जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥
होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥
jāni tumhahi mṛdu kahaum̐ kaṭhorā| kusamayam̐ tāta na anucita morā||
hohiṃ kuṭhāyam̐ subaṃdhu suhāe| oṛiahiṃ hātha asanihu ke ghāe||
Meaning तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोगकी बात) कह रहा हूँ। हे तात! बुरे समयमें मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है। कुठौर (कुअवसर) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्रके आघात भी हाथसे ही रोके जाते हैं॥ ४॥
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥ ३०६॥
sevaka kara pada nayana se mukha so sāhibu hoi|
tulasī prīti ki rīti suni sukabi sarāhahiṃ soi|| 306||
Meaning सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं॥ ३०६॥
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी॥
सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥
sabhā sakala suni raghubara bānī| prema payodhi amia janu sānī||
sithila samāja saneha samādhī| dekhi dasā cupa sārada sādhī||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्रके [ मन्थनसे निकले हुए] अमृतमें सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेमसमाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वतीने चुप साध ली॥ १॥
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥
bharatahi bhayau parama saṃtoṣū| sanamukha svāmi bimukha dukha doṣū||
mukha prasanna mana miṭā biṣādū| bhā janu gūm̐gehi girā prasādū||
Meaning भरतजीको परम सन्तोष हुआ। स्वामीके सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दु:ख और दोषोंने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मनका विषाद मिट गया। मानो गूँगैपर सरस्वतीकी कृपा हो गयी हो॥ २॥
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥
नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥
kīnha saprema pranāmu bahorī| bole pāni paṃkaruha jorī||
nātha bhayau sukhu sātha gae ko| laheum̐ lāhu jaga janamu bhae ko||
Meaning उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलोंको जोड़कर वे बोले--हे नाथ! मुझे आपके साथ जानेका सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत्में जन्म लेनेका लाभ भी पा लिया॥ ३॥
अब कृपाल जस आयसु होई।
करौं सीस धरि सादर सोई॥
aba kṛpāla jasa āyasu hoī| karauṃ sīsa dhari sādara soī||
सो अवलंब देव मोहि देई।
अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥
so avalaṃba deva mohi deī| avadhi pāru pāvauṃ jehi seī||
Meaning हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसीको मैं सिरपर धरकर आदरपूर्वक करूँ! परन्तु देव! आप मुझे वह अवलम्बन (कोई सहारा) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधिका पार पा जाऊँ ( अवधिको बिता दूँ)॥ ४॥
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ॥ ३०७॥
deva deva abhiṣeka hita gura anusāsanu pāi|
āneum̐ saba tīratha salilu tehi kaham̐ kāha rajāi|| 307||
Meaning हे देव! स्वामी (आप) के अभिषेकके लिये गुरुजीकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेता आया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञा होती है?॥ ३०७॥
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥
eku manorathu baṛa mana māhīṃ| sabhayam̐ sakoca jāta kahi nāhīṃ||
kahahu tāta prabhu āyasu pāī| bole bāni saneha suhāī||
Meaning मेरे मनमें एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोचके कारण कहा नहीं जाता। [ श्रीरामचन्द्रजीने कहा--] हे भाई! कहो। तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरतजी स्त्रेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले--॥ १॥
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥
citrakūṭa suci thala tīratha bana| khaga mṛga sara sari nirjhara girigana||
prabhu pada aṃkita avani biseṣī| āyasu hoi ta āvauṃ dekhī||
Meaning आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतोंके समूह तथा विशेषकर प्रभु (आप) के चरणचिह्लोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ॥ २॥
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥
मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥
avasi atri āyasu sira dharahū| tāta bigatabhaya kānana carahū||
muni prasāda banu maṃgala dātā| pāvana parama suhāvana bhrātā||
Meaning [ श्रीरघुनाथजी बोले--] अवश्य ही अत्रि ऋषिकी आज्ञाको सिरपर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निर्भय होकर वनमें विचरो। हे भाई! अत्रि मुनिके प्रसादसे वन मज़लोंका देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है--॥३॥
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥
riṣināyaku jaham̐ āyasu dehīṃ| rākhehu tīratha jalu thala tehīṃ||
suni prabhu bacana bharata sukha pāvā| muni pada kamala mudita siru nāvā||
Meaning और ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [लाया हुआ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना। प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया॥ ४॥
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥ ३०८॥
bharata rāma saṃbādu suni sakala sumaṃgala mūla|
