सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥
sunu muni kathā punīta purānī| jo girijā prati saṃbhu bakhānī||
bisva bidita eka kaikaya desū| satyaketu taham̐ basai naresū||
Meaning हे मुनि! वह पवित्र और प्राचीन कथा सुनो, जो शिवजीने पार्वतीसे कही थी। संसारमें प्रसिद्ध एक कैकय देश है। वहाँ सत्यकेतु नामका राजा रहता (राज्य करता) था॥ १॥
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥
dharama dhuraṃdhara nīti nidhānā| teja pratāpa sīla balavānā||
tehi keṃ bhae jugala suta bīrā| saba guna dhāma mahā ranadhīrā||
Meaning वह धर्मकी धुरीको धारण करनेवाला, नीतिकी खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान् था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणोंके भण्डार और बड़े ही रणधीर थे॥ २॥
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥
rāja dhanī jo jeṭha suta āhī| nāma pratāpabhānu asa tāhī||
apara sutahi arimardana nāmā| bhujabala atula acala saṃgrāmā||
Meaning राज्यका उत्तराधिकारी जो बड़ा लड़का था, उसका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्रका नाम अरिमर्दन था, जिसकी भुजाओंमें अपार बल था और जो युद्धमें [ पर्वतके समान] अटल रहता था॥३॥
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥
bhāihi bhāihi parama samītī| sakala doṣa chala barajita prītī||
jeṭhe sutahi rāja nṛpa dīnhā| hari hita āpu gavana bana kīnhā||
Meaning भाई-भाईमें बड़ा मेल और सब प्रकारके दोषों और छलोंसे रहित [सच्ची] प्रीति थी। राजाने जेठे पुत्रको राज्य दे दिया और आप भगवान् [के भजन] के लिये वनको चल दिया॥ ४॥
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥ १५३॥
jaba pratāparabi bhayau nṛpa phirī dohāī desa|
prajā pāla ati bedabidhi katahum̐ nahīṃ agha lesa|| 153||
Meaning जब प्रतापभानु राजा हुआ, देशमें उसकी दुहाई फिर गयी। वह वेदमें बतायी हुई विधिके अनुसार उत्तम रीतिसे प्रजाका पालन करने लगा। उसके राज्यमें पापका कहीं लेश भी नहीं रह गया॥ १५३॥
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥
nṛpa hitakāraka saciva sayānā| nāma dharamaruci sukra samānā||
saciva sayāna baṃdhu balabīrā| āpu pratāpapuṃja ranadhīrā||
Meaning राजाका हित करनेवाला और शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् धर्मरुचि नामक उसका मन्त्री था। इस प्रकार बुद्धिमान् मन्त्री और बलवान् तथा वीर भाईके साथ ही स्वयं राजा भी बड़ा प्रतापी और रणधीर था॥ १॥
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥
sena saṃga caturaṃga apārā| amita subhaṭa saba samara jujhārā||
sena biloki rāu haraṣānā| aru bāje gahagahe nisānā||
Meaning साथमें अपार चतुरड्ञिंणी सेना थी, जिसमें असंख्य योद्धा थे, जो सब-के-सब रणमें जूझ मरनेवाले थे। अपनी सेनाको देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और घमाघम नगाड़े बजने लगे॥ २॥
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥
जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई॥
bijaya hetu kaṭakaī banāī| sudina sādhi nṛpa caleu bajāī||
jam̐ha taham̐ parīṃ aneka larāīṃ| jīte sakala bhūpa bariāī||
Meaning दिग्विजयके लिये सेना सजाकर वह राजा शुभ दिन (मुहूर्त) साधकर और डंका बजाकर चला। जहाँ-तहाँ बहुत-सी लड़ाइयाँ हुईं। उसने सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया॥ ३॥
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥
sapta dīpa bhujabala basa kīnhe| lai lai daṃḍa chāṛi nṛpa dīnheṃ||
sakala avani maṃḍala tehi kālā| eka pratāpabhānu mahipālā||
Meaning अपनी भुजाओंके बलसे उसने सातों द्वीपों ( भूमिखण्डों) को वशमें कर लिया और राजाओंसे दण्ड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती ) राजा था॥ ४॥
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥ १५४॥
svabasa bisva kari bāhubala nija pura kīnha prabesu|
aratha dharama kāmādi sukha sevai samayam̐ naresu|| 154||
Meaning संसारभरको अपनी भुजाओंके बलसे वशमें करके राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया। राजा अर्थ, धर्म और काम आदिके सुखोंका समयानुसार सेवन करता था॥ १५४॥
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥
bhūpa pratāpabhānu bala pāī| kāmadhenu bhai bhūmi suhāī||
saba dukha barajita prajā sukhārī| dharamasīla suṃdara nara nārī||
Meaning राजा प्रतापभानुका बल पाकर भूमि सुन्दर कामधेनु (मनचाही वस्तु देनेवाली) हो गयी। [उनके राज्यमें ] प्रजा सब [ प्रकारके] दुःखोंसे रहित और सुखी थी, और सभी स्त्री-पुरुष सुन्दर और धर्मात्मा थे॥ १॥
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥
saciva dharamaruci hari pada prītī| nṛpa hita hetu sikhava nita nītī||
gura sura saṃta pitara mahidevā| karai sadā nṛpa saba kai sevā||
