सहित बधूटिन्ह कुऔर सब तब आए पितु पास।
sahita badhūṭinha kuaura saba taba āe pitu pāsa|
भा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥ ३२७॥
bhā maṃgala moda bhari umageu janu janavāsa|| 327||
Meaning तब सब (चारों ) कुमार बहुओंसहित पिताजीके पास आये। ऐसा मालूम होता था मानो शोभा, मज़ल और आनन्दसे भरकर जनवासा उमड़ पड़ा हो॥ ३२७॥
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥
परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥
puni jevanāra bhaī bahu bhām̐tī| paṭhae janaka bolāi barātī||
parata pām̐vaṛe basana anūpā| sutanha sameta gavana kiyo bhūpā||
Meaning फिर बहुत प्रकारकी रसोई बनी। जनकजीने बरातियोंको बुला भेजा। राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित गमन किया। अनुपम वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ते जाते हैं॥ १॥
सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥
धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥
sādara sabake pāya pakhāre| jathājogu pīṛhanha baiṭhāre||
dhoe janaka avadhapati caranā| sīlu sanehu jāi nahiṃ baranā||
Meaning आदरके साथ सबके चरण धोये और सबको यथायोग्य पीढ़ोंपर बैठाया। तब जनकजीने अवधपति दशरथजीके चरण धोये। उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता॥ २॥
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥
तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥
bahuri rāma pada paṃkaja dhoe| je hara hṛdaya kamala mahum̐ goe||
tīniu bhāī rāma sama jānī| dhoe carana janaka nija pānī||
Meaning फिर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंको धोया, जो श्रीशिवजीके हृदय-कमलमें छिपे रहते हैं। तीनों भाइयोंको श्रीरामचन्द्रजीके ही समान जानकर जनकजीने उनके भी चरण अपने हाथोंसे धोये॥ ३॥
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥
सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥
āsana ucita sabahi nṛpa dīnhe| boli sūpakārī saba līnhe||
sādara lage parana panavāre| kanaka kīla mani pāna sam̐vāre||
Meaning राजा जनकजीने सभीको उचित आसन दिये और सब परसनेवालोंको बुला लिया। आदरके साथ पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियोंके पत्तोंसे सोनेकी कील लगाकर बनायी गयी थीं॥ ४॥
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥ ३२८॥
sūpodana surabhī sarapi suṃdara svādu punīta|
chana mahum̐ saba keṃ parusi ge catura suāra binīta|| 328||
Meaning चतुर और विनीत रसोइये सुन्दर, स्वादिष्ट और पवित्र दाल-भात और गायका [सुगन्धित] घी क्षणभरमें सबके सामने परस गये॥ ३२८॥
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥
भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥
paṃca kavala kari jevana laage| gāri gāna suni ati anurāge||
bhām̐ti aneka pare pakavāne| sudhā sarisa nahiṃ jāhiṃ bakhāne||
Meaning सब लोग पंचकौर करके (अर्थात् ' प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा ' इन मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर) भोजन करने लगे। गालीका गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गये। अनेकों तरहके अमृतके समान (स्वादिष्ट ) पकवान परसे गये, जिनका बखान नहीं हो सकता॥ १॥
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥
चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥
parusana lage suāra sujānā| biṃjana bibidha nāma ko jānā||
cāri bhām̐ti bhojana bidhi gāī| eka eka bidhi barani na jāī||
Meaning चतुर रसोइये नाना प्रकारके व्यञ्जन परसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकारके (चर्व्य, चोष्य, लेह्म, पेय अर्थात् चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खानेयोग्य) भोजनकी विधि कही गयी है, उनमेंसे एक-एक विधिके इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ २॥
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥
charasa rucira biṃjana bahu jātī| eka eka rasa aganita bhām̐tī||
jevam̐ta dehiṃ madhura dhuni gārī| lai lai nāma puruṣa aru nārī||
Meaning छहों रसोंके बहुत तरहके सुन्दर (स्वादिष्ट) व्यज्जन हैं। एक-एक रसके अनगिनती प्रकारके बने हैं। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियोंके नाम ले-लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनिसे गाली दे रही हैं (गाली गा रही हैं)॥ ३॥
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥
एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥
samaya suhāvani gāri birājā| ham̐sata rāu suni sahita samājā||
ehi bidhi sabahīṃ bhaujanu kīnhā| ādara sahita ācamanu dīnhā||
Meaning समयकी सुहावनी गाली शोभित हो रही है। उसे सुनकर समाजसहित राजा दशरथजी हँस रहे हैं। इस रीतिसे सभीने भोजन किया और तब सबको आदरसहित आचमन (हाथ-मुँह धोनेके लिये जल) दिया गया॥ ४॥
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥ ३२९॥
dei pāna pūje janaka dasarathu sahita samāja|
janavāsehi gavane mudita sakala bhūpa siratāja|| 329||
Meaning फिर पान देकर जनकजीने समाजसहित दशरथजीका पूजन किया। सब राजाओंके सिरमौर (चक्रवर्ती ) श्रीदशरथजी प्रसन्न होकर जनवासेको चले॥ ३२९॥
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥
nita nūtana maṃgala pura māhīṃ| nimiṣa sarisa dina jāmini jāhīṃ||
baṛe bhora bhūpatimani jāge| jācaka guna gana gāvana lāge||
