राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥
rāma rāma raṭa bikala bhuālū| janu binu paṃkha bihaṃga behālū||
hṛdayam̐ manāva bhoru jani hoī| rāmahi jāi kahai jani koī||
Meaning राजा * राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो। वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे॥ १॥
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥
udau karahu jani rabi raghukula gura| avadha biloki sūla hoihi ura||
bhūpa prīti kaikai kaṭhināī| ubhaya avadhi bidhi racī banāī||
Meaning हे रघुकुलके गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें। अयोध्याको [ बेहाल] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी। राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्ठुरता दोनोंको ब्रह्माने सीमातक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्ठरताकी )॥ २॥
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥
bilapata nṛpahi bhayau bhinusārā| bīnā benu saṃkha dhuni dvārā||
paṛhahiṃ bhāṭa guna gāvahiṃ gāyaka| sunata nṛpahi janu lāgahiṃ sāyaka||
Meaning विलाप करते-करते ही राजाको सबेरा हो गया। राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी। भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं। सुननेपर राजाको वे बाण-जैसे लगते हैं॥ ३॥
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥
तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥
maṃgala sakala sohāhiṃ na kaiseṃ| sahagāminihi bibhūṣana jaiseṃ||
tehiṃ nisi nīda parī nahi kāhū| rāma darasa lālasā uchāhū||
Meaning राजाको ये सब मडज़ल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण ! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी॥ ४॥
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥ ३७॥
dvāra bhīra sevaka saciva kahahiṃ udita rabi dekhi|
jāgeu ajahum̐ na avadhapati kāranu kavanu biseṣi|| 37||
Meaning राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है। वे सब सूर्यको उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन-सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक नहीं जागे ?॥ ३७॥
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥
pachile pahara bhūpu nita jāgā| āju hamahi baṛa acaraju lāgā||
jāhu sumaṃtra jagāvahu jāī| kījia kāju rajāyasu pāī||
Meaning राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें॥ १॥
गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं॥
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥
gae sumaṃtru taba rāura māhī| dekhi bhayāvana jāta ḍerāhīṃ||
dhāi khāi janu jāi na herā| mānahum̐ bipati biṣāda baserā||
Meaning तब सुमन्त्र रावले (राजमहल )में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। [ऐसा लगता है] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो॥ २॥
पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई॥
pūcheṃ kou na ūtaru deī| gae jeṃhiṃ bhavana bhūpa kaikaiī||
kahi jayajīva baiṭha siru nāī| daikhi bhūpa gati gayau sukhāī||
Meaning पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे। ' जय-जीव' कहकर सिर नवाकर (वन्दना करके) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये॥ ३॥
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी॥
soca bikala bibarana mahi pareū| mānahum̐ kamala mūlu parihareū||
saciu sabhīta sakai nahiṃ pūm̐chī| bolī asubha bharī subha chūchī||
Meaning [ देखा कि--] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है। जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़से उखड़कर) [ मुझया पड़ा हो। मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली--॥ ४॥
परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु॥ ३८॥
parī na rājahi nīda nisi hetu jāna jagadīsu|
rāmu rāmu raṭi bhoru kiya kahai na maramu mahīsu|| 38||
Meaning राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने ' राम-राम' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते॥ ३८॥
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥
चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥
ānahu rāmahi begi bolāī| samācāra taba pūm̐chehu āī||
caleu sumaṃtra rāya rūkha jānī| lakhī kucāli kīnhi kachu rānī||
Meaning तुम जल्दी रामको बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है॥ १॥
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें॥
soca bikala maga parai na pāū| rāmahi boli kahihi kā rāū||
ura dhari dhīraju gayau duāreṃ| pūcham̐hiṃ sakala dekhi manu māreṃ||
Meaning सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), [सोचते हैं--] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे ? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये। सब लोग उनको मनमारे (उदास) देखकर पूछने लगे॥ २॥
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥
रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥
samādhānu kari so sabahī kā| gayau jahām̐ dinakara kula ṭīkā||
rāmu sumaṃtrahi āvata dekhā| ādaru kīnha pitā sama lekhā||
Meaning सब लोगोंका समाधान करके (किसी तरह समझा-बुझाकर) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे। श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया॥ ३॥
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥
nirakhi badanu kahi bhūpa rajāī| raghukuladīpahi caleu levāī||
