आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
ākara cāri lākha caurāsī| jāti jīva jala thala nabha bāsī||
sīya rāmamaya saba jaga jānī| karaum̐ pranāma jori juga pānī||
Meaning चौरासी लाख योनियोंमें चार प्रकारके (स्वेदज, अण्डज, उद्धिज्व, जरायुज) जीव जल, पृथ्वी और आकाशभमें रहते हैं, उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत्को श्रीसीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ॥ १॥
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥
jāni kṛpākara kiṃkara mohū| saba mili karahu chāṛi chala chohū||
nija budhi bala bharosa mohi nāhīṃ| tāteṃ binaya karaum̐ saba pāhī||
Meaning मुझको अपना दास जानकर कृपाकी खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिये। मुझे अपने बुद्धि-बलका भरोसा नहीं है, इसीलिये मैं सबसे विनती करता हूँ॥ २॥
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥
karana cahaum̐ raghupati guna gāhā| laghu mati mori carita avagāhā||
sūjha na ekau aṃga upāū| mana mati raṃka manoratha rāū||
Meaning मैं श्रीरघुनाथजीके गुणोंका वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजीका चरित्र अथाह है। इसके लिये मुझे उपायका एक भी अंग अर्थात् कुछ ( लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है॥ ३॥
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥
mati ati nīca ūm̐ci ruci āchī| cahia amia jaga jurai na chāchī||
chamihahiṃ sajjana mori ḍhiṭhāī| sunihahiṃ bālabacana mana lāī||
Meaning मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है; चाह तो अमृत पानेकी है, पर जगतमें जुड़ती छाछ भी नहीं। सज्जन मेरी ढिठाईको क्षमा करेंगे और मेरे बालवचनोंको मन लगाकर ( प्रेमपूर्वक ) सुनेंगे॥ ४॥
जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥
jau bālaka kaha totari bātā| sunahiṃ mudita mana pitu aru mātā||
ham̐sihahi kūra kuṭila kubicārī| je para dūṣana bhūṣanadhārī||
Meaning जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मनसे सुनते हैं। किन्तु क्रूर, कुटिल और बुरे विचारवाले लोग जो दूसरोंके दोषोंको ही भूषणरूपसे धारण किये रहते हैं (अर्थात् जिन्हें पराये दोष ही प्यारे लगते हैं ), हँसेंगे॥ ५॥
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥
nija kavita kehi lāga na nīkā| sarasa hou athavā ati phīkā||
je para bhaniti sunata haraṣāhī| te bara puruṣa bahuta jaga nāhīṃ||
Meaning रसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती ? किन्तु जो दूसरेकी रचनाको सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगतमें बहुत नहीं हैं,॥ ६॥
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥
jaga bahu nara sara sari sama bhāī| je nija bāṛhi baṛhahiṃ jala pāī||
sajjana sakṛta siṃdhu sama koī| dekhi pūra bidhu bāṛhai joī||
Meaning हे भाई! जगत्में तालाबों और नदियोंके समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नतिसे प्रसन्न होते हैं )। समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमाको पूर्ण देखकर (दूसरोंका उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है॥७॥
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास॥ ८॥
bhāga choṭa abhilāṣu baṛa karaum̐ eka bisvāsa|
paihahiṃ sukha suni sujana saba khala karahahiṃ upahāsa|| 8||
Meaning मेरा भाग्य छोटा है और इच्छा बहुत बड़ी है, परन्तु मुझे एक विश्वास है कि इसे सुनकर सज्जन सभी सुख पावेंगे और दुष्ट हँसी उड़ावेंगे॥ ८॥
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥
khala parihāsa hoi hita morā| kāka kahahiṃ kalakaṃṭha kaṭhorā||
haṃsahi baka dādura cātakahī| ham̐sahiṃ malina khala bimala batakahī||
Meaning किन्तु दुष्टोंके हँसनेसे मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठवाली कोयलको कौए तो कठोर ही कहा करते हैं। जैसे बगुले हंसको और मेढक पपीहेको हँसते हैं, वैसे ही मलिन मनवाले दुष्ट निर्मल वाणीको हँसते हैं॥ १॥
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥
kabita rasika na rāma pada nehū| tinha kaham̐ sukhada hāsa rasa ehū||
bhāṣā bhaniti bhori mati morī| ham̐sibe joga ham̐seṃ nahiṃ khorī||
Meaning जो न तो कविताके रसिक हैं और न जिनका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम है, उनके लिये भी यह कविता सुखद हास्यरसका काम देगी। प्रथम तो यह भाषाकी रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है; इससे यह हँसनेके योग्य ही है, हँसनेमें उन्हें कोई दोष नहीं॥ २॥
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी॥
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की॥
prabhu pada prīti na sāmujhi nīkī| tinhahi kathā suni lāgahi phīkī||
hari hara pada rati mati na kutarakī| tinha kahum̐ madhura kathā raghuvara kī||
Meaning जिन्हें न तो प्रभुके चरणोंमें प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुननेमें फीकी लगेगी। जिनकी श्रीहरि ( भगवान् विष्णु) और श्रीहर ( भगवान् शिव) के चरणोंमें प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करनेवाली नहीं है [जो श्रीहरि-हरमें भेदकी या ऊँच-नीचकी कल्पना नहीं करते], उन्हें श्रीरघुनाथजीकी यह कथा मीठी लगेगी॥ ३॥
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥
rāma bhagati bhūṣita jiyam̐ jānī| sunihahiṃ sujana sarāhi subānī||
kabi na houm̐ nahiṃ bacana prabīnū| sakala kalā saba bidyā hīnū||
Meaning सज्जनगण इस कथाको अपने जीमें श्रीरामजीकी भक्तिसे भूषित जानकर सुन्दर वाणीसे सराहना करते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्यरचनामें ही कुशल हूँ, मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओंसे रहित हूँ॥ ४॥
