दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥
नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥
dīnhi mohi sikha nīki gosāīṃ| lāgi agama apanī kadarāīṃ||
narabara dhīra dharama dhura dhārī| nigama nīti kahum̐ te adhikārī||
Meaning हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम (पहुँचके बाहर) लगी। शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं॥ १॥
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥
गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥
maiṃ sisu prabhu saneham̐ pratipālā| maṃdaru meru ki lehiṃ marālā||
gura pitu mātu na jānaum̐ kāhū| kahaum̐ subhāu nātha patiāhū||
Meaning मैं तो प्रभु (आप) के स्नेहमें पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! कहीं हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वतको उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभावसे ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, पिता, माता किसीको भी नहीं जानता॥ २॥
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥
jaham̐ lagi jagata saneha sagāī| prīti pratīti nigama niju gāī||
moreṃ sabai eka tumha svāmī| dīnabaṃdhu ura aṃtarajāmī||
Meaning जगतमें जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है--हे स्वामी ! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले ! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं॥ ३॥
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥
मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥
dharama nīti upadesia tāhī| kīrati bhūti sugati priya jāhī||
mana krama bacana carana rata hoī| kṛpāsiṃdhu pariharia ki soī||
Meaning धर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति (ऐश्वर्य) या सदूति प्यारी हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! कया वह भी त्यागनेके योग्य है ?॥ ४॥
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥ ७२॥
karunāsiṃdhu subaṃdha ke suni mṛdu bacana binīta|
samujhāe ura lāi prabhu jāni saneham̐ sabhīta|| 72||
Meaning दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया॥ ७२॥
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥
मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥
māgahu bidā mātu sana jāī| āvahu begi calahu bana bhāī||
mudita bhae suni raghubara bānī| bhayau lābha baṛa gai baṛi hānī||
Meaning [और कहा-] हे भाई! जाकर मातासे विदा माँग आओ और जल्दी वनको चलो! रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीकी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ!॥ १॥
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥
haraṣita hdayam̐ mātu pahiṃ āe| manahum̐ aṃdha phiri locana pāe||
jāi janani paga nāyau māthā| manu raghunaṃdana jānaki sāthā||
Meaning वे हर्षित हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माताके चरणों में मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था॥ २॥
पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी॥
गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा॥
pūm̐che mātu malina mana dekhī| lakhana kahī saba kathā biseṣī||
gaī sahami suni bacana kaṭhorā| mṛgī dekhi dava janu cahu orā||
Meaning माताने उदास मन देखकर उनसे [ कारण पूछा। लक्ष्मणजीने सब कथा विस्तारसे कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनोंको सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वनमें आग लगी देखकर सहम जाती है॥ ३॥
लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥
मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही॥
lakhana lakheu bhā anaratha ājū| ehiṃ saneha basa karaba akājū||
māgata bidā sabhaya sakucāhīṃ| jāi saṃga bidhi kahihi ki nāhī||
Meaning लक्ष्मणने देखा कि आज (अब) अनर्थ हुआ। ये स्नेहवश काम बिगाड़ देंगी ! इसलिये वे विदा माँगते हुए डरके मारे सकुचाते हैं [ और मन-ही-मन सोचते हैं] कि हे विधाता ! माता साथ जानेको कहेंगी या नहीं॥ ४॥
समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥ ७३॥
samujhi sumitrām̐ rāma siya rūpa susīlu subhāu|
nṛpa sanehu lakhi dhuneu siru pāpini dīnha kudāu|| 73||
Meaning सुमित्राजीने श्रीरामजी और श्रीसीताजीके रूप, सुन्दर शील और स्वभावको समझकर और उनपर राजाका प्रेम देखकर अपना सिर धुना (पीटा) और कहा कि पापिनी कैकेयीने बुरी तरह घात लगाया॥ ७३॥
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी॥
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥
dhīraju dhareu kuavasara jānī| sahaja suhda bolī mṛdu bānī||
tāta tumhāri mātu baidehī| pitā rāmu saba bhām̐ti sanehī||
Meaning परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभावसे ही हित चाहनेवाली सुमित्राजी कोमल वाणीसे बोलीं--हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं !॥ श॥
अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं॥
avadha tahām̐ jaham̐ rāma nivāsū| taham̐im̐ divasu jaham̐ bhānu prakāsū||
jau pai sīya rāmu bana jāhīṃ| avadha tumhāra kāju kachu nāhiṃ||
Meaning जहाँ श्रीरामजीका निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्यका प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वनको जाते हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है॥ २॥
गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै॥
gura pitu mātu baṃdhu sura sāī| seiahiṃ sakala prāna kī nāīṃ||
rāmu prānapriya jīvana jī ke| svāratha rahita sakhā sabahī kai||
Meaning गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये। फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं॥३॥
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें॥
अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू॥
pūjanīya priya parama jahām̐ teṃ| saba māniahiṃ rāma ke nāteṃ||
asa jiyam̐ jāni saṃga bana jāhū| lehu tāta jaga jīvana lāhū||
Meaning जगतमें जहाँतक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजीके नातेसे ही [ पूजनीय और परम प्रिय] मानने योग्य हैं। हृदयमें ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ वन जाओ और जगतमें जीनेका लाभ उठाओ !॥ ४॥
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।
जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥ ७४॥
bhūri bhāga bhājanu bhayahu mohi sameta bali jāum̐|
jauma tumhareṃ mana chāṛi chalu kīnha rāma pada ṭhāum̐|| 74||
Meaning मैं बलिहारी जाती हूँ, [हे पुत्र !] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्यके पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्तने छल छोड़कर श्रीरामजीके चरणोंमें स्थान प्राप्त किया है॥ ७४॥
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥
putravatī jubatī jaga soī| raghupati bhagatu jāsu sutu hoī||
nataru bām̐jha bhali bādi biānī| rāma bimukha suta teṃ hita jānī||
Meaning संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो। नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशुकी भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है॥ १॥
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥
tumharehiṃ bhāga rāmu bana jāhīṃ| dūsara hetu tāta kachu nāhīṃ||
sakala sukṛta kara baṛa phalu ehū| rāma sīya pada sahaja sanehū||
Meaning तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी वनको जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो॥ २॥
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥
rāga roṣu iriṣā madu mohū| jani sapanehum̐ inha ke basa hohū||
sakala prakāra bikāra bihāī| mana krama bacana karehu sevakāī||
Meaning राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह--इनके वश स्वप्रमें भी मत होना। सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना॥ ३॥
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥
tumha kahum̐ bana saba bhām̐ti supāsū| sam̐ga pitu mātu rāmu siya jāsū||
jehiṃ na rāmu bana lahahiṃ kalesū| suta soi karehu ihai upadesū||
Meaning तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है॥ ४॥
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥
upadesu yahu jehiṃ tāta tumhare rāma siya sukha pāvahīṃ|
pitu mātu priya parivāra pura sukha surati bana bisarāvahīṃ||
tulasī prabhuhi sikha dei āyasu dīnha puni āsiṣa daī|
rati hou abirala amala siya raghubīra pada nita nita naī||
Meaning हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायेँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु ( श्रीलक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर [वन जानेकी] आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो! .
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस॥ 9५॥
mātu carana siru nāi cale turata saṃkita hṛdayam̐|
bāgura biṣama torāi manahum̐ bhāga mṛgu bhāga basa|| 95||
Meaning माताके चरणोंमें सिर नवाकर हृदयमें डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ जाय] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदेको तुड़ाकर भाग निकला हो॥ ७५॥
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥
बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥
gae lakhanu jaham̐ jānakināthū| bhe mana mudita pāi priya sāthū||
baṃdi rāma siya carana suhāe| cale saṃga nṛpamaṃdira āe||
Meaning लक्ष्मणजी वहाँ गये जहाँ श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रियका साथ पाकर मनमें बड़े ही प्रसन्न हुए। श्रीराीमजी और सीताजीके सुन्दर चरणोंकी वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवनमें आये॥ १॥
कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥
तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥
kahahiṃ parasapara pura nara nārī| bhali banāi bidhi bāta bigārī||
tana kṛsa dukhu badana malīne| bikala manahum̐ mākhī madhu chīne||
Meaning नगरके स्त्री-पुरुष आपसभमें कह रहे हैं कि विधाताने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दु:खी और मुख उदास हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जानेपर शहदकी मक्खियाँ व्याकुल हों॥ २॥
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं॥
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥
kara mījahiṃ siru dhuni pachitāhīṃ| janu bina paṃkha bihaga akulāhīṃ||
bhai baṛi bhīra bhūpa darabārā| barani na jāi biṣādu apārā||
Meaning सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर ( पीटकर) पछता रहे हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हैं। राजद्वारपर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषादका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३॥
