यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥
भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए॥
yaha sudhi pāi prayāga nivāsī| baṭu tāpasa muni siddha udāsī||
bharadvāja āśrama saba āe| dekhana dasaratha suana suhāe||
Meaning यह (श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके आनेकी ) खबर पाकर प्रयागनिवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजीके सुन्दर पुत्रोंको देखनेके लिये भरद्वाजजीके आश्रमपर आये॥ ३॥
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू॥
देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई॥
rāma pranāma kīnha saba kāhū| mudita bhae lahi loyana lāhū||
dehiṃ asīsa parama sukhu pāī| phire sarāhata suṃdaratāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। नेत्रोंका लाभ पाकर सब आनन्दित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए वे लौटे॥ ४॥
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।
चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ॥ १०८॥
rāma kīnha biśrāma nisi prāta prayāga nahāi|
cale sahita siya lakhana jana mudadita munihi siru nāi|| 108||
Meaning श्रीरामजीने रातको वहीं विश्राम किया और प्रात: काल प्रयागराजका स्नान करके और प्रसन्नताके साथ मुनिको सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहके साथ वे चले॥ १०८॥
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥
rāma saprema kaheu muni pāhīṃ| nātha kahia hama kehi maga jāhīṃ||
muni mana bihasi rāma sana kahahīṃ| sugama sakala maga tumha kahum̐ ahahīṃ||
Meaning [चलते समय] बड़े प्रेमसे श्रीरामजीने मुनिसे कहा-- हे नाथ! बताइये हम किस मार्गसे जायेँ। मुनि मनमें हँसकर श्रीरामजीसे कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं॥ १॥
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा॥
sātha lāgi muni siṣya bolāe| suni mana mudita pacāsaka āe||
sabanhi rāma para prema apārā| sakala kahahi magu dīkha hamārā||
Meaning फिर उनके साथके लिये मुनिने शिष्योंको बुलाया। [साथ जानेकी बात सुनते ही चित्तमें हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभीका श्रीरामजीपर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है॥ २॥
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥
muni baṭu cāri saṃga taba dīnhe| jinha bahu janama sukṛta saba kīnhe||
kari pranāmu riṣi āyasu pāī| pramudita hṛdayam̐ cale raghurāī||
Meaning तब मुनिने [ चुनकर] चार ब्रहमचारियोंको साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मोंतक सब सुकृत (पुण्य) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषिकी आज्ञा पाकर हृदयमें बड़े ही आनन्दित होकर चले॥ ३॥
ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई॥
होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई॥
grāma nikaṭa jaba nikasahi jāī| dekhahi darasu nāri nara dhāī||
hohi sanātha janama phalu pāī| phirahi dukhita manu saṃga paṭhāī||
Meaning जब वे किसी गाँवके पास होकर निकलते हैं तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूपको देखने लगते हैं। जन्मका फल पाकर वे [सदाके अनाथ] सनाथ हो जाते हैं और मनको नाथके साथ भेजकर [शरीरसे साथ न रहनेके कारण] दुःखी होकर लौट आते हैं॥ ४॥
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥ १०९॥
bidā kie baṭu binaya kari phire pāi mana kāma|
utari nahāe jamuna jala jo sarīra sama syāma|| 109||
Meaning तदनन्तर श्रीरामजीने विनती करके चारों ब्रह्मचारियोंको विदा किया; वे मनचाही वस्तु (अनन्य भक्ति) पाकर लौटे। यमुनाजीके पार उतरकर सबने यमुनाजीके जलमें स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजीके शरीरके समान ही श्याम रंगका था॥ १०९॥
सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥
लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥
sunata tīravāsī nara nārī| dhāe nija nija kāja bisārī||
lakhana rāma siya sundaratāī| dekhi karahiṃ nija bhāgya baṛāī||
Meaning यमुनाजीके किनारेपर रहनेवाले स्त्री-पुरुष [यह सुनकर कि निषादके साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है] सब अपना-अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका सौन्दर्य देखकर अपने भाग्यकी बड़ाई करने लगे॥ १॥
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥
ati lālasā basahiṃ mana māhīṃ| nāum̐ gāum̐ būjhata sakucāhīṃ||
je tinha mahum̐ bayabiridha sayāne| tinha kari juguti rāmu pahicāne||
Meaning उनके मनमें [ परिचय जाननेकी ] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगोंमें जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीको पहचान लिया॥ २॥
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं॥
sakala kathā tinha sabahi sunāī| banahi cale pitu āyasu pāī||
suni sabiṣāda sakala pachitāhīṃ| rānī rāyam̐ kīnha bhala nāhīṃ||
Meaning उन्होंने सब कथा सब लोगोंको सुनायी कि पिताकी आज्ञा पाकर ये वनको चले हैं। यह सुनकर सब लोग दुःखित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया॥ ३॥
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥
कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥
tehi avasara eka tāpasu āvā| tejapuṃja laghubayasa suhāvā||
kavi alakhita gati beṣu birāgī| mana krama bacana rāma anurāgī||