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥
ākhara aratha alaṃkṛti nānā| chaṃda prabaṃdha aneka bidhānā||
bhāva bheda rasa bheda apārā| kabita doṣa guna bibidha prakārā||
Meaning नाना प्रकारके अक्षर, अर्थ और अलड्ार, अनेक प्रकारकी छन्द्रचना, भावों और रसोंके अपार भेद और कविताके भाँति-भाँतिके गुण-दोष होते हैं॥ ५॥
कबित बिबेक एक नहिं मोरें।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे॥
kabita bibeka eka nahiṃ moreṃ| satya kahaum̐ likhi kāgada kore||
Meaning इनमेंसे काव्यसम्बन्धी एक भी बातका ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागजपर लिखकर [शपथपूर्वक] सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ६॥
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
bhaniti mori saba guna rahita bisva bidita guna eka|
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक॥ ९॥
so bicāri sunihahiṃ sumati jinha keṃ bimala biveka|| 9||
Meaning मेरी रचना सब गुणोंसे रहित है; इसमें बस, जगत्प्रसिद्ध एक गुण है। उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले पुरुष, जिनके निर्मल ज्ञान है, इसको सुनेंगे॥ ९॥
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
ehi maham̐ raghupati nāma udārā| ati pāvana purāna śruti sārā||
maṃgala bhavana amaṃgala hārī| umā sahita jehi japata purārī||
Meaning इसमें श्रीरघुनाथजीका उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणोंका सार है, कल्याणका भवन है और अमज़लोंको हरनेवाला है, जिसे पार्वतीजीसहित भगवान् शिवजी सदा जपा करते हैं॥ १॥
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी॥
bhaniti bicitra sukabi kṛta joū| rāma nāma binu soha na soū||
bidhubadanī saba bhām̐ti sam̐vārī| sona na basana binā bara nārī||
Meaning जो अच्छे कविके द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी रामनामके बिना शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमाके समान मुखवाली सुन्दर स्त्री सब प्रकारसे सुसज्जित होनेपर भी वस्त्रके बिना शोभा नहीं देती॥ २॥
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥
saba guna rahita kukabi kṛta bānī| rāma nāma jasa aṃkita jānī||
sādara kahahiṃ sunahiṃ budha tāhī| madhukara sarisa saṃta gunagrāhī||
Meaning इसके विपरीत, कुकविकी रची हुई सब गुणोंसे रहित कविताको भी, रामके नाम एवं यशसे अंकित जानकर, बुद्धिमान्ू लोग आदरपूर्वक कहते और सुनते हैं; क्योंकि संतजन भौरेकी भाँति गुणहीको ग्रहण करनेवाले होते हैं॥ ३॥
जदपि कबित रस एकउ नाही।
राम प्रताप प्रकट एहि माहीं॥
jadapi kabita rasa ekau nāhī| rāma pratāpa prakaṭa ehi māhīṃ||
सोइ भरोस मोरें मन आवा।
केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा॥
soi bharosa moreṃ mana āvā| kehiṃ na susaṃga baḍappanu pāvā||
Meaning यद्यपि मेरी इस रचनामें कविताका एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजीका प्रताप प्रकट है। मेरे मनमें यही एक भरोसा है। भले संगसे भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया ?॥ ४॥
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥
dhūmau tajai sahaja karuāī| agaru prasaṃga sugaṃdha basāī||
bhaniti bhadesa bastu bhali baranī| rāma kathā jaga maṃgala karanī||
Meaning धुआँ भी अगरके संगसे सुगन्धित होकर अपने स्वाभाविक कड़वेपनको छोड़ देता है। मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत्का कल्याण करनेवाली रामकथारूपी उत्तम वस्तुका वर्णन किया गया है। [इससे यह भी अच्छी ही समझी जायगी]॥ ५॥
मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभुसुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
maṃgala karani kalimalaharani tulasī kathā raghunātha kī|
gati kūra kabitā sarita kī jyoṃ sarita pāvana pātha kī||
prabhusujasa saṃgati bhaniti bhali hoihi sujana mana bhāvanī|
bhava aṃga bhūti masāna kī sumirata suhāvani pāvanī||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी कथा कल्याण करनेवाली और कलियुगके पापोंको हरनेवाली है। मेरी इस भद्दी कवितारूपी नदीकी चाल पवित्र जलवाली नदी (गड़्ाजी) की चालकी भाँति टेढ़ी है। प्रभु श्रीरघुनाथजीके सुन्दर यशके संगसे यह कविता सुन्दर तथा सज्जनोंके मनको भानेवाली हो जायगी। श्मशानकी अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजीके अंगके संगसे सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करनेवाली होती है।
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दारु बिचारु कि करड़ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥ १० ( क )॥
priya lāgihi ati sabahi mama bhaniti rāma jasa saṃga|
dāru bicāru ki karaṛa kou baṃdia malaya prasaṃga|| 10 ( ka )||
Meaning श्रीरामजीके यशके संगसे मेरी कविता सभीको अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वतके संगसे काष्ठमात्र [चन्दन बनकर] वन्दनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ [की तुच्छता] का विचार करता है 2॥ १० (क)॥
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥ १० ( ख )॥
syāma surabhi paya bisada ati gunada karahiṃ saba pāna|
girā grāmya siya rāma jasa gāvahiṃ sunahiṃ sujāna|| 10 ( kha )||
Meaning श्यामा गौ काली होनेपर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है। यही समझकर सब लोग उसे पीते हैं। इसी तरह गँवारू भाषामें होनेपर भी श्रीसीता-रामजीके यशको बुद्धिमान् लोग बड़े चावसे गाते और सुनते हैं॥ १० (ख)॥
