नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥
nāma jīham̐ japi jāgahiṃ jogī| birati biraṃci prapaṃca biyogī||
brahmasukhahi anubhavahiṃ anūpā| akatha anāmaya nāma na rūpā||
Meaning ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपश्न (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं॥ १॥
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥
jānā cahahiṃ gūṛha gati jeū| nāma jīham̐ japi jānahiṃ teū||
sādhaka nāma japahiṃ laya lāem̐| hohiṃ siddha animādika pāem̐||
Meaning जो परमात्माके गूढ़ रहस्यको (यथार्थ महिमाको) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नामको जीभसे जपकर उसे जान लेते हैं। [लौकिक सिद्धियोंके चाहनेवाले अथार्थी] साधक लौ लगाकर नामका जप करते हैं और अणिमादि [आठों] सिद्धियोंको पाकर सिद्ध हो जाते हैं॥ २॥
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥
japahiṃ nāmu jana ārata bhārī| miṭahiṃ kusaṃkaṭa hohiṃ sukhārī||
rāma bhagata jaga cāri prakārā| sukṛtī cāriu anagha udārā||
Meaning [संकटसे घबराये हुए] आर्त भक्त नामजप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत्में चार प्रकारके ( १-अर्थार्थी-धनादिकी चाहसे भजनेवाले, २-आर्त-संकटको निवृत्तिके लिये भजनेवाले, ३-जिज्ञासु--भगवान्को जाननेको इच्छासे भजनेवाले, ४-ज्ञानी--भगवानूको तत्त्वसे जानकर स्वाभाविक ही प्रेमसे भजनेवाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥ ३॥
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥
cahū catura kahum̐ nāma adhārā| gyānī prabhuhi biseṣi piārā||
cahum̐ juga cahum̐ śruti nā prabhāū| kali biseṣi nahiṃ āna upāū||
Meaning चारों ही चतुर भक्तोंको नामका ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभुको विशेषरूपसे प्रिय है। यों तो चारों युगोंगें और चारों ही वेदोंमें नामका प्रभाव है, परन्तु कलियुगमें विशेषरूपसे है। इसमें तो [नामको छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है॥ ४॥
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन॥ २२॥
sakala kāmanā hīna je rāma bhagati rasa līna|
nāma suprema piyūṣa hada tinhahum̐ kie mana mīna|| 22||
Meaning जो सब प्रकारकी ( भोग और मोक्षकी भी ) कामनाओंसे रहित और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं, उन्होंने भी नामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतके सरोवरमें अपने मनको मछली बना रखा है (अर्थात् वे नामरूपी सुधाका निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते)॥ २२॥
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥
aguna saguna dui brahma sarūpā| akatha agādha anādi anūpā||
moreṃ mata baṛa nāmu duhū teṃ| kie jehiṃ juga nija basa nija būteṃ||
Meaning निर्गुण और सगुण--ब्रह्मके दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है॥ १॥
प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी॥
proṛhi sujana jani jānahiṃ jana kī| kahaum̐ pratīti prīti ruci mana kī||
eku dārugata dekhia ekū| pāvaka sama juga brahma bibekū||
ubhaya agama juga sugama nāma teṃ| kaheum̐ nāmu baṛa brahma rāma teṃ||
byāpaku eku brahma abināsī| sata cetana dhana ānam̐da rāsī||
Meaning सज्जनगण इस बातको मुझ दासकी ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मनके विश्वास, प्रेम और रुचिकी बात कहता हूँ। [ निर्गुण और सगुण] दोनों प्रकारके ब्रहमका ज्ञान अग्निके समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्निके समान है जो काठके अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्निके समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। [ तत्त्वत: दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट- अप्रकटके भेदसे भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वत: एक ही हैं। इतना होनेपर भी] दोनों ही जाननेमें बड़े कठिन हैं, परन्तु नामसे दोनों सुगम हो जाते हैं। इसीसे मैंने नामको [ निर्गुण] ब्रह्मसे और [सगुण] रामसे बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्दकी घनराशि है॥ २-३॥
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
asa prabhu hṛdayam̐ achata abikārī| sakala jīva jaga dīna dukhārī||