Meaning धर्मरुचि मन्त्रीका श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम था। वह राजाके हितके लिये सदा उसको नीति सिखाया करता था। राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण--इन सबकी सदा सेवा करता रहता था॥ २॥
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥
bhūpa dharama je beda bakhāne| sakala karai sādara sukha māne||
dina prati deha bibidha bidhi dānā| sunahu sāstra bara beda purānā||
Meaning वेदोंमें राजाओंके जो धर्म बताये गये हैं, राजा सदा आदरपूर्वक और सुख मानकर उन सबका पालन करता था। प्रतिदिन अनेक प्रकारके दान देता और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनता था॥ ३॥
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए॥
nānā bāpīṃ kūpa taṛāgā| sumana bāṭikā suṃdara bāgā||
biprabhavana surabhavana suhāe| saba tīrathanha bicitra banāe||
Meaning उसने बहुत-सी बावलियाँ, कुएँ, तालाब, फुलवाड़ियाँ, सुन्दर बगीचे, ब्राह्मणोंके लिये घर और देवताओंके सुन्दर विचित्र मन्दिर सब तीर्थोंमें बनवाये॥ ४॥
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग॥ १५५॥
jam̐ha lagi kahe purāna śruti eka eka saba jāga|
bāra sahastra sahastra nṛpa kie sahita anurāga|| 155||
Meaning वेद और पुराणोंमें जितने प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं, राजाने एक-एक करके उन सब यज्ञोंको प्रेमसहित हजार-हजार बार किया॥ १५५॥
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥
hṛdayam̐ na kachu phala anusaṃdhānā| bhūpa bibekī parama sujānā||
karai je dharama karama mana bānī| bāsudeva arpita nṛpa gyānī||
Meaning [ राजाके] हृदयमें किसी फलकी टोह (कामना) न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान और ज्ञानी था। वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणीसे जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान् वासुदेवके अर्पित करके करता था॥ १॥
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥
caṛhi bara bāji bāra eka rājā| mṛgayā kara saba sāji samājā||
biṃdhyācala gabhīra bana gayaū| mṛga punīta bahu mārata bhayaū||
Meaning एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़ेपर सवार होकर, शिकारका सब सामान सजाकर विन्ध्याचलके घने जंगलमें गया और वहाँ उसने बहुत-से उत्तम-उत्तम हिरन मारे॥ २॥
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं॥
phirata bipina nṛpa dīkha barāhū| janu bana dureu sasihi grasi rāhū||
baṛa bidhu nahi samāta mukha māhīṃ| manahum̐ krodhabasa ugilata nāhīṃ||
Meaning राजाने वनमें फिरते हुए एक सूअरको देखा। [दाँतोंके कारण वह ऐसा दीख पड़ता था; मानो चन्द्रमाको ग्रसकर (मुँहमें पकड़कर) राहु वनमें आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होनेसे उसके मुँहमें समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है॥ ३॥
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥
kola karāla dasana chabi gāī| tanu bisāla pīvara adhikāī||
ghurughurāta haya ārau pāem̐| cakita bilokata kāna uṭhāem̐||
Meaning यह तो सूअरके भयानक दाँतोंकी शोभा कही गयी। [इधर] उसका शरीर भी बहुत विशाल और मोटा था। घोड़ेकी आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाये चौकनना होकर देख रहा था॥ ४॥
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥ १५६॥
nīla mahīdhara sikhara sama dekhi bisāla barāhu|
capari caleu haya suṭuki nṛpa hām̐ki na hoi nibāhu|| 156||
Meaning नील पर्वतके शिखरके समान विशाल [शरीरवाले। उस सूअरको देखकर राजा घोड़ेको चाबुक लगाकर तेजीसे चला और उसने सूअरको ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता॥ १५६॥
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥
āvata dekhi adhika rava bājī| caleu barāha maruta gati bhājī||
turata kīnha nṛpa sara saṃdhānā| mahi mili gayau bilokata bānā||
Meaning अधिक शब्द करते हुए घोड़ेको [अपनी तरफ] आता देखकर सूअर पवनवेगसे भाग चला। राजाने तुरंत ही बाणको धनुषपर चढ़ाया। सूअर बाणको देखते ही धरतीमें दुबक गया॥ १॥
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा॥
taki taki tīra mahīsa calāvā| kari chala suara sarīra bacāvā||
pragaṭata durata jāi mṛga bhāgā| risa basa bhūpa caleu saṃga lāgā||
Meaning राजा तक-तककर तीर चलाता है, परन्तु सूअर छल करके शरीरको बचाता जाता है। वह पशु कभी प्रकट होता और कभी छिपता हुआ भागा जाता था; और राजा भी क्रोधके वश उसके साथ (पीछे) लगा चला जाता था॥ २॥
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥
gayau dūri ghana gahana barāhū| jaham̐ nāhina gaja bāji nibāhū||
ati akela bana bipula kalesū| tadapi na mṛga maga tajai naresū||
Meaning सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगलमें चला गया, जहाँ हाथी-घोड़ेका निबाह (गम) नहीं था। राजा बिलकुल अकेला था और वनमें क्लेश भी बहुत था, फिर भी राजाने उस पशुका पीछा नहीं छोड़ा॥ ३॥
