यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥ १॥
yasyāṅke ca vibhāti bhūdharasutā devāpagā mastake bhāle bālavidhurgale ca garalaṃ yasyorasi vyālarāṭ|
so'yaṃ bhūtivibhūṣaṇaḥ suravaraḥ sarvādhipaḥ sarvadā śarvaḥ sarvagataḥ śivaḥ śaśinibhaḥ śrīśaṅkaraḥ pātu mām|| 1||
$यं भूतिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशड्र: पातु माम्॥ १॥
$yaṃ bhūtivibhūṣaṇa: suravara: sarvādhipa: sarvadā śarva: sarvagata: śiva: śaśinibha: śrīśaḍra: pātu mām|| 1||
Meaning जिनकी गोदमें हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तकपर गड़ाजी, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा, कण्ठमें हलाहल विष और वक्ष:स्थलपर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्मसे विभूषित, देवताओंमें श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता [ या भक्तोंके पापनाशक, सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमाके समान शुश्रवर्ण श्रीशड्टरजी सदा मेरी रक्षा करें॥ १॥
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥ २॥
prasannatāṃ yā na gatābhiṣekatastathā na mamle vanavāsaduḥkhataḥ|
mukhāmbujaśrī raghunandanasya me sadāstu sā mañjulamaṅgalapradā|| 2||
Meaning रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दकी जो शोभा राज्याभिषेकसे ( राज्याभिषेककी बात सुनकर) न तो प्रसननताको प्राप्त हुई और न वनवासके दुःखसे मलिन ही हुई, वह (मुखकमलकी छवि) मेरे लिये सदा सुन्दर मज़लोंकी देनेवाली हो॥ २॥
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ ३॥
nīlāmbujaśyāmalakomalāṅgaṃ sītāsamāropitavāmabhāgam|
pāṇau mahāsāyakacārucāpaṃ namāmi rāmaṃ raghuvaṃśanātham|| 3||
Meaning नीले कमलके समान श्याम और कोमल जिनके अडद्भ हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम भागमें विराजमान हैं और जिनके हाथोंमें [ क्रमश: ] अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है, उन रघुवंशके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनडउें रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
śrīguru carana saroja raja nija manu mukuru sudhāri|
baranaḍauेṃ raghubara bimala jasu jo dāyaku phala cāri||
Meaning श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजसे अपने मनरूपी दर्पणको साफ करके मैं श्रीरघुनाथजीके उस निर्मल यशका वर्णन करता हूँ, जो चारों फलोंको (धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको) देनेवाला है।
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी॥
jaba teṃ rāmu byāhi ghara āe| nita nava maṃgala moda badhāe||
bhuvana cāridasa bhūdhara bhārī| sukṛta megha baraṣahi sukha bārī||
Meaning जब्से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे [ अयोध्यामें] नित्य नये मज़ल हो रहे हैं और आनन्दके बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोकरूपी बड़े भारी पर्वतोंपर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं॥ १॥
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥
ridhi sidhi saṃpati nadīṃ suhāī| umagi avadha aṃbudhi kahum̐ āī||
manigana pura nara nāri sujātī| suci amola suṃdara saba bhām̐tī||
Meaning ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्तिरूपी सुहावनी नदियाँ उमड़-उमड़कर अयोध्यारूपी समुद्रमें आ मिलीं। नगरके स्त्री-पुरुष अच्छी जातिके मणियोंके समूह हैं, जो सब प्रकारसे पवित्र, अमूल्य और सुन्दर हैं॥ २॥
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥
kahi na jāi kachu nagara bibhūtī| janu etania biraṃci karatūtī||
saba bidhi saba pura loga sukhārī| rāmacaṃda mukha caṃdu nihārī||
Meaning नगरका ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजीकी कारीगरी बस इतनी ही है। सब नगरनिवासी श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको देखकर सब प्रकारसे सुखी हैं॥ ३॥
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥
mudita mātu saba sakhīṃ sahelī| phalita biloki manoratha belī||
rāma rūpu gunasīlu subhāū| pramudita hoi dekhi suni rāū||
Meaning सब माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथरूपी बेलको फली हुई देखकर आनन्दित हैं। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनन्दित होते हैं॥ ४॥
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥ १॥
saba keṃ ura abhilāṣu asa kahahiṃ manāi mahesu|
āpa achata jubarāja pada rāmahi deu naresu|| 1||
Meaning सबके हृदयमें ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजीको मनाकर (प्रार्थना करके) कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजीको युवराजपद दे दें॥ १॥
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥
eka samaya saba sahita samājā| rājasabhām̐ raghurāju birājā||
sakala sukṛta mūrati naranāhū| rāma sujasu suni atihi uchāhū||
Meaning एक समय रघुकुलके राजा द्शरथजी अपने सारे समाजसहित राजसभामें विराजमान थे। महाराज समस्त पुण्योंकी मूर्ति हैं, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है॥ १॥
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥
तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं॥
nṛpa saba rahahiṃ kṛpā abhilāṣeṃ| lokapa karahiṃ prīti rukha rākheṃ||
tibhuvana tīni kāla jaga māhīṃ| bhūri bhāga dasaratha sama nāhīṃ||
