जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥
तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥
jāsu gyānu rabi bhava nisi nāsā| bacana kirana muni kamala bikāsā||
tehi ki moha mamatā niarāī| yaha siya rāma saneha baṛāī||
Meaning जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं ? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [अर्थात् राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता]॥ १॥
बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥
राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू
biṣaī sādhaka siddha sayāne| tribidha jīva jaga beda bakhāne||
rāma saneha sarasa mana jāsū| sādhu sabhām̐ baṛa ādara tāsū
Meaning विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष--जगतमें ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं। इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस (सराबोर) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है॥ २॥
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए॥
soha na rāma pema binu gyānū| karanadhāra binu jimi jalajānū||
muni bahubidhi bidehu samujhāe| rāmaghāṭa saba loga nahāe||
Meaning श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज। वसिष्टजीने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकारसे समझाया। तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया॥ ३॥
सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥
sakala soka saṃkula nara nārī| so bāsaru bīteu binu bārī||
pasu khaga mṛganha na kīnha ahārū| priya parijana kara kauna bicārū||
Meaning स्त्री-पुरुष सब शोकसे पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जलके बीत गया ( भोजनकी बात तो दूर रही, किसीने जलतक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनोंतकने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियोंका तो विचार ही क्या किया जाय?॥ ४॥
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥ २७७॥
dou samāja nimirāju raghurāju nahāne prāta|
baiṭhe saba baṭa biṭapa tara mana malīna kṛsa gāta|| 277||
Meaning निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे ख्रान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं॥ २७७॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥
हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥
je mahisura dasaratha pura bāsī| je mithilāpati nagara nivāsī||
haṃsa baṃsa gura janaka purodhā| jinha jaga magu paramārathu sodhā||
Meaning जो दशरथजीकी नगरी अयोध्याके रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजीके नगर जनकपुरके रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजीके पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदयका मार्ग तथा परमार्थका मार्ग छान डाला था,॥ १॥
लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका॥
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं॥
lage kahana upadesa anekā| sahita dharama naya birati bibekā||
kausika kahi kahi kathā purānīṃ| samujhāī saba sabhā subānīṃ||
Meaning वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे। विश्वामित्रजीने पुरानी कथाएँ (इतिहास) कह-कहकर सारी सभाको सुन्दर वाणीसे समझाया॥ २॥
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥
taba raghunātha kosikahi kaheū| nātha kāli jala binu sabu raheū||
muni kaha ucita kahata raghurāī| gayau bīti dina pahara aṛhāī||
Meaning तब श्रीरघुनाथजीने विश्वामित्रजीसे कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [अब कुछ आहार करना चाहिये]। विश्वामित्रजीने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [आज भी] बीत गया॥ ३॥
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥
कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना॥
riṣi rukha lakhi kaha terahutirājū| ihām̐ ucita nahiṃ asana anājū||
kahā bhūpa bhala sabahi sohānā| pāi rajāyasu cale nahānā||
Meaning विश्वामित्रजीका रुख देखकर तिरहुतराज जनकजीने कहा--यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है। राजाका सुन्दर कथन सबके मनको अच्छा लगा। सब आज्ञा पाकर नहाने चले॥ ४॥
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार॥ २७८॥
tehi avasara phala phūla dala mūla aneka prakāra|
lai āe banacara bipula bhari bhari kām̐vari bhāra|| 278||
Meaning उसी समय अनेकों प्रकारके बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझोंमें भर- भरकर वनवासी (कोल-किरात) लोग ले आये॥ २७८॥
कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥
सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा॥
kāmada me giri rāma prasādā| avalokata apaharata biṣādā||
sara saritā bana bhūmi bibhāgā| janu umagata ānam̐da anurāgā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे देखनेमात्रसे ही दुःखोंको सर्वथा हर लेते थे। वहँके तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वीके सभी भागों में मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है॥ १॥
बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला॥
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥
beli biṭapa saba saphala saphūlā| bolata khaga mṛga ali anukūlā||
tehi avasara bana adhika uchāhū| tribidha samīra sukhada saba kāhū||
Meaning बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलोंसे युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भौंरे अनुकूल बोलने लगे। उस अवसरपर वनमें बहुत उत्साह (आनन्द) था, सब किसीको सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी॥ २॥
