बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥
bacana binīta madhura raghubara ke| sara sama lage mātu ura karake||
sahami sūkhi suni sītali bānī| jimi javāsa pareṃ pāvasa pānī||
Meaning रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥ १॥
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥
नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥
kahi na jāi kachu hṛdaya biṣādū| manahum̐ mṛgī suni kehari nādū||
nayana sajala tana thara thara kām̐pī| mājahi khāi mīna janu māpī||
Meaning हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंगें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षाका फेन) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥ २॥
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥
dhari dhīraju suta badanu nihārī| gadagada bacana kahati mahatārī||
tāta pitahi tumha prānapiāre| dekhi mudita nita carita tumhāre||
Meaning धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गदूगद वचन कहने लगीं--हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे॥ ३॥
राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥
तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥
rāju dena kahum̐ subha dina sādhā| kaheu jāna bana kehiṃ aparādhā||
tāta sunāvahu mohi nidānū| ko dinakara kula bhayau kṛsānū||
Meaning राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराधसे वन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यबंश [रूपी वन] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया 2॥ ४॥
निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥ ५४॥
nirakhi rāma rukha sacivasuta kāranu kaheu bujhāi|
suni prasaṃgu rahi mūka jimi dasā barani nahiṃ jāi|| 54||
Meaning तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५४॥
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू॥
rākhi na sakai na kahi saka jāhū| duhūm̐ bhām̐ti ura dāruna dāhū||
likhata sudhākara gā likhi rāhū| bidhi gati bāma sadā saba kāhū||
Meaning न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है। [ मनमें सोचती हैं कि देखो--] विधाताकी चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु!॥ १॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥
dharama saneha ubhayam̐ mati gherī| bhai gati sām̐pa chuchuṃdari kerī||
rākhaum̐ sutahi karaum̐ anurodhū| dharamu jāi aru baṃdhu birodhū||
Meaning धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजीकी बुद्धिको घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछूँदरकी-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्रको रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयोंमें विरोध होता है;॥ २॥
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी॥
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥
kahaum̐ jāna bana tau baṛi hānī| saṃkaṭa soca bibasa bhai rānī||
bahuri samujhi tiya dharamu sayānī| rāmu bharatu dou suta sama jānī||
Meaning और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकारके धर्म-संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिब्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रोंको समान जानकर--॥ ३॥
सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥
sarala subhāu rāma mahatārī| bolī bacana dhīra dhari bhārī||
tāta jāum̐ bali kīnhehu nīkā| pitu āyasu saba dharamaka ṭīkā||
Meaning सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं--हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोका शिरोमणि धर्म है॥ ४॥
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु॥ ५५॥
rāju dena kahi dīnha banu mohi na so dukha lesu|
tumha binu bharatahi bhūpatihi prajahi pracaṃḍa kalesu|| 55||
Meaning राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। [दुःख तो इस बातका है कि] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा भारी क्लेश होगा॥ ५५॥
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना॥
jauṃ kevala pitu āyasu tātā| tau jani jāhu jāni baṛi mātā||
jauṃ pitu mātu kaheu bana jānā| tauṃ kānana sata avadha samānā||
Meaning हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [पितासे] बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है॥ १॥
पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥
pitu banadeva mātu banadevī| khaga mṛga carana saroruha sevī||
aṃtahum̐ ucita nṛpahi banabāsū| baya biloki hiyam̐ hoi harām̐sū||
Meaning वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण- कमलोंके सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [ सुकुमार] अवस्था देखकर हृदयमें दु:ख होता है॥ २॥
बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥
baṛabhāgī banu avadha abhāgī| jo raghubaṃsatilaka tumha tyāgī||
jauṃ suta kahau saṃga mohi lehū| tumhare hṛdayam̐ hoi saṃdehū||
Meaning हे रघुवंशके तिलक ! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं]॥ ३॥
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥
pūta parama priya tumha sabahī ke| prāna prāna ke jīvana jī ke||
te tumha kahahu mātu bana jāūm̐| maiṃ suni bacana baiṭhi pachitāūm̐||
