāna bicārī||
nava rasa japa tapa joga birāgā| te saba jalacara cāru taṛāgā||
Meaning अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष--ये चारों, ज्ञान-विज्ञानका विचारके कहना, काव्यके नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्यके प्रसंग--ये सब इस सरोवरके सुन्दर जलचर जीव हैं॥ ५॥
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना॥
संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥
sukṛtī sādhu nāma guna gānā| te bicitra jala bihaga samānā||
saṃtasabhā cahum̐ disi avam̐rāī| śraddhā ritu basaṃta sama gāī||
Meaning सुकृती (पुण्यात्मा) जनोंके, साधुओंके और श्रीरामनामके गुणोंका गान ही विचित्र जल- पक्षियोंके समान है। संतोंकी सभा ही इस सरोवरके चारों ओरकी अमराई (आमकी बगीचियाँ ) हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतुके समान कही गयी है॥ ६॥
भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥
सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना॥
bhagati nirupana bibidha bidhānā| chamā dayā dama latā bitānā||
sama jama niyama phūla phala gyānā| hari pata rati rasa beda bakhānā||
Meaning नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह ) लताओंके मण्डप हैं। मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईध्रप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है। ऐसा वेदोंने कहा है॥७॥
औरउ कथा अनेक प्रसंगा।
तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥
aurau kathā aneka prasaṃgā| tei suka pika bahubarana bihaṃgā||
Meaning इस (रामचरितमानस) में और भी जो अनेक प्रसड्ओोंकी कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं॥ ८॥
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥ ३७॥
pulaka bāṭikā bāga bana sukha subihaṃga bihāru|
mālī sumana saneha jala sīṃcata locana cāru|| 37||
Meaning कथामें जो रोमाज्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्वारा उनको सींचता है॥ ३७॥
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे॥
सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी॥
je gāvahiṃ yaha carita sam̐bhāre| tei ehi tāla catura rakhavāre||
sadā sunahiṃ sādara nara nārī| tei surabara mānasa adhikārī||
Meaning जो लोग इस चरित्रको सावधानीसे गाते हैं, वे ही इस तालाबके चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानसके अधिकारी उत्तम देवता हैं॥ १॥
अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा॥
संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥
ati khala je biṣaī baga kāgā| ehiṃ sara nikaṭa na jāhiṃ abhāgā||
saṃbuka bheka sevāra samānā| ihām̐ na biṣaya kathā rasa nānā||
Meaning जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवरके समीप नहीं जाते। क्योंकि यहाँ (इस मानस-सरोवरमें ) घोंघे, मेढडक और सेवारके समान विषय-रसकी नाना कथाएँ नहीं हैं॥ २॥
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥
आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥
tehi kārana āvata hiyam̐ hāre| kāmī kāka balāka bicāre||
āvata ehiṃ sara ati kaṭhināī| rāma kṛpā binu āi na jāī||
Meaning इसी कारण बेचारे कौवे और बगुलेरूपी विषयी लोग यहाँ आते हुए हदयमें हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवरतक आनेमें कठिनाइयाँ बहुत हैं। श्रीरामजीकी कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता॥ ३॥
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥
kaṭhina kusaṃga kupaṃtha karālā| tinha ke bacana bāgha hari byālā||
gṛha kāraja nānā jaṃjālā| te ati durgama saila bisālā||
Meaning घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियोंके वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं। घरके काम-काज और गृहस्थीके भाँति-भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं॥ ४॥
बन बहु बिषम मोह मद माना।
नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥
bana bahu biṣama moha mada mānā| nadīṃ kutarka bhayaṃkara nānā||
Meaning मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं॥५॥
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ।
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ ३८॥
je śraddhā saṃbala rahita nahi saṃtanha kara sātha|
tinha kahum̐ mānasa agama ati jinhahi na priya raghunātha|| 38||
Meaning जिनके पास श्रद्धारूपी राह-खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता)॥ ३८॥
