गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥
चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा॥
guha sārathihi phireu pahum̐cāī| birahu biṣādu barani nahiṃ jāī||
cale avadha lei rathahi niṣādā| hohi chanahiṃ chana magana biṣādā||
Meaning निषादराज गुह सारथी (सुमन्त्रजी)-को पहुँचाकर (विदा करके) लौटा। उसके विरह और दुःखका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवधको चले। [सुमन्त्र और घोड़ोंको देख-देखकर] वे भी क्षण-क्षणभर विषादमें डूबे जाते थे॥ १॥
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥
soca sumaṃtra bikala dukha dīnā| dhiga jīvana raghubīra bihīnā||
rahihi na aṃtahum̐ adhama sarīrū| jasu na laheu bichurata raghubīrū||
Meaning व्याकुल और दुःखसे दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीरके बिना जीनेको धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजीके बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश [क्यों] नहीं ले लिया॥ २॥
भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥
अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥
bhae ajasa agha bhājana prānā| kavana hetu nahiṃ karata payānā||
ahaha maṃda manu avasara cūkā| ajahum̐ na hṛdaya hota dui ṭūkā||
Meaning ये प्राण अपयश और पापके भाँड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते (निकलते नहीं ) 2 हाय! नीच मन [बड़ा अच्छा] मौका चूक गया। अब भी तो हृदयके दो टुकड़े नहीं हो जाते!॥ ३॥
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई॥
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥
mīji hātha siru dhuni pachitāī| manaham̐ kṛpana dhana rāsi gavām̐ī||
birida bām̐dhi bara bīru kahāī| caleu samara janu subhaṭa parāī||
Meaning सुमन्त्र हाथ मल-मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धनका खजाना खो बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीरका बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्धसे भाग चला हो!॥ ४॥
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति॥ १४४॥
bipra bibekī bedabida saṃmata sādhu sujāti|
jimi dhokheṃ madapāna kara saciva soca tehi bhām̐ti|| 144||
Meaning जैसे कोई विवेकशील, वेदका ज्ञाता, साधुसम्मत आचरणोंवाला और उत्तम जातिका (कुलीन) ब्राह्मण धोखेसे मदिरा पी ले और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मन्त्री सुमन्त्र सोच कर रहे (पछता रहे) हैं॥ १४४॥
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥
रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु॥
jimi kulīna tiya sādhu sayānī| patidevatā karama mana bānī||
rahai karama basa parihari nāhū| saciva hṛdayam̐ timi dāruna dāhu||
Meaning जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधुस्वभावकी, समझदार और मन, वचन, कर्मसे पतिको ही देवता माननेवाली पत्तब्रता स्त्रीको भाग्यवश पतिको छोड़कर (पतिसे अलग) रहना पड़े, उस समय उसके हदयमें जैसे भयानक सन्ताप होता है, वैसे ही मन्त्रीके हदयमें हो रहा है॥ १॥
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥
locana sajala ḍīṭhi bhai thorī| sunai na śravana bikala mati bhorī||
sūkhahiṃ adhara lāgi muham̐ lāṭī| jiu na jāi ura avadhi kapāṭī||
Meaning नेत्रोंगें जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानोंसे सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँहमें लाटी लग गयी है। किन्तु [ये सब मृत्युके लक्षण हो जानेपर भी] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदयमें अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं (अर्थात् चौदह वर्ष बीत जानेपर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है)॥ २॥
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥
bibarana bhayau na jāi nihārī| māresi manahum̐ pitā mahatārī||
hāni galāni bipula mana byāpī| jamapura paṃtha soca jimi pāpī||
Meaning सुमन्त्रजीके मुखका रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो इन्होंने माता-पिताको मार डाला हो। उनके मनमें रामवियोगरूपी हानिकी महान् ग्लानि (पीड़ा) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरकको जाता हुआ रास्तेमें सोच कर रहा हो॥३॥
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥
राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥
bacanu na āva hṛdayam̐ pachitāī| avadha kāha maiṃ dekhaba jāī||
rāma rahita ratha dekhihi joī| sakucihi mohi bilokata soī||
Meaning मुँहसे वचन नहीं निकलते। हृदयमें पछताते हैं कि मैं अयोध्यामें जाकर क्या देखूँगा ? श्रीरामचन्द्रजीसे शून्य रथको जो भी देखेगा, वही मुझे देखनेमें संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा)॥ '४॥
