बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥
banai na baranata banī barātā| hohiṃ saguna suṃdara subhadātā||
cārā cāṣu bāma disi leī| manahum̐ sakala maṃgala kahi deī||
Meaning बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। सुन्दर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बायीं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मज़लोंकी सूचना दे रहा हो॥ १॥
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी॥
dāhina kāga sukheta suhāvā| nakula darasu saba kāhūm̐ pāvā||
sānukūla baha tribidha bayārī| saghaṭa savāla āva bara nārī||
Meaning दाहिनी ओर कौओआ सुन्दर खेतमें शोभा पा रहा है। नेवलेका दर्शन भी सब किसीने पाया। तीनों प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्धित) हवा अनुकूल दिशामें चल रही है। श्रेष्ठ (सुहागिनी ) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोदमें बालक लिये आ रही हैं॥ २॥
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥
lovā phiri phiri darasu dekhāvā| surabhī sanamukha sisuhi piāvā||
mṛgamālā phiri dāhini āī| maṃgala gana janu dīnhi dekhāī||
Meaning लोमड़ी फिर-फिरकर (बार-बार) दिखायी दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ोंको दूध पिलाती हैं। हरिनोंकी टोली [बायीं ओरसे] घूमकर दाहिनी ओरको आयी, मानो सभी मज़लोंका समूह दिखायी दिया॥ ३॥
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥
chemakarī kaha chema biseṣī| syāmā bāma sutaru para dekhī||
sanamukha āyau dadhi aru mīnā| kara pustaka dui bipra prabīnā||
Meaning क्षेमकरी (सफेद सिरवाली चील) विशेष रूपसे क्षेम (कल्याण) कह रही है। श्यामा बायीं ओर सुन्दर पेड़पर दिखायी पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान् ब्राह्मण हाथमें पुस्तक लिये हुए सामने आये॥ ४॥
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥ ३०३॥
maṃgalamaya kalyānamaya abhimata phala dātāra|
janu saba sāce hona hita bhae saguna eka bāra|| 303||
Meaning सभी मज़लमय, कल्याणमय और मनोवाज्छित फल देनेवाले शकुन मानो सच्चे होनेके लिये एक ही साथ हो गये॥ ३०३॥
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥
maṃgala saguna sugama saba tākeṃ| saguna brahma suṃdara suta jākeṃ||
rāma sarisa baru dulahini sītā| samadhī dasarathu janaku punītā||
Meaning स्वयं सगुण ब्रह्म जिसके सुन्दर पुत्र हैं, उसके लिये सब मज़ल शकुन सुलभ हैं। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे दूल्हा और सीताजी-जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी-जैसे पवित्र समधी हैं,॥ १॥
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥
suni asa byāhu saguna saba nāce| aba kīnhe biraṃci hama sām̐ce||
ehi bidhi kīnha barāta payānā| haya gaya gājahiṃ hane nisānā||
Meaning ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे [और कहने लगे--] अब ब्रह्माजीने हमको सच्चा कर दिया। इस तरह बारातने प्रस्थान किया। घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और नगाड़ोंपर चोट लग रही है॥ २॥
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥
āvata jāni bhānukula ketū| saritanhi janaka bam̐dhāe setū||
bīca bīca bara bāsa banāe| surapura sarisa saṃpadā chāe||
Meaning सूर्यवंशके पताकास्वरूप दशरथजीको आते हुए जानकर जनकजीने नदियों पर पुल बँधवा दिये। बीच- बीचमें ठहरनेके लिये सुन्दर घर (पड़ाव) बनवा दिये, जिनमें देवलोकके समान सम्पदा छायी है,॥ ३॥
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥
asana sayana bara basana suhāe| pāvahiṃ saba nija nija mana bhāe||
nita nūtana sukha lakhi anukūle| sakala barātinha maṃdira bhūle||
Meaning और जहाँ बारातके सब लोग अपने-अपने मनकी पसंदके अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। मनके अनुकूल नित्य नये सुखोंको देखकर सभी बरातियोंको अपने घर भूल गये॥ ४॥
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥ ३०४॥
āvata jāni barāta bara suni gahagahe nisāna|
saji gaja ratha padacara turaga lena cale agavāna|| 304||
Meaning बड़े जोरसे बजते हुए नगाड़ोंकी आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारातको आती हुई जानकर अगवानी करनेवाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले॥ ३०४॥
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥
भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥
kanaka kalasa bhari kopara thārā| bhājana lalita aneka prakārā||
bhare sudhāsama saba pakavāne| nānā bhām̐ti na jāhiṃ bakhāne||
Meaning [ दूध, शर्बत, ठंढाई, जल आदिसे] भरकर सोनेके कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृतके समान भाँति-भाँतिके सब पकवानों से भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर बर्तन,॥ १॥
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥
phala aneka bara bastu suhāīṃ| haraṣi bheṃṭa hita bhūpa paṭhāīṃ||
bhūṣana basana mahāmani nānā| khaga mṛga haya gaya bahubidhi jānā||
Meaning उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजाने हर्षित होकर भेंटके लिये भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकारकी मूल्यवान् मणियाँ (रत्न), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरहकी सवारियाँ,॥ २॥
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥
maṃgala saguna sugaṃdha suhāe| bahuta bhām̐ti mahipāla paṭhāe||
dadhi ciurā upahāra apārā| bhari bhari kām̐vari cale kahārā||
Meaning तथा बहुत प्रकारके सुगन्धित एवं सुहावने मज़ल-द्रव्य और सगुनके पदार्थ राजाने भेजे। दही, चिउड़ा और अगणित उपहारकी चीजें काँवरोंमें भर-भरकर कहार चले॥ ३॥
अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥
agavānanha jaba dīkhi barātā| ura ānaṃdu pulaka bhara gātā||
dekhi banāva sahita agavānā| mudita barātinha hane nisānā||
Meaning अगवानी करनेवालोंको जब बारात दिखायी दी, तब उनके हृदयमें आनन्द छा गया और शरीर रोमाज्जसे भर गया। अगवानोंको सज-धजके साथ देखकर बरातियोंने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये॥ ४॥