Meaning सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुखको रखते हुए (अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं। [ पृथ्वी, आकाश, पाताल] तीनों भुवनोंमें और [ भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालोंमें दशरथजीके समान बड़भागी [और] कोई नहीं है॥ २॥
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू॥
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा॥
maṃgalamūla rāmu suta jāsū| jo kachu kahija thora sabu tāsū||
rāyam̐ subhāyam̐ mukuru kara līnhā| badanu biloki mukuṭa sama kīnhā||
Meaning मज़लोंके मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है। राजाने स्वाभाविक ही हाथमें दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुँह देखकर मुकुटको सीधा किया॥ ३॥
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥
नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥
śravana samīpa bhae sita kesā| manahum̐ jaraṭhapanu asa upadesā||
nṛpa jubarāja rāma kahum̐ dehū| jīvana janama lāhu kina lehū||
Meaning [देखा कि] कानोंके पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन् ! श्रीरामचन्द्रजीको युवराज-पद देकर अपने जीवन और जन्मका लाभ क्यों नहीं लेते॥ '४॥
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥ २॥
yaha bicāru ura āni nṛpa sudinu suavasaru pāi|
prema pulaki tana mudita mana gurahi sunāyau jāi|| 2||
Meaning हृदयमें यह विचार लाकर (युवराज-पद देनेका निश्चय कर) राजा दशरथजीने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेमसे पुलकितशरीर हो आनन्दमग्न मनसे उसे गुरु वसिष्टजीको जा सुनाया॥ २॥
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥
kahai bhuālu sunia munināyaka| bhae rāma saba bidhi saba lāyaka||
sevaka saciva sakala purabāsī| je hamāre ari mitra udāsī||
Meaning राजाने कहा--हे मुनिराज! [कृपया यह निवेदन] सुनिये। श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकारसे सब योग्य हो गये हैं। सेवक, मन्त्र, सब नगरनिवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं--॥ १॥
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई॥
sabahi rāmu priya jehi bidhi mohī| prabhu asīsa janu tanu dhari sohī||
bipra sahita parivāra gosāīṃ| karahiṃ chohu saba raurihi nāī||
Meaning सभीको श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं। [उनके रूपमें] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवारसहित आपके ही समान उनपर स्त्रेह करते हैं॥ २॥
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥
je gura carana renu sira dharahīṃ| te janu sakala bibhava basa karahīṃ||
mohi sama yahu anubhayau na dūjeṃ| sabu pāyaum̐ raja pāvani pūjeṃ||
Meaning जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया। आपकी पवित्र चरण- रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया॥ ३॥
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥
aba abhilāṣu eku mana moreṃ| pūjahi nātha anugraha toreṃ||
muni prasanna lakhi sahaja sanehū| kaheu naresa rajāyasu dehū||
Meaning अब मेरे मनमें एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आपहीके अनुग्रहसे पूरी होगी। राजाका सहज प्रेम देखकर मुनिने प्रसन्न होकर कहा--नरेश! आज्ञा दीजिये (कहिये, क्या अभिलाषा है ?)॥ ४॥
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥ ३॥
rājana rāura nāmu jasu saba abhimata dātāra|
phala anugāmī mahipa mani mana abhilāṣu tumhāra|| 3||
Meaning हे राजन्! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंको देनेवाला है। हे राजाओंके मुकुटमणि ! आपके मनकी अभिलाषा फलका अनुगमन करती है (अर्थात् आपके इच्छा करनेके पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है)॥ ३॥
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥
saba bidhi guru prasanna jiyam̐ jānī| boleu rāu raham̐si mṛdu bānī||
nātha rāmu kariahiṃ jubarājū| kahia kṛpā kari karia samājū||
Meaning अपने जीमें गुरुजीको सब प्रकारसे प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणीसे बोले--हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रको युवराज कीजिये। कृपा करके कहिये (आज्ञा दीजिये) तो तैयारी की जाय॥ १॥
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥
mohi achata yahu hoi uchāhū| lahahiṃ loga saba locana lāhū||
prabhu prasāda siva sabai nibāhīṃ| yaha lālasā eka mana māhīṃ||
Meaning मेरे जीते-जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [जिससे] सब लोग अपने नेत्रोंका लाभ प्राप्त करें। प्रभु (आप) -के प्रसादसे शिवजीने सब कुछ निबाह दिया (सब इच्छाएँ पूर्ण कर दीं), केवल यही एक लालसा मनमें रह गयी है॥ २॥
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥
puni na soca tanu rahau ki jāū| jehiṃ na hoi pācheṃ pachitāū||
suni muni dasaratha bacana suhāe| maṃgala moda mūla mana bhāe||
Meaning [इस लालसाके पूर्ण हो जानेपर] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजीके मज़ल और आनन्दके मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥ ३॥
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥
sunu nṛpa jāsu bimukha pachitāhīṃ| jāsu bhajana binu jarani na jāhīṃ||
bhayau tumhāra tanaya soi svāmī| rāmu punīta prema anugāmī||
Meaning [ वसिष्टजीने कहा--] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं। [ श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमबश आपके पुत्र हुए हैं]॥ ४॥
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥ ४॥
begi bilaṃbu na karia nṛpa sājia sabui samāju|