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥
तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥
दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥
jāi na barani manoharatāī| janu mahi karati janaka pahunāī||
taba saba loga nahāi nahāī| rāma janaka muni āyasu pāī||
dekhi dekhi tarubara anurāge| jaham̐ taham̐ purajana utarana lāge||
dala phala mūla kaṃda bidhi nānā| pāvana suṃdara sudhā samānā||
Meaning वनकी मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजीकी पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनिकी आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षोंको देख-देखकर प्रेममें भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृतके समान [स्वादिष्ट] अनेकों प्रकारके पत्ते, फल, मूल और कन्द--॥ डे॥
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥ २७९॥
sādara saba kaham̐ rāmagura paṭhae bhari bhari bhāra|
pūji pitara sura atithi gura lage karana pharahāra|| 279||
Meaning श्रीरामजीके गुरु वसिष्टजीने सबके पास बोझे भर-भरकर आदरपूर्वक भेजे। तब वे पितर-देवता, अतिथि और गुरुकी पूजा करके फलाहार करने लगे॥ २७९॥
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥
ehi bidhi bāsara bīte cārī| rāmu nirakhi nara nāri sukhārī||
duhu samāja asi ruci mana māhīṃ| binu siya rāma phiraba bhala nāhīṃ||
Meaning इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजोंके मनमें ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजीके बिना लौटना अच्छा नहीं है॥ १॥
सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥
परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥
sītā rāma saṃga banabāsū| koṭi amarapura sarisa supāsū||
parihari lakhana rāmu baidehī| jehi gharu bhāva bāma bidhi tehī||
Meaning श्रीसीतारामजीके साथ वनमें रहना करोड़ों देवलोकोंके [निवासके] समान सुखदायक है। श्रीलक््मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजीको छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं॥ २॥
दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥
dāhina daiu hoi jaba sabahī| rāma samīpa basia bana tabahī||
maṃdākini majjanu tihu kālā| rāma darasu muda maṃgala mālā||
Meaning जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजीके पास वनमें निवास हो सकता है। मन्दाकिनीजीका तीनों समय स्रान और आनन्द तथा मज़लोंकी माला (समूह) रूप श्रीरामका दर्शन,॥ ३॥
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥
सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥
aṭanu rāma giri bana tāpasa thala| asanu amia sama kaṃda mūla phala||
sukha sameta saṃbata dui sātā| pala sama hohiṃ na janiahiṃ jātā||
Meaning श्रीरामजीके पर्वत (कामदनाथ), वन और तपस्वियोंके स्थानोंमें घूमना और अमृतके समान कन्द, मूल, फलोंका भोजन। चौदह वर्ष सुखके साथ पलके समान हो जायूँगे (बीत जायँगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे॥ ४॥
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥ २८०॥
ehi sukha joga na loga saba kahahiṃ kahām̐ asa bhāgu|
sahaja subhāyam̐ samāja duhu rāma carana anurāgu|| 280||
Meaning सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुखके योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ ? दोनों समाजोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सहज स्वभावसे ही प्रेम है॥ २८०॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥
सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥
ehi bidhi sakala manoratha karahīṃ| bacana saprema sunata mana harahīṃ||
sīya mātu tehi samaya paṭhāīṃ| dāsīṃ dekhi suavasaru āīṃ||
Meaning इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [सुननेवालोंके] मनोंको हर लेते हैं। उसी समय सीताजीकी माता श्रीसुनयनाजीकी भेजी हुई दासियाँ [ कौसल्याजी आदिके मिलनेका] सुन्दर अवसर देखकर आयीं॥ १॥
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥
कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥
sāvakāsa suni saba siya sāsū| āyau janakarāja ranivāsū||
kausalyām̐ sādara sanamānī| āsana die samaya sama ānī||
Meaning उनसे यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ इस समय फुरसतमें हैं, जनकराजका रनिवास उनसे मिलने आया। कौसल्याजीने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये॥ २॥
सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥
sīlu saneha sakala duhu orā| dravahiṃ dekhi suni kulisa kaṭhorā||
pulaka sithila tana bāri bilocana| mahi nakha likhana lagīṃ saba socana||
Meaning दोनों ओर सबके शील और प्रेमको देखकर और सुनकर कठोर व्र भी पिघल जाते हैं। शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रोंगें [शोक और प्रेमके] आँसू हैं। सब अपने [ पैरोंके] नखोंसे जमीन कुरेदने और सोचने लगीं॥ ३॥
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥
saba siya rāma prīti ki si mūratī| janu karunā bahu beṣa bisūrati||
sīya mātu kaha bidhi budhi bām̐kī| jo paya phenu phora pabi ṭām̐kī||
Meaning सभी श्रीसीतारामजीके प्रेमकी मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष (रूप) धारण करके विसूर रही हो (दुःख कर रही हो)। सीताजीकी माता सुनयनाजीने कहा--विधाताकी बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूधके फेन-जैसी कोमल वस्तुको वज्रकी टाँकीसे फोड़ रहा है (अर्थात् जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उनपर विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है)॥ ४॥
