कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥
तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥
kaikayasutā sunata kaṭu bānī| kahi na sakai kachu sahami sukhānī||
tana paseu kadalī jimi kām̐pī| kubarīṃ dasana jībha taba cām̐pī||
Meaning कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मन्थरा)-ने अपनी जीभ दाँतों- तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय)॥ १॥
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥
फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥
kahi kahi koṭika kapaṭa kahānī| dhīraju dharahu prabodhisi rānī||
phirā karamu priya lāgi kucālī| bakihi sarāhai māni marālī||
Meaning फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो ! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुलीको हंसिनी मानकर (वैरिनको हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी॥ २॥
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥
sunu maṃtharā bāta phuri torī| dahini ām̐khi nita pharakai morī||
dina prati dekhaum̐ rāti kusapane| kahaum̐ na tohi moha basa apane||
Meaning कैकेयीने कहा--मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्र देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं॥ ३॥
काह करौ सखि सूध सुभाऊ।
दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥
kāha karau sakhi sūdha subhāū| dāhina bāma na jānaum̐ kāū||
Meaning सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती॥ ४॥
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥ २०॥
apane calata na āju lagi anabhala kāhuka kīnha|
kehiṃ agha ekahi bāra mohi daiam̐ dusaha dukhu dīnha|| 20||
Meaning अपनी चलते (जहाँतक मेरा वश चला) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दु:सह दुःख दिया॥ २०॥
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥
अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥
naihara janamu bharaba baru jāi| jiata na karabi savati sevakāī||
ari basa daiu jiāvata jāhī| maranu nīka tehi jīvana cāhī||
Meaning मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है॥ १॥
दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥
अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥
dīna bacana kaha bahubidhi rānī| suni kubarīṃ tiyamāyā ṭhānī||
asa kasa kahahu māni mana ūnā| sukhu sohāgu tumha kahum̐ dina dūnā||
Meaning रानीने बहुत प्रकारके दीन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचस्रि फैलाया। [वह बोली--] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा॥ २॥
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥
जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥
jehiṃ rāura ati anabhala tākā| soi pāihi yahu phalu paripākā||
jaba teṃ kumata sunā maiṃ svāmini| bhūkha na bāsara nīṃda na jāmini||
Meaning जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह (बुराईरूप) फल पायेगी। हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है॥ ३॥
पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥
भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥
pūm̐cheu guninha rekha tinha khām̐cī| bharata bhuāla hohiṃ yaha sām̐cī||
bhāmini karahu ta kahauṃ upāū| hai tumharīṃ sevā basa rāū||
Meaning मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि ! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवाके वशभमें हैं ही॥ ४॥
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥ २१॥
paraum̐ kūpa tua bacana para sakaum̐ pūta pati tyāgi|
kahasi mora dukhu dekhi baṛa kasa na karaba hita lāgi|| 21||
Meaning [ कैकेयीने कहा--] मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी ?॥ २१॥
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥
लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥
kubarīṃ kari kabulī kaikeī| kapaṭa churī ura pāhana ṭeī||
lakhai na rāni nikaṭa dukhu kaiṃse| carai harita tina balipasu jaiseṃ||
Meaning कुबरीने कैकेयीको [सब तरहसे] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरीको अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थरपर टेया (उसकी धारकों तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकटके (शीघ्र आनेवाले) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है]॥ १॥
सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥
कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥
sunata bāta mṛdu aṃta kaṭhorī| deti manahum̐ madhu māhura ghorī||
kahai ceri sudhi ahai ki nāhī| svāmini kahihu kathā mohi pāhīṃ||
Meaning मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है--हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं ?॥ २॥
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥
सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु॥
dui baradāna bhūpa sana thātī| māgahu āju juṛāvahu chātī||
sutahi rāju rāmahi banavāsū| dehu lehu saba savati hulāsu||
