देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥ २६६॥
dekhahu rāmahi nayana bhari taji iriṣā madu kohu|
lakhana roṣu pāvaku prabala jāni salabha jani hohu|| 266||
Meaning ईर्ष्या, घमंड और क्रोध छोड़कर नेत्र भरकर श्रीरामजी [की छवि] को देख लो। लक्ष्मणके क्रोधको प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे मत बनो॥ २६६॥
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥
bainateya bali jimi caha kāgū| jimi sasu cahai nāga ari bhāgū||
jimi caha kusala akārana kohī| saba saṃpadā cahai sivadrohī||
Meaning जैसे गरुड़का भाग कौआ चाहे, सिंहका भाग खरगोश चाहे, बिना कारण ही क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, शिवजीसे विरोध करनेवाला सब प्रकारकी सम्पत्ति चाहे,॥ १॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥
हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥
lobhī lolupa kala kīrati cahaī| akalaṃkatā ki kāmī lahaī||
hari pada bimukha parama gati cāhā| tasa tumhāra lālacu naranāhā||
Meaning लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है ? और जैसे श्रीहरिके चरणोंसे विमुख मनुष्य परमगति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ ! सीताके लिये तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है॥ २॥
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥
kolāhalu suni sīya sakānī| sakhīṃ lavāi gaīṃ jaham̐ rānī||
rāmu subhāyam̐ cale guru pāhīṃ| siya sanehu baranata mana māhīṃ||
Meaning कोलाहल सुनकर सीताजी शंकित हो गयीं। तब सखियाँ उन्हें वहाँ ले गयीं जहाँ रानी (सीताजीकी माता) थीं। श्रीरामचन्द्रजी मनमें सीताजीके प्रेमका बखान करते हुए स्वाभाविक चालसे गुरुजीके पास चले॥ ३॥
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥
rāninha sahita socabasa sīyā| aba dhauṃ bidhihi kāha karanīyā||
bhūpa bacana suni ita uta takahīṃ| lakhanu rāma ḍara boli na sakahīṃ||
Meaning रानियोंसहित सीताजी [दुष्ट राजाओंके दुर्वचन सुनकर] सोचके वश हैं कि न जाने विधाता अब क्या करनेवाले हैं। राजाओंके वचन सुनकर लक्ष्मणजी इधर-उधर ताकते हैं; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके डरसे कुछ बोल नहीं सकते॥ ४॥
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप॥ २६७॥
aruna nayana bhṛkuṭī kuṭila citavata nṛpanha sakopa|
manahum̐ matta gajagana nirakhi siṃghakisorahi copa|| 267||
Meaning उनके नेत्र लाल और भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वे क्रोधसे राजाओंकी ओर देखने लगे; मानो मतवाले हाथियोंका झुंड देखकर सिंहके बच्चेको जोश आ गया हो॥ २६७॥
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा॥
kharabharu dekhi bikala pura nārīṃ| saba mili dehiṃ mahīpanha gārīṃ||
tehiṃ avasara suni siva dhanu bhaṃgā| āyasu bhṛgukula kamala pataṃgā||
Meaning खलबली देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं और सब मिलकर राजाओंको गालियाँ देने लगीं। उसी मौकेपर शिवजीके धनुषका टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमलके सूर्य परशुरामजी आये॥ १॥
देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥
dekhi mahīpa sakala sakucāne| bāja jhapaṭa janu lavā lukāne||
gauri sarīra bhūti bhala bhrājā| bhāla bisāla tripuṃḍa birājā||
Meaning इन्हें देखकर सब राजा सकुचा गये, मानो बाजके झपटनेपर बटेर लुक (छिप) गये हों। गोरे शरीरपर विभूति ( भस्म) बड़ी फब रही है और विशाल ललाटपर त्रिपुण्ड़ विशेष शोभा दे रहा है॥ २॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥
sīsa jaṭā sasibadanu suhāvā| risabasa kachuka aruna hoi āvā||
bhṛkuṭī kuṭila nayana risa rāte| sahajahum̐ citavata manahum̐ risāte||
Meaning सिरपर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोधके कारण कुछ लाल हो आया है। भौंहें टेढ़ी और आँखें क्रोधसे लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं॥ ३॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥
कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥
bṛṣabha kaṃdha ura bāhu bisālā| cāru janeu māla mṛgachālā||
kaṭi muni basana tūna dui bām̐dheṃ| dhanu sara kara kuṭhāru kala kām̐dheṃ||
Meaning बैलके समान (ऊँचे और पुष्ट) कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवबीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमरमें मुनियोंका वस्त्र (वल्कल) और दो तरकस बाँधे हैं। हाथमें धनुष-बाण और सुन्दर कंधेपर फरसा धारण किये हैं॥ ४॥
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥ २६८॥
sāṃta beṣu karanī kaṭhina barani na jāi sarupa|
