धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥
dhūpa dhūma nabhu mecaka bhayaū| sāvana ghana ghamaṃḍu janu ṭhayaū||
surataru sumana māla sura baraṣahiṃ| manahum̐ balāka avali manu karaṣahiṃ||
Meaning धूपके धूएँसे आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावनके बादल घुमड़-घुमड़कर छा गये हों। देवता कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाएँ बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलोंकी पाँति मनको [अपनी ओर] खींच रही हो॥ १॥
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥
maṃjula manimaya baṃdanivāre| manahum̐ pākaripu cāpa sam̐vāre||
pragaṭahiṃ durahiṃ aṭanha para bhāmini| cāru capala janu damakahiṃ dāmini||
Meaning सुन्दर मणियोंसे बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों। अटारियों पर सुन्दर और चपल स््त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं (आती-जाती हैं); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजलियाँ चमक रही हों॥ २॥
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥
सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥
duṃdubhi dhuni ghana garajani ghorā| jācaka cātaka dādura morā||
sura sugandha suci baraṣahiṃ bārī| sukhī sakala sasi pura nara nārī||
Meaning नगाड़ोंकी ध्वनि मानो बादलोंकी घोर गर्जना है। याचकगण पपीहे, मेढठक और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे खेतीके समान नगरके सब स्त्री-पुरुष सुखी हो रहे हैं॥ ३॥
समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥
सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥
samau jānī gura āyasu dīnhā| pura prabesu raghukulamani kīnhā||
sumiri saṃbhu girajā ganarājā| mudita mahīpati sahita samājā||
Meaning [ प्रवेशका ] समय जानकर गुरु वसिष्ठजीने आज्ञा दी। तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजीने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजीका स्मरण करके समाजसहित आनन्दित होकर नगरमें प्रवेश किया॥ ४॥
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥ ३४७॥
hohiṃ saguna baraṣahiṃ sumana sura duṃdubhīṃ bajāi|
bibudha badhū nācahiṃ mudita maṃjula maṃgala gāi|| 347||
Meaning शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा-बजाकर फूल बरसा रहे हैं। देवताओंकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर सुन्दर मज़लगीत गा-गाकर नाच रही हैं॥ ३४७॥
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥
māgadha sūta baṃdi naṭa nāgara| gāvahiṃ jasu tihu loka ujāgara||
jaya dhuni bimala beda bara bānī| dasa disi sunia sumaṃgala sānī||
Meaning मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकोंके उजागर (सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाशस्वरूप) श्रीरामचन्द्रजीका यश गा रहे हैं। जयध्वनि तथा वेदकी निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मज़लसे सनी हुई दसों दिशाओंमें सुनायी पड़ रही है॥ १॥
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥
bipula bājane bājana lāge| nabha sura nagara loga anurāge||
bane barātī barani na jāhīṃ| mahā mudita mana sukha na samāhīṃ||
Meaning बहुत-से बाजे बजने लगे। आकाशमें देवता और नगरमें लोग सब प्रेममें मग्न हैं। बराती ऐसे बने-ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। परम आनन्दित हैं, सुख उनके मनमें समाता नहीं है॥ २॥
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥
purabāsinha taba rāya johāre| dekhata rāmahi bhae sukhāre||
karahiṃ nichāvari manigana cīrā| bāri bilocana pulaka sarīrā||
Meaning तब अयोध्यावासियोंने राजाको जोहार (वन्दना) की। श्रीरामचन्द्रजीको देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियाँ और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओोंका ] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं॥ ३॥
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी॥
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥
ārati karahiṃ mudita pura nārī| haraṣahiṃ nirakhi kum̐ara bara cārī||
sibikā subhaga ohāra ughārī| dekhi dulahininha hohiṃ sukhārī||
Meaning हर्षित हो रही हैं। पालकियोंके सुन्दर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनोंको देखकर सुखी होती हैं॥ ४॥
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥ ३४८॥