sura svārathī sarāhi kula baraṣata surataru phūla|| 308||
Meaning समस्त सुन्दर मज़लोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे॥ ३०८॥
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई॥
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥
dhanya bharata jaya rāma gosāīṃ| kahata deva haraṣata bariāī||
muni mithilesa sabhām̐ saba kāhū| bharata bacana suni bhayau uchāhū||
Meaning ' भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो !' ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ॥ १॥
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥
bharata rāma guna grāma sanehū| pulaki prasaṃsata rāu bidehū||
sevaka svāmi subhāu suhāvana| nemu pemu ati pāvana pāvana||
Meaning भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं॥ २॥
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥
सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥
mati anusāra sarāhana lāge| saciva sabhāsada saba anurāge||
suni suni rāma bharata saṃbādū| duhu samāja hiyam̐ haraṣu biṣādū||
Meaning मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धिकि अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हदयोंमें हर्ष और विषाद ( भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद) दोनों हुए॥ ३॥
राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥
rāma mātu dukhu sukhu sama jānī| kahi guna rāma prabodhīṃ rānī||
eka kahahiṃ raghubīra baṛāī| eka sarāhata bharata bhalāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाया। कोई श्रीरामजीकी बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं॥ ४॥
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥ ३०९॥
atri kaheu taba bharata sana saila samīpa sukūpa|
rākhia tīratha toya taham̐ pāvana amia anūpa|| 309||
Meaning तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा--इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये॥ ३०९॥
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥
bharata atri anusāsana pāī| jala bhājana saba die calāī||
sānuja āpu atri muni sādhū| sahita gae jaham̐ kūpa agādhū||
Meaning भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था॥ १॥
पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥
तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥
pāvana pātha punyathala rākhā| pramudita prema atri asa bhāṣā||
tāta anādi siddha thala ehū| lopeu kāla bidita nahiṃ kehū||
Meaning और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया। तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा--हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था॥ २॥
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥
taba sevakanha sarasa thalu dekhā| kinha sujala hita kūpa biseṣā||
bidhi basa bhayau bisva upakārū| sugama agama ati dharama bicārū||
Meaning तब [ भरतजीके] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [ तीर्थोंके] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया। धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [इस कूपके प्रभावसे] सुगम हो गया॥ ३॥
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥
bharatakūpa aba kahihahiṃ logā| ati pāvana tīratha jala jogā||
prema sanema nimajjata prānī| hoihahiṃ bimala karama mana bānī||
Meaning अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थोंके जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्तरान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायूँगे॥ ४॥
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥ ३१०॥
kahata kūpa mahimā sakala gae jahām̐ raghurāu|
atri sunāyau raghubarahi tīratha punya prabhāu|| 310||
Meaning कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया॥ ३१०॥
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥
kahata dharama itihāsa saprītī| bhayau bhoru nisi so sukha bītī||
nitya nibāhi bharata dou bhāī| rāma atri gura āyasu pāī||
Meaning प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया। भरत-शत्रुघ्र दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्टजीकी आज्ञा पाकर,॥ १॥
सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥
sahita samāja sāja saba sādeṃ| cale rāma bana aṭana payādeṃ||
komala carana calata binu panahīṃ| bhai mṛdu bhūmi sakuci mana manahīṃ||
Meaning समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण (प्रदक्षिणा) करनेके लिये पैदल ही चले। कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी॥ २॥
कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥
kusa kaṃṭaka kām̐karīṃ kurāīṃ| kaṭuka kaṭhora kubastu durāīṃ||
mahi maṃjula mṛdu māraga kīnhe| bahata samīra tribidha sukha līnhe||
Meaning कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखोंको साथ लिये (सुखदायक) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी॥ ३॥
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥
sumana baraṣi sura ghana kari chāhīṃ| biṭapa phūli phali tṛna mṛdutāhīṃ||