Meaning तुम्हारे दो वरदान राजाके पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंढी करो। पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो॥३॥
भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥
होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥
bhūpati rāma sapatha jaba karaī| taba māgehu jehiṃ bacanu na ṭaraī||
hoi akāju āju nisi bīteṃ| bacanu mora priya mānehu jī teṃ||
Meaning जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बातको हृदयसे प्रिय [या प्राणोंसे भी प्यारी ] समझना॥ ४॥
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।
काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥ २२॥
baṛa kughātu kari pātakini kahesi kopagṛham̐ jāhu|
kāju sam̐vārehu sajaga sabu sahasā jani patiāhu|| 22||
Meaning पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा--कोपभवनमें जाओ। सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना (उनकी बातोंगें न आ जाना)॥ २२॥
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥
तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥
kubarihi rāni prānapriya jānī| bāra bāra baṛi buddhi bakhānī||
tohi sama hita na mora saṃsārā| bahe jāta kai bhaisi adhārā||
Meaning कुबरीको रानीने प्राणोंके समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धिका बखान किया और बोली--संसारमें मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बही जाती हुईके लिये सहारा हुई है॥ १॥
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली॥
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई॥
jauṃ bidhi puraba manorathu kālī| karauṃ tohi cakha pūtari ālī||
bahubidhi cerihi ādaru deī| kopabhavana gavani kaikeī||
Meaning यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखोंकी पुतली बना लूँ। इस प्रकार दासीको बहुत तरहसे आदर देकर कैकेयी कोपभवनमें चली गयी॥ २॥
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी॥
पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥
bipati bīju baraṣā ritu cerī| bhuim̐ bhai kumati kaikeī kerī||
pāi kapaṭa jalu aṃkura jāmā| bara dou dala dukha phala parināmā||
Meaning विपत्ति (कलह) बीज है, दासी वर्षा-ऋतु है, कैकेयीकी कुबुद्धि [उस बीजके बोनेके लिये] जमीन हो गयी। उसमें कपटरूपी जल पाकर अर फूट निकला। दोनों वरदान उस अडछूरके दो पत्ते हैं और अन्तमें इसके दुःखरूपी फल होगा॥ ३॥
कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई॥
राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥
kopa samāju sāji sabu soī| rāju karata nija kumati bigoī||
rāura nagara kolāhalu hoī| yaha kucāli kachu jāna na koī||
Meaning कैकेयी कोपका सब साज सजकर [ कोपभवनमें] जा सोयी। राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धिसे नष्ट हो गयी। राजमहल और नगरमें धूम-धाम मच रही है। इस कुचालको कोई कुछ नहीं जानता॥ ४॥
प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥ २३॥
pramudita pura nara nāri saba sajahiṃ sumaṃgalacāra|
eka prabisahiṃ eka nirgamahiṃ bhīra bhūpa darabāra|| 23||
Meaning बड़े ही आनन्दित होकर नगरके सब स्त्री-पुरुष शुभ मज़लाचारके साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वारमें बड़ी भीड़ हो रही है॥ २३॥
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥
bāla sakhā suna hiyam̐ haraṣāhīṃ| mili dasa pām̐ca rāma pahiṃ jāhīṃ||
prabhu ādarahiṃ premu pahicānī| pūm̐chahiṃ kusala khema mṛdu bānī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके बालसखा राजतिलकका समाचार सुनकर हृदयमें हर्षित होते हैं। वे दस-पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणीसे कुशल-क्षेम पूछते हैं॥ १॥
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा॥
phirahiṃ bhavana priya āyasu pāī| karata parasapara rāma baṛāī||
ko raghubīra sarisa saṃsārā| sīlu saneha nibāhanihārā||
Meaning अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वे आपसभमें एक-दूसरेसे श्रीरामचन्द्रजी को बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं--संसारमें श्रीरघुनाथजीके समान शील और स्नेहको निबाहनेवाला कौन है ?॥ २॥
जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥
सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू॥
jeṃhi jeṃhi joni karama basa bhramahīṃ| taham̐ taham̐ īsu deu yaha hamahīṃ||
sevaka hama svāmī siyanāhū| hou nāta yaha ora nibāhū||
Meaning भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश श्रमते हुए जिस-जिस योनिमें जन्में, वहाँ-वहाँ (उस-उस योनिमें) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्ततक निभ जाय॥ ३॥
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू॥
को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥
asa abhilāṣu nagara saba kāhū| kaikayasutā hdayam̐ ati dāhū||
ko na kusaṃgati pāi nasāī| rahai na nīca mateṃ caturāī||
Meaning नगरमें सबकी ऐसी ही अभिलाषा है। परन्तु कैकेयीके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीचके मतके अनुसार चलनेसे चतुराई नहीं रह जाती॥ ४॥
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।
गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥ २४॥
sām̐sa samaya sānaṃda nṛpu gayau kaikeī geham̐|
gavanu niṭhuratā nikaṭa kiya janu dhari deha saneham̐|| 24||
Meaning सन्ध्याके समय राजा दशरथ आनन्दके साथ कैकेयीके महलमें गये। मानो साक्षात् स्वेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरताके पास गया हो!॥ २४॥
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥
सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥
kopabhavana suni sakuceu rāu| bhaya basa agahuṛa parai na pāū||
surapati basai bāham̐bala jāke| narapati sakala rahahiṃ rukha tākeṃ||
Meaning कोपभवनका नाम सुनकर राजा सहम गये। डरके मारे उनका पाँव आगेको नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओंके बलपर [ राक्षसोंसे निर्भय होकर] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं,॥ १॥
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥
सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥
so suni tiya risa gayau sukhāī| dekhahu kāma pratāpa baṛāī||
sūla kulisa asi am̐gavanihāre| te ratinātha sumana sara māre||
Meaning वही राजा दशरथ स्त्रीका क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेवका प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वर और तलवार आदिकी चोट अपने अज्लों पर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेवके पुष्पबाणसे मारे गये॥ २॥
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥
भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना॥
sabhaya naresu priyā pahiṃ gayaū| dekhi dasā dukhu dāruna bhayaū||
bhūmi sayana paṭu moṭa purānā| die ḍāri tana bhūṣaṇa nānā||
Meaning राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयीके पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। कैकेयी जमीनपर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीरके नाना आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया है॥ ३॥
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी॥
जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥
kumatihi kasi kubeṣatā phābī| ana ahivātu sūca janu bhābī||
jāi nikaṭa nṛpu kaha mṛdu bānī| prānapriyā kehi hetu risānī||
Meaning उस दुर्बुद्धि कैकेयीको यह कुवेषता (बुरा वेष) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापनकी सूचना दे रही हो। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणीसे बोले--हे प्राणप्रिये ! किसलिये रिसाई (रूठी) हो ?॥ ४॥
केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥
kehi hetu rāni risāni parasata pāni patihi nevāraī|
mānahum̐ saroṣa bhuaṃga bhāmini biṣama bhām̐ti nihāraī||
उ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखड।
तुलसी नृपति भवतब्यता ?' बस काम कौतुक लेख॥
u bāsanā rasanā dasana bara marama ṭhāharu dekhaḍa|
tulasī nṛpati bhavatabyatā ?' basa kāma kautuka lekha||
Meaning 'हे रानी! किसलिये रूठी हो यह कहकर राजा उसे हाथसे स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथको [झटककर] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोधमें भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टिसे देख रही हो। दोनों [वरदानोंकी। वासनाएँ उस नागिनकी दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटनेके लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहारके वशभमें होकर इसे (इस प्रकार हाथ झटकने और नागिनकी भाँति देखनेको ) कामदेवकी क्रीडा ही समझ रहे हैं।
बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि।
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥ २५॥
bāra bāra kaha rāu sumukhi sulocani pikabacani|
kārana mohi sunāu gajagāmini nija kopa kara|| 25||
Meaning राजा बार-बार कह रहे हैं-हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! हे कोकिलबयनी ! हे गजगामिनी ! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना॥ २५॥
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥
कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥
anahita tora priyā keim̐ kīnhā| kehi dui sira kehi jamu caha līnhā||
kahu kehi raṃkahi karau naresū| kahu kehi nṛpahi nikāsauṃ desū||
Meaning हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं ? यमराज किसको लेना (अपने लोकको ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगालको राजा कर दूँ या किस राजाको देशसे निकाल दूँ॥ १॥
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥
sakaum̐ tora ari amarau mārī| kāha kīṭa bapure nara nārī||
jānasi mora subhāu barorū| manu tava ānana caṃda cakorū||
Meaning तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े -सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है॥ २॥
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥
जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥
priyā prāna suta sarabasu moreṃ| parijana prajā sakala basa toreṃ||
jauṃ kachu kahau kapaṭu kari tohī| bhāmini rāma sapatha sata mohī||
Meaning हे प्रिये ! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र, यहाँतक कि मेरे प्राण भी,ये सब तेरे वशमें (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है॥ ३॥