dhari munitanu janu bīra rasu āyau jaham̐ saba bhūpa|| 268||
Meaning शान्त वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर है; स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर- रस ही मुनिका शरीर धारण करके, जहाँ सब राजालोग हैं वहाँ आ गया हो॥ २६८॥
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
dekhata bhṛgupati beṣu karālā| uṭhe sakala bhaya bikala bhuālā||
pitu sameta kahi kahi nija nāmā| lage karana saba daṃḍa pranāmā||
Meaning परशुरामजीका भयानक वेष देखकर सब राजा भयसे व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह-कहकर सब दण्डव्त्-प्रणाम करने लगे॥ १॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
jehi subhāyam̐ citavahiṃ hitu jānī| so jānai janu āi khuṭānī||
janaka bahori āi siru nāvā| sīya bolāi pranāmu karāvā||
Meaning परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी। फिर जनकजीने आकर सिर नवाया और सीताजीको बुलाकर प्रणाम कराया॥ २॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
āsiṣa dīnhi sakhīṃ haraṣānīṃ| nija samāja lai gaī sayānīṃ||
bisvāmitru mile puni āī| pada saroja mele dou bhāī||
Meaning परशुरामजीने सीताजीको आशीर्वाद दिया। सखियाँ हर्षित हुई और [वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर] वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डलीमें ले गयीं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयोंको उनके चरणकमलोंपर गिराया॥ ३॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
rāmu lakhanu dasaratha ke ḍhoṭā| dīnhi asīsa dekhi bhala joṭā||
rāmahi citai rahe thaki locana| rūpa apāra māra mada mocana||
Meaning [ विश्वामित्रजीने कहा--] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथके पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजीने आशीर्वाद दिया। कामदेवके भी मदको छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजीके अपार रूपको देखकर उनके नेत्र थकित (स्तम्भित) हो रहे॥ ४॥
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥ २६९॥
bahuri biloki bideha sana kahahu kāha ati bhīra|
pūchata jāni ajāna jimi byāpeu kopu sarīra|| 269||
Meaning फिर सब देखकर, जानते हुए भी अनजानकी तरह जनकजीसे पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है ? उनके शरीरमें क्रोध छा गया॥ २६९॥
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
samācāra kahi janaka sunāe| jehi kārana mahīpa saba āe||
sunata bacana phiri anata nihāre| dekhe cāpakhaṃḍa mahi ḍāre||
Meaning जिस कारण सब राजा आये थे, राजा जनकने वे सब समाचार कह सुनाये। जनकके वचन सुनकर परशुरामजीने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुषके टुकड़े पृथ्वीपर पड़े हुए दिखायी दिये॥ १॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
ati risa bole bacana kaṭhorā| kahu jaṛa janaka dhanuṣa kai torā||
begi dekhāu mūṛha na ta ājū| ulaṭaum̐ mahi jaham̐ lahi tava rājū||
Meaning अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे कठोर वचन बोले-रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा ? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँतक तेरा राज्य है, वहाँतककी पृथ्वी उलट दूँगा॥ २॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
ati ḍaru utaru deta nṛpu nāhīṃ| kuṭila bhūpa haraṣe mana māhīṃ||
sura muni nāga nagara nara nārī| socahiṃ sakala trāsa ura bhārī||
Meaning राजाको अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते। यह देखकर कुटिल राजा मनमें बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगरके स्त्री-पुरुष सभी सोच करने लगे, सबके हृदयमें बड़ा भय है॥ ३॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
mana pachitāti sīya mahatārī| bidhi aba sam̐varī bāta bigārī||
bhṛgupati kara subhāu suni sītā| aradha nimeṣa kalapa sama bītā||
Meaning सीताजीकी माता मनमें पछता रही हैं कि हाय! विधाताने अब बनी-बनायी बात बिगाड़ दी। परशुरामजीका स्वभाव सुनकर सीताजीको आधा क्षण भी कल्पके समान बीतने लगा॥ ४॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ २७०॥
sabhaya biloke loga saba jāni jānakī bhīru|
hṛdayam̐ na haraṣu biṣādu kachu bole śrīraghubīru|| 270||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजी सब लोगोंको भयभीत देखकर और सीताजीको डरी हुई जानकर बोले-- उनके हृदयमें न कुछ हर्ष था, न विषाद--॥ २७०॥
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
nātha saṃbhudhanu bhaṃjanihārā| hoihi keu eka dāsa tumhārā||
āyasu kāha kahia kina mohī| suni risāi bole muni kohī||
