भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥
bharata bacana suni dekhi subhāū| sahita samāja sarāhata rāū||
sugama agama mṛdu maṃju kaṭhore| arathu amita ati ākhara thore||
Meaning भरतजीके वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजीके वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े हैं, परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है॥ १॥
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥
jyau mukha mukura mukuru nija pānī| gahi na jāi asa adabhuta bānī||
bhūpa bharata muni sahita samājū| ge jaham̐ bibudha kumuda dvijarājū||
Meaning जैसे मुख [का प्रतिबिम्ब] दर्पणमें दीखता है और दर्पण अपने हाथमें है, फिर भी वह (मुखका प्रतिबिम्ब) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजीकी यह अद्भुत वाणी भी पकड़में नहीं आती (शब्दोंसे उसका आशय समझमें नहीं आता)। [किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बना] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्टजी समाजके साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदोंके खिलानेवाले (सुख देनेवाले ) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे॥ २॥
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥
suni sudhi soca bikala saba logā| manahum̐ mīnagana nava jala jogā||
devam̐ prathama kulagura gati dekhī| nirakhi bideha saneha biseṣī||
Meaning यह समाचार सुनकर सब लोग सोचसे व्याकुल हो गये; जैसे नये (पहली व्षकि) जलके संयोगसे मछलियाँ व्याकुल होती हैं। देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्टजीकी [प्रेमविह्नल] दशा देखी, फिर विदेहजीके विशेष स््रेहको देखा;॥ ३॥
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥
सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा॥
rāma bhagatimaya bharatu nihāre| sura svārathī hahari hiyam̐ hāre||
saba kou rāma pemamaya pekhā| bhau alekha soca basa lekhā||
Meaning और तब श्रीरामभक्तिसे ओतप्रोत भरतजीको देखा। इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदयमें हार मान गये (निराश हो गये)। उन्होंने सब किसीको श्रीरामप्रेममें सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोचके वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं॥ ४॥
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥ २९४॥
rāmu saneha sakoca basa kaha sasoca surarāja|
racahu prapaṃcahi paṃca mili nāhiṃ ta bhayau akāju|| 294||
Meaning देवराज इन्द्र सोचमें भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्रेह और संकोचके वशगें हैं। इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपश्न (माया) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा [ही समझो]॥ २९४॥
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥
फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥
suranha sumiri sāradā sarāhī| debi deva saranāgata pāhī||
pheri bharata mati kari nija māyā| pālu bibudha kula kari chala chāyā||
Meaning देवताओंने सरस्वतीका स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा--हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजीकी बुद्धिको फेर दीजिये। और छलकी छाया कर देवताओंके कुलका पालन (रक्षा) कीजिये॥ १॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥
मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥
bibudha binaya suni debi sayānī| bolī sura svāratha jaṛa jānī||
mo sana kahahu bharata mati pherū| locana sahasa na sūjha sumerū||
Meaning देवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं--मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो! हजार नेत्रोंसे भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!॥ २॥
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी।
सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥
bidhi hari hara māyā baṛi bhārī| sou na bharata mati sakai nihārī||
सो मति मोहि कहत करु भोरी।
चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥
so mati mohi kahata karu bhorī| caṃdini kara ki caṃḍakara corī||
Meaning ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजीकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धिको, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो ( भुलावेमें डाल दो) ! आरे ! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्यको चुरा सकती है ?॥ ३॥
भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥
अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥
bharata hṛdayam̐ siya rāma nivāsū| taham̐ ki timira jaham̐ tarani prakāsū||
asa kahi sārada gai bidhi lokā| bibudha bikala nisi mānahum̐ kokā||