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि॥ १४५॥
-dhāi pūm̐chihahiṃ mohi jaba bikala nagara nara nāri|
utaru deba maiṃ sabahi taba hṛdayam̐ bajru baiṭhāri|| 145||
Meaning नगरके सब व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदयपर वत्र रखकर सबको उत्तर दूँगा॥ १४५॥
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता॥
पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥
puchihahiṃ dīna dukhita saba mātā| kahaba kāha maiṃ tinhahi bidhātā||
pūchihi jabahiṃ lakhana mahatārī| kahihaum̐ kavana sam̐desa sukhārī||
Meaning जब दीन-दुखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा ? जब लक्ष्मणजीकी माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा 2॥ १॥
राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई॥
पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही॥
rāma janani jaba āihi dhāī| sumiri bacchu jimi dhenu lavāī||
pūm̐chata utaru deba maiṃ tehī| ge banu rāma lakhanu baidehī||
Meaning श्रीरामजीकी माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़ेको याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछनेपर मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वनको चले गये!॥ २॥
जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥
joi pūm̐chihi tehi ūtaru debā| jāi avadha aba yahu sukhu lebā||
pūm̐chihi jabahiṃ rāu dukha dīnā| jivanu jāsu raghunātha adhīnā||
Meaning जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा! हाय! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है! जब दुःखसे दीन महाराज, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजीके [ दर्शनके] ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे,॥ ३॥
देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई॥
सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥
dehaum̐ utaru kaunu muhu lāī| āyaum̐ kusala kuam̐ra pahum̐cāī||
sunata lakhana siya rāma sam̐desū| tṛna jimi tanu pariharihi naresū||
Meaning तब मैं कौन-सा मुँह लेकर उन्हें उत्तर दूँगा कि मैं राजकुमारोंको कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ ! लक्ष्मण, सीता और श्रीरामका समाचार सुनते ही महाराज तिनकेकी तरह शरीरको त्याग देंगे॥ ४॥
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु॥ १४६॥
-hradau na bidareu paṃka jimi bichurata prītamu nīru|
jānata hauṃ mohi dīnha bidhi yahu jātanā sarīru|| 146||
Meaning प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है [जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है]॥ १४६॥
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥
बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥
ehi bidhi karata paṃtha pachitāvā| tamasā tīra turata rathu āvā||
bidā kie kari binaya niṣādā| phire pāyam̐ pari bikala biṣādā||
Meaning सुमन्त्र इस प्रकार मार्गमें पछतावा कर रहे थे, इतनेमें ही रथ तुरंत तमसा नदीके तटपर आ पहुँचा। मन्त्रीने विनय करके चारों निषादोंको विदा किया। वे विषादसे व्याकुल होते हुए सुमन्त्रके पैरों पड़कर लौटे॥ १॥
पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा॥
paiṭhata nagara saciva sakucāī| janu māresi gura bām̐bhana gāī||
baiṭhi biṭapa tara divasu gavām̐vā| sām̐jha samaya taba avasaru pāvā||
Meaning नगरमें प्रवेश करते मन्त्री [ ग्लानिके कारण] ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौको मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला॥ २॥
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥
avadha prabesu kīnha am̐dhiāreṃ| paiṭha bhavana rathu rākhi duāreṃ||
jinha jinha samācāra suni pāe| bhūpa dvāra rathu dekhana āe||
Meaning अँधेरा होनेपर उन्होंने अयोध्यामें प्रवेश किया और रथको दरवाजेपर खड़ा करके वे [चुपके-से ] महलमें घुसे। जिन-जिन लोगोंने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ देखनेको राजद्वारपर आये॥ ३॥
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥
नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें॥
rathu pahicāni bikala lakhi ghore| garahiṃ gāta jimi ātapa ore||
nagara nāri nara byākula kaiṃseṃ| nighaṭata nīra mīnagana jaiṃseṃ||
Meaning रथको पहचानकर और घोड़ोंको व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं ( क्षीण हो रहे हैं ) जैसे घाममें ओले ! नगरके स्त्री-पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जलके घटनेपर मछलियाँ [ व्याकुल होती हैं]॥ ४॥
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥ १४७॥
-saciva āgamanu sunata sabu bikala bhayau ranivāsu|