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥ ३०५॥
haraṣi parasapara milana hita kachuka cale bagamela|
janu ānaṃda samudra dui milata bihāi subela|| 305||
Meaning [बराती तथा अगवानोंमेंसे] कुछ लोग परस्पर मिलनेके लिये हर्षके मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्दके दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों॥ ३०५॥
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥
बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें॥
baraṣi sumana sura suṃdari gāvahiṃ| mudita deva duṃdubhīṃ bajāvahiṃ||
bastu sakala rākhīṃ nṛpa āgeṃ| binaya kīnha tinha ati anurāgeṃ||
Meaning देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। [ अगवानीमें आये हुए] उन लोगोंने सब चीजें दशरथजीके आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेमसे विनती को॥ १॥
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥
करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥
prema sameta rāyam̐ sabu līnhā| bhai bakasīsa jācakanhi dīnhā||
kari pūjā mānyatā baṛāī| janavāse kahum̐ cale lavāī||
Meaning राजा दशरथजीने प्रेमसहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकोंको दे दी गयीं। तदनन्तर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासेकी ओर लिवा ले चले॥ २॥
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं॥
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥
basana bicitra pām̐vaṛe parahīṃ| dekhi dhanahu dhana madu pariharahīṃ||
ati suṃdara dīnheu janavāsā| jaham̐ saba kahum̐ saba bhām̐ti supāsā||
Meaning विलक्षण वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धनका अभिमान छोड़ देते हैं। बड़ा सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकारका सुभीता था॥ ३॥
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई॥
jānī siyam̐ barāta pura āī| kachu nija mahimā pragaṭi janāī||
hṛdayam̐ sumiri saba siddhi bolāī| bhūpa pahunaī karana paṭhāī||
Meaning सीताजीने बारात जनकपुरमें आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी। हृदयमें स्मरणकर सब सिद्धियोंको बुलाया और उन्हें राजा दशरथजीकी मेहमानी करनेके लिये भेजा॥ ४॥
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥ ३०६॥
sidhi saba siya āyasu akani gaīṃ jahām̐ janavāsa|
liem̐ saṃpadā sakala sukha surapura bhoga bilāsa|| 306||
Meaning सीताजीकी आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरीके भोग-विलासको लिये हुए गयीं॥ ३०६॥
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥
nija nija bāsa biloki barātī| sura sukha sakala sulabha saba bhām̐tī||
bibhava bheda kachu kou na jānā| sakala janaka kara karahiṃ bakhānā||
Meaning बरातियोंने अपने-अपने ठहरनेके स्थान देखे तो वहाँ देवताओंके सब सुखोंको सब प्रकारसे सुलभ पाया। इस ऐश्वर्यका कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनकजीकी बड़ाई कर रहे हैं॥ १॥
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥
siya mahimā raghunāyaka jānī| haraṣe hṛdayam̐ hetu pahicānī||
pitu āgamanu sunata dou bhāī| hṛdayam̐ na ati ānaṃdu amāī||
Meaning श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजीकी महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदयमें हर्षित हुए। पिता दशरथजीके आनेका समाचार सुनकर दोनों भाइयोंके हृदयमें महान् आनन्द समाता न था॥२॥
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥
sakucanha kahi na sakata guru pāhīṃ| pitu darasana lālacu mana māhīṃ||
bisvāmitra binaya baṛi dekhī| upajā ura saṃtoṣu biseṣī||
Meaning संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजीसे कह नहीं सकते थे; परन्तु मनमें पिताजीके दर्शनोंकी लालसा थी। विश्वामित्रजीने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हदयमें बहुत सन्तोष उत्पन्न हुआ॥ ३॥
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥
haraṣi baṃdhu dou hṛdayam̐ lagāe| pulaka aṃga aṃbaka jala chāe||
cale jahām̐ dasarathu janavāse| manahum̐ sarobara takeu piāse||
Meaning प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयोंको हृदयसे लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भर आया। वे उस जनवासेको चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासेकी ओर लक्ष्य करके चला हो॥ ४॥
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥ ३०७॥
bhūpa biloke jabahiṃ muni āvata sutanha sameta|
uṭhe haraṣi sukhasiṃdhu mahum̐ cale thāha sī leta|| 307||
Meaning जब राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित मुनिको आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुखके समुद्रमें थाह-सी लेते हुए चले॥ ३०७॥
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥
कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥
munihi daṃḍavata kīnha mahīsā| bāra bāra pada raja dhari sīsā||
kausika rāu liye ura lāī| kahi asīsa pūchī kusalāī||
Meaning पृथ्वीपति दशरथजीने मुनिकी चरणधूलिको बारंबार सिरपर चढ़ाकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया। विश्वामित्रजीने राजाको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी॥ १॥
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥
puni daṃḍavata karata dou bhāī| dekhi nṛpati ura sukhu na samāī||
suta hiyam̐ lāi dusaha dukha meṭe| mṛtaka sarīra prāna janu bheṃṭe||
Meaning फिर दोनों भाइयोंको दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजाके हृदयमें सुख समाया नहीं। पुत्रोिंको [उठाकर] हृदयसे लगाकर उन्होंने अपने [वियोगजनित] दु:सह दुःखको मिटाया। मानो मृतक शरीरको प्राण मिल गये हों॥ २॥
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥
बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं॥
puni basiṣṭha pada sira tinha nāe| prema mudita munibara ura lāe||