mṛga biloki khaga boli subānī| sevahiṃ sakala rāma priya jānī||
Meaning रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग (पशु) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर--सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे॥ ४॥
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात॥ ३११॥
sulabha siddhi saba prākṛtahu rāma kahata jamuhāta|
rāma prāna priya bharata kahum̐ yaha na hoi baṛi bāta|| 311||
Meaning जब एक साधारण मनुष्यको भी [आलस्यसे] जँभाई लेते समय 'राम' कह देनेसे ही सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजीके प्राणप्यारे भरतजीके लिये यह कोई बड़ी ( आश्चर्यकी ) बात नहीं है॥ ३११॥
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥
ehi bidhi bharatu phirata bana māhīṃ| nemu premu lakhi muni sakucāhīṃ||
punya jalāśraya bhūmi bibhāgā| khaga mṛga taru tṛna giri bana bāgā||
Meaning इस प्रकार भरतजी वनमें फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेमको देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलके स्थान (नदी, बावली, कुण्ड आदि), पृथ्वीके पृथक्-पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण (घास), पर्वत, वन और बगीचे--॥ १॥
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥
cāru bicitra pabitra biseṣī| būjhata bharatu dibya saba dekhī||
suni mana mudita kahata riṣirāū| hetu nāma guna punya prabhāū||
Meaning सभी विशेषरूपसे सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्र सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मनसे सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभावको कहते हैं॥ २॥
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥
katahum̐ nimajjana katahum̐ pranāmā| katahum̐ bilokata mana abhirāmā||
katahum̐ baiṭhi muni āyasu pāī| sumirata sīya sahita dou bhāī||
Meaning भरतजी कहीं स्तान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानोंके दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजीकी आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजीसहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंका स्मरण करते हैं॥ ३॥
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥
dekhi subhāu sanehu susevā| dehiṃ asīsa mudita banadevā||
phirahiṃ gaem̐ dinu pahara aṛhāī| prabhu pada kamala bilokahiṃ āī||
Meaning भरतजीके स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभावको देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतनेपर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं॥ ४॥
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ॥ ३१२॥
dekhe thala tīratha sakala bharata pām̐ca dina mājha|
kahata sunata hari hara sujasu gayau divasu bhai sām̐jha|| 312||
Meaning भरतजीने पाँच दिनमें सब तीर्थस्थानोंके दर्शन कर लिये। भगवान् विष्णु और महादेवजीका सुन्दर यश कहते-सुनते वह (पाँचवाँ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी॥ ३१२॥
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥
भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥
bhora nhāi sabu jurā samājū| bharata bhūmisura terahuti rājū||
bhala dina āju jāni mana māhīṃ| rāmu kṛpāla kahata sakucāhīṃ||
Meaning [ अगले छठे दिन] सबेरे स्रान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करनेके लिये अच्छा दिन है, यह मनमें जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहनेमें सकुचा रहे हैं॥ १॥
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥
सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥
gura nṛpa bharata sabhā avalokī| sakuci rāma phiri avani bilokī||
sīla sarāhi sabhā saba socī| kahum̐ na rāma sama svāmi sam̐kocī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने गुरु वसिष्तजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभाकी ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वीकी ओर ताकने लगे। सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजीके समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं॥ २॥
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी॥
करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी॥
bharata sujāna rāma rukha dekhī| uṭhi saprema dhari dhīra biseṣī||
kari daṃḍavata kahata kara jorī| rākhīṃ nātha sakala ruci morī||
Meaning सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूपसे धीरज धारणकर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे-रहे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियाँ रखीं॥ ३॥
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई॥
mohi lagi saheu sabahiṃ saṃtāpū| bahuta bhām̐ti dukhu pāvā āpū||
aba gosāim̐ mohi deu rajāī| sevauṃ avadha avadhi bhari jāī||
Meaning मेरे लिये सब लोगोंने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकारसे दुःख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवधिभर (चौदह वर्षतक) अवधका सेवन करूँ॥ ४॥
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।
jehiṃ upāya puni pāya janu dekhai dīnadayāla|
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल॥ ३१३॥