ehi bidhi sabahī deta sukhu āe rājaduāra|
mudita mātu paruchani karahiṃ badhunha sameta kumāra|| 348||
Meaning इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वारपर आये। माताएँ आनन्दित होकर बहुओंसहित कुमारोंका परछन कर रही हैं॥ ३४८॥
भूषन मनि पट नाना जाती।
करही निछावरि अगनित भाँती॥
bhūṣana mani paṭa nānā jātī| karahī nichāvari aganita bhām̐tī||
Meaning अनेकों प्रकारके आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकारकी अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं॥ १॥
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥
badhunha sameta dekhi suta cārī| paramānaṃda magana mahatārī||
puni puni sīya rāma chabi dekhī| mudita saphala jaga jīvana lekhī||
Meaning बहुओंसहित चारों पुत्रोंको देखकर माताएँ परमानन्दमें मग्न हो गयीं। सीताजी और श्रीरामजीकी छबिको बार-बार देखकर वे जगत्में अपने जीवनको सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं॥ २॥
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥
sakhīṃ sīya mukha puni puni cāhī| gāna karahiṃ nija sukṛta sarāhī||
baraṣahiṃ sumana chanahiṃ chana devā| nācahiṃ gāvahiṃ lāvahiṃ sevā||
Meaning सखियाँ सीताजीके मुखको बार-बार देखकर अपने पुण्योंकी सराहना करती हुई गान कर रही हैं। देवता क्षण-क्षणमें फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पण करते हैं॥ ३॥
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥
देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥
dekhi manohara cāriu jorīṃ| sārada upamā sakala ḍham̐ḍhorīṃ||
deta na banahiṃ nipaṭa laghu lāgī| ekaṭaka rahīṃ rūpa anurāgīṃ||
Meaning चारों मनोहर जोड़ियोंको देखकर सरस्वतीने सारी उपमाओंको खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि उन्हें सभी बिलकुल तुच्छ जान पड़ीं। तब हारकर वे भी श्रीरामजीके रूपमें अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं॥ ४॥
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥ ३४९॥
nigama nīti kula rīti kari aragha pām̐vaṛe deta|
badhunha sahita suta parichi saba calīṃ lavāi niketa|| 349||
Meaning वेदकी विधि और कुलकी रीति करके अर्घ्य-पाँवड़े देती हुई बहुओंसमेत सब पुत्रोंको परछन करके माताएँ महलमें लिवा चलीं॥ ३४९॥
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे॥
cāri siṃghāsana sahaja suhāe| janu manoja nija hātha banāe||
tinha para kuam̐ri kuam̐ra baiṭhāre| sādara pāya punita pakhāre||
Meaning स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेवने ही अपने हाथसे बनाये थे। उनपर माताओंने राजकुमारियों और राजकुमारोंको बैठाया और आदरके साथ उनके पवित्र चरण धोये॥ १॥
धूप दीप नैबेद बेद बिधि।
पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥
dhūpa dīpa naibeda beda bidhi| pūje bara dulahini maṃgalanidhi||
Meaning फिर वेदकी विधिके अनुसार मज़लोंके निधान दूलह और दुलहिनोंकी धूप, दीप और नैवेद्य तथा चँवर ढल रहे हैं॥ २॥
बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं॥
bastu aneka nichāvara hohīṃ| bharīṃ pramoda mātu saba sohīṃ||
pāvā parama tatva janu jogīṃ| amṛta laheu janu saṃtata rogīṃ||
Meaning अनेकों वस्तुएँ निछावर हो रही हैं; सभी माताएँ आनन्दसे भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगीने परम तत्त्वको प्राप्त कर लिया। सदाके रोगीने मानो अमृत पा लिया,॥ ३॥
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥
मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥
janama raṃka janu pārasa pāvā| aṃdhahi locana lābhu suhāvā||
mūka badana janu sārada chāī| mānahum̐ samara sūra jaya pāī||
Meaning जन्मका दरिद्री मानो पारस पा गया। अंधेको सुन्दर नेत्रोंका लाभ हुआ। गूँगेके मुखमें मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीरने मानो युद्धमें विजय पा ली॥ ४॥
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥ ३५० ( क )॥
ehi sukha te sata koṭi guna pāvahiṃ mātu anaṃdu|
bhāinha sahita biāhi ghara āe raghukulacaṃdu|| 350 ( ka )||
Meaning इन सुखोंसे भी सौ करोड़ गुना बढ़कर आनन्द माताएँ पा रही हैं। क्योंकि रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयोंसहित घर आये हैं॥ ३५० (क)॥
लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं॥ ३५० ( ख )॥
loka rīta jananī karahiṃ bara dulahini sakucāhiṃ|