rāmu kubhām̐ti saciva sam̐ga jāhīṃ| dekhi loga jaham̐ taham̐ bilakhāhīṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने साथ] लिवा चले। श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे (बिना किसी लवाजमेके) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं॥ ४॥
जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥ ३९॥
jāi dīkha raghubaṃsamani narapati nipaṭa kusāju|
sahami pareu lakhi siṃghinihi manahum̐ bṛddha gajarāju|| 39||
Meaning रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो॥ ३९॥
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई॥
sūkhahiṃ adhara jarai sabu aṃgū| manahum̐ dīna manihīna bhuaṃgū||
saruṣa samīpa dīkhi kaikeī| mānahum̐ mīcu gharī gani leī||
Meaning राजाके ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [राजाके जीवनकी अन्तिम] घड़ियाँ गिन रही हो॥ १॥
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥
karunāmaya mṛdu rāma subhāū| prathama dīkha dukhu sunā na kāū||
tadapi dhīra dhari samau bicārī| pūm̐chī madhura bacana mahatārī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने [ अपने जीवनमें] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा--॥ २॥
मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥
सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।
mohi kahu mātu tāta dukha kārana| karia jatana jehiṃ hoi nivārana||
sunahu rāma sabu kārana ehū| rājahi tuma para bahuta sanehū|
Meaning हे माता! मुझे पिताजीके दुः:खका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाय। [कैकेयीने कहा--]हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है॥ ३॥
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना।
मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना॥
dena kahenhi mohi dui baradānā| māgeum̐ jo kachu mohi sohānā||
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू।
छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥
so suni bhayau bhūpa ura socū| chāṛi na sakahiṃ tumhāra sam̐kocū||
Meaning इन्होंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा। उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते॥ ४॥
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥ ४०॥
suta saneha ita bacanu uta saṃkaṭa pareu naresu|
sakahu na āyasu dharahu sira meṭahu kaṭhina kalesu|| 40||
Meaning इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन (प्रतिज्ञा); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ॥ ४०॥
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥
nidharaka baiṭhi kahai kaṭu bānī| sunata kaṭhinatā ati akulānī||
jībha kamāna bacana sara nānā| manahum̐ mahipa mṛdu laccha samānā||
Meaning कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत-से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं॥ १॥
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥
सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥
janu kaṭhorapanu dhareṃ sarīrū| sikhai dhanuṣabidyā bara bīrū||
saba prasaṃgu raghupatihi sunāī| baiṭhi manahum̐ tanu dhari niṭhurāī||
Meaning [इस सारे साज-सामानके साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो॥ २॥
मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू॥
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥
mana musakāi bhānukula bhānu| rāmu sahaja ānaṃda nidhānū||
bole bacana bigata saba dūṣana| mṛdu maṃjula janu bāga bibhūṣana||
Meaning सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर वचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे--॥ ३॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥
sunu jananī soi sutu baṛabhāgī| jo pitu mātu bacana anurāgī||
tanaya mātu pitu toṣanihārā| durlabha janani sakala saṃsārā||
Meaning हे माता ! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके वचनोंका अनुरागी (पालन करनेवाला) है। [ आज्ञा-पालनके द्वारा] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी ! सारे संसारमें दुर्लभ है॥ ४॥
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥ ४१॥
munigana milanu biseṣi bana sabahi bhām̐ti hita mora|
tehi maham̐ pitu āyasu bahuri saṃmata jananī tora|| 41||
Meaning वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है॥ ४१॥
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु॥
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥
bharata prānapriya pāvahiṃ rājū| bidhi saba bidhi mohi sanamukha āju||
joṃ na jāum̐ bana aisehu kājā| prathama gania mohi mūṛha samājā||
Meaning और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मू्खोंके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये॥ १॥
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥
sevahiṃ aram̐ḍu kalapataru tyāgī| parihari amṛta lehiṃ biṣu māgī||
teu na pāi asa samau cukāhīṃ| dekhu bicāri mātu mana māhīṃ||
Meaning जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड्की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे (महामूर्ख)भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे॥ २॥
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥
aṃba eka dukhu mohi biseṣī| nipaṭa bikala naranāyaku dekhī||
thorihiṃ bāta pitahi dukha bhārī| hoti pratīti na mohi mahatārī||