nāma nirūpana nāma jatana teṃ| sou pragaṭata jimi mola ratana teṃ||
Meaning ऐसे विकाररहित प्रभुके हृदयमें रहते भी जगत्के सब जीव दीन और दुखी हैं। नामका निरूपण करके (नामके यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभावको जानकर )नामका जतन करनेसे ( श्रद्धापूर्वक नामजपरूपी साधन करनेसे) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्के जाननेसे उसका मूल्य॥ ४॥
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥ २३॥
niraguna teṃ ehi bhām̐ti baṛa nāma prabhāu apāra|
kahaum̐ nāmu baṛa rāma teṃ nija bicāra anusāra|| 23||
Meaning इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है। अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है॥ २३॥
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥
rāma bhagata hita nara tanu dhārī| sahi saṃkaṭa kie sādhu sukhārī||
nāmu saprema japata anayāsā| bhagata hohiṃ muda maṃgala bāsā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके हितके लिये मनुष्य-शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओंको सुखी किया; परन्तु भक्तगण प्रेमके साथ नामका जप करते हुए सहजहीमें आनन्द और कल्याणके घर हो जाते हैं॥ १॥
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी॥
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
rāma eka tāpasa tiya tārī| nāma koṭi khala kumati sudhārī||
riṣi hita rāma suketusutā kī| sahita sena suta kīnha bibākī||
sahita doṣa dukha dāsa durāsā| dalai nāmu jimi rabi nisi nāsā||
bhaṃjeu rāma āpu bhava cāpū| bhava bhaya bhaṃjana nāma pratāpū||
Meaning श्रीरामजीने एक तपस्वीकी स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नामने करोड़ों दुष्टोंकी बिगड़ी बुद्धिको सुधार दिया। श्रीरामजीने ऋषि विश्वामित्रके हितके लिये एक सुकेतु यक्षकी कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तोंके दोष, दुःख और दुराशाओंका इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रिका। श्रीरामजीने तो स्वयं शिवजीके धनुषको तोड़ा, परन्तु नामका प्रताप ही संसारके सब भयोंका नाश करनेवाला है॥ २-३॥
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥
daṃḍaka banu prabhu kīnha suhāvana| jana mana amita nāma kie pāvana||
nisicara nikara dale raghunaṃdana| nāmu sakala kali kaluṣa nikaṃdana||
Meaning प्रभु श्रीरामजीने [ भयानक] दण्डक वनको सुहावना बनाया, परन्तु नामने असंख्य मनुष्योंके मनोंको पवित्र कर दिया। श्रीरघुनाथजीने राक्षसोंके समूहको मारा, परन्तु नाम तो कलियुगके सारे पापोंकी जड़ उखाड़नेवाला है॥ ४॥
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥ २४॥
sabarī gīdha susevakani sugati dīnhi raghunātha|
nāma udhāre amita khala beda bidita guna gātha|| 24||
Meaning श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकोंको ही मुक्ति दी; परन्तु नामने अगनित दुष्छेंका उद्धार किया। नामके गुणोंकी कथा वेदोंमें प्रसिद्ध है॥ २४॥
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
rāma sukaṃṭha bibhīṣana doū| rākhe sarana jāna sabu koū||
nāma garība aneka nevāje| loka beda bara birida birāje||
Meaning श्रीरामजीने सुग्रीव और विभीषण दोको ही अपने शरणमें रखा, यह सब कोई जानते हैं; परंतु नामने अनेक गरीबोंपर कृपा की है। नामका यह सुन्दर विरद लोक और वेदमें विशेषरूपसे प्रकाशित है॥ १॥
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
rāma bhālu kapi kaṭaku baṭorā| setu hetu śramu kīnha na thorā||
nāmu leta bhavasiṃdhu sukhāhīṃ| karahu bicāru sujana mana māhīṃ||
Meaning श्रीरामजीने तो भालू और बन्दरोंकी सेना बटोरी और समुद्रपर पुल बाँधनेके लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परंतु नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण! मनमें विचार कीजिये [कि दोनोंमें कौन बड़ा है]॥ २॥
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥
राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥
rāma sakula rana rāvanu mārā| sīya sahita nija pura pagu dhārā||
rājā rāmu avadha rajadhānī| gāvata guna sura muni bara bānī||
sevaka sumirata nāmu saprītī| binu śrama prabala moha dalu jītī||