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥
नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥
mani mānika mukutā chabi jaisī| ahi giri gaja sira soha na taisī||
nṛpa kirīṭa tarunī tanu pāī| lahahiṃ sakala sobhā adhikāī||
Meaning मणि, माणिक और मोतीकी जैसी सुन्दर छवि है, वह साँप, पर्वत और हाथीके मस्तकपर वैसी शोभा नहीं पाती। राजाके मुकुट और नवयुवती स्त्रीके शरीरको पाकर ही ये सब अधिक शोभाको प्राप्त होते हैं॥ १॥
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं॥
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥
taisehiṃ sukabi kabita budha kahahīṃ| upajahiṃ anata anata chabi lahahīṃ||
bhagati hetu bidhi bhavana bihāī| sumirata sārada āvati dhāī||
Meaning इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकविकी कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात् कविकी वाणीसे उत्पन्न हुई कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्शका ग्रहण और अनुसरण होता है)। कविके स्मरण करते ही उसकी भक्तिके कारण सरस्वतीजी ब्रहालोकको छोड़कर दौड़ी आती हैं॥ २॥
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥
rāma carita sara binu anhavāem̐| so śrama jāi na koṭi upāem̐||
kabi kobida asa hṛdayam̐ bicārī| gāvahiṃ hari jasa kali mala hārī||
Meaning सरस्वतीजीकी दौड़ी आनेकी वह थकावट रामचरितरूपी सरोवरमें उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायोंसे भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदयमें ऐसा विचारकर कलियुगके पापोंको हरनेवाले श्रीहरिकि यशका ही गान करते हैं॥ ३॥
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥
kīnheṃ prākṛta jana guna gānā| sira dhuni girā lagata pachitānā||
hṛdaya siṃdhu mati sīpa samānā| svāti sāradā kahahiṃ sujānā||
Meaning संसारी मनुष्योंका गुणगान करनेसे सरस्वतीजी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [कि मैं क्यों इसके बुलानेपर आयी ]। बुद्धिमान् लोग हृदयको समुद्र, बुद्धिको सीप और सरस्वतीकों स्वाति नक्षत्रके समान कहते हैं॥ ४॥
जौं बरषइ बर बारि बिचारू।
होहिं कबित मुकुतामनि चारू॥
jauṃ baraṣai bara bāri bicārū| hohiṃ kabita mukutāmani cārū||
Meaning इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणिके समान सुन्दर कविता होती है॥ ५॥
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥ १४॥
juguti bedhi puni pohiahiṃ rāmacarita bara tāga|
pahirahiṃ sajjana bimala ura sobhā ati anurāga|| 14||
Meaning उन कवितारूपी मुक्तामणियोंको युक्तिसे बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुन्दर तागेमें पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदयमें धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुरागरूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेमको प्राप्त होते हैं)॥ ११॥
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें॥
je janame kalikāla karālā| karataba bāyasa beṣa marālā||
calata kupaṃtha beda maga chām̐ṛe| kapaṭa kalevara kali mala bhām̐ṛeṃ||
Meaning जो कराल कलियुगमें जन्मे हैं, जिनकी करनी कौएके समान है और वेष हंसका-सा है, जो वेदमार्गको छोड़कर कुमार्गपर चलते हैं, जो कपटकी मूर्ति और कलियुगके पापोंके भाड़ हैं॥ १॥
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥
baṃcaka bhagata kahāi rāma ke| kiṃkara kaṃcana koha kāma ke||
tinha maham̐ prathama rekha jaga morī| dhīṃga dharamadhvaja dhaṃdhaka dhorī||
Meaning जो श्रीरामजीके भक्त कहलाकर लोगोंको ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और कामके गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करनेवाले, धर्मध्वजी (धर्मकी झूठी ध्वजा फहरानेवाले-दम्भी ) और कपटके धन्धोंका बोझ ढोनेवाले हैं, संसारके ऐसे लोगोंमें सबसे पहले मेरी गिनती है॥ २॥
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥
jauṃ apane avaguna saba kahaūm̐| bāṛhai kathā pāra nahiṃ lahaūm̐||
tāte maiṃ ati alapa bakhāne| thore mahum̐ jānihahiṃ sayāne||
Meaning यदि मैं अपने सब अवगुणोंको कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जायगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणोंका वर्णन किया है। बुद्धिमान्ू लोग थोड़ेहीमें समझ लेंगे॥ ३॥
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥
samujhi bibidhi bidhi binatī morī| kou na kathā suni deihi khorī||
etehu para karihahiṃ je asaṃkā| mohi te adhika te jaṛa mati raṃkā||
Meaning मेरी अनेकों प्रकारकी विनतीको समझकर, कोई भी इस कथाको सुनकर दोष नहीं देगा। इतनेपर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धिके कंगाल हैं॥ ४॥
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥
kabi na houm̐ nahiṃ catura kahāvaum̐| mati anurūpa rāma guna gāvaum̐||
kaham̐ raghupati ke carita apārā| kaham̐ mati mori nirata saṃsārā||
Meaning मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धिकि अनुसार श्रीरामजीके गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजीके अपार चरित्र, कहाँ संसारमें आसक्त मेरी बुद्धि!॥५॥
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥
jehiṃ māruta giri meru uṛāhīṃ| kahahu tūla kehi lekhe māhīṃ||
samujhata amita rāma prabhutāī| karata kathā mana ati kadarāī||
Meaning जिस हवासे सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनतीमें है। श्रीरामजीकी असीम प्रभुताको समझकर कथा रचनेमें मेरा मन बहुत हिचकता है--॥६॥
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥ १२॥