so sikha deia avadhi lagi kosalapāla kṛpāla|| 313||
Meaning हे दीनदयालु ! जिस उपायसे यह दास फिर चरणोंका दर्शन करे-हे कोसलाधीश! हे कृपालु ! अवधिभरके लिये मुझे वही शिक्षा दीजिये॥ ३१३॥
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई॥
राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥
purajana parijana prajā gosāī| saba suci sarasa saneham̐ sagāī||
rāura badi bhala bhava dukha dāhū| prabhu binu bādi parama pada lāhū||
Meaning हे गोसाई! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुट्म्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं। आपके लिये भवदु:ख ( जन्म-मरणके दुःख) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है॥ १॥
स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥
प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥
svāmi sujānu jāni saba hī kī| ruci lālasā rahani jana jī kī||
pranatapālu pālihi saba kāhū| deu duhū disi ora nibāhū||
Meaning हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभीके हृदयकी और मुझ सेवकके मनकी रुचि, लालसा ( अभिलाषा) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल ! आप सब किसीका पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफको ओर-अन्ततक निबाहेंगे॥ २॥
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो॥
आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥
asa mohi saba bidhi bhūri bharoso| kiem̐ bicāru na socu kharo so||
ārati mora nātha kara chohū| duhum̐ mili kīnha ḍhīṭhu haṭhi mohū||
Meaning मुझे सब प्रकारसे ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करनेपर तिनकेके बराबर ( जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामीका स्त्रेह दोनोंने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है॥ ३॥
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥
yaha baṛa doṣu dūri kari svāmī| taji sakoca sikhaia anugāmī||
bharata binaya suni sabahiṃ prasaṃsī| khīra nīra bibarana gati haṃsī||
Meaning हे स्वामी ! इस बड़े दोषको दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवकको शिक्षा दीजिये। दूध और जलको अलग-अलग करनेमें हंसिनीकी -सी गतिवाली भरतजीकी विनती सुनकर उसकी सभीने प्रशंसा की॥ ४॥
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन॥ ३१४॥
dīnabaṃdhu suni baṃdhu ke bacana dīna chalahīna|
desa kāla avasara sarisa bole rāmu prabīna|| 314||
Meaning दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजीके दीन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसरके अनुकूल वचन बोले--॥ ३१४॥
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥
tāta tumhāri mori parijana kī| ciṃtā gurahi nṛpahi ghara bana kī||
māthe para gura muni mithilesū| hamahi tumhahi sapanehum̐ na kalesū||
Meaning हे तात ! तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घरकी और वनकी सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजीको है। हमारे सिरपर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वनमें भी क्लेश नहीं है॥ १॥
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई॥
mora tumhāra parama puruṣārathu| svārathu sujasu dharamu paramārathu||
pitu āyasu pālihiṃ duhu bhāī| loka beda bhala bhūpa bhalāī||
Meaning मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिताजीकी आज्ञाका पालन करें। राजाकी भलाई (उनके ब्रतकी रक्षा) से ही लोक और वेद दोनोंमें भला है॥ २॥
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥
अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई॥
gura pitu mātu svāmi sikha pāleṃ| calehum̐ kumaga paga parahiṃ na khāleṃ||
asa bicāri saba soca bihāī| pālahu avadha avadhi bhari jāī||
Meaning गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा (आज्ञा) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड़ेमें नहीं पड़ता (पतन नहीं होता)। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो॥ ३॥
देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥
desu kosu parijana parivārū| gura pada rajahiṃ lāga charubhārū||
tumha muni mātu saciva sikha mānī| pālehu puhumi prajā rajadhānī||
Meaning देश, खजाना, कुट्म्ब, परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजीकी चरण-रजपर है। तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियोंकी शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानीका पालन (रक्षा) -भर करते रहना॥ ४॥
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥ ३१५॥
mukhiā mukhu so cāhiai khāna pāna kahum̐ eka|
pālai poṣai sakala am̐ga tulasī sahita bibeka|| 315||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं--[ श्रीरामजीने कहा--] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने- पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है॥ ३१५॥
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥
rājadharama sarabasu etanoī| jimi mana māham̐ manoratha goī||
baṃdhu prabodhu kīnha bahu bhām̐tī| binu adhāra mana toṣu na sām̐tī||
Meaning राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति॥ १॥
भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥
bharata sīla gura saciva samājū| sakuca saneha bibasa raghurājū||
prabhu kari kṛpā pām̐varīṃ dīnhīṃ| sādara bharata sīsa dhari līnhīṃ||
Meaning इधर तो भरतजीका शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाजकी उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्त्रेहके विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजीके प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदिका संकोच भी होता है।) आखिर [ भरतजीके प्रेमवश ] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपाकर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजीने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया॥ २॥
चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥
संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के॥
caranapīṭha karunānidhāna ke| janu juga jāmika prajā prāna ke||
saṃpuṭa bharata saneha ratana ke| ākhara juga juna jīva jatana ke||
Meaning करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीके दोनों खड़ाऊँ प्रजाके प्राणोंकी रक्षाके लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजीके प्रेमरूपी रतके लिये मानो डिब्बा है और जीवके साधनके लिये मानो राम-नामके दो अक्षर हैं॥ ३॥
कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥
भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥
kula kapāṭa kara kusala karama ke| bimala nayana sevā sudharama ke||
bharata mudita avalaṃba lahe teṃ| asa sukha jasa siya rāmu rahe teṃ||
Meaning रघुकुल [की रक्षा] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ ) कर्म करनेके लिये दो हाथकी भाँति (सहायक) हैं। और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्मके सुझानेके लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्बके मिल जानेसे परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजीके रहनेसे होता॥ ४॥
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥ ३१६॥
māgeu bidā pranāmu kari rāma lie ura lāi|
loga ucāṭe amarapati kuṭila kuavasaru pāi|| 316||
Meaning भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हदयसे लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया॥ ३१६॥
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥
नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥
so kucāli saba kaham̐ bhai nīkī| avadhi āsa sama jīvani jī kī||
nataru lakhana siya sama biyogā| hahari marata saba loga kurogā||
Meaning वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते॥ १॥
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥
rāmakṛpām̐ avareba sudhārī| bibudha dhāri bhai gunada gohārī||
bheṃṭata bhuja bhari bhāi bharata so| rāma prema rasu kahi na parata so||
Meaning श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंको सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता॥ २॥
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥
बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥
tana mana bacana umaga anurāgā| dhīra dhuraṃdhara dhīraju tyāgā||
bārija locana mocata bārī| dekhi dasā sura sabhā dukhārī||
Meaning तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा। धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदूश नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओोंका] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा (समाज) दुःखी हो गयी॥ ३॥
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥
जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥
munigana gura dhura dhīra janaka se| gyāna anala mana kaseṃ kanaka se||
je biraṃci niralepa upāe| paduma patra jimi jaga jala jāe||
Meaning मुनिगण, गुरु वसिष्ठडजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्रिमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निर्लेप ही रचा और जो जगत्रूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह ही (जगतमें रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए,॥ ४॥
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥ ३१७॥
teu biloki raghubara bharata prīti anūpa apāra|
bhae magana mana tana bacana sahita birāga bicāra|| 317||
Meaning वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्र हो गये॥ ३१७॥
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥
बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥
jahām̐ janaka gura mati bhorī| prākṛta prīti kahata baṛi khorī||
baranata raghubara bharata biyogū| suni kaṭhora kabi jānihi logū||
Meaning जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत (लौकिक) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहदय समझेंगे॥ १॥
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥
भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥
so sakoca rasu akatha subānī| samau sanehu sumiri sakucānī||
bheṃṭi bharata raghubara samujhāe| puni ripudavanu haraṣi hiyam̐ lāe||
Meaning वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया॥ २॥
सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥
sevaka saciva bharata rukha pāī| nija nija kāja lage saba jāī||
suni dāruna dukhu duhūm̐ samājā| lage calana ke sājana sājā||
Meaning सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे॥ ३॥
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥
मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥
prabhu pada paduma baṃdi dou bhāī| cale sīsa dhari rāma rajāī||
muni tāpasa banadeva nihorī| saba sanamāni bahori bahorī||
Meaning प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की॥ ४॥
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥ ३१८॥
lakhanahi bheṃṭi pranāmu kari sira dhari siya pada dhūri|
cale saprema asīsa suni sakala sumaṃgala mūri|| 318||
Meaning फिर लक्ष्मणजीको क्रमश: भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मज़लोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले॥ ३१८॥
सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥
देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥
sānuja rāma nṛpahi sira nāī| kīnhi bahuta bidhi binaya baṛāī||
deva dayā basa baṛa dukhu pāyau| sahita samāja kānanahiṃ āyau||
Meaning छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [ और कहा-] हे देव ! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित वनमें आये॥ १॥
पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥
मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥
pura pagu dhāria dei asīsā| kīnha dhīra dhari gavanu mahīsā||
muni mahideva sādhu sanamāne| bidā kie hari hara sama jāne||
Meaning अब आशीर्वाद देकर नगरको पधारिये। यह सुन राजा जनकजीने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीयमचन्द्रजीने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु और शिवके समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया॥ २॥
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥
कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥
sāsu samīpa gae dou bhāī| phire baṃdi paga āsiṣa pāī||
kausika bāmadeva jābālī| purajana parijana saciva sucālī||
Meaning तब श्रीरम-लक्ष्मण दोनों भाई सास (सुनयनाजी ) के पास गये और उनके चरणोंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरणवाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री--॥ ३॥
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥
jathā jogu kari binaya pranāmā| bidā kie saba sānuja rāmā||
nāri puruṣa laghu madhya baṛere| saba sanamāni kṛpānidhi phere||
Meaning सबको छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने छोटे, मध्यम (मझले) और बड़े सभी श्रेणीके स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया॥ ४॥
भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि॥ ३१९॥
bharata mātu pada baṃdi prabhu suci saneham̐ mili bheṃṭi|
bidā kīnha saji pālakī sakuca soca saba meṭi|| 319||
Meaning भरतकी माता कैकेयीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने पवित्र (निश्छल ) प्रेमके साथ उनसे मिल-भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोचको मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया॥ ३१९॥
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥
करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥
parijana mātu pitahi mili sītā| phirī prānapriya prema punītā||
kari pranāmu bheṃṭī saba sāsū| prīti kahata kabi hiyam̐ na hulāsū||
Meaning प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजीके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहरके कुटुम्बियोंसे तथा माता-पितासे मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओंसे गले लगकर मिलीं। उनके प्रेमका वर्णन करनेके लिये कविके हृदयमें हुलास (उत्साह) नहीं होता॥ १॥
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥
रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई॥
suni sikha abhimata āsiṣa pāī| rahī sīya duhu prīti samāī||
raghupati paṭu pālakīṃ magāīṃ| kari prabodhu saba mātu caṛhāī||
Meaning उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता-पिता दोनों ओरकी प्रीतिमें समायी (बहुत देरतक निमगय्र) रहीं! [तब] श्रीरघुनाथजीने सुन्दर पालकियाँ मँगवायीं और सब माताओंको आश्वासन देकर उनपर चढ़ाया॥ २॥
बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई॥
साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥
bāra bāra hili mili duhu bhāī| sama saneham̐ jananī pahum̐cāī||
sāji bāji gaja bāhana nānā| bharata bhūpa dala kīnha payānā||
Meaning दोनों भाइयोंने माताओंसे समान प्रेमसे बार-बार मिल-जुलकर उनको पहुँचाया। भरतजी और राजा जनकजीके दलोंने घोड़े, हाथी और अनेकों तरहकी सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया॥ ३॥
हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता॥
बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें॥
hṛdayam̐ rāmu siya lakhana sametā| cale jāhiṃ saba loga acetā||
basaha bāji gaja pasu hiyam̐ hāreṃ| cale jāhiṃ parabasa mana māreṃ||