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥
bihasi māgu manabhāvati bātā| bhūṣana sajahi manohara gātā||
gharī kugharī samujhi jiyam̐ dekhū| begi priyā pariharahi kubeṣū||
Meaning तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा। मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे॥ ४॥
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥ २६॥
yaha suni mana guni sapatha baṛi bihasi uṭhī matimaṃda|
bhūṣana sajati biloki mṛgu manahum̐ kirātini phaṃda|| 26||
Meaning यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगन्धको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंदा तैयार कर रही हो!॥ २६॥
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥
puni kaha rāu suhrada jiyam̐ jānī| prema pulaki mṛdu maṃjula bānī||
bhāmini bhayau tora manabhāvā| ghara ghara nagara anaṃda badhāvā||
Meaning अपने जीमें कैकेयीको सुहृदू जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले-अहे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं॥ १॥
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥
दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥
rāmahi deum̐ kāli jubarājū| sajahi sulocani maṃgala sājū||
dalaki uṭheu suni hradau kaṭhorū| janu chui gayau pāka baratorū||
Meaning मैं कल ही रामको युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मज़ल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो॥ २॥
ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥
aisiu pīra bihasi tehi goī| cora nāri jimi pragaṭi na roī||
lakhahiṃ na bhūpa kapaṭa caturāī| koṭi kuṭila mani gurū paṛhāī||
Meaning ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराईको नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है॥३॥
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥
jadyapi nīti nipuna naranāhū| nāricarita jalanidhi avagāhū||
kapaṭa sanehu baṛhāi bahorī| bolī bihasi nayana muhu morī||
Meaning यद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपरसे प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली--॥ ४॥
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥ २७॥
māgu māgu pai kahahu piya kabahum̐ na dehu na lehu|
dena kahehu baradāna dui teu pāvata saṃdehu|| 27||
Meaning हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है॥ २७॥
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥
थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥
jāneum̐ maramu rāu ham̐si kahaī| tumhahi kohāba parama priya ahaī||
thāti rākhi na māgihu kāū| bisari gayau mohi bhora subhāū||
Meaning राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसज़ याद नहीं रहा॥ १॥
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
jhūṭhehum̐ hamahi doṣu jani dehū| dui kai cāri māgi maku lehū||
raghukula rīti sadā cali āī| prāna jāhum̐ baru bacanu na jāī||
Meaning मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दोके बदले चार माँग लो। रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायेँ, पर वचन नहीं जाता॥ २॥
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥
nahiṃ asatya sama pātaka puṃjā| giri sama hohiṃ ki koṭika guṃjā||
satyamūla saba sukṛta suhāe| beda purāna bidita manu gāe||
Meaning असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं। * सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों )-की जड़ है। यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है॥ ३॥
तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥
बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥
tehi para rāma sapatha kari āī| sukṛta saneha avadhi raghurāī||
bāta dṛṛhāi kumati ham̐si bolī| kumata kubihaga kulaha janu kholī||
Meaning उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी (मुँहसे निकल पड़ी )। श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेहकी सीमा हैं। इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज)-[ को छोड़नेके लिये उस ]-को कुलही ( आँखोंपरकी टोपी) खोल दी॥ ४॥
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।
भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥ २८॥
bhūpa manoratha subhaga banu sukha subihaṃga samāju|
bhillani jimi chāṛana cahati bacanu bhayaṃkaru bāju|| 28||
Meaning राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है। उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है॥ २८॥
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥
sunahu prānapriya bhāvata jī kā| dehu eka bara bharatahi ṭīkā||
māgaum̐ dūsara bara kara jorī| puravahu nātha manoratha morī||
Meaning [वह बोली-] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये--॥ १॥
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥
tāpasa beṣa biseṣi udāsī| caudaha barisa rāmu banabāsī||