modu binodu biloki baṛa rāmu manahiṃ musakāhiṃ|| 350 ( kha )||
Meaning माताएँ लोकरीति करती हैं और दूलह-दुलहिनें सकुचाते हैं। इस महान् आनन्द और विनोदको देखकर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ ३५० (ख)॥
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥
सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥
deva pitara pūje bidhi nīkī| pūjīṃ sakala bāsanā jī kī||
sabahiṃ baṃdi māgahiṃ baradānā| bhāinha sahita rāma kalyānā||
Meaning मनकी सभी वासनाएँ पूरी हुई जानकर देवता और पितरोंका भलीभाँति पूजन किया। सबकी वन्दना करके माताएँ यही वरदान माँगती हैं कि भाइयोंसहित श्रीरामजीका कल्याण हो॥ १॥
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं॥
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥
aṃtarahita sura āsiṣa dehīṃ| mudita mātu aṃcala bhari leṃhīṃ||
bhūpati boli barātī līnhe| jāna basana mani bhūṣana dīnhe||
Meaning देवता छिपे हुए [ अन्तरिक्षसे] आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएँ आनन्दित हो आँचल भरकर ले रही हैं। तदनन्तर राजाने बरातियोंको बुलवा लिया और उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, मणि (रबर) और आभूषणादि दिये॥ २॥
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि॥
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए॥
āyasu pāi rākhi ura rāmahi| mudita gae saba nija nija dhāmahi||
pura nara nāri sakala pahirāe| ghara ghara bājana lage badhāe||
Meaning आज्ञा. पाकर, श्रीरामजीको हृदयमें रखकर वे सब आनन्दित होकर अपने-अपने घर गये। नगरके समस्त स्त्री-पुरुषोंको राजाने कपड़े और गहने पहनाये। घर-घर बधावे बजने लगे॥ ३॥
जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई॥
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना॥
jācaka jana jācahi joi joī| pramudita rāu dehiṃ soi soī||
sevaka sakala bajaniā nānā| pūrana kie dāna sanamānā||
Meaning याचक लोग जो-जो माँगते हैं, विशेष प्रसन्न होकर राजा उन्हें वही-वही देते हैं। सम्पूर्ण सेवकों और बाजेवालोंको राजाने नाना प्रकारके दान और सम्मानसे सन्तुष्ट किया॥ ४॥
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ॥ ३५१॥
deṃhiṃ asīsa johāri saba gāvahiṃ guna gana gātha|
taba gura bhūsura sahita gṛham̐ gavanu kīnha naranātha|| 351||
Meaning सब जोहार (वन्दन) करके आशिष देते हैं और गुणसमूहोंकी कथा गाते हैं। तब गुरु और ब्राह्मणोंसहित राजा दशरथजीने महलमें गमन किया॥ ३५१॥
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥
jo basiṣṭha anusāsana dīnhī| loka beda bidhi sādara kīnhī||
bhūsura bhīra dekhi saba rānī| sādara uṭhīṃ bhāgya baṛa jānī||
Meaning वसिष्टजीने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेदकी विधिके अनुसार राजाने आदरपूर्वक किया। ब्राह्मणोंकी भीड़ देखकर अपना बड़ा भाग्य जानकर सब रानियाँ आदरके साथ उठीं॥ १॥
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए॥
आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे॥
pāya pakhāri sakala anhavāe| pūji bhalī bidhi bhūpa jevām̐e||
ādara dāna prema paripoṣe| deta asīsa cale mana toṣe||
Meaning चरण धोकर उन्होंने सबको स्नान कराया और राजाने भलीभाँति पूजन करके उन्हें भोजन कराया। आदर, दान और प्रेमसे पुष्ठ हुए वे सन्तुष्ट मनसे आशीर्वाद देते हुए चले॥ २॥
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥
bahu bidhi kīnhi gādhisuta pūjā| nātha mohi sama dhanya na dūjā||
kīnhi prasaṃsā bhūpati bhūrī| rāninha sahita līnhi paga dhūrī||
Meaning राजाने गाधि-पुत्र विश्वामित्रजीकी बहुत तरहसे पूजा की और कहा--हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है। राजाने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियोंसहित उनकी चरणधूलिको ग्रहण किया॥ ३॥
भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू॥
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥
bhītara bhavana dīnha bara bāsu| mana jogavata raha nṛpa ranivāsū||
pūje gura pada kamala bahorī| kīnhi binaya ura prīti na thorī||
Meaning उन्हें महलके भीतर ठहरनेको उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और सब रनिवास उनका मन जोहता रहे (अर्थात् जिसमें राजा और महलकी सारी रानियाँ स्वयं उनके इच्छानुसार उनके आरामकी ओर दृष्टि रख सकें), फिर राजाने गुरु वसिष्टडजीके चरणकमलोंकी पूजा और विनती की। उनके हृदयमें कम प्रीति न थी (अर्थात् बहुत प्रीति थी)॥ ४॥