sudina sumaṃgalu tabahiṃ jaba rāmu hohiṃ jubarāju|| 4||
Meaning हे राजन्! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइये। शुभ दिन और सुन्दर मज़ल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जायेँ ( अर्थात् उनके अभिषेकके लिये सभी दिन शुभ और मज़्लमय हैं)॥ ४॥
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥
mudita mahipati maṃdira āe| sevaka saciva sumaṃtru bolāe||
kahi jayajīva sīsa tinha nāe| bhūpa sumaṃgala bacana sunāe||
Meaning राजा आनन्दित होकर महलमें आये और उन्होंने सेवकोंको तथा मन्त्री सुमन्त्रको बुलवाया। उन लोगोंने 'जय-जीव' कहकर सिर नवाये। तब राजाने सुन्दर मज़लमय वचन ( श्रीरामजीको युवराज-पद देनेका प्रस्ताव) सुनाये॥ १॥
जौं पाँचहि मत लागै नीका।
करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥
jauṃ pām̐cahi mata lāgai nīkā| karahu haraṣi hiyam̐ rāmahi ṭīkā||
Meaning [और कहा-] यदि पंचोंको (आप सबको) यह मत अच्छा लगे, तो हृदयमें हर्षित होकर आपलोग श्रीरामचन्द्रका राजतिलक कीजिये॥ २॥
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी॥
बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी॥
maṃtrī mudita sunata priya bānī| abhimata biravam̐ pareu janu pānī||
binatī saciva karahi kara jorī| jiahu jagatapati barisa karorī||
Meaning इस प्रिय वाणीको सुनते ही मन्त्री ऐसे आनन्दित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधेपर पानी पड़ गया हो। मन्त्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हे जगत्पति! आप करोड़ों वर्ष जियें॥ ३॥
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥
jaga maṃgala bhala kāju bicārā| begia nātha na lāia bārā||
nṛpahi modu suni saciva subhāṣā| baṛhata bauṃṛa janu lahī susākhā||
Meaning आपने जगत्भरका मज़ल करनेवाला भला काम सोचा है। हे नाथ! शीघ्रता कीजिये, देर न लगाइये। मन्त्रियोंकी सुन्दर वाणी सुनकर राजाको ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डालीका सहारा पा गयी हो॥ ४॥
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ॥ ५॥
kaheu bhūpa munirāja kara joi joi āyasu hoi|
rāma rāja abhiṣeka hita begi karahu soi soi|| 5||
Meaning राजाने कहा--श्रीरामचन्द्रके राज्याभिषेकके लिये मुनिराज वसिष्टजीकी जो-जो आज्ञा हो, आपलोग वही सब तुरंत करें॥५॥
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥
haraṣi munīsa kaheu mṛdu bānī| ānahu sakala sutīratha pānī||
auṣadha mūla phūla phala pānā| kahe nāma gani maṃgala nānā||
Meaning मुनिराजने हर्षित होकर कोमल वाणीसे कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीथाँका जल ले आओ। फिर उन्होंने ओषधि, मूल, फूल, फल और पत्र आदि अनेकों माज़लिक वस्तुओंके नाम गिनकर बताये॥ १॥
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥
मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥
cāmara carama basana bahu bhām̐tī| roma pāṭa paṭa aganita jātī||
manigana maṃgala bastu anekā| jo jaga jogu bhūpa abhiṣekā||
Meaning चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकारके वस्त्र, असंख्यों जातियोंके ऊनी और रेशमी कपड़े, [नाना प्रकारकी। मणियाँ (रत) तथा और भी बहुत-सी मज़ल वस्तुएँ, जो जगतमें राज्याभिषेकके योग्य होती हैं [सबको मँगानेकी उन्होंने आज्ञा दी]॥ २॥
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥
beda bidita kahi sakala bidhānā| kaheu racahu pura bibidha bitānā||
saphala rasāla pūgaphala kerā| ropahu bīthinha pura cahum̐ pherā||
Meaning मुनिने वेदोंमें कहा हुआ सब विधान बताकर कहा--नगरमें बहुत-से मण्डप (चँदोवे) सजाओ। फलोंसमेत आम, सुपारी और केलेके वृक्ष नगरकी गलियोंमें चारों ओर रोप दो॥ ३॥
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥
racahu maṃju mani caukeṃ cārū| kahahu banāvana begi bajārū||
pūjahu ganapati gura kuladevā| saba bidhi karahu bhūmisura sevā||
Meaning सुन्दर मणियोंके मनोहर चौक पुरवाओ और बाजारको तुरंत सजानेके लिये कह दो। श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवताकी पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणोंकी सब प्रकारसे सेवा करो॥ ४॥
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥ ६॥
dhvaja patāka torana kalasa sajahu turaga ratha nāga|
sira dhari munibara bacana sabu nija nija kājahiṃ lāga|| 6||
Meaning ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके वचनोंको शिरोधार्य करके सब लोग अपने-अपने काममें लग गये॥ ६॥
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥
jo munīsa jehi āyasu dīnhā| so tehiṃ kāju prathama janu kīnhā||
bipra sādhu sura pūjata rājā| karata rāma hita maṃgala kājā||
Meaning मुनीश्वरने जिसको जिस कामके लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [इतनी शीघ्रतासे कर डाला कि] मानो पहलेसे ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओंको पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजीके लिये सब मड़लकार्य कर रहे हैं॥ १॥
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥
राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥
sunata rāma abhiṣeka suhāvā| bāja gahāgaha avadha badhāvā||
rāma sīya tana saguna janāe| pharakahiṃ maṃgala aṃga suhāe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेककी सुहावनी खबर सुनते ही अवधभरमें बड़ी धूमसे बधावे बजने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके शरीरमें भी शुभ शकुन सूचित हुए। उनके सुन्दर मज़ल अज्ध फड़कने लगे॥ २॥
