भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥
मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥
bhūpati bhavana subhāyam̐ suhāvā| surapati sadanu na paṭatara pāvā||
manimaya racita cāru caubāre| janu ratipati nija hātha sam̐vāre||
Meaning महाराज दशरथजीका महल तो स्वभावसे ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियोंके रचे चौबारे (छतके ऊपर बँगले) हैं, जिन्हें मानो रतिके पति कामदेवने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है;॥ ४॥
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।
पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास॥ ९०॥
suci subicitra subhogamaya sumana sugaṃdha subāsa|
palam̐ga maṃju manidīpa jaham̐ saba bidhi sakala supāsa|| 90||
Meaning जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुन्दर भोगपदार्थोंसे पूर्ण और फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित हैं; जहाँ सुन्दर पलैँग और मणियोंके दीपक हैं तथा सब प्रकारका पूरा आराम है;॥ ९०॥
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई॥
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥
bibidha basana upadhāna turāī| chīra phena mṛdu bisada suhāī||
taham̐ siya rāmu sayana nisi karahīṃ| nija chabi rati manoja madu harahīṃ||
Meaning जहाँ [ ओढ़ने-बिछानेके] अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूधके फेनके समान कोमल, निर्मल (उज्चल) और सुन्दर हैं; वहाँ (उन चौबारोंमें ) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रातको सोया करते थे और अपनी शोभासे रति और कामदेवके गर्वको हरण करते थे॥ १॥
ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥
मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥
te siya rāmu sātharīṃ soe| śramita basana binu jāhiṃ na joe||
mātu pitā parijana purabāsī| sakhā susīla dāsa aru dāsī||
Meaning वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं। ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी (प्रजा), मित्र, अच्छे शील- स्वभावके दास और दासियाँ--॥ २॥
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥
jogavahiṃ jinhahi prāna kī nāī| mahi sovata tei rāma gosāīṃ||
pitā janaka jaga bidita prabhāū| sasura suresa sakhā raghurāū||
Meaning सब जिनकी अपने प्राणोंकी तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वीपर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगतमें प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्रके मित्र रघुराज दशरथजी हैं,॥ ३॥
रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥
सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥
rāmacaṃdu pati so baidehī| sovata mahi bidhi bāma na kehī||
siya raghubīra ki kānana jogū| karama pradhāna satya kaha logū||
Meaning और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीनपर सो रही हैं। विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी कया वनके योग्य हैं ? लोग सच कहते हैं कि कर्म ( भाग्य)ही प्रधान है॥ ४॥
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥ ९१॥
kaikayanaṃdini maṃdamati kaṭhina kuṭilapanu kīnha|
jehīṃ raghunaṃdana jānakihi sukha avasara dukhu dīnha|| 91||
Meaning कैकयराजकी लड़की नीचबुद्धि कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया॥ ९१॥
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥
bhai dinakara kula biṭapa kuṭhārī| kumati kīnha saba bisva dukhārī||
bhayau biṣādu niṣādahi bhārī| rāma sīya mahi sayana nihārī||
Meaning वह सूर्यकुलरूपी वृक्षके लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्वको दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीताको जमीनपर सोते हुए देखकर निषादको बड़ा दुःख हुआ॥ १॥
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
bole lakhana madhura mṛdu bānī| gyāna birāga bhagati rasa sānī||
kāhu na kou sukha dukha kara dātā| nija kṛta karama bhoga sabu bhrātā||
Meaning तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले-- हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोका फल भोगते हैं॥ २॥
जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू॥
joga biyoga bhoga bhala maṃdā| hita anahita madhyama bhrama phaṃdā||
janamu maranu jaham̐ lagi jaga jālū| saṃpatī bipati karamu aru kālū||
Meaning संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु मित्र और उदासीन--ये सभी भ्रमके फंदे हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल--जहाँतक जगत्के जंजाल हैं;॥ ३॥
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥
dharani dhāmu dhanu pura parivārū| saragu naraku jaham̐ lagi byavahārū||
dekhia sunia gunia mana māhīṃ| moha mūla paramārathu nāhīṃ||
Meaning धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थत: ये नहीं हैं॥ ४॥
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ॥ ९२॥
sapaneṃ hoi bhikhāri nṛpa raṃku nākapati hoi|