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥
सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥
sacivam̐ uṭhāi rāu baiṭhāre| kahi priya bacana rāmu pagu dhāre||
siya sameta dou tanaya nihārī| byākula bhayau bhūmipati bhārī||
Meaning ' श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं', ये प्रिय वचन कहकर मन्त्रीने राजाको उठाकर बैठाया। सीतासहित दोनों पुत्रोंको [वनके लिये तैयार] देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए॥ ४॥
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥ ७६॥
sīya sahita suta subhaga dou dekhi dekhi akulāi|
bārahiṃ bāra saneha basa rāu lei ura lāi|| 76||
Meaning सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रोंको देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदयसे लगा लेते हैं॥ ७६॥
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥
sakai na boli bikala naranāhū| soka janita ura dāruna dāhū||
nāi sīsu pada ati anurāgā| uṭhi raghubīra bidā taba māgā||
Meaning राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त प्रेमसे चरणोंमें सिर नवाकर उठकर विदा माँगी--॥ १॥
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥
pitu asīsa āyasu mohi dījai| haraṣa samaya bisamau kata kījai||
tāta kiem̐ priya prema pramādū| jasu jaga jāi hoi apabādū||
Meaning हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात ! प्रियके प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगतमें यश जाता रहेगा और निन््दा होगी॥ २॥
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥
suni saneha basa uṭhi naranāhām̐| baiṭhāre raghupati gahi bāhām̐||
sunahu tāta tumha kahum̐ muni kahahīṃ| rāmu carācara nāyaka ahahīṃ||
Meaning यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा- हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचरके स्वामी हैं॥ ३॥
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी॥
करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥
subha aru asubha karama anuhārī| īsa dei phalu hdayam̐ bicārī||
karai jo karama pāva phala soī| nigama nīti asi kaha sabu koī||
Meaning शुभ और अशुभ कर्मोके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं॥ ४॥
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥ ७७॥
auru karai aparādhu kou aura pāva phala bhogu|
ati bicitra bhagavaṃta gati ko jaga jānai jogu|| 77||
Meaning [ किन्तु इस अवसरपर तो इसके विपरीत हो रहा है, ] अपराध तो कोई और ही करे और उसके फलका भोग कोई और ही पावे। भगवान्की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जाननेयोग्य जगत्में कौन है ?॥ ७७॥
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥
लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥
rāyam̐ rāma rākhana hita lāgī| bahuta upāya kie chalu tyāgī||
lakhī rāma rukha rahata na jāne| dharama dhuraṃdhara dhīra sayāne||
Meaning राजाने इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको रखनेके लिये छल छोड़कर बहुत-से उपाय किये। पर जब उन्होंने धर्मधुरन्धर, धीर और बुद्धिमान् श्रीरीमजीका रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े,॥ १॥
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही॥
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए॥
taba nṛpa sīya lāi ura līnhī| ati hita bahuta bhām̐ti sikha dīnhī||
kahi bana ke dukha dusaha sunāe| sāsu sasura pitu sukha samujhāe||
Meaning तब राजाने सीताजीको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्रेमसे बहुत प्रकारकी शिक्षा दी। वनके दुःसह दुःख कहकर सुनाये। फिर सास, ससुर तथा पिताके [पास रहनेके] सुखोंको समझाया॥ २॥
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥
siya manu rāma carana anurāgā| gharu na sugamu banu biṣamu na lāgā||
aurau sabahiṃ sīya samujhāī| kahi kahi bipina bipati adhikāī||
Meaning परन्तु सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त था। इसलिये उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा। फिर और सब लोगोंने भी वनमें विपत्तियोंकी अधिकता बता-बताकर सीताजीको समझाया॥ ३॥
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥
saciva nāri gura nāri sayānī| sahita saneha kahahiṃ mṛdu bānī||
tumha kahum̐ tau na dīnha banabāsū| karahu jo kahahiṃ sasura gura sāsū||
Meaning मन्त्री सुमन्त्रजीकी पत्नी और गुरु वसिष्टजीकी स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेहके साथ कोमल वाणीसे कहती हैं कि तुमको तो [राजाने] वनवास दिया नहीं है। इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो॥ ४॥
-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि॥ ७८॥
-sikha sītali hita madhura mṛdu suni sītahi na sohāni|
sarada caṃda caṃdani lagata janu cakaī akulāni|| 78||
Meaning यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुननेपर सीताजीको अच्छी नहीं लगी। [वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं] मानो शरदू-ऋतुके चन्द्रमाकी चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो॥ ७८॥
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥
sīya sakuca basa utaru na deī| so suni tamaki uṭhī kaikeī||