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु॥ ३५२॥
badhunha sameta kumāra saba rāninha sahita mahīsu|
puni puni baṃdata gura carana deta asīsa munīsu|| 352||
Meaning बहुओंसहित सब राजकुमार और सब रानियोंसमेत राजा बार-बार गुरुजीके चरणोंकी वन्दना करते हैं और मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं॥ ३५२॥
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥
binaya kīnhi ura ati anurāgeṃ| suta saṃpadā rākhi saba āgeṃ||
negu māgi munināyaka līnhā| āsirabādu bahuta bidhi dīnhā||
Meaning राजाने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे पुत्रोंको और सारी सम्पत्तिको सामने रखकर [उन्हें स्वीकार करनेके लिये] विनती की। परन्तु मुनिराजने [ पुरोहितके नाते] केवल अपना नेग माँग लिया और बहुत तरहसे आशीर्वाद दिया॥ १॥
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥
बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई॥
ura dhari rāmahi sīya sametā| haraṣi kīnha gura gavanu niketā||
biprabadhū saba bhūpa bolāī| caila cāru bhūṣana pahirāī||
Meaning फिर सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर गुरु वसिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थानको गये। राजाने सब ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंको बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये॥ २॥
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥
नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं॥
bahuri bolāi suāsini līnhīṃ| ruci bicāri pahirāvani dīnhīṃ||
negī nega joga saba lehīṃ| ruci anurupa bhūpamani dehīṃ||
Meaning फिर सब सुआसिनियोंको (नगरभरकी सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदिको) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर [उसीके अनुसार] उन्हें पहिरावनी दी। नेगी लोग सब अपना-अपना नेग-जोग लेते और राजाओंके शिरोमणि दशरथजी उनकी इच्छाके अनुसार देते हैं॥३॥
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥
priya pāhune pūjya je jāne| bhūpati bhalī bhām̐ti sanamāne||
deva dekhi raghubīra bibāhū| baraṣi prasūna prasaṃsi uchāhū||
Meaning जिन मेहमानोंको प्रिय और पूजनीय जाना, उनका राजाने भलीभाँति सम्मान किया। देवगण श्रीरघुनाथजीका विवाह देखकर, उत्सवकी प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए--॥ ४॥
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥ ३५३॥
cale nisāna bajāi sura nija nija pura sukha pāi|
kahata parasapara rāma jasu prema na hṛdayam̐ samāi|| 353||
Meaning नगाड़े बजाकर और [परम] सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकोंको चले। वे एक-दूसरेसे श्रीराीमजीका यश कहते जाते हैं। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है॥ ३५३॥
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥
saba bidhi sabahi samadi naranāhū| rahā hṛdayam̐ bhari pūri uchāhū||
jaham̐ ranivāsu tahām̐ pagu dhāre| sahita bahūṭinha kuam̐ra nihāre||
Meaning सब प्रकारसे सबका प्रेमपूर्वक भलीभाँति आदर-सत्कार कर लेनेपर राजा दशरथजीके हृदयमें पूर्ण उत्साह (आनन्द) भर गया। जहाँ रनिवास था, वे वहाँ पधारे और बहुओंसमेत उन्होंने कुमारोंको देखा॥ १॥
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥
lie goda kari moda sametā| ko kahi sakai bhayau sukhu jetā||
badhū saprema goda baiṭhārīṃ| bāra bāra hiyam̐ haraṣi dulārīṃ||
Meaning राजाने आनन्दसहित पुत्रोंको गोदमें ले लिया। उस समय राजाको जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है ? फिर पुत्रवधुओंको प्रेमसहित गोदीमें बैठाकर, बार-बार हृदयमें हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार (लाड़-चाव) किया॥ २॥
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू॥
dekhi samāju mudita ranivāsū| saba keṃ ura anaṃda kiyo bāsū||
kaheu bhūpa jimi bhayau bibāhū| suni haraṣu hota saba kāhū||
Meaning यह समाज (समारोह) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया। सबके हृदयमें आनन्दने निवास कर लिया। तब राजाने जिस तरह विवाह हुआ था वह सब कहा। उसे सुन-सुनकर सब किसीको हर्ष होता है॥ ३॥
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी॥
janaka rāja guna sīlu baṛāī| prīti rīti saṃpadā suhāī||
bahubidhi bhūpa bhāṭa jimi baranī| rānīṃ saba pramudita suni karanī||