bipra bṛṃda baṃde duhum̐ bhāīṃ| mana bhāvatī asīseṃ pāīṃ||
Meaning फिर उन्होंने वसिष्टडजीके चरणोंमें सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठने प्रेमके आनन्दमें उन्हें हदयसे लगा लिया। दोनों भाइयोंने सब ब्राह्मणोंकी वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये॥ ३॥
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥
bharata sahānuja kīnha pranāmā| lie uṭhāi lāi ura rāmā||
haraṣe lakhana dekhi dou bhrātā| mile prema paripūrita gātā||
Meaning भरतजीने छोटे भाई शत्रुघ्नसहित श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। श्रीरामजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए और प्रेमसे परिपूर्ण हुए शरीरसे उनसे मिले॥ ४॥
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥ ३०८॥
purajana parijana jātijana jācaka maṃtrī mīta|
mile jathābidhi sabahi prabhu parama kṛpāla binīta|| 308||
Meaning तदनन्तर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जातिके लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों-सभीसे यथायोग्य मिले॥ ३०८॥
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥
नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥
rāmahi dekhi barāta juṛānī| prīti ki rīti na jāti bakhānī||
nṛpa samīpa sohahiṃ suta cārī| janu dhana dharamādika tanudhārī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीको देखकर बारात शीतल हुई (रामके वियोगमें सबके हृदयमें जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी)। प्रीतिकी रीतिका बखान नहीं हो सकता। राजाके पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों॥ १॥
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥
sutanha sameta dasarathahi dekhī| mudita nagara nara nāri biseṣī||
sumana barisi sura hanahiṃ nisānā| nākanaṭīṃ nācahiṃ kari gānā||
Meaning पुत्रोंसहित दशरथजीको देखकर नगरके स्त्री-पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं। [ आकाशमगें ] देवता फूलोंकी वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएँ गा-गाकर नाच रही हैं॥ २॥
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥
सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥
satānaṃda aru bipra saciva gana| māgadha sūta biduṣa baṃdījana||
sahita barāta rāu sanamānā| āyasu māgi phire agavānā||
Meaning अगवानीमें आये हुए शतानन्दजी, अन्य ब्राह्मण, मन्त्रीगण, मागध, सूत, विद्वान् और भाटोंने बारातसहित राजा दशरथजीका आदर-सत्कार किया। फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे॥ ३॥
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥
prathama barāta lagana teṃ āī| tāteṃ pura pramodu adhikāī||
brahmānaṃdu loga saba lahahīṃ| baṛhahum̐ divasa nisi bidhi sana kahahīṃ||
Meaning बारात लग्नके दिनसे पहले आ गयी है, इससे जनकपुरमें अधिक आनन्द छा रहा है। सब लोग ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहे हैं और विधातासे मनाकर कहते हैं कि दिन-रात बढ़ जायेँ (बड़े हो जायेँ)॥ ४॥
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥ ३०९॥
rāmu sīya sobhā avadhi sukṛta avadhi dou rāja|
jaham̐ jaham̐ purajana kahahiṃ asa mili nara nāri samāja|| 309||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी सुन्दरताकी सीमा हैं और दोनों राजा पुण्यकी सीमा हैं, जहाँ-तहाँ जनकपुरवासी स्त्री-पुरुषोंके समूह इकट्ठे हो-होकर यही कह रहे हैं॥ ३०९॥
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥
इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे॥
janaka sukṛta mūrati baidehī| dasaratha sukṛta rāmu dhareṃ dehī||
inha sama kām̐hu na siva avarādhe| kāhiṃ na inha samāna phala lādhe||
Meaning जनकजीके सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजीके सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं। इन [दोनों राजाओं] के समान किसीने शिवजीकी आराधना नहीं की; और न इनके समान किसीने फल ही पाये॥ १॥
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥
inha sama kou na bhayau jaga māhīṃ| hai nahiṃ katahūm̐ honeu nāhīṃ||
hama saba sakala sukṛta kai rāsī| bhae jaga janami janakapura bāsī||
Meaning इनके समान जगत्में न कोई हुआ, न कहीं है, न होनेका ही है। हम सब भी सम्पूर्ण पुण्योंकी राशि हैं, जो जगत्में जन्म लेकर जनकपुरके निवासी हुए,॥ २॥
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥
jinha jānakī rāma chabi dekhī| ko sukṛtī hama sarisa biseṣī||
puni dekhaba raghubīra biāhū| leba bhalī bidhi locana lāhū||
Meaning और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखी है। हमारे-सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम श्रीरघुनाथजीका विवाह देखेंगे और भलीभाँति नेत्रोंका लाभ लेंगे॥ ३॥
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥
बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥
kahahiṃ parasapara kokilabayanīṃ| ehi biāham̐ baṛa lābhu sunayanīṃ||
baṛeṃ bhāga bidhi bāta banāī| nayana atithi hoihahiṃ dou bhāī||
Meaning कोयलके समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं कि हे सुन्दर नेत्रोंबाली ! इस विवाहमें बड़ा लाभ है। बड़े भाग्यसे विधाताने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रोंके अतिथि हुआ करेंगे॥ ४॥
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥ ३१०॥
bārahiṃ bāra saneha basa janaka bolāuba sīya|
lena āihahiṃ baṃdhu dou koṭi kāma kamanīya|| 310||
Meaning जनकजी स्तरेहवश बार-बार सीताजीको बुलावेंगे, और करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर दोनों भाई सीताजीको लेने (विदा कराने) आया करेंगे॥ ३१०॥
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥
bibidha bhām̐ti hoihi pahunāī| priya na kāhi asa sāsura māī||
taba taba rāma lakhanahi nihārī| hoihahiṃ saba pura loga sukhārī||
Meaning तब उनकी अनेकों प्रकारसे पहुनाई होगी। सखी ! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब- तब हम सब नगरनिवासी श्रीराम-लक्ष्मणको देख-देखकर सुखी होंगे॥ १॥
