चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥
cidānaṃdamaya deha tumhārī| bigata bikāra jāna adhikārī||
nara tanu dharehu saṃta sura kājā| kahahu karahu jasa prākṛta rājā||
Meaning आपकी देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतिजन्य पश्टमहाभूतोंकी बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेह- विशिष्ट मायिक नहीं है) और [ उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि] सब विकारोंसे रहित है; इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतोंके कार्यके लिये [दिव्य] नर-शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृतिके तत्त्वोंसे निर्मित देहवाले, साधारण) राजाओंकी तरहसे कहते और करते हैं॥ ३॥
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥
rāma dekhi suni carita tumhāre| jaṛa mohahiṃ budha hohiṃ sukhāre||
tumha jo kahahu karahu sabu sām̐cā| jasa kāchia tasa cāhia nācā||
Meaning हे राम! आपके चरित्रोंको देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोहको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य (उचित) ही है; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये (इस समय आप मनुष्यरूपमें हैं, अत: मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है)॥ ४॥
पूँछेहु मोहि कि रहाँ कहें में पूंछत सकुचाें।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥ १२७॥
pūm̐chehu mohi ki rahām̐ kaheṃ meṃ pūṃchata sakucāेṃ|
jaham̐ na hohu taham̐ dehu kahi tumhahi dekhāvauṃ ṭhāum̐|| 127||
Meaning आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहनेके लिये स्थान दिखाऊँ॥ १२७॥
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥
suni muni bacana prema rasa sāne| sakuci rāma mana mahum̐ musukāne||
bālamīki ham̐si kahahiṃ bahorī| bānī madhura amia rasa borī||
Meaning मुनिके प्रेमरससे सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [ रहस्य खुल जानेके डरसे] सकुचाकर मनमें मुसकराये। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत-रसमें डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले--॥ १॥
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
sunahu rāma aba kahaum̐ niketā| jahām̐ basahu siya lakhana sametā||
jinha ke śravana samudra samānā| kathā tumhāri subhaga sari nānā||
Meaning हे रामजी! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी-समेत निवास करिये। जिनके कान समुद्रकी भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियोंसे--॥ २॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥
bharahiṃ niraṃtara hohiṃ na pūre| tinha ke hiya tumha kahum̐ gṛha rūre||
locana cātaka jinha kari rākhe| rahahiṃ darasa jaladhara abhilāṣe||
Meaning निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं;॥ ३॥
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥
nidarahiṃ sarita siṃdhu sara bhārī| rūpa biṃdu jala hohiṃ sukhārī||
tinha ke hṛdaya sadana sukhadāyaka| basahu baṃdhu siya saha raghunāyaka||
Meaning तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलोंका निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [रूपी मेघ] के एक बूँद जलसे सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूपके किसी एक अज्ञकी जरा-सी भी झाँकीके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रहालोकतकके सौन्दर्यका तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी ! उन लोगोंके हृदयरूपी सुखदायी भवनोंमें आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित निवास कीजिये॥ ४॥
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥ १२८॥
jasu tumhāra mānasa bimala haṃsini jīhā jāsu|
mukutāhala guna gana cunai rāma basahu hiyam̐ tāsu|| 128||
Meaning आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवरमें जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियोंको चुगती रहती है, हे रामजी ! आप उसके हृदयमें बसिये॥ १२८॥
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥
prabhu prasāda suci subhaga subāsā| sādara jāsu lahai nita nāsā||
tumhahi nibedita bhojana karahīṃ| prabhu prasāda paṭa bhūṣana dharahīṃ||
Meaning जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगन्धित [पुष्पादि] सुन्दर प्रसादको नित्य आदरके साथ ग्रहण करती (सूँघती ) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;॥ १॥
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा॥
sīsa navahiṃ sura guru dvija dekhī| prīti sahita kari binaya biseṣī||
kara nita karahiṃ rāma pada pūjā| rāma bharosa hṛdayam̐ nahi dūjā||
Meaning जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको देखकर बड़ी नम्रताके साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी (आप) के चरणोंकी पूजा करते हैं, और जिनके हदयमें श्रीरामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;॥ २॥
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥
carana rāma tīratha cali jāhīṃ| rāma basahu tinha ke mana māhīṃ||
maṃtrarāju nita japahiṃ tumhārā| pūjahiṃ tumhahi sahita parivārā||