Meaning राजा जनकके गुण, शील, महत्त्व, प्रीतिकी रीति और सुहावनी सम्पत्तिका वर्णन राजाने भाटकी तरह बहुत प्रकारसे किया। जनकजीकी करनी सुनकर सब रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं॥ ४॥
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥ ३५४॥
sutanha sameta nahāi nṛpa boli bipra gura gyāti|
bhojana kīnha aneka bidhi gharī paṃca gai rāti|| 354||
Meaning पुत्रोंसहित स्नान करके राजाने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियोंको बुलाकर अनेक प्रकारके भोजन किये। [यह सब करते-करते] पाँच घड़ी रात बीत गयी॥ ३५४॥
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥
maṃgalagāna karahiṃ bara bhāmini| bhai sukhamūla manohara jāmini||
am̐cai pāna saba kāhūm̐ pāe| straga sugaṃdha bhūṣita chabi chāe||
Meaning सुन्दर स्त्रियाँ मज़लगान कर रही हैं। वह रात्रि सुखकी मूल और मनोहारिणी हो गयी। सबने आचमन करके पान खाये और फूलोंकी माला, सुगन्धित द्रव्य आदिसे विभूषित होकर सब शोभासे छा गये॥ १॥
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥
प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥
rāmahi dekhi rajāyasu pāī| nija nija bhavana cale sira nāī||
prema pramoda binodu baṛhāī| samau samāju manoharatāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीको देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घरको चले। वहँके प्रेम, आनन्द, विनोद, महत्त्व, समय, समाज और मनोहरताको--॥ २॥
कहि न सकहि सत सारद सेसू।
बेद बिरंचि महेस गनेसू॥
kahi na sakahi sata sārada sesū| beda biraṃci mahesa ganesū||
में कहाँ कवन बिधि बरनी।
भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥
meṃ kahām̐ kavana bidhi baranī| bhūmināgu sira dharai ki dharanī||
Meaning सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते। फिर भला मैं उसे किस प्रकारसे बखानकर कहूँ ? कहीं केंचुआ भी धरतीको सिरपर ले सकता है!॥ ३॥
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी॥
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई॥
nṛpa saba bhām̐ti sabahi sanamānī| kahi mṛdu bacana bolāī rānī||
badhū larikanīṃ para ghara āīṃ| rākhehu nayana palaka kī nāī||
Meaning राजाने सबका सब प्रकारसे सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियोंको बुलाया और कहा-- बहुएँ अभी बच्ची हैं, पराये घर आयी हैं। इनको इस तरहसे रखना जैसे नेत्रोंको पलकें रखती हैं (जैसे पलकें नेत्रोंकी सब प्रकारसे रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुँचाती हैं, वैसे ही इनको सुख पहुँचाना)॥ ४॥
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।
अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥ ३५५॥
larikā śramita unīda basa sayana karāvahu jāi|
asa kahi ge biśrāmagṛham̐ rāma carana citu lāi|| 355||
Meaning लड़के थके हुए नींदके वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें मन लगाकर विश्रामभवनमें चले गये॥ ३५५॥
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥
bhūpa bacana suni sahaja suhāe| jarita kanaka mani palam̐ga ḍasāe||
subhaga surabhi paya phena samānā| komala kalita supetīṃ nānā||
Meaning राजाके स्वभावसे ही सुन्दर वचन सुनकर [रानियोंने] मणियोंसे जड़े सुवर्णके पलैँग बिछवाये। [गद्दॉपर] गौके दूधके फेनके समान सुन्दर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछायीं॥ १॥
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥
upabarahana bara barani na jāhīṃ| straga sugaṃdha manimaṃdira māhīṃ||
ratanadīpa suṭhi cāru cam̐dovā| kahata na banai jāna jehiṃ jovā||
Meaning सुन्दर तकियोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियोंके मन्दिरमें फूलोंकी मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नोंके दीपकों और सुन्दर चँदोवेकी शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है॥ २॥
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥
seja rucira raci rāmu uṭhāe| prema sameta palam̐ga pauṛhāe||
agyā puni puni bhāinha dīnhī| nija nija seja sayana tinha kīnhī||
Meaning इस प्रकार सुन्दर शय्या सजाकर [माताओंने] श्रीरामचन्द्रजीको उठाया और प्रेमसहित पलगपर पौढ़ाया। श्रीरामजीने बार-बार भाइयोंको आज्ञा दी। तब वे भी अपनी-अपनी शय्याओंपर सो गये॥ ३॥
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥
dekhi syāma mṛdu maṃjula gātā| kahahiṃ saprema bacana saba mātā||
māraga jāta bhayāvani bhārī| kehi bidhi tāta tāṛakā mārī||
Meaning श्रीरामजीके साँवले सुन्दर कोमल अड्ञोंको देखकर सब माताएँ प्रेमसहित वचन कह रही हैं-- हे तात! मार्गमें जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसीको किस प्रकारसे मारा ?॥ ४॥
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥ ३५६॥
ghora nisācara bikaṭa bhaṭa samara ganahiṃ nahiṃ kāhu|
māre sahita sahāya kimi khala mārīca subāhu|| 356||
Meaning बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्धमें किसीको कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहुको सहायकोंसहित तुमने कैसे मारा ?॥ ३५६॥
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई॥
muni prasāda bali tāta tumhārī| īsa aneka karavareṃ ṭārī||
makha rakhavārī kari duhum̐ bhāī| guru prasāda saba bidyā pāī||
Meaning हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनिकी कृपासे ही ईश्वरने तुम्हारी बहुत-सी बलाओंको टाल दिया। दोनों भाइयोंने यज्ञकी रखवाली करके गुरुजीके प्रसादसे सब विद्याएँ पायीं॥ १॥
मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥
munitaya tarī lagata paga dhūrī| kīrati rahī bhuvana bhari pūrī||
kamaṭha pīṭhi pabi kūṭa kaṭhorā| nṛpa samāja mahum̐ siva dhanu torā||
Meaning चरणोंकी धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गयी। विश्वभरमें यह कीर्ति पूर्णरीतिसे व्याप्त हो गयी। कच्छपकी पीठ, वत्र और पर्वतसे भी कठोर शिवजीके धनुषको राजाओंके समाजमें तुमने तोड़ दिया॥ २॥
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥
bisva bijaya jasu jānaki pāī| āe bhavana byāhi saba bhāī||
sakala amānuṣa karama tumhāre| kevala kausika kṛpām̐ sudhāre||
Meaning विश्वविजयके यश और जानकीको पाया और सब भाइयोंको ब्याहकर घर आये। तुम्हारे सभी कर्म अमानुषी हैं (मनुष्यकी शक्तिके बाहर हैं), जिन्हें केवल विशध्वामित्रजीकी कृपाने सुधारा है (सम्पन्न किया है)॥ ३॥
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥
āju suphala jaga janamu hamārā| dekhi tāta bidhubadana tumhārā||
je dina gae tumhahi binu dekheṃ| te biraṃci jani pārahiṃ lekheṃ||
Meaning हे तात! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जगतमें जन्म लेना सफल हुआ। तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनतीमें न लावें (हमारी आयुमें शामिल न करें)॥ ४॥
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन॥ ३५७॥
rāma pratoṣīṃ mātu saba kahi binīta bara baina|
sumiri saṃbhu gura bipra pada kie nīdabasa naina|| 357||
Meaning विनयभरे उत्तम वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको संतुष्ट किया। फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणोंके चरणोंका स्मरण कर नेत्रोंको नींदके वश किया (अर्थात् वे सो रहे)॥ ३५७॥
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥
nīdaum̐ badana soha suṭhi lonā| manahum̐ sām̐jha sarasīruha sonā||
ghara ghara karahiṃ jāgarana nārīṃ| dehiṃ parasapara maṃgala gārīṃ||
Meaning नींदमें भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो सन्ध्याके समयका लाल कमल सोह रहा हो। स्त्रियाँ घर-घर जागरण कर रही हैं और आपसभमें (एक-दूसरीको ) मज्लमयी गालियाँ दे रही हैं॥ १॥
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई॥
purī birājati rājati rajanī| rānīṃ kahahiṃ bilokahu sajanī||
suṃdara badhunha sāsu lai soī| phanikanha janu siramani ura goī||
Meaning रानियाँ कहती हैं--हे सजनी! देखो, [आज] रात्रिकी कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! [यों कहती हुई] सासुएँ सुन्दर बहुओंको लेकर सो गयीं, मानो सर्पोने अपने सिरकी मणियोंको हृदयमें छिपा लिया है॥ २॥
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥
prāta punīta kāla prabhu jāge| arunacūṛa bara bolana lāge||
baṃdi māgadhanhi gunagana gāe| purajana dvāra johārana āe||
Meaning प्रात:काल पवित्र ब्राह्ममुहूर्तमें प्रभु जागे। मुर्गे सुन्दर बोलने लगे। भाट और मागधोंने गुणोंका गान किया तथा नगरके लोग द्वारपर जोहार करनेको आये॥ ३॥
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥
baṃdi bipra sura gura pitu mātā| pāi asīsa mudita saba bhrātā||
jananinha sādara badana nihāre| bhūpati saṃga dvāra pagu dhāre||