phirata saneham̐ magana sukha apaneṃ| nāma prasāda soca nahiṃ sapaneṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने कुटुम्बसहित रावणको युद्धमें मारा, तब सीतासहित उन्होंने अपने नगर ( अयोध्या )में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुन्दर वाणीसे जिनके गुण गाते हैं। परंतु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नामके स्मरणमात्रसे बिना परिश्रम मोहकी प्रबल सेनाको जीतकर प्रेममें मग्न हुए अपने ही सुखमें विचरते हैं, नामके प्रसादसे उन्हें सपनेमें भी कोई चिन्ता नहीं सताती॥ ३-४॥
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥ २५॥
brahma rāma teṃ nāmu baṛa bara dāyaka bara dāni|
rāmacarita sata koṭi maham̐ liya mahesa jiyam̐ jāni|| 25||
Meaning इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनोंसे बड़ा है। यह वरदान देनेवालोंको भी वर देनेवाला है। श्रीशिवजीने अपने हृदयमें यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्रमेंसे इस ' राम' नामको [साररूपसे चुनकर] ग्रहण किया है॥ २५॥
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥
nāma prasāda saṃbhu abināsī| sāju amaṃgala maṃgala rāsī||
suka sanakādi siddha muni jogī| nāma prasāda brahmasukha bhogī||
Meaning नामहीके प्रसादसे शिवजी अविनाशी हैं और अमज़ल वेषवाले होनेपर भी मज़लकी राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगीगण नामके ही प्रसादसे ब्रह्मानन्दको भोगते हैं॥ १॥
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥
nārada jāneu nāma pratāpū| jaga priya hari hari hara priya āpū||
nāmu japata prabhu kīnha prasādū| bhagata siromani bhe prahalādū||
Meaning नारदजीने नामके प्रतापको जाना है। हरि सारे संसारको प्यारे हैं, [हरिको हर प्यारे हैं] और आप (श्रीनारदजी) हरि और हर दोनोंको प्रिय हैं। नामके जपनेसे प्रभुने कृपा की, जिससे प्रह्माद भक्तशिरोमणि हो गये॥ २॥
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥
dhruvam̐ sagalāni japeu hari nāūm̐| pāyau acala anūpama ṭhāūm̐||
sumiri pavanasuta pāvana nāmū| apane basa kari rākhe rāmū||
Meaning ध्रुवजीने ग्लानिसे (विमाताके वचनोंसे दुखी होकर सकामभावसे ) हरिनामको जपा और उसके प्रतापसे अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्ूजीने पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है॥ ३॥
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥
apatu ajāmilu gaju ganikāū| bhae mukuta hari nāma prabhāū||
kahauṃ kahām̐ lagi nāma baṛāī| rāmu na sakahiṃ nāma guna gāī||
Meaning नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्रीहरिके नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। मैं नामकी बड़ाई कहाँतक कहूँ, राम भी नामके गुणोंको नहीं गा सकते॥ ४॥
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ २६॥
nāmu rāma ko kalapataru kali kalyāna nivāsu|
jo sumirata bhayo bhām̐ga teṃ tulasī tulasīdāsu|| 26||
Meaning कलियुगमें रामका नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसीके समान [पवित्र] हो गया॥ २६॥
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥
cahum̐ juga tīni kāla tihum̐ lokā| bhae nāma japi jīva bisokā||
beda purāna saṃta mata ehū| sakala sukṛta phala rāma sanehū||
Meaning [ केवल कलियुगकी ही बात नहीं है, ] चारों युगोंमें, तीनों कालोंमें और तीनों लोकोंमें नामको जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतोंका मत यही है कि समस्त पुण्योंका फल श्रीरामजीमें [या रामनाममें] प्रेम होना है॥ १॥
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
dhyānu prathama juga makhabidhi dūjeṃ| dvāpara paritoṣata prabhu pūjeṃ||
kali kevala mala mūla malīnā| pāpa payonidhi jana mana mīnā||
Meaning पहले (सत्य) युगमें ध्यानसे, दूसरे (त्रेता) युगमें यज्ञसे और द्वापरमें पूजनसे भगवान् प्रसन्न होते हैं; परंतु कलियुग केवल पापकी जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्योंका मन पापरूपी समुद्रमें मछली बना हुआ है (अर्थात् पापसे कभी अलग होना ही नहीं चाहता; इससे ध्यान,यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥ २॥
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
nāma kāmataru kāla karālā| sumirata samana sakala jaga jālā||
