देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥
deva danuja bhūpati bhaṭa nānā| samabala adhika hou balavānā||
jauṃ rana hamahi pacārai koū| larahiṃ sukhena kālu kina hoū||
Meaning देवता, दैत्य, राजा या और बहुत-से योद्धा, वे चाहे बलमें हमारे बराबर हों, चाहे अधिक बलवान् हों, यदि रणमें हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों नहो?॥१॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥
chatriya tanu dhari samara sakānā| kula kalaṃku tehiṃ pāvam̐ra ānā||
kahaum̐ subhāu na kulahi prasaṃsī| kālahu ḍarahiṃ na rana raghubaṃsī||
Meaning क्षत्रियका शरीर धरकर जो युद्धमें डर गया, उस नीचने अपने कुलपर कलड्ू लगा दिया। मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, कुलकी प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रणमें कालसे भी नहीं डरते॥ २॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥
biprabaṃsa kai asi prabhutāī| abhaya hoi jo tumhahi ḍerāī||
sunu mṛdu gūṛha bacana raghupati ke| ughare paṭala parasudhara mati ke||
Meaning ब्राह्मणवंशकी ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है]। श्रीरघुनाथजीके कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजीकी बुद्धिके परदे खुल गये॥ ३॥
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥
rāma ramāpati kara dhanu lehū| khaiṃcahu miṭai mora saṃdehū||
deta cāpu āpuhiṃ cali gayaū| parasurāma mana bisamaya bhayaū||
Meaning [ परशुरामजीने कहा--] हे राम! हे लक्ष्मीपति ! धनुषको हाथमें [ अथवा लक्ष्मीपति विष्णुका धनुष] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ४॥
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात॥ २८४॥
jānā rāma prabhāu taba pulaka praphullita gāta|
jori pāni bole bacana hdayam̐ na premu amāta|| 284||
Meaning तब उन्होंने श्रीरामजीका प्रभाव जाना, [जिसके कारण] उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले--प्रेम उनके हृदयमें समाता न था--॥ २८४॥
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥
jaya raghubaṃsa banaja bana bhānū| gahana danuja kula dahana kṛsānu||
jaya sura bipra dhenu hitakārī| jaya mada moha koha bhrama hārī||
Meaning हे रघुकुलरूपी कमलवनके सूर्य! हे राक्षसोंके कुलरूपी घने जंगलको जलानेवाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौका हित करनेवाले ! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और श्रमके हरनेवाले ! आपकी जय हो॥ १॥
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥
binaya sīla karunā guna sāgara| jayati bacana racanā ati nāgara||
sevaka sukhada subhaga saba aṃgā| jaya sarīra chabi koṭi anaṃgā||
Meaning हे विनय, शील, कृपा आदि गुणोंके समुद्र और वचनोंकी रचनामें अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो। हे सेवकोंको सुख देनेवाले, सब अज्ञोंसे सुन्दर और शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी छवि धारण करनेवाले ! आपकी जय हो॥ २॥
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥
karauṃ kāha mukha eka prasaṃsā| jaya mahesa mana mānasa haṃsā||
anucita bahuta kaheum̐ agyātā| chamahu chamāmaṃdira dou bhrātā||
Meaning मैं एक मुखसे आपकी क्या प्रशंसा करूँ ? हे महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस! आपकी जय हो। मैंने अनजानमें आपको बहुत-से अनुचित वचन कहे। हे क्षमाके मन्दिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिये॥ ३॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥
अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥
kahi jaya jaya jaya raghukulaketū| bhṛgupati gae banahi tapa hetū||
apabhayam̐ kuṭila mahīpa ḍerāne| jaham̐ taham̐ kāyara gavam̐hiṃ parāne||
Meaning हे रघुकुलके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी तपके लिये वनको चले गये। [यह देखकर] दुष्ट राजालोग बिना ही कारणके (मन:कल्पित) डरसे (रामचन्द्रजीसे तो परशुरामजी भी हार गये, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थके डरसे) डर गये, वे कायर चुपकेसे जहाँ-तहाँ भाग गये॥ ४॥
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥ २८५॥
devanha dīnhīṃ duṃdubhīṃ prabhu para baraṣahiṃ phūla|
haraṣe pura nara nāri saba miṭī mohamaya sūla|| 285||
Meaning देवताओंने नगाड़े बजाये, वे प्रभुके ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुरके स्त्री-पुरुष सब हर्षित हो गये। उनका मोहमय (अज्ञानसे उत्पन्न) शूल मिट गया॥ २८५॥
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे॥
जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी॥
ati gahagahe bājane bāje| sabahiṃ manohara maṃgala sāje||
jūtha jūtha mili sumukha sunayanīṃ| karahiṃ gāna kala kokilabayanī||
Meaning खूब जोरसे बाजे बजने लगे। सभीने मनोहर मज़ल-साज सजे। सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंबाली तथा कोयलके समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर सुन्दर गान करने लगीं॥ १॥
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥
गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥
sukhu bideha kara barani na jāī| janmadaridra manahum̐ nidhi pāī||
gata trāsa bhai sīya sukhārī| janu bidhu udayam̐ cakorakumārī||