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥
kola biloki bhūpa baṛa dhīrā| bhāgi paiṭha giriguhām̐ gabhīrā||
agama dekhi nṛpa ati pachitāī| phireu mahābana pareu bhulāī||
Meaning राजाको बड़ा धेर्यवान् देखकर, सूअर भागकर पहाड़की एक गहरी गुफामें जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजाको बहुत पछताकर लौटना पड़ा; पर उस घोर वनमें वह रास्ता भूल गया॥ '४॥
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥ २५७॥
kheda khinna chuddhita tṛṣita rājā bāji sameta|
khojata byākula sarita sara jala binu bhayau aceta|| 257||
Meaning बहुत परिश्रम करनेसे थका हुआ और घोड़ेसमेत भूख-प्याससे व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता पानी बिना बेहाल हो गया॥ १५७॥
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥
phirata bipina āśrama eka dekhā| taham̐ basa nṛpati kapaṭa munibeṣā||
jāsu desa nṛpa līnha chaṛāī| samara sena taji gayau parāī||
Meaning वनमें फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा; वहाँ कपटसे मुनिका वेष बनाये एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानुने छीन लिया था और जो सेनाको छोड़कर युद्धसे भाग गया था॥ १॥
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥
samaya pratāpabhānu kara jānī| āpana ati asamaya anumānī||
gayau na gṛha mana bahuta galānī| milā na rājahi nṛpa abhimānī||
Meaning प्रतापभानुका समय (अच्छे दिन) जानकर और अपना कुसमय (बुरे दिन) अनुमानकर उसके मनमें बड़ी ग्लानि हुई। इससे वह न तो घर गया और न अभिमानी होनेके कारण राजा प्रतापभानुसे ही मिला (मेल किया)॥ २॥
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा॥
risa ura māri raṃka jimi rājā| bipina basai tāpasa keṃ sājā||
tāsu samīpa gavana nṛpa kīnhā| yaha pratāparabi tehi taba cīnhā||
Meaning दरिद्रकी भाँति मनहीमें क्रोधको मारकर वह राजा तपस्वीके वेषमें वनमें रहता था। राजा ( प्रतापभानु) उसीके पास गया। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है॥ ३॥
राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥
rāu tṛṣita nahi so pahicānā| dekhi subeṣa mahāmuni jānā||
utari turaga teṃ kīnha pranāmā| parama catura na kaheu nija nāmā||
Meaning राजा प्यासा होनेके कारण [व्याकुलतामें ] उसे पहचान न सका। सुन्दर वेष देखकर राजाने उसे महामुनि समझा और घोड़ेसे उतरकर उसे प्रणाम किया। परन्तु बड़ा चतुर होनेके कारण राजाने उसे अपना नाम नहीं बतलाया॥ ४॥
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥ १५८॥
bhūpati tṛṣita biloki tehiṃ sarabaru dīnha dekhāi|
majjana pāna sameta haya kīnha nṛpati haraṣāi|| 158||
Meaning राजाको प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया। हर्षित होकर राजाने घोड़ेसहित उसमें स्तरान और जलपान किया॥ १५८॥
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥
gai śrama sakala sukhī nṛpa bhayaū| nija āśrama tāpasa lai gayaū||
āsana dīnha asta rabi jānī| puni tāpasa boleu mṛdu bānī||
Meaning सारी थकावट मिट गयी, राजा सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रममें ले गया और सूर्यास्तका समय जानकर उसने [राजाको बैठनेके लिये] आसन दिया। फिर वह तपस्वी कोमल वाणीसे बोला--॥ १॥
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥
ko tumha kasa bana phirahu akeleṃ| suṃdara jubā jīva paraheleṃ||
cakrabarti ke lacchana toreṃ| dekhata dayā lāgi ati moreṃ||
Meaning तुम कौन हो ? सुन्दर युवक होकर, जीवनकी परवा न करके, वनमें अकेले क्यों फिर रहे हो ? तुम्हारे चक्रवर्ती राजाके-से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है॥ २॥
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई॥
nāma pratāpabhānu avanīsā| tāsu saciva maiṃ sunahu munīsā||
phirata ahereṃ pareum̐ bhulāī| baḍe bhāga dekhaum̐ pada āī||
Meaning [ राजाने कहा--] हे मुनीश्वर! सुनिये, प्रतापभानु नामका एक राजा है, मैं उसका मन्त्री हूँ। शिकारके लिये फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्यसे यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाये हैं॥ ३॥
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥
कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥
hama kaham̐ durlabha darasa tumhārā| jānata hauṃ kachu bhala honihārā||
kaha muni tāta bhayau am̐dhiyārā| jojana sattari nagaru tumhārā||
Meaning हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होनेवाला है। मुनिने कहा- हे तात! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँसे सत्तर योजनपर है॥ ४॥
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥ १५९ ( क )॥
nisā ghora gambhīra bana paṃtha na sunahu sujāna|