Meaning हे नाथ! शिवजीके धनुषको तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते ? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले--॥ १॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
sevaku so jo karai sevakāī| ari karanī kari karia larāī||
sunahu rāma jehiṃ sivadhanu torā| sahasabāhu sama so ripu morā||
Meaning सेवक वह है जो सेवाका काम करे। शत्रुका काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिये। हे राम! सुनो, जिसने शिवजीके धनुषको तोड़ा है, वह सहस्रबाहुके समान मेरा शत्रु है॥ २॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
so bilagāu bihāi samājā| na ta māre jaihahiṃ saba rājā||
suni muni bacana lakhana musukāne| bole parasudharahi apamāne||
Meaning वह इस समाजको छोड़कर अलग हो जाय, नहीं तो सभी राजा मारे जायँँगे। मुनिके वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकराये और परशुरामजीका अपमान करते हुए बोले--॥ ३॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
bahu dhanuhīṃ torīṃ larikāīṃ| kabahum̐ na asi risa kīnhi gosāīṃ||
ehi dhanu para mamatā kehi hetū| suni risāi kaha bhṛgukulaketū||
Meaning हे गोसाईं! लड़कपनमें हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं। किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुषपर इतनी ममता किस कारणसे है ? यह सुनकर भृगुवंशकी ध्वजास्वरूप परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे--॥ ४॥
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥ २७१॥
re nṛpa bālaka kālabasa bolata tohi na sam̐māra|
dhanuhī sama tipurāri dhanu bidita sakala saṃsāra|| 271||
Meaning अरे राजपुत्र! कालके वश होनेसे तुझे बोलनेमें कुछ भी होश नहीं है। सारे संसारमें विख्यात शिवजीका यह धनुष क्या धनुहीके समान है ?॥ २७१॥
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥
का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें॥
lakhana kahā ham̐si hamareṃ jānā| sunahu deva saba dhanuṣa samānā||
kā chati lābhu jūna dhanu taureṃ| dekhā rāma nayana ke bhoreṃ||
Meaning लक्ष्मणजीने हँसकर कहा--हे देव! सुनिये, हमारे जानमें तो सभी धनुष एक-से ही हैं। पुराने धनुषके तोड़नेमें क्या हानि-लाभ! श्रीरामचन्द्रजीने तो इसे नवीनके धोखेसे देखा था॥ १॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥
chuata ṭūṭa raghupatihu na dosū| muni binu kāja karia kata rosū||
bole citai parasu kī orā| re saṭha sunehi subhāu na morā||
Meaning फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजीका भी कोई दोष नहीं है। मुनि! आप बिना ही कारण किसलिये क्रोध करते हैं ? परशुरामजी अपने फरसेकी ओर देखकर बोले--अआरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना॥ २॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥
bālaku boli badhaum̐ nahiṃ tohī| kevala muni jaṛa jānahi mohī||
bāla brahmacārī ati kohī| bisva bidita chatriyakula drohī||
Meaning मैं तुझे बालक जानकर नहीं मारता हूँ। अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही जानता है? मैं बालब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ। क्षत्रियकुलका शत्रु तो विश्वभरमें विख्यात हूँ॥ ३॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥
bhujabala bhūmi bhūpa binu kīnhī| bipula bāra mahidevanha dīnhī||
sahasabāhu bhuja chedanihārā| parasu biloku mahīpakumārā||
Meaning अपनी भुजाओंके बलसे मैंने पृथ्वीको राजाओंसे रहित कर दिया और बहुत बार उसे ब्राह्मणोंको दे डाला। हे राजकुमार! सहस्रबाहुकी भुजाओंको काटनेवाले मेरे इस फरसेको देख!॥ ४॥
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥ २७२॥
mātu pitahi jani socabasa karasi mahīsakisora|
garbhanha ke arbhaka dalana parasu mora ati ghora|| 272||
Meaning अरे राजाके बालक! तू अपने माता-पिताको सोचके वश न कर। मेरा फरसा बड़ा भयानक है, यह गर्भोके बच्चोंका भी नाश करनेवाला है॥ २७२॥
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥
bihasi lakhanu bole mṛdu bānī| aho munīsu mahā bhaṭamānī||
puni puni mohi dekhāva kuṭhārū| cahata uṛāvana phūm̐ki pahārū||
Meaning लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणीसे बोले--अहो, मुनीश्वर तो अपनेको बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हैं। फूँकसे पहाड़ उड़ाना चाहते हैं॥ १॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥
ihām̐ kumhaṛabatiyā kou nāhīṃ| je tarajanī dekhi mari jāhīṃ||
dekhi kuṭhāru sarāsana bānā| maiṃ kachu kahā sahita abhimānā||