jāgeṃ lābhu na hāni kachu timi prapaṃca jiyam̐ joi|| 92||
Meaning जैसे स्वनमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपश्नको हृदयसे देखना चाहिये॥ ९२॥
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥
asa bicāri nahiṃ kījaa rosū| kāhuhi bādi na deia dosū||
moha nisām̐ sabu sovanihārā| dekhia sapana aneka prakārā||
Meaning ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये। सब लोग मोहरूपी रात्रिमें सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकारके स्वप्न दिखायी देते हैं॥ १॥
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा॥
ehiṃ jaga jāmini jāgahiṃ jogī| paramārathī prapaṃca biyogī||
jānia tabahiṃ jīva jaga jāgā| jaba jaba biṣaya bilāsa birāgā||
Meaning इस जगत्रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रप्न (मायिक जगत्) से छूटे हुए हैं। जगत्में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग-विलासोंसे वैराग्य हो जाय॥ २॥
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥
सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥
hoi bibeku moha bhrama bhāgā| taba raghunātha carana anurāgā||
sakhā parama paramārathu ehū| mana krama bacana rāma pada nehū||
Meaning विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञानका नाश होनेपर) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है॥ ३॥
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥
rāma brahma paramāratha rūpā| abigata alakha anādi anūpā||
sakala bikāra rahita gatabhedā| kahi nita neti nirūpahiṃ bedā||
Meaning श्रीरामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जाननेमें न आनेवाले), अलख (स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले ), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य ' नेति-नेति' कहकर निरूपण करते हैं॥ ४॥
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल॥ ९३॥
bhagata bhūmi bhūsura surabhi sura hita lāgi kṛpāla|
karata carita dhari manuja tanu sunata miṭahi jaga jāla|| 93||
Meaning वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेसे जगत्के जंजाल मिट जाते हैं॥ ९३॥
सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥
कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥
sakhā samujhi asa parihari mohū| siya raghubīra carana rata hohū||
kahata rāma guna bhā bhinusārā| jāge jaga maṃgala sukhadārā||
Meaning हे सखा! ऐसा समझ, मोहको त्यागकर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम करो। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके गुण कहते-कहते सबेरा हो गया! तब जगत्का मज़ल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे॥ १॥
सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥
अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥
sakala soca kari rāma nahāvā| suci sujāna baṭa chīra magāvā||
anuja sahita sira jaṭā banāe| dekhi sumaṃtra nayana jala chāe||
Meaning शौचके सब कार्य करके [नित्य] पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्रजीने स्नान किया। फिर बड़का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित उस दूधसे सिरपर जटाएँ बनायीं। यह देखकर सुमन्त्रजीके नेत्रोंगें जल छा गया॥ २॥
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना॥
नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा॥
hṛdayam̐ dāhu ati badana malīnā| kaha kara jori bacana ati dīnā||
nātha kaheu asa kosalanāthā| lai rathu jāhu rāma keṃ sāthā||
Meaning उनका हृदय अत्यन्त जलने लगा, मुँह मलिन (उदास) हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वचन बोले--हे नाथ! मुझे कोसलनाथ द्शरथजीने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्रीरामजीके साथ जाओ;॥ ३॥
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई॥
लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी॥
banu dekhāi surasari anhavāī| ānehu pheri begi dou bhāī||
lakhanu rāmu siya ānehu pherī| saṃsaya sakala sam̐koca niberī||
Meaning वन दिखाकर, गज़ास्नान कराकर दोनों भाइयोंको तुरंत लौटा लाना। सब संशय और संकोचको दूर करके लक्ष्मण, राम, सीताको फिरा लाना॥ ४॥
नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।
करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ॥ ९४॥
nṛpa asa kaheu gosāīṃ jasa kahai karauṃ bali soi|
kari binatī pāyanha pareu dīnha bāla jimi roi|| 94||
Meaning महाराजने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, मैं वही करूँ; मैं आपकी बलिहारी हूँ। इस प्रकार विनती करके वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने बालककी तरह रो दिया॥ ९४॥
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥
मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥
tāta kṛpā kari kījia soī| jāteṃ avadha anātha na hoī||
maṃtrahi rāma uṭhāi prabodhā| tāta dharama matu tumha sabu sodhā||
