चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥
cale samīra bega haya hām̐ke| nāghata sarita saila bana bām̐ke||
hṛdayam̐ socu baṛa kachu na sohāī| asa jānahiṃ jiyam̐ jāum̐ uṛāī||
Meaning हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥ १॥
एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥
असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥
eka nimeṣa barasa sama jāī| ehi bidhi bharata nagara niarāī||
asaguna hohiṃ nagara paiṭhārā| raṭahiṃ kubhām̐ti kukheta karārā||
Meaning एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं॥२॥
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥
श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥
khara siāra bolahiṃ pratikūlā| suni suni hoi bharata mana sūlā||
śrīhata sara saritā bana bāgā| nagaru biseṣi bhayāvanu lāgā||
Meaning गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरतके मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है॥ ३॥
खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥
नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥
khaga mṛga haya gaya jāhiṃ na joe| rāma biyoga kuroga bigoe||
nagara nāri nara nipaṭa dukhārī| manahum̐ sabanhi saba saṃpati hārī||
Meaning श्रीरामजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ऐसे दुखी हो रहे हैं कि] देखे नहीं जाते। नगरके स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों॥ ४॥
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥ १५८॥
purajana milihiṃ na kahahiṃ kachu gavam̐hiṃ johārahiṃ jāhiṃ|
bharata kusala pūm̐chi na sakahiṃ bhaya biṣāda mana māhiṃ|| 158||
Meaning नगरके लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; गौँसे (चुपकेसे) जोहार (वन्दना) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसीसे कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मनमें भय और विषाद छा रहा है॥ १५८॥
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥
hāṭa bāṭa nahiṃ jāi nihārī| janu pura daham̐ disi lāgi davārī||
āvata suta suni kaikayanaṃdini| haraṣī rabikula jalaruha caṃdini||
Meaning बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगरमें दसों दिशाओंमें दावाग्नि लगी है! पुत्रको आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके लिये चाँदनीरूपी कैकेयी [बड़ी] हर्षित हुई॥ १॥
भरत दुखित परिवारु निहारा।
मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥
bharata dukhita parivāru nihārā| mānahum̐ tuhina banaja banu mārā||
Meaning शत्रु्तको महलमें ले आयी। भरतने सारे परिवारको दुखी देखा। मानो कमलोंके वनको पाला मार गया हो॥ २॥
कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥
सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥
kaikeī haraṣita ehi bhām̐ti| manahum̐ mudita dava lāi kirātī||
sutahi sasoca dekhi manu māreṃ| pūm̐chati naihara kusala hamāreṃ||
Meaning एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनन्दमें भर रही हो। पुत्रको सोचवश और मनमारे (बहुत उदास) देखकर वह पूछने लगी--हमारे नैहरमें कुशल तो है?॥ ३॥
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥
कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥
sakala kusala kahi bharata sunāī| pūm̐chī nija kula kusala bhalāī||
kahu kaham̐ tāta kahām̐ saba mātā| kaham̐ siya rāma lakhana priya bhrātā||
Meaning भरतजीने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुलकी कुशल-क्षेम पूछी। [ भरतजीने कहा-] कहो, पिताजी कहाँ हैं ? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं ? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम- लक्ष्मण कहाँ हैं ?॥ ४॥
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥ १५९॥
suni suta bacana sanehamaya kapaṭa nīra bhari naina|
bharata śravana mana sūla sama pāpini bolī baina|| 159||
Meaning पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंगें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके कानों में और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली--॥ १५९॥
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥
tāta bāta maiṃ sakala sam̐vārī| bhai maṃtharā sahāya bicārī||
kachuka kāja bidhi bīca bigāreu| bhūpati surapati pura pagu dhāreu||
Meaning हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मन्थरा सहायक हुई। पर विधाताने बीचमें जरा- सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये॥ १॥
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥
तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥
sunata bharatu bhae bibasa biṣādā| janu sahameu kari kehari nādā||
tāta tāta hā tāta pukārī| pare bhūmitala byākula bhārī||
Meaning भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश (बेहाल) हो गये। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे 'तात! तात! हा तात!' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीनपर गिर पड़े॥ २॥
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥
calata na dekhana pāyaum̐ tohī| tāta na rāmahi sauṃpehu mohī||