Meaning उसी अवसरपर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजका पुजझ्ञ, छोटी अवस्थाका और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते [अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता]। वह वैरागीके वेषमें था और मन, वचन तथा कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी था॥ ४॥ [इस तेज:पुझ् तापसके प्रसंगको कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगोंके देखनेमें यह अप्रासंगिक और ऊपरसे जोड़ा हुआ-सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियोंमें है। गुसाईंजी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे। पता नहीं, यहाँ इस प्रसंगके रखनेमें क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापसको जब *कबि अलखित गति' कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है। हमारी समझसे ये तापस या तो श्रीहनुमानूजी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी ! ]
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥ ११०॥
sajala nayana tana pulaki nija iṣṭadeu pahicāni|
pareu daṃḍa jimi dharanitala dasā na jāi bakhāni|| 110||
Meaning अपने इष्टदेवको पहचानकर उसके नेत्रोंगें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसकी [प्रेमविह्नल] दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ११०॥
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥
rāma saprema pulaki ura lāvā| parama raṃka janu pārasu pāvā||
manahum̐ premu paramārathu doū| milata dhare tana kaha sabu koū||
Meaning श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ; मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [ देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं॥ १॥
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥
bahuri lakhana pāyanha soi lāgā| līnha uṭhāi umagi anurāgā||
puni siya carana dhūri dhari sīsā| janani jāni sisu dīnhi asīsā||
Meaning फिर वह लक्ष्मणजीके चरणों लगा। उन्होंने प्रेमसे उमँगकर उसको उठा लिया। फिर उसने सीताजीकी चरणधूलिको अपने सिरपर धारण किया। माता सीताजीने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया॥ २॥
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥
kīnha niṣāda daṃḍavata tehī| mileu mudita lakhi rāma sanehī||
piata nayana puṭa rūpu piyūṣā| mudita suasanu pāi jimi bhūkhā||
Meaning फिर निषादराजने उसको दण्डवत् की। श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी जानकर वह उस (निषाद) से आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी दोनोंसे श्रीरामजीकी सौन्दर्य-सुधाका पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनन्दित होता है॥३॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥
te pitu mātu kahahu sakhi kaise| jinha paṭhae bana bālaka aise||
rāma lakhana siya rūpu nihārī| hohiṃ saneha bikala nara nārī||
Meaning [इधर गाँवकी स्त्रियाँ कह रही हैं--] हे सखी! कहो तो,वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर सुकुमार) बालकोंको वनमें भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेहसे व्याकुल हो जाते हैं॥ ४॥
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह॥ १११॥
taba raghubīra aneka bidhi sakhahi sikhāvanu dīnha|
rāma rajāyasu sīsa dhari bhavana gavanu teṃim̐ kīnha|| 111||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीने सखा गुहको अनेकों तरहसे [घर लौट जानेके लिये] समझाया। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसने अपने घरको गमन किया॥ १११॥
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥
चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥
puni siyam̐ rāma lakhana kara jorī| jamunahi kīnha pranāmu bahorī||
cale sasīya mudita dou bhāī| rabitanujā kai karata baṛāī||
Meaning फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर यमुनाजीको पुन: प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजीकी बड़ाई करते हुए सीताजीसहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले॥ श॥
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥
राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥
pathika aneka milahiṃ maga jātā| kahahiṃ saprema dekhi dou bhrātā||
rāja lakhana saba aṃga tumhāreṃ| dekhi socu ati hṛdaya hamāreṃ||
Meaning रास्तेमें जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयोंको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अड्डोंगें राजचिह्न देखकर हमारे हदयमें बड़ा सोच होता है॥ २॥
मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ॥
अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥
māraga calahu payādehi pāem̐| jyotiṣu jhūṭha hamāreṃ bhāem̐||
agamu paṃtha giri kānana bhārī| tehi maham̐ sātha nāri sukumārī||
Meaning [ ऐसे राजचिह्लोंके होते हुए भी] तुमलोग रास्तेमें पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझमें आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ोंका दुर्गम रास्ता है। तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है॥ ३॥
करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई॥
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥
kari kehari bana jāi na joī| hama sam̐ga calahi jo āyasu hoī||
jāba jahām̐ lagi taham̐ pahum̐cāī| phiraba bahori tumhahi siru nāī||
Meaning हाथी और सिंहोंसे भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँतक जायेँगे वहाँतक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे॥ ४॥
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥ ११२॥
ehi bidhi pūm̐chahiṃ prema basa pulaka gāta jalu naina|