Meaning हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ !॥ ४॥
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥ ५६॥
yaha bicāri nahiṃ karaum̐ haṭha jhūṭha sanehu baṛhāi|
māni mātu kara nāta bali surati bisari jani jāi|| 56||
Meaning यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना॥ ५६॥
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई॥
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥
deva pitara saba tunhahi gosāī| rākhahum̐ palaka nayana kī nāī||
avadhi aṃbu priya parijana mīnā| tumha karunākara dharama dhurīnā||
Meaning हे गोसाई! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखोंकी रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवासकी अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुट्म्बी मछली हैं। तुम दयाकी खान और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो॥ १॥
अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई॥
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥
asa bicāri soi karahu upāī| sabahi jiata jehiṃ bheṃṭehu āī||
jāhu sukhena banahi bali jāūm̐| kari anātha jana parijana gāūm̐||
Meaning ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ॥ २॥
सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥
saba kara āju sukṛta phala bītā| bhayau karāla kālu biparītā||
bahubidhi bilapi carana lapaṭānī| parama abhāgini āpuhi jānī||
Meaning आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [इस प्रकार] बहुत विलाप करके और अपनेको परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंमें लिपट गयीं॥ ३॥
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥
राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥
dāruna dusaha dāhu ura byāpā| barani na jāhiṃ bilāpa kalāpā||
rāma uṭhāi mātu ura lāī| kahi mṛdu bacana bahuri samujhāī||
Meaning हृदयमें भयानक दु:सह संताप छा गया। उस समयके बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया॥ ४॥
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥ ५७॥
samācāra tehi samaya suni sīya uṭhī akulāi|
jāi sāsu pada kamala juga baṃdi baiṭhi siru nāi|| 57||
Meaning उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सासके पास जाकर उनके दोनों चरणकमलोंकी वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं॥ ५७॥
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥
बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥
dīnhi asīsa sāsu mṛdu bānī| ati sukumāri dekhi akulānī||
baiṭhi namitamukha socati sītā| rūpa rāsi pati prema punītā||
Meaning सासने कोमल वाणीसे आशीर्वाद दिया। वे सीताजीको अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूपकी राशि और पतिके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं॥ १॥
चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू॥
की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना॥
calana cahata bana jīvananāthū| kehi sukṛtī sana hoihi sāthū||
kī tanu prāna ki kevala prānā| bidhi karatabu kachu jāi na jānā||
Meaning जीवननाथ (प्राणनाथ) वनको चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवानूसे उनका साथ होगा-- शरीर और प्राण दोनों साथ जायँगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा ? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती॥ २॥
चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥
cāru carana nakha lekhati dharanī| nūpura mukhara madhura kabi baranī||
manahum̐ prema basa binatī karahīṃ| hamahi sīya pada jani pariharahīṃ||
Meaning सीताजी अपने सुन्दर चरणोंके नखोंसे धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरोंका जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेमके वश होकर नूपुर यह विनती कर रहे हैं कि सीताजीके चरण कभी हमारा त्याग न करें॥ ३॥
मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी॥
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी॥
maṃju bilocana mocati bārī| bolī dekhi rāma mahatārī||
tāta sunahu siya ati sukumārī| sāsu sasura parijanahi piārī||
Meaning सीताजी सुन्दर नेत्रोंसे जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी बोलीं--हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभीको प्यारी हैं॥ ४॥
पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।
पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु॥ ५८॥
pitā janaka bhūpāla mani sasura bhānukula bhānu|
pati rabikula kairava bipina bidhu guna rūpa nidhānu|| 58||
Meaning इनके पिता जनकजी राजाओंके शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुलके सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूपके भण्डार हैं॥ ५८॥
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई॥
maiṃ puni putrabadhū priya pāī| rūpa rāsi guna sīla suhāī||
nayana putari kari prīti baṛhāī| rākheum̐ prāna jānikihiṃ lāī||
Meaning फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन ( जानकी )को आँखों की पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं॥ १॥
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥
फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥
kalapabeli jimi bahubidhi lālī| sīṃci saneha salila pratipālī||
phūlata phalata bhayau bidhi bāmā| jāni na jāi kāha parināmā||
Meaning इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़-चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है। अब इस लताके फूलने-फलनेके समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा॥ २॥
पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥
palam̐ga pīṭha taji goda hiṃṛorā| siyam̐ na dīnha pagu avani kaṭhorā||
jianamūri jimi jogavata rahaūm̐| dīpa bāti nahiṃ ṭārana kahaūm̐||
Meaning सीताने पर्यड्रपृष्ठ (पलंगके ऊपर), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा सज्ञीवनी जड़ीके समान [सावधानीसे] इनकी रखवाली करती रही हूँ! कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती॥ ३॥
सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥
चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी॥
soi siya calana cahati bana sāthā| āyasu kāha hoi raghunāthā||
caṃda kirana rasa rasika cakorī| rabi rukha nayana sakai kimi jorī||
Meaning वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है। हे रघुनाथ ! उसे कया आज्ञा होती है ? चन्द्रमाकी किरणोंका रस (अमृत) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है॥ ४॥
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥ ५९॥
kari kehari nisicara carahiṃ duṣṭa jaṃtu bana bhūri|
biṣa bāṭikām̐ ki soha suta subhaga sajīvani mūri|| 59||
Meaning हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सज्ञीवनी बूटी शोभा पा सकती है ?॥ ५९॥
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥
पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥
bana hita kola kirāta kisorī| racīṃ biraṃci biṣaya sukha bhorī||
pāina kṛmi jimi kaṭhina subhāū| tinhahi kalesu na kānana kāū||
Meaning वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े-जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता॥ १॥
कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥
kai tāpasa tiya kānana jogū| jinha tapa hetu tajā saba bhogū||
siya bana basihi tāta kehi bhām̐tī| citralikhita kapi dekhi ḍerātī||
Meaning अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी ?॥ २॥
सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥
अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥
surasara subhaga banaja bana cārī| ḍābara jogu ki haṃsakumārī||
asa bicāri jasa āyasu hoī| maiṃ sikha deum̐ jānakihi soī||
Meaning देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ैयों (तलैयों ) में रहनेके योग्य है ? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ॥ ३॥
जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥
jauṃ siya bhavana rahai kaha aṃbā| mohi kaham̐ hoi bahuta avalaṃbā||
suni raghubīra mātu priya bānī| sīla saneha sudhām̐ janu sānī||
Meaning माता कहती हैं--यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी,॥ ४॥
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥ ६०॥
kahi priya bacana bibekamaya kīnhi mātu paritoṣa|
lage prabodhana jānakihi pragaṭi bipina guna doṣa|| 60||
Meaning विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया। फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे॥ ६०॥
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥
राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥
mātu samīpa kahata sakucāhīṃ| bole samau samujhi mana māhīṃ||
rājakumāri sikhāvana sunahū| āna bhām̐ti jiyam̐ jani kachu gunahū||
Meaning माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं। पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले--हे राजकुमारी ! मेरी सिखावन सुनो। मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना॥ १॥
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥
आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥
āpana mora nīka jauṃ cahahū| bacanu hamāra māni gṛha rahahū||
āyasu mora sāsu sevakāī| saba bidhi bhāmini bhavana bhalāī||
Meaning जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी। घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है॥ २॥
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥
ehi te adhika dharamu nahiṃ dūjā| sādara sāsu sasura pada pūjā||
jaba jaba mātu karihi sudhi morī| hoihi prema bikala mati bhorī||
Meaning आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा (सेवा) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी ),॥ ३॥
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥
taba taba tumha kahi kathā purānī| suṃdari samujhāehu mṛdu bānī||
kahaum̐ subhāyam̐ sapatha sata mohī| sumukhi mātu hita rākhaum̐ tohī||
Meaning हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ॥ ४॥
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१॥
gura śruti saṃmata dharama phalu pāia binahiṃ kalesa|
haṭha basa saba saṃkaṭa sahe gālava nahuṣa naresa|| 61||
Meaning [मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आचरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है। किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे॥ ६१॥