Meaning यहाँ कोई कुम्हड़ेकी बतिया (छोटा कच्चा फल) नहीं है, जो तर्जनी (सबसे आगेकी ) उँगलीको देखते ही मर जाती हैं। कुठार और धनुष-बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमानसहित कहा था॥ २॥
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥
bhṛgusuta samujhi janeu bilokī| jo kachu kahahu sahaum̐ risa rokī||
sura mahisura harijana aru gāī| hamareṃ kula inha para na surāī||
Meaning भृगुवंशी समझकर और यज्ञोपवीत देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोधको रोककर सह लेता हूँ। देवता, ब्राह्मण, भगवान्के भक्त और गौ--इनपर हमारे कुलमें वीरता नहीं दिखायी जाती॥ ३॥
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥
badheṃ pāpu apakīrati hāreṃ| māratahūm̐ pā paria tumhāreṃ||
koṭi kulisa sama bacanu tumhārā| byartha dharahu dhanu bāna kuṭhārā||
Meaning क्योंकि इन्हें मारनेसे पाप लगता है और इनसे हार जानेपर अपकीर्ति होती है। इसलिये आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज़ोंके समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं॥ ४॥
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥ २७३॥
jo biloki anucita kaheum̐ chamahu mahāmuni dhīra|
suni saroṣa bhṛgubaṃsamani bole girā gabhīra|| 273||
Meaning इन्हें (धनुष-बाण और कुठारको) देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो, तो उसे हे धीर महामुनि! क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोधके साथ गम्भीर वाणी बोले--॥ २७३॥
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥
भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥
kausika sunahu maṃda yahu bālaku| kuṭila kālabasa nija kula ghālaku||
bhānu baṃsa rākesa kalaṃkū| nipaṭa niraṃkusa abudha asaṃkū||
Meaning हे विधामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, कालके वश होकर यह अपने कुलका घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्रका कलड्ठू है। यह बिलकुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है॥ १॥
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥
kāla kavalu hoihi chana māhīṃ| kahaum̐ pukāri khori mohi nāhīṃ||
tumha haṭakau jauṃ cahahu ubārā| kahi pratāpu balu roṣu hamārā||
Meaning अभी क्षणभरमें यह कालका ग्रास हो जायगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो॥ २॥
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥
lakhana kaheu muni sujasa tumhārā| tumhahi achata ko baranai pārā||
apane mum̐ha tumha āpani karanī| bāra aneka bhām̐ti bahu baranī||
Meaning लक्ष्मणजीने कहा--हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है? आपने अपने ही मुँहसे अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकारसे वर्णन की है॥ ३॥
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥
nahiṃ saṃtoṣu ta puni kachu kahahū| jani risa roki dusaha dukha sahahū||
bīrabratī tumha dhīra achobhā| gārī deta na pāvahu sobhā||
Meaning इतनेपर भी सन्तोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असद्य दुःख मत सहिये। आप वीरताका व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते॥ ४॥
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ २७४॥
sūra samara karanī karahiṃ kahi na janāvahiṃ āpu|
bidyamāna rana pāi ripu kāyara kathahiṃ pratāpu|| 274||
Meaning शूरवीर तो युद्धमें करनी (शूरवीरताका कार्य) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते। शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं॥ २७४॥
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥
tumha tau kālu hām̐ka janu lāvā| bāra bāra mohi lāgi bolāvā||
sunata lakhana ke bacana kaṭhorā| parasu sudhāri dhareu kara ghorā||
Meaning आप तो मानो कालको हाँक लगाकर बार-बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं। लक्ष्मणजीके कठोर वचन सुनते ही परशुरामजीने अपने भयानक फरसेको सुधारकर हाथमें ले लिया॥ १॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥
aba jani dei dosu mohi logū| kaṭubādī bālaku badhajogū||
bāla biloki bahuta maiṃ bām̐cā| aba yahu maranihāra bhā sām̐cā||
Meaning [और बोले-] अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़आ बोलनेवाला बालक मारे जानेके ही योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरनेको ही आ गया है॥ २॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥
kausika kahā chamia aparādhū| bāla doṣa guna ganahiṃ na sādhū||
khara kuṭhāra maiṃ akaruna kohī| āgeṃ aparādhī gurudrohī||