muni paṭa bhūṣana bhājana ānī| āgeṃ dhari bolī mṛdu bānī||
Meaning सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण (माला, मेखला आदि) और बर्तन (कमण्डलु आदि) लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रख दिये और कोमल वाणीसे कहा--॥ १॥
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥
nṛpahi prāna priya tumha raghubīrā| sīla saneha na chāṛihi bhīrā||
sukṛta sujasu paraloku nasāū| tumhahi jāna bana kahihi na kāū||
Meaning हे रघुवीर ! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो। भीरु (प्रेमवश दुर्बल हृदयके) राजा शील और स्त्रेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें वन जानेको वे कभी न कहेंगे॥ २॥
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥
भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥
asa bicāri soi karahu jo bhāvā| rāma janani sikha suni sukhu pāvā||
bhūpahi bacana bānasama lāge| karahiṃ na prāna payāna abhāge||
Meaning ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माताकी सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने [ बड़ा। सुख पाया। परन्तु राजाको ये वचन बाणके समान लगे। [वे सोचने लगे] अब भी अभागे प्राण [क्यों] नहीं निकलते !॥ ३॥
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥
loga bikala muruchita naranāhū| kāha karia kachu sūjha na kāhū||
rāmu turata muni beṣu banāī| cale janaka jananihi siru nāī||
Meaning राजा मुूर्च्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं। किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनिका वेष बनाकर और माता-पिताको सिर नवाकर चल दिये॥ ४॥
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥ ७९॥
saji bana sāju samāju sabu banitā baṃdhu sameta|
baṃdi bipra gura carana prabhu cale kari sabahi aceta|| 79||
Meaning वनका सब साज-सामान सजकर (वनके लिये आवश्यक वस्तुओंको साथ लेकर) श्रीरामचन्द्रजी स्त्री (श्रीसीताजी ) और भाई (लक्ष्मणजी)-सहित, ब्राह्मण और गुरुके चरणोंकी वन्दना करके सबको अचेत करके चले॥ ७९॥
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥
nikasi basiṣṭha dvāra bhae ṭhāṛhe| dekhe loga biraha dava dāṛhe||
kahi priya bacana sakala samujhāe| bipra bṛṃda raghubīra bolāe||
Meaning राजमहलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्टजीके दरवाजेपर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरहकी अग्निमें जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने ब्राह्मणोंकी मण्डलीको बुलाया॥ १॥
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥
जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥
gura sana kahi baraṣāsana dīnhe| ādara dāna binaya basa kīnhe||
jācaka dāna māna saṃtoṣe| mīta punīta prema paritoṣe||
Meaning गुरुजीसे कहकर उन सबको वर्षाशन (वर्षभरका भोजन) दिये और आदर, दान तथा विनयसे उन्हें वशमें कर लिया। फिर याचकोंको दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रोंको पतित्र प्रेमसे प्रसन्न किया॥ २॥
दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥
सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई॥
dāsīṃ dāsa bolāi bahorī| gurahi sauṃpi bole kara jorī||
saba kai sāra sam̐bhāra gosāīṃ| karabi janaka jananī kī nāī||
Meaning फिर दास-दासियोंको बुलाकर उन्हें गुरुजीको सौंपकर, हाथ जोड़कर बोले--हे गुसाई! इन सबकी माता-पिताके समान सार-सँभार (देख-रेख) करते रहियेगा॥ ३॥
बारहिं बार जोरि जुग पानी।
कहत रामु सब सन मृदु बानी॥
bārahiṃ bāra jori juga pānī| kahata rāmu saba sana mṛdu bānī||
सोइ सब भाँति मोर हितकारी।
जेहि तें रहै भुआल सुखारी॥
soi saba bhām̐ti mora hitakārī| jehi teṃ rahai bhuāla sukhārī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी बार-बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें॥ ४॥
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
mātu sakala more biraham̐ jehiṃ na hohiṃ dukha dīna|
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥ ८०॥
soi upāu tumha karehu saba pura jana parama prabīna|| 80||
Meaning हे परम चतुर पुरवासी सज्जनो ! आपलोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरहके दुःखसे दुःखी न हों॥ ८०॥
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥
गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥
ehi bidhi rāma sabahi samujhāvā| gura pada paduma haraṣi siru nāvā||
ganapatī gauri girīsu manāī| cale asīsa pāi raghurāī||
Meaning इस प्रकार श्रीरामजीने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया। फिर गणेशजी, पार्वतीजी और कैलासपति महादेवजीको मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्रीरघुनाथजी चले॥ १॥
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥
कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥
rāma calata ati bhayau biṣādū| suni na jāi pura ārata nādū||
kusaguna laṃka avadha ati sokū| haharaṣa biṣāda bibasa suralokū||
Meaning श्रीरामजीके चलते ही बड़ा भारी विषाद हो गया। नगरका आर्तनाद (हाहाकार) सुना नहीं जाता। लड़ामें बुरे शकुन होने लगे, अयोध्यामें अत्यन्त शोक छा गया और देवलोकमें सब हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हो गये। [हर्ष इस बातका था कि अब राक्षसोंका नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियोंके शोकके कारण था।]॥ २॥