Meaning तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी (आप) के तीर्थोंमें चलकर जाते हैं; हे रामजी ! आप उनके मनमें निवास कीजिये। जो नित्य आपके [रामनामरूप] मन्त्रराजको जपते हैं और परिवार (परिकर)-सहित आपकी पूजा करते हैं॥ ३॥
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥
tarapana homa karahiṃ bidhi nānā| bipra jevām̐i dehiṃ bahu dānā||
tumha teṃ adhika gurahi jiyam̐ jānī| sakala bhāyam̐ sevahiṃ sanamānī||
Meaning जो अनेकों प्रकारसे तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरुको हृदयमें आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभावसे सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;॥ ४॥
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥ १२९॥
sabu kari māgahiṃ eka phalu rāma carana rati hou|
tinha keṃ mana maṃdira basahu siya raghunaṃdana dou|| 129||
Meaning और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणों में हमारी प्रीति हो; उन लोगोंके मनरूपी मन्दिरोंमें सीताजी और रघुकुलको आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये॥ १२९॥
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
kāma koha mada māna na mohā| lobha na chobha na rāga na drohā||
jinha keṃ kapaṭa daṃbha nahiṃ māyā| tinha keṃ hṛdaya basahu raghurāyā||
Meaning जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है--हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये॥ १॥
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥
saba ke priya saba ke hitakārī| dukha sukha sarisa prasaṃsā gārī||
kahahiṃ satya priya bacana bicārī| jāgata sovata sarana tumhārī||
Meaning जो सबके प्रिय और सबका हित करनेवाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निन््दा) समान हैं, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते- सोते आपकी ही शरण हैं,॥ २॥
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥
tumhahi chāṛi gati dūsari nāhīṃ| rāma basahu tinha ke mana māhīṃ||
jananī sama jānahiṃ paranārī| dhanu parāva biṣa teṃ biṣa bhārī||
Meaning और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी ! आप उनके मनमें बसिये। जो परायी स्त्रीको जन्म देनेवाली माताके समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विषसे भी भारी विष है;॥ ३॥
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥
je haraṣahiṃ para saṃpati dekhī| dukhita hohiṃ para bipati biseṣī||
jinhahi rāma tumha prānapiāre| tinha ke mana subha sadana tumhāre||
Meaning जो दूसरेकी सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरेकी विपत्ति देखकर विशेष रूपसे दु:खी होते हैं, और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणोंके समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहनेयोग्य शुभ भवन हैं॥ ४॥
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥ १३०॥
svāmi sakhā pitu mātu gura jinha ke saba tumha tāta|
mana maṃdira tinha keṃ basahu sīya sahita dou bhrāta|| 130||
Meaning हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मन्दिरमें सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये॥ १३०॥
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥
avaguna taji saba ke guna gahahīṃ| bipra dhenu hita saṃkaṭa sahahīṃ||
nīti nipuna jinha kai jaga līkā| ghara tumhāra tinha kara manu nīkā||
Meaning जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगतमें मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है॥ १॥
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥
guna tumhāra samujhai nija dosā| jehi saba bhām̐ti tumhāra bharosā||
rāma bhagata priya lāgahiṃ jehī| tehi ura basahu sahita baidehī||
Meaning जो गुणोंको आपका और दोषोंको अपना समझता है, जिसे सब प्रकारसे आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदयमें आप सीतासहित निवास कीजिये॥ २॥
जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥
jāti pām̐ti dhanu dharama baṛāī| priya parivāra sadana sukhadāī||
saba taji tumhahi rahai ura lāī| tehi ke hṛdayam̐ rahahu raghurāī||
Meaning जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर--सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी ! आप उसके हृदयमें रहिये॥ ३॥
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥
saragu naraku apabaragu samānā| jaham̐ taham̐ dekha dhareṃ dhanu bānā||
karama bacana mana rāura cerā| rāma karahu tehi keṃ ura ḍerā||
Meaning स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टिमें समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्मसे, वचनसे और मनसे आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें डेरा कीजिये॥ ४॥
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥ १३१॥
jāhi na cāhia kabahum̐ kachu tumha sana sahaja sanehu|
basahu niraṃtara tāsu mana so rāura nija gehu|| 131||
Meaning जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मनमें निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है॥ १३१॥
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥
ehi bidhi munibara bhavana dekhāe| bacana saprema rāma mana bhāe||
kaha muni sunahu bhānukulanāyaka| āśrama kahaum̐ samaya sukhadāyaka||