Meaning भरतजीके हृदयमें श्रीसीतारामजीका निवास है। जहाँ सूर्यका प्रकाश है, वहाँ कहीं अँधेरा रह सकता है ? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोकको चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रिमें चकवा व्याकुल होता है॥ ४॥
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥ २९५॥
sura svārathī malīna mana kīnha kumaṃtra kuṭhāṭu|
raci prapaṃca māyā prabala bhaya bhrama arati ucāṭu|| 295||
Meaning मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाह करके बुरा ठाट (षड्यन्त्र) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया॥ २९५॥
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥
गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥
kari kucāli socata surarājū| bharata hātha sabu kāju akājū||
gae janaku raghunātha samīpā| sanamāne saba rabikula dīpā||
Meaning कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगड़ना सब भरतजीके हाथ है। इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ट आदिके साथ] श्रीरघुनाथजीके पास गये। सूर्यकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया,॥ १॥
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥
जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥
samaya samāja dharama abirodhā| bole taba raghubaṃsa purodhā||
janaka bharata saṃbādu sunāī| bharata kahāuti kahī suhāī||
Meaning तब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठतजी समय, समाज और धर्मके अविरोधी (अर्थात् अनुकूल) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया। फिर भरतजीकी कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं॥ २॥
तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥
tāta rāma jasa āyasu dehū| so sabu karai mora mata ehū||
suni raghunātha jori juga pānī| bole satya sarala mṛdu bānī||
Meaning [फिर बोले--] हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें ! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले--॥ ३॥
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥
राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥
bidyamāna āpuni mithilesū| mora kahaba saba bhām̐ti bhadesū||
rāura rāya rajāyasu hoī| rāuri sapatha sahī sira soī||
Meaning आपके और मिथिलेश्वर जनकजीके विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकारसे भद्दा (अनुचित) है। आपकी और महाराजकी जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी॥ ४॥
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत॥ २९६॥
rāma sapatha suni muni janaku sakuce sabhā sameta|
sakala bilokata bharata mukhu banai na utaru deta|| 296||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ सुनकर सभासमेत मुनि और जनकजी सकुचा गये (स्तम्भित रह गये)। किसीसे उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजीका मुँह ताक रहे हैं॥ २९६॥
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी॥
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा॥
sabhā sakuca basa bharata nihārī| rāmabaṃdhu dhari dhīraju bhārī||
kusamau dekhi sanehu sam̐bhārā| baṛhata biṃdhi jimi ghaṭaja nivārā||
Meaning भरतजीने सभाको संकोचके वश देखा। रामबन्धु ( भरतजी) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए] प्रेमको सँभाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था॥ १॥
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥
भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥
soka kanakalocana mati chonī| harī bimala guna gana jagajonī||
bharata bibeka barāham̐ bisālā| anāyāsa udharī tehi kālā||
Meaning शोकरूपी हिरण्याक्षने [ सारी सभाकी] बुद्धिरूपी पृथ्वीको हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत्की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजीके विवेकरूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोकरूपी हिरण्याक्षको नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया!॥ २॥
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥
kari pranāmu saba kaham̐ kara jore| rāmu rāu gura sādhu nihore||
chamaba āju ati anucita morā| kahaum̐ badana mṛdu bacana kaṭhorā||
Meaning भरतजीने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्टजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा--आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्तावको क्षमा कीजियेगा। मैं कोमल (छोटे) मुखसे कठोर ( धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ॥ ३॥
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥
hiyam̐ sumirī sāradā suhāī| mānasa teṃ mukha paṃkaja āī||
bimala bibeka dharama naya sālī| bharata bhāratī maṃju marālī||