basahu āju asa jāni tumha jāehu hota bihāna|| 159 ( ka )||
Meaning हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना॥ १५९ (क)॥
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥ १५९ (ख )॥
tulasī jasi bhavatabyatā taisī milai sahāi|
āpunu āvai tāhi pahiṃ tāhi tahām̐ lai jāi|| 159 (kha )||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं--जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है, या उसको वहाँ ले जाती है॥ १५९ (ख)॥
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही॥
bhalehiṃ nātha āyasu dhari sīsā| bām̐dhi turaga taru baiṭha mahīsā||
nṛpa bahu bhām̐tī prasaṃseu tāhī| carana baṃdī nija bhāgya sarāhī||
Meaning हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़ेको वृक्षसे बाँधकर राजा बैठ गया। राजाने उसकी बहुत प्रकारसे प्रशंसा की और उसके चरणोंकी वन्दना करके अपने भाग्यकी सराहना को॥ १॥
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥
puni bole mṛdu girā suhāī| jāni pitā prabhu karaum̐ ḍhiṭhāī||
mohi munīsa suta sevaka jānī| nātha nāma nija kahahu bakhānī||
Meaning फिर सुन्दर कोमल वाणीसे कहा--हे प्रभो ! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम [ धाम] विस्तारसे बतलाइये॥ २॥
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥
tehi na jāna nṛpa nṛpahi so jānā| bhūpa suhrada so kapaṭa sayānā||
bairī puni chatrī puni rājā| chala bala kīnha cahai nija kājā||
Meaning राजाने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजाको पहचान गया था। राजा तो शुद्धहदय था और वह कपट करनेमें चतुर था। एक तो वैरी, फिर जातिका क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बलसे अपना काम बनाना चाहता था॥ ३॥
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥
samujhi rājasukha dukhita arātī| avām̐ anala iva sulagai chātī||
sarala bacana nṛpa ke suni kānā| bayara sam̐bhāri hṛdayam̐ haraṣānā||
Meaning वह शत्रु अपने राज्य-सुखको समझ करके (स्मरण करके) दुखी था। उसकी छाती [ कुम्हारके। आँवेकी आगकी तरह [ भीतर-ही-भीतर] सुलग रही थी। राजाके सरल वचन कानसे सुनकर, अपने वैरको यादकर वह हदयमें हर्षित हुआ॥ ४॥
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति॥ १६०॥
kapaṭa bori bānī mṛdula boleu juguti sameta|
nāma hamāra bhikhāri aba nirdhana rahita niketi|| 160||
Meaning वह कपठमें डुबोकर बड़ी युक्तिके साथ कोमल वाणी बोला--अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन) हैं॥ १६०॥
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥
kaha nṛpa je bigyāna nidhānā| tumha sārikhe galita abhimānā||
sadā rahahi apanapau durāem̐| saba bidhi kusala kubeṣa banāem̐||
Meaning राजाने कहा--जो आपके सदृश विज्ञानके निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूपको सदा छिपाये रहते हैं। क्योंकि कुवेष बनाकर रहनेमें ही सब तरहका कल्याण है (प्रकट संतवेषमें मान होनेकी सम्भावना है और मानसे पतनकी)॥ १॥
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥
tehi teṃ kahahi saṃta śruti ṭereṃ| parama akiṃcana priya hari kereṃ||
tumha sama adhana bhikhāri agehā| hota biraṃci sivahi saṃdehā||
Meaning इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिशज्जन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान्को प्रिय होते हैं। आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी]॥ २॥
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥
josi sosi tava carana namāmī| mo para kṛpā karia aba svāmī||
sahaja prīti bhūpati kai dekhī| āpu biṣaya bisvāsa biseṣī||
Meaning आप जो हों सो हों (अर्थात् जो कोई भी हों), मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी ! अब मुझपर कृपा कीजिये। अपने ऊपर राजाकी स्वाभाविक प्रीति और अपने विषयमें उसका अधिक विश्वास देखकर--॥ ३॥
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥
saba prakāra rājahi apanāī| boleu adhika saneha janāī||
sunu satibhāu kahaum̐ mahipālā| ihām̐ basata bīte bahu kālā||
Meaning सब प्रकारसे राजाको अपने वशमें करके, अधिक स्त्रेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी ) बोला-शे राजन्!! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया॥ ४॥
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥ १६१ (क)॥
aba lagi mohi na mileu kou maiṃ na janāvaum̐ kāhu|
lokamānyatā anala sama kara tapa kānana dāhu|| 161 (ka)||
Meaning अबतक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपनेको किसीपर प्रकट करता हूँ; क्योंकि लोकमें प्रतिष्ठा अग्िके समान है जो तपरूपी वनको भस्म कर डालती है॥ १६१ (क)॥
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥ १६१ (ख )॥
