समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥
samau biloki basiṣṭha bolāe| sādara satānaṃdu suni āe||
begi kuam̐ri aba ānahu jāī| cale mudita muni āyasu pāī||
Meaning समय देखकर वसिष्टजीने शतानन्दजीको आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदरके साथ आये। वसिष्टजीने कहा--अब जाकर राजकुमारीको शीघ्र ले आइये। मुनिकी आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले॥ १॥
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं॥
rānī suni uparohita bānī| pramudita sakhinha sameta sayānī||
bipra badhū kulabṛddha bolāīṃ| kari kula rīti sumaṃgala gāīṃ||
Meaning बुद्धिमती रानी पुरोहितकी वाणी सुनकर सखियोंसमेत बड़ी प्रसन्न हुई। ब्राह्मणोंकी स्त्रियों और कुलकी बूढ़ी स्त्रियोंको बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुन्दर मज़लगीत गाये॥ २॥
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥
nāri beṣa je sura bara bāmā| sakala subhāyam̐ suṃdarī syāmā||
tinhahi dekhi sukhu pāvahiṃ nārīṃ| binu pahicāni prānahu te pyārīṃ||
Meaning श्रेष्ठ देवाज़नाएँ, जो सुन्दर मनुष्य-स्त्रियोंके वेषमें हैं, सभी स्वभावसे ही सुन्दरी और श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली) हैं। उनको देखकर रनिवासकी स्त्रयाँ सुख पाती हैं और बिना पहचानके ही वे सबको प्राणोंसे भी प्यारी हो रही हैं॥ ३॥
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥
सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥
bāra bāra sanamānahiṃ rānī| umā ramā sārada sama jānī||
sīya sam̐vāri samāju banāī| mudita maṃḍapahiṃ calīṃ lavāī||
Meaning उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। [ रनिवासकी स्त्रियाँ और सखियाँ] सीताजीका श्रंगार करके, मण्डली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मण्डपमें लिवा चलीं॥ ४॥
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।
नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
cali lyāi sītahi sakhīṃ sādara saji sumaṃgala bhāminīṃ|
navasapta sāje suṃdarīṃ saba matta kuṃjara gāminīṃ||
kala gāna suni muni dhyāna tyāgahiṃ kāma kokila lājahīṃ|
maṃjīra nūpura kalita kaṃkana tāla gati bara bājahīṃ||
Meaning सुन्दर मड़लका साज सजकर [रनिवासकी ] स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजीको लिवा चलीं। सभी सुन्दरियाँ सोलहों श्रृंगार किये हुए मतवाले हाथियोंकी चालसे चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गानको सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेवकी कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुन्दर कंकण तालकी गतिपर बड़े सुन्दर बज रहे हैं।
सोहति बनिता बूंद महूं सहज सुहावनि सीय।
छवि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ ३२२॥
sohati banitā būṃda mahūṃ sahaja suhāvani sīya|
chavi lalanā gana madhya janu suṣamā tiya kamanīya|| 322||
Meaning सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रयोंके समूहमें इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओंके समूहके बीच साक्षात् परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो॥ ३२२॥
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥
आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥
siya suṃdaratā barani na jāī| laghu mati bahuta manoharatāī||
āvata dīkhi barātinha sītā| rūpa rāsi saba bhām̐ti punītā||
Meaning सीताजीकी सुन्दरताका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है। रूपकी राशि और सब प्रकारसे पवित्र सीताजीको बरातियोंने आते देखा॥ १॥
सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥
sabahi manahiṃ mana kie pranāmā| dekhi rāma bhae pūranakāmā||
haraṣe dasaratha sutanha sametā| kahi na jāi ura ānam̐du jetā||
Meaning सभीने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर तो सभी पूर्णकाम ( कृतकृत्य) हो गये। राजा दशरथजी पुत्रोंसहित हर्षित हुए। उनके हृदयमें जितना आनन्द था, वह कहा नहीं जा सकता॥ २॥
सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥
गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥
sura pranāmu kari barasahiṃ phūlā| muni asīsa dhuni maṃgala mūlā||
gāna nisāna kolāhalu bhārī| prema pramoda magana nara nārī||
Meaning देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मज़लोंकी मूल मुनियोंके आशीर्वादोंकी ध्वनि हो रही है। गानों और नगाड़ोंके शब्दसे बड़ा शोर मच रहा है। सभी नर-नारी प्रेम और आनन्दमें मग्न हैं॥ ३॥