Meaning जनकपुरमें नित्य नये मज़ल हो रहे हैं। दिन और रात पलके समान बीत जाते हैं। बड़े सबेरे राजाओंके मुकुटमणि दशरथजी जागे। याचक उनके गुणसमूहका गान करने लगे॥ १॥
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥
dekhi kuam̐ra bara badhunha sametā| kimi kahi jāta modu mana jetā||
prātakriyā kari ge guru pāhīṃ| mahāpramodu premu mana māhīṃ||
Meaning चारों कुमारोंको सुन्दर वधुओंसहित देखकर उनके मनमें जितना आनन्द है, वह किस प्रकार कहा जा सकता है ? वे प्रात:क्रिया करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये। उनके मनमें महान् आनन्द और प्रेम भरा है॥ २॥
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा॥
kari pranāma pūjā kara jorī| bole girā amiam̐ janu borī||
tumharī kṛpām̐ sunahu munirājā| bhayaum̐ āju maiṃ pūranakājā||
Meaning राजा प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृतमें डुबोयी हुई वाणी बोले-- हे मुनिराज! सुनिये, आपकी कृपासे आज मैं पूर्णकाम हो गया॥ ३॥
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई॥
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई॥
aba saba bipra bolāi gosāīṃ| dehu dhenu saba bhām̐ti banāī||
suni gura kari mahipāla baṛāī| puni paṭhae muni bṛṃda bolāī||
Meaning हे स्वामिन् ! अब सब ब्राह्मणोंको बुलाकर उनको सब तरह [ गहनों -कपड़ों। से सजी हुई गायें दीजिये। यह सुनकर गुरुजीने राजाकी बड़ाई करके फिर मुनिगणोंको बुलवा भेजा॥ ४॥
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥ ३३०१॥
bāmadeu aru devariṣi bālamīki jābāli|
āe munibara nikara taba kausikādi tapasāli|| 3301||
Meaning तब वामदेव, देवर्षि नारद, वाल्मीकि, जाबालि और विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह-के-समूह आये॥ ३३०॥
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥
चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई॥
daṃḍa pranāma sabahi nṛpa kīnhe| pūji saprema barāsana dīnhe||
cāri laccha bara dhenu magāī| kāmasurabhi sama sīla suhāī||
Meaning राजाने सबको दण्डवत् प्रणाम किया और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिये। चार लाख उत्तम गायें मँगवायीं, जो कामधेनुके समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं॥ १॥
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं॥
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू॥
saba bidhi sakala alaṃkṛta kīnhīṃ| mudita mahipa mahidevanha dīnhīṃ||
karata binaya bahu bidhi naranāhū| laheum̐ āju jaga jīvana lāhū||
Meaning उन सबको सब प्रकारसे [गहनों-कपड़ोंसे] सजाकर राजाने प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणोंको दिया। राजा बहुत तरहसे विनती कर रहे हैं कि जगत्में मैंने आज ही जीनेका लाभ पाया॥ २॥
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥
pāi asīsa mahīsu anaṃdā| lie boli puni jācaka bṛṃdā||
kanaka basana mani haya gaya syaṃdana| die būjhi ruci rabikulanaṃdana||
Meaning [ ब्राह्मणोंसे] आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकोंके समूहोंको बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ (जिसने जो चाहा सो) सूर्यकुलको आनन्दित करनेवाले दशरथजीने दिये॥ ३॥
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥
एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥
cale paṛhata gāvata guna gāthā| jaya jaya jaya dinakara kula nāthā||
ehi bidhi rāma biāha uchāhū| sakai na barani sahasa mukha jāhū||
Meaning वे सब गुणानुवाद गाते और ' सूर्यकुलके स्वामीकी जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते॥ ४॥
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥ ३३१॥
bāra bāra kausika carana sīsu nāi kaha rāu|
yaha sabu sukhu munirāja tava kṛpā kaṭāccha pasāu|| 331||
Meaning बार-बार विश्वामित्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर राजा कहते हैं--हे मुनिराज! यह सब सुख आपके ही कृपाकटाक्षका प्रसाद है॥ ३३१॥
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥
दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥
janaka sanehu sīlu karatūtī| nṛpu saba bhām̐ti sarāha bibhūtī||
dina uṭhi bidā avadhapati māgā| rākhahiṃ janaku sahita anurāgā||
Meaning राजा दशरथजी जनकजीके स्त्रेह, शील, करनी और एऐश्चर्यकी सब प्रकारसे सराहना करते हैं। प्रतिदिन [सबेरे] उठकर अयोध्यानरेश विदा माँगते हैं। पर जनकजी उन्हें प्रेमसे रख लेते हैं॥ १॥
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥
नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥
nita nūtana ādaru adhikāī| dina prati sahasa bhām̐ti pahunāī||
nita nava nagara anaṃda uchāhū| dasaratha gavanu sohāi na kāhū||
Meaning आदर नित्य नया बढ़ता जाता है। प्रतिदिन हजारों प्रकारसे मेहमानी होती है। नगरमें नित्य नया आनन्द और उत्साह रहता है, दशरथजीका जाना किसीको नहीं सुहाता॥ २॥
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥
कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥
bahuta divasa bīte ehi bhām̐tī| janu saneha raju bam̐dhe barātī||
kausika satānaṃda taba jāī| kahā bideha nṛpahi samujhāī||
Meaning इस प्रकार बहुत दिन बीत गये, मानो बराती स्तरेहकी रस्सीसे बँध गये हैं। तब विशधवामित्रजी और शतानन्दजीने जाकर राजा जनकको समझाकर कहा--॥ ३॥
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥
aba dasaratha kaham̐ āyasu dehū| jadyapi chāṛi na sakahu sanehū||