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥
भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥
pulaki saprema parasapara kahahīṃ| bharata āgamanu sūcaka ahahīṃ||
bhae bahuta dina ati avaserī| saguna pratīti bheṃṭa priya kerī||
Meaning पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक-दूसरेसे कहते हैं कि ये सब शकुन भरतके आनेकी सूचना देनेवाले हैं। [उनको मामाके घर गये ] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है (बार-बार उनसे मिलनेकी मनमें आती है) शकुनोंसे प्रिय ( भरत) -के मिलनेका विश्वास होता है॥ ३॥
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती॥
bharata sarisa priya ko jaga māhīṃ| ihai saguna phalu dūsara nāhīṃ||
rāmahi baṃdhu soca dina rātī| aṃḍanhi kamaṭha hradau jehi bhām̐tī||
Meaning और भरतके समान जगतमें [हमें] कौन प्यारा है! शकुनका बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने] भाई भरतका दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुएका हृदय अंडोंमें रहता है॥ ४॥
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।
ehi avasara maṃgalu parama suni raham̐seu ranivāsu|
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु॥ 9॥
sobhata lakhi bidhu baṛhata janu bāridhi bīci bilāsu|| 9||
Meaning इसी समय यह परम मज़ल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमाको बढ़ते देखकर समुद्रमें लहरोंका विलास (आनन्द) सुशोभित होता है॥७॥
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥
prathama jāi jinha bacana sunāe| bhūṣana basana bhūri tinha pāe||
prema pulaki tana mana anurāgīṃ| maṃgala kalasa sajana saba lāgīṃ||
Meaning सबसे पहले [रनिवासमें ] जाकर जिन्होंने ये वचन (समाचार) सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियोंका शरीर प्रेमसे पुलकित हो उठा और मन प्रेममें मग्न हो गया। वे सब मज़लकलश सजाने लगीं॥ १॥
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी॥
आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥
caukeṃ cāru sumitrām̐ purī| manimaya bibidha bhām̐ti ati rurī||
ānam̐da magana rāma mahatārī| die dāna bahu bipra ham̐kārī||
Meaning सुमित्राजीने मणियों (रत्नों ) -के बहुत प्रकारके अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्दमें मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर बहुत दान दिये॥ २॥
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥
pūjīṃ grāmadebi sura nāgā| kaheu bahori dena balibhāgā||
jehi bidhi hoi rāma kalyānū| dehu dayā kari so baradānū||
Meaning उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागोंकी पूजा की और फिर बलि भेंट देनेको कहा (अर्थात् कार्य सिद्ध होनेपर फिर पूजा करनेकी मनौती मानी); और प्रार्थना की कि जिस प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीका कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये॥ ३॥
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं।
बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥
gāvahiṃ maṃgala kokilabayanīṃ| bidhubadanīṃ mṛgasāvakanayanīṃ||
Meaning कोयलकी-सी मीठी वाणीवाली, चन्द्रमाके समान मुखवाली और हिरनके बच्चेके-से नेत्रोिंबाली स्त्रियाँ मज़लगान करने लगीं॥ ४॥
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि॥ ८॥
rāma rāja abhiṣeku suni hiyam̐ haraṣe nara nāri|
lage sumaṃgala sajana saba bidhi anukūla bicāri|| 8||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदयमें हर्षित हो उठे और विधाताको अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मज़ल-साज सजाने लगे॥ ८॥
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥
taba naranāham̐ basiṣṭhu bolāe| rāmadhāma sikha dena paṭhāe||
gura āgamanu sunata raghunāthā| dvāra āi pada nāyau māthā||
Meaning तब राजाने वसिष्टजीको बुलाया और शिक्षा (समयोचित उपदेश) देनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी के महलमें भेजा। गुरुका आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजीने दरवाजेपर आकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाया॥ १॥
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥
sādara aragha dei ghara āne| soraha bhām̐ti pūji sanamāne||
gahe carana siya sahita bahorī| bole rāmu kamala kara jorī||
Meaning आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घरमें लाये और षोडशोपचारसे पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमलके समान दोनों हाथोंको जोड़कर श्रीरामजी बोले--
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती॥
sevaka sadana svāmi āgamanū| maṃgala mūla amaṃgala damanū||
tadapi ucita janu boli saprītī| paṭhaia kāja nātha asi nītī||
Meaning यद्यपि सेवकके घर स्वामीका पधारना मज़लोंका मूल और अमज्लोंका नाश करनेवाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दासको ही कार्यके लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है॥ ३॥
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥
आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई॥
prabhutā taji prabhu kīnha sanehū| bhayau punīta āju yahu gehū||
āyasu hoi so karauṃ gosāī| sevaka lahai svāmi sevakāī||
Meaning परन्तु प्रभु (आप) -ने प्रभुतता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाई! [अब] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है॥ ४॥