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू॥
ehi bidhi sīya maṃḍapahiṃ āī| pramudita sāṃti paṛhahiṃ munirāī||
tehi avasara kara bidhi byavahārū| duhum̐ kulagura saba kīnha acārū||
Meaning इस प्रकार सीताजी मण्डपमें आयीं। मुनिराज बहुत ही आनन्दित होकर शान्तिपाठ पढ़ रहे हैं। उस अवसरकी सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओंने किये॥ ४॥
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।
सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥
मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महूँ चहैं।
भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहें॥
ācāru kari gura gauri ganapati mudita bipra pujāvahīṃ|
sura pragaṭi pūjā lehiṃ dehiṃ asīsa ati sukhu pāvahīṃ||
madhuparka maṃgala drabya jo jehi samaya muni mana mahūm̐ cahaiṃ|
bhare kanaka kopara kalasa so taba liehiṃ paricāraka raheṃ||
Meaning कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणोंकी पूजा करा रहे हैं [ अथवा ब्राह्मणोंके द्वारा गौरी और गणेशकी पूजा करवा रहे हैं]। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं। मधुपर्क आदि जिस किसी भी माज़लिक पदार्थकी मुनि जिस समय भी मनमें चाहमात्र करते हैं, सेवकगण उसी समय सोनेकी परातोंमें और कलशोंमें भरकर उन पदार्थोंको लिये तैयार रहते हैं॥ १॥
कुल रीति प्रीति समेत रवि कहि देत सबु सादर कियो।
एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥
सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै।
मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करे॥
kula rīti prīti sameta ravi kahi deta sabu sādara kiyo|
ehi bhām̐ti deva pujāi sītahi subhaga siṃghāsanu diyo||
siya rāma avalokani parasapara premu kāhu na lakhi parai|
mana buddhi bara bānī agocara pragaṭa kabi kaiseṃ kare||
Meaning स्वयं सूर्यदेव प्रेमसहित अपने कुलकी सब रीतियाँ बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं। इस प्रकार देवताओंकी पूजा कराके मुनियोंने सीताजीको सुंदर सिंहासन दिया। श्रीसीताजी और श्रीरामजीका आपसभें एक-दूसरेको देखना तथा उनका परस्परका प्रेम किसीको लख नहीं पड़ रहा है। जो बात श्रेष्ठ मन, बुद्धि और वाणीसे भी परे है, उसे कवि क्योंकर प्रकट करे?॥ २॥
होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।
बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥ ३२३॥
homa samaya tanu dhari analu ati sukha āhuti lehiṃ|
bipra beṣa dhari beda saba kahi bibāha bidhi dehiṃ|| 323||
Meaning हवनके समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े ही सुखसे आहुति ग्रहण करते हैं और सारे वेद ब्राह्मणका वेष धरकर विवाहकी विधियाँ बताये देते हैं॥ ३२३॥
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥
सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥
janaka pāṭamahiṣī jaga jānī| sīya mātu kimi jāi bakhānī||
sujasu sukṛta sukha sudaṃratāī| saba sameṭi bidhi racī banāī||
Meaning जनकजीकी जगद्धविख्यात पटरानी और सीताजीकी माताका बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और सुन्दरता सबको बटोरकर विधाताने उन्हें सँवारकर तैयार किया है॥ १॥
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई॥
जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना॥
samau jāni munibaranha bolāī| sunata suāsini sādara lyāī||
janaka bāma disi soha sunayanā| himagiri saṃga bani janu mayanā||
Meaning समय जानकर श्रेष्ठ मुनियोंने उनको बुलवाया। यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आयीं। सुनयनाजी (जनकजीकी पटरानी) जनकजीकी बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचलके साथ मैनाजी शोभित हों॥ २॥
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे॥
निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥
kanaka kalasa mani kopara rūre| suci suṃgadha maṃgala jala pūre||
nija kara mudita rāyam̐ aru rānī| dhare rāma ke āgeṃ ānī||
Meaning पवित्र, सुगन्धित और मज़ल जलसे भरे सोनेके कलश और मणियोंकी सुन्दर परातें राजा और रानीने आनन्दित होकर अपने हाथोंसे लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रखीं॥ ३॥
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥
paṛhahiṃ beda muni maṃgala bānī| gagana sumana jhari avasaru jānī||
baru biloki daṃpati anurāge| pāya punīta pakhārana lāge||
Meaning मुनि मज़लवाणीसे वेद पढ़ रहे हैं। सुअवसर जानकर आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी है। दूलहको देखकर राजा-रानी प्रेममग्न हो गये और उनके पवित्र चरणोंको पखारने लगे॥ ४॥