rāma nāma kali abhimata dātā| hita paraloka loka pitu mātā||
Meaning ऐसे कराल (कलियुगके) कालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है। कलियुगमें यह रामनाम मनोवाज्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता-पिता है (अर्थात् परलोकमें भगवान्का परमधाम देता है और इस लोकमें माता-पिताके समान सब प्रकारसे पालन और रक्षण करता है)॥ ३॥
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
nahiṃ kali karama na bhagati bibekū| rāma nāma avalaṃbana ekū||
kālanemi kali kapaṭa nidhānū| nāma sumati samaratha hanumānū||
Meaning कलियुगमें न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है; रामनाम ही एक आधार है। कपटकी खान कलियुगरूपी कालनेमिके [ मारनेके] लिये रामनाम ही बुद्धिमान् और समर्थ श्रीहनुमान्जी हैं॥ ४॥
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ २७॥
rāma nāma narakesarī kanakakasipu kalikāla|
jāpaka jana prahalāda jimi pālihi dali surasāla|| 27||
Meaning रामनाम श्रीनूसिंह भगवान् है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्मादके समान हैं; यह रामनाम देवताओंके शत्रु (कलियुगरूपी दैत्य) को मारकर जप करनेवालोंकी रक्षा करेगा॥ २७॥
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
bhāyam̐ kubhāyam̐ anakha ālasahūm̐| nāma japata maṃgala disi dasahūm̐||
sumiri so nāma rāma guna gāthā| karaum̐ nāi raghunāthahi māthā||
Meaning अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) रामनामका स्मरण करके और श्रीरघुनाथजीको मस्तक नवाकर मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूँ॥ १॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो॥
mori sudhārihi so saba bhām̐tī| jāsu kṛpā nahiṃ kṛpām̐ aghātī||
rāma susvāmi kusevaku moso| nija disi daikhi dayānidhi poso||
Meaning वे (श्रीरामजी) मेरी [बिगड़ी] सब तरहसे सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करनेसे नहीं अघाती। राम-से उत्तम स्वामी और मुझ-सरीखा बुरा सेवक! इतनेपर भी उन दयानिधिने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है॥ २॥
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥
गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥
lokahum̐ beda susāhiba rītīṃ| binaya sunata pahicānata prītī||
ganī garība grāmanara nāgara| paṃḍita mūṛha malīna ujāgara||
Meaning लोक और वेदमें भी अच्छे स्वामीकी यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेमको पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगरनिवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी,॥ ३॥
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥
sukabi kukabi nija mati anuhārī| nṛpahi sarāhata saba nara nārī||
sādhu sujāna susīla nṛpālā| īsa aṃsa bhava parama kṛpālā||
Meaning सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धिकि अनुसार राजाकी सराहना करते हैं। और साधु, बुद्धिमान, सुशील, ईश्वरके अंशसे उत्पन्न कृपालु राजा--॥ ४॥
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥
suni sanamānahiṃ sabahi subānī| bhaniti bhagati nati gati pahicānī||
yaha prākṛta mahipāla subhāū| jāna siromani kosalarāū||
Meaning सबकी सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चालकों पहचानकर सुन्दर (मीठी) वाणीसे सबका यथायोग्य सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसारी राजाओंका है, कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी तो चतुरशिरोमणि हैं॥ ५॥
रीझत राम सनेह निसोतें।
को जग मंद मलिनमति मोतें॥
rījhata rāma saneha nisoteṃ| ko jaga maṃda malinamati moteṃ||
Meaning श्रीरामजी तो विशुद्ध प्रेमसे ही रीझते हैं, पर जगतमें मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिनबुद्धि और कौन होगा?॥ ६॥
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु॥ २८ (क)॥
saṭha sevaka kī prīti ruci rakhihahiṃ rāma kṛpālu|
upala kie jalajāna jehiṃ saciva sumati kapi bhālu|| 28 (ka)||
Meaning तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवककी प्रीति और रुचिको अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरोंको जहाज और बन्दर-भालुओंको बुद्धिमान् मन्त्री बना लिया॥ २८ (क)॥
हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥ २८ (ख )॥
hauhu kahāvata sabu kahata rāma sahata upahāsa|
sāhiba sītānātha so sevaka tulasīdāsa|| 28 (kha )||
Meaning सब लोग मुझे श्रीरामजीका सेवक कहते हैं और मैं भी [बिना लजाा-संकोचके] कहलाता हूँ (कहनेवालोंका विरोध नहीं करता); कृपालु श्रीरामजी इस निन््दाको सहते हैं कि श्रीसीतानाथजी-जैसे स्वामीका तुलसीदास-सा सेवक है॥ २८ (ख)॥
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥
ati baṛi mori ḍhiṭhāī khorī| suni agha narakahum̐ nāka sakorī||
samujhi sahama mohi apaḍara apaneṃ| so sudhi rāma kīnhi nahiṃ sapaneṃ||
Meaning यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पापको सुनकर नरकने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात् नरकमें भी मेरे लिये ठौर नहीं है)। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डरसे डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने तो स्वनमें भी इसपर (मेरी इस ढिठाई और दोषपर) ध्यान नहीं दिया॥ १॥
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥
suni avaloki sucita cakha cāhī| bhagati mori mati svāmi sarāhī||
kahata nasāi hoi hiyam̐ nīkī| rījhata rāma jāni jana jī kī||
Meaning वर मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने तो इस बातको सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षुसे निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धिकी [उलटे] सराहना की। क्योंकि कहनेमें चाहे बिगड़ जाय (अर्थात् मैं चाहे अपनेको भगवान्का सेवक कहता-कहलाता रहूँ ), परंतु हदयमें अच्छापन होना चाहिये। (हृदयमें तो अपनेको उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दासके हृदयकी [ अच्छी] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं॥ २॥
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली॥
rahati na prabhu cita cūka kie kī| karata surati saya bāra hie kī||
jehiṃ agha badheu byādha jimi bālī| phiri sukaṃṭha soi kīnha kucālī||
Meaning प्रभुके चित्तमें अपने भक्तोंकी की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती (वे उसे भूल जाते हैं) और उनके हृदय [ की अच्छाई--नीकी] को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं। जिस पापके कारण उन्होंने बालिको व्याधकी तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीवने चली॥ ३॥
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥
ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥
soi karatūti bibhīṣana kerī| sapanehum̐ so na rāma hiyam̐ herī||
te bharatahi bheṃṭata sanamāne| rājasabhām̐ raghubīra bakhāne||
Meaning वही करनी विभीषणकी थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजीने स्वप्रमें भी उसका मनमें विचार नहीं किया। उलटे भरतजीसे मिलनेके समय श्रीरघुनाथजीने उनका सम्मान किया और राजसभामें भी उनके गुणोंका बखान किया॥ ४॥
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान॥ २९ (क )॥
prabhu taru tara kapi ḍāra para te kie āpu samāna|
tulasī kahūm̐ na rāma se sāhiba sīlanidhāna|| 29 (ka )||
Meaning प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी ) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर)। परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं॥ २९ (क)॥
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥ २९ ख )॥
rāma nikāīṃ rāvarī hai sabahī ko nīka|
joṃ yaha sām̐cī hai sadā tau nīko tulasīka|| 29 kha )||
Meaning हे श्रीरामजी ! आपकी अच्छाईसे सभीका भला है ( अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है)। यदि यह बात सच है तो तुलसीदासका भी सदा कल्याण ही होगा॥ २९ (ख])॥
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥ २९ (ग)॥
ehi bidhi nija guna doṣa kahi sabahi bahuri siru nāi|
baranaum̐ raghubara bisada jasu suni kali kaluṣa nasāi|| 29 (ga)||
Meaning इस प्रकार अपने गुण-दोषोंको कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन करता हूँ जिसके सुननेसे कलियुगके पाप नष्ट हो जाते हैं॥ २९ (ग)॥
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥
jāgabalika jo kathā suhāī| bharadvāja munibarahi sunāī||