bhavana bhayaṃkaru lāga tehi mānahum̐ preta nivāsu|| 147||
Meaning मन्त्रीका [। अकेले ही] आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतोंका निवासस्थान (श्मशान) हो॥ १४७॥
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी॥
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा॥
ati ārati saba pūm̐chahiṃ rānī| utaru na āva bikala bhai bānī||
sunai na śravana nayana nahiṃ sūjhā| kahahu kahām̐ nṛpa tehi tehi būjhā||
Meaning अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं; पर सुमन्त्रको कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी (रुक गयी) है। न कानोंसे सुनायी पड़ता है और न आंँखोंसे कुछ सूझता है। वे जो भी सामने आता है उस-उससे पूछते हैं--कहो, राजा कहाँ हैं ?॥१॥
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई॥
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा॥
dāsinha dīkha saciva bikalāī| kausalyā gṛham̐ gaīṃ lavāī||
jāi sumaṃtra dīkha kasa rājā| amia rahita janu caṃdu birājā||
Meaning दासियाँ मन्त्रीको व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्याजीके महलमें लिवा गयीं। सुमन्त्रने जाकर वहाँ राजाको कैसा [बैठे] देखा मानो बिना अमृतका चन्द्रमा हो॥ २॥
आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना॥
लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती॥
āsana sayana bibhūṣana hīnā| pareu bhūmitala nipaṭa malīnā||
lei usāsu soca ehi bhām̐tī| surapura teṃ janu kham̐seu jajātī||
Meaning राजा आसन, शय्या और आभूषणोंसे रहित बिलकुल मलिन (उदास) प्ृथ्वीपर पड़े हुए हैं। वे लंबी सँसें लेकर इस प्रकार सोच करते हैं मानो राजा ययाति स्वर्गसे गिरकर सोच कर रहे हों॥३॥
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती॥
राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही॥
leta soca bhari chinu chinu chātī| janu jari paṃkha pareu saṃpātī||
rāma rāma kaha rāma sanehī| puni kaha rāma lakhana baidehī||
Meaning राजा क्षण-क्षणमें सोचसे छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा ' है मानो [गीधराज ' जटायुका भाई] सम्पाती पंखोंके जल जानेपर गिर पड़ा हो। राजा [बार-बार] राम, राम, हा स्नेही (प्यारे ) राम!' कहते हैं, फिर *हा राम, हा लक्ष्मण, हा जानकी' ऐसा कहने लगते हैं॥ ४॥
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु॥ १४८॥
dekhi sacivam̐ jaya jīva kahi kīnheu daṃḍa pranāmu|
sunata uṭheu byākula nṛpati kahu sumaṃtra kaham̐ rāmu|| 148||
Meaning मन्त्रीने देखकर जयजीव' कहकर दण्डवत्-प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले--सुमन्त्र! कहो, राम कहाँ हैं ?॥ १४८॥
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥
सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥
bhūpa sumaṃtru līnha ura lāī| būṛata kachu adhāra janu pāī||
sahita saneha nikaṭa baiṭhārī| pūm̐chata rāu nayana bhari bārī||
Meaning राजाने सुमन्त्रको हृदयसे लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमीको कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्रीको स्नेहके साथ पास बैठाकर नेत्रोंगें जल भरकर राजा पूछने लगे--॥ १॥
राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥
आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए॥
rāma kusala kahu sakhā sanehī| kaham̐ raghunāthu lakhanu baidehī||
āne pheri ki banahi sidhāe| sunata saciva locana jala chāe||
Meaning हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीरामकी कुशल कहो। बताओ, श्रीराम,लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं ? उन्हें लौटा लाये हो कि वे वनको चले गये ? यह सुनते ही मन्त्रीके नेत्रोंगें जल भर आया॥ २॥
सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू॥
राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥
soka bikala puni pūm̐cha naresū| kahu siya rāma lakhana saṃdesū||
rāma rūpa guna sīla subhāū| sumiri sumiri ura socata rāū||
Meaning शोकसे व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे-सीता, राम और लक्ष्मणका सँदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको याद कर-करके राजा हृदयमें सोच करते हैं॥ ३॥
राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू।
सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥
rāu sunāi dīnha banabāsū| suni mana bhayau na haraṣu harām̐sū||
सो सुत बिछुरत गए न प्राना।
को पापी बड़ मोहि समाना॥
so suta bichurata gae na prānā| ko pāpī baṛa mohi samānā||
Meaning [और कहते हैं--] मैंने राजा होनेकी बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस (राम)के मनमें हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्रके बिछुड़नेपर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा 2॥ ४॥