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहूँ दिसि चली॥
जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।
जेसकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥
lāge pakhārana pāya paṃkaja prema tana pulakāvalī|
nabha nagara gāna nisāna jaya dhuni umagi janu cahūm̐ disi calī||
je pada saroja manoja ari ura sara sadaiva birājahīṃ|
jesakṛta sumirata bimalatā mana sakala kali mala bhājahīṃ||
Meaning वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको पखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है। आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली। जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं,॥ १॥
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमड।
मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥
करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेड़ अभिमत गति लहें।
ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहें॥
je parasi munibanitā lahī gati rahī jo pātakamaḍa|
makaraṃdu jinha ko saṃbhu sira sucitā avadhi sura baranaī||
kari madhupa mana muni jogijana je seṛa abhimata gati laheṃ|
te pada pakhārata bhāgyabhājanu janaku jaya jaya saba kaheṃ||
Meaning जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलोंका मकरन्दरस (गड़ाजी) शिवजीके मस्तकपर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रताकी सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मनको भौंरा बनाकर जिन चरणकमलोंका सेवन करके मनोवाज्छित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणोंको भाग्यके पात्र (बड़भागी) जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं॥ २॥
बर कुर्रि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनंद भरैं॥
सुखमूल दूलह देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥
bara kurri karatala jori sākhocāru dou kulagura karaiṃ|
bhayo pānigahanu biloki bidhi sura manuja muni ānaṃda bharaiṃ||
sukhamūla dūlaha dekhi daṃpati pulaka tana hulasyo hiyo|
kari loka beda bidhānu kanyādānu nṛpabhūṣana kiyo||
Meaning दोनों कुलोंके गुरु वर और कन्याकी हथेलियोंको मिलाकर शाखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्दमें भर गये। सुखके मूल दूलहको देखकर राजा-रानीका शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्दसे उमँग उठा। राजाओंके अलड्ारस्वरूप महाराज जनकजीने लोक और वेदकी रीतिको करके कन्यादान किया॥ ३॥
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥
क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावेंरीं।
करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावेँरीं॥
himavaṃta jimi girijā mahesahi harihi śrī sāgara daī|
timi janaka rāmahi siya samarapī bisva kala kīrati naī||
kyoṃ karai binaya bidehu kiyo bidehu mūrati sāveṃrīṃ|
kari homu bidhivata gām̐ṭhi jorī hona lāgīṃ bhāvem̐rīṃ||
Meaning जैसे हिमवानूने शिवजीको पार्वतीजी और सागरने भगवान् विष्णुको लक्ष्मीजी दी थीं, वैसे ही जनकजीने श्रीरामचन्द्रजीको सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्वमें सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी। विदेह (जनकजी) कैसे विनती करें ! उस साँवली मूर्तिने तो उन्हें सचमुच विदेह (देहकी सुध- बुधसे रहित) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं॥ ४॥
जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।
सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥ ३२४॥
jaya dhuni baṃdī beda dhuni maṃgala gāna nisāna|
suni haraṣahiṃ baraṣahiṃ bibudha surataru sumana sujāna|| 324||
Meaning जयध्वनि, वन्दीध्वनि, वेदध्वनि, मज़लगान और नगाड़ोंकी ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्षके फूलोंको बरसा रहे हैं॥ ३२४॥
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥
जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥
kuam̐ru kuam̐ri kala bhāvam̐ri dehīṃ| nayana lābhu saba sādara lehīṃ||
jāi na barani manohara jorī| jo upamā kachu kahauṃ so thorī||
Meaning वर और कन्या सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक [उन्हें देखकर] नेत्रोंका परम लाभ ले रहे हैं। मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूँ वही थोड़ी होगी॥ १॥
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥
rāma sīya suṃdara pratichāhīṃ| jagamagāta mani khaṃbhana māhīṃ||
manahum̐ madana rati dhari bahu rūpā| dekhata rāma biāhu anūpā||
Meaning श्रीरामजी और श्रीसीताजीकी सुन्दर परछाहीं मणियोंके खम्भोंमें जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत-से रूप धारण करके श्रीरामजीके अनुपम विवाहको देख रहे हैं॥ २॥
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥
भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥
darasa lālasā sakuca na thorī| pragaṭata durata bahori bahorī||
bhae magana saba dekhanihāre| janaka samāna apāna bisāre||
Meaning उन्हें (कामदेव और रतिको) दर्शनकी लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं (अर्थात् बहुत हैं); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजीकी भाँति सभी अपनी सुध भूल गये॥ ३॥
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥
राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥
pramudita muninha bhāvam̐rī pherī| negasahita saba rīti niberīṃ||
rāma sīya sira seṃdura dehīṃ| sobhā kahi na jāti bidhi kehīṃ||
Meaning मुनियोंने आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरायीं और नेगसहित सब रीतियोंको पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके सिरमें सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती॥ ४॥
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥
बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥
aruna parāga jalaju bhari nīkeṃ| sasihi bhūṣa ahi lobha amī keṃ||
bahuri basiṣṭha dīnha anusāsana| baru dulahini baiṭhe eka āsana||
Meaning मानो कमलको लाल परागसे अच्छी तरह भरकर अमृतके लोभसे साँप चन्द्रमाको भूषित कर रहा है। [यहाँ श्रीरामके हाथको कमलकी, सेंदुरको परागकी, श्रीरामकी श्याम भुजाको साँपकी और सीताजीके मुखको चन्द्रमाकी उपमा दी गयी है] फिर वसिष्ठजीने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसनपर बैठे॥ ५॥
तबैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए।
तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥
भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।
केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यह मंगलु महा॥
tabaiṭhe barāsana rāmu jānaki mudita mana dasarathu bhae|
tanu pulaka puni puni dekhi apaneṃ sukṛta surataru phala nae||
bhari bhuvana rahā uchāhu rāma bibāhu bhā sabahīṃ kahā|
kehi bhām̐ti barani sirāta rasanā eka yaha maṃgalu mahā||
Meaning श्रीरीमजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसनपर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मनमें बहुत आनन्दित हुए। अपने सुक़ृतरूपी कल्पवृक्षमें नये फल [आये] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनोंमें उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजीका विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मज़ल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!॥ १॥
तब जनक पाइ बसिष्ट आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुर्रि लईं हँकारि कै॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥
taba janaka pāi basiṣṭa āyasu byāha sāja saṃvāri kai|
māṃḍavī śrutakīrati uramilā kurri laīṃ ham̐kāri kai||
kusaketu kanyā prathama jo guna sīla sukha sobhāmaī|
saba rīti prīti sameta kari so byāhi nṛpa bharatahi daī||
Meaning तब वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर जनकजीने विवाहका सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी--इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशध्वजकी बड़ी कन्या माण्डवीजीको, जो गुण, शील, सुख और शोभाकी रूप ही थीं, राजा जनकने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजीको ब्याह दिया॥ २॥
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।
jānakī laghu bhaginī sakala suṃdari siromani jāni kai|
तनय दीन्ही ब्याहिलखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥
जेहि नामु श्रुतकोरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।
tanaya dīnhī byāhilakhanahi sakala bidhi sanamāni kai||
jehi nāmu śrutakorati sulocani sumukhi saba guna āgarī|
दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥
daī ripusūdanahi bhūpati rūpa sīla ujāgarī||
Meaning जानकीजीकी छोटी बहिन उर्मिलाजीको सब सुन्दरियोंमें शिरोमणि जानकर उस कन्याको सब प्रकारसे सम्मान करके, लक्ष्मणजीको ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुन्दर नेत्रोंबाली, सुन्दर मुखवाली, सब गुणोंकी खान और रूप तथा शीलमें उजागर हैं, उनको राजाने शत्रुघ्नको ब्याह दिया॥ ३॥
अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हे हियें हरषहीं।
सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥
सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥
anurūpa bara dulahini paraspara lakhi sakuca he hiyeṃ haraṣahīṃ|
saba mudita suṃdaratā sarāhahiṃ sumana sura gana baraṣahīṃ||
suṃdarī suṃdara baranha saha saba eka maṃḍapa rājahīṃ|
janu jīva ura cāriu avasthā bibhuna sahita birājahīṃ||
Meaning दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ीको देखकर सकुचते हुए हृदयमें हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरताकी सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्होंके साथ एक ही मण्डपमें ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीवके हृदयमें चारों अवस्थाएँ (जाग्रतू, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों॥ ४॥
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ ३२५॥
mudita avadhapati sakala suta badhunha sameta nihāri|
janu pāe mahipāla mani kriyanha sahita phala cāri|| 325||
Meaning सब पुत्रोंको बहुओंसहित देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं, मानो वे राजाओंके शिरोमणि क्रियाओं (यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया) सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) पा गये हों॥ ३२५॥
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥
jasi raghubīra byāha bidhi baranī| sakala kuam̐ra byāhe tehiṃ karanī||
kahi na jāi kachu dāija bhūrī| rahā kanaka mani maṃḍapu pūrī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके विवाहकी जैसी विधि वर्णन की गयी, उसी रीतिसे सब राजकुमार विवाहे गये। दहेजकी अधिकता कुछ कही नहीं जाती; सारा मंडप सोने और मणियोंसे भर गया॥ १॥
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥
गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥
kaṃbala basana bicitra paṭore| bhām̐ti bhām̐ti bahu mola na thore||
gaja ratha turaga dāsa aru dāsī| dhenu alaṃkṛta kāmaduhā sī||
Meaning बहुत-से कम्बल, वस्त्र और भाँति-भाँतिके विचित्र रेशमी कपड़े, जो थोड़ी कीमतके न थे ( अर्थात् बहुमूल्य थे) तथा हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और गहनोंसे सजी हुई कामधेनु- सरीखी गायें--॥ २॥
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥
bastu aneka karia kimi lekhā| kahi na jāi jānahiṃ jinha dekhā||
lokapāla avaloki sihāne| līnha avadhapati sabu sukhu māne||
Meaning [ आदि] अनेकों वस्तुएँ हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाय। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल भी सिहा गये। अवधराज दशरथजीने सुख मानकर प्रसन्नचित्तसे सब कुछ ग्रहण किया॥ ३॥
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥
dīnha jācakanhi jo jehi bhāvā| ubarā so janavāsehiṃ āvā||
taba kara jori janaku mṛdu bānī| bole saba barāta sanamānī||
Meaning उन्होंने वह दहेजका सामान याचकोंको, जो जिसे अच्छा लगा, दे दिया। जो बच रहा, वह जनवासेमें चला आया। तब जनकजी हाथ जोड़कर सारी बारातका सम्मान करते हुए कोमल वाणीसे बोले॥ ४॥
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाड़ कै।
प्रमुदित महा मुनि बूंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥
सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।
सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिए॥
sanamāni sakala barāta ādara dāna binaya baṛāṛa kai|
pramudita mahā muni būṃda baṃde pūji prema laṛāi kai||
siru nāi deva manāi saba sana kahata kara saṃpuṭa kiem̐|
sura sādhu cāhata bhāu siṃdhu ki toṣa jala aṃjali die||
Meaning आदर, दान, विनय और बड़ाईके द्वारा सारी बारातका सम्मान कर राजा जनकने महान् आनन्दके साथ प्रेमपूर्वक लड़ाकर (लाड़ करके) मुनियोंके समूहकी पूजा एवं वन्दना की। सिर नवाकर, देवताओंको मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं (वे प्रेमसे ही प्रसन्न हो जाते हैं, उन पूर्णकाम महानुभावोंको कोई कुछ देकर कैसे सन्तुष्ट कर सकता है); क्या एक अज्जलि जल देनेसे कहीं समुद्र सन्तुष्ट हो सकता है॥ १॥
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥
संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भएण।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥
kara jori janaku bahori baṃdhu sameta kosalarāya soṃ|