Meaning [और कहा--] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है॥ १॥
सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा॥
रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना॥
sibi dadhīci haricaṃda naresā| sahe dharama hita koṭi kalesā||
raṃtideva bali bhūpa sujānā| dharamu dhareu sahi saṃkaṭa nānā||
Meaning शिबि, दधीचि और राजा हरिश्रन्द्रने धर्मके लिये करोड़ों (अनेकों) कष्ट सहे थे। बुद्धिमान् राजा रन्तिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे (उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया)॥ २॥
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥
dharamu na dūsara satya samānā| āgama nigama purāna bakhānā||
maiṃ soi dharamu sulabha kari pāvā| tajeṃ tihūm̐ pura apajasu chāvā||
Meaning वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है। इस [सत्यरूपी धर्म] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंगें अपयश छा जायगा॥ ३॥
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥
तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥
saṃbhāvita kahum̐ apajasa lāhū| marana koṭi sama dāruna dāhū||
tumha sana tāta bahuta kā kahaūm̐| diem̐ utaru phiri pātaku lahaūm̐||
Meaning प्रतिष्टित पुरुषके लिये अपयशकी प्राप्ति करोड़ों मृत्युके समान भीषण सन्ताप देनेवाली है। हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देनेमें भी पापका भागी होता हूँ॥ ४॥
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥ ९५॥
pitu pada gahi kahi koṭi nati binaya karaba kara jori|
ciṃtā kavanihu bāta kai tāta karia jani mori|| 95||
Meaning आप जाकर पिताजीके चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कारके साथ ही हाथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात! आप मेरी किसी बातको चिन्ता न करें॥ ९५॥
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥
tumha puni pitu sama ati hita moreṃ| binatī karaum̐ tāta kara joreṃ||
saba bidhi soi karatabya tumhāreṃ| dukha na pāva pitu soca hamāreṃ||
Meaning आप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दुःख न पावें॥ १॥
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू॥
पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी॥
suni raghunātha saciva saṃbādū| bhayau saparijana bikala niṣādū||
puni kachu lakhana kahī kaṭu bānī| prabhu baraje baṛa anucita jānī||
Meaning श्रीरघुनाथजी और सुमन्त्रका यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियोंसहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजीने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया॥ २॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई॥
कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥
sakuci rāma nija sapatha devāī| lakhana sam̐desu kahia jani jāī||
kaha sumaṃtru puni bhūpa sam̐desū| sahi na sakihi siya bipina kalesū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमन्त्रजीसे कहा कि आप जाकर लक्ष्मणका यह सन्देश न कहियेगा। सुमन्त्रने फिर राजाका सन्देश कहा कि सीता वनके क्लेश न सह सकेंगी॥ ३॥
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥
नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥
jehi bidhi avadha āva phiri sīyā| soi raghubarahi tumhahi karanīyā||
nataru nipaṭa avalaṃba bihīnā| maiṃ na jiaba jimi jala binu mīnā||
Meaning अतएव जिस तरह सीता अयोध्याको लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजीको वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारेका होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जलके मछली नहीं जीती॥ ४॥
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।
तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान॥ ९६॥
maikeṃ sasareṃ sakala sukha jabahiṃ jahām̐ manu māna|
tam̐ha taba rahihi sukhena siya jaba lagi bipati bihāna|| 96||
Meaning सीताके मायके (पिताके घर) और ससुरालमें सब सुख हैं। जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तबतक वे जब जहाँ जी चाहे, वहीं सुखसे रहेंगी॥ ९६॥
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥
पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥
binatī bhūpa kīnha jehi bhām̐tī| ārati prīti na so kahi jātī||
pitu sam̐desu suni kṛpānidhānā| siyahi dīnha sikha koṭi bidhānā||
Meaning राजाने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेमसे) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने पिताका सन्देश सुनकर सीताजीको करोड़ों (अनेकों ) प्रकारसे सीख दी॥ १॥
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू॥
सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥
sāsu sasura gura priya parivārū| phiratu ta saba kara miṭai khabhārū||
suni pati bacana kahati baidehī| sunahu prānapati parama sanehī||
Meaning [ उन्होंने कहा--] जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय। पतिके वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं--हे प्राणपति! हे परम स्नेही ! सुनिये॥ २॥