sārada sesa mahesa bidhi āgama nigama purāna|
neti neti kahi jāsu guna karahiṃ niraṃtara gāna|| 12||
Meaning सरस्वतीजी, शेषजी, ' शिवजी, ' ब्रह्माजी, ' शास्त्र, वेद और पुराण-सये सब 'नेति-नेति' कहकर (पार नहीं पाकर ऐसा नहीं ', ऐसा नहीं कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं॥ १२॥
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥
saba jānata prabhu prabhutā soī| tadapi kaheṃ binu rahā na koī||
tahām̐ beda asa kārana rākhā| bhajana prabhāu bhām̐ti bahu bhāṣā||
Meaning यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुताको सब ऐसी (अकथनीय) ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेदने ऐसा कारण बताया है कि भजनका प्रभाव बहुत तरहसे कहा गया है। ( अर्थात् भगवान्की महिमाका पूरा वर्णन तो कोई कर नहीं सकता; परन्तु जिससे जितना बन पड़े उतना भगवान्का गुणगान करना चाहिये। क्योंकि भगवान्के गुणगानरूपी भजनका प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकारसे शास्त्रोंमें वर्णन है। थोड़ा-सा भी भगवान्का भजन मनुष्यको सहज ही भवसागरसे तार देता है)॥ १॥
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥
eka anīha arūpa anāmā| aja saccidānaṃda para dhāmā||
byāpaka bisvarūpa bhagavānā| tehiṃ dhari deha carita kṛta nānā||
Meaning जो परमेश्वर एक हैं, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विधरूप हैं, उन्हीं भगवान्ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारकी लीला की है॥ २॥
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥
so kevala bhagatana hita lāgī| parama kṛpāla pranata anurāgī||
jehi jana para mamatā ati chohū| jehiṃ karunā kari kīnha na kohū||
Meaning वह लीला केवल भक्तोंके हितके लिये ही है; क्योंकि भगवान् परम कृपालु हैं और शरणागतके बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तोंपर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिसपर कृपा कर दी, उसपर फिर कभी क्रोध नहीं किया॥ ३॥
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी॥
gaī bahora garība nevājū| sarala sabala sāhiba raghurājū||
budha baranahiṃ hari jasa asa jānī| karahi punīta suphala nija bānī||
Meaning वे प्रभु श्रीरघुनाथजी गयी हुई वस्तुको फिर प्राप्त करानेवाले, गरीबनिवाज ( दीनबन्धु), सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमानू और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान् लोग उन श्रीहरिका यश वर्णन करके अपनी वाणीको पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम ) देनेवाली बनाते हैं॥ ४॥
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥
tehiṃ bala maiṃ raghupati guna gāthā| kahihaum̐ nāi rāma pada māthā||
muninha prathama hari kīrati gāī| tehiṃ maga calata sugama mohi bhāī||
Meaning उसी बलसे (महिमाका यथार्थ वर्णन नहीं, परन्तु महान्ू फल देनेवाला भजन समझकर भगवत्कृपाके बलपर ही) मैं श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथा कहूँगा। इसी विचारसे [वाल्मीकि, व्यास आदि] मुनियोंने पहले हरिकी कीर्ति गायी है, भाई! उसी मार्गपर चलना मेरे लिये सुगम होगा॥ ५॥
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥ १३॥
ati apāra je sarita bara jauṃ nṛpa setu karāhiṃ|
caḍhi pipīlikau parama laghu binu śrama pārahi jāhiṃ|| 13||
Meaning जो अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियाँ हैं, यदि राजा उनपर पुल बँधा देता है तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उनपर चढ़कर बिना ही परिश्रमके पार चली जाती हैं [इसी प्रकार मुनियोंके वर्णनके सहारे मैं भी श्रीरामचरित्रका वर्णन सहज ही कर सकूँगा]॥ १३॥
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥
ehi prakāra bala manahi dekhāī| karihaum̐ raghupati kathā suhāī||
byāsa ādi kabi puṃgava nānā| jinha sādara hari sujasa bakhānā||
Meaning इस प्रकार मनको बल दिखलाकर मैं श्रीरघुनाथजीकी सुहावनी कथाकी रचना करूँगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गये हैं, जिन्होंने बड़े आदरसे श्रीहरिका सुयश वर्णन किया है॥ १॥
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥
carana kamala baṃdaum̐ tinha kere| puravahum̐ sakala manoratha mere||
kali ke kabinha karaum̐ paranāmā| jinha barane raghupati guna grāmā||
Meaning मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ. वे मर सब मनोरथोंको पूरा करें। कलियुगके भी उन कवियोंको मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन किया है॥ २॥
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें॥
je prākṛta kabi parama sayāne| bhāṣām̐ jinha hari carita bakhāne||
bhae je ahahiṃ je hoihahiṃ āgeṃ| pranavaum̐ sabahiṃ kapaṭa saba tyāgeṃ||
Meaning जो बड़े बुद्धिमान् प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषामें हरिचरित्रोंका वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्याग- कर प्रणाम करता हूँ॥ ३॥
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥
hohu prasanna dehu baradānū| sādhu samāja bhaniti sanamānū||
jo prabaṃdha budha nahiṃ ādarahīṃ| so śrama bādi bāla kabi karahīṃ||
Meaning आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधु-समाजमें मेरी कविताका सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान् लोग जिस कविताका आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचनाका व्यर्थ परिश्रम करते हैं॥ ४॥
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥
kīrati bhaniti bhūti bhali soī| surasari sama saba kaham̐ hita hoī||
rāma sukīrati bhaniti bhadesā| asamaṃjasa asa mohi am̐desā||
Meaning कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गड़़ाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो। श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही ) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामझस्य है (अर्थात् इन दोनोंका मेल नहीं मिलता), इसीकी मुझे चिन्ता है॥ ५॥
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे।
सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥
tumharī kṛpā sulabha sou more| siani suhāvani ṭāṭa paṭore||
Meaning परन्तु हे कवियो ! आपकी कृपासे यह बात भी मेरे लिये सुलभ हो सकती है। रेशमकी सिलाई टाटपर भी सुहावनी लगती है॥ ६॥
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥ १४ ( क )॥
sarala kabita kīrati bimala soi ādarahiṃ sujāna|
sahaja bayara bisarāi ripu jo suni karahiṃ bakhāna|| 14 ( ka )||
Meaning चतुर पुरुष उसी कविताका आदर करते हैं, जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्रका वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैरको भूलकर सराहना करने लगें॥ १४ (क)॥
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥ १४ ( ख )॥
so na hoi binu bimala mati mohi mati bala ati thora|
karahu kṛpā hari jasa kahaum̐ puni puni karaum̐ nihora|| 14 ( kha )||
Meaning ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धिकि होती नहीं और मेरे बुद्धिका बल बहुत ही थोड़ा है। इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ कि हे कवियो! आप कृपा करें, जिससे मैं हरियशका वर्णन कर सकूँ॥ १४ (ख)॥
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल॥ १४ ( ग )॥
kabi kobida raghubara carita mānasa maṃju marāla|
bāla binaya suni suruci lakhi mopara hohu kṛpāla|| 14 ( ga )||
Meaning कवि और पण्डितगण! आप जो रामचरित्ररूपी मानसरोवरके सुन्दर हंस हैं, मुझ बालककी विनती सुनकर और सुन्दर रुचि देखकर मुझपर कृपा करें॥ १४ (ग)॥
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥ १४ (घ )॥
baṃdaum̐ muni pada kaṃju rāmāyana jehiṃ niramayau|
sakhara sukomala maṃju doṣa rahita dūṣana sahita|| 14 (gha )||
Meaning मैं उन वाल्मीकि मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने रामायणकी रचना की है, जो खर (राक्षस) सहित होनेपर भी खर (कठोर) से विपरीत बड़ी कोमल और सुन्दर है तथा जो दूषण (राक्षस) सहित होनेपर भी दूषण अर्थात् दोषसे रहित है॥ १४ (घ)॥
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥ १४ ( ड)॥
baṃdaum̐ cāriu beda bhava bāridhi bohita sarisa|
jinhahi na sapanehum̐ kheda baranata raghubara bisada jasu|| 14 ( ḍa)||
Meaning मैं चारों वेदोंकी वन्दना करता हूँ, जो संसारसमुद्रके पार होनेके लिये जहाजके समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन करते स्वनमें भी खेद ( थकावट) नहीं होता॥ १४ (ड)॥
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥ १४ (च)॥
baṃdaum̐ bidhi pada renu bhava sāgara jehi kīnha jaham̐|
saṃta sudhā sasi dhenu pragaṭe khala biṣa bārunī|| 14 (ca)||
Meaning मैं ब्रह्माजीके चरण-रजकी वन्दना करता हूँ जिन्होंने भवसागर बनाया है; जहाँसे एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्यरूपी विष और मदिरा उत्पन्न हुए॥ १४ (च)॥
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि॥ १४ ( छ )॥
bibudha bipra budha graha carana baṃdi kahaum̐ kara jori|
hoi prasanna puravahu sakala maṃju manoratha mori|| 14 ( cha )||
Meaning देवता, ब्राह्मण, पण्डित, ग्रह--इन सबके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप प्रसन्न होकर मेरे सारे सुन्दर मनोरथोंको पूरा करें॥ १४ (छ)॥
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥
puni baṃdaum̐ sārada surasaritā| jugala punīta manohara caritā||
majjana pāna pāpa hara ekā| kahata sunata eka hara abibekā||
Meaning फिर मैं सरस्वतीजी और देवनदी गड़ाजीकी वन्दना करता हूँ। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्रवाली हैं। एक (गड़ाजी) स्नान करने और जल पीनेसे पापोंको हरती हैं और दूसरी (सरस्वतीजी ) गुण और यश कहने और सुननेसे अज्ञानका नाश कर देती हैं॥ १॥
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके॥
gura pitu mātu mahesa bhavānī| pranavaum̐ dīnabaṃdhu dina dānī||
sevaka svāmi sakhā siya pī ke| hita nirupadhi saba bidhi tulasīke||
Meaning श्रीमहेश और पार्वतीको मैं प्रणाम करता हूँ, जो मेरे गुरु और माता-पिता हैं, जो दीनबन्धु और नित्य दान करनेवाले हैं, जो सीतापति श्रीरामचन्द्रजीके सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझ तुलसीदासका सब प्रकारसे कपटरहित (सच्चा) हित करनेवाले हैं॥ २॥
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥
kali biloki jaga hita hara girijā| sābara maṃtra jāla jinha sirijā||
anamila ākhara aratha na jāpū| pragaṭa prabhāu mahesa pratāpū||
Meaning जिन शिव-पार्वतीने कलियुगको देखकर, जगत्के हितके लिये, शाबर मन्त्रसमूहकी रचना की, जिन मन्त्रोंके अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है, तथापि श्रीशिवजीके प्रतापसे जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥ ३॥
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥
so umesa mohi para anukūlā| karihiṃ kathā muda maṃgala mūlā||
sumiri sivā siva pāi pasāū| baranaum̐ rāmacarita cita cāū||