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥ १४९॥
sakhā rāmu siya lakhanu jaham̐ tahām̐ mohi pahum̐cāu|
nāhiṃ ta cāhata calana aba prāna kahaum̐ satibhāu|| 149||
Meaning हे सखा! श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भावसे कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं॥ १४९॥
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥
puni puni pūm̐chata maṃtrahi rāū| priyatama suana sam̐desa sunāū||
karahi sakhā soi begi upāū| rāmu lakhanu siya nayana dekhāū||
Meaning राजा बार-बार मन्त्रीसे पूछते हैं--मेरे प्रियतम पुत्रोंका सँदेसा सुनाओ। हे सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको मुझे आँखों दिखा दो॥ १॥
सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥
बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा॥
saciva dhīra dhari kaha mudu bānī| mahārāja tumha paṃḍita gyānī||
bīra sudhīra dhuraṃdhara devā| sādhu samāju sadā tumha sevā||
Meaning मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले--महाराज ! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव ! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओंके समाजका सेवन किया है॥ २॥
जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा॥
काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥
janama marana saba dukha bhogā| hāni lābha priya milana biyogā||
kāla karama basa hauhiṃ gosāīṃ| barabasa rāti divasa kī nāīṃ||
Meaning जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी ! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं॥३॥
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥
sukha haraṣahiṃ jaṛa dukha bilakhāhīṃ| dou sama dhīra dharahiṃ mana māhīṃ||
dhīraja dharahu bibeku bicārī| chāṛia soca sakala hitakārī||
Meaning मूर्खलोग सुखमें हर्षित होते और दु:खमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं। हे सबके हितकारी (रक्षक) ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये॥ ४॥
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।
न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर॥ १५०॥
prathama bāsu tamasā bhayau dūsara surasari tīra|
nhāī rahe jalapānu kari siya sameta dou bīra|| 150||
Meaning श्रीरामजीका पहला निवास (मुकाम) तमसाके तटपर हुआ, दूसरा गड़ातीरपर। सीताजीसहित दोनों भाई उस दिन सख्रान करके जल पीकर ही रहे॥ १५०॥
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥
होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥
kevaṭa kīnhi bahuta sevakāī| so jāmini siṃgaraura gavām̐ī||
hota prāta baṭa chīru magāvā| jaṭā mukuṭa nija sīsa banāvā||
Meaning केवट (निषादराज) ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( श्रृंगवेरपुर) में ही बितायी। दूसरे दिन सबेरा होते ही बड़का दूध मँगवाया और उससे श्रीराम-लक्ष्मणने अपने सिरोंपर जटाओंके मुकुट बनाये॥ १॥
राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥
लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥
rāma sakhām̐ taba nāva magāī| priyā caṛhāi caṛhe raghurāī||
lakhana bāna dhanu dhare banāī| āpu caṛhe prabhu āyasu pāī||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजने नाव मँगवायी। पहले प्रिया सीताजीको उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजीने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े॥ २॥
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥
तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।
bikala biloki mohi raghubīrā| bole madhura bacana dhari dhīrā||
tāta pranāmu tāta sana kahehu| bāra bāra pada paṃkaja gahehū|
Meaning मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले--हे तात! पिताजीसे मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओरसे बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना॥ ३॥
करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी॥
बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें॥
karabi pāyam̐ pari binaya bahorī| tāta karia jani ciṃtā morī||
bana maga maṃgala kusala hamāreṃ| kṛpā anugraha punya tumhāreṃ||
Meaning फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी! आप मेरी चिन्ता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्यसे वनमें और मार्गमें हमारा कुशल-मज़ल होगा॥ ४॥
तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।
प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौँ॥