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई॥
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥
jauṃ kari kaṣṭa jāi puni koī| jātahiṃ nīṃda juṛāī hoī||
jaṛatā jāṛa biṣama ura lāgā| gaehum̐ na majjana pāva abhāgā||
Meaning यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँतक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नींदरूपी जूड़ी आ जाती है। हृदयमें मूर्खतारूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह आअभागा स्नान नहीं कर पाता॥ १॥
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥
kari na jāi sara majjana pānā| phiri āvai sameta abhimānā||
jauṃ bahori kou pūchana āvā| sara niṃdā kari tāhi bujhāvā||
Meaning उससे उस सरोवरमें स्रान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमानसहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [वहाँका हाल] पूछने आता है, तो वह [अपने अभाग्यकी बात न कहकर] सरोवरकी निन््दा करके उसे समझाता है॥ २॥
सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही।
राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥
sakala bighna byāpahi nahiṃ tehī| rāma sukṛpām̐ bilokahiṃ jehī||
सोइ सादर सर मज्जनु करई।
महा घोर त्रयताप न जरई॥
soi sādara sara majjanu karaī| mahā ghora trayatāpa na jaraī||
Meaning ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते (बाधा नहीं देते) जिसे श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर कृपाकी दृष्टिसे देखते हैं। वही आदरपूर्वक इस सरोवरमें स्रान करता है और महान् भयानक त्रितापसे ( आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापोंसे) नहीं जलता॥ ३॥
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ॥
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥
te nara yaha sara tajahiṃ na kāū| jinha ke rāma carana bhala bhāū||
jo nahāi caha ehiṃ sara bhāī| so satasaṃga karau mana lāī||
Meaning जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते। हे भाई! जो इस सरोवरमें स्रान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे॥ ४॥
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥
asa mānasa mānasa cakha cāhī| bhai kabi buddhi bimala avagāhī||
bhayau hṛdayam̐ ānaṃda uchāhū| umageu prema pramoda prabāhū||
Meaning ऐसे मानस-सरोवरको हृदयके नेत्रोंसे देखकर और उसमें गोता लगाकर कविकी बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदयमें आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा आनन्दका प्रवाह उमड़ आया॥ ५॥
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥
calī subhaga kabitā saritā so| rāma bimala jasa jala bharitā so||
sarajū nāma sumaṃgala mūlā| loka beda mata maṃjula kūlā||
Meaning उससे वह सुन्दर कवितारूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजीका निर्मल यशरूपी जल भरा है। इस(कवितारूपिणी नदी) का नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मज़लोंकी जड़ है। लोकमत और वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं॥६॥
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि।
कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥
nadī punīta sumānasa naṃdini| kalimala tṛna taru mūla nikaṃdini||
Meaning यह सुन्दर मानस-सरोवरकी कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुगके [छोटे-बड़े] पापरूपी तिनकों और वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाली है॥ ७॥
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल॥
śrotā tribidha samāja pura grāma nagara duhum̐ kūla|
saṃtasabhā anupama avadha sakala sumaṃgala mūla||
Meaning तीनों प्रकारके श्रोताओंका समाज ही इस नदीके दोनों किनारोंपर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतोंकी सभा ही सब सुन्दर मज़लोंकी जड़ अनुपम अयोध्याजी है॥ ३९॥
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥
rāmabhagati surasaritahi jāī| milī sukīrati saraju suhāī||
sānuja rāma samara jasu pāvana| mileu mahānadu sona suhāvana||
Meaning सुन्दर कौर्तिरूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्तिरूपी गड़ाजीमें जा मिलीं। छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामजीके युद्धका पवित्र यशरूपी सुहावना महानद सोन उसमें आ मिला॥ १॥
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी॥
