वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १॥
varṇānāmarthasaṃghānāṃ rasānāṃ chandasāmapi|
maṅgalānāṃ ca karttārau vande vāṇīvināyakau|| 1||
Meaning अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥ २॥
bhavānīśaṅkarau vande śraddhāviśvāsarūpiṇau|
yābhyāṃ vinā na paśyanti siddhāḥ svāntaḥsthamīśvaram|| 2||
Meaning श्रद्धा और विश्वासके स्वरूप श्रीपार्वतीजी और श्रीशड्रजीकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्त:करणमें स्थित ईश्वरको नहीं देख सकते॥ २॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३॥
vande bodhamayaṃ nityaṃ guruṃ śaṅkararūpiṇam|
yamāśrito hi vakro'pi candraḥ sarvatra vandyate|| 3||
Meaning ज्ञानमय, नित्य, शड्भररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥३॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ ४॥
sītārāmaguṇagrāmapuṇyāraṇyavihāriṇau|
vande viśuddhavijñānau kavīśvarakapīśvarau|| 4||
Meaning श्रीसीतारामजीके गुणसमूहरूपी पवित्र वनमें विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवी धर श्रीवाल्मीकिजी और कपीश्वर श्रीहनुमानूजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ४॥
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥ ५॥
udbhavasthitisaṃhārakāriṇīṃ kleśahāriṇīm|
sarvaśreyaskarīṃ sītāṃ nato'haṃ rāmavallabhām|| 5||
Meaning उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशोंकी हरनेवाली तथा सम्पूर्ण कल्याणोंकी करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीसीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५॥
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६॥
yanmāyāvaśavartti viśvamakhilaṃ brahmādidevāsurā yatsattvādamṛṣaiva bhāti sakalaṃ rajjau yathāherbhramaḥ|
yatpādaplavamekameva hi bhavāmbhodhestitīrṣāvatāṃ vande'haṃ tamaśeṣakāraṇaparaṃ rāmākhyamīśaṃ harim|| 6||
Meaning जिनकी मायाके वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्तासे रस्सीमें सर्पके भ्रमकी भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागरसे तरनेकी इच्छावालोंके लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणोंसे पर (सब कारणोंके कारण और सब्से श्रेष्ठ) राम कहानेवाले भगवान् हरिकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ६॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथाभाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥ ७॥
nānāpurāṇanigamāgamasammataṃ yad rāmāyaṇe nigaditaṃ kvacidanyato'pi|
svāntaḥsukhāya tulasī raghunāthagāthābhāṣānibandhamatimañjulamātanoti|| 7||
Meaning अनेक पुराण, वेद और [तन्त्र] शास्त्रसे सम्मत तथा जो रामायणमें वर्णित है और कुछ अन्यत्रसे भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजीकी कथाको तुलसीदास अपने अन्त:करणके सुखके लिये अत्यन्त मनोहर भाषारचनामें विस्तृत करता है॥७॥
जो सुमिरत सिधि होड़ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन श॥
jo sumirata sidhi hoṛa gana nāyaka karibara badana|
karau anugraha soi buddhi rāsi subha guna sadana śa||
Meaning जिन्हें स्मरण करनेसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणोंके स्वामी और सुन्दर हाथीके मुखवाले हैं, वे ही बुद्धिकि राशि और शुभ गुणोंके धाम (श्रीगणेशजी ) मुझपर कृपा करें॥ १॥
मूक होड़ बाचाल पंगु चढ़ड़ गिरिबर गहन।
जासु कृर्षों सो दयाल द्रवठ सकल कलि मल दहन॥ २॥
mūka hoṛa bācāla paṃgu caṛhaṛa giribara gahana|
jāsu kṛrṣoṃ so dayāla dravaṭha sakala kali mala dahana|| 2||
Meaning जिनकी कृपासे गूँगा बहुत सुन्दर बोलनेवाला हो जाता है और लंँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़पर चढ़ जाता है, वे कलियुगके सब पापोंको जला डालनेवाले दयालु ( भगवान्) मुझपर द्रवित हों (दया करें),॥ २॥
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करठ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥ ३॥
nīla saroruha syāma taruna aruna bārija nayana|
karaṭha so mama ura dhāma sadā chīrasāgara sayana|| 3||
Meaning जो नील कमलके समान श्यामवर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमलके समान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागरमें शयन करते हैं, वे भगवान् (नारायण) मेरे हृदयमें निवास करें॥ ३॥
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥ ४॥
kuṃda iṃdu sama deha umā ramana karunā ayana|
jāhi dīna para neha karau kṛpā mardana mayana|| 4||