bhalehiṃ nātha kahi saciva bolāe| kahi jaya jīva sīsa tinha nāe||
Meaning यद्यपि आप सख्त्रेह [वश उन्हें] नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजीको आज्ञा दीजिये। 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर जनकजीने मन्त्रियोंको बुलवाया। वे आये और * जय जीव' कहकर उन्होंने मस्तक नवाया॥ ४॥
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥ ३३२॥
avadhanāthu cāhata calana bhītara karahu janāu|
bhae premabasa saciva suni bipra sabhāsada rāu|| 332||
Meaning [जनकजीने कहा--] अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर (रनिवासमें ) खबर कर दो। यह सुनकर मन्त्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा जनक भी प्रेमके वश हो गये॥ ३३२॥
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥
purabāsī suni calihi barātā| būjhata bikala paraspara bātā||
satya gavanu suni saba bilakhāne| manahum̐ sām̐jha sarasija sakucāne||
Meaning जनकपुरवासियोंने सुना कि बारात जायगी, तब वे व्याकुल होकर एक-दूसरेसे बात पूछने लगे। जाना सत्य है, यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गये मानो सन्ध्याके समय कमल सकुचा गये हों॥ १॥
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥
बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥
jaham̐ jaham̐ āvata base barātī| taham̐ taham̐ siddha calā bahu bhām̐tī||
bibidha bhām̐ti mevā pakavānā| bhojana sāju na jāi bakhānā||
Meaning आते समय जहाँ-जहाँ बराती ठहरे थे, वहाँ-वहाँ बहुत प्रकारका सीधा (रसोईका सामान) भेजा गया। अनेकों प्रकारके मेवे, पकवान और भोजनकी सामग्री जो बखानी नहीं जा सकती--॥ २॥
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा॥
तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥
bhari bhari basaham̐ apāra kahārā| paṭhaī janaka aneka susārā||
turaga lākha ratha sahasa pacīsā| sakala sam̐vāre nakha aru sīsā||
Meaning अनगिनत बेलों और कहारोंपर भर-भरकर (लाद-लादकर) भेजी गयी। साथ ही जनकजीने अनेकों सुन्दर शय्याएँ (प्लँग) भेजीं। एक लाख घोड़े और पचीस हजार रथ सब नखसे शिखातक (ऊपरसे नीचेतक) सजाये हुए,॥ ३॥
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥
कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥
matta sahasa dasa siṃdhura sāje| jinhahi dekhi disikuṃjara lāje||
kanaka basana mani bhari bhari jānā| mahiṣīṃ dhenu bastu bidhi nānā||
Meaning दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी, जिन्हें देखकर दिशाओंके हाथी भी लजा जाते हैं, गाड़ियोंमें भर- भरकर सोना, वस्त्र और रत्र (जवाहिरात) और भैंस, गाय तथा और भी नाना प्रकारकी चीजें दीं॥ ४॥
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥ ३३३॥
dāija amita na sakia kahi dīnha bideham̐ bahori|
jo avalokata lokapati loka saṃpadā thori|| 333||
Meaning [ इस प्रकार] जनकजीने फिरसे अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालोंके लोकोंकी सम्पदा भी थोड़ी जान पड़ती थी॥ ३३३॥
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥
चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥
sabu samāju ehi bhām̐ti banāī| janaka avadhapura dīnha paṭhāī||
calihi barāta sunata saba rānīṃ| bikala mīnagana janu laghu pānīṃ||
Meaning इस प्रकार सब सामान सजाकर राजा जनकने अयोध्यापुरीको भेज दिया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गयीं, मानो थोड़े जलमें मछलियाँ छटपटा रही हों॥ १॥
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं॥
होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥
puni puni sīya goda kari lehīṃ| dei asīsa sikhāvanu dehīṃ||
hoehu saṃtata piyahi piārī| ciru ahibāta asīsa hamārī||
Meaning वे बार-बार सीताजीको गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं--तुम सदा अपने पतिकी प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो; हमारी यही आशिष है॥ २॥
सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥
अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥
sāsu sasura gura sevā karehū| pati rukha lakhi āyasu anusarehū||
ati saneha basa sakhīṃ sayānī| nāri dharama sikhavahiṃ mṛdu bānī||
Meaning सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना। पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्रेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म सिखलाती हैं॥ ३॥
सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई॥
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥
sādara sakala kuam̐ri samujhāī| rāninha bāra bāra ura lāī||
bahuri bahuri bheṭahiṃ mahatārīṃ| kahahiṃ biraṃci racīṃ kata nārīṃ||
Meaning आदरके साथ सब पुत्रियोंको [स्त्रियोंके धर्म] समझाकर रानियोंने बार-बार उन्हें हृदयसे लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्माने स्त्रीजतिको क्यों रचा॥ ४॥
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥ ३३४॥
tehi avasara bhāinha sahita rāmu bhānu kula ketu|
cale janaka maṃdira mudita bidā karāvana hetu|| 334||
Meaning उसी समय सूर्यवंशके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंसहित प्रसन्न होकर विदा करानेके लिये जनकजीके महलको चले॥ ३३४॥
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥
cāria bhāi subhāyam̐ suhāe| nagara nāri nara dekhana dhāe||