Meaning हे माता! मुझे एक ही दु:ख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी-सी बातके लिये ही पिताजीको इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बातपर विश्वास नहीं होता॥ ३॥
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू॥
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ॥
rāu dhīra guna udadhi agādhū| bhā mohi te kachu baṛa aparādhū||
jāteṃ mohi na kahata kachu rāū| mori sapatha tohi kahu satibhāū||
Meaning क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणोंके अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो॥ ४॥
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥ ४२॥
sahaja sarala raghubara bacana kumati kuṭila kari jāna|
calai joṃka jala bakragati jadyapi salilu samāna|| 42||
Meaning रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावसे ही सीधे वचनोंको दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चालसे ही चलती है॥ ४२॥
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई॥
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना॥
rahasī rāni rāma rukha pāī| bolī kapaṭa sanehu janāī||
sapatha tumhāra bharata kai ānā| hetu na dūsara mai kachu jānā||
Meaning रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली--तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है॥ १॥
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥
tumha aparādha jogu nahiṃ tātā| jananī janaka baṃdhu sukhadātā||
rāma satya sabu jo kachu kahahū| tumha pitu mātu bacana rata ahahū||
Meaning हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं )। तुम तो माता-पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माताके वचनों [के पालन; में तत्पर हो॥ २॥
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥
pitahi bujhāi kahahu bali soī| cautheṃpana jehiṃ ajasu na hoī||
tumha sama suana sukṛta jehiṃ dīnhe| ucita na tāsu nirādaru kīnhe||
Meaning मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं॥ ३॥
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥
lāgahiṃ kumukha bacana subha kaise| magaham̐ gayādika tīratha jaise||
rāmahi mātu bacana saba bhāe| jimi surasari gata salila suhāe||
Meaning कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गड्ाजीमें जाकर [ अच्छे-बुरे सभी प्रकारके] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं॥ ४॥
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥ ४३॥
gai muruchā rāmahi sumiri nṛpa phiri karavaṭa līnha|
saciva rāma āgamana kahi binaya samaya sama kīnha|| 43||
Meaning इतनेमें राजाकी मूर्व्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके (' राम-राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की॥ ४३॥
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥
avanipa akani rāmu pagu dhāre| dhari dhīraju taba nayana ughāre||
sacivam̐ sam̐bhāri rāu baiṭhāre| carana parata nṛpa rāmu nihāre||
Meaning जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया। राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणों में पड़ते (प्रणाम करते) देखा॥ १॥
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥
lie saneha bikala ura lāī| gai mani manahum̐ phanika phiri pāī||
rāmahi citai raheu naranāhū| calā bilocana bāri prabāhū||
Meaning स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हदयसे लगा लिया। मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली॥ २॥
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा॥
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥
soka bibasa kachu kahai na pārā| hṛdayam̐ lagāvata bārahiṃ bārā||
bidhihi manāva rāu mana māhīṃ| jehiṃ raghunātha na kānana jāhīṃ||
Meaning शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वनको न जायेँ॥ ३॥
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥
sumiri mahesahi kahai nihorī| binatī sunahu sadāsiva morī||
āsutoṣa tumha avaḍhara dānī| ārati harahu dīna janu jānī||
Meaning फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं--हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ) और अवढरदानी ( मुँहमाँगा दे डालनेवाले ) हैं। अत: मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये॥ ४॥
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु॥ ४४॥
tumha preraka saba ke hṛdayam̐ so mati rāmahi dehu|
bacanu mora taji rahahi ghara parihari sīlu sanehu|| 44||
Meaning आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायेँ॥ ४४॥
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥
ajasu hou jaga sujasu nasāū| naraka parau baru surapuru jāū||
saba dukha dusaha sahāvahu mohī| locana oṭa rāmu jani hoṃhī||
Meaning जगत्में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे [नया पाप होनेसे] मैं नरकमें गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय (पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले)। और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट नहों॥!१॥
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥
asa mana gunai rāu nahiṃ bolā| pīpara pāta sarisa manu ḍolā||
raghupati pitahi premabasa jānī| puni kachu kahihi mātu anumānī||
Meaning राजा मन-ही-मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजीको दुःख होगा]--॥ २॥
देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥
desa kāla avasara anusārī| bole bacana binīta bicārī||
tāta kahaum̐ kachu karaum̐ ḍhiṭhāī| anucitu chamaba jāni larikāī||
Meaning देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे--हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा॥ ३॥
अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥
ati laghu bāta lāgi dukhu pāvā| kāhum̐ na mohi kahi prathama janāvā||
dekhi gosāim̐hi pūm̐chium̐ mātā| suni prasaṃgu bhae sītala gātā||
Meaning इस अत्यन्त तुच्छ बातके लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसीने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी (आप) को इस दशामें देखकर मैंने मातासे पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई)॥ ४॥
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥ 'ढं५॥
maṃgala samaya saneha basa soca pariharia tāta|
āyasu deia haraṣi hiyam̐ kahi pulake prabhu gāta|| 'ḍhaṃ5||
Meaning हे पिताजी! इस मज़लके समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हदयमें प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सवबडद्धि पुलकित हो गये॥ 'ढ५६॥
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥
dhanya janamu jagatītala tāsū| pitahi pramodu carita suni jāsū||
cāri padāratha karatala tākeṃ| priya pitu mātu prāna sama jākeṃ||
Meaning [उन्होंने फिर कहा--] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) उसके करतलगत (मुट्दीमें) रहते हैं॥ १॥
आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥
āyasu pāli janama phalu pāī| aihaum̐ begihiṃ hou rajāī||
bidā mātu sana āvaum̐ māgī| calihaum̐ banahi bahuri paga lāgī||
Meaning आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अत: कृपया आज्ञा दीजिये। मातासे विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके ) वनको चलूँगा॥ २॥
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा॥
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥
asa kahi rāma gavanu taba kīnhā| bhūpa soka basu utaru na dīnhā||
nagara byāpi gai bāta sutīchī| chuata caṛhī janu saba tana bīchī||
Meaning ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये। राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो॥ ३॥
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥
suni bhae bikala sakala nara nārī| beli biṭapa jimi dekhi davārī||
jo jaham̐ sunai dhunai siru soī| baṛa biṣādu nahiṃ dhīraju hoī||
Meaning इस बातको सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (वनमें आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता॥ ४॥
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥ ४६॥
mukha sukhāhiṃ locana stravahi soku na hṛdayam̐ samāi|
manahum̐ karuna rasa kaṭakaī utarī avadha bajāi|| 46||
Meaning सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हदयमें नहीं समाता। मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उतर आयी हो॥ ४६॥
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी॥
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥
milehi mājha bidhi bāta begārī| jaham̐ taham̐ dehiṃ kaikeihi gārī||
ehi pāpinihi būjhi kā pareū| chāi bhavana para pāvaku dhareū||
Meaning सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतनेमें ही विधाताने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयीको गाली दे रहे हैं! इस पापिनको क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घरपर आग रख दी॥ १॥
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥
nija kara nayana kāṛhi caha dīkhā| ḍāri sudhā biṣu cāhata cīkhā||
kuṭila kaṭhora kubuddhi abhāgī| bhai raghubaṃsa benu bana āgī||
Meaning यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके वनके लिये अग्नि हो गयी!॥ २॥
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥
pālava baiṭhi peṛu ehiṃ kāṭā| sukha mahum̐ soka ṭhāṭu dhari ṭhāṭā||
sadā rāmu ehi prāna samānā| kārana kavana kuṭilapanu ṭhānā||
Meaning पत्तेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका ठाट ठटकर रख दिया ! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी॥ ३॥
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥
satya kahahiṃ kabi nāri subhāū| saba bidhi agahu agādha durāū||
nija pratibiṃbu baruku gahi jāī| jāni na jāi nāri gati bhāī||
Meaning कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई ! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती॥ ४॥
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥ '४७॥
kāha na pāvaku jāri saka kā na samudra samāi|
kā na karai abalā prabala kehi jaga kālu na khāi|| '47||
Meaning आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहानेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगतमें काल किसको नहीं खाता !॥ ४७॥
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥
kā sunāi bidhi kāha sunāvā| kā dekhāi caha kāha dekhāvā||
eka kahahiṃ bhala bhūpa na kīnhā| baru bicāri nahiṃ kumatihi dīnhā||
Meaning विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया,॥ १॥
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥
jo haṭhi bhayau sakala dukha bhājanu| abalā bibasa gyānu gunu gā janu||
eka dharama paramiti pahicāne| nṛpahi dosu nahiṃ dehiṃ sayāne||