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।
राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस॥ ९॥
suni saneha sāne bacana muni raghubarahi prasaṃsa|
rāma kasa na tumha kahahu asa haṃsa baṃsa avataṃsa|| 9||
Meaning [ श्रीरामचन्द्रजीके ] प्रेममें सने हुए वचनोंको सुनकर मुनि वसिष्टजीने श्रीरघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप सूर्यवंशके भूषण जो हैं॥ ९॥
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥
भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥
barani rāma guna sīlu subhāū| bole prema pulaki munirāū||
bhūpa sajeu abhiṣeka samājū| cāhata dena tumhahi jubarājū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका बखान कर, मुनिराज प्रेमसे पुलकित होकर बोले-- [ हे रामचन्द्रजी !] राजा (दशरथजी )-ने राज्याभिषेककी तैयारी की है। वे आपको युवराज-पद देना चाहते हैं॥ १॥
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥
rāma karahu saba saṃjama ājū| jauṃ bidhi kusala nibāhai kājū||
guru sikha dei rāya pahiṃ gayau| rāma hṛdayam̐ asa bisamau bhayaū||
Meaning [इसलिये] हे रामजी ! आज आप [उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक] सब संयम कीजिये, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस कामको निबाह दें (सफल कर दें)। गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजीके पास चले गये। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें [यह सुनकर] इस बातका खेद हुआ कि--॥ २॥
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥
करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥
janame eka saṃga saba bhāī| bhojana sayana keli larikāī||
karanabedha upabīta biāhā| saṃga saṃga saba bhae uchāhā||
Meaning हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपनके खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए॥ ३॥
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥
bimala baṃsa yahu anucita ekū| baṃdhu bihāi baṛehi abhiṣekū||
prabhu saprema pachitāni suhāī| harau bhagata mana kai kuṭilāī||
Meaning पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषिक एक बड़ेका ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे॥ ४॥
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद॥ १०॥
tehi avasara āe lakhana magana prema ānaṃda|
sanamāne priya bacana kahi raghukula kairava caṃda|| 10||
Meaning उसी समय प्रेम और आनन्दमें मग्न लक्ष्मणजी आये। रघुकुलरूपी कुमुदके खिलानेवाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया॥ १०॥
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥
भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥
bājahiṃ bājane bibidha bidhānā| pura pramodu nahiṃ jāi bakhānā||
bharata āgamanu sakala manāvahiṃ| āvahum̐ begi nayana phalu pāvahiṃ||
Meaning बहुत प्रकारके बाजे बज रहे हैं। नगरके अतिशय आनन्दका वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजीका आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [ राज्याभिषेकका उत्सव देखकर] नेत्रोंका फल प्राप्त करें॥ १॥
हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई॥
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥
hāṭa bāṭa ghara galīṃ athāī| kahahiṃ parasapara loga logāī||
kāli lagana bhali ketika bārā| pūjihi bidhi abhilāṣu hamārā||
Meaning बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरोंपर (जहाँ-तहाँ) पुरुष और स्त्री आपसमें यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न (मुहूर्त) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे॥ २॥
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥
सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥
kanaka siṃghāsana sīya sametā| baiṭhahiṃ rāmu hoi cita cetā||
sakala kahahiṃ kaba hoihi kālī| bighana manāvahiṃ deva kucālī||
Meaning जब सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्णके सिंहासनपर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा (मन:कामना पूरी होगी)। इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं॥ ३॥
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥
सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥
tinhahi sohāi na avadha badhāvā| corahi caṃdini rāti na bhāvā||
sārada boli binaya sura karahīṃ| bārahiṃ bāra pāya lai parahīṃ||
Meaning उन्हें (देवताओंको) अवधके बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोरको चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजीको बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरोंको पकड़कर उनपर गिरते हैं॥ ४॥
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।
रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥ ११४॥
bipati hamāri biloki baṛi mātu karia soi āju|
rāmu jāhiṃ bana rāju taji hoi sakala surakāju|| 114||
Meaning [वे कहते हैं--] हे माता! हमारी बड़ी विपत्तिको देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वनको चले जायँ और देवताओंका सब कार्य सिद्ध हो॥ ११॥
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥
देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥
suni sura binaya ṭhāṛhi pachitātī| bhaium̐ saroja bipina himarātī||
dekhi deva puni kahahiṃ nihorī| mātu tohi nahiṃ thoriu khorī||