Meaning इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ वाल््मीकिजीने श्रीरामचन्द्रजीको घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरीमजीके मनको अच्छे लगे। फिर मुनिने कहा--हे सूर्यकुलके स्वामी! सुनिये, अब मैं इस समयके लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवासस्थान बतलाता हूँ)॥ १॥
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥
citrakūṭa giri karahu nivāsū| taham̐ tumhāra saba bhām̐ti supāsū||
sailu suhāvana kānana cārū| kari kehari mṛga bihaga bihārū||
Meaning आप चित्रकूट पर्वतपर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकारकी सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियोंका विहारस्थल है॥ २॥
नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥
nadī punīta purāna bakhānī| atripriyā nija tapabala ānī||
surasari dhāra nāum̐ maṃdākini| jo saba pātaka potaka ḍākini||
Meaning वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसे लायी थीं। वह. गड़्ाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी (डाइन) रूप है॥३॥
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥
atri ādi munibara bahu basahīṃ| karahiṃ joga japa tapa tana kasahīṃ||
calahu saphala śrama saba kara karahū| rāma dehu gaurava giribarahū||
Meaning अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीरको कसते हैं। हे रामजी! चलिये, सबके परिश्रमको सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटको भी गौरव दीजिये॥ ४॥
चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥ १३२॥
citrakūṭa mahimā amita kahīṃ mahāmuni gāi|
āe nahāe sarita bara siya sameta dou bhāi|| 132||
Meaning महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजीसहित दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया॥ १३२॥
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥
लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥
raghubara kaheu lakhana bhala ghāṭū| karahu katahum̐ aba ṭhāhara ṭhāṭū||
lakhana dīkha paya utara karārā| cahum̐ disi phireu dhanuṣa jimi nārā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने कहा--लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [और कहा कि--] इसके चारों ओर धनुषके-जैसा एक नाला फिरा हुआ है॥ १॥
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥
चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥
nadī panaca sara sama dama dānā| sakala kaluṣa kali sāuja nānā||
citrakūṭa janu acala aherī| cukai na ghāta māra muṭhabherī||
Meaning नदी (मन्दाकिनी ) उस धनुषकी प्रत्यज्ला (डोरी ) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है॥ २॥
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥
asa kahi lakhana ṭhāum̐ dekharāvā| thalu biloki raghubara sukhu pāvā||
rameu rāma manu devanha jānā| cale sahita sura thapati pradhānā||
Meaning ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया। स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई (मकान बनानेवाले) विश्वकर्माको साथ लेकर चले॥ ३॥
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥
बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥
kola kirāta beṣa saba āe| race parana tṛna sadana suhāe||
barani na jāhi maṃju dui sālā| eka lalita laghu eka bisālā||
Meaning सब देवता कोल-भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासोंके सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी- सी थी और दूसरी बड़ी थी॥ ४॥
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
lakhana jānakī sahita prabhu rājata rucira niketa|
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥ १३३॥
soha madanu muni beṣa janu rati riturāja sameta|| 133||
Meaning लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तोंके घरमें शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनिका वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त-ऋतुके साथ सुशोभित हो॥ १३३॥
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥
amara nāga kiṃnara disipālā| citrakūṭa āe tehi kālā||
rāma pranāmu kīnha saba kāhū| mudita deva lahi locana lāhū||
Meaning उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए॥ १॥
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥
करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥
baraṣi sumana kaha deva samājū| nātha sanātha bhae hama ājū||
kari binatī dukha dusaha sunāe| haraṣita nija nija sadana sidhāe||
Meaning फूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा--हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दु:खोंके नाशका आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २॥
चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥
citrakūṭa raghunaṃdanu chāe| samācāra suni suni muni āe||
āvata dekhi mudita munibṛṃdā| kīnha daṃḍavata raghukula caṃdā||
Meaning श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने मुदित हुई मुनिमण्डलीको आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया॥ ३॥
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥
सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥
muni raghubarahi lāi ura lehīṃ| suphala hona hita āsiṣa dehīṃ||
siya saumitra rāma chabi dekhahiṃ| sādhana sakala saphala kari lekhahiṃ||
Meaning मुनिगण श्रीरामजीको हृदयसे लगा लेते हैं और सफल होनेके लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखते हैं और अपने सारे साधनोंको सफल हुआ समझते हैं॥ ४॥
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥ १३४॥
jathājoga sanamāni prabhu bidā kie munibṛṃda|
karahi joga japa jāga tapa nija āśramanhi suchaṃda|| 134||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डलीको विदा किया। [ श्रीरामचन्द्रजीके आ जानेसे] वे सब अपने-अपने आश्रमोंमें अब स्वतन्त्रताके साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे॥ १३४॥
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥
yaha sudhi kola kirātanha pāī| haraṣe janu nava nidhi ghara āī||
kaṃda mūla phala bhari bhari donā| cale raṃka janu lūṭana sonā||
Meaning यह ( श्रीरामजीके आगमनका) समाचार जब कोल-भीलोंने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घरहीपर आ गयी हों। वे दोनोंमें कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों॥ १॥
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता॥
कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥
tinha maham̐ jinha dekhe dou bhrātā| apara tinhahi pūm̐chahi magu jātā||
kahata sunata raghubīra nikāī| āi sabanhi dekhe raghurāī||
Meaning उनमेंसे जो दोनों भाइयोंको [ पहले] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्तेमें जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजीके दर्शन किये॥ २॥
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥
karahiṃ johāru bheṃṭa dhari āge| prabhuhi bilokahiṃ ati anurāge||
citra likhe janu jaham̐ taham̐ ṭhāṛhe| pulaka sarīra nayana jala bāṛhe||
Meaning भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुरागके साथ प्रभुको देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्रलिखे-से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओं के जलकी बाढ़ आ रही है॥ ३॥
राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी॥
rāma saneha magana saba jāne| kahi priya bacana sakala sanamāne||
prabhuhi johāri bahori bahorī| bacana binīta kahahiṃ kara jorī||
Meaning श्रीरामजीने उन सबको प्रेममें मग्र जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं--॥ ४॥
अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय॥ २३५॥
aba hama nātha sanātha saba bhae dekhi prabhu pāya|
bhāga hamāre āgamanu rāura kosalarāya|| 235||
Meaning हे नाथ! प्रभु (आप) के चरणोंका दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज ! हमारे ही भाग्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है॥ १३५॥
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥
धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥
dhanya bhūmi bana paṃtha pahārā| jaham̐ jaham̐ nātha pāu tumha dhārā||
dhanya bihaga mṛga kānanacārī| saphala janama bhae tumhahi nihārī||
Meaning हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वनमें विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफलजन्म हो गये॥ १॥
हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥
hama saba dhanya sahita parivārā| dīkha darasu bhari nayana tumhārā||
kīnha bāsu bhala ṭhāum̐ bicārī| ihām̐ sakala ritu rahaba sukhārī||
Meaning हम सब भी अपने परिवारसहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओंमें आप सुखी रहियेगा॥ २॥
हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥
hama saba bhām̐ti karaba sevakāī| kari kehari ahi bāgha barāī||
bana behaṛa giri kaṃdara khohā| saba hamāra prabhu paga paga johā||
Meaning हमलोग सब प्रकारसे हाथी, सिंह, सर्प और बाघोंसे बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो ! यहाँके बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह (दरें) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं॥ ३॥
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥
taham̐ taham̐ tumhahi ahera khelāuba| sara nirajhara jalaṭhāum̐ dekhāuba||
hama sevaka parivāra sametā| nātha na sakucaba āyasu detā||
Meaning हम वहाँ-वहाँ (उन-उन स्थानोंमें) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयोंको दिखावेंगे। हम कुट्म्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ! इसलिये हमें आज्ञा देनेमें संकोच न कीजियेगा॥ ४॥
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ १३६॥
beda bacana muni mana agama te prabhu karunā aina|
bacana kirātanha ke sunata jimi pitu bālaka baina|| 136||
Meaning जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है॥ १३६॥
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥
राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥
rāmahi kevala premu piārā| jāni leu jo jānanihārā||
rāma sakala banacara taba toṣe| kahi mṛdu bacana prema paripoṣe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीको केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो ( जानना चाहता हो), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमसे परिपुष्ठ हुए (प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगोंको संतुष्ट किया॥ १॥
बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥
bidā kie sira nāi sidhāe| prabhu guna kahata sunata ghara āe||
ehi bidhi siya sameta dou bhāī| basahiṃ bipina sura muni sukhadāī||
Meaning फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभुके गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजीसमेत वनमें निवास करने लगे॥ २॥
जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥
jaba te āi rahe raghunāyaku| taba teṃ bhayau banu maṃgaladāyaku||
phūlahiṃ phalahiṃ biṭapa bidhi nānā| maṃju balita bara beli bitānā||
Meaning जबसे श्रीरघुनाथजी वनमें आकर रहे तबसे वन मज़लदायक हो गया। अनेकों प्रकारके वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं॥ ३॥
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥
गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥
surataru sarisa subhāyam̐ suhāe| manahum̐ bibudha bana parihari āe||
gaṃja maṃjutara madhukara śrenī| tribidha bayāri bahai sukha denī||
Meaning वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओंके वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौंरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है॥ ४॥
नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥ १३७॥
nīlakaṃṭha kalakaṃṭha suka cātaka cakka cakora|
bhām̐ti bhām̐ti bolahiṃ bihaga śravana sukhada cita cora|| 137||
Meaning नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे,चकवे और चकोर आदि पक्षी कानोंको सुख देनेवाली और चित्तको चुरानेवाली तरह-तरहकी बोलियाँ बोलते हैं॥ १३७॥
केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥
फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी॥
keri kehari kapi kola kuraṃgā| bigatabaira bicarahiṃ saba saṃgā||
phirata ahera rāma chabi dekhī| hohiṃ mudita mṛgabaṃda biseṣī||
Meaning हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन-सये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकारके लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी छबिको देखकर पशुओंके समूह विशेष आनन्दित होते हैं॥ १॥
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं॥
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥
bibudha bipina jaham̐ lagi jaga māhīṃ| dekhi rāma banu sakala sihāhīṃ||
surasari sarasai dinakara kanyā| mekalasutā godāvari dhanyā||
Meaning जगतमें जहाँतक (जितने) देवताओंके वन हैं,सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं। गड़ा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य (पुण्यमयी) नदियाँ,॥ २॥
सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥
saba sara siṃdhu nadī nada nānā| maṃdākini kara karahiṃ bakhānā||
udaya asta giri aru kailāsū| maṃdara meru sakala surabāsū||
Meaning सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओंके रहनेके स्थान हैं,॥ ३॥
सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥
बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥
saila himācala ādika jete| citrakūṭa jasu gāvahiṃ tete||
biṃdhi mudita mana sukhu na samāī| śrama binu bipula baṛāī pāī||
Meaning और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं। विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है॥ ४॥
चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥ १३८॥
citrakūṭa ke bihaga mṛga beli biṭapa tṛna jāti|
punya puṃja saba dhanya asa kahahiṃ deva dina rāti|| 138||
Meaning चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्यकी राशि हैं और धन्य हैं--देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं॥ १३८॥
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥
परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥
nayanavaṃta raghubarahi bilokī| pāi janama phala hohiṃ bisokī||
parasi carana raja acara sukhārī| bhae parama pada ke adhikārī||
Meaning आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये॥ १॥
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥
so banu sailu subhāyam̐ suhāvana| maṃgalamaya ati pāvana pāvana||
mahimā kahia kavani bidhi tāsū| sukhasāgara jaham̐ kīnha nivāsū||
Meaning वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मज़लमय और अत्यन्त पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुखके समुद्र श्रीरामजीने निवास किया है॥ २॥
पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन॥
paya payodhi taji avadha bihāī| jaham̐ siya lakhanu rāmu rahe āī||
kahi na sakahiṃ suṣamā jasi kānana| jauṃ sata sahasa hoṃhiṃ sahasānana||
Meaning क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्याको छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वनकी जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुखवाले जो लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते॥ ३॥
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥
सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥
so maiṃ barani kahauṃ bidhi kehīṃ| ḍābara kamaṭha ki maṃdara lehīṃ||