bole manohara bayana sāni saneha sīla subhāya soṃ||
saṃbaṃdha rājana rāvareṃ hama baṛe aba saba bidhi bhaeṇa|
ehi rāja sāja sameta sevaka jānibe binu gatha lae||
Meaning फिर जनकजी भाईसहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथजीसे स्नेह, शील और सुन्दर प्रेममें सानकर मनोहर वचन बोले--हे राजन् ! आपके साथ सम्बन्ध हो जानेसे अब हम सब प्रकारसे बड़े हो गये। इस राज-पाट्सहित हम दोनोंको आप बिना दामके लिये हुए सेवक ही समझियेगा॥ २॥
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हों ढीट्यो कई॥
पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।
कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥
e dārikā paricārikā kari pālibīṃ karunā naī|
aparādhu chamibo boli paṭhae bahuta hoṃ ḍhīṭyo kaī||
puni bhānukulabhūṣana sakala sanamāna nidhi samadhī kie|
kahi jāti nahiṃ binatī paraspara prema paripūrana hie||
Meaning इन लड़कियोंको टहलनी मानकर, नयी-नयी दया करके पालन कीजियेगा। मैंने बड़ी ढिठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजियेगा। फिर सूर्यकुलके भूषण दशरथजीने समधी जनकजीको सम्पूर्ण सम्मानका निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि वे सम्मानके भण्डार ही हो गये)। उनकी परस्परकी विनय कही नहीं जाती, दोनोंके हृदय प्रेमसे परिपूर्ण हैं॥ ३॥
बूंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।
दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥
तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।
दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल््याइ के॥
būṃdārakā gana sumana barisahiṃ rāu janavāsehi cale|
duṃdubhī jaya dhuni beda dhuni nabha nagara kautūhala bhale||
taba sakhīṃ maṃgala gāna karata munīsa āyasu pāi kai|
dūlaha dulahininha sahita suṃdari calīṃ kohabara lyāi ke||
Meaning देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासेको चले। नगाड़ेकी ध्वनि, जयध्वनि और वेदकी ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनोंमें खूब कौतूहल हो रहा है (आनन्द छा रहा है), तब मुनीश्वरकी आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियाँ मज़लगान करती हुई दुलहिनोंसहित दूल्होंको लिवाकर कोहबरको चलीं॥ ४॥
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ ३२६॥
puni puni rāmahi citava siya sakucati manu sakucai na|
harata manohara mīna chabi prema piāse naina|| 326||
Meaning सीताजी बार-बार रामजीको देखती हैं और सकुचा जाती हैं; पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेमके प्यासे उनके नेत्र सुन्दर मछलियोंकी छबिको हर रहे हैं॥ ३२६॥
स्याम सरीरु सुभायें सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥
जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥
syāma sarīru subhāyeṃ suhāvana| sobhā koṭi manoja lajāvana||
jāvaka juta pada kamala suhāe| muni mana madhupa rahata jinha chāe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका साँवला शरीर स्वभावसे ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाली है। महावरसे युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिनपर मुनियोंके मनरूपी भौरे सदा छाये रहते हैं॥ १॥
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥
pīta punīta manohara dhotī| harati bāla rabi dāmini jotī||
kala kiṃkini kaṭi sūtra manohara| bāhu bisāla bibhūṣana suṃdara||
Meaning पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रात:कालके सूर्य और बिजलीकी ज्योतिको हरे लेती है। कमरमें सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओंमें सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं॥ २॥
पीत जनेउ महाछबि देई।
कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥
pīta janeu mahāchabi deī| kara mudrikā cori citu leī||
सोहत ब्याह साज सब साजे।
उर आयत उरभूषन राजे॥
sohata byāha sāja saba sāje| ura āyata urabhūṣana rāje||
Meaning पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथकी अँगूठी चित्तको चुरा लेती है। ब्याहके सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छातीपर हृदयपर पहननेके सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं॥ ३॥
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥
नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥
piara uparanā kākhāsotī| duhum̐ ām̐caranhi lage mani motī||
nayana kamala kala kuṃḍala kānā| badanu sakala sauṃdarja nidhānā||