kṛpāsiṃdhu pherahi tinhahi kahi binīta mṛdu baina|| 112||
Meaning इस प्रकार वे यात्री प्रेमबश पुलकितशरीर हो और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओोंका] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं॥ ११२॥
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥
je pura gām̐va basahiṃ maga māhīṃ| tinhahi nāga sura nagara sihāhīṃ||
kehi sukṛtīṃ kehi gharīṃ basāe| dhanya punyamaya parama suhāe||
Meaning जो गाँव और पुरवे रास्तेमें बसे हैं, नागों और देवताओंके नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवानूने किस शुभ घड़ीमें इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं॥ १॥
जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥
पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥
jaham̐ jaham̐ rāma carana cali jāhīṃ| tinha samāna amarāvati nāhīṃ||
punyapuṃja maga nikaṭa nivāsī| tinhahi sarāhahiṃ surapurabāsī||
Meaning जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजीके चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्रकी पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्तेके समीप बसनेवाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं--स्वर्गमें रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं--॥ २॥
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥
जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥
je bhari nayana bilokahiṃ rāmahi| sītā lakhana sahita ghanasyāmahi||
je sara sarita rāma avagāhahiṃ| tinhahi deva sara sarita sarāhahiṃ||
Meaning जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजीके दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियोंमें श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी बड़ाई करती हैं॥ ३॥
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥
jehi taru tara prabhu baiṭhahiṃ jāī| karahiṃ kalapataru tāsu baṛāī||
parasi rāma pada paduma parāgā| mānati bhūmi bhūri nija bhāgā||
Meaning जिस वृक्षके नीचे प्रभु जा बेठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलोंकी रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है॥ ४॥
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं॥ ११३॥
chām̐ha karahi ghana bibudhagana baraṣahi sumana sihāhiṃ|
dekhata giri bana bihaga mṛga rāmu cale maga jāhiṃ|| 113||
Meaning रास्तेमें बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु- पक्षियोंको देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं॥ ११३॥
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी॥
sītā lakhana sahita raghurāī| gām̐va nikaṭa jaba nikasahiṃ jāī||
suni saba bāla bṛddha nara nārī| calahiṃ turata gṛhakāju bisārī||
Meaning सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँवके पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काजको भूलकर तुरंत उन्हें देखनेके लिये चल देते हैं॥ १॥
राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी॥
सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥
rāma lakhana siya rūpa nihārī| pāi nayanaphalu hohiṃ sukhārī||
sajala bilocana pulaka sarīrā| saba bhae magana dekhi dou bīrā||
Meaning श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीका रूप देखकर, नेत्रोंका [ परम] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयोंको देखकर सब प्रेमानन्दमें मग्र हो गये। उनके नेत्रोंगें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये॥ २॥
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥
barani na jāi dasā tinha kerī| lahi janu raṃkanha suramani ḍherī||
ekanha eka boli sikha dehīṃ| locana lāhu lehu chana ehīṃ||
Meaning उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दख़्ोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो। वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो॥ ३॥
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥
rāmahi dekhi eka anurāge| citavata cale jāhiṃ sam̐ga lāge||
eka nayana maga chabi ura ānī| hohiṃ sithila tana mana bara bānī||
Meaning कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है)॥ ४॥
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥ ११४॥
eka dekhiṃ baṭa chām̐ha bhali ḍāsi mṛdula tṛna pāta|
kahahiṃ gavām̐ia chinuku śramu gavanaba abahiṃ ki prāta|| 114||
Meaning कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे॥ ११४॥
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥
eka kalasa bhari ānahiṃ pānī| am̐caia nātha kahahiṃ mṛdu bānī||
suni priya bacana prīti ati dekhī| rāma kṛpāla susīla biseṣī||
Meaning कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणीसे कहते हैं--नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजीने--॥ १॥
जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥
मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥
jānī śramita sīya mana māhīṃ| gharika bilaṃbu kīnha baṭa chāhīṃ||
mudita nāri nara dekhahiṃ sobhā| rūpa anūpa nayana manu lobhā||
Meaning मनमें सीताजीको थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़की छायामें विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है॥ २॥
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥
तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥
ekaṭaka saba sohahiṃ cahum̐ orā| rāmacaṃdra mukha caṃda cakorā||