sevahiṃ lakhanu karama mana bānī| jāi na sīlu sanehu bakhānī||
Meaning उसे भला, मैं किस प्रकारसे वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरेका [ क्षुद्र] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है ? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करते हैं। उनके शील और स्त्रेहका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ४॥
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥ १३९॥
-chinu chinu lakhi siya rāma pada jāni āpu para nehu|
karata na sapanehum̐ lakhanu citu baṃdhu mātu pitu gehu|| 139||
Meaning क्षण-क्षणपर श्रीसीतारामजीके चरणोंको देखकर और अपने ऊपर उनका स्त्रेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्रमें भी भाइयों, माता-पिता और घरकी याद नहीं करते॥ १३९॥
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥
rāma saṃga siya rahati sukhārī| pura parijana gṛha surati bisārī||
chinu chinu piya bidhu badanu nihārī| pramudita manahum̐ cakorakumārī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्बके लोग और घरकी याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षणपर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमाके समान मुखको देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरकुमारी (चकोरी ) चन्द्रमाको देखकर !॥ १॥
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥
सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥
nāha nehu nita baṛhata bilokī| haraṣita rahati divasa jimi kokī||
siya manu rāma carana anurāgā| avadha sahasa sama banu priya lāgā||
Meaning स्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिनमें चकवी ! सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है॥ २॥
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥
paranakuṭī priya priyatama saṃgā| priya parivāru kuraṃga bihaṃgā||
sāsu sasura sama munitiya munibara| asanu amia sama kaṃda mūla phara||
Meaning प्रियतम ( श्रीरामचन्द्रजी ) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुट्म्बियों के समान लगते हैं। मुनियोंकी स्त्रियाँ सासके समान, श्रेष्ठ मुनि ससुरके समान और कन्द-मूल-फलोंका आहार उनको अमृतके समान लगता है॥ ३॥
नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥
लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥
nātha sātha sām̐tharī suhāī| mayana sayana saya sama sukhadāī||
lokapa hohiṃ bilokata jāsū| tehi ki mohi saka biṣaya bilāsū||
Meaning स्वामीके साथ सुन्दर साथरी (कुश और पत्तोंकी सेज) सैकड़ों कामदेवकी सेजोंके समान सुख देनेवाली है। जिनके [कृपापूर्वक] देखनेमात्रसे जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग- विलास मोहित कर सकते हैं !॥ ४॥
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥ १४०॥
-sumirata rāmahi tajahiṃ jana tṛna sama biṣaya bilāsu|
rāmapriyā jaga janani siya kachu na ācaraju tāsu|| 140||
Meaning जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्की माता सीताजीके लिये यह [ भोग-विलासका त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है॥ १४०॥
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं॥
कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥
sīya lakhana jehi bidhi sukhu lahahīṃ| soi raghunātha karahi soi kahahīṃ||
kahahiṃ purātana kathā kahānī| sunahiṃ lakhanu siya ati sukhu mānī||
Meaning सीताजी और लक्ष्मणजीको जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं॥ १॥
जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥
jaba jaba rāmu avadha sudhi karahīṃ| taba taba bāri bilocana bharahīṃ||
sumiri mātu pitu parijana bhāī| bharata sanehu sīlu sevakāī||
Meaning जब-जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्याकी याद करते हैं,तब-तब उनके नेत्रोंगें जल भर आता है। माता-पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरतके प्रेम, शील और सेवाभावको याद करके--॥ २॥
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥
kṛpāsiṃdhu prabhu hohiṃ dukhārī| dhīraju dharahiṃ kusamau bicārī||
lakhi siya lakhanu bikala hoi jāhīṃ| jimi puruṣahi anusara parichāhīṃ||
Meaning कृपाके समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दुःखी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजीको दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्यकी परछाहीं उस मनुष्यके समान ही चेष्टा करती है॥ ३॥
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥
priyā baṃdhu gati lakhi raghunaṃdanu| dhīra kṛpāla bhagata ura caṃdanu||
lage kahana kachu kathā punītā| suni sukhu lahahiṃ lakhanu aru sītā||
Meaning तब धीर,कृपालु और भक्तोंके हदयोंको शीतल करनेके लिये चन्दनरूप रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मणकी दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं,जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्रात करते हैं॥ ४॥
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत॥ १४९४॥
rāmu lakhana sītā sahita sohata parana niketa|
jimi bāsava basa amarapura sacī jayaṃta sameta|| 1494||