Meaning जनकजीके सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता; मानो जन्मका दरिद्री धनका खजाना पा गया हो! सीताजीका भय जाता रहा; वे ऐसी सुखी हुईं जैसे चन्द्रमाके उदय होनेसे चकोरकी कन्या सुखी होती है॥ २॥
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई॥
janaka kīnha kausikahi pranāmā| prabhu prasāda dhanu bhaṃjeu rāmā||
mohi kṛtakṛtya kīnha duhum̐ bhāīṃ| aba jo ucita so kahia gosāī||
Meaning जनकजीने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया [ और कहा--] प्रभुहीकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयोंने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये॥ ३॥
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना॥
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु॥
kaha muni sunu naranātha prabīnā| rahā bibāhu cāpa ādhīnā||
ṭūṭatahīṃ dhanu bhayau bibāhū| sura nara nāga bidita saba kāhu||
Meaning मुनिने कहा--हे चतुर नरेश! सुनो, यों तो विवाह धनुषके अधीन था; धनुषके टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब किसीको यह मालूम है॥ ४॥
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥ २८६॥
tadapi jāi tumha karahu aba jathā baṃsa byavahāru|
būjhi bipra kulabṛddha gura beda bidita ācāru|| 286||
Meaning तथापि तुम जाकर अपने कुलका जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुलके बूढ़ों और गुरुओंसे पूछकर और वेदोंमें वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो॥ २८६॥
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई॥
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥
dūta avadhapura paṭhavahu jāī| ānahiṃ nṛpa dasarathahi bolāī||
mudita rāu kahi bhalehiṃ kṛpālā| paṭhae dūta boli tehi kālā||
Meaning जाकर अयोध्याको दूत भेजो, जो राजा दशरथको बुला लावें। राजाने प्रसन्न होकर कहा-- हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतोंको बुलाकर भेज दिया॥ १॥
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥
हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥
bahuri mahājana sakala bolāe| āi sabanhi sādara sira nāe||
hāṭa bāṭa maṃdira surabāsā| nagaru sam̐vārahu cārihum̐ pāsā||
Meaning फिर सब महाजनोंको बुलाया और सबने आकर राजाको आदरपूर्वक सिर नवाया। [ राजाने कहा--] बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगरको चारों ओरसे सजाओ॥ २॥
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥
रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥
haraṣi cale nija nija gṛha āe| puni paricāraka boli paṭhāe||
racahu bicitra bitāna banāī| sira dhari bacana cale sacu pāī||
Meaning महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजाने नौकरोंको बुला भेजा [ और उन्हें आज्ञा दी कि] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजाके वचन सिरपर धरकर और सुख पाकर चले॥ ३॥
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥
paṭhae boli gunī tinha nānā| je bitāna bidhi kusala sujānā||
bidhihi baṃdi tinha kīnha araṃbhā| birace kanaka kadali ke khaṃbhā||
Meaning उन्होंने अनेक कारीगरोंको बुला भेजा, जो मण्डप बनानेमें कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्माकी वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [पहले] सोनेके केलेके खंभे बनाये॥ ४॥
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥ २८७॥
harita maninha ke patra phala padumarāga ke phūla|
racanā dekhi bicitra ati manu biraṃci kara bhūla|| 287||
Meaning हरी-हरी मणियों (पन्ने) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों (माणिक) के फूल बनाये। मण्डपकी अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्माका मन भी भूल गया॥ २८७॥
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥
कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई॥
beni harita manimaya saba kīnhe| sarala saparaba parahiṃ nahiṃ cīnhe||
kanaka kalita ahibela banāī| lakhi nahi parai saparana suhāī||
Meaning बाँस सब हरी-हरी मणियों (पन्ने) के सीधे और गाँठोंसे युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [कि मणियोंके हैं या साधारण]। सोनेकी सुन्दर नागबेलि (पानकी लता) बनायी, जो पत्तोंसहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी॥ १॥
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए॥
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥
tehi ke raci paci baṃdha banāe| bica bica mukatā dāma suhāe||
mānika marakata kulisa pirojā| cīri kori paci race sarojā||
Meaning उसी नागबेलिके रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन (बँधनेकी रस्सी ) बनाये। बीच-बीचमें मोतियोंकी सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नोंको चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंगके] कमल बनाये॥ २॥
किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी॥
kie bhṛṃga bahuraṃga bihaṃgā| guṃjahiṃ kūjahiṃ pavana prasaṃgā||
sura pratimā khaṃbhana gaṛhī kāṛhī| maṃgala drabya liem̐ saba ṭhāṛhī||
Meaning भौरे और बहुत रंगोंके पक्षी बनाये, जो हवाके सहारे गूँजते और कूजते थे। खंभोंपर देवताओंकी मूर्तियाँ गढ़कर निकालीं, जो सब मज़लद्रव्य लिये खड़ी थीं॥ ३॥