taruna tamāla barana tanu sohā| dekhata koṭi madana manu mohā||
Meaning सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजीका नवीन तमाल वृक्षके रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं॥ ३॥
दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा॥
dāmini barana lakhana suṭhi nīke| nakha sikha subhaga bhāvate jī ke||
munipaṭa kaṭinha kaseṃ tūnīrā| sohahiṃ kara kamalini dhanu tīrā||
Meaning बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं, और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके (वल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं॥ ४॥
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥ ११५॥
jaṭā mukuṭa sīsani subhaga ura bhuja nayana bisāla|
sarada paraba bidhu badana bara lasata sveda kana jāla|| 115||
Meaning उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्ष:स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है॥ ११५॥
बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥
barani na jāi manohara jorī| sobhā bahuta thori mati morī||
rāma lakhana siya suṃdaratāī| saba citavahiṃ cita mana mati lāī||
Meaning उस मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीकी सुन्दरताको सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं॥ १॥
थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥
thake nāri nara prema piāse| manahum̐ mṛgī mṛga dekhi diā se||
sīya samīpa grāmatiya jāhīṃ| pūm̐chata ati saneham̐ sakucāhīṃ||
Meaning प्रेमके प्यासे [वे गाँवोंके] स्त्री-पुरुष [ इनके सौन्दर्य-माधुर्यकी छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपकको देखकर हिरनी और हिरन [ निस्तब्ध रह जाते हैं ] ! गाँवोंकी स्त्रियाँ सीताजीके पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेहके कारण पूछते सकुचाती हैं॥ २॥
बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥
राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥
bāra bāra saba lāgahiṃ pāem̐| kahahiṃ bacana mṛdu sarala subhāem̐||
rājakumāri binaya hama karahīṃ| tiya subhāyam̐ kachu pūm̐chata ḍarahīṃ||
Meaning बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं-हे राजकुमारी ! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती) हैं, परन्तु स्त्री-स्वभावके कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं॥ ३॥
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥
राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥
svāmini abinaya chamabi hamārī| bilagu na mānaba jāni gavām̐rī||
rājakuam̐ra dou sahaja salone| inha teṃ lahī duti marakata sone||
Meaning हे स्वामिनि! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभावसे ही लावण्यमय ( परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्णने कान्ति इन्हींसे पायी है ( अर्थात् मरकतमणिमें और स्वर्णमें जो हरित और स्वर्णवर्णकी आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्तिके एक कणके बराबर भी नहीं है)॥ ४॥
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥ ११६॥
syāmala gaura kisora bara suṃdara suṣamā aina|
sarada sarbarīnātha mukhu sarada saroruha naina|| 116||
Meaning श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद्-ऋतुके कमलके समान इनके नेत्र हैं॥ ११६॥
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥
koṭi manoja lajāvanihāre| sumukhi kahahu ko āhiṃ tumhāre||
suni sanehamaya maṃjula bānī| sakucī siya mana mahum̐ musukānī||
Meaning हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं॥ १॥
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी॥
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥
tinhahi biloki bilokati dharanī| duhum̐ sakoca sakucita barabaranī||
sakuci saprema bāla mṛga nayanī| bolī madhura bacana pikabayanī||
Meaning उत्तम (गौर) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [ संकोचवश] पृथ्वीकी ओर देखती हैं। वे दोनों ओरके संकोचसे सकुचा रही हैं ( अर्थात् न बतानेमें ग्रामकी स्त्रियोंको दु:ख होनेका संकोच है और बतानेमें लज्जारूप संकोच)। हिरणके बच्चेके सदृश नेत्रवाली और कोकिलकी-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं--॥ २॥
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥
sahaja subhāya subhaga tana gore| nāmu lakhanu laghu devara more||
bahuri badanu bidhu aṃcala ḍhām̐kī| piya tana citai bhauṃha kari bām̐kī||
Meaning ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीरके हैं,उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजीने [ लजावश] अपने चन्द्रमुखको आँचलसे ढककर और प्रियतम ( श्रीरामजी) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,॥ ३॥
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥
भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥
khaṃjana maṃju tirīche nayanani| nija pati kaheu tinhahi siyam̐ sayanani||
bhai mudita saba grāmabadhūṭīṃ| raṃkanha rāya rāsi janu lūṭīṃ||
Meaning खंजन पक्षीके-से सुन्दर नेत्रोंको तिरछा करके सीताजीने इशारेसे उन्हें कहा कि ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँवकी सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालोंने धनकी राशियाँ लूट ली हों॥ ४॥
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥ ११७॥
ati saprema siya pāyam̐ pari bahubidhi dehiṃ asīsa|
sadā sohāgini hohu tumha jaba lagi mahi ahi sīsa|| 117||