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥
sakhi jasa rāma lakhanakara joṭā| taisei bhūpa saṃga dui ḍhoṭā||
syāma gaura saba aṃga suhāe| te saba kahahiṃ dekhi je āe||
Meaning हे सखी ! जैसा श्रीराम-लक्ष्मणका जोड़ा है, वैसे ही दो कुमार राजाके साथ और भी हैं। वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्णके हैं। उनके भी सब आड्भ बहुत सुन्दर हैं। जो लोग उन्हें देख आये हैं, वे सब यही कहते हैं॥ २॥
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥
kahā eka maiṃ āju nihāre| janu biraṃci nija hātha sam̐vāre||
bharatu rāmahī kī anuhārī| sahasā lakhi na sakahiṃ nara nārī||
Meaning एकने कहा-मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं, मानो ब्रह्माजीने उन्हें अपने हाथों सँवारा है। भरत तो श्रीरामचन्द्रजीकी ही शकल-सूरतके हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते॥ ३॥
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥
lakhanu satrusūdanu ekarūpā| nakha sikha te saba aṃga anūpā||
mana bhāvahiṃ mukha barani na jāhīṃ| upamā kahum̐ tribhuvana kou nāhīṃ||
Meaning लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनोंका एक रूप है। दोनोंके नखसे शिखातक सभी अडज्ञज अनुपम हैं। मनको बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुखसे उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमाके योग्य तीनों लोकोंमें कोई नहीं है॥ ४॥
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहूँ कबि कोबिद कहैं।
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एड उतहें॥
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।
ब्याहिअहुं चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
upamā na kou kaha dāsa tulasī katahūm̐ kabi kobida kahaiṃ|
bala binaya bidyā sīla sobhā siṃdhu inha se eḍa utaheṃ||
pura nāri sakala pasāri aṃcala bidhihi bacana sunāvahīṃ|
byāhiahuṃ cāriu bhāi ehiṃ pura hama sumaṃgala gāvahīṃ||
Meaning दास तुलसी कहता है कवि और कोविद (विद्वानू) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभाके समुद्र इनके समान ये ही हैं। जनकपुरकी सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाताको यह वचन (विनती) सुनाती हैं कि चारों भाइयोंका विवाह इसी नगरमें हो और हम सब सुन्दर मड़ल गावें।
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥ ३४११॥
kahahiṃ paraspara nāri bāri bilocana pulaka tana|
sakhi sabu karaba purāri punya payonidhi bhūpa dou|| 3411||
Meaning नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भरकर पुलकित शरीरसे स्त्रियाँ आपसमें कह रही हैं कि हे सखी ! दोनों राजा पुण्यके समुद्र हैं, त्रपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे॥ ३११॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥
ehi bidhi sakala manoratha karahīṃ| ānam̐da umagi umagi ura bharahīṃ||
je nṛpa sīya svayaṃbara āe| dekhi baṃdhu saba tinha sukha pāe||
Meaning इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदयको उमँग-उमँगकर (उत्साहपूर्वक) आनन्दसे भर रही हैं। सीताजीके स्वयंवरमें जो राजा आये थे, उन्होंने भी चारों भाइयोंको देखकर सुख पाया॥ १॥
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥
गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥
kahata rāma jasu bisada bisālā| nija nija bhavana gae mahipālā||
gae bīti kucha dina ehi bhām̐tī| pramudita purajana sakala barātī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका निर्मल और महान् यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गये। इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। जनकपुरनिवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं॥ २॥
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥
maṃgala mūla lagana dinu āvā| hima ritu agahanu māsu suhāvā||
graha tithi nakhatu jogu bara bārū| lagana sodhi bidhi kīnha bicārū||
Meaning मज़लोंका मूल लग्नका दिन आ गया। हेमन्त-ऋतु और सुहावना अगहनका महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लग्न (मुहूर्त) शोधकर ब्रह्माजीने उसपर विचार किया,॥ ३॥
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥
paṭhai dīnhi nārada sana soī| ganī janaka ke ganakanha joī||
sunī sakala loganha yaha bātā| kahahiṃ jotiṣī āhiṃ bidhātā||
Meaning और उस (लग्नपत्रिका) को नारदजीके हाथ [जनकजीके यहाँ] भेज दिया। जनकजीके ज्योतिषियोंने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगोंने यह बात सुनी तब वे कहने लगे-- यहाँके ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं॥ ४॥
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल॥ ३४१२॥
dhenudhūri belā bimala sakala sumaṃgala mūla|
bipranha kaheu bideha sana jāni saguna anukula|| 3412||
Meaning निर्मल और सभी सुन्दर मज़लोंकी मूल गोधूलिकी पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राहमणोंने जनकजीसे कहा॥ ३१२॥
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥
uparohitahi kaheu naranāhā| aba bilaṃba kara kāranu kāhā||
satānaṃda taba saciva bolāe| maṃgala sakala sāji saba lyāe||
Meaning तब राजा जनकने पुरोहित शतानन्दजीसे कहा कि अब देरका क्या कारण है। तब शतानन्दजीने मन्त्रियोंको बुलाया। वे सब मज़लका सामान सजाकर ले आये॥ १॥
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥
saṃkha nisāna panava bahu bāje| maṃgala kalasa saguna subha sāje||
subhaga suāsini gāvahiṃ gītā| karahiṃ beda dhuni bipra punītā||
Meaning शड्ु, नगाड़े, ढोल और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मड़ल-कलश और शुभ शकुनकी वस्तुएँ (दि, दूर्वा आदि) सजायी गयीं। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेदकी ध्वनि कर रहे हैं॥२॥
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥
lena cale sādara ehi bhām̐tī| gae jahām̐ janavāsa barātī||