Meaning देवताओंकी विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी -खड़ी पछता रही हैं कि [ हाय!। मैं कमलवनके लिये हेमन्त-ऋतुकी रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा॥ १॥
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥
जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी॥
bisamaya haraṣa rahita raghurāū| tumha jānahu saba rāma prabhāū||
jīva karama basa sukha dukha bhāgī| jāia avadha deva hita lāgī||
Meaning श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं। आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःखका भागी होता है। अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये॥ २॥
बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥
bāra bāra gahi carana sam̐kocau| calī bicāri bibudha mati pocī||
ūm̐ca nivāsu nīci karatūtī| dekhi na sakahiṃ parāi bibhūtī||
Meaning बार-बार चरण पकड़कर देवताओंने सरस्वतीको संकोचमें डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओंकी बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरेका ऐश्वर्य नहीं देख सकते॥ ३॥
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥
हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥
āgila kāju bicāri bahorī| karahahiṃ cāha kusala kabi morī||
haraṣi hṛdayam̐ dasaratha pura āī| janu graha dasā dusaha dukhadāī||
Meaning परंतु आगेके कामका विचार करके ( श्रीरामजीके वन जानेसे राक्षसोंका वध होगा, जिससे सारा जगत् सुखी हो जायगा) चतुर कवि [ श्रीरामजीके वनवासके चरित्रोंका वर्णन करनेके लिये मेरी चाह (कामना) करेंगे। ऐसा विचारकर सरस्वती हृदयमें हर्षित होकर दशरथजीकी पुरी अयोध्यामें आयीं, मानो दु:सह दुःख देनेवाली कोई ग्रहदशा आयी हो॥ ४॥
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥ १२॥
nāmu maṃtharā maṃdamati cerī kaikei keri|
ajasa peṭārī tāhi kari gaī girā mati pheri|| 12||
Meaning मन्थरा नामकी कैकेयीकी एक मन्दबुद्धि दासी थी, उसे अपयशकी पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धिको फेरकर चली गयीं॥ १२॥
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥
पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥
dīkha maṃtharā nagaru banāvā| maṃjula maṃgala bāja badhāvā||
pūchesi loganha kāha uchāhū| rāma tilaku suni bhā ura dāhū||
Meaning मन्थराने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर मज़लमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगोंसे पूछा कि कैसा उत्सव है ? [उनसे] श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलककी बात सुनते ही उसका हदय जल उठा॥ १॥
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥
karai bicāru kubuddhi kujātī| hoi akāju kavani bidhi rātī||
dekhi lāgi madhu kuṭila kirātī| jimi gavam̐ takai leum̐ kehi bhām̐tī||
Meaning वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकारसे यह काम रात-ही-रातमें बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहदका छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरहसे उखाड़ लूँ॥ २॥
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥
bharata mātu pahiṃ gai bilakhānī| kā anamani hasi kaha ham̐si rānī||
ūtaru dei na lei usāsū| nāri carita kari ḍhārai ām̐sū||
Meaning वह उदास होकर भरतजीकी माता कैकेयीके पास गयी। रानी कैकेयीने हँसकर कहा--तू उदास क्यों है ? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है॥ ३॥
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥
तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥
ham̐si kaha rāni gālu baṛa toreṃ| dīnha lakhana sikha asa mana moreṃ||
tabahum̐ na bola ceri baṛi pāpini| chāṛai svāsa kāri janu sām̐pini||
Meaning रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलनेवाली है)। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मणने तुझे कुछ सीख दी है (दण्ड दिया है)। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो॥ ४॥
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥ १३॥
sabhaya rāni kaha kahasi kina kusala rāmu mahipālu|
lakhanu bharatu ripudamanu suni bhā kubarī ura sālu|| 13||
Meaning तब रानीने डरकर कहा--अरी! कहती क्यों नहीं ? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशलसे तो हैं ? यह सुनकर कुबरी मन्थराके हृदयमें बड़ी ही पीड़ा हुई॥ १३॥
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥
kata sikha dei hamahi kou māī| gālu karaba kehi kara balu pāī||
rāmahi chāṛi kusala kehi ājū| jehi janesu dei jubarājū||
Meaning [वह कहने लगी--] हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी (बढ़-बढ़कर बोलूँगी )। रामचन्द्रको छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज-पद दे रहे हैं॥ १॥
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥
bhayau kausilahi bidhi ati dāhina| dekhata garaba rahata ura nāhina||
dekhehu kasa na jāi saba sobhā| jo avaloki mora manu chobhā||
Meaning आज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें क्षोभ हुआ है॥ २॥
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥
pūtu bidesa na socu tumhāreṃ| jānati hahu basa nāhu hamāreṃ||
nīda bahuta priya seja turāī| lakhahu na bhūpa kapaṭa caturāī||
Meaning तुम्हारा पुत्र परदेशमें है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वशमें है। तुम्हें तो तोशक-पलँगपर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजाकी कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं॥ ३॥