kahihaum̐ soi saṃbāda bakhānī| sunahum̐ sakala sajjana sukhu mānī||
Meaning मुनि याज्ञवल्क्यजीने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीको सुनायी थी, उसी संवादको मैं बखानकर कहूँगा; सब सज्जन सुखका अनुभव करते हुए उसे सुनें॥ १॥
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥
saṃbhu kīnha yaha carita suhāvā| bahuri kṛpā kari umahi sunāvā||
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा।
राम भगत अधिकारी चीन्हा॥
soi siva kāgabhusuṃḍihi dīnhā| rāma bhagata adhikārī cīnhā||
Meaning शिवजीने पहले इस सुहावने चरित्रको रचा, फिर कृपा करके पार्वतीजीको सुनाया। वही चरित्र शिवजीने काकभुशुण्डिजीको रामभक्त और अधिकारी पहचानकर दिया॥ २॥
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥
ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥
tehi sana jāgabalika puni pāvā| tinha puni bharadvāja prati gāvā||
te śrotā bakatā samasīlā| savam̐darasī jānahiṃ harilīlā||
Meaning उन काकभुशुण्डिजीसे फिर याज्ञवल्क्यजीने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजीको गाकर सुनाया। वे दोनों वक्ता और श्रोता (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शीलवाले और समदर्शी हैं और श्रीहरिकी लीलाको जानते हैं॥ ३॥
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥
jānahiṃ tīni kāla nija gyānā| karatala gata āmalaka samānā||
aurau je haribhagata sujānā| kahahiṃ sunahiṃ samujhahiṃ bidhi nānā||
Meaning वे अपने ज्ञानसे तीनों कालोंकी बातोंको हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान (प्रत्यक्ष) जानते हैं। और भी जो सुजान ( भगवान्की लीलाओंका रहस्य जाननेवाले) हरिभक्त हैं, वे इस चरित्रको नाना प्रकारसे कहते, सुनते और समझते हैं॥ ४॥
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥ ३० ( क )॥
mai puni nija gura sana sunī kathā so sūkarakheta|
samujhī nahi tasi bālapana taba ati raheum̐ aceta|| 30 ( ka )||
Meaning फिर वही कथा मैंने वाराह-क्षेत्रमें अपने गुरुजीसे सुनी; परन्तु उस समय मैं लड़कपनके कारण बहुत बेसमझ था, इससे उसको उस प्रकार (अच्छी तरह) समझा नहीं॥ ३० (क)॥
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥ ३० (ख )॥
śrotā bakatā gyānanidhi kathā rāma kai gūṛha|
kimi samujhauṃ mai jīva jaṛa kali mala grasita bimūṛha|| 30 (kha )||
Meaning श्रीरामजीकी गूढ़ कथाके वक्ता (कहनेवाले) और श्रोता (सुननेवाले) दोनों ज्ञानके खजाने (पूरे ज्ञानी) होते हैं। मैं कलियुगके पापोंसे ग्रसा हुआ महामूढ़ जड़ जीव भला उसको कैसे समझ सकता था ?॥ ३० (ख)॥
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥
tadapi kahī gura bārahiṃ bārā| samujhi parī kachu mati anusārā||
bhāṣābaddha karabi maiṃ soī| moreṃ mana prabodha jehiṃ hoī||
Meaning तो भी गुरुजीने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धिके अनुसार कुछ समझमें आयी। वही अब मेरे द्वारा भाषामें रची जायगी, जिससे मेरे मनको सन्तोष हो॥ १॥
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥
निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥
jasa kachu budhi bibeka bala mereṃ| tasa kahihaum̐ hiyam̐ hari ke prereṃ||
nija saṃdeha moha bhrama haranī| karaum̐ kathā bhava saritā taranī||
Meaning जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेकका बल है, मैं हृदयमें हरिकी प्रेरणासे उसीके अनुसार कहूँगा। मैं अपने सन्देह, अज्ञान और शभ्रमको हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदीके पार करनेके लिये नाव है॥ २॥
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥
रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥
budha biśrāma sakala jana raṃjani| rāmakathā kali kaluṣa bibhaṃjani||
rāmakathā kali paṃnaga bharanī| puni bibeka pāvaka kahum̐ aranī||
Meaning रामकथा पण्डितोंको विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है। रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि (मन्थन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है)॥ ३॥
रामकथा कलि कामद गाई।
सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥
rāmakathā kali kāmada gāī| sujana sajīvani mūri suhāī||