Meaning जिनका कुन्दके पुष्प और चन्द्रमाके समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजीके प्रियतम और दयाके धाम हैं और जिनका दीनोंपर स्नेह है, वे कामदेवका मर्दन करनेवाले (शड्रजी) मुझपर कृपा करें॥ ४॥
बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५॥
baṃdauṃ guru pada kaṃja kṛpā siṃdhu nararūpa hari|
mahāmoha tama puṃja jāsu bacana rabi kara nikara|| 5||
Meaning मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ, जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं॥ ५॥
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
baṃdau guru pada paduma parāgā| suruci subāsa sarasa anurāgā||
amiya mūrimaya cūrana cārū| samana sakala bhava ruja parivārū||
Meaning मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि( सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (सज्ीवनी जड़ी )का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है॥ १॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
sukṛti saṃbhu tana bimala bibhūtī| maṃjula maṃgala moda prasūtī||
jana mana maṃju mukura mala haranī| kiem̐ tilaka guna gana basa karanī||
Meaning वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजीके शरीरपर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्तके मनरूपी सुन्दर दर्पणके मैलको दूर करनेवाली और तिलक करनेसे गुणोंके समूहको वशमें करनेवाली है॥ २॥
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
śrīgura pada nakha mani gana jotī| sumirata dibya drṛṣṭi hiyam̐ hotī||
dalana moha tama so saprakāsū| baṛe bhāga ura āvai jāsū||
Meaning श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥ ३॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥
ugharahiṃ bimala bilocana hī ke| miṭahiṃ doṣa dukha bhava rajanī ke||
sūjhahiṃ rāma carita mani mānika| guputa pragaṭa jaham̐ jo jehi khānika||
Meaning उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खानमें है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं--॥ ४॥
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥ १॥
jathā suaṃjana aṃji dṛga sādhaka siddha sujāna|
kautuka dekhata saila bana bhūtala bhūri nidhāna|| 1||
Meaning जैसे सिद्धाज्नको नेत्रोंमें लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वीके अंदर कौतुकसे ही बहुत-सी खानें देखते हैं॥ १॥
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥
guru pada raja mṛdu maṃjula aṃjana| nayana amia dṛga doṣa bibhaṃjana||
tehiṃ kari bimala bibeka bilocana| baranaum̐ rāma carita bhava mocana||
Meaning श्रीगुरु महाराजके चरणोंकी रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अज्जन है, जो नेत्रोिंके दोषोंका नाश करनेवाला है। उस अज्जनसे विवेकरूपी नेत्रोंको निर्मल करके मैं संसाररूपी बन्धनसे छुड़ानेवाले श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ॥ १॥
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥
baṃdaum̐ prathama mahīsura caranā| moha janita saṃsaya saba haranā||
sujana samāja sakala guna khānī| karaum̐ pranāma saprema subānī||
Meaning पहले पृथ्वीके देवता ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, जो अज्ञानसे उत्पन्न सब संदेहों को हरनेवाले हैं। फिर सब गुणोंकी खान संत-समाजको प्रेमसहित सुन्दर वाणीसे प्रणाम करता हूँ॥ २॥
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥
sādhu carita subha carita kapāsū| nirasa bisada gunamaya phala jāsū||
jo sahi dukha parachidra durāvā| baṃdanīya jehiṃ jaga jasa pāvā||
Meaning संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन) -के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्चल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है।) [जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है उसी प्रकार] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके छिद्रों ( दोषों ) -को ढकता है, जिसके कारण उसने जगतमें वन्दनीय यश प्राप्त किया है॥ ३॥
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥
muda maṃgalamaya saṃta samājū| jo jaga jaṃgama tīratharājū||
rāma bhakti jaham̐ surasari dhārā| sarasai brahma bicāra pracārā||
Meaning संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें ) रामभक्तिरूपी गड्ाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं॥ ४॥
बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥
bidhi niṣedhamaya kali mala haranī| karama kathā rabinaṃdani baranī||
hari hara kathā birājati benī| sunata sakala muda maṃgala denī||
Meaning विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मोकी कथा कलियुगके पापोंको हरनेवाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान् विष्णु और शड्भरजीकी कथाएँ त्रिवेणीरूपसे सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनन्द और कल्याणोंकी देनेवाली हैं॥ ५॥
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥
baṭu bisvāsa acala nija dharamā| tīratharāja samāja sukaramā||
sabahiṃ sulabha saba dina saba desā| sevata sādara samana kalesā||
Meaning [उस संतसमाजरूपी प्रयागमें] अपने धर्ममें जो अटल विश्वास है वह अक्षयवट है, और शुभकर्म ही उस तीर्थराजका समाज (परिकर) है। वह (संतसमाजरूपी प्रयागराज) सब देशोंमें, सब समय सभीको सहजहीमें प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करनेसे क्लेशोंको नष्ट करनेवाला है॥ ६॥
अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥
akatha alaukika tīratharāū| dei sadya phala pragaṭa prabhāū||
Meaning वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देनेवाला है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥ ७॥
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥ २॥
suni samujhahiṃ jana mudita mana majjahiṃ ati anurāga|
lahahiṃ cāri phala achata tanu sādhu samāja prayāga|| 2||
Meaning जो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराजका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीरके रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-- चारों फल पा जाते हैं॥ २॥
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥
majjana phala pekhia tatakālā| kāka hohiṃ pika bakau marālā||
suni ācaraja karai jani koī| satasaṃgati mahimā nahiṃ goī||
Meaning इस तीर्थराजमें स्नानका फल तत्काल ऐसा देखनेमें आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संगकी महिमा छिपी नहीं है॥ १॥
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
bālamīka nārada ghaṭajonī| nija nija mukhani kahī nija honī||
jalacara thalacara nabhacara nānā| je jaṛa cetana jīva jahānā||
Meaning वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजीने अपने-अपने मुखोंसे अपनी होनी( जीवनका वृत्तान्त) कही है। जलमें रहनेवाले, जमीनपर चलनेवाले और आकाशमें विचरनेवाले नाना प्रकारके जड़- चेतन जितने जीव इस जगतमें हैं,॥ २॥
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
mati kīrati gati bhūti bhalāī| jaba jehiṃ jatana jahām̐ jehiṃ pāī||
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
so jānaba satasaṃga prabhāū| lokahum̐ beda na āna upāū||
Meaning उनमेंसे जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्ससे बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, सो सब सत्संगका ही प्रभाव समझना चाहिये। वेदोंगें और लोकमें इनकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ ३॥
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥
binu satasaṃga bibeka na hoī| rāma kṛpā binu sulabha na soī||
satasaṃgata muda maṃgala mūlā| soi phala sidhi saba sādhana phūlā||
Meaning सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं। सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है। सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं॥ ४॥
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
saṭha sudharahiṃ satasaṃgati pāī| pārasa parasa kudhāta suhāī||
bidhi basa sujana kusaṃgata parahīṃ| phani mani sama nija guna anusarahīṃ||
Meaning दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं ( अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशकों नहीं छोड़ती उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)॥ ५॥
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी॥
bidhi hari hara kabi kobida bānī| kahata sādhu mahimā sakucānī||
सो मो सन कहि जात न कैसें।
साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥
so mo sana kahi jāta na kaiseṃ| sāka banika mani guna gana jaiseṃ||
Meaning ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते॥ ६॥
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ ( क )॥