Meaning लक्ष्मणजी और सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावतीमें इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयन्तसहित बसता है॥ १४१॥
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥
jogavahiṃ prabhu siya lakhanahiṃ kaiseṃ| palaka bilocana golaka jaiseṃ||
sevahiṃ lakhanu sīya raghubīrahi| jimi abibekī puruṣa sarīrahi||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीकी कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रोंके गोलकोंकी। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजीकी [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी ] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीरकी करते हैं॥ १॥
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥
कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥
ehi bidhi prabhu bana basahiṃ sukhārī| khaga mṛga sura tāpasa hitakārī||
kaheum̐ rāma bana gavanu suhāvā| sunahu sumaṃtra avadha jimi āvā||
Meaning पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियोंके हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वनमें निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं--मैंने श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्यामें आये वह [कथा] सुनो॥ २॥
फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥
मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥
phireu niṣādu prabhuhi pahum̐cāī| saciva sahita ratha dekhesi āī||
maṃtrī bikala biloki niṣādū| kahi na jāi jasa bhayau biṣādū||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथको मन्त्री (सुमन्त्र)- सहित देखा। मन्त्रीको व्याकुल देखकर निषादको जैसा दुःख हुआ, वह कहा नहीं जाता॥ ३॥
राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥
देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥
rāma rāma siya lakhana pukārī| pareu dharanitala byākula bhārī||
dekhi dakhina disi haya hihināhīṃ| janu binu paṃkha bihaga akulāhīṃ||
Meaning [ निषादको अकेले आया देखकर] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े। [रथके] घोड़े दक्षिण दिशाकी ओर [जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे] देख-देखकर हिनहिनाते हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हों॥ ४॥
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥ १४२॥
nahiṃ tṛna carahiṃ piahiṃ jalu mocahiṃ locana bāri|
byākula bhae niṣāda saba raghubara bāji nihāri|| 142||
Meaning वे न तो घास चरते हैं,न पानी पीते हैं। केवल आँखोंसे जल बहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी के घोड़ोंको इस दशामें देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये॥ १४२॥
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥
dhari dhīraja taba kahai niṣādū| aba sumaṃtra pariharahu biṣādū||
tumha paṃḍita paramāratha gyātā| dharahu dhīra lakhi bimukha bidhātā||
Meaning तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा--हे सुमन्त्रजी ! अब विषादको छोड़िये। आप पण्डित और परमार्थके जाननेवाले हैं। विधाताको प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये॥ १॥
बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी।
रथ बैठारेउ बरबस आनी॥
bibidha kathā kahi kahi mṛdu bānī| ratha baiṭhāreu barabasa ānī||
क सिधिल रथु सकड़ न हॉकी।
रघुबर बिरह पीर उर बाँकी॥
ka sidhila rathu sakaṛa na hôkī| raghubara biraha pīra ura bām̐kī||
Meaning कोमल वाणीसे भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहकर निषादने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्रको रथपर बैठाया। परन्तु शोकके मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथको हाँक नहीं सकते। उनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी बड़ी तीव्र वेदना है॥ २॥
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥
अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें॥
carapharāhiṃ maga calahiṃ na ghore| bana mṛga manahum̐ āni ratha jore||
aṛhuki parahiṃ phiri herahiṃ pīcheṃ| rāma biyogi bikala dukha tīcheṃ||
Meaning 'चोड़े तड़फड़ाते हैं और [ठीक] रास्तेपर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथमें जोत दिये गये हों। वे श्रीरामचन्द्रजीके वियोगी घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछेकी ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दुःखसे व्याकुल हैं॥ ३॥
जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती॥
jo kaha rāmu lakhanu baidehī| hiṃkari hiṃkari hita herahiṃ tehī||
bāji biraha gati kahi kimi jātī| binu mani phanika bikala jehi bhām̐tī||
Meaning जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकीका नाम ले लेता है, घोड़े हिकर-हिकरकर उसकी ओर प्यारसे देखने लगते हैं। घोड़ोंकी विरहदशा कैसे कही जा सकती है ? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणिके बिना साँप व्याकुल होता है॥ ४॥
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥ १४३॥
bhayau niṣāda biṣādabasa dekhata saciva turaṃga|
boli susevaka cāri taba die sārathī saṃga|| 143||
Meaning मन्त्री और घोड़ोंकी यह दशा देखकर निषादराज विषादके वश हो गया। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथीके साथ कर दिये॥ १४३॥