Meaning सीताजी एवं लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर सब लोग बेसुध हुए चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े, हाथी आदि पशु हृदयमें हारे (शिथिल) हुए परवश मनमारे चले जा रहे हैं॥ ४॥
गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥ ३२०॥
gura guratiya pada baṃdi prabhu sītā lakhana sameta|
phire haraṣa bisamaya sahita āe parana niketa|| 320||
Meaning गुरु वसिष्टजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषादके साथ लौटकर पर्णकुटीपर आये॥ ३२०॥
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥
कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥
bidā kīnha sanamāni niṣādū| caleu hṛdayam̐ baṛa biraha biṣādū||
kola kirāta bhilla banacārī| phere phire johāri johārī||
Meaning फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदयमें विरहका बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजीने कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगोंको लौटाया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे॥ १॥
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥
भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥
prabhu siya lakhana baiṭhi baṭa chāhīṃ| priya parijana biyoga bilakhāhīṃ||
bharata saneha subhāu subānī| priyā anuja sana kahata bakhānī||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़की छायामें बैठकर प्रियजन एवं परिवारके वियोगसे दुखी हो रहे हैं। भरतजीके स्त्रेह, स्वभाव और सुन्दर वाणीको बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसे कहने लगे॥ २॥
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥
तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥
prīti pratīti bacana mana karanī| śrīmukha rāma prema basa baranī||
tehi avasara khaga mṛga jala mīnā| citrakūṭa cara acara malīnā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमके वश होकर भरतजीके वचन, मन, कर्मकी प्रीति तथा विश्वासका अपने श्रीमुखसे वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियाँ, चित्रकूटके सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये॥ ३॥
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥
bibudha biloki dasā raghubara kī| baraṣi sumana kahi gati ghara ghara kī||
prabhu pranāmu kari dīnha bharoso| cale mudita mana ḍara na kharo so||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी दशा देखकर देवताओंने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर-घरको दशा कही ( दुखड़ा सुनाया )। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मनमें जरा-सा भी डर न रहा॥ ४॥
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥ ३२१॥
sānuja sīya sameta prabhu rājata parana kuṭīra|
bhagati gyānu bairāgya janu sohata dhareṃ sarīra|| 321||
Meaning छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों॥ ३२१॥
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥
muni mahisura gura bharata bhuālū| rāma biraham̐ sabu sāju bihālū||
prabhu guna grāma ganata mana māhīṃ| saba cupacāpa cale maga jāhīṃ||
Meaning मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्टजी, भरतजी और राजा जनकजी--सारा समाज श्रीरामचन्द्रजी के विरहमें विह्नल है। प्रभुके गुणसमूहोंका मनमें स्मरण करते हुए सब लोग मार्गमें चुपचाप चले जा रहे हैं॥ १॥
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥
उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
jamunā utari pāra sabu bhayaū| so bāsaru binu bhojana gayaū||
utari devasari dūsara bāsū| rāmasakhām̐ saba kīnha supāsū||
Meaning [ पहले दिन] सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए। वह दिन बिना भोजनके ही बीत गया। दूसरा मुकाम गड़ाजी उतरकर (गड़ापार श्रज़वेरपुरमें) हुआ। वहाँ रामसखा निषादराजने सब सुप्रबन्ध कर दिया॥ २॥
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥
जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥
saī utari gomatīṃ nahāe| cautheṃ divasa avadhapura āe||
janaku rahe pura bāsara cārī| rāja kāja saba sāja sam̐bhārī||
Meaning फिर सई उतरकर गोमतीजीमें स्रान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुँचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजीमें रहे और राजकाज एवं सब साज-सामानको सँभालकर,॥ ३॥
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥
नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥
sauṃpi saciva gura bharatahi rājū| terahuti cale sāji sabu sājū||
nagara nāri nara gura sikha mānī| base sukhena rāma rajadhānī||
Meaning तथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजीको राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुतको चले। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुजीकी शिक्षा मानकर श्रीरामजीकी राजधानी अयोध्याजीमें सुखपूर्वक रहने लगे॥ ४॥
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥ ३२२॥
rāma darasa lagi loga saba karata nema upabāsa|
taji taji bhūṣana bhoga sukha jiata avadhi kīṃ āsa|| 322||
Meaning सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग- सुखोंको छोड़-छाड़कर अवधिकी आशापर जी रहे हैं॥ ३२२॥