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥
रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥
gai muruchā taba bhūpati jāge| boli sumaṃtru kahana asa lāge||
rāmu cale bana prāna na jāhīṃ| kehi sukha lāgi rahata tana māhīṃ||
Meaning मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्रको बुलाकर ऐसा कहने लगे-श्रीराम वनको चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने ये किस सुखके लिये शरीरमें टिक रहे हैं॥ ३॥
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना॥
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू॥
ehi teṃ kavana byathā balavānā| jo dukhu pāi tajahiṃ tanu prānā||
puni dhari dhīra kahai naranāhū| lai rathu saṃga sakhā tumha jāhū||
Meaning इससे अधिक बलवती और कौन-सी व्यथा होगी जिस दुःखको पाकर प्राण शरीरको छोड़ेंगे। फिर धीरज धरकर राजाने कहा-हे सखा! तुम रथ लेकर श्रीरामके साथ जाओ॥ ४॥
-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥ ८१॥
-suṭhi sukumāra kumāra dou janakasutā sukumāri|
ratha caṛhāi dekharāi banu phirehu gaem̐ dina cāri|| 81||
Meaning अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारोंको और सुकुमारी जानकीको रथमें चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिनके बाद लौट आना॥ ८१॥
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥
jau nahiṃ phirahiṃ dhīra dou bhāī| satyasaṃdha dṛṛhabrata raghurāī||
tau tumha binaya karehu kara jorī| pheria prabhu mithilesakisorī||
Meaning यदि धैर्यवान् दोनों भाई न लौटें--क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रणके सच्चे और दृढ़तासे नियमका पालन करनेवाले हैं--तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो ! जनककुमारी सीताजीको तो लौटा दीजिये॥ १॥
जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई॥
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥
jaba siya kānana dekhi ḍerāī| kahehu mori sikha avasaru pāī||
sāsu sasura asa kaheu sam̐desū| putri phiria bana bahuta kalesū||
Meaning जब सीता वनको देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुरने ऐसा सन्देश कहा है कि हे पुत्री! तुम लौट चलो, वनमें बहुत क्लेश हैं॥ २॥
पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥
pitṛgṛha kabahum̐ kabahum̐ sasurārī| rahehu jahām̐ ruci hoi tumhārī||
ehi bidhi karehu upāya kadaṃbā| phirai ta hoi prāna avalaṃbā||
Meaning कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत- से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणोंको सहारा हो जायगा॥ ३॥
नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा॥
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ॥
nāhiṃ ta mora maranu parināmā| kachu na basāi bhaem̐ bidhi bāmā||
asa kahi muruchi parā mahi rāū| rāmu lakhanu siya āni dekhāū||
Meaning नहीं तो अन्तमें मेरा मरण ही होगा। विधाताके विपरीत होनेपर कुछ वश नहीं चलता। हा! राम, लक्ष्मण और सीताको लाकर दिखाओ। ऐसा कहकर राजा मुूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ४॥
-पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ॥ ८२॥
-pāi rajāyasu nāi siru rathu ati bega banāi|
gayau jahām̐ bāhera nagara sīya sahita dou bhāi|| 82||
Meaning सुमन्त्रजी राजाकी आज्ञा पाकर, सिर नवाकर और बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहाँ गये जहाँ नगरके बाहर सीताजीसहित दोनों भाई थे॥ ८२॥
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥
taba sumaṃtra nṛpa bacana sunāe| kari binatī ratha rāmu caṛhāe||
caṛhi ratha sīya sahita dou bhāī| cale hṛdayam̐ avadhahi siru nāī||
Meaning तब (वहाँ पहुँचकर ) सुमन्त्रने राजाके वचन श्रीरामचन्द्रजीको सुनाये और विनती करके उनको रथपर चढ़ाया। सीताजीसहित दोनों भाई रथपर चढ़कर हृदयमें अयोध्याको सिर नवाकर चले॥ १॥
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥
calata rāmu lakhi avadha anāthā| bikala loga saba lāge sāthā||
kṛpāsiṃdhu bahubidhi samujhāvahiṃ| phirahiṃ prema basa puni phiri āvahiṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीको जाते हुए और अयोध्याको अनाथ [होते हुए] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपाके समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरहसे समझाते हैं, तो वे [ अयोध्याकी ओर] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमबश फिर लौट आते हैं॥ २॥
लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी॥
घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी॥
lāgati avadha bhayāvani bhārī| mānahum̐ kālarāti am̐dhiārī||
ghora jaṃtu sama pura nara nārī| ḍarapahiṃ ekahi eka nihārī||
Meaning अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है। मानो अन्धकारमयी कालरात्रि ही हो। नगरके नर- नारी भयानक जन्तुओंके समान एक-दूसरेको देखकर डर रहे हैं॥ ३॥
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं॥
ghara masāna parijana janu bhūtā| suta hita mīta manahum̐ jamadūtā||
bāganha biṭapa beli kumhilāhīṃ| sarita sarovara dekhi na jāhīṃ||
Meaning घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराजके दूत हैं। बगीचों में वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता॥ ४॥
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥ ८३॥