Meaning फिर उन्होंने हृदयमें सुहावनी सरस्वतीजीका स्मरण किया। वे मानससे (उनके मनरूपी मानसरोवरसे ) उनके मुखारविन्दपर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे युक्त भरतजीकी वाणी सुन्दर हंसिनी [ के समान गुण-दोषका विवेचन करनेवाली] है॥ ४॥
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु॥ २९७॥
nirakhi bibeka bilocananhi sithila saneham̐ samāju|
kari pranāmu bole bharatu sumiri sīya raghurāju|| 297||
Meaning विवेकके नेत्रोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देख, सबको प्रणामकर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके भरतजी बोले--॥ २९७॥
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी॥
सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥
prabhu pitu mātu suhrada gura svāmī| pūjya parama hita ataṃrajāmī||
sarala susāhibu sīla nidhānū| pranatapāla sarbagya sujānū||
Meaning हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहददू (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरलहदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,॥ १॥
समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई॥
samaratha saranāgata hitakārī| gunagāhaku avaguna agha hārī||
svāmi gosām̐ihi sarisa gosāī| mohi samāna maiṃ sāim̐ dohāī||
Meaning समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं। हे गोसाई ! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ॥२॥
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥
prabhu pitu bacana moha basa pelī| āyaum̐ ihām̐ samāju sakelī||
jaga bhala poca ūm̐ca aru nīcū| amia amarapada māhuru mīcū||
Meaning मैं मोहवश प्रभु (आप) के और पिताजीके वचनोंका उल्लज्लनकर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ। जगतमें भले-बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद (देवताओंका पद), विष और मृत्यु आदि--॥ ३॥
राम रजाइ मेट मन माहीं।
देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥
rāma rajāi meṭa mana māhīṃ| dekhā sunā katahum̐ kou nāhīṃ||
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई।
प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥
so maiṃ saba bidhi kīnhi ḍhiṭhāī| prabhu mānī saneha sevakāī||
Meaning किसीको भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मनमें भी श्रीरामचन्द्रजी (आप) की आज्ञाको मेट दे। मैंने सब प्रकारसे वही ढिठाई की, परन्तु प्रभुने उस ढिठाईको ख्रेह और सेवा मान लिया!॥ ४॥
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥ २९८॥
kṛpām̐ bhalāī āpanī nātha kīnha bhala mora|
dūṣana bhe bhūṣana sarisa sujasu cāru cahu ora|| 298||
Meaning हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया॥ २९८॥
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥
rāuri rīti subāni baṛāī| jagata bidita nigamāgama gāī||
kūra kuṭila khala kumati kalaṃkī| nīca nisīla nirīsa nisaṃkī||
Meaning हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगतमें प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रोंने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं॥ १॥
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥
teu suni sarana sāmuheṃ āe| sakṛta pranāmu kiheṃ apanāe||
dekhi doṣa kabahum̐ na ura āne| suni guna sādhu samāja bakhāne||
Meaning उन्हें भी आपने शरणमें सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करनेपर ही अपना लिया। उन (शरणागतों ) के दोषोंको देखकर भी आप कभी हृदयमें नहीं लाये और उनके गुणोंको सुनकर साधुओंके समाजमें उनका बखान किया॥ २॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥
ko sāhiba sevakahi nevājī| āpu samāja sāja saba sājī||
nija karatūti na samujhia sapaneṃ| sevaka sakuca socu ura apaneṃ||
Meaning ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्रमें भी अपनी कोई करनी न समझकर ( अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे!॥ ३॥
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥
so gosāim̐ nahi dūsara kopī| bhujā uṭhāi kahaum̐ pana ropī||
pasu nācata suka pāṭha prabīnā| guna gati naṭa pāṭhaka ādhīnā||
Meaning मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोरके साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। [ बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [ सीखे हुए] पाठमें प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोतेका [ पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशुके नाचनेकी गति [ क्रमश: ] पढ़ानेवाले और नचानेवालेके अधीन है॥ ४॥
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर॥ २९९॥
yoṃ sudhāri sanamāni jana kie sādhu siramora|
ko kṛpāla binu pālihai biridāvali barajora|| 299||
Meaning इस प्रकार अपने सेवकोंकी (बिगड़ी) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया। कृपालु (आप) के सिवा अपनी विरदावलीका और कौन जबर्दस्ती (हठपूर्वक) पालन करेगा ?॥ २९९॥