juga bica bhagati devadhuni dhārā| sohati sahita subirati bicārā||
tribidha tāpa trāsaka timuhānī| rāma sarupa siṃdhu samuhānī||
Meaning दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गड़ाजीकी धारा ज्ञान और वैराग्यके सहित शोभित हो रही है। ऐसी तीनों तापोंको डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्रकी ओर जा रही है॥ २॥
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥
mānasa mūla milī surasarihī| sunata sujana mana pāvana karihī||
bica bica kathā bicitra bibhāgā| janu sari tīra tīra bana bāgā||
Meaning इस (कीर्तिरूपी सरयू) का मूल मानस (श्रीरामचरित) है और यह [रामभक्तिरूपी] गड़ाजीमें मिली है, इसलिये यह सुननेवाले सज्जनोंके मनको पवित्र कर देगी। इसके बीच-बीचमें जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदीतटके आस-पासके वन और बाग हैं॥ ३॥
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥
रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥
umā mahesa bibāha barātī| te jalacara aganita bahubhām̐tī||
raghubara janama anaṃda badhāī| bhavam̐ra taraṃga manoharatāī||
Meaning श्रीपार्वतीजी और शिवजीके विवाहके बराती इस नदीमें बहुत प्रकारके असंख्य जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजीके जन्मकी आनन्द-बधाइयाँ ही इस नदीके भँवर और तरंगोंकी मनोहरता है॥ ४॥
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग॥ ४०॥
bālacarita cahu baṃdhu ke banaja bipula bahuraṃga|
nṛpa rānī parijana sukṛta madhukara bāribihaṃga|| 40||
Meaning चारों भाइयोंके जो बालचरित हैं, वे ही इसमें खिले हुए रंग-बिरंगे बहुत-से कमल हैं। महाराज श्रीदशरथजी तथा उनकी रानियों और कुट्म्बियोंके सत्कर्म (पुण्य) ही शभ्रमर और जल- पक्षी हैं॥ ४०॥
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥
sīya svayaṃbara kathā suhāī| sarita suhāvani so chabi chāī||
nadī nāva paṭu prasna anekā| kevaṭa kusala utara sabibekā||
Meaning श्रीसीताजीके स्वयंवरकी जो सुन्दर कथा है, वही इस नदीमें सुहावनी छबि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदीकी नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं॥ १॥
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥
suni anukathana paraspara hoī| pathika samāja soha sari soī||
ghora dhāra bhṛgunātha risānī| ghāṭa subaddha rāma bara bānī||
Meaning इस कथाको सुनकर पीछे जो आपसभें चर्चा होती है, वही इस नदीके सहारे-सहारे चलनेवाले यात्रियोंका समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजीका क्रोध इस नदीकी भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं॥ २॥
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥
sānuja rāma bibāha uchāhū| so subha umaga sukhada saba kāhū||
kahata sunata haraṣahiṃ pulakāhīṃ| te sukṛtī mana mudita nahāhīṃ||
Meaning भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्साह ही इस कथा-नदीकी कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभीको सुख देनेवाली है। इसके कहने-सुननेमें जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मनसे इस नदीमें नहाते हैं॥ ३॥
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥
rāma tilaka hita maṃgala sājā| paraba joga janu jure samājā||
kāī kumati kekaī kerī| parī jāsu phala bipati ghanerī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलकके लिये जो मज़ल-साज सजाया गया, वही मानो पर्वके समय इस नदीपर यात्रियोंके समूह इकट्ठे हुए हैं। कैकेयीकी कुबुद्धि ही इस नदीमें काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी॥ ४॥
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥ ४ २9१
samana amita utapāta saba bharatacarita japajāga|
kali agha khala avaguna kathana te jalamala baga kāga|| 4 291
Meaning सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातोंको शान्त करनेवाला भरतजीका चरित्र नदी-तटपर किया जानेवाला जपयज्ञ है। कलियुगके पापों और दुष्टोंके अवगुणोंके जो वर्णन हैं वे ही इस नदीके जलका कीचड़ और बगुले-कौए हैं॥ ४१॥
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥
kīrati sarita chahūm̐ ritu rūrī| samaya suhāvani pāvani bhūrī||
hima himasailasutā siva byāhū| sisira sukhada prabhu janama uchāhū||
Meaning यह कौीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओंगें सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वतीका विवाह हेमन्त ऋतु है। श्रीरामचन्द्रजीके जन्मका उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है॥ १॥