Meaning वे उमापति शिवजी मुझपर प्रसन्न होकर [ श्रीरामजीकी] इस कथाको आनन्द और मज़लकी मूल (उत्पन्न करनेवाली) बनायेंगे। इस प्रकार पार्वतीजी और शिवजी दोनोंका स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चावभरे चित्तसे श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ॥ ४॥
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥
bhaniti mori siva kṛpām̐ bibhātī| sasi samāja mili manahum̐ surātī||
je ehi kathahi saneha sametā| kahihahiṃ sunihahiṃ samujhi sacetā||
hoihahiṃ rāma carana anurāgī| kali mala rahita sumaṃgala bhāgī||
Meaning मेरी कविता श्रीशिवजीकी कृपासे ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणोंके सहित चन्द्रमाके साथ रात्रि शोभित होती है। जो इस कथाको प्रेमसहित एवं सावधानीके साथ समझ-बूझकर कहें- सुनेंगे, वे कलियुगके पापोंसे रहित और सुन्दर कल्याणके भागी होकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके प्रेमी बन जायेँगे॥ ५-६॥
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥ २५॥
sapanehum̐ sācehum̐ mohi para jauṃ hara gauri pasāu|
tau phura hou jo kaheum̐ saba bhāṣā bhaniti prabhāu|| 25||
Meaning यदि मुझपर श्रीशिवजी और पार्वतीजीकी स्वनमें भी सचमुच प्रसन्नता हो, तो मैंने इस भाषा, कविताका जो प्रभाव कहा है, वह सब सच हो॥ १५॥
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥
baṃdaum̐ avadha purī ati pāvani| sarajū sari kali kaluṣa nasāvani||
pranavaum̐ pura nara nāri bahorī| mamatā jinha para prabhuhi na thorī||
Meaning मैं अति पवित्र श्रीअयोध्यापुरी और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली श्रीसरयू नदीकी वन्दना करता हूँ। फिर अवधपुरीके उन नर-नारियोंको प्रणाम करता हूँ जिनपर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी ममता थोड़ी नहीं है (अर्थात् बहुत है)॥ १॥
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥
siya niṃdaka agha ogha nasāe| loka bisoka banāi basāe||
baṃdaum̐ kausalyā disi prācī| kīrati jāsu sakala jaga mācī||
Meaning उन्होंने [ अपनी पुरीमें रहनेवाले] सीताजीकी निन्दा करनेवाले (धोबी और उसके समर्थक पुर-नर-नारियों ) के पापसमूहको नाश कर उनको शोकरहित बनाकर अपने लोक ( धाम) में बसा दिया। मैं कौसल्यारूपी पूर्व दिशाकी वन्दना करता हूँ, जिसकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही है॥ २॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥
pragaṭeu jaham̐ raghupati sasi cārū| bisva sukhada khala kamala tusārū||
dasaratha rāu sahita saba rānī| sukṛta sumaṃgala mūrati mānī||
karaum̐ pranāma karama mana bānī| karahu kṛpā suta sevaka jānī||
jinhahi biraci baṛa bhayau bidhātā| mahimā avadhi rāma pitu mātā||
Meaning जहाँ (कौसल्यारूपी पूर्व दिशा) से विश्वको सुख देनेवाले और दुष्टरूपी कमलोंके लिये पालेके समान श्रीरामचन्द्रजीरूपी सुन्दर चन्द्रमा प्रकट हुए। सब रानियोंसहित राजा दशरथजीको पुण्य और सुन्दर कल्याणकी मूर्ति मानकर मैं मन, वचन और कर्मसे प्रणाम करता हूँ। अपने पुत्रका सेवक जानकर वे मुझपर कृपा करें, जिनको रचकर ब्रह्माजीने भी बड़ाई पायी तथा जो श्रीरामजीके माता और पिता होनेके कारण महिमाकी सीमा हैं॥ ३-४॥
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥ १६॥
baṃdaum̐ avadha bhuāla satya prema jehi rāma pada|
bichurata dīnadayāla priya tanu tṛna iva parihareu|| 16||
Meaning मैं अवधके राजा श्रीदशरथजीकी वन्दना करता हूँ, जिनका श्रीरामजीके चरणोंमें सच्चा प्रेम था, जिन्होंने दीनदयालु प्रभुके बिछुड़ते ही अपने प्यारे शरीरको मामूली तिनकेकी तरह त्याग दिया॥ १६॥
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥
pranavaum̐ parijana sahita bidehū| jāhi rāma pada gūṛha sanehū||
joga bhoga maham̐ rākheu goī| rāma bilokata pragaṭeu soī||
Meaning मैं परिवारसहित राजा जनकजीको प्रणाम करता हूँ, जिनका श्रीरामजीके चरणोंमें गूढ़ प्रेम था, जिसको उन्होंने योग और भोगमें छिपा रखा था, परन्तु श्रीरामचन्द्रजीको देखते ही वह प्रकट हो गया॥ श॥
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥
pranavaum̐ prathama bharata ke caranā| jāsu nema brata jāi na baranā||
rāma carana paṃkaja mana jāsū| lubudha madhupa iva tajai na pāsū||
Meaning [ भाइयोंमें] सबसे पहले मैं श्रीभरतजीके चरणोंको प्रणाम करता हूँ, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें भौरेकी तरह लुभाया हुआ है, कभी उनका पास नहीं छोड़ता॥ २॥
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता॥
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥
baṃdaum̐ lachimana pada jalajātā| sītala subhaga bhagata sukha dātā||
raghupati kīrati bimala patākā| daṃḍa samāna bhayau jasa jākā||
Meaning मैं श्रीलक््मणजीके चरणकमलोंको प्रणाम करता हूँ, जो शीतल, सुन्दर और भक्तोंको सुख देनेवाले हैं। श्रीरघुनाथजीकी कीर्तिरूपी विमल पताकामें जिनका ( लक्ष्मणजीका) यश [ पताकाको ऊँचा करके फहरानेवाले] दंडके समान हुआ॥ ३॥
सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥
seṣa sahastrasīsa jaga kārana| jo avatareu bhūmi bhaya ṭārana||
sadā so sānukūla raha mo para| kṛpāsiṃdhu saumitri gunākara||
Meaning जो हजार सिरवाले और जगत्के कारण (हजार सिरोंपर जगत्को धारण कर रखनेवाले) शेषजी हैं, जिन्होंने पृथ्वीका भय दूर करनेके लिये अवतार लिया, वे गुणोंकी खानि कृपासिन्धु सुमित्रानन्दन श्रीलक््मणजी मुझपर सदा प्रसन्न रहें॥ ४॥
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥
महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥
ripusūdana pada kamala namāmī| sūra susīla bharata anugāmī||
mahāvīra binavaum̐ hanumānā| rāma jāsu jasa āpa bakhānā||