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥
soka saneham̐ ki bāla subhāem̐| āyaum̐ lāi rajāyasu bāem̐||
tabahum̐ kṛpāla heri nija orā| sabahi bhām̐ti bhala māneu morā||
Meaning मैं शोकसे या स्तरेहसे या बालकस्वभावसे आज्ञाको बायें लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकारसे मेरा भला ही माना (मेरे इस अनुचित कार्यको अच्छा ही समझा)॥ १॥
देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला॥
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥
dekheum̐ pāya sumaṃgala mūlā| jāneum̐ svāmi sahaja anukūlā||
baṛeṃ samāja bilokeum̐ bhāgū| baṛīṃ cūka sāhiba anurāgū||
Meaning मैंने सुन्दर मज़लोंके मूल आपके चरणोंका दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझपर स्वभावसे ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाजमें अपने भाग्यको देखा कि इतनी बड़ी चूक होनेपर भी स्वामीका मुझपर कितना अनुराग है!॥ २॥
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥
राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं॥
kṛpā anugraha aṃgu aghāī| kīnhi kṛpānidhi saba adhikāī||
rākhā mora dulāra gosāīṃ| apaneṃ sīla subhāyam̐ bhalāīṃ||
Meaning कृपानिधानने मुझपर साड़ोपाज़ भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं (अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सवडज्जिपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है)। हे गोसाईं! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाईसे मेरा दुलार रखा॥ ३॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥
अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥
nātha nipaṭa maiṃ kīnhi ḍhiṭhāī| svāmi samāja sakoca bihāī||
abinaya binaya jathāruci bānī| chamihi deu ati ārati jānī||
Meaning हे नाथ! मैंने स्वामी और समाजके संकोचको छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे॥ ४॥
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि॥ ३००१॥
suhrada sujāna susāhibahi bahuta kahaba baṛi khori|
āyasu deia deva aba sabai sudhārī mori|| 3001||
Meaning सुहदू (बिना ही हेतुके हित करनेवाले), बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिकसे बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी॥ ३००॥
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई।
सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥
prabhu pada paduma parāga dohāī| satya sukṛta sukha sīvam̐ suhāī||
सो करि कहउँ हिए अपने की।
रुचि जागत सोवत सपने की॥
so kari kahaum̐ hie apane kī| ruci jāgata sovata sapane kī||
Meaning प्रभु (आप) के चरणकमलोंकी रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुखकी सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदयकी जागते, सोते और स्वप्रमें भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ॥ १॥
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥
sahaja saneham̐ svāmi sevakāī| svāratha chala phala cāri bihāī||
agyā sama na susāhiba sevā| so prasādu jana pāvai devā||
Meaning वह रुचि है--कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय॥ २॥
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥
asa kahi prema bibasa bhae bhārī| pulaka sarīra bilocana bārī||
prabhu pada kamala gahe akulāī| samau sanehu na so kahi jāī||
Meaning भरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उस समयको और स्त्रेहको कहा नहीं जा सकता॥ ३॥
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥
kṛpāsiṃdhu sanamāni subānī| baiṭhāe samīpa gahi pānī||
bharata binaya suni dekhi subhāū| sithila saneham̐ sabhā raghurāū||
Meaning कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने सुन्दर वाणीसे भरतजीका सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजीकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्तरेहसे शिथिल हो गये॥ ४॥
रघुराउ सिथिल सनेहेँं साधु समाज मुनि मिथिला धनी।
मन महुँ सराहत भरत भायप भगति को महिमा घनी॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥
raghurāu sithila sanehem̐ṃ sādhu samāja muni mithilā dhanī|
mana mahum̐ sarāhata bharata bhāyapa bhagati ko mahimā ghanī||
bharatahi prasaṃsata bibudha baraṣata sumana mānasa malina se|
tulasī bikala saba loga suni sakuce nisāgama nalina se||
Meaning श्रीरघुनाथजी, साधुओंका समाज, मुनि वसिष्टजी और मिथिलापति जनकजी स्त्रेहसे शिथिल हो गये। सब मन-ही-मन भरतजीके भाईपन और उनकी भक्तिकी अतिशय महिमाको सराहने लगे। देवता मलिन मनसे भरतजीकी प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं-सब लोग भरतजीका भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रिके आगमनसे कमल !
देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।
मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥ ३०१॥
dekhi dukhārī dīna duhu samāja nara nāri saba|
maghavā mahā malīna mue māri maṃgala cahata|| 301||
Meaning दोनों समाजोंके सभी नर-नारियोंको दीन और दुखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मरे हुओंको मारकर अपना मज़ल चाहता है॥ ३०१॥
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥
काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥
kapaṭa kucāli sīvam̐ surarājū| para akāja priya āpana kājū||
kāka samāna pākaripu rītī| chalī malīna katahum̐ na pratītī||
Meaning देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है। उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्रकी रीति कौएके समान है। वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है॥ १॥
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥
prathama kumata kari kapaṭu sam̐kelā| so ucāṭu saba keṃ sira melā||
suramāyām̐ saba loga bimohe| rāma prema atisaya na bichohe||
Meaning पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपटको बटोरा (अनेक प्रकारके कपटका साज सजा)। फिर वह (कपटजनित) उचाट सबके सिरपर डाल दिया। फिर देवमायासे सब लोगोंको विशेषरूपसे मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमसे उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजीके प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा)॥ २॥
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥
bhaya ucāṭa basa mana thira nāhīṃ| chana bana ruci chana sadana sohāhīṃ||
dubidha manogati prajā dukhārī| sarita siṃdhu saṃgama janu bārī||
Meaning भय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है। क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है। मानो नदी और समुद्रके सड़्मका जल क्षुब्ध हो रहा हो। (जैसे नदी और समुद्रके सज़मका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी)॥ ३॥
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥
ducita katahum̐ paritoṣu na lahahīṃ| eka eka sana maramu na kahahīṃ||
lakhi hiyam̐ ham̐si kaha kṛpānidhānū| sarisa svāna maghavāna jubānū||
Meaning चित्त दोतरफा हो जानेसे वे कहीं सन्तोष नहीं पाते और एक-दूसरेसे अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदयमें हँसकर कहने लगे--कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष) एक-सरीखे (एक ही स्वभावके ) हैं। [ पाणिनीय व्याकरणके अनुसार श्वन, युवन् और मघवन् शब्दोंके रूप भी एक-सरीखे होते हैं]॥ ४॥
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ॥ ३०२॥
bharatu janaku munijana saciva sādhu saceta bihāi|
lāgi devamāyā sabahi jathājogu janu pāi|| 302||
Meaning भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु-संतोंको छोड़कर अन्य सभीपर जिस मनुष्यको जिस योग्य (जिस प्रकृति और जिस स्थितिका) पाया, उसपर वैसे ही देवमाया लग गयी॥ ३०२॥
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥
kṛpāsiṃdhu lakhi loga dukhāre| nija saneham̐ surapati chala bhāre||
sabhā rāu gura mahisura maṃtrī| bharata bhagati saba kai mati jaṃtrī||
Meaning कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने लोगोंको अपने स्तरेह और देवराज इन्द्रके भारी छलसे दुखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभीकी बुद्धिको भरतजीकी भक्तिने कील दिया॥ १॥
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥
rāmahi citavata citra likhe se| sakucata bolata bacana sikhe se||
bharata prīti nati binaya baṛāī| sunata sukhada baranata kaṭhināī||
Meaning सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजीकी प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुननेमें सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करनेमें कठिनता है॥ २॥
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥
jāsu biloki bhagati lavalesū| prema magana munigana mithilesū||
mahimā tāsu kahai kimi tulasī| bhagati subhāyam̐ sumati hiyam̐ hulasī||
Meaning जिनकी भक्तिका लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्र हो गये, उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे ? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [कविके] हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है)॥ ३॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥
āpu choṭi mahimā baṛi jānī| kabikula kāni māni sakucānī||
kahi na sakati guna ruci adhikāī| mati gati bāla bacana kī nāī||
Meaning परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी मर्यादाको मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुर्णोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धिकी गति बालकके वचनोंकी तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी) !॥ ४॥
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥ ३०३॥
bharata bimala jasu bimala bidhu sumati cakorakumāri|
udita bimala jana hṛdaya nabha ekaṭaka rahī nihāri|| 303||
Meaning भरतजीका निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कविकी सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तोंके हदयरूपी निर्मल आकाशमें उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [तब उसका वर्णन कौन करे ?]॥ ३०३॥
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥
कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥
bharata subhāu na sugama nigamahūm̐| laghu mati cāpalatā kabi chamahūm̐||
kahata sunata sati bhāu bharata ko| sīya rāma pada hoi na rata ko||