Meaning विश्वामित्रजीने कहा--अपराध क्षमा कीजिये। बालकोंके दोष और गुणको साधुलोग नहीं गिनते। [ परशुरामजी बोले-] तीखी धारका कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने--॥ ३॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥
utara deta choṛaum̐ binu māreṃ| kevala kausika sīla tumhāreṃ||
na ta ehi kāṭi kuṭhāra kaṭhoreṃ| gurahi urina hoteum̐ śrama thoreṃ||
Meaning उत्तर दे रहा है। इतनेपर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विधामित्र! केवल तुम्हारे शील (प्रेम) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठारसे काटकर थोड़े ही परिश्रमसे गुरुसे उकऋण हो जाता॥ ४॥
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥ २७५॥
gādhisūnu kaha hṛdayam̐ ham̐si munihi hariarai sūjha|
ayamaya khām̐ḍa na ūkhamaya ajahum̐ na būjha abūjha|| 275||
Meaning विश्वामित्रजीने हदयमें हँसकर कहा-मुनिको हरा-ही-हरा सूझ रहा है ( अर्थात् सर्वत्र विजयी होनेके कारण ये श्रीराम-लक्ष्मणको भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी (केवल फौलादकी बनी हुई) खाँड़ (खाँड़ा-खड्ग) है, ऊखकी (रसकी) खाँड़ नहीं है [जो मुँहमें लेते ही गल जाय। खेद है, ] मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभावको नहीं समझ रहे हैं॥ २७५॥
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा॥
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥
kaheu lakhana muni sīlu tumhārā| ko nahi jāna bidita saṃsārā||
mātā pitahi urina bhae nīkeṃ| gura rinu rahā socu baṛa jīkeṃ||
Meaning लक्ष्मणजीने कहा--हे मुनि! आपके शीलको कौन नहीं जानता ? वह संसारभरमें प्रसिद्ध है। आप माता-पितासे तो अच्छी तरह उकऋण हो ही गये, अब गुरुका ऋण रहा, जिसका जीमें बड़ा सोच लगा है॥ १॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥
so janu hamarehi māthe kāṛhā| dina cali gae byāja baṛa bāṛhā||
aba ānia byavahariā bolī| turata deum̐ maiṃ thailī kholī||
Meaning वह मानो हमारे ही मत्थे काढ़ा था। बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब करनेवालेको बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ॥ २॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥
भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही॥
suni kaṭu bacana kuṭhāra sudhārā| hāya hāya saba sabhā pukārā||
bhṛgubara parasu dekhāvahu mohī| bipra bicāri bacaum̐ nṛpadrohī||
Meaning लक्ष्मणजीके कड़वे वचन सुनकर परशुरामजीने कुठार सँभाला। सारी सभा हाय! हाय! करके पुकार उठी। [ लक्ष्मणजीने कहा--] हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं ? पर हे राजाओंके शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ (तरह दे रहा हूँ)॥ ३॥
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥
mile na kabahum̐ subhaṭa rana gāṛhe| dvija devatā gharahi ke bāṛhe||
anucita kahi saba loga pukāre| raghupati sayanahiṃ lakhanu nevāre||
Meaning आपको ' कभी रणधीर बलवान् वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता! आप घरहीमें बड़े हैं। यह सुनकर अनुचित है, अनुचित है' कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजीने इशारेसे लक्ष्मणजीको रोक दिया॥ ४॥
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥ २७६॥
lakhana utara āhuti sarisa bhṛgubara kopu kṛsānu|
baṛhata dekhi jala sama bacana bole raghukulabhānu|| 276||
Meaning लक्ष्मणजीके उत्तरसे, जो आहुतिके समान थे, परशुरामजीके क्रोधरूपी अग्निको बढ़ते देखकर रघुकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जलके समान (शान्त करनेवाले) वचन बोले--॥ २७६॥
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥
nātha karahu bālaka para chohū| sūdha dūdhamukha karia na kohū||
jauṃ pai prabhu prabhāu kachu jānā| tau ki barābari karata ayānā||
Meaning हे नाथ! बालकपर कृपा कीजिये। इस सीधे और दुधमुँहे बच्चेपर क्रोध न कीजिये। यदि यह प्रभुका (आपका) कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता ?॥ १॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥
jauṃ larikā kachu acagari karahīṃ| gura pitu mātu moda mana bharahīṃ||
karia kṛpā sisu sevaka jānī| tumha sama sīla dhīra muni gyānī||
Meaning बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता मनमें आनन्दसे भर जाते हैं। अत: इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये। आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं॥ २॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने॥
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥
rāma bacana suni kachuka juṛāne| kahi kachu lakhanu bahuri musakāne||