kou kaha calana cahata hahiṃ ājū| kīnha bideha bidā kara sājū||
Meaning स्वभावसे ही सुन्दर चारों भाइयोंको देखनेके लिये नगरके स्त्री-पुरुष दौड़े। कोई कहता है-- आज ये जाना चाहते हैं। विदेहने विदाईका सब सामान तैयार कर लिया है॥ १॥
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥
को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥
lehu nayana bhari rūpa nihārī| priya pāhune bhūpa suta cārī||
ko jānai kehi sukṛta sayānī| nayana atithi kīnhe bidhi ānī||
Meaning राजाके चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानोंके [मनोहर] रूपको नेत्र भरकर देख लो। हे सयानी ! कौन जाने, किस पुण्यसे विधाताने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रोंका अतिथि किया है॥ २॥
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥
पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे॥
maranasīlu jimi pāva piūṣā| surataru lahai janama kara bhūkhā||
pāva nārakī haripadu jaiseṃ| inha kara darasanu hama kaham̐ taise||
Meaning मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्मका भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरकमें रहनेवाला (या नरकके योग्य) जीव जैसे भगवान्के परमपदको प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं॥ ३॥
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥
nirakhi rāma sobhā ura dharahū| nija mana phani mūrati mani karahū||
ehi bidhi sabahi nayana phalu detā| gae kuam̐ra saba rāja niketā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी शोभाको निरखकर हदयमें धर लो। अपने मनको साँप और इनकी मूर्तिको मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रोंका फल देते हुए सब राजकुमार राजमहलमें गये॥ ४॥
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।
rūpa siṃdhu saba baṃdhu lakhi haraṣi uṭhā ranivāsu|
Meaning रूपके समुद्र सब भाइयोंको देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। सासुएँ महान् प्रसन्न मनसे
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥
रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥
dekhi rāma chabi ati anurāgīṃ| premabibasa puni puni pada lāgīṃ||
rahī na lāja prīti ura chāī| sahaja sanehu barani kimi jāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर वे प्रेममें अत्यन्त मग्र हो गयीं और प्रेमके विशेष वश होकर बार-बार चरणों लगीं। हृदयमें प्रीति छा गयी, इससे लज्जा नहीं रह गयी। उनके स्वाभाविक स्रेहका वर्णन किस तरह किया जा सकता है॥ १॥
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥
बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥
bhāinha sahita ubaṭi anhavāe| charasa asana ati hetu jevām̐e||
bole rāmu suavasaru jānī| sīla saneha sakucamaya bānī||
Meaning उन्होंने भाइयोंसहित श्रीरामजीको उबटन करके स्वान कराया और बड़े प्रेमसे षट्रस भोजन कराया। सुअवसर जानकर श्रीरामचन्द्रजी शील, स्त्रेह और संकोचभरी वाणी बोले--॥ २॥
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥
मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥
rāu avadhapura cahata sidhāe| bidā hona hama ihām̐ paṭhāe||
mātu mudita mana āyasu dehū| bālaka jāni karaba nita nehū||
Meaning महाराज अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें विदा होनेके लिये यहाँ भेजा है। हे माता! प्रसन्न मनसे आज्ञा दीजिये और हमें अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखियेगा॥ ३॥
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥
sunata bacana bilakheu ranivāsū| boli na sakahiṃ premabasa sāsū||
hṛdayam̐ lagāi kuam̐ri saba līnhī| patinha sauṃpi binatī ati kīnhī||
Meaning इन वचनोंको सुनते ही रनिवास उदास हो गया। सासुएँ प्रेमवश बोल नहीं सकतीं। उन्होंने सब कुमारियोंको हृदयसे लगा लिया और उनके पतियोंको सौंपकर बहुत विनती की॥ ४॥
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।
बलि जाउं तात सुजान तुम्ह कहूँ बिदित गति सब की अहै॥
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिली।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिनी॥
kari binaya siya rāmahi samarapī jori kara puni puni kahai|
bali jāuṃ tāta sujāna tumha kahūm̐ bidita gati saba kī ahai||
parivāra purajana mohi rājahi prānapriya siya jānilī|
tulasīsa sīlu sanehu lakhi nija kiṃkarī kari māninī||
Meaning विनती करके उन्होंने सीताजीको श्रीरामचन्द्रजीको समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार- बार कहा--हे तात! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति (हाल) मालूम है। परिवारको, पुरवासियोंको, मुझको और राजाको सीता प्राणोंके समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसीके स्वामी ! इसके शील और स्त्रेहको देखकर इसे अपनी दासी करके मानियेगा।
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।
जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥ ३३६॥
tumha paripūrana kāma jāna siromani bhāvapriya|
jana guna gāhaka rāma doṣa dalana karunāyatana|| 336||
Meaning तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो (तुम्हें प्रेम प्यारा है)। हे राम! तुम भक्तोंके गुणोंको ग्रहण करनेवाले, दोषोंको नाश करनेवाले और दयाके धाम हो॥ ३३६॥
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥
सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥
asa kahi rahī carana gahi rānī| prema paṃka janu girā samānī||
suni sanehasānī bara bānī| bahubidhi rāma sāsu sanamānī||
Meaning ऐसा कहकर रानी चरणोंको पकड़कर[ चुप] रह गयीं। मानो उनकी वाणी प्रेमरूपी दलदलमें समा गयी हो। स्त्रेहसे सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने सासका बहुत प्रकारसे सम्मान किया॥ १॥
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥
rāma bidā māgata kara jorī| kīnha pranāmu bahori bahorī||
pāi asīsa bahuri siru nāī| bhāinha sahita cale raghurāī||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़कर विदा माँगते हुए बार-बार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयोंसहित श्रीरघुनाथजी चले॥ २॥
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी॥
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं॥
maṃju madhura mūrati ura ānī| bhaī saneha sithila saba rānī||
puni dhīraju dhari kuam̐ri ham̐kārī| bāra bāra bheṭahiṃ mahatārīṃ||
Meaning श्रीरीमजीकी सुन्दर मधुर मूर्तिको हृदयमें लाकर सब रानियाँ स्रेहसे शिथिल हो गयीं। फिर धीरज धारण करके कुमारियोंको बुलाकर माताएँ बारंबार उन्हें [ गले लगाकर] भेंटने लगीं॥ ३॥
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥
pahum̐cāvahiṃ phiri milahiṃ bahorī| baṛhī paraspara prīti na thorī||
puni puni milata sakhinha bilagāī| bāla baccha jimi dhenu lavāī||
Meaning पुत्रियोंको पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्परमें कुछ थोड़ी प्रीति नहीं बढ़ी ( अर्थात् बहुत प्रीति बढ़ी )। बार-बार मिलती हुई माताओंको सखियोंने अलग कर दिया। जैसे हालकी ब्यायी हुई गायको कोई उसके बालक बछड़े [या बछिया] से अलग कर दे॥ ४॥
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु॥ ३३७॥
premabibasa nara nāri saba sakhinha sahita ranivāsu|
mānahum̐ kīnha bidehapura karunām̐ biraham̐ nivāsu|| 337||
Meaning सब स्त्री-पुरुष और सखियोंसहित सारा रनिवास प्रेमके विशेष वश हो रहा है। [ऐसा लगता है] मानो जनकपुरमें करुणा और विरहने डेरा डाल दिया है॥ ३३७॥
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥
suka sārikā jānakī jyāe| kanaka piṃjaranhi rākhi paṛhāe||
byākula kahahiṃ kahām̐ baidehī| suni dhīraju pariharai na kehī||
Meaning जानकीने जिन तोता और मैनाको पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोनेके पिंजड़ोंमें रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं--वैदेही कहाँ हैं। उनके ऐसे वचनोंको सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा (अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा)॥ १॥
भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥
बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥
bhae bikala khaga mṛga ehi bhām̐ti| manuja dasā kaiseṃ kahi jātī||
baṃdhu sameta janaku taba āe| prema umagi locana jala chāe||
Meaning जब पक्षी और पशुतक इस तरह विकल हो गये, तब मनुष्योंकी दशा कैसे कही जा सकती है! तब भाईसहित जनकजी वहाँ आये। प्रेमसे उमड़कर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओोंका] जल भर आया॥ २॥
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥
लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥
sīya biloki dhīratā bhāgī| rahe kahāvata parama birāgī||
līnhi rām̐ya ura lāi jānakī| miṭī mahāmarajāda gyāna kī||
Meaning वे परम वैराग्यवान् कहलाते थे; पर सीताजीको देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजाने जानकीजीको हृदयसे लगा लिया। [ प्रेमके प्रभावसे। ज्ञानकी महान् मर्यादा मिट गयी (ज्ञानका बाँध टूट गया)॥ ३॥
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥
बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई॥
samujhāvata saba saciva sayāne| kīnha bicāru na avasara jāne||
bārahiṃ bāra sutā ura lāī| saji suṃdara pālakīṃ magāī||
Meaning सब बुद्धिमान् मन्त्री उन्हें समझाते हैं। तब राजाने विषाद करनेका समय न जानकर विचार किया। बारंबार पुत्रियोंको हृदयसे लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवायी॥ ४॥
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।
कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥ ३३८॥
premabibasa parivāru sabu jāni sulagana naresa|
kum̐ari caṛhāī pālakinha sumire siddhi ganesa|| 338||
Meaning सारा परिवार प्रेममें विवश है। राजाने सुन्दर मुहूर्त जानकर सिद्धिसहित गणेशजीका स्मरण करके कन्याओंको पालकियोंपर चढ़ाया॥ ३३८॥
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई॥
दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥
bahubidhi bhūpa sutā samujhāī| nāridharamu kularīti sikhāī||
dāsīṃ dāsa die bahutere| suci sevaka je priya siya kere||
Meaning राजाने पुत्रियोंको बहुत प्रकारसे समझाया और उन्हें स्त्रियोंका धर्म और कुलकी रीति सिखायी। बहुत-से दासी-दास दिये, जो सीताजीके प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे॥ १॥
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥
भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥
sīya calata byākula purabāsī| hohiṃ saguna subha maṃgala rāsī||
bhūsura saciva sameta samājā| saṃga cale pahum̐cāvana rājā||
Meaning सीताजीके चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गये। मज़लकी राशि शुभ शकुन हो रहे हैं। ब्राह्मण और मन्त्रियोंके समाजसहित राजा जनकजी उन्हें पहुँचानेके लिये साथ चले॥ २॥