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥
दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥
maiṃ puni kari pravāna pitu bānī| begi phiraba sunu sumukhi sayānī||
divasa jāta nahiṃ lāgihi bārā| suṃdari sikhavanu sunahu hamārā||
Meaning हे सुमुखि! हे सयानी ! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौटूँगा। दिन जाते देर नहीं लगेगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो!॥ १॥
जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥
काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥
jau haṭha karahu prema basa bāmā| tau tumha dukhu pāuba parināmā||
kānanu kaṭhina bhayaṃkaru bhārī| ghora ghāmu hima bāri bayārī||
Meaning हे वामा! यदि प्रेमबश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन ( क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥ २॥
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥
चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥
kusa kaṃṭaka maga kām̐kara nānā| calaba payādehiṃ binu padatrānā||
carana kamala mudu maṃju tumhāre| māraga agama bhūmidhara bhāre||
Meaning रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत-से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥ ३॥
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥
भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥
kaṃdara khoha nadīṃ nada nāre| agama agādha na jāhiṃ nihāre||
bhālu bāgha bṛka kehari nāgā| karahiṃ nāda suni dhīraju bhāgā||
Meaning पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह (रद्द), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [ भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥ ४॥
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२॥
bhūmi sayana balakala basana asanu kaṃda phala mūla|
te ki sadā saba dina milihiṃ sabui samaya anukūla|| 62||
Meaning जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे ? सब कुछ अपने-अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा॥ ६२॥
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥
लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥
nara ahāra rajanīcara carahīṃ| kapaṭa beṣa bidhi koṭika karahīṃ||
lāgai ati pahāra kara pānī| bipina bipati nahiṃ jāi bakhānī||
Meaning मनुष्योंको खानेवाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकारके कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़का पानी बहुत ही लगता है। वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥ १॥
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥
byāla karāla bihaga bana ghorā| nisicara nikara nāri nara corā||
ḍarapahiṃ dhīra gahana sudhi āem̐| mṛgalocani tumha bhīru subhāem̐||
Meaning वनमें भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषोंको चुरानेवाले राक्षसोंके झुंड-के-झुंड रहते हैं। वनकी [ भयंकरता] याद आनेमात्रसे धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभावसे ही डरपोक हो!॥ २॥
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥
haṃsagavani tumha nahiṃ bana jogū| suni apajasu mohi deihi logū||
mānasa salila sudhām̐ pratipālī| jiai ki lavana payodhi marālī||
Meaning हे हंसगमनी ! तुम वनके योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जानेकी बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे ( बुरा कहेंगे )। मानसरोवरके अमृतके समान जलसे पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्रमें जी सकती है ?॥ ३॥
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥
nava rasāla bana biharanasīlā| soha ki kokila bipina karīlā||
rahahu bhavana asa hṛdayam̐ bicārī| caṃdabadani dukhu kānana bhārī||
Meaning नवीन आमके वनमें विहार करनेवाली कोयल क्या करीलके जंगलमें शोभा पाती है ? हे चन्द्रमुखी ! हृदयमें ऐसा विचारकर तुम घरहीपर रहो। वनमें बड़ा कष्ट है॥ ४॥
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
sahaja suhda gura svāmi sikha jo na karai sira māni|
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥ ६३॥
so pachitāi aghāi ura avasi hoi hita hāni|| 63||
Meaning स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है॥ ६३॥
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥
सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें॥
suni mṛdu bacana manohara piya ke| locana lalita bhare jala siya ke||
sītala sikha dāhaka bhai kaiṃseṃ| cakaihi sarada caṃda nisi jaiṃseṃ||
Meaning प्रियतमके कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजीके सुन्दर नेत्र जलसे भर गये। श्रीरामजीकी यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवीको शरद्-ऋतुकी चाँदनी रात होती है॥ १॥
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥
बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥
utaru na āva bikala baidehī| tajana cahata suci svāmi sanehī||
barabasa roki bilocana bārī| dhari dhīraju ura avanikumārī||
Meaning जानकीजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रोंकें जल ( आँसुओं) को जबर्दस्ती रोककर वे पृथ्वीकी कन्या सीताजी हृदयमें धीरज धरकर,॥ २॥