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥
baranaba rāma bibāha samājū| so muda maṃgalamaya riturājū||
grīṣama dusaha rāma banagavanū| paṃthakathā khara ātapa pavanū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके विवाह-समाजका वर्णन ही आनन्द-मज़लमय ऋतुराज वसंत है। श्रीरामजीका वनगमन दु:सह ग्रीष्म-ऋतु है और मार्गकी कथा ही कड़ी धूप और लू है॥ २॥
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥
baraṣā ghora nisācara rārī| surakula sāli sumaṃgalakārī||
rāma rāja sukha binaya baṛāī| bisada sukhada soi sarada suhāī||
Meaning राक्षसोंके साथ घोर युद्ध ही वर्षा-ऋतु है, जो देवकुलरूपी धानके लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है। रामचन्द्रजीके राज्यकालका जो सुख, विनम्रता और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरदू-ऋतु है॥ ३॥
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥
satī siromani siya gunagāthā| soi guna amala anūpama pāthā||
bharata subhāu susītalatāī| sadā ekarasa barani na jāī||
Meaning सती-शिरोमणि श्रीसीताजीके गुणोंकी जो कथा है, वही इस जलका निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजीका स्वभाव इस नदीकी सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ४॥
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥ ४२॥
avalokani bolani milani prīti parasapara hāsa|
bhāyapa bhali cahu baṃdhu kī jala mādhurī subāsa|| 42||
Meaning चारों भाइयोंका परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरेसे प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपन इस जलकी मधुरता और सुगन्ध हैं॥ ४२॥
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥
ārati binaya dīnatā morī| laghutā lalita subāri na thorī||
adabhuta salila sunata gunakārī| āsa piāsa manomala hārī||
Meaning मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जलका कम हलकापन नहीं है ( अर्थात् अत्यन्त हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुननेसे ही गुण करता है और आशारूपी प्यासको और मनके मैलको दूर कर देता है॥ १॥
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥
rāma supremahi poṣata pānī| harata sakala kali kaluṣa galānī||
bhava śrama soṣaka toṣaka toṣā| samana durita dukha dārida doṣā||
Meaning यह जल श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमको पुष्ठ करता है, कलियुगके समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानिको हर लेता है। संसारके (जन्म-मृत्युरूप) श्रमको सोख लेता है, सन्तोषको भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषोंको नष्ट कर देता है॥ २॥
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥
kāma koha mada moha nasāvana| bimala bibeka birāga baṛhāvana||
sādara majjana pāna kie teṃ| miṭahiṃ pāpa paritāpa hie teṃ||
Meaning यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है। इसमें आदरपूर्वक स्त्लान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं॥ ३॥
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥
jinha ehi bāri na mānasa dhoe| te kāyara kalikāla bigoe||
tṛṣita nirakhi rabi kara bhava bārī| phirihahi mṛga jimi jīva dukhārī||
Meaning जिन्होंने इस (राम-सुयशरूपी ) जलसे अपने हृदयको नहीं धोया, वे कायर कलिकालके द्वारा ठगे गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्यकी किरणोंके रेतपर पड़नेसे उत्पन्न हुए जलके श्रमको वास्तविक जल समझकर पीनेको दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुगसे ठगे हुए) जीव भी [विषयोंके पीछे भटककर] दुःखी होंगे॥ ४॥
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥ ४३ (क )॥
mati anuhāri subāri guna gani mana anhavāi|
sumiri bhavānī saṃkarahi kaha kabi kathā suhāi|| 43 (ka )||
Meaning अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर जलके गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी-शड्भरको स्मरण करके कवि ( तुलसीदास ) सुन्दर कथा कहता है॥ ४३ (क)॥
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।
कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद॥ ४३ (ख)॥
aba raghupati pada paṃkaruha hiyam̐ dhari pāi prasāda|
kahaum̐ jugala munibarja kara milana subhaga saṃbāda|| 43 (kha)||