ham̐sata dekhi nakha sikha risa byāpī| rāma tora bhrātā baṛa pāpī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतनेमें लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुसकरा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजीके नखसे शिखातक (सारे शरीरमें ) क्रोध छा गया। उन्होंने कहा--हे राम! तेरा भाई बड़ा पापी है॥ ३॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं॥
gaura sarīra syāma mana māhīṃ| kālakūṭamukha payamukha nāhīṃ||
sahaja ṭeṛha anuharai na tohī| nīcu mīcu sama dekha na mauhīṃ||
Meaning यह शरीरसे गोरा, पर हृदयका बड़ा काला है। यह विषमुख है, दुधमुँहा नहीं। स्वभावसे ही टेढ़ा है, तेरा अनुसरण नहीं करता (तेरे-जैसा शीलवान् नहीं है)। यह नीच मुझे कालके समान नहीं देखता॥ ४॥
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥ २७७॥
lakhana kaheu ham̐si sunahu muni krodhu pāpa kara mūla|
jehi basa jana anucita karahiṃ carahiṃ bisva pratikūla|| 277||
Meaning लक्ष्मणजीने हँसकर कहा--हे मुनि! सुनिये, क्रोध पापका मूल है, जिसके वशमें होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभरके प्रतिकूल चलते (सबका अहित करते) हैं॥ २७७॥
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥
maiṃ tumhāra anucara munirāyā| parihari kopu karia aba dāyā||
ṭūṭa cāpa nahiṃ jurahi risāne| baiṭhia hoihiṃ pāya pirāne||
Meaning हे मुनिराज! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया कीजिये। टूटा हुआ धनुष क्रोध करनेसे जुड़ नहीं जायगा। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये॥ १॥
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥
jau ati priya tau karia upāī| joria kou baṛa gunī bolāī||
bolata lakhanahiṃ janaku ḍerāhīṃ| maṣṭa karahu anucita bhala nāhīṃ||
Meaning यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी ( कारीगर )को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजीके बोलनेसे जनकजी डर जाते हैं और कहते है--बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं॥ २॥
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥
thara thara kāpahiṃ pura nara nārī| choṭa kumāra khoṭa baṛa bhārī||
bhṛgupati suni suni nirabhaya bānī| risa tana jarai hoi bala hānī||
Meaning जनकपुरके स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं [और मन-ही-मन कह रहे हैं कि] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजीकी निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजीका शरीर क्रोधसे जला जा रहा है और उनके बलकी हानि हो रही है (उनका बल घट रहा है)॥ ३॥
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं॥
bole rāmahi dei nihorā| bacaum̐ bicāri baṃdhu laghu torā||
manu malīna tanu suṃdara kaiseṃ| biṣa rasa bharā kanaka ghaṭu jaisaiṃ||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीपर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले--तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मनका मैला और शरीरका कैसा सुन्दर है, जैसे विषके रससे भरा हुआ सोनेका घड़ा !॥ ४॥
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥ २७८॥
suni lachimana bihase bahuri nayana tarere rāma|
gura samīpa gavane sakuci parihari bānī bāma|| 278||
Meaning यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजीने तिरछी नजरसे उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजीके पास चले गये॥ २७८॥
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥
ati binīta mṛdu sītala bānī| bole rāmu jori juga pānī||
sunahu nātha tumha sahaja sujānā| bālaka bacanu karia nahiṃ kānā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनयके साथ कोमल और शीतल वाणी बोले-- हे नाथ! सुनिये, आप तो स्वभावसे ही सुजान हैं। आप बालकके वचनपर कान न कीजिये (उसे सुना-अनसुना कर दीजिये)॥ १॥
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा॥
bararai bālaka eku subhāū| inhahi na saṃta bidūṣahiṃ kāū||
tehiṃ nāhīṃ kachu kāja bigārā| aparādhī meṃ nātha tumhārā||
Meaning बरँँ और बालकका एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मणने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ॥ २॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥
kṛpā kopu badhu bam̐dhaba gosāīṃ| mo para karia dāsa kī nāī||
kahia begi jehi bidhi risa jāī| munināyaka soi karauṃ upāī||
Meaning अत: हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दासकी तरह (अर्थात् दास समझकर) मुझपर कीजिये। जिस प्रकारसे शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज! बताइये, मैं वही उपाय करूँ॥ ३॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥
kaha muni rāma jāi risa kaiseṃ| ajahum̐ anuja tava citava anaiseṃ||
ehi ke kaṃṭha kuṭhāru na dīnhā| tau maiṃ kāha kopu kari kīnhā||
Meaning मुनिने कहा--हे राम! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। इसकी गर्दनपर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या?॥ ४॥
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥ २७९॥
garbha stravahiṃ avanipa ravani suni kuṭhāra gati ghora|
parasu achata dekhaum̐ jiata bairī bhūpakisora|| 279||
Meaning मेरे जिस कुठारकी घोर करनी सुनकर राजाओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसेके रहते मैं इस शत्रु राजपुत्रको जीवित देख रहा हूँ॥ २७९॥
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥
bahai na hāthu dahai risa chātī| bhā kuṭhāru kuṃṭhita nṛpaghātī||
bhayau bāma bidhi phireu subhāū| more hṛdayam̐ kṛpā kasi kāū||
Meaning हाथ चलता नहीं, क्रोधसे छाती जली जाती है। [हाय !] राजाओंका घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदयमें किसी समय भी कृपा कैसी ?॥ १॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥
āju dayā dukhu dusaha sahāvā| suni saumitra bihasi siru nāvā||
bāu kṛpā mūrati anukūlā| bolata bacana jharata janu phūlā||
Meaning आज दया मुझे यह दु:सह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजीने मुसकराकर सिर नवाया [और कहा--] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्तिके अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं!॥ २॥
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥
jauṃ pai kṛpām̐ jarihiṃ muni gātā| krodha bhaem̐ tanu rākha bidhātā||
dekhu janaka haṭhi bālaka ehū| kīnha cahata jaṛa jamapura gehū||
Meaning हे मुनि! यदि कृपा करनेसे आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होनेपर तो शरीरकी रक्षा विधाता ही करेंगे। [ परशुरामजीने कहा--] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरीमें घर (निवास) करना चाहता है॥ ३॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा॥
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥
begi karahu kina ām̐khinha oṭā| dekhata choṭa khoṭa nṛpa ḍhoṭā||
bihase lakhanu kahā mana māhīṃ| mūdeṃ ām̐khi katahum̐ kou nāhīṃ||
Meaning इसको शीघ्र ही आँखोंकी ओट क्यों नहीं करते ? यह राजपुत्र देखनेमें छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजीने हँसकर मन-ही-मन कहा-आँख मूँद लेनेपर कहीं कोई नहीं है॥ ४॥
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥ २८०॥
parasurāmu taba rāma prati bole ura ati krodhu|
saṃbhu sarāsanu tori saṭha karasi hamāra prabodhu|| 280||
Meaning तब परशुरामजी हृदयमें अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजीसे बोले--अरे शठ! तू शिवजीका धनुष तोड़कर उलटा हमींको ज्ञान सिखाता है!॥ २८०॥
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥
baṃdhu kahai kaṭu saṃmata toreṃ| tū chala binaya karasi kara joreṃ||
karu paritoṣu mora saṃgrāmā| nāhiṃ ta chāṛa kahāuba rāmā||
Meaning तेरा यह भाई तेरी ही सम्मतिसे कटु वचन बोलता है और तू छलसे हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्धमें मेरा सन्तोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे॥ श१॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ॥
chalu taji karahi samaru sivadrohī| baṃdhu sahita na ta māraum̐ tohī||
bhṛgupati bakahiṃ kuṭhāra uṭhāem̐| mana musakāhiṃ rāmu sira nāem̐||
Meaning अरे शिवद्रोही ! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बक रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ २॥
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥
gunaha lakhana kara hama para roṣū| katahum̐ sudhāihu te baṛa doṣū||
ṭeṛha jāni saba baṃdai kāhū| bakra caṃdramahi grasai na rāhū||
Meaning [ श्रीरामचन्द्रजीने मन-ही-मन कहा--] गुनाह (दोष) तो लक्ष्मणका और क्रोध मुझपर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपनमें भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसीकी भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमाको राहु भी नहीं ग्रसता॥ ३॥
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी॥
rāma kaheu risa tajia munīsā| kara kuṭhāru āgeṃ yaha sīsā||
jeṃhiṃ risa jāi karia soi svāmī| mohi jāni āpana anugāmī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने [प्रकट] कहा--हे मुनीधर! क्रोध छोड़िये। आपके हाथमें कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी ! वही कीजिये। मुझे अपना अनुचर (दास) जानिये॥ ४॥