Meaning भरतजीके स्वभावका वर्णन वेदोंके लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धिकी चल्नलताको कविलोग क्षमा करें ! भरतजीके सद्धावको कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजीके चरणोंमें अनुरक्त न हो जायगा॥ श॥
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को॥
देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥
sumirata bharatahi premu rāma ko| jehi na sulabha tehi sarisa bāma ko||
dekhi dayāla dasā sabahī kī| rāma sujāna jāni jana jī kī||
Meaning भरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त ( भरतजी) के हृदयकी स्थिति जानकर,॥ २॥
धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥
देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥
dharama dhurīna dhīra naya nāgara| satya saneha sīla sukha sāgara||
desu kāla lakhi samau samājū| nīti prīti pālaka raghurājū||
Meaning धर्मधुरन्धर, धीर, नीतिमें चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुखके समुद्र; नीति और प्रीतिके पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाजको देखकर,॥ ३॥
बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥
bole bacana bāni sarabasu se| hita parināma sunata sasi rasu se||
tāta bharata tumha dharama dhurīnā| loka beda bida prema prabīnā||
Meaning [ तदनुसार] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीके सर्वस्व ही थे, परिणाममें हितकारी थे और सुननेमें चन्द्रमाके रस (अमृत )-सरीखे थे। [उन्होंने कहा--.] हे तात भरत! तुम धर्मको धुरीको धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनोंके जाननेवाले और प्रेममें प्रवीण हो॥ ४॥
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात॥ ३०४॥
karama bacana mānasa bimala tumha samāna tumha tāta|
gura samāja laghu baṃdhu guna kusamayam̐ kimi kahi jāta|| 304||
Meaning हे तात! कर्मसे, वचनसे और मनसे निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो। गुरुजनोंके समाजमें और ऐसे कुसमयमें छोटे भाईके गुण किस तरह कहे जा सकते हैं ?॥ ३०४॥
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥
समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥
jānahu tāta tarani kula rītī| satyasaṃdha pitu kīrati prītī||
samau samāju lāja gurujana kī| udāsīna hita anahita mana kī||
Meaning हे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीर्ति और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा (मर्यादा) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो॥ १॥
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥
tumhahi bidita sabahī kara karamū| āpana mora parama hita dharamū|
mohi saba bhām̐ti bharosa tumhārā| tadapi kahaum̐ avasara anusārā||
Meaning तुमको सबके कर्मों (कर्तव्यों) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकारसे भरोसा है, तथापि मैं समयके अनुसार कुछ कहता हूँ॥ २॥
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी॥
नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥
tāta tāta binu bāta hamārī| kevala gurukula kṛpām̐ sam̐bhārī||
nataru prajā parijana parivārū| hamahi sahita sabu hota khuārū||
Meaning हे तात! पिताजीके बिना (उनकी अनुपस्थितिमें) हमारी बात केवल गुरुवंशकी कृपाने ही सम्हाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते॥ ३॥
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥
jauṃ binu avasara athavam̐ dinesū| jaga kehi kahahu na hoi kalesū||
tasa utapātu tāta bidhi kīnhā| muni mithilesa rākhi sabu līnhā||
Meaning यदि बिना समयके (संध्यासे पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत्में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकारका उत्पात विधाताने यह (पिताकी असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराजने तथा मिथिलेश्वरने सबको बचा लिया॥ ४॥
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम॥ ३०५॥
rāja kāja saba lāja pati dharama dharani dhana dhāma|
gura prabhāu pālihi sabahi bhala hoihi parināma|| 305||
Meaning राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर--इन सभीका पालन (रक्षण) गुरुजीका प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा॥ ३०५॥
सहित समाज तुम्हार हमारा।
घर बन गुर प्रसाद रखवारा मातु पिता गुर स्वामि निदेसू।
सकल धरम धरनीधर सेसू॥
sahita samāja tumhāra hamārā| ghara bana gura prasāda rakhavārā mātu pitā gura svāmi nidesū| sakala dharama dharanīdhara sesū||
Meaning गुरुजीका प्रसाद ( अनुग्रह) ही घरमें और वनमें समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामीकी आज्ञा [का पालन] समस्त धर्मरूपी पृथ्वीको धारण करनेमें शेषजीके समान है॥ १॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।
साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥
so tumha karahu karāvahu mohū| tāta taranikula pālaka hohū|
sādhaka eka sakala sidhi denī| kīrati sugati bhūtimaya benī||
Meaning हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुलके रक्षक बनो। साधकके लिये यह एक ही (आज्ञापालनरूपी साधना) सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है॥ २॥
सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥
so bicāri sahi saṃkaṭu bhārī| karahu prajā parivāru sukhārī||
bām̐ṭī bipati sabahiṃ mohi bhāī| tumhahi avadhi bhari baṛi kaṭhināī||
Meaning इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवारको सुखी करो। हे भाई! मेरी विपत्ति सभीने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि (चौदह वर्ष) -तक बड़ी कठिनाई है (सबसे अधिक दुःख है)॥ ३॥