प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥
prabhu karunāmaya parama bibekī| tanu taji rahati chām̐ha kimi cheṃkī||
prabhā jāi kaham̐ bhānu bihāī| kaham̐ caṃdrikā caṃdu taji jāī||
Meaning हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। [ कृपा करके विचार तो कीजिये] शरीरको छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहाँ जा सकती है ? और चाँदनी चन्द्रमाको त्यागकर कहाँ जा सकती है?॥ ३॥
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥
तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥
patihi premamaya binaya sunāī| kahati saciva sana girā suhāī||
tumha pitu sasura sarisa hitakārī| utaru deum̐ phiri anucita bhārī||
Meaning इस प्रकार पतिको प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्रीसे सुहावनी वाणी कहने लगीं--आप मेरे पिताजी और ससुरजीके समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदलेमें उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है॥ ४॥
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥ ९७॥
ārati basa sanamukha bhaium̐ bilagu na mānaba tāta|
ārajasuta pada kamala binu bādi jahām̐ lagi nāta|| 97||
Meaning किन्तु हे तात! मैं आर्त्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र (स्वामी ) के चरणकमलोंके बिना जगत्में जहाँतक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं॥ ९७॥
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥
pitu baibhava bilāsa maiṃ ḍīṭhā| nṛpa mani mukuṭa milita pada pīṭhā||
sukhanidhāna asa pitu gṛha moreṃ| piya bihīna mana bhāva na bhoreṃ||
Meaning मैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं (अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं) ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता॥ १॥
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई॥
sasura cakkavai kosalarāū| bhuvana cāridasa pragaṭa prabhāū||
āgeṃ hoi jehi surapati leī| aradha siṃghāsana āsanu deī||
Meaning मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासनपर बैठनेके लिये स्थान देता है,॥ २॥
ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥
sasuru etādṛsa avadha nivāsū| priya parivāru mātu sama sāsū||
binu raghupati pada paduma parāgā| mohi keu sapanehum̐ sukhada na lāgā||
Meaning ऐसे [ऐश्वर्य और प्रभावशाली ] ससुर; [उनकी राजधानी] अयोध्याका निवास; प्रिय कुटुम्बी और माताके समान सासुएँ-ये कोई भी श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी रजके बिना मुझे स्वप्रमें भी सुखदायक नहीं लगते॥ ३॥
अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा॥
कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥
agama paṃtha banabhūmi pahārā| kari kehari sara sarita apārā||
kola kirāta kuraṃga bihaṃgā| mohi saba sukhada prānapati saṃgā||
Meaning दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ; कोल,भील, हिरन और पक्षी-प्राणपति (रघुनाथजी) के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे॥ ४॥
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥ ९८॥
sāsu sasura sana mori hum̐ti binaya karabi pari pāyam̐|
mora socu jani karia kachu maiṃ bana sukhī subhāyam̐|| 98||
Meaning अतः: सास और ससुरके पाँव पड़कर, मेरी ओरसे विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वनमें स्वभावसे ही सुखी हूँ॥ ९८॥
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥
नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥
prānanātha priya devara sāthā| bīra dhurīna dhareṃ dhanu bhāthā||
nahiṃ maga śramu bhramu dukha mana moreṃ| mohi lagi socu karia jani bhoreṃ||
Meaning वीरोंमें अग्रगण्य तथा धनुष और [बाणोंसे भरे] तरकश धारण किये मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं। इससे मुझे न रास्तेकी थकावट है, न श्रम है, और न मेरे मनमें कोई दुःख ही है। आप मेरे लिये भूलकर भी सोच न करें॥१॥
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥
नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥
suni sumaṃtru siya sītali bānī| bhayau bikala janu phani mani hānī||
nayana sūjha nahiṃ sunai na kānā| kahi na sakai kachu ati akulānā||
Meaning सुमन्त्र सीताजीकी शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गये, जैसे साँप मणि खो जानेपर। नेत्रों से कुछ सूझता नहीं, कानोंसे सुनायी नहीं देता। वे बहुत व्याकुल हो गये, कुछ कह नहीं सकते॥ २॥
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥
जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे॥
rāma prabodhu kīnha bahu bhām̐ti| tadapi hoti nahiṃ sītali chātī||
jatana aneka sātha hita kīnhe| ucita utara raghunaṃdana dīnhe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने उनका बहुत प्रकारसे समाधान किया। तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलनेके लिये मन्त्रीने अनेकों यत्र किये (युक्तियाँ पेश कीं ), पर रघुनन्दन श्रीरामजी [उन सब युक्तियोंका] यथोचित उत्तर देते गये॥ ३॥
मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई॥
राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥
meṭi jāi nahiṃ rāma rajāī| kaṭhina karama gati kachu na basāī||
rāma lakhana siya pada siru nāī| phireu banika jimi mūra gavām̐ī||
Meaning श्रीरामजीकी आज्ञा मेटी नहीं जा सकती। कर्मकी गति कठिन है, उसपर कुछ भी वश नहीं चलता। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके चरणोंमें सिर नवाकर सुमन्त्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन (पूँजी) गँवाकर लौटे॥ ४॥
-रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।
देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं॥ ९९॥
-ratha hām̐keu haya rāma tana heri heri hihināhiṃ|
dekhi niṣāda biṣādabasa dhunahiṃ sīsa pachitāhiṃ|| 99||
Meaning सुमन्त्रने रथको हाँका, घोड़े श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख-देखकर हिनहिनाते हैं। यह देखकर निषादलोग विषादके वश होकर सिर धुन-धुनकर (पीट-पीटकर) पढछताते हैं॥ ९९॥
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥
बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥
jāsu biyoga bikala pasu aise| prajā mātu pitu jiihahiṃ kaiseṃ||
barabasa rāma sumaṃtru paṭhāe| surasari tīra āpu taba āe||
Meaning जिनके वियोगमें पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोगमें प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे ? श्रीरामचन्द्रजीने जबर्दस्ती सुमन्त्रको लौटाया। तब आप गड़ाजीके तीरपर आये॥ १॥
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥
māgī nāva na kevaṭu ānā| kahai tumhāra maramu maiṃ jānā||
carana kamala raja kahum̐ sabu kahaī| mānuṣa karani mūri kachu ahaī||
Meaning श्रीरामने केवटसे नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा--मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलोंकी धूलके लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है,॥ २॥
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥
chuata silā bhai nāri suhāī| pāhana teṃ na kāṭha kaṭhināī||
taraniu muni gharini hoi jāī| bāṭa parai mori nāva uṛāī||
Meaning जिसके छूते ही पत्थरकी शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [मेरी नाव तो काठकी है]। काठ पत्थरसे कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनिकी स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी] (मेरी कमाने-खानेकी राह ही मारी जायगी)॥ ३॥
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥
ehiṃ pratipālaum̐ sabu parivārū| nahiṃ jānaum̐ kachu aura kabārū||
jau prabhu pāra avasi gā cahahū| mohi pada paduma pakhārana kahahū||
Meaning मैं तो इसी नावसे सारे परिवारका पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण-कमल पखारने (धो लेने) के लिये कह दो॥ ४॥
पद कमल धोड़ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहाँ।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहाँ॥
बरु तीर मारहेँ लखनु पे जब लगि न पाय पखारिहीँ।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥
pada kamala dhoṛa caṛhāi nāva na nātha utarāī cahām̐|
mohi rāma rāuri āna dasaratha sapatha saba sācī kahām̐||
baru tīra mārahem̐ lakhanu pe jaba lagi na pāya pakhārihīm̐|
taba lagi na tulasīdāsa nātha kṛpāla pāru utārihauṃ||
Meaning हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगोंको नावपर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजीकी सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरोंको पखार न लूँगा, तबतक हे तुलसीदासके नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।
सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितड़ जानकी लखन तन॥ १००॥
suni kevaṭa ke baina prema lapeṭe aṭapaṭe|
bihase karunāaina citaṛa jānakī lakhana tana|| 100||
Meaning केवटके प्रेममें लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसे॥ १००॥
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥
वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥
kṛpāsiṃdhu bole musukāī| soi karu jeṃhi tava nāva na jāī||
vegi ānu jala pāya pakhārū| hota bilaṃbu utārahi pārū||
Meaning कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवटसे मुसकराकर बोले--भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥ १॥
जासु नाम सुमरत एक बारा।
उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
jāsu nāma sumarata eka bārā| utarahiṃ nara bhavasiṃdhu apārā||
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा।
जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥
soi kṛpālu kevaṭahi nihorā| jehiṃ jagu kiya tihu pagahu te thorā||
Meaning एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [ वामनावतारमें ] जगत्को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था (दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [ गड़ाजीसे पार उतारनेके लिये] केवटका निहोरा कर रहे हैं!॥ २॥