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥
suni priya bacana malina manu jānī| jhukī rāni aba rahu aragānī||
puni asa kabahum̐ kahasi gharaphorī| taba dhari jībha kaṛhāvaum̐ torī||
Meaning मन्थराके प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मनकी मैली जानकर रानी झुककर (डाँटकर) बोली--बस, अब चुप रह घरफोड़ी करहींकी! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी॥ ४॥
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥ १४॥
kāne khore kūbare kuṭila kucālī jāni|
tiya biseṣi puni ceri kahi bharatamātu musukāni|| 14||
Meaning कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी ! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दीं॥ श४॥
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥
priyabādini sikha dīnhium̐ tohī| sapanehum̐ to para kopu na mohī||
sudinu sumaṃgala dāyaku soī| tora kahā phura jehi dina hoī||
Meaning [ और फिर बोलीं--] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है (शिक्षाके लिये इतनी बात कही है)। मुझे तुझपर स्वप्रमें भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मज़्लदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा (अर्थात् श्रीरामका राज्यतिलक होगा)॥ १॥
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥
jeṭha svāmi sevaka laghu bhāī| yaha dinakara kula rīti suhāī||
rāma tilaku jauṃ sām̐cehum̐ kālī| deum̐ māgu mana bhāvata ālī||
Meaning बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी॥ २॥
कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥
kausalyā sama saba mahatārī| rāmahi sahaja subhāyam̐ piārī||
mo para karahiṃ sanehu biseṣī| maiṃ kari prīti parīchā dekhī||
Meaning रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है॥ ३॥
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥
jauṃ bidhi janamu dei kari chohū| hohum̐ rāma siya pūta putohū||
prāna teṃ adhika rāmu priya moreṃ| tinha keṃ tilaka chobhu kasa toreṃ||
Meaning जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलकसे (उनके तिलककी बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा 2॥ ४॥
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।
हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥ १५॥
bharata sapatha tohi satya kahu parihari kapaṭa durāu|
haraṣa samaya bisamau karasi kārana mohi sunāu|| 15||
Meaning तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना॥ श५॥
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥
फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥
ekahiṃ bāra āsa saba pūjī| aba kachu kahaba jībha kari dūjī||
phorai jogu kapāru abhāgā| bhaleu kahata dukha raurehi lāgā||
Meaning [ मन्थराने कहा--] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दु:ख होता है॥ १॥
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥
kahahiṃ jhūṭhi phuri bāta banāī| te priya tumhahi karui maiṃ māī||
hamahum̐ kahabi aba ṭhakurasohātī| nāhiṃ ta mauna rahaba dinu rātī||
Meaning जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी॥ २॥
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥
kari kurūpa bidhi parabasa kīnhā| bavā so lunia lahia jo dīnhā||
kou nṛpa hou hamahi kā hānī| ceri chāṛi aba hoba ki rānī||
Meaning विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर कया अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही)॥ ३॥
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥
तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥
jārai jogu subhāu hamārā| anabhala dekhi na jāi tumhārā||
tāteṃ kachuka bāta anusārī| chamia debi baṛi cūka hamārī||
Meaning हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो॥ ४॥
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि॥ १६॥
gūṛha kapaṭa priya bacana suni tīya adharabudhi rāni|
suramāyā basa bairinihi suhda jāni patiāni|| 16||
Meaning आधाररहित ( अस्थिर) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने बैरिन मन्थराको अपनी सुहददू (अहैतुक हित करनेवाली ) जानकर उसका विश्वास कर लिया॥ १६॥
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥
sādara puni puni pūm̐chati ohī| sabarī gāna mṛgī janu mohī||
tasi mati phirī ahai jasi bhābī| rahasī ceri ghāta janu phābī||
Meaning बार-बार रानी उससे आदरके साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनीके गानसे हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई॥ १॥
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ॥
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥
tumha pūm̐chahu maiṃ kahata ḍerāūm̐| dhareu mora gharaphorī nāūm̐||
saji pratīti bahubidhi gaṛhi cholī| avadha sāṛhasātī taba bolī||
Meaning तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरहसे गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़्साती (शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशारूपी मन्थरा) बोली--॥ २॥
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥
रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते॥
priya siya rāmu kahā tumha rānī| rāmahi tumha priya so phuri bānī||
rahā prathama aba te dina bīte| samau phireṃ ripu hohiṃ piṃrīte||