kosalapati kara dekhi samājū| ati laghu lāga tinhahi surarājū||
Meaning सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारातको लेने चले और जहाँ बरातियोंका जनवासा था, वहाँ गये। अवधपति दशरथजीका समाज (वैभव) देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे॥ ३॥
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥
bhayau samau aba dhāria pāū| yaha suni parā nisānahiṃ ghāū||
gurahi pūchi kari kula bidhi rājā| cale saṃga muni sādhu samājā||
Meaning [उन्होंने जाकर विनती की--] समय हो गया, अब पधारिये। यह सुनते ही नगाड़ोंपर चोट पड़ी। गुरु वसिष्ठतजीसे पूछकर और कुलकी सब रीतियोंको करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओंके समाजको साथ लेकर चले॥ ४॥
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥ ३१३॥
bhāgya bibhava avadhesa kara dekhi deva brahmādi|
lage sarāhana sahasa mukha jāni janama nija bādi|| 313||
Meaning अवधनरेश द्शरथजीका भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखोंसे उसकी सराहना करने लगे॥ ३१३॥
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥
suranha sumaṃgala avasaru jānā| baraṣahiṃ sumana bajāi nisānā||
siva brahmādika bibudha barūthā| caṛhe bimānanhi nānā jūthā||
Meaning देवगण सुन्दर मज़लका अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ (टोलियाँ) बना-बनाकर विमानोंपर जा चढ़े॥ १॥
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥
prema pulaka tana hṛdayam̐ uchāhū| cale bilokana rāma biāhū||
dekhi janakapuru sura anurāge| nija nija loka sabahiṃ laghu lāge||
Meaning और प्रेमसे पुलकित-शरीर हो तथा हृदयमें उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजीका विवाह देखने चले। जनकपुरको देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गये कि उन सबको अपने-अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे॥ २॥
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना॥
नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥
citavahiṃ cakita bicitra bitānā| racanā sakala alaukika nānā||
nagara nāri nara rūpa nidhānā| sughara sudharama susīla sujānā||
Meaning विचित्र मण्डपको तथा नाना प्रकारकी सब अलौकिक रचनाओंको वे चकित होकर देख रहे हैं। नगरके स्त्री-पुरुष रूपके भण्डार, सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं॥ ३॥
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥
बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥
tinhahi dekhi saba sura suranārīṃ| bhae nakhata janu bidhu ujiārīṃ||
bidhihi bhayaha ācaraju biseṣī| nija karanī kachu katahum̐ na dekhī||
Meaning उन्हें देखकर सब देवता और देवाज़नाएँ ऐसे प्रभाहीन हो गये जैसे चन्द्रमाके उजियालेमें तारागण फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्माजीको विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना) तो कहीं देखी ही नहीं॥ ४॥
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥ ३१४॥
sivam̐ samujhāe deva saba jani ācaraja bhulāhu|
hṛdayam̐ bicārahu dhīra dhari siya raghubīra biāhu|| 314||
Meaning तब शिवजीने सब देवताओंको समझाया कि तुमलोग आश्चर्यमें मत भूलो। हृदयमें धीरज धरकर विचार तो करो कि यह [ भगवान्की महामहिमामयी निजशक्ति] श्रीसीताजीका और [अखिल ब्रह्माण्डोंके परम ईशर साक्षात् भगवान्] श्रीरामचन्द्रजीका विवाह है॥ ३१४॥
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥
करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥
jinha kara nāmu leta jaga māhīṃ| sakala amaṃgala mūla nasāhīṃ||
karatala hohiṃ padāratha cārī| tei siya rāmu kaheu kāmārī||
Meaning जिनका नाम लेते ही जगतमें सारे अमज्लोंकी जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठीमें आ जाते हैं, ये वही [ जगत्के माता-पिता] श्रीसीतारामजी हैं; कामके शत्रु शिवजीने ऐसा कहा॥ १॥
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥
देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥
ehi bidhi saṃbhu suranha samujhāvā| puni āgeṃ bara basaha calāvā||
devanha dekhe dasarathu jātā| mahāmoda mana pulakita gātā||
Meaning इस प्रकार शिवजीने देवताओंको समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नन्दीश्वरको आगे बढ़ाया। देवताओंने देखा कि दशरथजी मनमें बड़े ही प्रसन्न और शरीरसे पुलकित हुए चले जा रहे हैं॥ २॥
साधु समाज संग महिदेवा।
जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥
sādhu samāja saṃga mahidevā| janu tanu dhareṃ karahiṃ sukha sevā||
सोहत साथ सुभग सुत चारी।
जनु अपबरग सकल तनुधारी॥
sohata sātha subhaga suta cārī| janu apabaraga sakala tanudhārī||
Meaning उनके साथ [परम हर्षयुक्त] साधुओं और ब्राह्मणोंकी मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण करके उनकी सेवा कर रहे हों। चारों सुन्दर पुत्र साथमें ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किये हुए हों॥ ३॥
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥
marakata kanaka barana bara jorī| dekhi suranha bhai prīti na thorī||
puni rāmahi biloki hiyam̐ haraṣe| nṛpahi sarāhi sumana tinha baraṣe||
Meaning मरकतमणि और सुवर्णके रंगकी सुन्दर जोड़ियोंको देखकर देवताओंको कम प्रीति नहीं हुई ( अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई)। फिर श्रीरामचन्द्रजीको देखकर वे हृदयमें ( अत्यन्त) हर्षित हुए और राजाकी सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये॥ ४॥
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥ ३१५॥
rāma rūpu nakha sikha subhaga bārahiṃ bāra nihāri|
pulaka gāta locana sajala umā sameta purāri|| 315||
Meaning नखसे शिखातक श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर रूपको बार-बार देखते हुए पार्वतीजीसहित श्रीशिवजीका शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र [प्रेमाश्रुओंके] जलसे भर गये॥ ३१५॥
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥
keki kaṃṭha duti syāmala aṃgā| taṛita biniṃdaka basana suraṃgā||