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥
lāgi sāsu paga kaha kara jorī| chamabi debi baṛi abinaya morī||
dīnhi prānapati mohi sikha soī| jehi bidhi mora parama hita hoī||
Meaning सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं->हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाईको क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो॥ ३॥
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं।
पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥
maiṃ puni samujhi dīkhi mana māhīṃ| piya biyoga sama dukhu jaga nāhīṃ||
Meaning परन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगतमें कोई दुःख नहीं है॥ ४॥
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥ ६४॥
prānanātha karunāyatana suṃdara sukhada sujāna|
tumha binu raghukula kumuda bidhu surapura naraka samāna|| 64||
Meaning हे प्राणनाथ ! हे दयाके धाम! हे सुन्दर! हे सुखोंके देनेवाले ! हे सुजान! हे रघुकुलरूपी कुमुदके खिलानेवाले चन्द्रमा ! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरकके समान है॥ ६४॥
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई॥
सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥
mātu pitā bhaginī priya bhāī| priya parivāru suhrada samudāī||
sāsu sasura gura sajana sahāī| suta suṃdara susīla sukhadāī||
Meaning माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रोंका समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बान्धव), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र--॥ १॥
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥
jaham̐ lagi nātha neha aru nāte| piya binu tiyahi taranihu te tāte||
tanu dhanu dhāmu dharani pura rājū| pati bihīna sabu soka samājū||
Meaning हे नाथ! जहाँतक स्नेह और नाते हैं, पतिके बिना स्त्रीको सभी सूर्यसे भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पतिके बिना स्त्रीके लिये यह सब शोकका समाज है॥ २॥
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥
bhoga rogasama bhūṣana bhārū| jama jātanā sarisa saṃsārū||
prānanātha tumha binu jaga māhīṃ| mo kahum̐ sukhada katahum̐ kachu nāhīṃ||
Meaning भोग रोगके समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम-यातना (नरककी पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगतमें मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है॥ ३॥
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥
jiya binu deha nadī binu bārī| taisia nātha puruṣa binu nārī||
nātha sakala sukha sātha tumhāreṃ| sarada bimala bidhu badanu nihāreṃ||
Meaning जैसे बिना जीवके देह और बिना जलके नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुषके स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद्-[ पूर्णिमा] के निर्मल चन्द्रमाके समान मुख देखनेसे मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे॥ ४॥
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥ ६५॥
khaga mṛga parijana nagaru banu balakala bimala dukūla|
nātha sātha surasadana sama paranasāla sukha mūla|| 65||
Meaning हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुट्म्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षोंकी छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी (पत्तोंकी बनी झोंपड़ी ) ही स्वर्गके समान सुखोंकी मूल होगी॥ ६५॥
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥
कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥
banadevīṃ banadeva udārā| karihahiṃ sāsu sasura sama sārā||
kusa kisalaya sātharī suhāī| prabhu sam̐ga maṃju manoja turāī||
Meaning उदार हृदयके वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुरके समान मेरी सार-सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तोंकी सुन्दर साथरी( बिछौना) ही प्रभुके साथ कामदेवकी मनोहर तोशकके समान होगी॥ १॥
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥
kaṃda mūla phala amia ahārū| avadha saudha sata sarisa pahārū||
chinu chinu prabhu pada kamala biloki| rahihaum̐ mudita divasa jimi kokī||
Meaning कन्द, मूल और फल ही अमृतके समान आहार होंगे और [वनके] पहाड़ ही अयोध्याके सैकड़ों राजमहलों के समान होंगे। क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंको देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिनमें चकवी रहती है॥ २॥
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥
प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥
bana dukha nātha kahe bahutere| bhaya biṣāda paritāpa ghanere||
prabhu biyoga lavalesa samānā| saba mili hohiṃ na kṛpānidhānā||
Meaning हे नाथ! आपने वनके बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और सन्ताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान ! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग [से होनेवाले दुःख] के लवलेशके समान भी नहीं हो सकते॥ ३॥
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥
बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥
asa jiyam̐ jāni sujāna siromani| leia saṃga mohi chāṛia jani||
binatī bahuta karauṃ kā svāmī| karunāmaya ura aṃtarajāmī||