Meaning वे अत्यन्त प्रेमसे सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जबतक शेषजीके सिरपर पृथ्वी रहे, तबतक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो,॥ ११७॥
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥
pārabatī sama patipriya hohū| debi na hama para chāṛaba chohū||
puni puni binaya karia kara jorī| jauṃ ehi māraga phiria bahorī||
Meaning और पार्वतीजीके समान अपने पतिकी प्यारी होओ। हे देवि! हमपर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें,॥ १॥
दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥
darasanu deba jāni nija dāsī| lakhīṃ sīyam̐ saba prema piāsī||
madhura bacana kahi kahi paritoṣīṃ| janu kumudinīṃ kaumudīṃ poṣīṃ||
Meaning और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजीने उन सबको प्रेमकी प्यासी देखा, और मधुर वचन कह-कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया। मानो चाँदनीने कुमुदिनियोंको खिलाकर पुष्ठ कर दिया हो॥ २॥
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥
सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥
tabahiṃ lakhana raghubara rukha jānī| pūm̐cheu magu loganhi mṛdu bānī||
sunata nāri nara bhae dukhārī| pulakita gāta bilocana bārī||
Meaning उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर लक्ष्मणजीने कोमल वाणीसे लोगोंसे रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये। उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंगें [वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका] जल भर आया॥ ३॥
मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥
miṭā modu mana bhae malīne| bidhi nidhi dīnha leta janu chīne||
samujhi karama gati dhīraju kīnhā| sodhi sugama magu tinha kahi dīnhā||
Meaning उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो। कर्मकी गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया॥ ४॥
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥ ११८॥
lakhana jānakī sahita taba gavanu kīnha raghunātha|
phere saba priya bacana kahi lie lāi mana sātha|| 118||
Meaning तब लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित श्रीरघुनाथजीने गमन किया और सब लोगोंको प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया॥ ११८॥
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं॥
सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥
phirata nāri nara ati pachitāhīṃ| deahi doṣu dehiṃ mana māhīṃ||
sahita biṣāda parasapara kahahīṃ| bidhi karataba ulaṭe saba ahahīṃ||
Meaning लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैवको दोष देते हैं। परस्पर [बड़े ही] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलरटे हैं॥ १॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥
रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥
nipaṭa niraṃkusa niṭhura nisaṃkū| jehiṃ sasi kīnha saruja sakalaṃkū||
rūkha kalapataru sāgaru khārā| tehiṃ paṭhae bana rājakumārā||
Meaning वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया। उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है॥ २॥
जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥
jauṃ pe inhahi dīnha banabāsū| kīnha bādi bidhi bhoga bilāsū||
e bicarahiṃ maga binu padatrānā| race bādi bidhi bāhana nānā||
Meaning जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूतेके (नंगे ही पैरों ) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे॥ ३॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥
e mahi parahiṃ ḍāsi kusa pātā| subhaga seja kata sṛjata bidhātā||
tarubara bāsa inhahi bidhi dīnhā| dhavala dhāma raci raci śramu kīnhā||
Meaning जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीनपर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज (पलंग और बिछौने) किसलिये बनाता है ? विधाताने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों [ के नीचे] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलोंको बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया॥ ४॥
जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुक़ुमार।
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥ ११९॥
jauṃ e muni paṭa dhara jaṭila suṃdara suṭhi suqumāra|
bibidha bhām̐ti bhūṣana basana bādi kie karatāra|| 119||
Meaning जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके (वल्कल) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार (विधाता) ने भाँति-भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये॥ ११९॥
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥
एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥
jauṃ e kaṃda mūla phala khāhīṃ| bādi sudhādi asana jaga māhīṃ||
eka kahahiṃ e sahaja suhāe| āpu pragaṭa bhae bidhi na banāe||
Meaning जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं--ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं॥ १॥
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥
देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥
jaham̐ lagi beda kahī bidhi karanī| śravana nayana mana gocara baranī||
dekhahu khoji bhuana dasa cārī| kaham̐ asa puruṣa kahām̐ asi nārī||
Meaning हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं ? [कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं]॥ २॥