bahuri dhīra dhari uṭhe sam̐bhārī| kahu pitu marana hetu mahatārī||
Meaning [ और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्गके लिये] चलते समय देख भी न सका। [हाय !] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले--माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ॥ ३॥
सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥
आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥
suni suta bacana kahati kaikeī| maramu pām̐chi janu māhura deī||
ādihu teṃ saba āpani karanī| kuṭila kaṭhora mudita mana baranī||
Meaning पुत्रका वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थानको पाछकर (चाकूसे चीरकर) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयीने अपनी सब करनी शुरूसे [ आखीरतक बड़े] प्रसन्न मनसे सुना दी॥ ४॥
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥ १६०॥
bharatahi bisareu pitu marana sunata rāma bana gaunu|
hetu apanapau jāni jiyam̐ thakita rahe dhari maunu|| 160||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका वन जाना सुनकर भरतजीको पिताका मरण भूल गया और हृदयमें इस सारे अनर्थका कारण अपनेको ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये (अर्थात् उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये)॥ १६०॥
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥
तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥
bikala biloki sutahi samujhāvati| manahum̐ jare para lonu lagāvati||
tāta rāu nahiṃ soce jogū| biṛhai sukṛta jasu kīnheu bhogū||
Meaning पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जलेपर नमक लगा रही हो। [वह बोली--] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्यात्त भोग किया॥ १॥
जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥
jīvata sakala janama phala pāe| aṃta amarapati sadana sidhāe||
asa anumāni soca pariharahū| sahita samāja rāja pura karahū||
Meaning जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो॥ २॥
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा॥
suni suṭhi sahameu rājakumārū| pākeṃ chata janu lāga am̐gārū||
dhīraja dhari bhari lehiṃ usāsā| pāpani sabahi bhām̐ti kula nāsā||
Meaning राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घावपर अँगार छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा--पापिनी ! तूने सभी तरहसे कुलका नाश कर दिया॥ ३॥
जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥
jauṃ pai kuruci rahī ati tohī| janamata kāhe na māre mohī||
peṛa kāṭi taiṃ pālau sīṃcā| mīna jiana niti bāri ulīcā||
Meaning हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि (दुष्ट इच्छा) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला ? तूने पेड़को काटकर पत्तेको सींचा है और मछलीके जीनेके लिये पानीको उलीच डाला! (अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला)॥ ४॥
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥ २६१॥
haṃsabaṃsu dasarathu janaku rāma lakhana se bhāi|
jananī tūm̐ jananī bhaī bidhi sana kachu na basāi|| 261||
Meaning मुझे सूर्यबंश [-सा वंश], दशरथजी [-सरीखे] पिता और राम-लक्ष्मण-से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई! [क्या किया जाय! ] विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता॥ १६१॥
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ॥
बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा॥
jaba taiṃ kumati kumata jiyam̐ ṭhayaū| khaṃḍa khaṃḍa hoi hradau na gayaū||
bara māgata mana bhai nahiṃ pīrā| gari na jīha muham̐ pareu na kīrā||
Meaning आअरी कुमति! जब तूने हृदयमें यह बुरा विचार (निश्चय) ठाना, उसी समय तेरे हदयके टुकड़े- टुकड़े [क्यों] न हो गये? वरदान माँगते समय तेरे मनमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गयी ? तेरे मुँहमें कीड़े नहीं पड़ गये ?॥ १॥
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥
bhūpam̐ pratīta tori kimi kīnhī| marana kāla bidhi mati hari līnhī||
bidhihum̐ na nāri hṛdaya gati jānī| sakala kapaṭa agha avaguna khānī||
Meaning राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया ? [जान पड़ता है, ] विधाताने मरनेके समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियोंके हदयकी गति (चाल) विधाता भी नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है॥ २॥
सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ॥
अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥
sarala susīla dharama rata rāū| so kimi jānai tīya subhāū||
asa ko jīva jaṃtu jaga māhīṃ| jehi raghunātha prānapriya nāhīṃ||
Meaning फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभावको कैसे जानते ? 3रे, जगत्के जीव-जन्तुओंमें ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंके समान प्यारे नहीं हैं॥ ३॥
भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई॥
bhe ati ahita rāmu teu tohī| ko tū ahasi satya kahu mohī||
jo hasi so hasi muham̐ masi lāī| ām̐khi oṭa uṭhi baiṭhahiṃ jāī||
Meaning वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये (वैरी लगे) ! तू कौन है ? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँहमें स्याही पोतकर (मुँह काला करके) उठकर मेरी अँखोंकी ओटमें जा बैठ॥ ४॥