baṃdaum̐ saṃta samāna cita hita anahita nahiṃ koi|
aṃjali gata subha sumana jimi sama sugaṃdha kara doi|| 3 ( ka )||
Meaning मैं संतोंको प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्तमें समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अज्जलिमें रखे हुए सुन्दर फूल [जिस हाथने फूलोंको तोड़ा और जिसने उनको रखा उन ] दोनों ही हाथोंको समानरूपसे सुगन्धित करते हैं [वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनोंका ही समानरूपसे कल्याण करते हैं]॥ ३ (क)॥
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥ ३ ( ख )॥
saṃta sarala cita jagata hita jāni subhāu sanehu|
bālabinaya suni kari kṛpā rāma carana rati dehu|| 3 ( kha )||
Meaning संत सरलहदय और जगत्के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेहको जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बाल-विनयको सुनकर कृपा करके श्रीरामजीके चरणोंमें मुझे प्रीति दें॥ ३ (ख)॥
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
bahuri baṃdi khala gana satibhāem̐| je binu kāja dāhinehu bāem̐||
para hita hāni lābha jinha kereṃ| ujareṃ haraṣa biṣāda basereṃ||
Meaning अब मैं सच्चे भावसे दुष्टोंको प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करनेवालेके भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरोंके हितकी हानि ही जिनकी दृष्टिमें लाभ है, जिनको दूसरोंके उजड़नेमें हर्ष और बसनेमें विषाद होता है॥ १॥
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
hari hara jasa rākesa rāhu se| para akāja bhaṭa sahasabāhu se||
je para doṣa lakhahiṃ sahasākhī| para hita ghṛta jinha ke mana mākhī||
Meaning जो हरि और हरके यशरूपी पूर्णिमाके चन्द्रमाके लिये राहुके समान हैं( अर्थात् जहाँ कहीं भगवान् विष्णु या शड्धरके यशका वर्णन होता है, उसीमें वे बाधा देते हैं) और दूसरोंकी बुराई करनेमें सहस््रबाहुके समान वीर हैं। जो दूसरोंके दोषोंको हजार आँखोंसे देखते हैं और दूसरोंके हितरूपी घीके लिये जिनका मन मक्खीके समान है( अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घीमें गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरोंके बने-बनाये कामको अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं)॥ २॥
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
teja kṛsānu roṣa mahiṣesā| agha avaguna dhana dhanī dhanesā||
udaya keta sama hita sabahī ke| kuṃbhakarana sama sovata nīke||
Meaning जो तेज (दूसरोंको जलानेवाले ताप) में अग्नि और क्रोधमें यमराजके समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धनमें कुबेरके समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभीके हितका नाश करनेके लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्णकी तरह सोते रहनेमें ही भलाई है॥ ३॥
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
para akāju lagi tanu pariharahīṃ| jimi hima upala kṛṣī dali garahīṃ||
baṃdaum̐ khala jasa seṣa saroṣā| sahasa badana baranai para doṣā||
Meaning जैसे ओले खेतीका नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरोंका काम बिगाड़नेके लिये अपना शरीरतक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टोंको [ हजार मुखवाले] शेषजीके समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषोंका हजार मुखोंसे बड़े रोषके साथ वर्णन करते हैं॥ ४॥
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
puni pranavaum̐ pṛthurāja samānā| para agha sunai sahasa dasa kānā||
bahuri sakra sama binavaum̐ tehī| saṃtata surānīka hita jehī||
Meaning पुन: उनको राजा पृथु (जिन्होंने भगवान्का यश सुननेके लिये दस हजार कान माँगे थे) के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानोंसे दूसरोंके पापोंको सुनते हैं। फिर इन्द्रके समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी और हितकारी मालूम देती है [इन्द्रके लिये भी सुरानीक अर्थात् देवताओंकी सेना हितकारी है]॥५॥
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा।
सहस नयन पर दोष निहारा॥
bacana bajra jehi sadā piārā| sahasa nayana para doṣa nihārā||
Meaning जिनको कठोर वचनरूपी वत्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आँखोंसे दूसरोंके दोषोंको देखते हैं॥ ६॥
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥ ४॥
udāsīna ari mīta hita sunata jarahiṃ khala rīti|
jāni pāni juga jori jana binatī karai saprīti|| 4||