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥
inhahi dekhi bidhi manu anurāgā| paṭatara joga banāvai lāgā||
kīnha bahuta śrama aika na āe| tehiṃ iriṣā bana āni durāe||
Meaning इन्हें देखकर विधाताका मन अनुरक्त (मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हींकी उपमाके योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकलमें ही नहीं आये (पूरे नहीं उतरे)। इसी ईष्यकि मारे उसने इनको जंगलमें लाकर छिपा दिया है॥ ३॥
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥
eka kahahiṃ hama bahuta na jānahiṃ| āpuhi parama dhanya kari mānahiṃ||
te puni punyapuṃja hama lekhe| je dekhahiṃ dekhihahiṃ jinha dekhe||
Meaning कोई एक कहते हैं--हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपनेको परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं] और हमारी समझमें वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे॥ ४॥
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥ १२०॥
ehi bidhi kahi kahi bacana priya lehiṃ nayana bhari nīra|
kimi calihahi māraga agama suṭhi sukumāra sarīra|| 120||
Meaning इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रोंगें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम (कठिन) मार्गमें कैसे चलेंगे॥ १२०॥
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं॥
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥
nāri saneha bikala basa hohīṃ| cakaī sām̐jha samaya janu sohīṃ||
mṛdu pada kamala kaṭhina magu jānī| gahabari hṛdayam̐ kahahiṃ bara bānī||
Meaning स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्याके समय चकवी [ भावी वियोगकी पीड़ासे ] सोह रही हों (दुखी हो रही हों )। इनके चरणकमलोंको कोमल तथा मार्गको कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं--॥ १॥
परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥
parasata mṛdula carana arunāre| sakucati mahi jimi hṛdaya hamāre||
jauṃ jagadīsa inhahi banu dīnhā| kasa na sumanamaya māragu kīnhā||
Meaning इनके कोमल और लाल-लाल चरणों (तलवों) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वरने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्तेको पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया ?॥ २॥
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥
जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥
jauṃ māgā pāia bidhi pāhīṃ| e rakhiahiṃ sakhi ām̐khinha māhīṃ||
je nara nāri na avasara āe| tinha siya rāmu na dekhana pāe||
Meaning यदि ब्रह्मासे माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखोंमें ही रखें ! जो स्त्री-पुरुष इस अवसरपर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजीको नहीं देख सके॥ ३॥
सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥
suni surupa būjhahiṃ akulāī| aba lagi gae kahām̐ lagi bhāī||
samaratha dhāi bilokahiṃ jāī| pramudita phirahiṃ janamaphalu pāī||
Meaning उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई ! अबतक वे कहाँतक गये होंगे ? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं॥ ४॥
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं॥ १२१॥
abalā bālaka bṛddha jana kara mījahiṃ pachitāhiṃ|
hohiṃ premabasa loga imi rāmu jahām̐ jaham̐ jāhiṃ|| 121||
Meaning [ गर्भवती, प्रसूता आदि] अबला स्त्रयाँ, बच्चे और बूढ़े [दर्शन न पानेसे] हाथ मलते और पछताते हैं। इस प्रकार जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेमके वशगें हो जाते हैं॥ १२१॥
गावें गावँ अस होड़ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥
जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥
gāveṃ gāvam̐ asa hoṛa anaṃdū| dekhi bhānukula kairava caṃdū||
je kachu samācāra suni pāvahiṃ| te nṛpa rānihi dosu lagāvahiṃ||
Meaning सूर्यकुलरूपी कुमुदिनीके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर गाँव- गाँवमें ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग [वनवास दिये जानेका] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [दशरथ-कैकेयी] को दोष लगाते हैं॥ १॥
कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥
कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं॥
kahahiṃ eka ati bhala naranāhū| dīnha hamahi joi locana lāhū||
kahahiṃ paraspara loga logāīṃ| bāteṃ sarala saneha suhāīṃ||
Meaning कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रोंका लाभ दिया। स्त्री- पुरुष सभी आपसभमें सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं॥ २॥
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥
te pitu mātu dhanya jinha jāe| dhanya so nagaru jahām̐ teṃ āe||
dhanya so desu sailu bana gāūm̐| jaham̐ jaham̐ jāhiṃ dhanya soi ṭhāūm̐||
Meaning [कहते हैं--] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य है जहाँसे ये आये हैं। वह देश,पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ-जहाँ ये जाते हैं॥ ३॥
सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥
राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥
sukha pāyau biraṃci raci tehī| e jehi ke saba bhām̐ti sanehī||
rāma lakhana pathi kathā suhāī| rahī sakala maga kānana chāī||
Meaning ब्रह्माने उसीको रचकर सुख पाया है जिसके ये (श्रीरामचन्द्रजी ) सब प्रकारसे स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम-लक्ष्मणकी सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगलमें छा गयी है॥ ४॥