tulasī dekhi subeṣu bhūlahiṃ mūṛha na catura nara|
suṃdara kekihi pekhu bacana sudhā sama asana ahi|| 161 (kha )||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं--सुन्दर वेष देखकर मूढ़ नहीं, [मूढ़ तो मूढ़ ही हैं, ] चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुन्दर मोरको देखो, उसका वचन तो अमृतके समान है और आहार साँपका है॥ १६१ (ख)॥
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥
tāteṃ guputa rahaum̐ jaga māhīṃ| hari taji kimapi prayojana nāhīṃ||
prabhu jānata saba binahiṃ janāem̐| kahahu kavani sidhi loka rijhāem̐||
Meaning [ कपट-तपस्वीने कहा--] इसीसे मैं जगत्में छिपकर रहता हूँ। श्रीहरिको छोड़कर किसीसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाये ही सब जानते हैं। फिर कहो संसारको रिझानेसे क्या सिद्धि मिलेगी॥ १॥
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥
tumha suci sumati parama priya moreṃ| prīti pratīti mohi para toreṃ||
aba jauṃ tāta durāvaum̐ tohī| dāruna doṣa ghaṭai ati mohī||
Meaning तुम पवित्र और सुन्दर बुद्धिवाले हो, इससे मुझे बहुत ही प्यारे हो और तुम्हारी भी मुझपर प्रीति और विश्वास है। हे तात! अब यदि मैं तुमसे कुछ छिपाता हूँ तो मुझे बहुत ही भयानक दोष लगेगा॥ २॥
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥
jimi jimi tāpasu kathai udāsā| timi timi nṛpahi upaja bisvāsā||
dekhā svabasa karma mana bānī| taba bolā tāpasa bagadhyānī||
Meaning ज्यों-ज्यों वह तपस्वी उदासीनताकी बातें कहता था, त्यों-ही-त्यों राजाको विश्वास उत्पन्न होता जाता था। जब उस बगुलेकी तरह ध्यान लगानेवाले (कपटी) मुनिने राजाको कर्म, मन और वचनसे अपने वशमें जाना, तब वह बोला--॥ ३॥
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥
nāma hamāra ekatanu bhāī| suni nṛpa bole puni siru nāī||
kahahu nāma kara aratha bakhānī| mohi sevaka ati āpana jānī||
Meaning हे भाई! हमारा नाम एकतनु है। यह सुनकर राजाने फिर सिर नवाकर कहा-मुझे अपना अत्यन्त [ अनुरागी] सेवक जानकर अपने नामका अर्थ समझाकर कहिये॥ ४॥
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥ १६२॥
ādisṛṣṭi upajī jabahiṃ taba utapati bhai mori|
nāma ekatanu hetu tehi deha na dharī bahori|| 162||
Meaning [ कपटी मुनिने कहा--] जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसीसे मेरा नाम एकतनु है॥ १६२॥
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥
तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥
jani ācaruja karahu mana māhīṃ| suta tapa teṃ durlabha kachu nāhīṃ||
tapabala teṃ jaga sṛjai bidhātā| tapabala biṣnu bhae paritrātā||
Meaning हे पुत्र! मनमें आश्चर्य मत करो, तपसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तपके बलसे ब्रह्मा जगत्को रचते हैं। तपहीके बलसे विष्णु संसारका पालन करनेवाले बने हैं॥ १॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥
tapabala saṃbhu karahiṃ saṃghārā| tapa teṃ agama na kachu saṃsārā||
bhayau nṛpahi suni ati anurāgā| kathā purātana kahai so lāgā||
Meaning तपहीके बलसे रुद्र संहार करते हैं। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तपसे न मिल सके। यह सुनकर राजाको बड़ा अनुराग हुआ। तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा॥ २॥
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥
karama dharama itihāsa anekā| karai nirūpana birati bibekā||
udabhava pālana pralaya kahānī| kahesi amita ācaraja bakhānī||
Meaning कर्म, धर्म और अनेकों प्रकारके इतिहास कहकर वह वैराग्य और ज्ञानका निरूपण करने लगा। सृष्टिकी उत्पत्ति, पालन (स्थिति) और संहार (प्रलय) की अपार आश्चर्यभरी कथाएँ उसने विस्तारसे कहीं॥ ३॥
सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ॥
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥
suni mahipa tāpasa basa bhayaū| āpana nāma kahata taba layaū||
kaha tāpasa nṛpa jānaum̐ tohī| kīnhehu kapaṭa lāga bhala mohī||
Meaning राजा सुनकर उस तपस्वीके वशमें हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वीने कहा-राजन्!! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा॥ ४॥
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥ १६३॥
sunu mahīsa asi nīti jaham̐ taham̐ nāma na kahahiṃ nṛpa|
mohi tohi para ati prīti soi caturatā bicāri tava|| 163||
Meaning हे राजन्! सुनो, ऐसी नीति है कि राजालोग जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं कहते। तुम्हारी वही चतुराई समझकर तुमपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया है॥ १६३॥
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
nāma tumhāra pratāpa dinesā| satyaketu tava pitā naresā||
gura prasāda saba jānia rājā| kahia na āpana jāni akājā||