चौंकें भाँति अनेक पुराईं।
सिंधुर मनिमय सहज सुहाई॥
cauṃkeṃ bhām̐ti aneka purāīṃ| siṃdhura manimaya sahaja suhāī||
Meaning गजमुक्ताओंके सहज ही सुहावने अनेकों तरहके चौक पुराये॥ ४॥
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥ २८८॥
saurabha pallava subhaga suṭhi kie nīlamani kori|
hema baura marakata ghavari lasata pāṭamaya ḍori|| 288||
Meaning नीलमणिको कोरकर अत्यन्त सुन्दर आमके पत्ते बनाये। सोनेके बौर (आमके फूल) और रेशमकी डोरीसे बँधे हुए पन्नेके बने फलोंके गुच्छे सुशोभित हैं॥ २८८॥
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहूं मनोभवें फंद संवारे॥
मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥
race rucira bara baṃdanibāre| manahūṃ manobhaveṃ phaṃda saṃvāre||
maṃgala kalasa aneka banāe| dhvaja patāka paṭa camara suhāe||
Meaning ऐसे सुन्दर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेवने फंदे सजाये हों। अनेकों मज़ल-कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका, परदे और चँवर बनाये॥ १॥
दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥
dīpa manohara manimaya nānā| jāi na barani bicitra bitānā||
jehiṃ maṃḍapa dulahini baidehī| so baranai asi mati kabi kehī||
Meaning जिसमें मणियोंके अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस विचित्र मण्डपका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। जिस मण्डपमें श्रीजनकीजी दुलहिन होंगी, किस कविकी ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके॥ २॥
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥
जनक भवन कै सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥
dūlahu rāmu rūpa guna sāgara| so bitānu tihum̐ loka ujāgara||
janaka bhavana kai saubhā jaisī| gṛha gṛha prati pura dekhia taisī||
Meaning जिस मण्डपमें रूप और गुणोंके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होना ही चाहिये। जनकजीके महलकी जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगरके प्रत्येक घरकी दिखायी देती है॥ ३॥
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥
जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥
jehiṃ terahuti tehi samaya nihārī| tehi laghu lagahiṃ bhuvana dasa cārī||
jo saṃpadā nīca gṛha sohā| so biloki suranāyaka mohā||
Meaning उस समय जिसने तिरहुतको देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुरमें नीचके घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था॥ ४॥
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥ २८९॥
basai nagara jehi laccha kari kapaṭa nāri bara beṣu|
tehi pura kai sobhā kahata sakucahiṃ sārada seṣu|| 289||
Meaning जिस नगरमें साक्षात् लक्ष्मीजी कपटसे स्त्रीका सुन्दर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुरकी शोभाका वर्णन करनेमें सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं॥ २८९॥
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥
pahum̐ce dūta rāma pura pāvana| haraṣe nagara biloki suhāvana||
bhūpa dvāra tinha khabari janāī| dasaratha nṛpa suni lie bolāī||
Meaning जनकजीके दूत श्रीरामचन्द्रजीकी पवित्र पुरी अयोध्यामें पहुँचे। सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वारपर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजीने सुनकर उन्हें बुला लिया॥ १॥
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥
बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती॥
kari pranāmu tinha pātī dīnhī| mudita mahīpa āpu uṭhi līnhī||
bāri bilocana bācata pām̐tī| pulaka gāta āī bhari chātī||
Meaning दूतोंने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजाने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रोंगें जल (प्रेम और आनन्दके आँसू) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी॥ २॥
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥
rāmu lakhanu ura kara bara cīṭhī| rahi gae kahata na khāṭī mīṭhī||
puni dhari dhīra patrikā bām̐cī| haraṣī sabhā bāta suni sām̐cī||
Meaning हृदयमें राम और लक्ष्मण हैं, हाथमें सुन्दर चिट्ठी है, राजा उसे हाथमें लिये ही रह गये, खट्टी- मीठी कुछ भी कह न सके। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्रिका पढ़ी। सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी॥ ३॥
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई
khelata rahe tahām̐ sudhi pāī| āe bharatu sahita hita bhāī||
pūchata ati saneham̐ sakucāī| tāta kahām̐ teṃ pātī āī
Meaning भरतजी अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्कके साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गये। बहुत प्रेमसे सकुचाते हुए पूछते हैं--पिताजी! चिट्ठी कहाँसे आयी है 2॥ ४॥
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥ २९०॥
kusala prānapriya baṃdhu dou ahahiṃ kahahu kehiṃ desa|
suni saneha sāne bacana bācī bahuri naresa|| 290||
Meaning हमारे प्राणोंसे प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देशमें हैं ? स्नेहसे सने ये वचन सुनकर राजाने फिरसे चिट्ठी पढ़ी॥ २९०॥
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता॥
प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥
suni pātī pulake dou bhrātā| adhika sanehu samāta na gātā||
prīti punīta bharata kai dekhī| sakala sabhām̐ sukhu laheu biseṣī||
Meaning चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गये। स्रेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीरमें समाता नहीं। भरतजीका पवित्र प्रेम देखकर सारी सभाने विशेष सुख पाया॥ १॥
तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥
भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥
taba nṛpa dūta nikaṭa baiṭhāre| madhura manohara bacana ucāre||
bhaiyā kahahu kusala dou bāre| tumha nīkeṃ nija nayana nihāre||
Meaning तब राजा दूतोंको पास बैठाकर मनको हरनेवाले मीठे वचन बोले--भैया! कहो, दोनों बच्चे कुशलसे तो हैं ? तुमने अपनी आंँखोंसे उन्हें अच्छी तरह देखा है न?॥ २॥
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥
syāmala gaura dhareṃ dhanu bhāthā| baya kisora kausika muni sāthā||
pahicānahu tumha kahahu subhāū| prema bibasa puni puni kaha rāū||
Meaning साँवले और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, विधामित्र मुनिके साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेमके विशेष वश होनेसे बार-बार इस प्रकार कह (पूछ) रहे हैं॥ ३॥
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने॥
jā dina teṃ muni gae lavāī| taba teṃ āju sām̐ci sudhi pāī||
kahahu bideha kavana bidhi jāne| suni priya bacana dūta musakāne||
Meaning [ भैया !] जिस दिनसे मुनि उन्हें लिवा ले गये, तबसे आज ही हमने सच्ची खबर पायी है। कहो तो महाराज जनकने उन्हें कैसे पहचाना? ये प्रिय (प्रेमभरे) वचन सुनकर दूत मुसकराये॥ ४॥
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥ २९१॥
sunahu mahīpati mukuṭa mani tumha sama dhanya na kou|
rāmu lakhanu jinha ke tanaya bisva bibhūṣana dou|| 291||
Meaning [ दूतोंने कहा--] हे राजाओंके मुकुटमणि! सुनिये, आपके समान धन्य और कोई नहीं है, जिनके राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्वके विभूषण हैं॥ २९१॥
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥
pūchana jogu na tanaya tumhāre| puruṣasiṃgha tihu pura ujiāre||
jinha ke jasa pratāpa keṃ āge| sasi malīna rabi sītala lāge||
Meaning आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषरसिंह तीनों लोकोंके प्रकाशस्वरूप हैं। जिनके यशके आगे चन्द्रमा मलिन और प्रतापके आगे सूर्य शीतल लगता है,॥ १॥
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥
सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥
tinha kaham̐ kahia nātha kimi cīnhe| dekhia rabi ki dīpa kara līnhe||
sīya svayaṃbara bhūpa anekā| samiṭe subhaṭa eka teṃ ekā||
Meaning हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना ! क्या सूर्यको हाथमें दी पक लेकर देखा जाता है ? सीताजीके स्वयंवरमें अनेकों राजा और एक-से-एक बढ़कर योद्धा एकत्र हुए थे,॥ २॥
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥
तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥
saṃbhu sarāsanu kāhum̐ na ṭārā| hāre sakala bīra bariārā||
tīni loka maham̐ je bhaṭamānī| sabha kai sakati saṃbhu dhanu bhānī||
Meaning परन्तु शिवजीके धनुषको कोई भी नहीं हटा सका। सारे बलवान् वीर हार गये। तीनों लोकोंमें जो वीरताके अभिमानी थे, शिवजीके धनुषने सबकी शक्ति तोड़ दी॥ ३॥
सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥
जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥
sakai uṭhāi sarāsura merū| sou hiyam̐ hāri gayau kari pherū||
jehi kautuka sivasailu uṭhāvā| sou tehi sabhām̐ parābhau pāvā||
Meaning बाणासुर, जो सुमेरुको भी उठा सकता था, वह भी हृदयमें हारकर परिक्रमा करके चला गया; और जिसने खेलसे ही कैलासको उठा लिया था, वह रावण भी उस सभामें पराजयको प्राप्त हुआ॥ ४॥
तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥ २९२॥
tahām̐ rāma raghubaṃsa mani sunia mahā mahipāla|
bhaṃjeu cāpa prayāsa binu jimi gaja paṃkaja nāla|| 292||
Meaning हे महाराज! सुनिये, वहाँ (जहाँ ऐसे-ऐसे योद्धा हार मान गये) रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने बिना ही प्रयास शिवजीके धनुषको वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमलकी डंडीको तोड़ डालता है!॥ २९२॥
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥
suni saroṣa bhṛgunāyaku āe| bahuta bhām̐ti tinha ām̐khi dekhāe||
dekhi rāma balu nija dhanu dīnhā| kari bahu binaya gavanu bana kīnhā||
Meaning धनुष टूटनेकी बात सुनकर परशुरामजी क्रोधभरे आये और उन्होंने बहुत प्रकारसे आँखें दिखलायीं। अन्तमें उन्होंने भी श्रीरामचन्द्रजीका बल देखकर उन्हें अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकारसे विनती करके वनको गमन किया॥ १॥
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥
कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥
rājana rāmu atulabala jaiseṃ| teja nidhāna lakhanu puni taiseṃ||
kaṃpahi bhūpa bilokata jākeṃ| jimi gaja hari kisora ke tākeṃ||
Meaning हे राजन्! जैसे श्रीरामचन्द्रजी अतुलनीय बली हैं, वैसे ही तेजनिधान फिर लक्ष्मणजी भी हैं, जिनके देखनेमात्रसे राजालोग ऐसे काँप उठते थे, जैसे हाथी सिंहके बच्चेके ताकनेसे काँप उठते हैं॥ २॥
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥
दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥
deva dekhi tava bālaka doū| aba na ām̐khi tara āvata koū||
dūta bacana racanā priya lāgī| prema pratāpa bīra rasa pāgī||
Meaning हे देव ! आपके दोनों बालकोंको देखनेके बाद अब आंँखोंके नीचे कोई आता ही नहीं ( हमारी दृष्टिर कोई चढ़ता ही नहीं )। प्रेम, प्रताप और वीर-रसमें पगी हुई दूतोंकी वचनरचना सबको बहुत प्रिय लगी॥ ३॥
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥
कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना॥
sabhā sameta rāu anurāge| dūtanha dena nichāvari lāge||
kahi anīti te mūdahiṃ kānā| dharamu bicāri sabahiṃ sukha mānā||
Meaning सभासहित राजा प्रेममें मगर हो गये और दूतोंको निछावर देने लगे। [उन्हें निछावर देते देखकर ] यह नीतिविरुद्ध है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथोंसे कान मूँदने लगे। धर्मको विचारकर (उनका धर्मयुक्त बर्ताव देखकर) सभीने सुख माना॥ ४॥
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ॥ २९३॥
taba uṭhi bhūpa basiṣṭha kahum̐ dīnhi patrikā jāi|
kathā sunāī gurahi saba sādara dūta bolāi|| 293||
Meaning तब राजाने उठकर वसिष्टजीके पास जाकर उन्हें पत्रिका दी और आदरपूर्वक दूतोंको बुलाकर सारी कथा गुरुजीको सुना दी॥ २९३॥
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥
suni bole gura ati sukhu pāī| punya puruṣa kahum̐ mahi sukha chāī||
jimi saritā sāgara mahum̐ jāhīṃ| jadyapi tāhi kāmanā nāhīṃ||
Meaning सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले--पुण्यात्मा पुरुषके लिये पृथ्वी सुखोंसे छायी हुई है। जैसे नदियाँ समुद्रमें जाती हैं, यद्यपि समुद्रको नदीकी कामना नहीं होती॥ १॥
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥
timi sukha saṃpati binahiṃ bolāem̐| dharamasīla pahiṃ jāhiṃ subhāem̐||
tumha gura bipra dhenu sura sebī| tasi punīta kausalyā debī||
Meaning वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुषके पास जाती हैं। तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताकी सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं॥ २॥
सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥
तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें॥
sukṛtī tumha samāna jaga māhīṃ| bhayau na hai kou honeu nāhīṃ||
tumha te adhika punya baṛa kākeṃ| rājana rāma sarisa suta jākeṃ||
Meaning तुम्हारे समान पुण्यात्मा जगत्में न कोई हुआ, न है और न होनेका ही है। हे राजन् ! तुमसे अधिक पुण्य और किसका होगा, जिसके राम-सरीखे पुत्र हैं॥ ३॥
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी॥
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना॥
bīra binīta dharama brata dhārī| guna sāgara bara bālaka cārī||
tumha kahum̐ sarba kāla kalyānā| sajahu barāta bajāi nisānā||
Meaning और जिसके चारों बालक वीर, विनम्र, धर्मका व्रत धारण करनेवाले और गुणोंके सुन्दर समुद्र हैं। तुम्हारे लिये सभी कालोंमें कल्याण है। अतएव डंका बजवाकर बारात सजाओ॥ ४॥
चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।
भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ॥ २९४॥
calahu begi suni gura bacana bhalehiṃ nātha siru nāi|
bhūpati gavane bhavana taba dūtanha bāsu devāi|| 294||
Meaning और जल्दी चलो। गुरुजीके ऐसे वचन सुनकर, 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर और सिर नवाकर तथा दूतोंको डेरा दिलवाकर राजा महलमें गये॥ २९४॥
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥
rājā sabu ranivāsa bolāī| janaka patrikā bāci sunāī||
suni saṃdesu sakala haraṣānīṃ| apara kathā saba bhūpa bakhānīṃ||
Meaning राजाने सारे रनिवासको बुलाकर जनकजीकी पत्रिका बाँचकर सुनायी। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्षसे भर गयीं। राजाने फिर दूसरी सब बातोंका (जो दूतोंके मुखसे सुनी थीं ) वर्णन किया॥ १॥
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी॥
मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥
prema praphullita rājahiṃ rānī| manahum̐ sikhini suni bārida banī||
mudita asīsa dehiṃ guru nārīṃ| ati ānaṃda magana mahatārīṃ||
Meaning प्रेममें प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलोंकी गरज सुनकर प्रफुल्लित होती हैं। बड़ी-बूढ़ी [अथवा गुरुओंकी] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्दमें मग्न हैं॥ २॥
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥
lehiṃ paraspara ati priya pātī| hṛdayam̐ lagāi juṛāvahiṃ chātī||
rāma lakhana kai kīrati karanī| bārahiṃ bāra bhūpabara baranī||
Meaning उस अत्यन्त प्रिय पत्रिकाको आपसभमें लेकर सब हृदयसे लगाकर छाती शीतल करती हैं। राजाओंमें श्रेष्ठ दशरथजीने श्रीराम-लक्ष्मणकी कीर्ति और करनीका बारंबार वर्णन किया॥ ३॥
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥
muni prasādu kahi dvāra sidhāe| rāninha taba mahideva bolāe||
die dāna ānaṃda sametā| cale biprabara āsiṣa detā||
Meaning 'यह सब मुनिकी कृपा है' ऐसा कहकर वे बाहर चले आये। तब रानियोंने ब्राह्मणोंको बुलाया और आनन्दसहित उन्हें दान दिये। श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले॥ ४॥
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥ २९५॥
jācaka lie ham̐kāri dīnhi nichāvari koṭi bidhi|