Meaning पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊकी तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरोंपर मणि और मोती लगे हैं। कमलके समान सुन्दर नेत्र हैं, कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरताका खजाना ही है॥ ४॥
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा।
भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥
suṃdara bhṛkuṭi manohara nāsā| bhāla tilaku ruciratā nivāsā||
सोहत मौरु मनोहर माथे।
मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥
sohata mauru manohara māthe| maṃgalamaya mukutā mani gāthe||
Meaning सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाटपर तिलक तो सुन्दरताका घर ही है। जिसमें मज़लमय मोती और मणि गुँधे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माधेपर सोह रहा है॥५॥
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं।
पुर नारि सुर सुंदरी बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥
मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं।
सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥
gāthe mahāmani maura maṃjula aṃga saba cita corahīṃ|
pura nāri sura suṃdarī barahi biloki saba tina torahīṃ||
mani basana bhūṣana vāri ārati karahiṃ maṃgala gāvahīṃ|
sura sumana barisahiṃ sūta māgadha baṃdi sujasu sunāvahīṃ||
Meaning सुन्दर मौरमें बहुमूल्य मणियाँ गुँधी हुई हैं, सभी अज्ज चित्तको चुराये लेते हैं। सब नगरकी स्त्रियाँ और देवसुन्दरियाँ दूलहको देखकर तिनका तोड़ रही हैं (उनकी बलैयाँ ले रही हैं) और फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं॥ १॥
कोहबरहिं आने कु्अर कु्रि सुआसिनिन्ह सुख पाइ के।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ के॥
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहें।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहें॥
kohabarahiṃ āne kuara kuri suāsininha sukha pāi ke|
ati prīti laukika rīti lāgīṃ karana maṃgala gāi ke||
lahakauri gauri sikhāva rāmahi sīya sana sārada kaheṃ|
ranivāsu hāsa bilāsa rasa basa janma ko phalu saba laheṃ||
Meaning सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियोंको कोहबर (कुलदेवताके स्थान) में लायीं और अत्यन्त प्रेमसे मज़लगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। पार्वतीजी श्रीरामचन्द्रजीको लहकौर (वर-वधूका परस्पर ग्रास देना) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजीको सिखाती हैं। रनिवास हास-विलासके आनन्दमें मग्न है, [ श्रीरीमजी और सीताजीको देख-देखकर] सभी जन्मका परम फल प्राप्त कर रही हैं॥ २॥
निज पानि मनि महूँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।
चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥
कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेम न जाइ कहि जानहिं अलीं।
बर कुर्रि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥
nija pāni mani mahūm̐ dekhiati mūrati surūpanidhāna kī|
cālati na bhujaballī bilokani biraha bhaya basa jānakī||
kautuka binoda pramodu prema na jāi kahi jānahiṃ alīṃ|
bara kurri suṃdara sakala sakhīṃ lavāi janavāsehi calīṃ||
Meaning अपने हाथकी मणियोंमें सुन्दर रूपके भण्डार श्रीरामचन्द्रजीकी परछाहीं दीख रही है। यह देखकर जानकीजी दर्शनमें वियोग होनेके भयसे बाहुरूपी लताको और दृष्टिको हिलाती-डुलाती नहीं हैं। उस समयके हँसी-खेल और विनोदका आनन्द और प्रेम कहा नहीं जा सकता, उसे सखियाँ ही जानती हैं। तदनन्तर वर-कन्याओंको सब सुन्दर सखियाँ जनवासेको लिवा चलीं॥ ३॥
तेहि समय सुनिअ असीस जहें तहं नगर नभ आनंदु महा।
चिरु जिअहुँं जोरीं चारु चारथो मुदित मन सबहीं कहा॥
जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी।
चले हरघषि बरघि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥
tehi samaya sunia asīsa jaheṃ tahaṃ nagara nabha ānaṃdu mahā|
ciru jiahum̐ṃ jorīṃ cāru cāratho mudita mana sabahīṃ kahā||
jogīṃdra siddha munīsa deva biloki prabhu duṃdubhi hanī|
cale haraghaṣi baraghi prasūna nija nija loka jaya jaya jaya bhanī||
Meaning उस समय नगर और आकाशगें जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वादकी ध्वनि सुनायी दे रही है और महान् आनन्द छाया है। सभीने प्रसन्न मनसे कहा कि सुन्दर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगिराज, सिद्ध, मुनीश्वर और देवताओंने ' प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलोंकी वर्षा करते हुए तथा जय हो, जय हो,जय हो' कहते हुए वे अपने-अपने लोकको चले॥ ४॥