Meaning दुष्ठोंकी यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसीका भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है॥ ४॥
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥
maiṃ apanī disi kīnha nihorā| tinha nija ora na lāuba bhorā||
bāyasa paliahiṃ ati anurāgā| hohiṃ nirāmiṣa kabahum̐ ki kāgā||
Meaning मैंने अपनी ओरसे विनती की है, परन्तु वे अपनी ओरसे कभी नहीं चूकेंगे। कौओंको बड़े प्रेमसे पालिये; परन्तु वे क्या कभी मांसके त्यागी हो सकते हैं ?॥ १॥
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
baṃdaum̐ saṃta asajjana caranā| dukhaprada ubhaya bīca kachu baranā||
bichurata eka prāna hari lehīṃ| milata eka dukha dāruna dehīṃ||
Meaning अब मैं संत और असंत दोनोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दु:ख देते हैं। ( अर्थात् संतोंका बिछुड़ना मरनेके समान दुः:खदायी होता है और असंतोंका मिलना)॥ २॥
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
upajahiṃ eka saṃga jaga māhīṃ| jalaja joṃka jimi guna bilagāhīṃ||
sudhā surā sama sādhū asādhū| janaka eka jaga jaladhi agādhū||
Meaning दोनों (संत और असंत) जगत्में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्शसे सुख देता है, किन्तु जोंक शरीरका स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृतके समान (मृत्युरूपी संसारसे उबारनेवाला) और असाधु मदिराके समान (मोह,प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनोंको उत्पन्न करनेवाला जगदूरूपी अगाध समुद्र एक ही है। [शास्त्रोंमें समुद्रमन्थनसे ही अमृत और मदिरा दोनोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है]॥ ३॥
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥
bhala anabhala nija nija karatūtī| lahata sujasa apaloka bibhūtī||
sudhā sudhākara surasari sādhū| garala anala kalimala sari byādhū||
guna avaguna jānata saba koī| jo jehi bhāva nīka tehi soī||
Meaning भले और बुरे अपनी-अपनी करनीके अनुसार सुन्दर यश और अपयशकी सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गड़्ाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापोंकी नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है॥ ४-५॥
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥ ५॥
bhalo bhalāihi pai lahai lahai nicāihi nīcu|
sudhā sarāhia amaratām̐ garala sarāhia mīcu|| 5||
Meaning भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचताको ही ग्रहण किये रहता है। अमृतकी सराहना अमर करनेमें होती है और विषकी मारनेमें॥ ५॥
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥
khala agha aguna sādhū guna gāhā| ubhaya apāra udadhi avagāhā||
tehi teṃ kachu guna doṣa bakhāne| saṃgraha tyāga na binu pahicāne||
Meaning दुष्टोंके पापों और अवगुणोंकी और साधुओंके गुणोंकी कथाएँ--दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। इसीसे कुछ गुण और दोषोंका वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता॥ १॥
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥
bhaleu poca saba bidhi upajāe| gani guna doṣa beda bilagāe||
kahahiṃ beda itihāsa purānā| bidhi prapaṃcu guna avaguna sānā||
Meaning भले, बुरे सभी ब्रह्माके पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषोंको विचारकर वेदोंने उनको अलग-अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्माकी यह सृष्टि गुण- अवगुणोंसे सनी हुई है॥ २॥
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥
dukha sukha pāpa punya dina rātī| sādhu asādhu sujāti kujātī||
dānava deva ūm̐ca aru nīcū| amia sujīvanu māhuru mīcū||
māyā brahma jīva jagadīsā| lacchi alacchi raṃka avanīsā||
kāsī maga surasari kramanāsā| maru mārava mahideva gavāsā||
saraga naraka anurāga birāgā| nigamāgama guna doṣa bibhāgā||
Meaning दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुन्दर जीवन) -मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गड़ा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, [ ये सभी पदार्थ ब्रह्माकी सृष्टिमें हैं।] वेद-शास्त्रोंने उनके गुण-दोषोंका विभाग कर दिया है॥ ३--५॥
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥ ६॥
jaṛa cetana guna doṣamaya bisva kīnha karatāra|
saṃta haṃsa guna gahahiṃ paya parihari bāri bikāra|| 6||
Meaning विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं॥ ६॥