ciru jīvahum̐ suta cāri cakrabarti dasarattha ke|| 295||
Meaning फिर भिक्षुकोंको बुलाकर करोड़ों प्रकारकी निछावरें उनको दीं। चक्रवर्ती महाराज दशरथके चारों पुत्र चिरंजीवी हों '॥ २९५॥
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥
समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने बधाए॥
kahata cale pahireṃ paṭa nānā| haraṣi hane gahagahe nisānā||
samācāra saba loganha pāe| lāge ghara ghara hone badhāe||
Meaning यों कहते हुए वे अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्र पहन-पहनकर चले। आनन्दित होकर नगाड़ेवालोंने बड़े जोरसे नगाड़ोंपर चोट लगायी। सब लोगोंने जब यह समाचार पाया, तब घर-घर बधावे होने लगे॥ १॥
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥
bhuvana cāri dasa bharā uchāhū| janakasutā raghubīra biāhū||
suni subha kathā loga anurāge| maga gṛha galīṃ sam̐vārana lāge||
Meaning चौदहों लोकोंमें उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्रीरघुनाथजीका विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गये और रास्ते, घर तथा गलियाँ सजाने लगे॥ २॥
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥
jadyapi avadha sadaiva suhāvani| rāma purī maṃgalamaya pāvani||
tadapi prīti kai prīti suhāī| maṃgala racanā racī banāī||
Meaning यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजीकी मज़लमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होनेसे वह सुन्दर मज़लरचनासे सजायी गयी॥ ३॥
ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू॥
कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥
dhvaja patāka paṭa cāmara cāru| chāvā parama bicitra bajārū||
kanaka kalasa torana mani jālā| harada dūba dadhi acchata mālā||
Meaning ध्वजा, पताका, परदे और सुन्दर चँवरोंसे सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है। सोनेके कलश, तोरण, मणियोंकी झालरें, हलदी, दूब, दही, अक्षत और मालाओंसे--॥ ४॥
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥ २९६॥
maṃgalamaya nija nija bhavana loganha race banāi|
bīthīṃ sīcīṃ caturasama caukeṃ cāru purāi|| 296||
Meaning लोगोंने अपने-अपने घरोंको सजाकर मज़लमय बना लिया। गलियोंको चतुरसमसे सींचा और [ द्वारॉंपर] सुन्दर चौक पुराये। [ चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूरसे बने हुए एक सुगन्धित द्रवको चतुरसम कहते हैं]॥ २९६॥
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि॥
बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि॥
jaham̐ taham̐ jūtha jūtha mili bhāmini| saji nava sapta sakala duti dāmini||
bidhubadanīṃ mṛga sāvaka locani| nija sarupa rati mānu bimocani||
Meaning बिजलीकी-सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिनके बच्चेके-से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूपसे कामदेवकी स्त्री रतिके अभिमानको छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर,॥ १॥
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं॥
भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥
gāvahiṃ maṃgala maṃjula bānīṃ| sunikala rava kalakaṃṭhi lajānīṃ||
bhūpa bhavana kimi jāi bakhānā| bisva bimohana raceu bitānā||
Meaning मनोहर वाणीसे मज़लगीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वरको सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहलका वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्वको विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है॥ २॥
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥
maṃgala drabya manohara nānā| rājata bājata bipula nisānā||
katahum̐ birida baṃdī uccarahīṃ| katahum̐ beda dhuni bhūsura karahīṃ||
Meaning अनेकों प्रकारके मनोहर माज़लिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं॥ ३॥
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥
gāvahiṃ suṃdari maṃgala gītā| lai lai nāmu rāmu aru sītā||
bahuta uchāhu bhavanu ati thorā| mānahum̐ umagi calā cahu orā||
Meaning सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजीका नाम ले-लेकर मज़्लगीत गा रही हैं। उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है। इससे [उसमें न समाकर] मानो वह उत्साह (आनन्द) चारों ओर उमड़ चला है॥ ४॥
सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥ २९७॥
sobhā dasaratha bhavana kai ko kabi baranai pāra|
jahām̐ sakala sura sīsa mani rāma līnha avatāra|| 297||
Meaning दशरथके महलकी शोभाका वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओंके शिरोमणि रामचन्द्रजीने अवतार लिया है॥ २९७॥
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई॥
चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥
bhūpa bharata puni lie bolāī| haya gaya syaṃdana sājahu jāī||
calahu begi raghubīra barātā| sunata pulaka pūre dou bhrātā||
Meaning फिर राजाने भरतजीको बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजीकी बारातमें चलो। यह सुनते ही दोनों भाई ( भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनन्दवश पुलकसे भर गये॥ १॥
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥
bharata sakala sāhanī bolāe| āyasu dīnha mudita uṭhi dhāe||