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि।
भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥
soi basudhātala sudhā taraṃgini| bhaya bhaṃjani bhrama bheka bhuaṃgini||
Meaning रामकथा कलियुगमें सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु गौ है और सज्जनोंके लिये सुन्दर सज्जीवनी जड़ी है। पृथ्वीपर यही अमृतकी नदी है, जन्म-मरणरूपी भयका नाश करनेवाली और भ्रमरूपी मेढकोंको खानेके लिये सर्पिणी है॥ ४॥
असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥
संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥
asura sena sama naraka nikaṃdini| sādhu bibudha kula hita girinaṃdini||
saṃta samāja payodhi ramā sī| bisva bhāra bhara acala chamā sī||
Meaning यह रामकथा असुरोंकी सेनाके समान नरकोंका नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओंके कुलका हित करनेवाली पार्वती (दुर्गा) है। यह संत-समाजरूपी क्षीरसमुद्रके लिये लक्ष्मीजीके समान है और सम्पूर्ण विश्वका भार उठानेमें अचल पृथ्वीके समान है॥ ५॥
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥
jama gana muham̐ masi jaga jamunā sī| jīvana mukuti hetu janu kāsī||
rāmahi priya pāvani tulasī sī| tulasidāsa hita hiyam̐ hulasī sī||
Meaning यमदूतोंके मुखपर कालिख लगानेके लिये यह जगतमें यमुनाजीके समान है और जीवोंको मुक्ति देनेके लिये मानो काशी ही है। यह श्रीरामजीको पवित्र तुलसीके समान प्रिय है और तुलसीदासके लिये हुलसी (तुलसीदासजीकी माता) के समान हृदयसे हित करनेवाली है॥ ६॥
सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥
sivapraya mekala saila sutā sī| sakala siddhi sukha saṃpati rāsī||
sadaguna suragana aṃba aditi sī| raghubara bhagati prema paramiti sī||
Meaning यह रामकथा शिवजीको नर्मदाजीके समान प्यारी है, यह सब सिद्धियोंकी तथा सुख-सम्पत्तिकी राशि है। सद्गुणरूपी देवताओंके उत्पन्न और पालन-पोषण करनेके लिये माता अदितिके समान है। श्रीरघुनाथजीकी भक्ति और प्रेमकी परम सीमा-सी है॥ ७॥
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥ ३१॥
rāma kathā maṃdākinī citrakūṭa cita cāru|
tulasī subhaga saneha bana siya raghubīra bihāru|| 31||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर ख्रेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं॥ ३१॥
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
rāma carita ciṃtāmani cārū| saṃta sumati tiya subhaga siṃgārū||
jaga maṃgala guna grāma rāma ke| dāni mukuti dhana dharama dhāma ke||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतोंकी सुबुद्धिरूपी स्त्रीका सुन्दर श्रज़्ार है। श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूह जगत्का कल्याण करनेवाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधामके देनेवाले हैं॥ १॥
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥
sadagura gyāna birāga joga ke| bibudha baida bhava bhīma roga ke||
janani janaka siya rāma prema ke| bīja sakala brata dharama nema ke||
Meaning ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद््गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण ब्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं॥ २॥
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के॥
samana pāpa saṃtāpa soka ke| priya pālaka paraloka loka ke||
saciva subhaṭa bhūpati bicāra ke| kuṃbhaja lobha udadhi apāra ke||
Meaning पाप, सन्ताप और शोकका नाश करनेवाले तथा इस लोक और परलोकके प्रिय पालन करनेवाले हैं। विचार (ज्ञान) रूपी राजाके शूरवीर मन्त्री और लोभरूपी अपार समुद्रके सोखनेके लिये अगस्त्य मुनि हैं॥ ३॥
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥
kāma koha kalimala karigana ke| kehari sāvaka jana mana bana ke||
atithi pūjya priyatama purāri ke| kāmada ghana dārida davāri ke||
Meaning भक्तोंके मनरूपी वनमें बसनेवाले काम, क्रोध और कलियुगके पापरूपी हाथियोंके मारनेके लिये सिंहके बच्चे हैं। शिवजीके पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रतारूपी दावानलके बुझानेके लिये कामना पूर्ण करनेवाले मेघ हैं॥ ४॥
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥
maṃtra mahāmani biṣaya byāla ke| meṭata kaṭhina kuaṃka bhāla ke||
harana moha tama dinakara kara se| sevaka sāli pāla jaladhara se||
Meaning विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं। ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं। अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं॥ ५॥
अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥
सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से॥
abhimata dāni devataru bara se| sevata sulabha sukhada hari hara se||
sukabi sarada nabha mana uḍagana se| rāmabhagata jana jīvana dhana se||
Meaning मनोवाज्छित वस्तु देनेमें श्रेष्ठ कल्पवृक्षके समान हैं और सेवा करनेमें हरि-हरके समान सुलभ और सुख देनेवाले हैं। सुकविरूपी शरद्ू ऋतुके मनरूपी आकाशको सुशोभित करनेके लिये तारागणके समान और श्रीरामजीके भक्तोंके तो जीवनधन ही हैं॥ ६॥
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥
सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से॥
sakala sukṛta phala bhūri bhoga se| jaga hita nirupadhi sādhu loga se||
sevaka mana mānasa marāla se| pāvaka gaṃga taṃraga māla se||
Meaning सम्पूर्ण पुण्योंके फल महान् भोगोंके समान हैं। जगत्का छलरहित (यथार्थ) हित करनेमें साधु- संतोंके समान हैं। सेवकोंके मनरूपी मानसरोवरके लिये हंसके समान और पवित्र करनेमें गड़ाजीकी तरजमालाओंके समान हैं॥७॥
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥ ३२ (क )॥
kupatha kutaraka kucāli kali kapaṭa daṃbha pāṣaṃḍa|
dahana rāma guna grāma jimi iṃdhana anala pracaṃḍa|| 32 (ka )||
Meaning श्रीरामजीके गुणोंके समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुगके कपट, दम्भ और पाखण्डके जलानेके लिये वैसे ही हैं जैसे ईंधनके लिये प्रचण्ड अग्नि॥ ३२ (क)॥
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु॥ ३२ ( ख )॥
rāmacarita rākesa kara sarisa sukhada saba kāhu|
sajjana kumuda cakora cita hita biseṣi baṛa lāhu|| 32 ( kha )||
Meaning रामचरित्र पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान सभीको सुख देनेवाले हैं, परन्तु सज्जनरूपी कुमुदिनी और चकोरके चित्तके लिये तो विशेष हितकारी और महान् लाभदायक हैं॥ ३२ (ख)॥
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी।
जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥
kīnhi prasna jehi bhām̐ti bhavānī| jehi bidhi saṃkara kahā bakhānī||
सो सब हेतु कहब मैं गाई।
कथाप्रबंध बिचित्र बनाई॥
so saba hetu kahaba maiṃ gāī| kathāprabaṃdha bicitra banāī||
Meaning जिस प्रकार श्रीपार्वतीजीने श्रीशिवजीसे प्रश्न किया और जिस प्रकारसे श्रीशिवजीने विस्तारसे उसका उत्तर कहा, वह सब कारण मैं विचित्र कथाकी रचना करके गाकर कहूँगा॥ १॥
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥
jehi yaha kathā sunī nahiṃ hoī| jani ācaraju karaiṃ suni soī||
kathā alaukika sunahiṃ je gyānī| nahiṃ ācaraju karahiṃ asa jānī||
rāmakathā kai miti jaga nāhīṃ| asi pratīti tinha ke mana māhīṃ||
nānā bhām̐ti rāma avatārā| rāmāyana sata koṭi apārā||
Meaning जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथाको सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसारमें रामकथाकी कोई सीमा नहीं है (रामकथा अनन्त है)। उनके मनमें ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीके अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं॥ २-३॥
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी॥
kalapabheda haricarita suhāe| bhām̐ti aneka munīsanha gāe||
karia na saṃsaya asa ura ānī| sunia kathā sārada rati mānī||
Meaning कल्पभेदके अनुसार श्रीहरिके सुन्दर चरित्रोंको मुनी धरोंने अनेकों प्रकारसे गाया है। हृदयमें ऐसा विचारकर संदेह न कीजिये और आदरसहित प्रेमसे इस कथाको सुनिये॥ ४॥
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार॥ ३३॥
rāma anaṃta anaṃta guna amita kathā bistāra|
suni ācaraju na mānihahiṃ jinha keṃ bimala bicāra|| 33||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओंका विस्तार भी असीम है। अतएव जिनके विचार निर्मल हैं, वे इस कथाको सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे॥ ३३॥