Meaning ऐसा जीमें जानकर, हे सुजानशिरोमणि ! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ ? आप करुणामय हैं और सबके हदयके अंदरकी जाननेवाले हैं॥ ४॥
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान॥ ६६॥
rākhia avadha jo avadhi lagi rahata na janiahiṃ prāna|
dīnabaṃdhu saṃdara sukhada sīla saneha nidhāna|| 66||
Meaning हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे॥ ६६॥
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥
mohi maga calata na hoihi hārī| chinu chinu carana saroja nihārī||
sabahi bhām̐ti piya sevā karihauṃ| māraga janita sakala śrama harihauṃ||
Meaning क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलों को देखते रहनेसे मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी। हे प्रियतम ! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी॥ १॥
पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥
pāya pakhārī baiṭhi taru chāhīṃ| karihaum̐ bāu mudita mana māhīṃ||
śrama kana sahita syāma tanu dekheṃ| kaham̐ dukha samau prānapati pekheṃ||
Meaning आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी )। पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर--प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा॥ २॥
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी॥
बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही॥
sama mahi tṛna tarupallava ḍāsī| pāga paloṭihi saba nisi dāsī||
bārabāra mṛdu mūrati johī| lāgahi tāta bayāri na mohī||
Meaning समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी। बार- बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी॥ ३॥
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥
ko prabhu sam̐ga mohi citavanihārā| siṃghabadhuhi jimi sasaka siārā||
maiṃ sukumāri nātha bana jogū| tumhahi ucita tapa mo kahum̐ bhogū||
Meaning प्रभुके साथ [रहते] मेरी ओर [ आँख उठाकर] देखनेवाला कौन है ( अर्थात् कोई नहीं देख सकता) ! जैसे सिंहकी स्त्री (सिंहनी ) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वनके योग्य हैं ? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग ?॥ ४॥
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान॥ ६७॥
aiseu bacana kaṭhora suni jauṃ na hradau bilagāna|
tau prabhu biṣama biyoga dukha sahihahiṃ pāvam̐ra prāna|| 67||
Meaning ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु! [ मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे॥ ६७॥
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥
देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥
asa kahi sīya bikala bhai bhārī| bacana biyogu na sakī sam̐bhārī||
dekhi dasā raghupati jiyam̐ jānā| haṭhi rākheṃ nahiṃ rākhihi prānā||
Meaning ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं। ( अर्थात् शरीरसे वियोगकीो बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी॥ १॥
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥
kaheu kṛpāla bhānukulanāthā| parihari socu calahu bana sāthā||
nahiṃ biṣāda kara avasaru ājū| begi karahu bana gavana samājū||
Meaning तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो॥ २॥
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥
बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥
kahi priya bacana priyā samujhāī| lage mātu pada āsiṣa pāī||
begi prajā dukha meṭaba āī| jananī niṭhura bisari jani jāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया। फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [ माताने कहा--] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय!॥ ३॥
फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥
सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥
phirahi dasā bidhi bahuri ki morī| dekhihaum̐ nayana manohara jorī||
sudina sugharī tāta kaba hoihi| jananī jiata badana bidhu joihi||
Meaning हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी ? क्या अपने नेत्रोंसे मैं इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी ? हे पुत्र ! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते-जी तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा फिर देखेगी !॥ ४॥
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥ ६८॥
bahuri baccha kahi lālu kahi raghupati raghubara tāta|
kabahiṃ bolāi lagāi hiyam̐ haraṣi nirakhihaum̐ gāta|| 68||
Meaning हे तात! 'वत्स' कहकर, ' लाल' कहकर, *रघुपति' कहकर, 'रघुवर' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अज्ोंको देखूँगी !॥ ६८॥
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥
lakhi saneha kātari mahatārī| bacanu na āva bikala bhai bhārī||
rāma prabodhu kīnha bidhi nānā| samau sanehu na jāi bakhānā||
Meaning यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १॥
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥
taba jānakī sāsu paga lāgī| sunia māya maiṃ parama abhāgī||
sevā samaya daiam̐ banu dīnhā| mora manorathu saphala na kīnhā||
Meaning तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं--हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया॥ २॥
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥
tajaba chobhu jani chāṛia chohū| karamu kaṭhina kachu dosu na mohū||
suni siya bacana sāsu akulānī| dasā kavani bidhi kahauṃ bakhānī||
Meaning आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ!॥ ३॥
बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥
bārahi bāra lāi ura līnhī| dhari dhīraju sikha āsiṣa dīnhī||
acala hou ahivātu tumhārā| jaba lagi gaṃga jamuna jala dhārā||
Meaning उन्होंने सीताजीको बार-बार हदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गड़ाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे॥ ४॥
सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।
चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥ ६९॥
sītahi sāsu asīsa sikha dīnhi aneka prakāra|
calī nāi pada paduma siru ati hita bārahiṃ bāra|| 69||
Meaning सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे (सीताजी) बड़े ही प्रेमसे बार-बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं॥ ६९॥
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥
कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥
samācāra jaba lachimana pāe| byākula bilakha badana uṭhi dhāe||
kaṃpa pulaka tana nayana sanīrā| gahe carana ati prema adhīrā||
Meaning जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाज्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये॥ १॥
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े।
मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥
kahi na sakata kachu citavata ṭhāṛhe| mīnu dīna janu jala teṃ kāṛhe||
सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा।
सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा॥
socu hṛdayam̐ bidhi kā honihārā| sabu sukhu sukṛta sirāna hamārā||
Meaning वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ऐसे दीन हो रहे हैं] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो। हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया?॥ २॥
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥
राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें॥
mo kahum̐ kāha kahaba raghunāthā| rakhihahiṃ bhavana ki lehahiṃ sāthā||
rāma biloki baṃdhu kara joreṃ| deha geha saba sana tṛnu toreṃ||
Meaning मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे ? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा॥ ३॥
बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥
तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥
bole bacanu rāma naya nāgara| sīla saneha sarala sukha sāgara||
tāta prema basa jani kadarāhū| samujhi hṛdayam̐ parināma uchāhū||
Meaning तब नीतिमें निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले-- हे तात! परिणाममें होनेवाले आनन्दको हृदयमें समझकर तुम प्रेमबश अधीर मत होओ॥ ४॥
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥ ७०॥
mātu pitā guru svāmi sikha sira dhari karahi subhāyam̐|
laheu lābhu tinha janama kara nataru janamu jaga jāyam̐|| 70||
Meaning जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है॥ ७०॥
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥
भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥
asa jiyam̐ jāni sunahu sikha bhāī| karahu mātu pitu pada sevakāī||
bhavana bharatu ripusūdana nāhīṃ| rāu bṛddha mama dukhu mana māhīṃ||
Meaning हे भाई! हृदयमें ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिताके चरणोंकी सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घरपर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और उनके मनमें मेरा दुःख है॥ १॥
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥
maiṃ bana jāum̐ tumhahi lei sāthā| hoi sabahi bidhi avadha anāthā||
guru pitu mātu prajā parivārū| saba kahum̐ parai dusaha dukha bhārū||
Meaning इस अवस्थामें मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकारसे अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभीपर दुःखका दुः:सह भार आ पड़ेगा॥ २॥
रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥
rahahu karahu saba kara paritoṣū| nataru tāta hoihi baṛa doṣū||
jāsu rāja priya prajā dukhārī| so nṛpu avasi naraka adhikārī||
Meaning अत: तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो। नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है॥ ३॥
रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥
सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥
rahahu tāta asi nīti bicārī| sunata lakhanu bhae byākula bhārī||
siareṃ bacana sūkhi gae kaiṃseṃ| parasata tuhina tāmarasu jaiseṃ||
Meaning हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये। इन शीतल वचनोंसे वे कैसे सूख गये, जैसे पालेके स्पर्शसे कमल सूख जाता है!॥ ४॥
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥ 98॥
utaru na āvata prema basa gahe carana akulāi|
nātha dāsu maiṃ svāmi tumha tajahu ta kāha basāi|| 98||
Meaning प्रेमबश लक्ष्मणजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये और कहा-उहे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अत: आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है?॥ ७१॥