raci ruci jīna turaga tinha sāje| barana barana bara bāji birāje||
Meaning भरतजीने सब साहनी (घुड़सालके अध्यक्ष) बुलाये और उन्हें [ घोड़ोंको सजानेकी ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचिके साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंगके उत्तम घोड़े शोभित हो गये॥ २॥
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥
नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥
subhaga sakala suṭhi caṃcala karanī| aya iva jarata dharata paga dharanī||
nānā jāti na jāhiṃ bakhāne| nidari pavanu janu cahata uṛāne||
Meaning सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चलज्नल करनी (चाल) के हैं। वे धरतीपर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहेपर रखते हों। अनेकों जातिके घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चालके हैं] मानो हवाका निरादर करके उड़ना चाहते हैं॥ ३॥
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥
सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥
tinha saba chayala bhae asavārā| bharata sarisa baya rājakumārā||
saba suṃdara saba bhūṣanadhārī| kara sara cāpa tūna kaṭi bhārī||
Meaning उन सब घोड़ोंपर भरतजीके समान अवस्थावाले सब छैल-छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुन्दर हैं और सब आभूषण धारण किये हुए हैं। उनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं तथा कमरमें भारी तरकस बँधे हैं॥ ४॥
छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥ २९८॥
chare chabīle chayala saba sūra sujāna nabīna|
juga padacara asavāra prati je asikalā prabīna|| 298||
Meaning सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं। प्रत्येक सवारके साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलानेकी कलामें बड़े निपुण हैं॥ २९८॥
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना॥
bām̐dhe birada bīra rana gāṛhe| nikasi bhae pura bāhera ṭhāṛhe||
pherahiṃ catura turaga gati nānā| haraṣahiṃ suni suni pavana nisānā||
Meaning शूरताका बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगरके बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ोंको तरह-तरहकी चालोंसे फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़ेकी आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं॥ १॥
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥
चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं॥
ratha sārathinha bicitra banāe| dhvaja patāka mani bhūṣana lāe||
cavam̐ra cāru kiṃkina dhuni karahī| bhānu jāna sobhā apaharahīṃ||
Meaning सारथियोंने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणोंको लगाकर रथोंको बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्यके रथकी शोभाको छीने लेते हैं॥ २॥
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥
सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥
sāvam̐karana aganita haya hote| te tinha rathanha sārathinha jote||
suṃdara sakala alaṃkṛta sohe| jinhahi bilokata muni mana mohe||
Meaning अगणित श्यामकर्ण घोड़े थे। उनको सारथियोंने उन रथोंमें जोत दिया है, जो सभी देखनेमें सुन्दर और गहनोंसे सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं॥ ३॥
जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई॥
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥
je jala calahiṃ thalahi kī nāī| ṭāpa na būṛa bega adhikāī||
astra sastra sabu sāju banāī| rathī sārathinha lie bolāī||
Meaning जो जलपर भी जमीनकी तरह ही चलते हैं। वेगकी अधिकतासे उनकी टाप पानीमें नहीं डूबती। अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियोंने रथियोंको बुला लिया॥ ४॥
चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात॥ २९९॥
caṛhi caṛhi ratha bāhera nagara lāgī jurana barāta|
hota saguna sundara sabahi jo jehi kāraja jāta|| 299||
Meaning रथोंपर चढ़-चढ़कर बारात नगरके बाहर जुटने लगी। जो जिस कामके लिये जाता है, सभीको सुन्दर शकुन होते हैं॥ २९९॥
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥
चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥
kalita karibaranhi parīṃ am̐bārīṃ| kahi na jāhiṃ jehi bhām̐ti sam̐vārīṃ||
cale mattagaja ghaṃṭa birājī| manahum̐ subhaga sāvana ghana rājī||
Meaning श्रेष्ठ हाथियोंपर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटोंसे सुशोभित होकर (घंटे बजाते हुए) चले, मानो सावनके सुन्दर बादलोंके समूह [गरजते हुए] जा रहे हों॥१॥
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥
bāhana apara aneka bidhānā| sibikā subhaga sukhāsana jānā||
tinha caṛhi cale biprabara bṛndā| janu tanu dhareṃ sakala śruti chaṃdā||
Meaning सुन्दर पालकियाँ, सुखसे बैठने योग्य तामजान (जो कुर्सीनुमा होते हैं) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकारकी सवारियाँ हैं। उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदोंके छन्द ही शरीर धारण किये हुए हों॥ २॥
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥
māgadha sūta baṃdi gunagāyaka| cale jāna caṛhi jo jehi lāyaka||
besara ūm̐ṭa bṛṣabha bahu jātī| cale bastu bhari aganita bhām̐tī||