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥
pada nakha nirakhi devasari haraṣī| suni prabhu bacana moham̐ mati karaṣī||
kevaṭa rāma rajāyasu pāvā| pāni kaṭhavatā bhari lei āvā||
Meaning प्रभुके इन वचनोंको सुनकर गड़ाजीकी बुद्धि मोहसे खिंच गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारनेके लिये केवटका निहोरा कैसे कर रहे हैं]। परन्तु [समीप आनेपर अपनी उत्पत्तिके स्थान] पदनखोंको देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गड्ाजी हर्षित हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर कठौतेमें भरकर जल ले आया॥ ३॥
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥
ati ānaṃda umagi anurāgā| carana saroja pakhārana lāgā||
baraṣi sumana sura sakala sihāhīṃ| ehi sama punyapuṃja kou nāhīṃ||
Meaning अत्यन्त आनन्द और प्रेममें उमैगकर वह भगवान्के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्यकी राशि कोई नहीं है॥ ४॥
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥ १०१॥
pada pakhāri jalu pāna kari āpu sahita parivāra|
pitara pāru kari prabhuhi puni mudita gayau lei pāra|| 101||
Meaning चरणोंको धोकर और सारे परिवारसहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले [उस महान् पुण्यके द्वारा] अपने पितरोंको भवसागरसे पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रको गज़ाजीके पार ले गया॥ १०१॥
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥
utari ṭhāṛa bhae surasari retā| sīyarāma guha lakhana sametā||
kevaṭa utari daṃḍavata kīnhā| prabhuhi sakuca ehi nahiṃ kachu dīnhā||
Meaning निषादराज और लक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [ नावसे] उतरकर गड़्ाजीकी रेत (बालू)में खड़े हो गये। तब केवटने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर। प्रभुको संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥ १॥
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥
piya hiya kī siya jānanihārī| mani mudarī mana mudita utārī||
kaheu kṛpāla lehi utarāī| kevaṭa carana gahe akulāī||
Meaning पतिके हृदयकी जाननेवाली सीताजीने आनन्दभरे मनसे अपनी रत्रजटित अँगूठी [ अँगुलीसे] उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने केवटसे कहा, नावकी उतराई लो। केवटने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये॥ २॥
नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥
nātha āju maiṃ kāha na pāvā| miṭe doṣa dukha dārida dāvā||
bahuta kāla maiṃ kīnhi majūrī| āju dīnha bidhi bani bhali bhūrī||
Meaning [उसने कहा--] हे नाथ! आज मैंने कया नहीं पाया ! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रताकी आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समयतक मजदूरी की। विधाताने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥ ३॥
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥
फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥
aba kachu nātha na cāhia moreṃ| dīnadayāla anugraha toreṃ||
phiratī bāra mohi je debā| so prasādu maiṃ sira dhari lebā||
Meaning हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा॥ ४॥
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥ १०२॥
bahuta kīnha prabhu lakhana siyam̐ nahiṃ kachu kevaṭu lei|
bidā kīnha karunāyatana bhagati bimala baru dei|| 102||
Meaning प्रभु श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीने बहुत आग्रह [या यत्र] किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणाके धाम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने निर्मल भक्तिका वरदान देकर उसे विदा किया॥ १०२॥
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥
taba majjanu kari raghukulanāthā| pūji pārathiva nāyau māthā||
siyam̐ surasarihi kaheu kara jorī| mātu manoratha puraubi morī||
Meaning फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया। सीताजीने हाथ जोड़कर गड्ाजीसे कहा--हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कोजियेगा॥ १॥
पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥
pati devara saṃga kusala bahorī| āi karauṃ jehiṃ pūjā torī||
suni siya binaya prema rasa sānī| bhai taba bimala bāri bara bānī||
Meaning जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गड़्ाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई--॥ २॥
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥
लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥
sunu raghubīra priyā baidehī| tava prabhāu jaga bidita na kehī||
lokapa hohiṃ bilokata toreṃ| tohi sevahiṃ saba sidhi kara joreṃ||
Meaning हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगतमें किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [ कृपादृष्टिसे] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं॥ ३॥