Meaning मैं अब श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारणकर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ॥ ४३ (ख)॥
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥
bharadvāja muni basahiṃ prayāgā| tinhahi rāma pada ati anurāgā||
tāpasa sama dama dayā nidhānā| paramāratha patha parama sujānā||
Meaning भरद्वाज मुनि प्रयागमें बसते हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं॥ १॥
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥
māgha makaragata rabi jaba hoī| tīrathapatihiṃ āva saba koī||
deva danuja kiṃnara nara śrenī| sādara majjahiṃ sakala tribenīṃ||
Meaning माघमें जब सूर्य मकर राशिपर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयागको आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्योंके समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणीमें स्नान करते हैं॥ २॥
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥
pūjahi mādhava pada jalajātā| parasi akhaya baṭu haraṣahiṃ gātā||
bharadvāja āśrama ati pāvana| parama ramya munibara mana bhāvana||
Meaning श्रीवेणीमाधवजीके चरणकमलोंको पूजते हैं और अक्षयवटका स्पर्शकर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजीका आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियोंके मनको भानेवाला है॥ ३॥
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥
tahām̐ hoi muni riṣaya samājā| jāhiṃ je majjana tīratharājā||
majjahiṃ prāta sameta uchāhā| kahahiṃ parasapara hari guna gāhā||
Meaning तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ ( भरद्वाजके आश्रममें ) जुटता है। प्रात:काल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्के गुणोंकी कथाएँ कहते हैं॥ ४॥
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥ ४॥
brahma nirūpama dharama bidhi baranahiṃ tattva bibhāga|
kahahiṃ bhagati bhagavaṃta kai saṃjuta gyāna birāga|| 4||
Meaning ब्रह्मका निरूपण, धर्मका विधान और तत्त्वोंके विभागका वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त भगवानूकी भक्तिका कथन करते हैं॥ ४४॥
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥
ehi prakāra bhari māgha nahāhīṃ| puni saba nija nija āśrama jāhīṃ||
prati saṃbata ati hoi anaṃdā| makara majji gavanahiṃ munibṛṃdā||
Meaning इसी प्रकार माघके महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमोंको चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं॥ १॥
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी॥
eka bāra bhari makara nahāe| saba munīsa āśramanha sidhāe||
jagabālika muni parama bibekī| bharavdāja rākhe pada ṭekī||
Meaning एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनी श्र अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये। परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया॥ २॥
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥
करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥
sādara carana saroja pakhāre| ati punīta āsana baiṭhāre||
kari pūjā muni sujasa bakhānī| bole ati punīta mṛdu bānī||
Meaning आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसनपर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजीके सुयशका वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणीसे बोले--॥ ३॥
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥
nātha eka saṃsau baṛa moreṃ| karagata bedatatva sabu toreṃ||
kahata so mohi lāgata bhaya lājā| jau na kahaum̐ baṛa hoi akājā||
Meaning हे नाथ! मेरे मनमें एक बड़ा सन्देह है; वेदोंका तत्त्व सब आपकी मुद्टीमें है ( अर्थात् आप ही वेदका तत्त्व जाननेवाले होनेके कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देहको कहते मुझे भय और लाज आती है [भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अबतक ज्ञान न हुआ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ]॥ ४॥
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ ४५॥
saṃta kahahi asi nīti prabhu śruti purāna muni gāva|
hoi na bimala bibeka ura gura sana kiem̐ durāva|| 45||
Meaning हे प्रभो ! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता॥ ४५॥
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥
asa bicāri pragaṭaum̐ nija mohū| harahu nātha kari jana para chohū||