Meaning मागध, सूत, भाट और गुण गानेवाले सब, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारीपर चढ़कर चले। बहुत जातियोंके खच्चर, ऊँट और बैल असंख्यों प्रकारकी वस्तुएँ लाद-लादकर चले॥ ३॥
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥
चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥
koṭinha kām̐vari cale kahārā| bibidha bastu ko baranai pārā||
cale sakala sevaka samudāī| nija nija sāju samāju banāī||
Meaning कहार करोड़ों काँवरें लेकर चले। उनमें अनेकों प्रकारकी इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकोंके समूह अपना-अपना साज-समाज बनाकर चले॥ ४॥
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर॥ ३००॥
saba keṃ ura nirbhara haraṣu pūrita pulaka sarīra|
kabahiṃ dekhibe nayana bhari rāmu lakhanū dou bīra|| 300||
Meaning सबके हृदयमें अपार हर्ष है और शरीर पुलकसे भरे हैं। [सबको एक ही लालसा लगी है कि] हम श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको नेत्र भरकर कब देखेंगे॥ ३००॥
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥
garajahiṃ gaja ghaṃṭā dhuni ghorā| ratha rava bāji hiṃsa cahu orā||
nidari ghanahi ghurmmarahiṃ nisānā| nija parāi kachu sunia na kānā||
Meaning हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटोंकी भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी हिनहिनाहट हो रही है। बादलोंका निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं। किसीको अपनी-परायी कोई बात कानोंसे सुनायी नहीं देती॥ १॥
महा भीर भूपति के द्वारें।
रज होइ जाइ पषान पबारें॥
mahā bhīra bhūpati ke dvāreṃ| raja hoi jāi paṣāna pabāreṃ||
Meaning राजा दशरथके दरवाजेपर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो वह भी
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥
gāvahiṃ gīta manohara nānā| ati ānaṃdu na jāi bakhānā||
taba sumaṃtra dui spaṃdana sājī| jote rabi haya niṃdaka bājī||
Meaning और नाना प्रकारके मनोहर गीत गा रही हैं। उनके अत्यन्त आनन्दका बखान नहीं हो सकता। तब सुमन्त्रजीने दो रथ सजाकर उनमें सूर्यके घोड़ोंको भी मात करनेवाले घोड़े जोते॥ ३॥
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥
dou ratha rucira bhūpa pahiṃ āne| nahiṃ sārada pahiṃ jāhiṃ bakhāne||
rāja samāju eka ratha sājā| dūsara teja puṃja ati bhrājā||
Meaning दोनों सुन्दर रथ वे राजा दशरथके पास ले आये, जिनकी सुन्दरताका वर्णन सरस्वतीसे भी नहीं हो सकता। एक रथपर राजसी सामान सजाया गया। और दूसरा जो तेजका पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था,॥ ४॥
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥ ३०१॥
tehiṃ ratha rucira basiṣṭha kahum̐ haraṣi caṛhāi naresu|
āpu caṛheu spaṃdana sumiri hara gura gauri ganesu|| 301||
Meaning उस सुन्दर रथपर राजा वसिष्टजीको हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी (पार्वती ) और गणेशजीका स्मरण करके [दूसरे] रथपर चढ़े॥ ३०१॥
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥
sahita basiṣṭha soha nṛpa kaiseṃ| sura gura saṃga puraṃdara jaiseṃ||
kari kula rīti beda bidhi rāū| dekhi sabahi saba bhām̐ti banāū||
Meaning वसिष्टजीके साथ [ जाते हुए] राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु बृहस्पतिजीके साथ इन्द्र हों। वेदकी विधिसे और कुलकी रीतिके अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकारसे सजे देखकर,॥ १॥
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता॥
sumiri rāmu gura āyasu pāī| cale mahīpati saṃkha bajāī||
haraṣe bibudha biloki barātā| baraṣahiṃ sumana sumaṃgala dātā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके, गुरुकी आज्ञा पाकर पृथ्वीपति दशरथजी शंख बजाकर चले। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुन्दर मज़लदायक फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ २॥
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥
सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥
bhayau kolāhala haya gaya gāje| byoma barāta bājane bāje||
sura nara nāri sumaṃgala gāī| sarasa rāga bājahiṃ sahanāī||
Meaning बड़ा शोर मच गया, घोड़े और हाथी गरजने लगे। आकाशमें और बारातमें [ दोनों जगह] बाजे बजने लगे। देवाज़नाएँ और मनुष्योंकी स्त्रियाँ सुन्दर मज़लगान करने लगीं और रसीले रागसे शहनाइयाँ बजने लगीं॥ ३॥
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥
ghaṃṭa ghaṃṭi dhuni barani na jāhīṃ| sarava karahiṃ pāika phaharāhīṃ||
karahiṃ bidūṣaka kautuka nānā| hāsa kusala kala gāna sujānā||
Meaning घंटे-घंटियोंकी ध्वनिका वर्णन नहीं हो सकता। पैदल चलनेवाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरतके खेल कर रहे हैं और फहरा रहे हैं (आकाशमें ऊँचे उछलते हुए जा रहे हैं)। हँसी करनेमें निपुण और सुन्दर गानेमें चतुर विदूषक (मसखरे) तरह-तरहके तमाशे कर रहे हैं॥ ४॥
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥ ३०२॥
turaga nacāvahiṃ kum̐ara bara akani mṛdaṃga nisāna|
nāgara naṭa citavahiṃ cakita ḍagahiṃ na tāla bam̐dhāna|| 302||
Meaning सुन्दर राजकुमार मृदज् और नगाड़ेके शब्द सुनकर घोड़ोंको उन्हींके अनुसार इस प्रकार नचा रहे हैं कि वे तालके बंधानसे जरा भी डिगते नहीं हैं। चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं॥ ३०२॥