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥ १६२॥
rāma birodhī hṛdaya teṃ pragaṭa kīnha bidhi mohi|
mo samāna ko pātakī bādi kahaum̐ kachu tohi|| 162||
Meaning विधाताने मुझे श्रीरामजीसे विरोध करनेवाले (तेरे) हृदयसे उत्पन्न किया [ अथवा विधाताने मुझे हृदयसे रामका विरोधी जाहिर कर दिया]। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ॥ १६२॥
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥
suni satrughuna mātu kuṭilāī| jarahiṃ gāta risa kachu na basāī||
tehi avasara kubarī taham̐ āī| basana bibhūṣana bibidha banāī||
Meaning माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुध्नजीके सब अड्भ क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके कपड़ों और गहनोंसे सजकर कुबरी (मन्थरा) वहाँ आयी॥ १॥
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई॥
हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा॥
lakhi risa bhareu lakhana laghu bhāī| barata anala ghṛta āhuti pāī||
humagi lāta taki kūbara mārā| pari muha bhara mahi karata pukārā||
Meaning उसे [सजी] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोधमें भर गये। मानो जलती हुई आगको घीकी आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोरसे तककर कूबड़पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी॥ २॥
कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥
आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा॥
kūbara ṭūṭeu phūṭa kapārū| dalita dasana mukha rudhira pracārū||
āha daia maiṃ kāha nasāvā| karata nīka phalu anaisa pāvā||
Meaning उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँहसे खून बहने लगा। [वह कराहती हुई बोली--] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा ? जो भला करते बुरा फल पाया॥ ३॥
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥
suni ripuhana lakhi nakha sikha khoṭī| lage ghasīṭana dhari dhari jhoṃṭī||
bharata dayānidhi dīnhi chaṛāī| kausalyā pahiṃ ge dou bhāī||
Meaning उसकी यह बात सुनकर और उसे नखसे शिखातक दुष्ट जानकर शत्रुघ्तजी झोंटा पकड़- पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजीने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई [तुरंत] कौसल्याजीके पास गये॥ ४॥
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥ १६३॥
malina basana bibarana bikala kṛsa sarīra dukha bhāra|
kanaka kalapa bara beli bana mānahum̐ hanī tusāra|| 163||
Meaning कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरेका रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दु:ःखके बोझसे शरीर सूख गया है। ऐसी दीख रही हैं मानो सोनेकी सुन्दर कल्पलताको वनमें पाला मार गया हो॥ १६३॥
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥
देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥
bharatahi dekhi mātu uṭhi dhāī| muruchita avani parī jhaim̐ āī||
dekhata bharatu bikala bhae bhārī| pare carana tana dasā bisārī||
Meaning भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जानेसे मूर््छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीरकी सुध भुलाकर चरणोंमें गिर पड़े॥ १॥
मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥
कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा॥
mātu tāta kaham̐ dehi dekhāī| kaham̐ siya rāmu lakhanu dou bhāī||
kaikai kata janamī jaga mājhā| jauṃ janami ta bhai kāhe na bām̐jhā||
Meaning [फिर बोले-] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगतमें क्यों जनमी ? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई ?--॥ २॥
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥
kula kalaṃku jehiṃ janameu mohī| apajasa bhājana priyajana drohī||
ko tibhuvana mohi sarisa abhāgī| gati asi tori mātu jehi lāgī||
Meaning जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँडे और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है ? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥ ३॥
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु॥
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥
pitu surapura bana raghubara ketū| maiṃ kevala saba anaratha hetu||
dhiga mohi bhayaum̐ benu bana āgī| dusaha dāha dukha dūṣana bhāgī||
Meaning पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोका कारण हूँ। मुझे धिककार है ! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना॥ ४॥
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥ १६४॥
mātu bharata ke bacana mṛdu suni suni uṭhī sam̐bhāri|
lie uṭhāi lagāi ura locana mocati bāri|| 164||
Meaning भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं॥ १६४॥
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥
sarala subhāya māyam̐ hiyam̐ lāe| ati hita manahum̐ rāma phiri āe||
bheṃṭeu bahuri lakhana laghu bhāī| soku sanehu na hṛdayam̐ samāī||
Meaning सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुष्तको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है॥ १॥
देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥
माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे॥
dekhi subhāu kahata sabu koī| rāma mātu asa kāhe na hoī||
mātām̐ bharatu goda baiṭhāre| ām̐su pauṃchi mṛdu bacana ucāre||
Meaning कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं--श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं--॥ २॥
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥
जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि॥
ajahum̐ baccha bali dhīraja dharahū| kusamau samujhi soka pariharahū||
jani mānahu hiyam̐ hāni galānī| kāla karama gati aghaṭita jāni||
Meaning हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हदयमें हानि और ग्लानि मत मानो॥ ३॥
काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥
kāhuhi dosu dehu jani tātā| bhā mohi saba bidhi bāma bidhātā||
jo etehum̐ dukha mohi jiāvā| ajahum̐ ko jānai kā tehi bhāvā||
Meaning हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःखपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है?॥४॥
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥ १६५॥
pitu āyasa bhūṣana basana tāta taje raghubīra|
bisamau haraṣu na hṛdayam̐ kachu pahire balakala cīra|| 165||
Meaning हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और वल्कल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष!॥ १६५॥
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥
mukha prasanna mana raṃga na roṣū| saba kara saba bidhi kari paritoṣū||
cale bipina suni siya sam̐ga lāgī| rahai na rāma carana anurāgī||
Meaning उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष )। सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं॥१॥
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥
sunatahiṃ lakhanu cale uṭhi sāthā| rahahiṃ na jatana kie raghunāthā||
taba raghupati sabahī siru nāī| cale saṃga siya aru laghu bhāī||
Meaning सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्र किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये॥ २॥
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए॥
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें॥
rāmu lakhanu siya banahi sidhāe| gaium̐ na saṃga na prāna paṭhāe||
yahu sabu bhā inha ām̐khinha āgeṃ| tau na tajā tanu jīva abhāgeṃ||
Meaning श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा॥ ३॥
मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥
जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥
mohi na lāja nija nehu nihārī| rāma sarisa suta maiṃ mahatārī||
jiai marai bhala bhūpati jānā| mora hṛdaya sata kulisa samānā||
Meaning अपने स्रेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्रकी मैं माता ! जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज़रोंके समान कठोर है॥ ४॥
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥ १६६॥
kausalyā ke bacana suni bharata sahita ranivāsa|
byākula bilapata rājagṛha mānahum̐ soka nevāsu|| 166||
Meaning कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोकका निवास बन गया॥ १६६॥
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥
भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥
bilapahiṃ bikala bharata dou bhāī| kausalyām̐ lie hṛdayam̐ lagāī||
bhām̐ti aneka bharatu samujhāe| kahi bibekamaya bacana sunāe||
Meaning भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजीने उनको हदयसे लगा लिया। अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं॥ १॥
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥
bharatahum̐ mātu sakala samujhāīṃ| kahi purāna śruti kathā suhāīṃ|
chala bihīna suci sarala subānī| bole bharata jori juga pānī||
Meaning भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले-॥ २॥
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥
je agha mātu pitā suta māreṃ| gāi goṭha mahisura pura jāreṃ||
je agha tiya bālaka badha kīnheṃ| mīta mahīpati māhura dīnheṃ||
Meaning जो पाप माता-पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं--॥ ३॥
जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं॥
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता॥
je pātaka upapātaka ahahīṃ| karama bacana mana bhava kabi kahahīṃ||
te pātaka mohi hohum̐ bidhātā| jauṃ yahu hoi mora mata mātā||
Meaning कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें॥ ४॥
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥ १६७॥
je parihari hari hara carana bhajahiṃ bhūtagana ghora|
tehi kai gati mohi deu bidhi jauṃ jananī mata mora|| 167||
Meaning जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे॥ १६७॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
becahiṃ bedu dharamu duhi lehīṃ| pisuna parāya pāpa kahi dehīṃ||
kapaṭī kuṭila kalahapriya krodhī| beda bidūṣaka bisva birodhī||
Meaning जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं;॥ १॥
लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥
पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥
lobhī laṃpaṭa lolupacārā| je tākahiṃ paradhanu paradārā||
pāvauṃ maiṃ tinha ke gati ghorā| jauṃ jananī yahu saṃmata morā||
Meaning जो लोभी, लम्पट और लालचियोंका आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्रीकी ताकमें रहते हैं; हे जननी ! यदि इस काममें मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गतिको पाऊँ॥ २॥
जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥
je nahiṃ sādhusaṃga anurāge| paramāratha patha bimukha abhāge||
je na bhajahiṃ hari naratanu pāī| jinhahi na hari hara sujasu sohāī||
Meaning जिनका सत्सज्में प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर ( भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता;॥ ३॥
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥
taji śrutipaṃthu bāma patha calahīṃ| baṃcaka biraci beṣa jagu chalahīṃ||
tinha kai gati mohi saṃkara deū| jananī jauṃ yahu jānauṃ bheū||
Meaning जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें॥ ४॥
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ॥ १६८॥
mātu bharata ke bacana suni sām̐ce sarala subhāyam̐|
kahati rāma priya tāta tumha sadā bacana mana kāyam̐|| 168||
Meaning माता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनोंको सुनकर कहने लगीं- हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो॥ १६८॥
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥
rāma prānahu teṃ prāna tumhāre| tumha raghupatihi prānahu teṃ pyāre||
bidhu biṣa cavai stravai himu āgī| hoi bāricara bāri birāgī||
Meaning श्रीराम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथको प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जलसे विरक्त हो जाय,॥ १॥
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥
bhaem̐ gyānu baru miṭai na mohū| tumha rāmahi pratikūla na hohū||
mata tumhāra yahu jo jaga kahahīṃ| so sapanehum̐ sukha sugati na lahahīṃ||
Meaning और ज्ञान हो जानेपर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्रके प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत्में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्रमें भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे॥ २॥
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए॥
करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती॥
asa kahi mātu bharatu hiyam̐ lāe| thana paya stravahiṃ nayana jala chāe||
karata bilāpa bahuta yahi bhām̐tī| baiṭhehiṃ bīti gai saba rātī||
Meaning ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही- बेठे बीत गयी॥ ३॥
बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे॥
bāmadeu basiṣṭha taba āe| saciva mahājana sakala bolāe||
muni bahu bhām̐ti bharata upadese| kahi paramāratha bacana sudese||
Meaning तब वामदेवजी और वसिष्टजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया॥ ४॥
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥ १६९॥
tāta hṛdayam̐ dhīraju dharahu karahu jo avasara āju|
uṭhe bharata gura bacana suni karana kaheu sabu sāju|| 169||
Meaning [ वसिष्ठजीने कहा--] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो। गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा॥ १६९॥
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥
गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥
nṛpatanu beda bidita anhavāvā| parama bicitra bimānu banāvā||
gahi pada bharata mātu saba rākhī| rahīṃ rāni darasana abhilāṣī||
Meaning वेदोंमें बतायी हुई विधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजीने सब माताओंको चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थथा करके उनको सती होनेसे रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं॥ १॥
चंदन अगर भार बहु आए।
अमित अनेक सुगंध सुहाए॥
caṃdana agara bhāra bahu āe| amita aneka sugaṃdha suhāe||
Meaning चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [ कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो॥ २॥
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही।
बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही॥
ehi bidhi dāha kriyā saba kīnhī| bidhivata nhāi tilāṃjuli dīnhī||
सोधि सुमृति सब बेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥
sodhi sumṛti saba beda purānā| kīnha bharata dasagāta bidhānā||
Meaning इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाझलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र- विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया॥ ३॥
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा॥
भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना॥
jaham̐ jasa munibara āyasu dīnhā| taham̐ tasa sahasa bhām̐ti sabu kīnhā||
bhae bisuddha die saba dānā| dhenu bāji gaja bāhana nānā||
Meaning मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ,॥ ४॥
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम॥ १७०॥