haya gaya koṭinha kelimṛga purapasu cātaka mora|
pika rathāṃga suka sārikā sārasa haṃsa cakora|| 83||
Meaning करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलनेके लिये पाले हुए हिरन, नगरके [ गाय, बैल, बकरी आदि] पशु, पपीहे, मोर, कोयल,चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर--॥ ८३॥
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥
नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥
rāma biyoga bikala saba ṭhāṛhe| jaham̐ taham̐ manahum̐ citra likhi kāṛhe||
nagaru saphala banu gahabara bhārī| khaga mṛga bipula sakala nara nārī||
Meaning श्रीरामजीके वियोगमें सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ [ऐसे चुपचाप स्थिर होकर] खड़े हैं, मानो तसबवीरोंमें लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलोंसे परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगरनिवासी सब स्त्री-पुरुष बहुत-से पशु-पक्षी थे। ( अर्थात् अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलोंको देनेवाली नगरी थी और सब स्त्री-पुरुष सुखसे उन फलोंको प्राप्त करते थे।)॥ १॥
बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही॥
सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी॥
bidhi kaikeī kirātini kīnhī| jeṃhi dava dusaha dasahum̐ disi dīnhī||
sahi na sake raghubara birahāgī| cale loga saba byākula bhāgī||
Meaning विधाताने कैकेयीको भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओंमें दु:सह दावाग्नि (भयानक आग) लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी इस अग्निको लोग सह न सके। सब लोग व्याकुल होकर भाग चले॥ २॥
सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥
sabahiṃ bicāra kīnha mana māhīṃ| rāma lakhana siya binu sukhu nāhīṃ||
jahām̐ rāmu taham̐ sabui samājū| binu raghubīra avadha nahiṃ kājū||
Meaning सबने मनमें विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके बिना सुख नहीं है। जहाँ श्रीरामजी रहेंगे, वहीं सारा समाज रहेगा। श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यामें हमलोगोंका कुछ काम नहीं है॥ ३॥
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥
cale sātha asa maṃtru dṛṛhāī| sura durlabha sukha sadana bihāī||
rāma carana paṃkaja priya jinhahī| biṣaya bhoga basa karahiṃ ki tinhahī||
Meaning ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओंको भी दुर्लभ सुखोंसे पूर्ण घरोंको छोड़कर सब श्रीरामचन्द्रजीके साथ चल पड़े। जिनको श्रीरामजीके चरणकमल प्यारे हैं, उन्हें क्या कभी विषयभोग वशमें कर सकते हैं॥ ४॥
बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ॥ ८४॥
bālaka bṛddha bihāi gṛm̐ha lage loga saba sātha|
tamasā tīra nivāsu kiya prathama divasa raghunātha|| 84||
Meaning बच्चों और बूढ़ोंको घरोंमें छोड़कर सब लोग साथ हो लिये। पहले दिन श्रीरघुनाथजीने तमसा नदीके तीरपर निवास किया॥ ८४॥
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥
करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥
raghupati prajā premabasa dekhī| sadaya hṛdayam̐ dukhu bhayau biseṣī||
karunāmaya raghunātha gosām̐ī| begi pāiahiṃ pīra parāī||
Meaning प्रजाको प्रेमवश देखकर श्रीरघुनाथजीके दयालु हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। प्रभु श्रीरघुनाथजी करुणामय हैं। परायी पीड़ाको वे तुरंत पा जाते हैं (अर्थात् दूसरेका दुःख देखकर वे तुरंत स्वयं दुःखित हो जाते हैं)॥ १॥
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥
किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥
kahi saprema mṛdu bacana suhāe| bahubidhi rāma loga samujhāe||
kie dharama upadesa ghanere| loga prema basa phirahiṃ na phere||
Meaning प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजीने बहुत प्रकारसे लोगोंको समझाया और बहुतेरे धर्मसम्बन्धी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमबश लोग लौटाये लौटते नहीं॥ २॥
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥
लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥
sīlu sanehu chāṛi nahiṃ jāī| asamaṃjasa basa bhe raghurāī||
loga soga śrama basa gae soī| kachuka devamāyām̐ mati moī||
Meaning शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता। श्रीरघुनाथजी असमजझसके अधीन हो गये (दुविधामें पड़ गये)। शोक और परिश्रम (थकावट) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओंकी मायासे भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी॥ ३॥
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥
खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता॥
jabahiṃ jāma juga jāmini bītī| rāma saciva sana kaheu saprītī||
khoja māri rathu hām̐kahu tātā| āna upāyam̐ banihi nahiṃ bātā||
Meaning जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमपूर्वक मन्त्री सुमन्त्रसे कहा--हे तात! रथके खोज मारकर (अर्थात् पहियोंके चिह्लोंसे दिशाका पता न चले इस प्रकार) रथको हाँकिये। और किसी उपायसे बात नहीं बनेगी॥ ४॥
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥ ८५॥
rāma lakhana suya jāna caṛhi saṃbhu carana siru nāi|
sacivam̐ calāyau turata rathu ita uta khoja durāi|| 85||
Meaning शंकरजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी रथपर सवार हुए। मन्त्रीने तुरंत ही रथको, इधर-उधर खोज छिपाकर चला दिया॥ ८५॥