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥
samaya biloki bājane bāje| ratha gaja bāji barātinha sāje||
dasaratha bipra boli saba līnhe| dāna māna paripūrana kīnhe||
Meaning समय देखकर बाजे बजने लगे। बरातियोंने रथ, हाथी और घोड़े सजाये। दशरथजीने सब ब्राह्मणोंको बुला लिया और उन्हें दान और सम्मानसे परिपूर्ण कर दिया॥ ३॥
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना॥
carana saroja dhūri dhari sīsā| mudita mahīpati pāi asīsā||
sumiri gajānanu kīnha payānā| maṃgalamūla saguna bhae nānā||
Meaning उनके. चरणकमलोंकी धूलि सिरपर धरकर और आशिष पाकर राजा आनन्दित हुए और गणेशजीका स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया। मज़लोंके मूल अनेकों शकुन हुए॥ ४॥
सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान।
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥ ३३९॥
sura prasūna baraṣahi haraṣi karahiṃ apacharā gāna|
cale avadhapati avadhapura mudita bajāi nisāna|| 339||
Meaning देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएँ गान कर रही हैं। अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर आनन्दपूर्वक अयोध्यापुरीको चले॥ ३३९॥
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥
nṛpa kari binaya mahājana phere| sādara sakala māgane ṭere||
bhūṣana basana bāji gaja dīnhe| prema poṣi ṭhāṛhe saba kīnhe||
Meaning राजा दशरथजीने विनती करके प्रतिष्टित जनोंको लौयया और आदरके साथ सब मंगनोंको बुलवाया। उनको गहने-कपड़े, घोड़े-हाथी दिये और प्रेमसे पुष्ठ करके सबको सम्पन्न अर्थात् बलयुक्त कर दिया॥ १॥
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं॥
bāra bāra biridāvali bhāṣī| phire sakala rāmahi ura rākhī||
bahuri bahuri kosalapati kahahīṃ| janaku premabasa phirai na cahahīṃ||
Meaning वे सब बारंबार विरुदावली (कुलकीर्ति) बखानकर और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर लौटे। कोसलाधीश दशरथजी बार-बार लौटनेको कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते॥ २॥
पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥
puni kaha bhūpati bacana suhāe| phiria mahīsa dūri baṛi āe||
rāu bahori utari bhae ṭhāṛhe| prema prabāha bilocana bāṛhe||
Meaning दशरथजीने फिर सुहावने वचन कहे--हे राजन् ! बहुत दूर आ गये, अब लौटिये। फिर राजा दशरथजी रथसे उतरकर खड़े हो गये। उनके नेत्रोंमें प्रेमका प्रवाह बढ़ आया (प्रेमाश्रुओंकी धारा बह चली)॥ ३॥
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥
करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥
taba bideha bole kara jorī| bacana saneha sudhām̐ janu borī||
karau kavana bidhi binaya banāī| mahārāja mohi dīnhi baṛāī||
Meaning तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्तरेहरूपी अमृतमें डुबोकर वचन बोले--मैं किस तरह बनाकर (किन शब्दोंमें) विनती करूँ। हे महाराज! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है॥ ४॥
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥ ३४०॥
kosalapati samadhī sajana sanamāne saba bhām̐ti|
milani parasapara binaya ati prīti na hṛdayam̐ samāti|| 340||
Meaning अयोध्यानाथ द्शरथजीने अपने स्वजन समधीका सब प्रकारसे सम्मान किया। उनके आपसके मिलनेमें अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदयमें समाती न थी॥ ३४०॥
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥
muni maṃḍalihi janaka siru nāvā| āsirabādu sabahi sana pāvā||
sādara puni bheṃṭe jāmātā| rūpa sīla guna nidhi saba bhrātā||
Meaning जनकजीने मुनिमण्डलीको सिर नवाया और सभीसे आशीर्वाद पाया। फिर आदरके साथ वे रूप, शील और गुणोंके निधान सब भाइयोंसे--अपने दामादोंसे मिले;॥ १॥
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥
राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥
jori paṃkaruha pāni suhāe| bole bacana prema janu jāe||
rāma karau kehi bhām̐ti prasaṃsā| muni mahesa mana mānasa haṃsā||
Meaning और सुन्दर कमलके समान हाथोंको जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेमसे ही जन्मे हों। हे रामजी! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ! आप मुनियों और महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस हैं॥ २॥
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥
karahiṃ joga jogī jehi lāgī| kohu mohu mamatā madu tyāgī||
byāpaku brahmu alakhu abināsī| cidānaṃdu niraguna gunarāsī||
Meaning योगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मदको त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणोंकी राशि हैं,॥ ३॥
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥
mana sameta jehi jāna na bānī| taraki na sakahiṃ sakala anumānī||
mahimā nigamu neti kahi kahaī| jo tihum̐ kāla ekarasa rahaī||
Meaning जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालोंमें एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं;॥ ४॥
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल॥ ३४१॥
nayana biṣaya mo kahum̐ bhayau so samasta sukha mūla|
sabai lābhu jaga jīva kaham̐ bhaem̐ īsu anukula|| 341||
Meaning वे ही समस्त सुखोंके मूल [ आप, मेरे नेत्रोंके विषय हुए। ईश्वरके अनुकूल होनेपर जगतमें जीवको सब लाभ-ही-लाभ है॥ ३४१॥
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥
sabahi bhām̐ti mohi dīnhi baṛāī| nija jana jāni līnha apanāī||
hohiṃ sahasa dasa sārada seṣā| karahiṃ kalapa koṭika bhari lekhā||
Meaning आपने मुझे सभी प्रकारसे बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। यदि दस हजार सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पोंतक गणना करते रहें॥१॥
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥
मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥
mora bhāgya rāura guna gāthā| kahi na sirāhiṃ sunahu raghunāthā||
mai kachu kahaum̐ eka bala moreṃ| tumha rījhahu saneha suṭhi thoreṃ||
Meaning तो भी हे रघुनाथजी ! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणोंकी कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती। मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह अपने इस एक ही बलपर कि आप अत्यन्त थोड़े प्रेमसे प्रसन्न हो जाते हैं॥ २॥
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥
bāra bāra māgaum̐ kara joreṃ| manu pariharai carana jani bhoreṃ||
suni bara bacana prema janu poṣe| pūranakāma rāmu paritoṣe||
Meaning मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणोंको न छोड़े। जनकजीके श्रेष्ठ वचनोंको सुनकर, जो मानो प्रेमसे पुष्ठ किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए॥ ३॥
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही॥
kari bara binaya sasura sanamāne| pitu kausika basiṣṭha sama jāne||
binatī bahuri bharata sana kīnhī| mili sapremu puni āsiṣa dīnhī||
Meaning उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्टजीके समान जानकर ससुर जनकजीका सम्मान किया। फिर जनकजीने भरतजीसे विनती की और प्रेमके साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया॥ ४॥
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस॥ ३४२॥
mile lakhana ripusūdanahi dīnhi asīsa mahīsa|
bhae paraspara premabasa phiri phiri nāvahiṃ sīsa|| 342||
Meaning फिर राजाने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजीसे मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया। वे परस्पर प्रेमके वश होकर बार-बार आपसभमें सिर नवाने लगे॥ ३४२॥
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥
जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥
bāra bāra kari binaya baṛāī| raghupati cale saṃga saba bhāī||
janaka gahe kausika pada jāī| carana renu sira nayananha lāī||
Meaning जनकजीकी बार-बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाइयोंके साथ चले। जनकजीने जाकर विध्वामित्रजीके चरण पकड़ लिये और उनके चरणोंकी रजको सिर और नेत्रोंमें लगाया॥ १॥
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥
sunu munīsa bara darasana toreṃ| agamu na kachu pratīti mana moreṃ||
jo sukhu sujasu lokapati cahahīṃ| karata manoratha sakucata ahahīṃ||
Meaning [उन्होंने कहा--] हे मुनीश्वर ! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शनसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मनमें ऐसा विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपाल चाहते हैं; परन्तु [ असम्भव समझकर] जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं,॥ २॥
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥
so sukhu sujasu sulabha mohi svāmī| saba sidhi tava darasana anugāmī||
kīnhi binaya puni puni siru nāī| phire mahīsu āsiṣā pāī||
Meaning हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियाँ आपके दर्शनोंकी अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलनेवाली हैं। इस प्रकार बार-बार विनती की और सिर नवाकर तथा उनसे आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे॥ ३॥
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥
calī barāta nisāna bajāī| mudita choṭa baṛa saba samudāī||
rāmahi nirakhi grāma nara nārī| pāi nayana phalu hohiṃ sukhārī||
Meaning डंका बजाकर बारात चली। छोटे-बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं। [ रास्तेके] गाँवोंके स्त्री-पुरुष श्रीरामचन्द्रजीको देखकर नेत्रोंका फल पाकर सुखी होते हैं॥ ४॥
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत॥ ३४३॥
bīca bīca bara bāsa kari maga loganha sukha deta|
avadha samīpa punīta dina pahum̐cī āi janeta|| 343||
Meaning बीच-बीचमें सुन्दर मुकाम करती हुई तथा मार्गके लोगोंको सुख देती हुई वह बारात पत्रित्र दिनमें अयोध्यापुरीके समीप आ पहुँची॥ ३४३॥
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥
झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥
hane nisāna panava bara bāje| bheri saṃkha dhuni haya gaya gāje||
jhām̐jhi birava ḍiṃḍamīṃ suhāī| sarasa rāga bājahiṃ sahanāī||
Meaning नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढोल बजने लगे। भेरी और शज्भुकी बड़ी आवाज हो रही है; हाथी-घोड़े गरज रहे हैं। विशेष शब्द करनेवाली झाँझें, सुहावनी डफलियाँ तथा रसीले रागसे शहनाइयाँ बज रही हैं॥ १॥
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥
pura jana āvata akani barātā| mudita sakala pulakāvali gātā||
nija nija suṃdara sadana sam̐vāre| hāṭa bāṭa cauhaṭa pura dvāre||
Meaning बारातको आती हुई सुनकर नगरनिवासी प्रसन्न हो गये। सबके शरीरोंपर पुलकावली छा गयी। सबने अपने-अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगरके द्वारोंको सजाया॥ २॥
