सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे॥
पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥
saciva susevaka bharata prabodhe| nija nija kāja pāi pāi sikha odhe||
puni sikha dīnha boli laghu bhāī| sauṃpī sakala mātu sevakāī||
Meaning भरतजीने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकोंको समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने- अपने काममें लग गये। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजीको बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओंकी सेवा उनको सौंपी॥ १॥
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥
ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥
bhūsura boli bharata kara jore| kari pranāma baya binaya nihore||
ūm̐ca nīca kāraju bhala pocū| āyasu deba na karaba sam̐kocū||
Meaning ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतजीने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्थाके अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊँचा-नीचा (छोटा-बड़ा), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा॥ २॥
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥
parijana purajana prajā bolāe| samādhānu kari subasa basāe||
sānuja ge gura geham̐ bahorī| kari daṃḍavata kahata kara jorī||
Meaning भरतजीने फिर परिवारके लोगोंको, नागरिकोंको तथा अन्य प्रजाको बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजीसहित वे गुरुजीके घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले--॥ ३॥
आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥
समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥
āyasu hoi ta rahauṃ sanemā| bole muni tana pulaki sapemā||
samujhava kahaba karaba tumha joī| dharama sāru jaga hoihi soī||
Meaning आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ ! मुनि वसिष्टजी पुलकितशरीर हो प्रेमके साथ बोले-हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगतमें धर्मका सार होगा॥ ४॥
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥ ३२३॥
suni sikha pāi asīsa baṛi ganaka boli dinu sādhi|
siṃghāsana prabhu pādukā baiṭhāre nirupādhi|| 323||
Meaning भरतजीने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियोंको बुलाया और दिन ( अच्छा मुहूर्त) साधकर प्रभुकी चरणपादुकाओंको निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासनपर विराजित कराया॥ ३२३॥
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥
नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥
rāma mātu gura pada siru nāī| prabhu pada pīṭha rajāyasu pāī||
naṃdigāvam̐ kari parana kuṭīrā| kīnha nivāsu dharama dhura dhīrā||
Meaning फिर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी और गुरुजीके चरणोंमें सिर नवाकर और प्रभुकी चरणपादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मकी धुरी धारण करनेमें धीर भरतजीने नन्दिग्राममें पर्णकुटी बनाकर उसीमें निवास किया॥ १॥
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥
असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥
jaṭājūṭa sira munipaṭa dhārī| mahi khani kusa sām̐tharī sam̐vārī||
asana basana bāsana brata nemā| karata kaṭhina riṣidharama sapremā||
Meaning सिरपर जटाजूट और शरीरमें मुनियोंके [वल्कल] वस्त्र धारण कर, पृथ्वीको खोदकर उसके अंदर कुशकी आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बरतन, ब्रत, नियम--सभी बातोंमें वे ऋषियोंके कठिन धर्मका प्रेमसहित आचरण करने लगे॥ २॥
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥
अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥
bhūṣana basana bhoga sukha bhūrī| mana tana bacana taje tina tūrī||
avadha rāju sura rāju sihāī| dasaratha dhanu suni dhanadu lajāī||
Meaning गहने-कपड़े और अनेकों प्रकारके भोग-सुखोंको मन, तन और वचनसे तृण तोड़कर (प्रतिज्ञा करके) त्याग दिया। जिस अयोध्याके राज्यको देवराज इन्द्र सिहाते थे और [जहाँके राजा; दशरथजीकी सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे,॥ ३॥
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥
tehiṃ pura basata bharata binu rāgā| caṃcarīka jimi caṃpaka bāgā||
ramā bilāsu rāma anurāgī| tajata bamana jimi jana baṛabhāgī||
Meaning उसी अयोध्यापुरीमें भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पाके बागमें भौंरा। श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मीके विलास [ भोगैश्चर्य] को वमनकी भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं)॥ ४॥
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥ ३२४॥
rāma pema bhājana bharatu baṛe na ehiṃ karatūti|
cātaka haṃsa sarāhiata ṭeṃka bibeka bibhūti|| 324||
Meaning फिर भरतजी तो [ स्वयं] श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमके पात्र हैं। वे इस ( भोगै श्वर्यत्यागरूप ) करनीसे बड़े नहीं हुए ( अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है)। [ पृथ्वीपरका जल न पीनेकी] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति (शक्ति) से हंसकी भी सराहना होती है॥ ३२४॥
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥
deha dinahum̐ dina dūbari hoī| ghaṭai teju balu mukhachabi soī||
nita nava rāma prema panu pīnā| baṛhata dharama dalu manu na malīnā||
Meaning भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज ( अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद *) घट रहा है। बल और मुखछबि (मुखकी कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है। रामप्रेमका प्रण नित्य * नया और पुष्ट होता ' है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात् प्रसन्न है)॥ १॥ संस्कृत-कोषमें तेज' का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेनेसे 'घटइ' के अर्थमें भी किसी प्रकारकी खींच-तान नहीं करनी पड़ती।
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥
सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥
jimi jalu nighaṭata sarada prakāse| bilasata betasa banaja bikāse||
sama dama saṃjama niyama upāsā| nakhata bharata hiya bimala akāsā||
Meaning जैसे शरदू-ऋतुके प्रकाश [विकास] से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजीके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र (तारागण) हैं॥ २॥
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥
dhruva bisvāsa avadhi rākā sī| svāmi surati surabīthi bikāsī||
rāma pema bidhu acala adoṣā| sahita samāja soha nita cokhā||
Meaning विश्वास ही [उस आकाशमें ] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [ का ध्यान] पूर्णिमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति (स्मृति) आकाशगड़्ा-सरीखी प्रकाशित है। रामप्रेम ही अचल (सदा रहनेवाला) और कलड्रहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है॥ ३॥
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥
bharata rahani samujhani karatūtī| bhagati birati guna bimala bibhūtī||
baranata sakala sukaci sakucāhīṃ| sesa ganesa girā gamu nāhīṃ||
Meaning भरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [ औरोंकी तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है॥ ४॥
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥ ३२५॥
nita pūjata prabhu pām̐varī prīti na hṛdayam̐ samāti|
māgi māgi āyasu karata rāja kāja bahu bhām̐ti|| 325||
Meaning वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार (सब प्रकारके) राज-काज करते हैं॥ ३२५॥
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥
pulaka gāta hiyam̐ siya raghubīrū| jīha nāmu japa locana nīrū||
lakhana rāma siya kānana basahīṃ| bharatu bhavana basi tapa tanu kasahīṃ||
Meaning शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं॥ १॥
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥
dou disi samujhi kahata sabu logū| saba bidhi bharata sarāhana jogū||
suni brata nema sādhu sakucāhīṃ| dekhi dasā munirāja lajāhīṃ||
Meaning दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकारसे सराहने योग्य हैं। उनके व्रत और नियमोंको सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लखज्नित होते हैं॥ २॥
परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥
parama punīta bharata ācaranū| madhura maṃju muda maṃgala karanū||
harana kaṭhina kali kaluṣa kalesū| mahāmoha nisi dalana dinesū||
Meaning भरतजीका परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मज़लोंका करनेवाला है। कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है। महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है॥ ३॥
पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥
जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥
pāpa puṃja kuṃjara mṛgarājū| samana sakala saṃtāpa samājū||
jana raṃjana bhaṃjana bhava bhārū| rāma saneha sudhākara sārū||
Meaning पापसमूहरूपी हाथीके लिये सिंह है। सारे सन्तापोंके दलका नाश करनेवाला है। भक्तोंको आनन्द देनेवाला और भवके भार (संसारके दुःख) -का भज्जन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी चन्द्रमाका सार (अमृत) है॥ ४॥
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनिमन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
siya rāma prema piyūṣa pūrana hota janamu na bharata ko|
munimana agama jama niyama sama dama biṣama brata ācarata ko||
dukha dāha dārida daṃbha dūṣana sujasa misa apaharata ko|
kalikāla tulasī se saṭhanhi haṭhi rāma sanamukha karata ko||
Meaning श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृतसे परिपूर्ण भरतजीका जन्म यदि न होता तो मुनियोंके मनको भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन ब्रतोंका आचरण कौन करता? दु:ख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकालमें तुलसीदास-जैसे शठोंको हठपूर्वक कौन श्रीरामजीके सम्मुख करता ?
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होड़ भव रस बिरति॥ ३२६॥
bharata carita kari nemu tulasī jo sādara sunahiṃ|
sīya rāma pada pemu avasi hoṛa bhava rasa birati|| 326||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं--जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा॥ ३२६॥
अत्रिके अतिथि 7॥
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥
atrike atithi 7||
kari pūjā kahi bacana suhāe| die mūla phala prabhu mana bhāe||