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥ २८१॥
prabhuhi sevakahi samaru kasa tajahu biprabara rosu|
beṣu bilokeṃ kahesi kachu bālakahū nahiṃ dosu|| 281||
Meaning स्वामी और सेवकमें युद्ध कैसा? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! क्रोधका त्याग कीजिये। आपका [वीरोंका-सा] वेष देखकर ही बालकने कुछ कह डाला था; वास्तवमें उसका भी कोई दोष नहीं है॥ २८१॥
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा॥
dekhi kuṭhāra bāna dhanu dhārī| bhai larikahi risa bīru bicārī||
nāmu jāna pai tumhahi na cīnhā| baṃsa subhāyam̐ utaru teṃhiṃ dīnhā||
Meaning आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालकको क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश (रघुवंश ) के स्वभावके अनुसार उसने उत्तर दिया॥ १॥
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥
छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥
jauṃ tumha autehu muni kī nāīṃ| pada raja sira sisu dharata gosāīṃ||
chamahu cūka anajānata kerī| cahia bipra ura kṛpā ghanerī||
Meaning यदि आप मुनिकी तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणोंकी धूलि सिरपर रखता। अनजानेकी भूलको क्षमा कर दीजिये। ब्राह्मणोंके हृदयमें बहुत अधिक दया होनी चाहिये॥ २॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा
hamahi tumhahi saribari kasi nāthā| kahahu na kahām̐ carana kaham̐ māthā||
rāma mātra laghu nāma hamārā| parasu sahita baṛa nāma tohārā
Meaning हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम॥ ३॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥
deva eku gunu dhanuṣa hamāreṃ| nava guna parama punīta tumhāreṃ||
saba prakāra hama tumha sana hāre| chamahu bipra aparādha hamāre||
Meaning हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता--ये] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकारसे आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधोंको क्षमा कीजिये॥ ४॥
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥ २८२॥
bāra bāra muni biprabara kahā rāma sana rāma|
bole bhṛgupati saruṣa hasi tahūm̐ baṃdhu sama bāma|| 282||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने परशुरामजीको बार-बार मुनि' और विप्रवर कहा। तब भृगुपति (परशुरामजी ) कुपित होकर [अथवा क्रोधकी हँसी हँसकर] बोले--तू भी अपने भाईके समान ही टेढ़ा है॥ २८२॥
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु॥
nipaṭahiṃ dvija kari jānahi mohī| maiṃ jasa bipra sunāvaum̐ tohī||
cāpa struvā sara āhuti jānū| kopa mora ati ghora kṛsānu||
Meaning तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुषको खरुवा, बाणको आहुति और मेरे क्रोधको अत्यन्त भयड्भर अग्नि जान॥ १॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥
samidhi sena caturaṃga suhāī| mahā mahīpa bhae pasu āī||
mai ehi parasu kāṭi bali dīnhe| samara jagya japa koṭinha kīnhe||
Meaning चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ (यज्ञमें जलायी जानेवाली लकड़ियाँ ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलिके पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसेसे ' काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं ( अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहा शब्दके साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकारकर राजाओंकी बलि दी है)॥ २॥
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥
mora prabhāu bidita nahiṃ toreṃ| bolasi nidari bipra ke bhoreṃ||
bhaṃjeu cāpu dāpu baṛa bāṛhā| ahamiti manahum̐ jīti jagu ṭhāṛhā||
Meaning मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसीसे तू ब्राह्मणके धोखे मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसारको जीतकर खड़ा है॥ ३॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना॥
rāma kahā muni kahahu bicārī| risa ati baṛi laghu cūka hamārī||
chuatahiṃ ṭūṭa pināka purānā| maiṃ kahi hetu karauṃ abhimānā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने कहा--हे मुनि! विचारकर बोलिये। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ 2॥ ४॥
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥ २८३॥
jauṃ hama nidarahiṃ bipra badi satya sunahu bhṛgunātha|
tau asa ko jaga subhaṭu jehi bhaya basa nāvahiṃ mātha|| 283||
Meaning हे भूगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसारमें ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवायें ?॥ २८३॥