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥ १२२॥
ehi bidhi raghukula kamala rabi maga loganha sukha deta|
jāhiṃ cale dekhata bipina siya saumitri sameta|| 122||
Meaning रघुकुलरूपी कमलके खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्गके लोगोंको सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं॥ १२२॥
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥
उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे॥
āge rāmu lakhanu bane pācheṃ| tāpasa beṣa birājata kācheṃ||
ubhaya bīca siya sohati kaise| brahma jīva bica māyā jaise||
Meaning आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियोंके वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनोंके बीचमें सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीचमें माया !॥ १॥
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥
bahuri kahaum̐ chabi jasi mana basaī| janu madhu madana madhya rati lasaī||
upamā bahuri kahaum̐ jiyam̐ johī| janu budha bidhu bica rohini sohī||
Meaning फिर जैसी छबि मेरे मनमें बस रही है, उसको कहता हूँ- मानो वसन्त-ऋतु और कामदेवके बीचमें रति (कामदेवकी स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदयमें खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमाके पुत्र) और चन्द्रमाके बीचमें रोहिणी (चन्द्रमाकी स्त्री) सोह रही हो॥ २॥
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥
सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥
prabhu pada rekha bīca bica sītā| dharati carana maga calati sabhītā||
sīya rāma pada aṃka barāem̐| lakhana calahiṃ magu dāhina lāem̐||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [ जमीनपर अड़्ित होनेवाले दोनों] चरणचिह्लोंके बीच-बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [ कहीं भगवान्ूके चरणचिष्लोंपर पैर न टिक जाय इस बातसे] डरती हुई मार्गमें चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [ मर्यादाकी रक्षाके लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचि्लों को बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं॥३॥
राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥
खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥
rāma lakhana siya prīti suhāī| bacana agocara kimi kahi jāī||
khaga mṛga magana dekhi chabi hohīṃ| lie cori cita rāma baṭohīṃ||
Meaning श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीकी सुन्दर प्रीति वाणीका विषय नहीं है (अर्थात् अनिर्वचनीय है), अत: वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर ( प्रेमानन्दमें) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजीने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं॥ ४॥
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ॥ १२३॥
jinha jinha dekhe pathika priya siya sameta dou bhāi|
bhava magu agamu anaṃdu tei binu śrama rahe sirāi|| 123||
Meaning प्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग ( जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया ( अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)॥ १२३॥
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥
राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥
ajahum̐ jāsu ura sapanehum̐ kāū| basahum̐ lakhanu siya rāmu baṭāū||
rāma dhāma patha pāihi soī| jo patha pāva kabahum̐ muni koī||
Meaning आज भी जिसके हृदयमें स्वप्रमें भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीराीमजीके परमधामके उस मार्गको पा जायगा जिस मार्गको कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं॥ १॥
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥
तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥
taba raghubīra śramita siya jānī| dekhi nikaṭa baṭu sītala pānī||
taham̐ basi kaṃda mūla phala khāī| prāta nahāi cale raghurāī||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़का वृक्ष और ठंडा पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [रातभर वहाँ रहकर] प्रात: काल स्रान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले॥ २॥
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥
राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥
dekhata bana sara saila suhāe| bālamīki āśrama prabhu āe||
rāma dīkha muni bāsu suhāvana| suṃdara giri kānanu jalu pāvana||
Meaning सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है॥ ३॥
सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥
sarani saroja biṭapa bana phūle| guṃjata maṃju madhupa rasa bhūle||
khaga mṛga bipula kolāhala karahīṃ| birahita baira mudita mana carahīṃ||
Meaning सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द-रसमें मस्त हुए भौरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। बहुत-से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं॥ ४॥
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन॥ १२४॥
suci suṃdara āśramu nirakhi haraṣe rājivanena|
suni raghubara āgamanu muni āgeṃ āyau lena|| 124||
Meaning पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वालमीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये॥ १२४॥
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥
muni kahum̐ rāma daṃḍavata kīnhā| āsirabādu biprabara dīnhā||