byāha bibhūṣana bibidha banāe| maṃgala saba saba bhām̐ti suhāe||
Meaning रामजीका मोरके कण्ठकी-सी कान्तिवाला [हरिताभ] श्याम शरीर है। बिजलीका अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर [ पीत] रंगके वस्त्र हैं। सब मज़लरूप और सब प्रकारसे सुन्दर भाँति-भाँतिके विवाहके आभूषण शरीरपर सजाये हुए हैं॥ १॥
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥
सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥
sarada bimala bidhu badanu suhāvana| nayana navala rājīva lajāvana||
sakala alaukika suṃdaratāī| kahi na jāi manahīṃ mana bhāī||
Meaning उनका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमाके निर्मल चन्द्रमाके समान और [मनोहर] नेत्र नबीन कमलको लजानेवाले हैं। सारी सुन्दरता अलौकिक है। (मायाकी बनी नहीं है, दिव्य सच्चिदानन्दमयी है ) वह कही नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है॥ २॥
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥
baṃdhu manohara sohahiṃ saṃgā| jāta nacāvata capala turaṃgā||
rājakuam̐ra bara bāji dekhāvahiṃ| baṃsa prasaṃsaka birida sunāvahiṃ||
Meaning साथमें मनोहर भाई शोभित हैं, जो चज्नल घोड़ोंको नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ोंको (उनकी चालको) दिखला रहे हैं और वंशकी प्रशंसा करनेवाले (मागध-भाट) विरुदावली सुना रहे हैं॥ ३॥
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥
jehi turaṃga para rāmu birāje| gati biloki khaganāyaku lāje||
kahi na jāi saba bhām̐ti suhāvā| bāji beṣu janu kāma banāvā||
Meaning जिस घोड़ेपर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी [तेज] चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकारसे सुन्दर है। मानो कामदेवने ही घोड़ेका वेष धारण कर लिया हो॥४॥
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।
आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥
janu bāji beṣu banāi manasiju rāma hita ati sohaī|
āpaneṃ baya bala rūpa guna gati sakala bhuvana bimohaī||
jagamagata jīnu jarāva joti sumoti mani mānika lage|
kiṃkini lalāma lagāmu lalita biloki sura nara muni ṭhage||
Meaning मानो श्रीरामचन्द्रजीके लिये कामदेव घोड़ेका वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चालसे समस्त लोकोंको मोहित कर रहा है। सुन्दर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योतिसे जगमगा रहा है। उसकी सुन्दर घुँघरू लगी ललित लगामको देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं।
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६॥
prabhu manasahiṃ layalīna manu calata bāji chabi pāva|
bhūṣita uṛagana taṛita ghanu janu bara barahi nacāva|| 316||
Meaning प्रभुकी इच्छामें अपने मनको लीन किये चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है। मानो तारागण तथा बिजलीसे अलड्त मेघ सुन्दर मोरको नचा रहा हो॥ ३१६॥
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥
jehiṃ bara bāji rāmu asavārā| tehi sāradau na baranai pārā||
saṃkaru rāma rūpa anurāge| nayana paṃcadasa ati priya lāge||
Meaning जिस श्रेष्ठ घोड़ेपर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शड्रजी श्रीरामचन्द्रजी के रूपमें ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे॥ १॥
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥
hari hita sahita rāmu jaba johe| ramā sameta ramāpati mohe||
nirakhi rāma chabi bidhi haraṣāne| āṭhai nayana jāni pachitāne||
Meaning भगवान् विष्णुने जब प्रेमसहित श्रीरामको देखा,तब वे [ रमणीयताकी मूर्ति। श्रीलक्ष्मीजीके पति श्रीलक्ष्मीजीसहित मोहित हो गये। श्रीरामचन्द्रजीको शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे॥ २॥
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥
sura senapa ura bahuta uchāhū| bidhi te ḍevaṛha locana lāhū||
rāmahi citava suresa sujānā| gautama śrāpu parama hita mānā||
Meaning देवताओंके सेनापति स्वामिकार्तिकके हृदयमें बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजीसे ड्योढ़े अथीत् बारह नेत्रोंसे रामदर्शनका सुन्दर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र [अपने हजार नेत्रोंसे] श्रीरामचन्द्रजीको देख रहे हैं और गौतमजीके शापको अपने लिये परम हितकर मान रहे हैं॥ ३॥
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥
मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥
deva sakala surapatihi sihāhīṃ| āju puraṃdara sama kou nāhīṃ||
mudita devagana rāmahi dekhī| nṛpasamāja duhum̐ haraṣu biseṣī||
Meaning सभी देवता देवराज इन्द्रसे ईर्ष्या कर रहे हैं [ और कह रहे हैं] कि आज इन्द्रके समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओंके समाजमें विशेष हर्ष छा रहा है॥ ४॥
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभी बाजहिं घनी।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।
रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥
ati haraṣu rājasamāja duhu disi duṃdubhī bājahiṃ ghanī|
baraṣahiṃ sumana sura haraṣi kahi jaya jayati jaya raghukulamanī||
ehi bhām̐ti jāni barāta āvata bājane bahu bājahīṃ|
rānī suāsini boli parichani hetu maṃgala sājahīṃ||
Meaning दोनों ओरसे राजसमाजमें अत्यन्त हर्ष है और बड़े जोरसे नगाड़े बज रहे हैं। देवता प्रसन्न होकर और 'रघुकुलमणि श्रीरामकी जय हो, जय हो, जय हो' कहकर फूल बरसा रहे हैं। इस प्रकार बारातको आती हुई जानकर बहुत प्रकारके बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियोंको बुलाकर परछनके लिये मज़लद्रव्य सजाने लगीं।
चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥ ३४१७॥
calīṃ mudita parichani karana gajagāmini bara nāri|| 3417||
Meaning (हाथीकी-सी चालवाली) उत्तम स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक परछनके लिये चलीं॥ ३१७॥
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥
bidhubadanīṃ saba saba mṛgalocani| saba nija tana chabi rati madu mocani||
pahireṃ barana barana bara cīrā| sakala bibhūṣana sajeṃ sarīrā||