Meaning जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दु:खोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते॥ २॥
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥
sibi dadhīci haricaṃda kahānī| eka eka sana kahahiṃ bakhānī||
eka bharata kara saṃmata kahahīṃ| eka udāsa bhāyam̐ suni rahahīṃ||
Meaning वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं ( कुछ बोलते नहीं )॥ ३॥
कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥
kāna mūdi kara rada gahi jīhā| eka kahahiṃ yaha bāta alīhā||
sukṛta jāhiṃ asa kahata tumhāre| rāmu bharata kahum̐ prānapiāre||
Meaning कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायँगे। भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं॥ ४॥
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥ ४८॥
caṃdu cavai baru anala kana sudhā hoi biṣatūla|
sapanehum̐ kabahum̐ na karahiṃ kichu bharatu rāma pratikūla|| 48||
Meaning चन्द्रमा चाहे [शीतल किरणोंकी जगह] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्रमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥ ४८॥
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥
eka bidhātahiṃ dūṣanu deṃhīṃ| sudhā dekhāi dīnha biṣu jehīṃ||
kharabharu nagara socu saba kāhū| dusaha dāhu ura miṭā uchāhū||
Meaning कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया। हृदयमें दु:सह जलन हो गयी, आनन्द-उत्साह मिट गया॥ १॥
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी॥
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही॥
biprabadhū kulamānya jaṭherī| je priya parama kaikeī kerī||
lagīṃ dena sikha sīlu sarāhī| bacana bānasama lāgahiṃ tāhī||
Meaning ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं॥ २॥
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥
bharatu na mohi priya rāma samānā| sadā kahahu yahu sabu jagu jānā||
karahu rāma para sahaja sanehū| kehiṃ aparādha āju banu dehū||
Meaning [वे कहती हैं--] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो?॥ ३॥
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥
kabahum̐ na kiyahu savati āresū| prīti pratīti jāna sabu desū||
kausalyām̐ aba kāha bigārā| tumha jehi lāgi bajra pura pārā||
Meaning तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है। अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वर गिरा दिया॥ ४॥
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥ ४९॥
sīya ki piya sam̐gu pariharihi lakhanu ki rahihahiṃ dhāma|
rāju ki bhūm̐jaba bharata pura nṛpu ki jiihi binu rāma|| 49||
Meaning क्या. सीताजी अपने पति (श्रीरामचन्द्रजी)-का साथ छोड़ देंगी ? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे ? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे ? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा)॥ ४९॥
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥
asa bicāri ura chāṛahu kohū| soka kalaṃka koṭhi jani hohū||
bharatahi avasi dehu jubarājū| kānana kāha rāma kara kājū||
Meaning हदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलड्लकी कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है!॥ १॥
नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥
nāhina rāmu rāja ke bhūkhe| dharama dhurīna biṣaya rasa rūkhe||
gura gṛha basahum̐ rāmu taji gehū| nṛpa sana asa baru dūsara lehū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह ) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें॥ २॥
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥
jauṃ nahiṃ lagihahu kaheṃ hamāre| nahiṃ lāgihi kachu hātha tumhāre||
jauṃ parihāsa kīnhi kachu hoī| tau kahi pragaṭa janāvahu soī||
Meaning जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल््लगी की है]॥ ३॥
राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥
rāma sarisa suta kānana jogū| kāha kahihi suni tumha kahum̐ logū||
uṭhahu begi soi karahu upāī| jehi bidhi soku kalaṃku nasāī||
Meaning राम-सरीखा पुत्र क्या वनके योग्य है ? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलड्का नाश हो॥ ४॥
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।
हठि फेरू रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥
जिमि भानुबिनुदिनुप्रान बिनुतनुचंद बिनुजिमि जामिनी।
तिमि अवध तुलसीदास प्रभुबिनुसमुझि धौं जियें भामिनी॥
jehi bhām̐ti soku kalaṃku jāi upāya kari kula pālahī|
haṭhi pherū rāmahi jāta bana jani bāta dūsari cālahī||
jimi bhānubinudinuprāna binutanucaṃda binujimi jāminī|
timi avadha tulasīdāsa prabhubinusamujhi dhauṃ jiyeṃ bhāminī||
Meaning जिस तरह [नगरभरका] शोक और [तुम्हारा] कलड्ड मिठे वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरमजीको हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं--जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भामिनी ! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ (विचारकर देख) तो सही।
सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेइई कछ कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥ ५०॥
sakhinha sikhāvanu dīnha sunata madhura parināma hita|
teiī kacha kāna na kīnha kuṭila prabodhī kūbarī|| 50||
Meaning इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कुबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया॥ ५०॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥
utaru na dei dusaha risa rūkhī| mṛginha citava janu bāghini bhūkhī||
byādhi asādhi jāni tinha tyāgī| calīṃ kahata matimaṃda abhāgī||
Meaning कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दु:सह क्रोधके मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियोंको देख रही हो। तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं॥१॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥
rāju karata yaha daiam̐ bigoī| kīnhesi asa jasa karai na koī||
ehi bidhi bilapahiṃ pura nara nārīṃ| dehiṃ kucālihi koṭika gārīṃ||
Meaning राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा ! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं॥ २॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥
jarahiṃ biṣama jara lehiṃ usāsā| kavani rāma binu jīvana āsā||
bipula biyoga prajā akulānī| janu jalacara gana sūkhata pānī||
Meaning लोग विषमज्वर ( भयानक दु:खकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है। महान् वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो!॥ ३॥
अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई॥
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥
ati biṣāda basa loga logāī| gae mātu pahiṃ rāmu gosāī||
mukha prasanna cita cauguna cāū| miṭā socu jani rākhai rāū||
Meaning सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चित्तमें चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। [श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।]ु॥४॥
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥ ५१॥
nava gayaṃdu raghubīra manu rāju alāna samāna|
chūṭa jāni bana gavanu suni ura anaṃdu adhikāna|| 51||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी केदार लोहेकी बेड़ीके समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है॥ ५१॥
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥
raghukulatilaka jori dou hāthā| mudita mātu pada nāyau māthā||
dīnhi asīsa lāi ura līnhe| bhūṣana basana nichāvari kīnhe||
Meaning रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये॥ १॥
बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए॥
bāra bāra mukha cuṃbati mātā| nayana neha jalu pulakita gātā||
goda rākhi puni hṛdayam̐ lagāe| stravata prenarasa payada suhāe||
Meaning माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंगें प्रेमका जल भर आया है और सब अड्ञ पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे॥ २॥
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥
सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥
premu pramodu na kachu kahi jāī| raṃka dhanada padabī janu pāī||
sādara suṃdara badanu nihārī| bolī madhura bacana mahatārī||
Meaning उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं--॥ ३॥
कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥
kahahu tāta jananī balihārī| kabahiṃ lagana muda maṃgalakārī||
sukṛta sīla sukha sīvam̐ suhāī| janama lābha kai avadhi aghāī||
Meaning हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मज़लकारी लग्न कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जनम लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है;॥ ४॥
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥ ५२॥
jehi cāhata nara nāri saba ati ārata ehi bhām̐ti|
jimi cātaka cātaki tṛṣita bṛṣṭi sarada ritu svāti|| 52||
Meaning तथा जिस (लग्न) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरदू-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं॥ ५२॥
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥
पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥
tāta jāum̐ bali begi nahāhū| jo mana bhāva madhura kachu khāhū||
pitu samīpa taba jāehu bhaiā| bhai baṛi bāra jāi bali maiā||
Meaning हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥ १॥
मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥
सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला॥
mātu bacana suni ati anukūlā| janu saneha surataru ke phūlā||
sukha makaraṃda bhare śriyamūlā| nirakhi rāma manu bhavarum̐ na bhūlā||
Meaning माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर--जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे--ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौंरा उनपर नहीं भूला॥ २॥
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
dharama dhurīna dharama gati jānī| kaheu mātu sana ati mṛdu bānī||
pitām̐ dīnha mohi kānana rājū| jaham̐ saba bhām̐ti mora baṛa kājū||
Meaning धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा--हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥ ३॥
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥
āyasu dehi mudita mana mātā| jehiṃ muda maṃgala kānana jātā||
jani saneha basa ḍarapasi bhoreṃ| ānam̐du aṃba anugraha toreṃ||
Meaning हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मड़ल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥ ४॥
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥ ५३॥
baraṣa cāridasa bipina basi kari pitu bacana pramāna|
āi pāya puni dekhihaum̐ manu jani karasi malāna|| 53||
Meaning चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी) न कर॥ ५३॥