Meaning मैं श्रीशत्रुघ्तजीके चरणकमलोंको प्रणाम करता हूँ, जो बड़े वीर, सुशील और श्रीभरतजीके पीछे चलनेवाले हैं। मैं महावीर श्रीहनुमानूजीकी विनती करता हूँ, जिनके यशका श्रीरामचन्द्रजीने स्वयं ( अपने श्रीमुखसे) वर्णन किया है॥ ५॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥ १७॥
pranavaum̐ pavanakumāra khala bana pāvaka gyānadhana|
jāsu hṛdaya āgāra basahiṃ rāma sara cāpa dhara|| 17||
Meaning मैं पवनकुमार श्रीहनुमानूजीको प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरूपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये श्रीरामजी निवास करते हैं॥ १७॥
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥
kapipati rīcha nisācara rājā| aṃgadādi je kīsa samājā||
baṃdaum̐ saba ke carana suhāe| adhama sarīra rāma jinha pāe||
Meaning वानरोंके राजा सुग्रीवजी, रीछोंके राजा जाम्बवानूजी, राक्षसोंके राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितना वानरोंका समाज है, सबके सुन्दर चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जिन्होंने अधम (पशु और राक्षस आदि) शरीरमें भी श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त कर लिया॥ १॥
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥
raghupati carana upāsaka jete| khaga mṛga sura nara asura samete||
baṃdaum̐ pada saroja saba kere| je binu kāma rāma ke cere||
Meaning पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुरसमेत जितने श्रीरामजीके चरणोंके उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो श्रीरामजीके निष्काम सेवक हैं॥ २॥
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥
suka sanakādi bhagata muni nārada| je munibara bigyāna bisārada||
pranavaum̐ sabahiṃ dharani dhari sīsā| karahu kṛpā jana jāni munīsā||
Meaning शुकदेवजी, सनकादि, नारदमुनि आदि जितने भक्त और परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरतीपर सिर टेककर उन सबको प्रणाम करता हूँ; हे मुनीश्वरो ! आप सब मुझको अपना दास जानकर कृपा कीजिये॥ ३॥
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
janakasutā jaga janani jānakī| atisaya priya karunā nidhāna kī||
tāke juga pada kamala manāvaum̐| jāsu kṛpām̐ niramala mati pāvaum̐||
Meaning राजा जनककी पुत्री, जगत्की माता और करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीजनकीजीके दोनों चरणकमलोंको मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपासे निर्मल बुद्धि पाऊँ॥ ४॥
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥
राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक॥
puni mana bacana karma raghunāyaka| carana kamala baṃdaum̐ saba lāyaka||
rājivanayana dhareṃ dhanu sāyaka| bhagata bipati bhaṃjana sukha dāyaka||
Meaning फिर मैं मन, वचन और कर्मसे कमलनयन, धनुष-बाणधारी, भक्तोंकी विपत्तिका नाश करने और उन्हें सुख देनेवाले भगवान् श्रीरघुनाथजीके सर्वसमर्थ चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥ ५॥
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥ १८॥
girā aratha jala bīci sama kahiata bhinna na bhinna|
badaum̐ sītā rāma pada jinhahi parama priya khinna|| 18||
Meaning जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जलकी लहरके समान कहनेमें अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तवमें अभिन्न (एक) हैं, उन श्रीसीतारामजीके चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जिन्हें दीन- दुखी बहुत ही प्रिय हैं॥ १८॥
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
baṃdaum̐ nāma rāma raghuvara ko| hetu kṛsānu bhānu himakara ko||
bidhi hari haramaya beda prāna so| aguna anūpama guna nidhāna so||
Meaning मैं श्रीरघुनाथजीके नाम 'राम' की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' *'आ' और 'म' रूपसे बीज है। वह * राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है॥ १॥
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
mahāmaṃtra joi japata mahesū| kāsīṃ mukuti hetu upadesū||
mahimā jāsu jāna ganarāu| prathama pūjiata nāma prabhāū||
Meaning जो महामन्त्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशीमें मुक्तिका कारण है, तथा जिसकी महिमाको गणेशजी जानते हैं, जो इस * राम' नामके प्रभावसे ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥ २॥
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥
jāna ādikabi nāma pratāpū| bhayau suddha kari ulaṭā jāpū||
sahasa nāma sama suni siva bānī| japi jeī piya saṃga bhavānī||
Meaning आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामके प्रतापको जानते हैं, जो उलटा नाम (मरा, ' मरा) जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजीके इस वचनको सुनकर कि एक राम-नाम सहस्त्र नामके समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति ( श्रीशिवजी ) के साथ रामनामका जप करती रहती हैं॥ ३॥
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥
haraṣe hetu heri hara hī ko| kiya bhūṣana tiya bhūṣana tī ko||
nāma prabhāu jāna siva nīko| kālakūṭa phalu dīnha amī ko||
Meaning नामके प्रति पार्वतीजीके हृदयकी ऐसी प्रीति देखकर श्रीशिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियोंमें भूषणरूप (पतिव्रताओंमें शिरोमणि) पार्वतीजीको अपना भूषण बना लिया (अर्थात् उन्हें अपने आज़्में धारण करके अर्द्धाज्ञिनी बना लिया)। नामके प्रभावको श्रीशिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहरने उनको अमृतका फल दिया॥ ४॥