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई॥
asa bibeka jaba dei bidhātā| taba taji doṣa gunahiṃ manu rātā||
kāla subhāu karama bariāī| bhaleu prakṛti basa cukai bhalāī||
Meaning विधाता जब इस प्रकारका (हंसका-सा) विवेक देते हैं, तब दोषोंको छोड़कर मन गु्णोंमें अनुरक्त होता है। काल-स्वभाव और कर्मकी प्रबलतासे भले लोग (साधु) भी मायाके वशमें होकर कभी-कभी भलाईसे चूक जाते हैं॥ १॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
so sudhāri harijana jimi lehīṃ| dali dukha doṣa bimala jasu dehīṃ||
khalau karahiṃ bhala pāi susaṃgū| miṭai na malina subhāu abhaṃgū||
Meaning भगवान्के भक्त जैसे उस चूकको सुधार लेते हैं और दु:ख-दोषोंको मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम सड्ध पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होनेवाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥ २॥
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
lakhi subeṣa jaga baṃcaka jeū| beṣa pratāpa pūjiahiṃ teū||
udharahiṃ aṃta na hoi nibāhū| kālanemi jimi rāvana rāhū||
Meaning जो [वेषधारी] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधुका-सा) वेष बनाये देखकर वेषके प्रतापसे जगत् पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अन्ततक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहुका हाल हुआ॥ ३॥
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥
kiehum̐ kubeṣa sādhu sanamānū| jimi jaga jāmavaṃta hanumānū||
hāni kusaṃga susaṃgati lāhū| lokahum̐ beda bidita saba kāhū||
Meaning बुरा वेष बना लेनेपर भी साधुका सम्मान ही होता है, जैसे जगतमें जाम्बवान् और हनुमानूजीका हुआ। बुरे संगसे हानि और अच्छे संगसे लाभ होता है, यह बात लोक और वेदमें है और सभी लोग इसको जानते हैं॥ ४॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी॥
gagana caṛhai raja pavana prasaṃgā| kīcahiṃ milai nīca jala saṃgā||
sādhu asādhu sadana suka sārīṃ| sumirahiṃ rāma dehiṃ gani gārī||
Meaning पवनके संगसे धूल आकाशपर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचेकी ओर बहनेवाले) जलके संगसे कीचड़में मिल जाती है। साधुके घरके तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधुके घरके तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं॥ ५॥
धूम कुसंगति कारिख होई।
लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
dhūma kusaṃgati kārikha hoī| likhia purāna maṃju masi soī||
सोइ जल अनल अनिल संघाता।
होइ जलद जग जीवन दाता॥
soi jala anala anila saṃghātā| hoi jalada jaga jīvana dātā||
Meaning कुसंगके कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [सुसंगसे] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखनेके काममें आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवनके संगसे बादल होकर जगत्को जीवन देनेवाला बन जाता है॥ ६॥
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥ ७ (कक,
graha bheṣaja jala pavana paṭa pāi kujoga sujoga|
hohi kubastu subastu jaga lakhahiṃ sulacchana loga|| 7 (kaka,
Meaning ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र-ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसारमें बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बातको जान पाते हैं॥ ७ (क)॥
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥ ७ ( ख )॥
sama prakāsa tama pākha duhum̐ nāma bheda bidhi kīnha|
sasi soṣaka poṣaka samujhi jaga jasa apajasa dīnha|| 7 ( kha )||
Meaning महीनेके दोनों पखवाड़ोंगें उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाताने इनके नाममें भेद कर दिया है (एकका नाम शुक्ल और दूसरेका नाम कृष्ण रख दिया)। एकको चन्द्रमाका बढ़ानेवाला और दूसरेको उसका घटानेवाला समझकर जगत्ने एकको सुयश और दूसरेको अपयश दे दिया॥ ७ (ख)॥
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥ ७ ( ग )॥
jaṛa cetana jaga jīva jata sakala rāmamaya jāni|
baṃdaum̐ saba ke pada kamala sadā jori juga pāni|| 7 ( ga )||
Meaning जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ॥ ७ (ग)॥
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥ ७ (घ )॥
deva danuja nara nāga khaga preta pitara gaṃdharba|
baṃdaum̐ kiṃnara rajanicara kṛpā karahu aba sarba|| 7 (gha )||
Meaning देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूँ। अब सब मुझपर कृपा कीजिये॥ ७ (घ)॥