जननीं सकल परितोषि परि परि पाये करि बिनती घनी।
तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी॥
tumhareṃ anugraha tāta kānana jāta saba sukhu pāihauṃ|
pratipāli āyasu kusala dekhana pāya puni phiri āihaum̐||
jananīṃ sakala paritoṣi pari pari pāye kari binatī ghanī|
tulasī karehu soi jatanu jehiṃ kusalī rahahiṃ kosaladhanī||
Meaning हे पिताजी ! आपके अनुग्रहसे मैं वन जाते हुए सब प्रकारका सुख पाऊँगा। आज्ञाका भलीभाँति पालन करके चरणोंका दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओंके पैरों पड़- पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके--तुलसीदास कहते हैं--तुम वही प्रयव करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।
गुर सन कहब सेंदेसु बार बार पद पदुम गहि।
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥ २५९॥
gura sana kahaba seṃdesu bāra bāra pada paduma gahi|
karaba soi upadesu jehiṃ na soca mohi avadhapati|| 259||
Meaning बार-बार चरणकमलोंको पकड़कर गुरु वसिष्ठजीसे मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें॥ १५१॥
पुरजन परिजन सकल निहोरी।
तात सुनाएहु बिनती मोरी॥
purajana parijana sakala nihorī| tāta sunāehu binatī morī||
सोइ सब भाँति मोर हितकारी।
जातें रह नरनाहु सुखारी॥
soi saba bhām̐ti mora hitakārī| jāteṃ raha naranāhu sukhārī||
Meaning हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें॥ १॥
कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥
पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥
kahaba sam̐desu bharata ke āem̐| nīti na tajia rājapadu pāem̐||
pālehu prajahi karama mana bānī| seehu mātu sakala sama jānī||
Meaning भरतके आनेपर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजाका पद पा जानेपर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजाका पालन करना और सब माताओंको समान जानकर उनकी सेवा करना॥ २॥
ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥
तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥
ora nibāhehu bhāyapa bhāī| kari pitu mātu sujana sevakāī||
tāta bhām̐ti tehi rākhaba rāū| soca mora jehiṃ karai na kāū||
Meaning और हे भाई! पिता, माता और स्वजनोंकी सेवा करके भाईपनेको अन्ततक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें॥३॥
लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥
बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई॥
lakhana kahe kachu bacana kaṭhorā| baraji rāma puni mohi nihorā||
bāra bāra nija sapatha devāī| kahabi na tāta lakhana larikāī||
Meaning लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा--] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना॥ ४॥
कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥ १५२॥
kahi pranāma kachu kahana liya siya bhai sithila saneha|
thakita bacana locana sajala pulaka pallavita deha|| 152||
Meaning प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्रेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रोंगें जल भर आया और शरीर रोमाज्जसे व्याप्त हो गया॥ श५२॥
तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥
tehi avasara raghubara rūkha pāī| kevaṭa pārahi nāva calāī||
raghukulatilaka cale ehi bhām̐tī| dekhaum̐ ṭhāṛha kulisa dhari chātī||
Meaning उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर केवटने पार जानेके लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वर रखकर खड़ा-खड़ा देखता रहा॥ १॥
मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ॥
maiṃ āpana kimi kahauṃ kalesū| jiata phireum̐ lei rāma sam̐desū||
asa kahi saciva bacana rahi gayaū| hāni galāni soca basa bhayaū||
Meaning मैं अपने क्लेशको कैसे कहूँ, जो श्रीरामजीका यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्रीकी वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये) और वे हानिकी ग्लानि और सोचके वश हो गये॥ २॥
सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥
तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥
suta bacana sunatahiṃ naranāhū| pareu dharani ura dāruna dāhū||
talaphata biṣama moha mana māpā| mājā manahum̐ mīna kahum̐ byāpā||
Meaning सारथी सुमन्त्रके वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदयमें भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोहसे व्याकुल हो गया। मानो मछलीको माँजा व्याप गया हो (पहली वर्षाका जल लग गया हो)॥ ३॥
करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी॥
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा॥