Meaning सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी (चन्द्रमाके समान मुखवाली ) और सभी मृगलोचनी (हरिणकी-सी आँखोंवाली ) हैं और सभी अपने शरीरकी शोभासे रतिके गर्वको छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंगकी सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीरपर सब आभूषण सजे हुए हैं॥ १॥
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥
sakala sumaṃgala aṃga banāem̐| karahiṃ gāna kalakaṃṭhi lajāem̐||
kaṃkana kiṃkini nūpura bājahiṃ| cāli biloki kāma gaja lājahiṃ||
Meaning समस्त अड्ोंको सुन्दर मड़ल पदार्थोंसे सजाये हुए वे कोयलको भी लजाती हुई [मधुर स्वरसे] गान कर रही हैं। कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियोंकी चाल देखकर कामदेवके हाथी भी लजा जाते हैं॥ २॥
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥
bājahiṃ bājane bibidha prakārā| nabha aru nagara sumaṃgalacārā||
sacī sāradā ramā bhavānī| je suratiya suci sahaja sayānī||
Meaning अनेक प्रकारके बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानोंमें सुन्दर मड़लाचार हो रहे हैं। शची (इन्द्राणी ), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभावसे ही पवित्र और सयानी देवाज़नाएँ थीं,॥ ३॥
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई॥
करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी॥
kapaṭa nāri bara beṣa banāī| milīṃ sakala ranivāsahiṃ jāī||
karahiṃ gāna kala maṃgala bānīṃ| haraṣa bibasa saba kāhum̐ na jānī||
Meaning वे सब कपटसे सुन्दर स्त्रीका वेष बनाकर रनिवासमें जा मिलीं और मनोहर वाणीसे मज़लगान करने लगीं। सब कोई हर्षके विशेष वश थे, अत: किसीने उन्हें पहचाना नहीं॥ ४॥
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्म बर परिछन चली।
कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियें हरषित भई।
अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
ko jāna kehi ānaṃda basa saba brahma bara parichana calī|
kala gāna madhura nisāna baraṣahiṃ sumana sura sobhā bhalī||
ānaṃdakaṃdu biloki dūlahu sakala hiyeṃ haraṣita bhaī|
aṃbhoja aṃbaka aṃbu umagi suaṃga pulakāvali chaī||
Meaning कौन किसे जाने-पहिचाने! आनन्दके वश हुई सब दूलह बने हुए ब्रहमका परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर-मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलहको देखकर सब स्त्रियाँ हदयमें हर्षित हुईं। उनके कमल-सरीखे नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल उमड़ आया और सुन्दर अड्डोंगें पुलकावली छा गयी।
जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।
jo sukhu bhā siya mātu mana dekhi rāma bara beṣu|
न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥ ३१८॥
na sakahiṃ kahi kalapa sata sahasa sāradā seṣu|| 318||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका वरवेष देखकर सीताजीकी माता सुनयनाजीके मनमें जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पोंमें भी नहीं कह सकते [ अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पोंमें भी नहीं कह सकते]॥ ३१८॥
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥
बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥
nayana nīru haṭi maṃgala jānī| parichani karahiṃ mudita mana rānī||
beda bihita aru kula ācārū| kīnha bhalī bidhi saba byavahārū||
Meaning मज़ल-अवसर जानकर नेत्रोंके जलको रोके हुए रानी प्रसन्न मनसे परछन कर रही हैं। वेदोंमें कहे हुए तथा कुलाचारके अनुसार सभी व्यवहार रानीने भलीभाँति किये॥ १॥
पंच सबद धुनि मंगल गाना।
पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥
paṃca sabada dhuni maṃgala gānā| paṭa pām̐vaṛe parahiṃ bidhi nānā||
Meaning पश्शब्द (तन्त्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरही-इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द), पश्नध्वनि (वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शज्गुध्वनि और हुलूध्वनि) और मज़लगान हो रहे हैं। नाना मण्डपमें गमन किया॥ २॥
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥
dasarathu sahita samāja birāje| bibhava biloki lokapati lāje||
samayam̐ samayam̐ sura baraṣahiṃ phūlā| sāṃti paṛhahiṃ mahisura anukūlā||
Meaning दशरथजी अपनी मण्डलीसहित विराजमान हुए। उनके वैभवको देखकर लोकपाल भी लजा गये। समय-समयपर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति-पाठ करते हैं॥ ३॥
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥
nabha aru nagara kolāhala hoī| āpani para kachu sunai na koī||
ehi bidhi rāmu maṃḍapahiṃ āe| araghu dei āsana baiṭhāe||
Meaning आकाश और नगरमें शोर मच रहा है। अपनी-परायी कोई कुछ भी नहीं सुनता। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मण्डपमें आये और अर्घ्य देकर आसनपर बैठाये गये॥ ४॥
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥
ब्रहमादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।
अवलोकि रघुकुल कमल रबिछबि सुफल जीवन लेखहीं॥
mani basana bhūṣana bhūri vārahiṃ nāri maṃgala gāvahīṃ||
brahamādi surabara bipra beṣa banāi kautuka dekhahīṃ|
avaloki raghukula kamala rabichabi suphala jīvana lekhahīṃ||
Meaning वस्त्र और गहने निछावर करके मज़ल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मणका वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं। वे रघुकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर अपना जीवन सफल जान रहे हैं।
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।
मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हदयें समाइ॥ ३१९॥
nāū bārī bhāṭa naṭa rāma nichāvari pāi|
mudita asīsahiṃ nāi sira haraṣu na hadayeṃ samāi|| 319||
Meaning नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजीकी निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशिष देते हैं; उनके हृदयमें हर्ष समाता नहीं है॥ ३१९॥
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥
मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥
mile janaku dasarathu ati prītīṃ| kari baidika laukika saba rītīṃ||
milata mahā dou rāja birāje| upamā khoji khoji kabi lāje||
Meaning वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेमसे मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिये उपमा खोज-खोजकर लजा गये॥ १॥
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥
सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥
lahī na katahum̐ hāri hiyam̐ mānī| inha sama ei upamā ura ānī||
sāmadha dekhi deva anurāge| sumana baraṣi jasu gāvana lāge||
Meaning जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदयमें हार मानकर उन्होंने मनमें यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समधियोंका मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे॥ २॥
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥
सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥
jagu biraṃci upajāvā jaba teṃ| dekhe sune byāha bahu taba teṃ||
sakala bhām̐ti sama sāju samājū| sama samadhī dekhe hama ājū||
Meaning [वे कहने लगे--] जब्से ब्रह्माजीने जगत्को उत्पन्न किया, तबसे हमने बहुत विवाह देखे-सुने; परन्तु सब प्रकारसे समान साज-समाज और बराबरीके ( पूर्ण समतायुक्त) समधी तो आज ही देखे॥ ३॥
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥
देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥
deva girā suni suṃdara sām̐cī| prīti alaukika duhu disi mācī||
deta pām̐vaṛe araghu suhāe| sādara janaku maṃḍapahiṃ lyāe||
Meaning देवताओंकी सुन्दर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गयी। सुन्दर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजीको आदरपूर्वक मण्डपमें ले आये॥ ४॥
०--मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनों रुचिरतां मुनि मन हरे।
निज पानि जनक सुजान सब कहुं आनि सिंघासन धरे॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परे कही॥
0--maṃḍapu biloki bicitra racanoṃ ruciratāṃ muni mana hare|
nija pāni janaka sujāna saba kahuṃ āni siṃghāsana dhare||
kula iṣṭa sarisa basiṣṭa pūje binaya kari āsiṣa lahī|
kausikahi pūjata parama prīti ki rīti tau na pare kahī||
Meaning मण्डपको देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरतासे मुनियोंके मन भी हरे गये (मोहित हो गये)। सुजान जनकजीने अपने हाथोंसे ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुलके इष्टदेवताके समान वसिष्टजीकी पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विधामित्रजीकी पूजा करते समयकी परम प्रीतिकी रीति तो कहते ही नहीं बनती।
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
दिए दिव्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ ३२०॥
bāmadeva ādika riṣaya pūje mudita mahīsa|
die divya āsana sabahi saba sana lahī asīsa|| 320||
Meaning राजाने वामदेव आदि ऋषियोंकी प्रसन्न मनसे पूजा की। सभीको दिव्य आसन दिये और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया॥ ३२०॥
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥
bahuri kīnha kosalapati pūjā| jāni īsa sama bhāu na dūjā||
kīnha jori kara binaya baṛāī| kahi nija bhāgya bibhava bahutāī||
Meaning फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजीकी पूजा उन्हें ईश (महादेवजी) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था। तदनन्तर [उनके सम्बन्धसे] अपने भाग्य और वैभवके विस्तारकी सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की॥ १॥
पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती॥
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू॥
pūje bhūpati sakala barātī| samadhi sama sādara saba bhām̐tī||
āsana ucita die saba kāhū| kahauṃ kāha mūkha eka uchāhū||
Meaning राजा जनकजीने सब बरातियोंका समधी दशरथजीके समान ही सब प्रकारसे आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसीको उचित आसन दिये। मैं एक मुखसे उस उत्साहका क्या वर्णन करूँ॥ २॥
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥
sakala barāta janaka sanamānī| dāna māna binatī bara bānī||
bidhi hari haru disipati dinarāū| je jānahiṃ raghubīra prabhāū||
Meaning राजा जनकने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणीसे सारी बारातका सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुनाथजीका प्रभाव जानते हैं,॥ ३॥
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥
kapaṭa bipra bara beṣa banāem̐| kautuka dekhahiṃ ati sacu pāem̐||
pūje janaka deva sama jāneṃ| die suāsana binu pahicāneṃ||
Meaning वे कपटसे ब्राह्मणोंका सुन्दर वेष बनाये बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे। जनकजीने उनको देवताओंके समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुन्दर आसन दिये॥ ४॥
पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनेंदमई॥
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥
pahicāna ko kehi jāna sabahi apāna sudhi bhorī bhaī|
ānaṃda kaṃdu biloki dūlahu ubhaya disi āneṃdamaī||
sura lakhe rāma sujāna pūje mānasika āsana dae|
avaloki sīlu subhāu prabhu ko bibudha mana pramudita bhae||
Meaning कौन किसको जाने-पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है। आनन्दकन्द दूलहको देखकर दोनों ओर आनन्दमयी स्थिति हो रही है। सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरमचन्रजीने देवताओंको पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये। प्रभुका शील-स्वभाव देखकर देवगण मनमें बहुत आनन्दित हुए।
रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥ ३२१॥
rāmacaṃdra mukha caṃdra chabi locana cāru cakora|
karata pāna sādara sakala premu pramodu na thora|| 321||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी छबिको सभीके सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनन्द कम नहीं है (अर्थात् बहुत है)॥ ३२१॥