Meaning हे रानी ! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं॥ ३॥
भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥
bhānu kamala kula poṣanihārā| binu jala jāri karai soi chārā||
jari tumhāri caha savati ukhārī| rūm̐dhahu kari upāu bara bārī||
Meaning सूर्य कमलके कुलका पालन करनेवाला है, पर बिना जलके वही सूर्य उनको (कमलोंको) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अत: उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो)॥ ४॥
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ॥ १४॥
tumhahi na socu sohāga bala nija basa jānahu rāu|
mana malīna muha mīṭha nṛpa rāura sarala subhāu|| 14||
Meaning तुमको अपने सुहागके [झूठे] बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वशमें जानती हो। किन्तु राजा मनके मैले और मुँहके मीठे हैं ! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं)॥ १७॥
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥
पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें॥
catura gam̐bhīra rāma mahatārī| bīcu pāi nija bāta sam̐vārī||
paṭhae bharatu bhūpa naniaureṃ| rāma mātu mata jānava raureṃ||
Meaning रामकी माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता)। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस रामकी माताकी ही सलाह समझिये!॥ १॥
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥
सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥
sevahiṃ sakala savati mohi nīkeṃ| garabita bharata mātu bala pī keṃ||
sālu tumhāra kausilahi māī| kapaṭa catura nahiṃ hoi janāī||
Meaning [ कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है! इसीसे हे माई! कौसल्याको तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अत: उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता (वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है)॥ २॥
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥
rājahi tumha para premu biseṣī| savati subhāu sakai nahiṃ dekhī||
racī praṃpacu bhūpahi apanāī| rāma tilaka hita lagana dharāī||
Meaning राजाका तुमपर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [ भरतकी अनुपस्थितिमें। रामके राजतिलकके लिये लग निश्चय करा लिया॥ ३॥
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥
आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥
yaha kula ucita rāma kahum̐ ṭīkā| sabahi sohāi mohi suṭhi nīkā||
āgili bāta samujhi ḍaru mohī| deu daiu phiri so phalu ohī||
Meaning रामको तिलक हो, यह रघुकुलके उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे॥ ४॥
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥ १८॥
raci paci koṭika kuṭilapana kīnhesi kapaṭa prabodhu|
kahisi kathā sata savati kai jehi bidhi bāṛha birodhu|| 18||
Meaning इस तरह करोड़ों कुटिलिपनकी बातें गढ़-छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढ़े॥ १८॥
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥
का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥
bhāvī basa pratīti ura āī| pūm̐cha rāni puni sapatha devāī||
kā pūchahum̐ tumha abahum̐ na jānā| nija hita anahita pasu pahicānā||
Meaning होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया। रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी। [ मन्थरा बोली-- क्या पूछती हो ? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले-बुरेको (अथवा मित्र- शत्रुको) तो पशु भी पहचान लेते हैं॥ १॥
भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥
खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥
bhayau pākhu dina sajata samājū| tumha pāī sudhi mohi sana ājū||
khāia pahiria rāja tumhāreṃ| satya kaheṃ nahiṃ doṣu hamāreṃ||
Meaning पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे! मैं तुम्हारे राजमें खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है॥ २॥
जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥
jauṃ asatya kachu kahaba banāī| tau bidhi deihi hamahi sajāī||
rāmahi tilaka kāli jauṃ bhayaū| tumha kahum̐ bipati bīju bidhi bayaū||
Meaning यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा। यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [समझ रखना कि] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया॥ ३॥
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी॥
जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥
rekha kham̐cāi kahaum̐ balu bhāṣī| bhāmini bhaihu dūdha kai mākhī||
jauṃ suta sahita karahu sevakāī| tau ghara rahahu na āna upāī||
Meaning मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी! तुम तो अब दूधकी मकक््खी हो गयी! (जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [ कौसल्याकी] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी; [ अन्यथा घरमें रहनेका] दूसरा उपाय नहीं॥ ४॥
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।
भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥ १९॥
kadrūm̐ binatahi dīnha dukhu tumhahi kausilām̐ deba|
bharatu baṃdigṛha seihahiṃ lakhanu rāma ke neba|| 19||
Meaning कद्ूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी। भरत कारागारका सेवन करेंगे ( जेलकी हवा खायेंगे) और लक्ष्मण रामके नायब (सहकारी) होंगे॥ १९॥