kari bilāpa saba rovahiṃ rānī| mahā bipati kimi jāi bakhānī||
suni bilāpa dukhahū dukhu lāgā| dhīrajahū kara dhīraju bhāgā||
Meaning सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया!॥ '४॥
भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु॥ १५३॥
bhayau kolāhalu avadha ati suni nṛpa rāura soru|
bipula bihaga bana pareu nisi mānahum̐ kulisa kaṭhoru|| 153||
Meaning राजाके रावले (रनिवास) में [रोनेका] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम मच गया! [ऐसा जान पड़ता था] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वत्र गिरा हो॥ १५३॥
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥
इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥
prāna kaṃṭhagata bhayau bhuālū| mani bihīna janu byākula byālū||
idrīṃ sakala bikala bhaim̐ bhārī| janu sara sarasija banu binu bārī||
Meaning राजाके प्राण कण्ठमें आ गये। मानो मणिके बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जलके तालाबमें कमलोंका वन मुरझा गया हो॥ १॥
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥
उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी॥
kausalyām̐ nṛpu dīkha malānā| rabikula rabi am̐thayau jiyam̐ jānā||
ura dhari dhīra rāma mahatārī| bolī bacana samaya anusārī||
Meaning कौसल्याजीने राजाको बहुत दुखी देखकर अपने हृदयमें जान लिया कि अब सूर्यकुलका सूर्य अस्त हो चला ! तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्या हृदयमें धीरज धरकर समयके अनुकूल वचन बोलीं--॥ २॥
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू॥
करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥
nātha samujhi mana karia bicārū| rāma biyoga payodhi apārū||
karanadhāra tumha avadha jahājū| caṛheu sakala priya pathika samājū||
Meaning हे नाथ! आप मनमें समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्रका वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और प्रजा) ही यात्रियोंका समाज है जो इस जहाजपर चढ़ा हुआ है॥ ३॥
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू॥
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥
dhīraju dharia ta pāia pārū| nāhiṃ ta būṛihi sabu parivārū||
jauṃ jiyam̐ dharia binaya piya morī| rāmu lakhanu siya milahiṃ bahorī||
Meaning आप धीरज धरियेगा तो सब पार पहुँच जायेँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी ! यदि मेरी विनती हृदयमें धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे॥ ४॥
प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि॥ १५४॥
priyā bacana mṛdu sunata nṛpu citayau ām̐khi ughāri|
talaphata mīna malīna janu sīṃcata sītala bāri|| 154||
Meaning प्रिय पत्नी कौसल्याके कोमल वचन सुनते हुए राजाने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछलीपर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो॥ १५४॥
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥
dhari dhīraju uṭhī baiṭha bhuālū| kahu sumaṃtra kaham̐ rāma kṛpālū||
kahām̐ lakhanu kaham̐ rāmu sanehī| kaham̐ priya putrabadhū baidehī||
Meaning धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले-सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं ? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्रेही राम कहाँ हैं ? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है ?॥ १॥
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती॥
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥
bilapata rāu bikala bahu bhām̐tī| bhai juga sarisa sirāti na rātī||
tāpasa aṃdha sāpa sudhi āī| kausalyahi saba kathā sunāī||
Meaning राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजाको अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमारके पिता) के शापकी याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी॥ २॥
भयउ बिकल बरनत इतिहासा।
राम रहित धिग जीवन आसा॥
bhayau bikala baranata itihāsā| rāma rahita dhiga jīvana āsā||
सो तनु राखि करब मैं काहा।
जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा॥
so tanu rākhi karaba maiṃ kāhā| jeṃhi na prema panu mora nibāhā||
Meaning उस इतिहासका वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीरामके बिना जीनेकी आशाको धिक्कार है। मैं उस शरीरको रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा ?॥ ३॥
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥
hā raghunaṃdana prāna pirīte| tumha binu jiata bahuta dina bīte||
hā jānakī lakhana hā raghubara| hā pitu hita cita cātaka jaladhara||
Meaning हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ !॥ ४॥