Meaning ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओंने आदरके साथ उनके मुखोंको देखा। फिर वे राजाके साथ दरवाजे (बाहर) पधारे॥ ४॥
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥ ३५८॥
kīnha sauca saba sahaja suci sarita punīta nahāi|
prātakriyā kari tāta pahiṃ āe cāriu bhāi|| 358||
Meaning स्वभावसे ही पवित्र चारों भाइयोंने सब शौचादिसे निवृत्त होकर पवित्र सरयू नदीमें स्रान किया और प्रात:क्रिया (सन्ध्या-वन्दनादि) करके वे पिताके पास आये॥ ३५८॥
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई॥
देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥
bhūpa biloki lie ura lāī| baiṭhai haraṣi rajāyasu pāī||
dekhi rāmu saba sabhā juṛānī| locana lābha avadhi anumānī||
Meaning राजाने देखते ही उन्हें हृदयसे लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गये। श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर और नेत्रोंके लाभकी बस यही सीमा है, ऐसा अनुमानकर सारी सभा शीतल हो गयी (अर्थात् सबके तीनों प्रकारके ताप सदाके लिये मिट गये)॥ १॥
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥
puni basiṣṭu muni kausika āe| subhaga āsananhi muni baiṭhāe||
sutanha sameta pūji pada lāge| nirakhi rāmu dou gura anurāge||
Meaning फिर मुनि वसिष्टजी और विश्वामित्रजी आये। राजाने उनको सुन्दर आसनोंपर बैठाया और पुत्रों - समेत उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे। दोनों गुरु श्रीरामजीको देखकर प्रेममें मुग्ध हो गये॥ २॥
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥
मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥
kahahiṃ basiṣṭu dharama itihāsā| sunahiṃ mahīsu sahita ranivāsā||
muni mana agama gādhisuta karanī| mudita basiṣṭa bipula bidhi baranī||
Meaning वसिष्ठजी धर्मके इतिहास कह रहे हैं और राजा रनिवाससहित सुन रहे हैं। जो मुनियोंके मनको भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजीकी करनीको वसिष्टजीने आनन्दित होकर बहुत प्रकारसे वर्णन किया॥ ३॥
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥
bole bāmadeu saba sām̐cī| kīrati kalita loka tihum̐ mācī||
suni ānaṃdu bhayau saba kāhū| rāma lakhana ura adhika uchāhū||
Meaning वामदेवजी बोले--ये सब बातें सत्य हैं। विश्वामित्रजीकी सुन्दर कीर्ति तीनों लोकोंमें छायी हुई है। यह सुनकर सब किसीको आनन्द हुआ। श्रीराम-लक्ष्मणके हृदयमें अधिक उत्साह (आनन्द) हुआ॥ ४॥
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥ ३५९॥
maṃgala moda uchāha nita jāhiṃ divasa ehi bhām̐ti|
umagī avadha anaṃda bhari adhika adhika adhikāti|| 359||
Meaning नित्य ही मजड़ल, आनन्द और उत्सव होते हैं; इस तरह आनन्दमें दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनन्दसे भरकर उमड़ पड़ी, आनन्दकी अधिकता अधिक-अधिक बढ़ती ही जा रही है॥ ३५९॥
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥
sudina sodhi kala kaṃkana chaure| maṃgala moda binoda na thore||
nita nava sukhu sura dekhi sihāhīṃ| avadha janma jācahiṃ bidhi pāhīṃ||
Meaning अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधकर सुन्दर कड्लण खोले गये। मज़ल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए ( अर्थात् बहुत हुए)। इस प्रकार नित्य नये सुखको देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्यामें जन्म पानेके लिये ब्रह्माजीसे याचना करते हैं॥ १॥
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥
bisvāmitru calana nita cahahīṃ| rāma saprema binaya basa rahahīṃ||
dina dina sayaguna bhūpati bhāū| dekhi sarāha mahāmunirāū||
Meaning विधामित्रजी नित्य ही चलना (अपने आश्रम जाना) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजीके स्वेह और विनयवश रह जाते हैं। दिनों-दिन राजाका सौगुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं॥ २॥
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥
māgata bidā rāu anurāge| sutanha sameta ṭhāṛha bhe āge||
nātha sakala saṃpadā tumhārī| maiṃ sevaku sameta suta nārī||
Meaning अन्तमें जब विश्वामित्रजीने विदा माँगी, तब राजा प्रेममग्न हो गये और पुत्रोंसहित आगे खड़े हो गये। [वे बोले-] हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रोंसहित आपका सेवक हूँ॥ ३॥
करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू॥
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥
karaba sadā larikanaḥ para chohū| darasana deta rahaba muni mohū||
asa kahi rāu sahita suta rānī| pareu carana mukha āva na bānī||
Meaning हे मुनि! लड़कोंपर सदा स्नेह करते रहियेगा और मुझे भी दर्शन देते रहियेगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियोंसहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजीके चरणोंपर गिर पड़े, [प्रेमविह्नल हो जानेके कारण] उनके मुँहसे बात नहीं निकलती॥ ४॥
दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥
dīnha asīsa bipra bahu bhām̐tī| cale na prīti rīti kahi jātī||
rāmu saprema saṃga saba bhāī| āyasu pāi phire pahum̐cāī||
Meaning ब्राह्मण विश्वामित्रजीने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीतिकी रीति कही नहीं जाती। सब भाइयोंको साथ लेकर श्रीरामजी प्रेमके साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे॥ ५॥
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥ ३६०॥
rāma rūpu bhūpati bhagati byāhu uchāhu anaṃdu|
jāta sarāhata manahiṃ mana mudita gādhikulacaṃdu|| 360||
Meaning गाधिकुलके चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ श्रीरामचन्द्रजीके रूप, राजा दशरथजीकी भक्ति, [चारों भाइयोंके] विवाह और [सबके] उत्साह और आनन्दको मन-ही-मन सराहते जाते हैं॥ ३६०॥
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥
bāmadeva raghukula gura gyānī| bahuri gādhisuta kathā bakhānī||
suni muni sujasu manahiṃ mana rāū| baranata āpana punya prabhāū||
Meaning वामदेवजी और रघुकुलके गुरु ज्ञानी वसिष्टजीने फिर विश्वामित्रजीकी कथा बखानकर कही। मुनिका सुन्दर यश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पुण्योंके प्रभावका बखान करने लगे॥ १॥
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥
bahure loga rajāyasu bhayaū| sutanha sameta nṛpati gṛham̐ gayaū||
jaham̐ taham̐ rāma byāhu sabu gāvā| sujasu punīta loka tihum̐ chāvā||
Meaning आज्ञा हुई तब सब लोग [अपने-अपने घरोंको] लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रोंसहित महलमें गये। जहाँ-तहाँ सब श्रीरामचन्द्रजीके विवाहकी गाथाएँ गा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीका पवित्र सुयश तीनों लोकोंमें छा गया॥ २॥
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥
āe byāhi rāmu ghara jaba teṃ| basai anaṃda avadha saba taba teṃ||
prabhu bibāham̐ jasa bhayau uchāhū| sakahiṃ na barani girā ahināhū||
Meaning जब्से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे सब प्रकारका आनन्द अयोध्यामें आकर बसने लगा। प्रभुके विवाहमें जैसा आनन्द-उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पोके राजा शेषजी भी नहीं कह सकते॥ ३॥
कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥
kabikula jīvanu pāvana jānī| rāma sīya jasu maṃgala khānī||
tehi te maiṃ kachu kahā bakhānī| karana punīta hetu nija bānī||
Meaning श्रीसीतारामजीके यशको कविकुलके जीवनको पवित्र करनेवाला और मज़लोंकी खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये कुछ ( थोड़ा-सा) बखानकर कहा है॥ ४॥
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कद्ो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कोनें लक्मो॥
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बेदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥
nija girā pāvani karana kārana rāma jasu tulasīṃ kadो|
raghubīra carita apāra bāridhi pāru kabi koneṃ lakmo||
upabīta byāha uchāha maṃgala suni je sādara gāvahīṃ|
bedehi rāma prasāda te jana sarbadā sukhu pāvahīṃ||
Meaning अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है। [नहीं तो] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मज़लमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजनकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे।
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहु सदा उछाहु मगलायतन राम जसु॥ ३६॥
siya raghubīra bibāhu je saprema gāvahiṃ sunahiṃ|
tinha kahu sadā uchāhu magalāyatana rāma jasu|| 36||
Meaning श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीके विवाह-प्रसज़को जो लोग प्रेमपूर्वक गायें-सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह (आनन्द) -ही-उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीका यश मज़लका धाम है॥ ३६१॥