Meaning तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन् ! गुरुकी कृपासे मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं॥ १॥
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥
dekhi tāta tava sahaja sudhāī| prīti pratīti nīti nipunāī||
upaji pari mamatā mana moreṃ| kahaum̐ kathā nija pūche toreṃ||
Meaning हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन (सरलता), प्रेम, विश्वास और नीतिमें निपुणता देखकर मेरे मनमें तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गयी है; इसीलिये मैं तुम्हारे पूछनेपर अपनी कथा कहता हूँ॥ २॥
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥
aba prasanna maiṃ saṃsaya nāhīṃ| māgu jo bhūpa bhāva mana māhīṃ||
suni subacana bhūpati haraṣānā| gahi pada binaya kīnhi bidhi nānā||
Meaning अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह न करना। हे राजन् ! जो मनको भावे वही माँग लो। सुन्दर (प्रिय) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और [मुनिके] पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकारसे विनती को॥ ३॥
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥
kṛpāsiṃdhu muni darasana toreṃ| cāri padāratha karatala moreṃ||
prabhuhi tathāpi prasanna bilokī| māgi agama bara houm̐ asokī||
Meaning हे दयासागर मुनि! आपके दर्शनसे ही चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मुड्डीमें आ गये। तो भी स्वामीको प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर [क्यों न] शोकरहित हो जाऊँ॥ ४॥
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥ १६४॥
jarā marana dukha rahita tanu samara jitai jani kou|
ekachatra ripuhīna mahi rāja kalapa sata hou|| 164||
Meaning मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दु:खसे रहित हो जाय; मुझे युद्धमें कोई जीत न सके और पृथ्वीपर मेरा सौ कल्पतक एकच्छत्र अकण्टक राज्य हो॥ श६४॥
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥
kaha tāpasa nṛpa aisei hoū| kārana eka kaṭhina sunu soū||
kālau tua pada nāihi sīsā| eka biprakula chāṛi mahīsā||
Meaning तपस्वीने कहा--हे राजन् ! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो। हे पृथ्वीके स्वामी ! केवल ब्राह्मणकुलको छोड़ काल भी तुम्हारे चरणोंपर सिर नवायेगा॥ १॥
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥
tapabala bipra sadā bariārā| tinha ke kopa na kou rakhavārā||
jauṃ bipranha saba karahu naresā| tau tua basa bidhi biṣnu mahesā||
Meaning तपके बलसे ब्राह्मण सदा बलवान् रहते हैं। उनके क्रोधसे रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणोंको वशमें कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायँगे॥ २॥
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला॥
cala na brahmakula sana bariāī| satya kahaum̐ dou bhujā uṭhāī||
bipra śrāpa binu sunu mahipālā| tora nāsa nahi kavanehum̐ kālā||
Meaning ब्राह्मणकुलसे जोर-जबर्दस्ती नहीं चल सकती, मैं दोनों भुजा उठाकर सत्य कहता हूँ। हे राजन् ! सुनो, ब्राह्मणोंके शाप बिना तुम्हारा नाश किसी कालमें नहीं होगा॥ ३॥
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥
haraṣeu rāu bacana suni tāsū| nātha na hoi mora aba nāsū||
tava prasāda prabhu kṛpānidhānā| mo kahum̐ sarba kāla kalyānā||
Meaning राजा उसके वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा--हे स्वामी! मेरा नाश अब नहीं होगा। हे कृपानिधान प्रभु! आपकी कृपासे मेरा सब समय कल्याण होगा॥ ४॥
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥ १६५॥
evamastu kahi kapaṭamuni bolā kuṭila bahori|
milaba hamāra bhulāba nija kahahu ta hamahi na khori|| 165||
Meaning “एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला--[किन्तु] तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जानेकी बात किसीसे [कहना नहीं, यदि] कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं॥ १६५॥
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥
tāteṃ mai tohi barajaum̐ rājā| kaheṃ kathā tava parama akājā||
chaṭheṃ śravana yaha parata kahānī| nāsa tumhāra satya mama bānī||
Meaning हे राजन्! मैं तुमको इसलिये मना करता हूँ कि इस प्रसज़को कहनेसे तुम्हारी बड़ी हानि होगी। छठे कानमें यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जायगा, मेरा यह वचन सत्य जानना॥ १॥
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥
yaha pragaṭeṃ athavā dvijaśrāpā| nāsa tora sunu bhānupratāpā||
āna upāyam̐ nidhana tava nāhīṃ| jauṃ hari hara kopahiṃ mana māhīṃ||
Meaning हे प्रतापभानु ! सुनो, इस बातके प्रकट करनेसे अथवा ब्राह्मणोंके शापसे तुम्हारा नाश होगा और किसी उपायसे, चाहे ब्रह्मा और शंकर भी मनमें क्रोध करें, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ २॥