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा॥
tumha jo hamahi baṛi binaya sunāī| kṛpā kīnhi mohi dīnhi baṛāī||
tadapi debi maiṃ debi asīsā| saphala hopana hita nija bāgīsā||
Meaning तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी॥ ४॥
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥ १०३॥
prānanātha devara sahita kusala kosalā āi|
pūjahi saba manakāmanā sujasu rahihi jaga chāi|| 103||
Meaning तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मन:कामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगतूभरमें छा जायगा॥ १०३॥
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला॥
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥
gaṃga bacana suni maṃgala mūlā| mudita sīya surasari anukulā||
taba prabhu guhahi kaheu ghara jāhū| sunata sūkha mukhu bhā ura dāhū||
Meaning मज़लके मूल गड़ाजीके वचन सुनकर और देवनदीको अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुईं। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निषादराज गुहसे कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हदयमें दाह उत्पन्न हो गया॥ १॥
दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥
नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥
dīna bacana guha kaha kara jorī| binaya sunahu raghukulamani morī||
nātha sātha rahi paṃthu dekhāī| kari dina cāri carana sevakāī||
Meaning गुह॒ हाथ जोड़कर दीन वचन बोला-हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ (आप)के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ )दिन चरणोंकी सेवा करके--॥ २॥
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥
jehiṃ bana jāi rahaba raghurāī| paranakuṭī maiṃ karabi suhāī||
taba mohi kaham̐ jasi deba rajāī| soi karihaum̐ raghubīra dohāī||
Meaning हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी (पत्तोंकी कुटिया) बना दूँगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर (आप) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा॥ ३॥
सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥
sahaja saneha rāma lakhi tāsu| saṃga līnha guha hṛdaya hulāsū||
puni guham̐ gyāti boli saba līnhe| kari paritoṣu bidā taba kīnhe||
Meaning उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने उसको साथ ले लिया, इससे गुहके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जातिके लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया॥ ४॥
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ॥ १०४॥
taba ganapati siva sumiri prabhu nāi surasarihi mātha|
sakhā anuja siyā sahita bana gavanu kīnha radhunātha|| 104||
Meaning तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गड़्ाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले॥ १०४॥
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥
tehi dina bhayau biṭapa tara bāsū| lakhana sakhām̐ saba kīnha supāsū||
prāta prātakṛta kari radhusāī| tīratharāju dīkha prabhu jāī||
Meaning उस दिन पेड़के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुहने [विश्रामकी ] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने सबेरे प्रात:कालकी सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थोंके राजा प्रयागके दर्शन किये॥ १॥
सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी॥
चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु॥
saciva satya śradhdā priya nārī| mādhava sarisa mītu hitakārī||
cāri padāratha bharā bham̐ḍāru| punya pradesa desa ati cāru||
Meaning उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी-सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है॥ २॥
छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥
chetra agama gaṛhu gāṛha suhāvā| sapanehum̐ nahiṃ pratipacchinha pāvā||
sena sakala tīratha bara bīrā| kaluṣa anīka dalana ranadhīrā||
Meaning प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ (किला) है, जिसको स्वनमें भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पापकी सेनाको कुचल डालनेवाले और बड़े रणधीर हैं॥ ३॥
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥
saṃgamu siṃhāsanu suṭhi sohā| chatru akhayabaṭu muni manu mohā||
cavam̐ra jamuna aru gaṃga taraṃgā| dekhi hohiṃ dukha dārida bhaṃgā||
Meaning [गड़ा, यमुना और सरस्वतीका] सज़्म ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियोंके भी मनको मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गड़ाजीकी तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है॥ ४॥
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम॥ १०५॥
sevahiṃ sukṛti sādhu suci pāvahiṃ saba manakāma|
baṃdī beda purāna gana kahahiṃ bimala guna grāma|| 105||
Meaning पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणोंके समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणोंका बखान करते हैं॥ १०५॥