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ १५५॥
rāma rāma kahi rāma kahi rāma rāma kahi rāma|
tanu parihari raghubara biraham̐ rāu gayau suradhāma|| 155||
Meaning राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीरामके विरहमें शरीर त्याग कर सुरलोकको सिधार गये॥ १५५॥
जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥
जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥
jiana marana phalu dasaratha pāvā| aṃḍa aneka amala jasu chāvā||
jiata rāma bidhu badanu nihārā| rāma biraha kari maranu sam̐vārā||
Meaning जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया॥ १॥
सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी॥
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा॥
soka bikala saba rovahiṃ rānī| rūpu sīla balu teju bakhānī||
karahiṃ bilāpa aneka prakārā| parahīṃ bhūmitala bārahiṃ bārā||
Meaning सब रानियाँ शोकके मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजाके रूप, शील, बल और तेजका बखान कर-करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार-बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं॥ २॥
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥
अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू॥
bilapahiṃ bikala dāsa aru dāsī| ghara ghara rudanu karahiṃ purabāsī||
am̐thayau āju bhānukula bhānū| dharama avadhi guna rūpa nidhānū||
Meaning दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये!॥ ३॥
गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी॥
gārīṃ sakala kaikaihi dehīṃ| nayana bihīna kīnha jaga jehīṃ||
ehi bidhi bilapata raini bihānī| āe sakala mahāmuni gyānī||
Meaning सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभरको बिना नेत्रका (अंधा) कर दिया ! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रात:काल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये॥ ४॥
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।
taba basiṣṭha muni samaya sama kahi aneka itihāsa|
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥ १५६॥
soka nevāreu sabahi kara nija bigyāna prakāsa|| 156||
Meaning तब वसिष्ट मुनिने समयके अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञानके प्रकाशसे सबका शोक दूर किया॥ १५६॥
तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥
tela nām̐va bhari nṛpa tanu rākhā| dūta bolāi bahuri asa bhāṣā||
dhāvahu begi bharata pahiṃ jāhū| nṛpa sudhi katahum̐ kahahu jani kāhū||
Meaning वसिष्टजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया। फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा--तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ। राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना॥ १॥
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई॥
सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए॥
etanei kahehu bharata sana jāī| gura bolāī paṭhayau dou bhāī||
suni muni āyasu dhāvana dhāe| cale bega bara bāji lajāe||
Meaning जाकर भरतसे इतना ही कहना कि दोनों भाइयोंको गुरुजीने बुलवा भेजा है। मुनिकी आज्ञा सुनकर धावन (दूत) दौड़े। वे अपने वेगसे उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले॥ २॥
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥
देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥
anarathu avadha araṃbheu jaba teṃ| kusaguna hohiṃ bharata kahum̐ taba teṃ||
dekhahiṃ rāti bhayānaka sapanā| jāgi karahiṃ kaṭu koṭi kalapanā||
Meaning जबसे अयोध्यामें अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभीसे भरतजीको अपशकुन होने लगे। वे रातको भयड्र स्वप्र देखते थे और जागनेपर [उन स्वप्रोंके कारण] करोड़ों (अनेकों ) तरहकी बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे॥ ३॥
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥
bipra jevām̐i dehiṃ dina dānā| siva abhiṣeka karahiṃ bidhi nānā||
māgahiṃ hṛdayam̐ mahesa manāī| kusala mātu pitu parijana bhāī||
Meaning [ अनिष्टशान्तिके लिये] वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियोंसे रुद्राभिषिक करते थे। महादेवजीको हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुट्म्बी और भाइयोंका कुशल-क्षेम माँगते थे॥ ४॥
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥ १५७॥
ehi bidhi socata bharata mana dhāvana pahum̐ce āi|
gura anusāsana śravana suni cale ganesu manāi|| 157||
Meaning भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े॥ १५७॥