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥
रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं॥
jāge sakala loga bhaem̐ bhorū| ge raghunātha bhayau ati sorū||
ratha kara khoja katahahum̐ nahiṃ pāvahiṃ| rāma rāma kahi cahu disi dhāvahiṃ||
Meaning सबेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि श्रीरघुनाथजी चले गये। कहीं रथका खोज नहीं पाते, सब 'हा राम! हा राम!' पुकारते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं॥१॥
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥
एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥
manahum̐ bārinidhi būṛa jahājū| bhayau bikala baṛa banika samājū||
ekahi eka deṃhiṃ upadesū| taje rāma hama jāni kalesū||
Meaning मानो समुद्रमें जहाज डूब गया हो, जिससे व्यापारियोंका समुदाय बहुत ही व्याकुल हो उठा हो। वे एक-दूसरेको उपदेश देते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने, हमलोगोंको क्लेश होगा, यह जानकर छोड़ दिया है॥ २॥
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥
niṃdahiṃ āpu sarāhahiṃ mīnā| dhiga jīvanu raghubīra bihīnā||
jauṃ pai priya biyogu bidhi kīnhā| tau kasa maranu na māgeṃ dīnhā||
Meaning वे लोग अपनी निन्दा करते हैं और मछलियोंकी सराहना करते हैं। [कहते हैं-] श्रीरामचन्द्रजीके बिना हमारे जीनेको धिक्कार है। विधाताने यदि प्यारेका वियोग ही रचा, तो फिर उसने माँगनेपर मृत्यु क्यों नहीं दी!॥ ३॥
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा॥
बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना॥
ehi bidhi karata pralāpa kalāpā| āe avadha bhare paritāpā||
biṣama biyogu na jāi bakhānā| avadhi āsa saba rākhahiṃ prānā||
Meaning इस प्रकार बहुत-से प्रलाप करते हुए वे सन्तापसे भरे हुए अयोध्याजीमें आये। उन लोगोंके विषम वियोगकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता। [ चौदह सालकी ] अवधिकी आशासे ही वे प्राणोंको रख रहे हैं॥ ४॥
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि॥ ८६॥
rāma darasa hita nema brata lage karana nara nāri|
manahum̐ koka kokī kamala dīna bihīna tamāri|| 86||
Meaning [सब] स्त्री-पुरुष श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और ब्रत करने लगे और ऐसे दु:खी हो गये जैसे चकवा, चकवी और कमल सूर्यके बिना दीन हो जाते हैं॥ ८६॥
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥
sītā saciva sahita dou bhāī| sṛṃgaberapura pahum̐ce jāī||
utare rāma devasari dekhī| kīnha daṃḍavata haraṣu biseṣī||
Meaning सीताजी और मन्त्रीसहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गज़ाजीको देखकर श्रीरामजी रथसे उतर पड़े और बड़े हर्षके साथ उन्होंने दण्डवत् की॥ १॥
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥
lakhana sacivam̐ siyam̐ kie pranāmā| sabahi sahita sukhu pāyau rāmā||
gaṃga sakala muda maṃgala mūlā| saba sukha karani harani saba sūlā||
Meaning लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजीने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। गड़ाजी समस्त आनन्द-मज़्लोंकी मूल हैं। वे सब सुखोंकी करनेवाली और सब पीड़ाओंकी हरनेवाली हैं॥ २॥
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥
kahi kahi koṭika kathā prasaṃgā| rāmu bilokahiṃ gaṃga taraṃgā||
sacivahi anujahi priyahi sunāī| bibudha nadī mahimā adhikāī||
Meaning अनेक कथा-प्रसज् कहते हुए श्रीरामजी गड़ाजीकी तरड्ञोंको देख रहे हैं। उन्होंने मन्त्रीको, छोटे भाई लक्ष्मणजीको और प्रिया सीताजीको देवनदी गड्ाजीकी बड़ी महिमा सुनायी॥ ३॥
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥
majjanu kīnha paṃtha śrama gayaū| suci jalu piata mudita mana bhayaū||
sumirata jāhi miṭai śrama bhārū| tehi śrama yaha laukika byavahārū||
Meaning इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम ( थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरणमात्रसे [ बार-बार जन्मने और मरनेका] महानू् श्रम मिट जाता है, उनको ' श्रम' होना--यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है॥ ४॥
सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥ ८७॥
sudhda sacidānaṃdamaya kaṃda bhānukula ketu|
carita karata nara anuharata saṃsṛti sāgara setu|| 87||
Meaning शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मज़लविग्रह ) सच्चिदानन्द-कन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंके सदृश ऐसे चरित्र करते हैं जो संसाररूपी समुद्रके पार उतरनेके लिये पुलके समान हैं॥ ८७॥
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥
लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा॥
yaha sudhi guham̐ niṣāda jaba pāī| mudita lie priya baṃdhu bolāī||
lie phala mūla bheṃṭa bhari bhārā| milana caleu hiṃyam̐ haraṣu apārā||
Meaning जब निषादराज गुहने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बन्धुओंको बुला लिया और भेंट देनेके लिये फल, मूल (कन्द) लेकर और उन्हें भारों (बहँगियों )-में भरकर मिलनेके लिये चला। उसके हदयमें हर्षका पार नहीं था॥ १॥
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥
kari daṃḍavata bheṃṭa dhari āgeṃ| prabhuhi bilokata ati anurāgeṃ||
sahaja saneha bibasa raghurāī| pūm̐chī kusala nikaṭa baiṭhāī||
Meaning दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेमसे प्रभुको देखने लगा। श्रीरघुनाथजीने स्वाभाविक स्नेहके वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी॥ २॥
नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें॥
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥
nātha kusala pada paṃkaja dekheṃ| bhayaum̐ bhāgabhājana jana lekheṃ||
deva dharani dhanu dhāmu tumhārā| maiṃ janu nīcu sahita parivārā||
Meaning निषादराजने उत्तर दिया--हे नाथ! आपके चरणकमलके दर्शनसे ही कुशल है [आपके चरणारविन्दोंके दर्शनकर] आज मैं भाग्यवान् पुरुषोंकी गिनतीमें आ गया। हे देव! यह पृथ्वी, धन और घर सब आपका है। मैं तो परिवारसहित आपका नीच सेवक हूँ॥ ३॥
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ॥
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना॥
kṛpā karia pura dhāria pāū| thāpiya janu sabu logu sihāū||
kahehu satya sabu sakhā sujānā| mohi dīnha pitu āyasu ānā||
Meaning अब कृपा करके पुर ( श्रंगवेरपुर)-में पधारिये और इस दासकी प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्यकी बड़ाई करें। श्रीरामचन्द्रजीने कहा-हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है। परन्तु पिताजीने मुझको और ही आज्ञा दी है॥ ४॥
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥ ८८॥
baraṣa cāridasa bāsu bana muni brata beṣu ahāru|
grāma bāsu nahiṃ ucita suni guhahi bhayau dukhu bhāru|| 88||
Meaning [ उनके आज्ञानुसार] मुझे चौदह वर्षतक मुनियोंका व्रत और वेष धारणकर और मुनियोंके योग्य आहार करते हुए वनमें ही बसना है, गाँवके भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुहको बड़ा दुःख हुआ॥ ८८॥
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
rāma lakhana siya rūpa nihārī| kahahiṃ saprema grāma nara nārī||
te pitu mātu kahahu sakhi kaise| jinha paṭhae bana bālaka aise||
Meaning श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर गाँवके स्त्री -पुरुष प्रेमके साथ चर्चा करते हैं। [ कोई कहती है--] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे [ सुन्दर सुकुमार] बालकोंको वनमें भेज दिया है!॥ १॥
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥
तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना॥
eka kahahiṃ bhala bhūpati kīnhā| loyana lāhu hamahi bidhi dīnhā||
taba niṣādapati ura anumānā| taru siṃsupā manohara jānā||
Meaning कोई एक कहते हैं--राजाने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्माने नेत्रोंका लाभ दिया। तब निषादराजने हृदयमें अनुमान किया, तो अशोकके पेड़को [ उनके ठहरनेके लिये] मनोहर समझा॥ २॥
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥
पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए॥
lai raghunāthahi ṭhāum̐ dekhāvā| kaheu rāma saba bhām̐ti suhāvā||
purajana kari johāru ghara āe| raghubara saṃdhyā karana sidhāe||
Meaning उसने श्रीरघुनाथजीको ले जाकर वह स्थान दिखाया। श्रीरामचन्द्रजीने [ देखकर] कहा कि यह सब प्रकारसे सुन्दर है। पुरवासी लोग जोहार (वन्दना) करके अपने-अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्रजी सन्ध्या करने पधारे॥ ३॥
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥
guham̐ sam̐vāri sām̐tharī ḍasāī| kusa kisalayamaya mṛdula suhāī||
suci phala mūla madhura mṛdu jānī| donā bhari bhari rākhesi pānī||
Meaning गुहने [इसी बीच] कुश और कोमल पत्तोंकी कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनोंमें भर-भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [ अथवा अपने हाथसे फल-मूल दोनोंमें भर-भरकर रख दिये]॥ ४॥
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ॥ ८९॥
siya sumaṃtra bhrātā sahita kaṃda mūla phala khāi|
sayana kīnha raghubaṃsamani pāya paloṭata bhāi|| 89||
Meaning सीताजी, सुमन्त्रजी और भाई लक्ष्मणजीसहित कन्द-मूल-फल खाकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी लेट गये। भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबाने लगे॥ ८९॥
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥
कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥
uṭhe lakhanu prabhu sovata jānī| kahi sacivahi sovana mṛdu bānī||
kachuka dūra saji bāna sarāsana| jāgana lage baiṭhi bīrāsana||
Meaning फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणीसे मन्त्री सुमन्त्रजीको सोनेके लिये कहकर वहाँसे कुछ दूरपर धनुष-बाणसे सजकर, वीरासनसे बैठकर जागने (पहरा देने) लगे॥ १॥
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती॥
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई॥
gum̐ha bolāi pāharū pratītī| ṭhāvam̐ ṭhām̐va rākhe ati prītī||
āpu lakhana pahiṃ baiṭheu jāī| kaṭi bhāthī sara cāpa caṛhāī||
Meaning गुहने विश्वासपात्र पहरेदारोंको बुलाकर अत्यन्त प्रेमसे जगह-जगह नियुक्त कर दिया। और आप कमरमें तरकस बाँधकर तथा धनुषपर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणजीके पास जा बैठा॥ २॥
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू॥
तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई॥
sovata prabhuhi nihāri niṣādū| bhayau prema basa hdayam̐ biṣādū||
tanu pulakita jalu locana bahaī| bacana saprema lakhana sana kahaī||
Meaning प्रभुको जमीनपर सोते देखकर प्रेमवश निषादराजके हृदयमें विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा। वह प्रेमसहित लक्ष्मणजीसे वचन कहने लगा--॥ ३॥