siṃghāsana bhūṣana basana anna dharani dhana dhāma|
die bharata lahi bhūmisura bhe paripūrana kāma|| 170||
Meaning सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये (अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं )॥ १७०॥
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥
pitu hita bharata kīnhi jasi karanī| so mukha lākha jāi nahiṃ baranī||
sudinu sodhi munibara taba āe| saciva mahājana sakala bolāe||
Meaning पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्टडजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया॥ १॥
बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई॥
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे॥
baiṭhe rājasabhām̐ saba jāī| paṭhae boli bharata dou bhāī||
bharatu basiṣṭha nikaṭa baiṭhāre| nīti dharamamaya bacana ucāre||
Meaning सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुष्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्टजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे॥ २॥
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी॥
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा॥
prathama kathā saba munibara baranī| kaikai kuṭila kīnhi jasi karanī||
bhūpa dharamabratu satya sarāhā| jehiṃ tanu parihari premu nibāhā||
Meaning पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा॥ ३॥
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥
kahata rāma guna sīla subhāū| sajala nayana pulakeu munirāū||
bahuri lakhana siya prīti bakhānī| soka saneha magana muni gyānī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंगें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्त्रेहमें मग्र हो गये॥ ४॥
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥ १७१॥
sunahu bharata bhāvī prabala bilakhi kaheu muninātha|
hāni lābhu jīvana maranu jasu apajasu bidhi hātha|| 171||
Meaning मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा--हे भरत! सुनो, भावी ( होनहार) बड़ी बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं॥ १७१॥
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥
asa bicāri kehi deia dosū| byaratha kāhi para kījia rosū||
tāta bicāru kehi karahu mana māhīṃ| soca jogu dasarathu nṛpu nāhīṃ||
Meaning ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय ? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें विचार करो। राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं॥ १॥
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना।
तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥
socia bipra jo beda bihīnā| taji nija dharamu biṣaya layalīnā||
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।
जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥
socia nṛpati jo nīti na jānā| jehi na prajā priya prāna samānā||
Meaning सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय- भोगमें ही लीन रहता है। उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है॥ २॥
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू।
जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥
socia bayasu kṛpana dhanavānū| jo na atithi siva bhagati sujānū||
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी।
मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥
socia sūdru bipra avamānī| mukhara mānapriya gyāna gumānī||
Meaning उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा शिवजीकी भक्ति करनेमें कुशल नहीं है। उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला,. बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला. और ज्ञानका घमंड रखनेवाला है॥ ३॥
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी।
कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥
socia puni pati baṃcaka nārī| kuṭila kalahapriya icchācārī||
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।
जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥
socia baṭu nija bratu pariharaī| jo nahiṃ gura āyasu anusaraī||
Meaning पुनः उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारीका सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रतको छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता॥ ४॥
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
socia gṛhī jo moha basa karai karama patha tyāga|
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग॥ १७९२॥
socia jati praṃpaca rata bigata bibeka birāga|| 1792||
Meaning उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपश्नमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है॥ १७२॥
बेखानस सोड़ सोचे जोगू।
तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥
bekhānasa soṛa soce jogū| tapu bihāi jehi bhāvai bhogū||
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी।
जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥
socia pisuna akārana krodhī| janani janaka gura baṃdhu birodhī||
Meaning वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है॥ १॥