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई॥
बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥
galīṃ sakala aragajām̐ siṃcāī| jaham̐ taham̐ caukeṃ cāru purāī||
banā bajāru na jāi bakhānā| torana ketu patāka bitānā||
Meaning सारी गलियाँ अरगजेसे सिंचायी गयीं, जहाँ-तहाँ सुन्दर चौक पुराये गये। तोरणों, ध्वजा- पताकाओं और मण्डपोंसे बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३॥
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥
लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥
saphala pūgaphala kadali rasālā| rope bakula kadaṃba tamālā||
lage subhaga taru parasata dharanī| manimaya ālabāla kala karanī||
Meaning फलसहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमालके वृक्ष लगाये गये। वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष [फलोंके भारसे] पृथ्वीको छू रहे हैं। उनके मणियोंके थाले बड़ी सुन्दर कारीगरीसे बनाये गये हैं॥ ४॥
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥ ३४४॥
bibidha bhām̐ti maṃgala kalasa gṛha gṛha race sam̐vāri|
sura brahmādi sihāhiṃ saba raghubara purī nihāri|| 344||
Meaning अनेक प्रकारके मज़ल-कलश घर-घर सजाकर बनाये गये हैं। श्रीरघुनाथजीकी पुरी ( अयोध्या)को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं॥ ३४४॥
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥
bhūpa bhavana tehi avasara sohā| racanā dekhi madana manu mohā||
maṃgala saguna manoharatāī| ridhi sidhi sukha saṃpadā suhāī||
Meaning उस समय राजमहल [ अत्यन्त] शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेवका भी मन मोहित हो जाता था। मज़ल शकुन, मनोहरता, ऋद्धि-सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति॥ १॥
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए॥
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥
janu uchāha saba sahaja suhāe| tanu dhari dhari dasaratha dasaratha gṛham̐ chāe||
dekhana hetu rāma baidehī| kahahu lālasā hohi na kehī||
Meaning और सब प्रकारके उत्साह (आनन्द) मानो सहज सुन्दर शरीर धर-धरकर दशरथजीके घरमें छा गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके दर्शनोंके लिये भला कहिये किसे लालसा न होगी 7॥ २॥
जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि।
निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि॥
jutha jūtha mili calīṃ suāsini| nija chabi nidarahiṃ madana bilāsani||
Meaning सुहागिनी स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छबिसे कामदेवकी स्त्री रतिका भी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों॥३॥
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं॥
bhūpati bhavana kolāhalu hoī| jāi na barani samau sukhu soī||
kausalyādi rāma mahatārīṃ| prema bibasa tana dasā bisārīṃ||
Meaning राजमहलमें [ आनन्दके मारे] शोर मच रहा है। उस समयका और सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजीकी सब माताएँ प्रेमके विशेष वश होनेसे शरीरकी सुध भूल गर्यी॥ ४॥
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥ ३४५॥
die dāna bipranha bipula pūji ganesa purārī|
pramudita parama daridra janu pāi padāratha cāri|| 345||
Meaning गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान दिया। वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो॥ ३४५॥
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥
moda pramoda bibasa saba mātā| calahiṃ na carana sithila bhae gātā||
rāma darasa hita ati anurāgīṃ| parichani sāju sajana saba lāgīṃ||
Meaning सुख और महान् आनन्दसे विवश होनेके कारण सब माताओंके शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनोंके लिये वे अत्यन्त अनुरागमें भरकर परछनका सब सामान सजाने लगीं॥ १॥
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥
bibidha bidhāna bājane bāje| maṃgala mudita sumitrām̐ sāje||
harada dūba dadhi pallava phūlā| pāna pūgaphala maṃgala mūlā||
Meaning अनेकों प्रकारके बाजे बजते थे। सुमित्राजीने आनन्दपूर्वक मज़ल साज सजाये। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मज़लकी मूल वस्तुएँ,॥ २॥
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥
acchata aṃkura locana lājā| maṃjula maṃjari tulasi birājā||
chuhe puraṭa ghaṭa sahaja suhāe| madana sakuna janu nīṛa banāe||
Meaning तथा अक्षत (चावल), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसीकी सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं। नाना रंगोंसे चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्णके कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेवके पक्षियोंने घोंसले बनाये हों॥ ३॥
सगुन सुंगध न जाहिं बखानी।
मंगल सकल सजहिं सब रानी॥
saguna suṃgadha na jāhiṃ bakhānī| maṃgala sakala sajahiṃ saba rānī||
Meaning शकुनकी सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जा सकतीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मज़ल साज सज रही
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥ ३४६॥
kanaka thāra bhari maṃgalanhi kamala karanhi liem̐ māta|
calīṃ mudita parichani karana pulaka pallavita gāta|| 346||
Meaning सोनेके थालोंको माज़लिक वस्तुओंसे भरकर अपने कमलके समान (कोमल) हाथोंमें लिये हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावलीसे छा गये हैं॥ ३४६॥