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥
satya nātha pada gahi nṛpa bhāṣā| dvija gura kopa kahahu ko rākhā||
rākhai gura jauṃ kopa bidhātā| gura birodha nahiṃ kou jaga trātā||
Meaning राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा--हे स्वामी! सत्य ही है। ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है ? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्में कोई भी बचानेवाला नहीं है॥ ३॥
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥
jauṃ na calaba hama kahe tumhāreṃ| hou nāsa nahiṃ soca hamāreṃ||
ekahiṃ ḍara ḍarapata mana morā| prabhu mahideva śrāpa ati ghorā||
Meaning यदि मैं आपके कथनके अनुसार नहीं चलूँगा, तो [भले ही] मेरा नाश हो जाय। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो ! [ केवल] एक ही डरसे डर रहा है कि ब्राह्मणोंका शाप बड़ा भयानक होता है॥ ४॥
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ॥ १६६॥
hohiṃ bipra basa kavana bidhi kahahu kṛpā kari sou|
tumha taji dīnadayāla nija hitū na dekhaum̐ koum̐|| 166||
Meaning वे ब्राह्मण किस प्रकारसे वशमें हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइये। हे दीनदयालु! आपको छोड़कर और किसीको मैं अपना हितू नहीं देखता॥ १६६॥
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥
sunu nṛpa bibidha jatana jaga māhīṃ| kaṣṭasādhya puni hohiṃ ki nāhīṃ||
ahai eka ati sugama upāī| tahām̐ paraṃtu eka kaṭhināī||
Meaning [ तपस्वीने कहा--] हे राजन्! सुनो, संसारमें उपाय तो बहुत हैं; पर वे कष्टसाध्य हैं (बड़ी कठिनतासे बननेमें आते हैं) और इसपर भी सिद्ध हों या न हों (उनकी सफलता निश्चित नहीं है) हाँ, एक उपाय बहुत सहज है; परन्तु उसमें भी एक कठिनता है॥ १॥
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥
mama ādhīna juguti nṛpa soī| mora jāba tava nagara na hoī||
āju lageṃ aru jaba teṃ bhayaūm̐| kāhū ke gṛha grāma na gayaūm̐||
Meaning हे राजन् ! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगरमें हो नहीं सकता। जबसे पैदा हुआ हूँ, तबसे आजतक मैं किसीके घर अथवा गाँव नहीं गया॥ २॥
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥
jauṃ na jāum̐ tava hoi akājū| banā āi asamaṃjasa ājū||
suni mahīsa boleu mṛdu bānī| nātha nigama asi nīti bakhānī||
Meaning परंतु यदि नहीं जाता हूँ, तो तुम्हारा काम बिगड़ता है। आज यह बड़ा असमंजस आ पड़ा है। यह सुनकर राजा कोमल वाणीसे बोला, हे नाथ! वेदोंगें ऐसी नीति कही है कि--॥ ३॥
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
baṛe saneha laghunha para karahīṃ| giri nija sirani sadā tṛna dharahīṃ||
jaladhi agādha mauli baha phenū| saṃtata dharani dharata sira renū||
Meaning बड़े लोग छोटोंपर स्रेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरोंपर सदा तृण (घास) को धारण किये रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तकपर फेनको धारण करता है, और धरती अपने सिरपर सदा धूलिको धारण किये रहती है॥ ४॥
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥ १६७॥
asa kahi gahe naresa pada svāmī hohu kṛpāla|
mohi lāgi dukha sahia prabhu sajjana dīnadayāla|| 167||
Meaning ऐसा कहकर राजाने मुनिके चरण पकड़ लिये। [ और कहा--] हे स्वामी ! कृपा कीजिये। आप संत हैं। दीनदयालु हैं। [अतः] हे प्रभो ! मेरे लिये इतना कष्ट [अवश्य] सहिये॥ १६७॥
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥
jāni nṛpahi āpana ādhīnā| bolā tāpasa kapaṭa prabīnā||
satya kahaum̐ bhūpati sunu tohī| jaga nāhina durlabha kachu mohī||
Meaning राजाको अपने अधीन जानकर कपठमें प्रवीण तपस्वी बोला--हे राजन् ! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगतमें मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ १॥
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥
avasi kāja maiṃ karihaum̐ torā| mana tana bacana bhagata taiṃ morā||
joga juguti tapa maṃtra prabhāū| phalai tabahiṃ jaba karia durāū||
Meaning मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा; [ क्योंकि] तुम मन, वाणी और शरीर [तीनों ] से मेरे भक्त हो। पर योग, युक्ति, तप और मन्त्रका प्रभाव तभी फलीभूत होता है जब वे छिपाकर किये जाते हैं॥ २॥
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥
jauṃ naresa maiṃ karauṃ rasoī| tumha parusahu mohi jāna na koī||
anna so joi joi bhojana karaī| soi soi tava āyasu anusaraī||
Meaning हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्नको जो-जो खायगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जायगा॥ ३॥
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥
puni tinha ke gṛha jevam̐i joū| tava basa hoi bhūpa sunu soū||