rāma nāma kara amita prabhāvā| saṃta purāna upaniṣada gāvā||
Meaning यही सोचकर मैं अपना अआज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवकपर कृपा करके इस अआअज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है॥ १॥
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥
saṃtata japata saṃbhu abināsī| siva bhagavāna gyāna guna rāsī||
ākara cāri jīva jaga ahahīṃ| kāsīṃ marata parama pada lahahīṃ||
Meaning कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं। संसारमें चार जातिके जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं॥ २॥
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥
sopi rāma mahimā munirāyā| siva upadesu karata kari dāyā||
rāmu kavana prabhu pūchaum̐ tohī| kahia bujhāi kṛpānidhi mohī||
Meaning हे मुनिराज! वह भी राम [नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [काशीमें मरनेवाले जीवको] रामनामका ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है]। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं ? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये॥ ३॥
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा॥
eka rāma avadhesa kumārā| tinha kara carita bidita saṃsārā||
nāri biraham̐ dukhu laheu apārā| bhayahu roṣu rana rāvanu mārā||
Meaning एक राम तो अवधनरेश दशरथजीके कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्रीके विरहमें अपार दुःख उठाया और क्रोध आनेपर युद्धमें रावणको मार डाला॥ ४॥
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥ ४६॥
prabhu soi rāma ki apara kou jāhi japata tripurāri|
satyadhāma sarbagya tumha kahahu bibeku bicāri|| 46||
Meaning हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं ? आप सत्यके धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये॥ ४६॥
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥
jaise miṭai mora bhrama bhārī| kahahu so kathā nātha bistārī||
jāgabalika bole musukāī| tumhahi bidita raghupati prabhutāī||
Meaning हे नाथ! जिस प्रकारसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाय, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इसपर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको तुम जानते हो॥ १॥
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥
rāmamagata tumha mana krama bānī| caturāī tumhārī maiṃ jānī||
cāhahu sunai rāma guna gūṛhā| kīnhihu prasna manahum̐ ati mūṛhā||
Meaning तुम मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके भक्त हो। तुम्हारी चतुराईको मैं जान गया। तुम श्रीरामजीके रहस्यमय गुणोंको सुनना चाहते हो; इसीसे तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो॥ २॥
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥
tāta sunahu sādara manu lāī| kahaum̐ rāma kai kathā suhāī||
mahāmohu mahiṣesu bisālā| rāmakathā kālikā karālā||
Meaning हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजीकी सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्रीरामजीकी कथा [उसे नष्ट कर देनेवाली] भयंकर कालीजी हैं॥ ३॥
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥
rāmakathā sasi kirana samānā| saṃta cakora karahiṃ jehi pānā||
aisei saṃsaya kīnha bhavānī| mahādeva taba kahā bakhānī||
Meaning श्रीरीमजीकी कथा चन्द्रमाकी किरणोंके समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही सन्देह पार्वतीजीने किया था, तब महादेवजीने विस्तारसे उसका उत्तर दिया था॥ ४॥ .
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥ '४७॥
kahaum̐ so mati anuhāri aba umā saṃbhu saṃbāda|
bhayau samaya jehi hetu jehi sunu muni miṭihi biṣāda|| '47||
Meaning अब मैं अपनी बुद्धिकि अनुसार वही उमा और शिवजीका संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतुसे हुआ, उसे हे मुनि! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा॥ '४७॥
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥
eka bāra tretā juga māhīṃ| saṃbhu gae kuṃbhaja riṣi pāhīṃ||
saṃga satī jagajanani bhavānī| pūje riṣi akhilesvara jānī||
Meaning एक बार त्रेतायुगमें शिवजी अगस्त्य ऋषिके पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषिने सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया॥ १॥
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥
rāmakathā munībarja bakhānī| sunī mahesa parama sukhu mānī||
riṣi pūchī haribhagati suhāī| kahī saṃbhu adhikārī pāī||
Meaning मुनिवर अगस्त्यजीने रामकथा विस्तारसे कही, जिसको महेश्वरने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषिने शिवजीसे सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिवजीने उनको अधिकारी पाकर [रहस्यसहित] भक्तिका निरूपण किया॥ २॥
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥
kahata sunata raghupati guna gāthā| kachu dina tahām̐ rahe girināthā||
muni sana bidā māgi tripurārī| cale bhavana sam̐ga dacchakumārī||
Meaning श्रीरघुनाथजीके गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनोंतक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनिसे विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजीके साथ घर (कैलास) को चले॥ ३॥
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥
tehi avasara bhaṃjana mahibhārā| hari raghubaṃsa līnha avatārā||
pitā bacana taji rāju udāsī| daṃḍaka bana bicarata abināsī||
Meaning उन्हीं दिनों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये श्रीहरिने रघुवंशमें अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान् उस समय पिताके वचनसे राज्यका त्याग करके तपस्वी या साधुवेशमें दण्डकवनमें विचर रहे थे॥ ४॥
ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥ ४८ (क
hdayam̐ bicārata jāta hara kehi bidhi darasanu hoi|
gupta rupa avatareu prabhu gaem̐ jāna sabu koi|| 48 (ka
Meaning शिवजी हृदयमें विचारते जा रहे थे कि भगवान्के दर्शन मुझे किस प्रकार हों। प्रभुने गुप्तरूपसे अवतार लिया है, मेरे जानेसे सब लोग जान जायेँगे॥ ४८ (क)॥
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥ ४८ ( ख )॥
saṃkara ura ati chobhu satī na jānahiṃ maramu soi|
tulasī darasana lobhu mana ḍaru locana lālacī|| 48 ( kha )||
Meaning श्रीशड्रजीके हृदयमें इस बातको लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेदको नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजीके मनमें [ भेद खुलनेका] डर था, परन्तु दर्शनके लोभसे उनके नेत्र ललचा रहे थे॥ ४८ (ख)॥
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥
rāvana marana manuja kara jācā| prabhu bidhi bacanu kīnha caha sācā||
jauṃ nahiṃ jāum̐ rahai pachitāvā| karata bicāru na banata banāvā||
Meaning रावणने [ब्रह्माजीसे] अपनी मृत्यु मनुष्यके हाथसे माँगी थी। ब्रह्माजीके वचनोंको प्रभु सत्य करना चाहते हैं। मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जायगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी॥ १॥
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा॥
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥
ehi bidhi bhae socabasa īsā| tehi samaya jāi dasasīsā||
līnha nīca mārīcahi saṃgā| bhayau turata soi kapaṭa kuraṃgā||
Meaning इस प्रकार महादेवजी चिन्ताके वश हो गये। उसी समय नीच रावणने जाकर मारीचको साथ लिया और वह (मारीच) तुरंत कपटमृग बन गया॥ २॥
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥
मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥
kari chalu mūṛha harī baidehī| prabhu prabhāu tasa bidita na tehī||
mṛga badhi bandhu sahita hari āe| āśramu dekhi nayana jala chāe||
Meaning मूर्ख (रावण) ने छल करके सीताजीको हर लिया। उसे श्रीरामचन्द्रजीके वास्तविक प्रभावका कुछ भी पता न था। मृगको मारकर भाई लक्ष्मणसहित श्रीहरि आश्रममें आये और उसे खाली देखकर (अर्थात् वहाँ सीताजीको न पाकर) उनके नेत्रोंगें आँसू भर आये॥ ३॥
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें॥
biraha bikala nara iva raghurāī| khojata bipina phirata dou bhāī||
kabahūm̐ joga biyoga na jākeṃ| dekhā pragaṭa biraha dukha tākeṃ||
Meaning श्रीरघुनाथजी मनुष्योंकी भाँति विरहसे व्याकुल हैं और दोनों भाई वनमें सीताको खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरहका दुःख देखा गया॥ ४॥
अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥ ४९॥
ati vicitra raghupati carita jānahiṃ parama sujāna|
je matimaṃda bimoha basa hṛdayam̐ dharahiṃ kachu āna|| 49||
Meaning श्रीरघुनाथजीका चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुँचे हुए ज्ञानीजन ही जानते हैं। जो मन्दबुद्धि हैं, वे तो विशेषरूपसे मोहके वश होकर हृदयमें कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं॥ ४९॥