dekhi rāma chabi nayana juṛāne| kari sanamānu āśramahiṃ āne||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये॥ १॥
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए॥
सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए॥
munibara atithi prānapriya pāe| kaṃda mūla phala madhura magāe||
siya saumitri rāma phala khāe| taba muni āśrama die suhāe||
Meaning श्रेष्ठ मुनि वाल््मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया। तब मुनिने उनको [विश्राम करनेके लिये] सुन्दर स्थान बतला दिये॥ २॥
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥
bālamīki mana ānam̐du bhārī| maṃgala mūrati nayana nihārī||
taba kara kamala jori raghurāī| bole bacana śravana sukhadāī||
Meaning [ मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी] मज़ल-मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वालमीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदूश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले--॥ ३॥
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥
tumha trikāla darasī munināthā| bisva badara jimi tumhareṃ hāthā||
asa kahi prabhu saba kathā bakhānī| jehi jehi bhām̐ti dīnha banu rānī||
Meaning हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकारसे रानी कैकेयीने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तारसे सुनायी॥ ४॥
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥ १२५॥
tāta bacana puni mātu hita bhāi bharata asa rāu|
mo kahum̐ darasa tumhāra prabhu sabu mama punya prabhāu|| 125||
Meaning [और कहा--] हे प्रभो! पिताकी आज्ञा [का पालन], माताका हित और भरत-जैसे [स्नेही एवं धर्मात्मा] भाईका राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्योंका प्रभाव है॥ १२५॥
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥
अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥
dekhi pāya munirāya tumhāre| bhae sukṛta saba suphala hamāre||
aba jaham̐ rāura āyasu hoī| muni udabegu na pāvai koī||
Meaning हे मुनिराज! आपके चरणोंका दर्शन करनेसे आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये (हमें सारे पुण्योंका फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्देगको प्राप्त न हो--॥१॥
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥
muni tāpasa jinha teṃ dukhu lahahīṃ| te naresa binu pāvaka dahahīṃ||
maṃgala mūla bipra paritoṣū| dahai koṭi kula bhūsura roṣū||
Meaning क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही (अपने दुष्ट कर्मोंसे ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणोंका संतोष सब मज़लोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है॥ २॥
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला॥
asa jiyam̐ jāni kahia soi ṭhāūm̐| siya saumitri sahita jaham̐ jāūm̐||
taham̐ raci rucira parana tṛna sālā| bāsu karau kachu kāla kṛpālā||
Meaning ऐसा हृदयमें समझकर--वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ। और वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ॥ ३॥
सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥
sahaja sarala suni raghubara bānī| sādhu sādhu bole muni gyānī||
kasa na kahahu asa raghukulaketū| tumha pālaka saṃtata śruti setū||
Meaning श्रीरीमजीकी सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले--धन्य! धन्य! हे रघुकुलके ध्वजास्वरूप ! आप ऐसा क्यों न कहेंगे ? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन (रक्षण) करते हैं॥ ४॥
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
śruti setu pālaka rāma tumha jagadīsa māyā jānakī|
jo sṛjati jagu pālati harati rukha pāi kṛpānidhāna kī||
jo sahasasīsu ahīsu mahidharu lakhanu sacarācara dhanī|
sura kāja dhari nararāja tanu cale dalana khala nisicara anī||
Meaning हे राम! आप वेदकी मर्यादाके रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [ आपकी स्वरूपभूता] माया हैं, जो कृपाके भण्डार आपकी रुख पाकर जगत्का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तकवाले सर्पोंके स्वामी और पृथ्वीको अपने सिरपर धारण करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओंके कार्यके लिये आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं।
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥ १२६॥
rāma sarūpa tumhāra bacana agocara buddhipara|
abigata akatha apāra neti neti nita nigama kaha|| 126||
Meaning हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अआपार है। वेद निरन्तर उसका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं॥ १२६॥
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥
jagu pekhana tumha dekhanihāre| bidhi hari saṃbhu nacāvanihāre||
teu na jānahiṃ maramu tumhārā| auru tumhahi ko jānanihārā||
Meaning हे राम! जगत् दृश्य है, आप उसके देखनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शड्धरको भी नचानेवाले हैं। जब वे भी आपके मर्मको नहीं जानते, तब और कौन आपको जाननेवाला है ?॥ १॥
ड़ जानड़ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥
ṛa jānaṛa jehi dehu janāī| jānata tumhahi tumhai hoi jāī||
tumharihi kṛpām̐ tumhahi raghunaṃdana| jānahiṃ bhagata bhagata ura caṃdana||
Meaning वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनन्दन ! हे भक्तोंके हदयके शीतल करनेवाले चन्दन ! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं॥ २॥