jāi upāya racahu nṛpa ehū| saṃbata bhari saṃkalapa karehū||
Meaning यही नहीं, उन ( भोजन करनेवालों ) के घर भी जो कोई भोजन करेगा, हे राजन् ! सुनो, वह भी तुम्हारे अधीन हो जायगा। हे राजन् ! जाकर यही उपाय करो और वर्षभर [ भोजन कराने] का सड्रल्प कर लेना॥ ४॥
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार॥ १६८॥
nita nūtana dvija sahasa sata barehu sahita parivāra|
maiṃ tumhare saṃkalapa lagi dinahiṃkariba jevanāra|| 168||
Meaning नित्य नये एक लाख ब्राह्मणोंको कुटुम्बसहित निमन्त्रित करना। मैं तुम्हारे सड्टल्प [के काल अर्थात् एक वर्ष] तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा॥ १६८॥
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥
ehi bidhi bhūpa kaṣṭa ati thoreṃ| hoihahiṃ sakala bipra basa toreṃ||
karihahiṃ bipra homa makha sevā| tehiṃ prasaṃga sahajehiṃ basa devā||
Meaning हे राजन् ! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रमसे सब ब्राह्मण तुम्हारे वशमें हो जायँगे। ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा-पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग (सम्बन्ध) से देवता भी सहज ही वशमें हो जायेँगे॥ १॥
और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥
aura eka tohi kahaūm̐ lakhāū| maiṃ ehi beṣa na āuba kāū||
tumhare uparohita kahum̐ rāyā| hari ānaba maiṃ kari nija māyā||
Meaning मैं एक और पहचान तुमको बताये देता हूँ कि मैं इस रूपमें कभी न आऊँगा। हे राजन्! मैं अपनी मायासे तुम्हारे पुरोहितको हर लाऊँगा॥ २॥
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥
tapabala tehi kari āpu samānā| rakhihaum̐ ihām̐ baraṣa paravānā||
maiṃ dhari tāsu beṣu sunu rājā| saba bidhi tora sam̐vāraba kājā||
Meaning तपके बलसे उसे अपने समान बनाकर एक वर्षतक यहाँ रखूँगा और हे राजन् ! सुनो, मैं उसका रूप बनाकर सब प्रकारसे तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा॥ ३॥
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता॥
gai nisi bahuta sayana aba kīje| mohi tohi bhūpa bheṃṭa dina tīje||
maiṃ tapabala tohi turaga sametā| pahum̐cehaum̐ sovatahi niketā||
Meaning हे राजन् ! रात बहुत बीत गयी, अब सो जाओ। आजसे तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी। तपके बलसे मैं घोड़ेसहित तुमको सोतेहीमें घर पहुँचा दूँगा॥ ४॥
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥ १६९॥
maiṃ āuba soi beṣu dhari pahicānehu taba mohi|
jaba ekāṃta bolāi saba kathā sunāvauṃ tohi|| 169||
Meaning मैं वही (पुरोहितका) वेष धरकर आऊँगा। जब एकान्तमें तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना॥ १६९॥
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥
sayana kīnha nṛpa āyasu mānī| āsana jāi baiṭha chalagyānī||
śramita bhūpa nidrā ati āī| so kimi sova soca adhikāī||
Meaning राजाने आज्ञा मानकर शयन किया और वह कपट-ज्ञानी आसनपर जा बैठा। राजा थका था, [उसे] खूब (गहरी) नींद आ गयी। पर वह कपटी कैसे सोता। उसे तो बहुत चिन्ता हो रही थी॥ १॥
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥
kālaketu nisicara taham̐ āvā| jehiṃ sūkara hoi nṛpahi bhulāvā||
parama mitra tāpasa nṛpa kerā| jānai so ati kapaṭa ghanerā||
Meaning [उसी समय] वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजाको भटकाया था। वह तपस्वी राजाका बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपश्न जानता था॥ २॥
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥
प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥
tehi ke sata suta aru dasa bhāī| khala ati ajaya deva dukhadāī||
prathamahi bhūpa samara saba māre| bipra saṃta sura dekhi dukhāre||
Meaning उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसीसे न जीते जानेवाले और देवताओंको दुःख देनेवाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओंको दुखी देखकर राजाने उन सबको पहले ही युद्धमें मार डाला था॥ ३॥
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥
जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥
tehiṃ khala pāchila bayaru sam̐bharā| tāpasa nṛpa mili maṃtra bicārā||
jehi ripu chaya soi racenhi upāū| bhāvī basa na jāna kachu rāū||
Meaning उस दुष्टने पिछला वैर याद करके तपस्वी राजासे मिलकर सलाह विचारी (षड्यन्त्र किया) और जिस प्रकार शत्रुका नाश हो, वही उपाय रचा। भावीवश राजा ( प्रतापभानु) कुछ भी न समझ सका॥ ४॥
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥ १७०॥
ripu tejasī akela api laghu kari gania na tāhu|
ajahum̐ deta dukha rabi sasihi sira avaseṣita rāhu|| 170||
Meaning तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिये। जिसका सिरमात्र बचा था, वह राहु आजतक सूर्य-चन्द्रमाको दुःख देता है॥ १७०॥