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥
baraṣā ritu raghupati bhagati tulasī sāli sudāsa|
rāma nāma bara barana juga sāvana bhādava māsa||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं॥ १९॥
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
ākhara madhura manohara doū| barana bilocana jana jiya joū||
sumirata sulabha sukhada saba kāhū| loka lāhu paraloka nibāhū||
Meaning दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमालारूपी शरीरके नेत्र हैं, भक्तोंके जीवन हैं तथा स्मरण करनेमें सबके लिये सुलभ और सुख देनेवाले हैं, और जो इस लोकमें लाभ और परलोकमें निर्वाह करते हैं (अर्थात् भगवान्के दिव्य धाममें दिव्य देहसे सदा भगवत्सेवामें नियुक्त रखते हैं)॥ १॥
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥
kahata sunata sumirata suṭhi nīke| rāma lakhana sama priya tulasī ke||
baranata barana prīti bilagātī| brahma jīva sama sahaja sam̐ghātī||
Meaning ये कहने, सुनने और स्मरण करनेमें बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं; तुलसीदासको तो श्रीराम-लक्ष्मणके समान प्यारे हैं। इनका (*र' और *म' का) अलग-अलग वर्णन करनेमें प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीजमन्त्रकी दृष्टिसे इनके उच्चारण, अर्थ और फलमें भिन्नना दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रहमके समान स्वभावसे ही साथ रहनेवाले (सदा एकरूप और एकरस)॥ २॥
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥
nara nārāyana sarisa subhrātā| jaga pālaka biseṣi jana trātā||
bhagati sutiya kala karana bibhūṣana| jaga hita hetu bimala bidhu pūṣana||
Meaning ये दोनों अक्षर नर-नारायणके समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत्का पालन और विशेषरूपसे भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं। ये भक्तिरूपिणी सुन्दर स्त्रीके कानोंके सुन्दर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत्के हितके लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं॥ ३॥
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥
svāda toṣa sama sugati sudhā ke| kamaṭha seṣa sama dhara basudhā ke||
jana mana maṃju kaṃja madhukara se| jīha jasomati hari haladhara se||
Meaning ये सुन्दर गति (मोक्ष) रूपी अमृतके स्वाद और तृप्तिके समान हैं, कच्छप और शेषजीके समान पृथ्वीके धारण करनेवाले हैं, भक्तोंके मनरूपी सुन्दर कमलमें विहार करनेवाले भौंरेके समान हैं और जीभरूपी यशोदाजीके लिये श्रीकृष्ण और बलरामजीके समान (आनन्द देनेवाले ) हैं॥ ४॥
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥ २०॥
eku chatru eku mukuṭamani saba baranani para jou|
tulasī raghubara nāma ke barana birājata dou|| 20||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं--श्रीरघुनाथजीके नामके दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमेंसे एक (रकार) छत्ररूप ( रेफ ) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि ( अनुस्वार) रूपसे सब अक्षरोंके ऊपर हैं॥ २०॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥
samujhata sarisa nāma aru nāmī| prīti parasapara prabhu anugāmī||
nāma rūpa dui īsa upādhī| akatha anādi susāmujhi sādhī||
Meaning समझनेमें नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनोंमें परस्पर स्वामी और सेवकके समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामीमें पूर्ण एकता होनेपर भी जैसे स्वामीके पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नामके पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्रीरामजी अपने *राम' नामका ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वरकी उपाधि हैं; ये ( भगवान्के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धिसे ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जाननेमें आता है॥ १॥
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
ko baṛa choṭa kahata aparādhū| suni guna bheda samujhihahiṃ sādhū||
dekhiahiṃ rūpa nāma ādhīnā| rūpa gyāna nahiṃ nāma bihīnā||
Meaning इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणोंका तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नामके अधीन देखे जाते हैं, नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता॥ २॥
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥
rūpa biseṣa nāma binu jāneṃ| karatala gata na parahiṃ pahicāneṃ||
sumiria nāma rūpa binu dekheṃ| āvata hṛdayam̐ saneha biseṣeṃ||
Meaning कोई-सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेलीपर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूपके बिना देखे भी नामका स्मरण किया जाय तो विशेष प्रेमके साथ वह रूप हृदयमें आ जाता है॥ ३॥
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
nāma rūpa gati akatha kahānī| samujhata sukhada na parati bakhānī||
aguna saguna bica nāma susākhī| ubhaya prabodhaka catura dubhāṣī||
Meaning नाम और रूपकी गतिकी कहानी (विशेषताकी कथा) अकथनीय है। वह समझनेमें सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुणके बीचमें नाम सुन्दर साक्षी है और दोनोंका यथार्थ ज्ञान करानेवाला चतुर दुभाषिया है॥ ४॥
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥ २१॥
rāma nāma manidīpa dharu jīha deharī dvāra|
tulasī bhītara bāherahum̐ jauṃ cāhasi ujiāra|| 21||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वाकी जीभरूपी देहलीपर रामनामरूपी मणि-दीपकको रख॥ २१॥