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥
ko kahi sakai prayāga prabhāū| kaluṣa puṃja kuṃjara mṛgarāū||
asa tīrathapati dekhi suhāvā| sukha sāgara raghubara sukhu pāvā||
Meaning पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव (महत्त्व--माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया॥ १॥
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥
kahi siya lakhanahi sakhahi sunāī| śrīmukha tīratharāja baṛāī||
kari pranāmu dekhata bana bāgā| kahata mahātama ati anurāgā||
Meaning उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए--॥ २॥
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा॥
ehi bidhi āi bilokī benī| sumirata sakala sumaṃgala denī||
mudita nahāi kīnhi siva sevā| puji jathābidhi tīratha devā||
Meaning इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मज़लोंको देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [त्रिवेणीमें] स्नान करके शिवजीकी सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया॥ ३॥
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥
मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥
taba prabhu bharadvāja pahiṃ āe| karata daṃḍavata muni ura lāe||
muni mana moda na kachu kahi jāi| brahmānaṃda rāsi janu pāī||
Meaning [ स्नान,पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया। मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो॥ ४॥
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥ २०६॥
dīnhi asīsa munīsa ura ati anaṃdu asa jāni|
locana gocara sukṛta phala manahum̐ kie bidhi āni|| 206||
Meaning मुनीधर भरद्वाजजीने आशीर्वाद दिया। उनके हृदयमें ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [ श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन कराकर] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्योंके फलको लाकर आँखोंके सामने कर दिया॥ १०६॥
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥
कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥
kusala prasna kari āsana dīnhe| pūji prema paripūrana kīnhe||
kaṃda mūla phala aṃkura nīke| die āni muni manahum̐ amī ke||
Meaning कुशल पूछकर मुनिराजने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृतके ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये॥ १॥
सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥
भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे॥
sīya lakhana jana sahita suhāe| ati ruci rāma mūla phala khāe||
bhae bigataśrama rāmu sukhāre| bharavdāja mṛdu bacana ucāre||
Meaning सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन सुन्दर मूल-फलोंको बड़ी रुचिके साथ खाया। थकावट दूर होनेसे श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजीने उनसे कोमल वचन कहे--॥ २॥
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू॥
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥
āju suphala tapu tīratha tyāgū| āju suphala japa joga birāgū||
saphala sakala subha sādhana sājū| rāma tumhahi avalokata ājū||
Meaning हे राम ! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनोंका समुदाय भी सफल हो गया॥ ३॥
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी॥
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥
lābha avadhi sukha avadhi na dūjī| tumhāreṃ darasa āsa saba pūjī||
aba kari kṛpā dehu bara ehū| nija pada sarasija sahaja sanehū||
Meaning लाभकी सीमा और सुखकी सीमा [ प्रभुके दर्शनको छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥ ४॥
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥ १०७॥
karama bacana mana chāṛi chalu jaba lagi janu na tumhāra|
taba lagi sukhu sapanehum̐ nahīṃ kiem̐ koṭi upacāra|| 107||
Meaning जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्रमें भी वह सुख नहीं पाता॥ १०७॥
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥
suni muni bacana rāmu sakucāne| bhāva bhagati ānaṃda aghāne||
taba raghubara muni sujasu suhāvā| koṭi bhām̐ti kahi sabahi sunāvā||
Meaning मुनिके वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्तिके कारण आनन्दसे तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [ लीलाकी दृष्टिसे। सकुचा गये। तब [ अपने ऐश्वर्यको छिपाते हुए] श्रीरामचन्द्रजीने भरद्वाज मुनिका सुन्दर सुयश करोड़ों (अनेकों ) प्रकारसे कहकर सबको सुनाया॥ १॥
सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥
so baḍa so saba guna gana gehū| jehi munīsa tumha ādara dehū||
muni raghubīra parasapara navahīṃ| bacana agocara sukhu anubhavahīṃ||
Meaning [उन्होंने कहा--] हे मुनीश्वर ! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणसमूहों का घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुखका अनुभव कर रहे हैं॥ २॥