suni mṛdu bacana bhūpa hiyam̐ sokū| sasi kara chuata bikala jimi kokū||
Meaning तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे (राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें। कैकेयीके कोमल (विनययुक्त ) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है॥ २॥
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥
gayau sahami nahiṃ kachu kahi āvā| janu sacāna bana jhapaṭeu lāvā||
bibarana bhayau nipaṭa narapālū| dāmini haneu manahum̐ taru tālū||
Meaning राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो। राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो (जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ)॥ ३॥
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥
māthe hātha mūdi dou locana| tanu dhari socu lāga janu socana||
mora manorathu surataru phūlā| pharata karini jimi hateu samūlā||
Meaning माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षातू सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो। [वे सोचते हैं--हाय!] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला॥ ४॥
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं।
दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं॥
avadha ujāri kīnhi kaikeīṃ| dīnhasi acala bipati kai neīṃ||
Meaning कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी॥ ५॥
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥ २९॥
kavaneṃ avasara kā bhayau gayaum̐ nāri bisvāsa|
joga siddhi phala samaya jimi jatihi abidyā nāsa|| 29||
Meaning किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है॥ २९॥
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥
भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥
ehi bidhi rāu manahiṃ mana jhām̐khā| dekhi kubhām̐ti kumati mana mākhā||
bharatu ki rāura pūta na hohīṃ| ānehu mola besāhi ki mohī||
Meaning इस प्रकार राजा मन-ही-मन झींख रहे हैं। राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई। [और बोली--] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं ? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं ? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?)॥ १॥
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे॥
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥
jo suni saru asa lāga tumhāreṃ| kāhe na bolahu bacanu sam̐bhāre||
dehu utaru anu karahu ki nāhīṃ| satyasaṃdha tumha raghukula māhīṃ||
Meaning जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते ? उत्तर दीजिये-हाँ कीजिये, नहीं तो नाहीं कर दीजिये। आप रघुवंशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [प्रसिद्ध] हैं!॥ २१॥
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू॥
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥
dena kahehu aba jani baru dehū| tajahum̐ satya jaga apajasu lehū||
satya sarāhi kahehu baru denā| jānehu leihi māgi cabenā||
Meaning आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्यको छोड़ दीजिये और जगतमें अपयश लीजिये। सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी!॥ ३॥
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥
sibi dadhīci bali jo kachu bhāṣā| tanu dhanu tajeu bacana panu rākhā||
ati kaṭu bacana kahati kaikeī| mānahum̐ lona jare para deī||
Meaning राजा शिबि, दधीचि और बलिने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो॥ ४॥
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥ ३०॥
dharama dhuraṃdhara dhīra dhari nayana ughāre rāyam̐|
siru dhuni līnhi usāsa asi māresi mohi kuṭhāyam̐|| 30||
Meaning धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥ ३०॥
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥
āgeṃ dīkhi jarata risa bhārī| manahum̐ roṣa taravāri ughārī||
mūṭhi kubuddhi dhāra niṭhurāī| dharī kūbarīṃ sāna banāī||
Meaning प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यानसे बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठतुरता धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥ १॥
लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥
lakhī mahīpa karāla kaṭhorā| satya ki jīvanu leihi morā||
bole rāu kaṭhina kari chātī| bānī sabinaya tāsu sohātī||
Meaning राजाने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा--] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे( कैकेयीको )प्रिय लगनेवाली वाणी बोले--॥ २॥
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी॥
priyā bacana kasa kahasi kubhām̐tī| bhīra pratīti prīti kari hām̐tī||
moreṃ bharatu rāmu dui ām̐khī| satya kahaum̐ kari saṃkarū sākhī||
Meaning हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात् एक-से) हैं; यह मैं शड्डरजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥ ३॥
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥
avasi dūtu maiṃ paṭhaiba prātā| aihahiṃ begi sunata dou bhrātā||
sudina sodhi sabu sāju sajāī| deum̐ bharata kahum̐ rāju bajāī||
Meaning मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा॥ '४॥
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥ ३१॥
lobhu na rāmahi rāju kara bahuta bharata para prīti|
maiṃ baṛa choṭa bicāri jiyam̐ karata raheum̐ nṛpanīti|| 31||
Meaning रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मनमें बड़े-छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था (बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था)॥ ३१॥
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥
rāma sapatha sata kahuum̐ subhāū| rāmamātu kachu kaheu na kāū||
maiṃ sabu kīnha tohi binu pūm̐cheṃ| tehi teṃ pareu manorathu chūcheṃ||
Meaning रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता (कौसल्या) -ने [इस विषयमें] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया॥ १॥
रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥
risa pariharū aba maṃgala sājū| kachu dina gaem̐ bharata jubarājū||
ekahi bāta mohi dukhu lāgā| bara dūsara asamaṃjasa māgā||
Meaning अब क्रोध छोड़ दे और मज़ल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायेँगे। एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड्चनका माँगा॥ २॥
अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥
ajahum̐ hṛdaya jarata tehi ām̐cā| risa parihāsa ki sām̐cehum̐ sām̐cā||
kahu taji roṣu rāma aparādhū| sabu kou kahai rāmu suṭhi sādhū||
Meaning उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही (वास्तवमें) सच्चा है ? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ४ ही साधु हैं॥ ३॥
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥
tuhūm̐ sarāhasi karasi sanehū| aba suni mohi bhayau saṃdehū||
jāsu subhāu arihi anukūlā| so kimi karihi mātu pratikūlā||
Meaning तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [कि तुम्हारी प्रशंसा और स्त्रेह कहीं झूठे तो न थे ?] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा 2॥ ४॥
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥ ३२॥
priyā hāsa risa pariharahi māgu bicāri bibeku|
jehiṃ dekhām̐ aba nayana bhari bharata rāja abhiṣeku|| 32||
Meaning हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ॥ ३२॥
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥
jiai mīna barū bāri bihīnā| mani binu phaniku jiai dukha dīnā||
kahaum̐ subhāu na chalu mana māhīṃ| jīvanu mora rāma binu nāhīṃ||
Meaning मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और सौप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [ जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है॥ १॥
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥
सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥
samujhi dekhu jiyam̐ priyā prabīnā| jīvanu rāma darasa ādhīnā||
suni mradu bacana kumati ati jaraī| manahum̐ anala āhuti ghṛta paraī||
Meaning हे चतुर प्रिये ! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है। राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्रिमें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं॥ २॥
कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥
kahai karahu kina koṭi upāyā| ihām̐ na lāgihi rāuri māyā||
dehu ki lehu ajasu kari nāhīṃ| mohi na bahuta prapaṃca sohāhīṃ||
Meaning [ कैकेयी कहती है--] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया (चालबाजी ) नहीं लगेगी। या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो ' नाहीं' करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रप्न (बखेड़े) नहीं सुहाते॥ ३॥
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥
rāmu sādhu tumha sādhu sayāne| rāmamātu bhali saba pahicāne||
jasa kausilām̐ mora bhala tākā| tasa phalu unhahi deum̐ kari sākā||
Meaning राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके (याद रखनेयोग्य) उन्हें वैसा ही फल दूँगी॥ '४॥
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥ ३३॥
hota prāta munibeṣa dhari jauṃ na rāmu bana jāhiṃ|
mora maranu rāura ajasa nṛpa samujhia mana māhiṃ|| 33||
Meaning सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन् ! मनमें [ निश्चय समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश!॥ ३३॥
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥
asa kahi kuṭila bhaī uṭhi ṭhāṛhī| mānahum̐ roṣa taraṃgini bāṛhī||
pāpa pahāra pragaṭa bhai soī| bharī krodha jala jāi na joī||
Meaning ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती!॥ १॥
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥
dou bara kūla kaṭhina haṭha dhārā| bhavam̐ra kūbarī bacana pracārā||
ḍhāhata bhūparūpa taru mūlā| calī bipati bāridhi anukūlā||
Meaning दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [तीव्र। धारा है और कुबरी (मन्थरा)-के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़-मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [सीधी चली है॥ २॥
लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥
lakhī naresa bāta phuri sām̐cī| tiya misa mīcu sīsa para nācī||
gahi pada binaya kīnha baiṭhārī| jani dinakara kula hosi kuṭhārī||
Meaning राजाने समझ लिया कि बात सचमुच (वास्तवमें) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है। [ तदनन्तर राजाने कैकेयीके] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल- [रूपी वृक्ष] के लिये कुल्हाड़ी मत बन॥ ३॥
मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥
māgu mātha abahīṃ deum̐ tohī| rāma biraham̐ jani mārasi mohī||
rākhu rāma kahum̐ jehi tehi bhām̐tī| nāhiṃ ta jarihi janama bhari chātī||
Meaning तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर रामके विरहमें मुझे मत मार। जिस किसी प्रकारसे हो तू रामको रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी॥ ४॥
देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥
dekhī byādhi asādha nṛpu pareu dharani dhuni mātha|
kahata parama ārata bacana rāma rāma raghunātha||
Meaning राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे * हा राम! हा राम! हा रघुनाथ !' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े॥ ३४॥
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥
byākula rāu sithila saba gātā| karini kalapataru manahum̐ nipātā||
kaṃṭhu sūkha mukha āva na bānī| janu pāṭhīnu dīna binu pānī||
Meaning राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो॥ १॥
पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥
puni kaha kaṭu kaṭhora kaikeī| manahum̐ ghāya mahum̐ māhura deī||
jauṃ aṃtahum̐ asa karatabu raheū| māgu māgu tumha kehiṃ bala kaheū||
Meaning कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो। [कहती है--] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने ' माँग, माँग' किस बलपर कहा था॥ २॥
दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥
dui ki hoi eka samaya bhuālā| ham̐saba ṭhaṭhāi phulāuba gālā||
dāni kahāuba aru kṛpanāī| hoi ki khema kusala rautāī||
Meaning हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना--क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं ? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी रह सकती है? ( लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!)॥ ३॥
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥
chāṛahu bacanu ki dhīraju dharahū| jani abalā jimi karunā karahū||
tanu tiya tanaya dhāmu dhanu dharanī| satyasaṃdha kahum̐ tṛna sama baranī||
Meaning या तो वचन (प्रतिज्ञा)ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यब्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी--सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं॥ ४॥
मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥ ३५॥
marama bacana suni rāu kaha kahu kachu doṣu na tora|
lāgeu tohi pisāca jimi kālu kahāvata mora|| 35||
Meaning कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है॥ ३५॥
चहत न भरत भूपतहि भोरें।
बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥
cahata na bharata bhūpatahi bhoreṃ| bidhi basa kumati basī jiya toreṃ||
सो सबु मोर पाप परिनामू।
भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥
so sabu mora pāpa parināmū| bhayau kuṭhāhara jehiṃ bidhi bāmū||
Meaning भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें (बेमौके) विधाता विपरीत हो गया॥ १॥
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥
subasa basihi phiri avadha suhāī| saba guna dhāma rāma prabhutāī||
karihahiṃ bhāi sakala sevakāī| hoihi tihum̐ pura rāma baṛāī||
Meaning [ तेरी उजाड़ी हुई] यह सुन्दर अयोध्या फिर भली भाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुतता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी॥ २॥
तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ॥
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥
tora kalaṃku mora pachitāū| muehum̐ na miṭahi na jāihi kāū||
aba tohi nīka lāga karu soī| locana oṭa baiṭhu muhu goī||
Meaning केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ (अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा)॥ ३॥
जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी॥
jaba lagi jiauṃ kahaum̐ kara jorī| taba lagi jani kachu kahasi bahorī||
phiri pachitaihasi aṃta abhāgī| mārasi gāi nahāru lāgī||
Meaning मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना (अर्थात् मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू (ताँत) के लिये गायको मार रही है॥ ४॥
परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥ ३६॥
pareu rāu kahi koṭi bidhi kāhe karasi nidānu|
kapaṭa sayāni na kahati kachu jāgati manahum̐ masānu|| 36||
Meaning राजा करोड़ों प्रकारसे (बहुत तरहसे) समझाकर [और यह कहकर] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [ मौन होकर] मसान जगा रही हो (श्मशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो)॥ ३६॥