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥ २८१॥
sunia sudhā dekhiahiṃ garala saba karatūti karāla|
jaham̐ taham̐ kāka ulūka baka mānasa sakṛta marāla|| 281||
Meaning अमृत केवल सुननेमें आता है और विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। विधाताकी सभी करतूतें भयड्र हैं। जहाँ-तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [दिखायी देते] हैं; हंस तो एक मानसरोवरमें ही है॥ २८१॥
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी॥
suni sasoca kaha debi sumitrā| bidhi gati baṛi biparīta bicitrā||
jo sṛji pālai harai bahorī| bāla keli sama bidhi mati bhorī||
Meaning यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोकके साथ कहने लगीं--विधाताकी चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टिको उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है। विधाताकी बुद्धि बालकोंके खेलके समान भोली (विवेकशून्य) है॥ १॥
कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥
कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥
kausalyā kaha dosu na kāhū| karama bibasa dukha sukha chati lāhū||
kaṭhina karama gati jāna bidhātā| jo subha asubha sakala phala dātā||
Meaning कौसल्याजीने कहा--किसीका दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं। कर्मकी गति कठिन (दुर्विज्ञेय) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलोंका देनेवाला है॥ २॥
ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥
देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥
īsa rajāi sīsa sabahī keṃ| utapati thiti laya biṣahu amī keṃ||
debi moha basa socia bādī| bidhi prapaṃcu asa acala anādī||
Meaning ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है (ये सब भी उसीके अधीन हैं)। हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है। विधाताका प्रपश्न ऐसा ही अचल और अनादि है॥ ३॥
भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥
सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥
bhūpati jiaba maraba ura ānī| socia sakhi lakhi nija hita hānī||
sīya mātu kaha satya subānī| sukṛtī avadhi avadhapati rānī||
Meaning महाराजके मरने और जीनेकी बातको हदयमें याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी ! हम अपने ही हितकी हानि देखकर (स्वार्थवश ) करती हैं। सीताजीकी माताने कहा--आपका कथन उत्तम और सत्य है। आप पुण्यात्माओंके सीमारूप अवधपति (महाराज दशरथजी) की ही तो रानी हैं। [फिर, भला ऐसा क्यों न कहेंगी]॥ ४॥
लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥ २८२॥
lakhanu rāma siya jāhum̐ bana bhala parināma na pocu|
gahabari hiyam̐ kaha kausilā mohi bharata kara socu|| 282||
Meaning कौसल्याजीने दु:खभरे हृदयसे कहा--श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जाये, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरतकी चिन्ता है॥ २८२॥
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥
īsa prasāda asīsa tumhārī| suta sutabadhū devasari bārī||
rāma sapatha maiṃ kīnha na kāū| so kari kahaum̐ sakhī sati bhāū||
Meaning ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ गज़ाजीके जलके समान पतित्र हैं। हे सखी ! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ॥ १॥
भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥
कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥
bharata sīla guna binaya baṛāī| bhāyapa bhagati bharosa bhalāī||
kahata sāradahu kara mati hīce| sāgara sīpa ki jāhiṃ ulīce||
Meaning भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करनेमें सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है। सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं 2?॥२॥
जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥
jānaum̐ sadā bharata kuladīpā| bāra bāra mohi kaheu mahīpā||
kaseṃ kanaku mani pārikhi pāem̐| puruṣa parikhiahiṃ samayam̐ subhāem̐||
Meaning मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ। महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटीपर कसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है॥ ३॥
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥
anucita āju kahaba asa morā| soka saneham̐ sayānapa thorā||
suni surasari sama pāvani bānī| bhaīṃ saneha bikala saba rānī||
Meaning किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्त्रेहमें सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्रेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजीकी गड़ाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ ख्रेहके मारे विकल हो उठीं॥ ४॥
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥ २८३॥
kausalyā kaha dhīra dhari sunahu debi mithilesi|
ko bibekanidhi ballabhahi tumhahi sakai upadesi|| 283||
Meaning कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा-*हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है ?॥ २८३॥
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥
rāni rāya sana avasaru pāī| apanī bhām̐ti kahaba samujhāī||
rakhiahiṃ lakhanu bharatu gabanahiṃ bana| jauṃ yaha mata mānai mahīpa mana||
Meaning हे रानी! मौका पाकर आप राजाको अपनी ओरसे जहाँतक हो सके समझाकर कहियेगा कि लक्ष्मणको घर रख लिया जाय और भरत वनको जायँ। यदि यह राय राजाके मनमें [ठीक] जँच जाय,॥ १॥
तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी॥
गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥
tau bhala jatanu karaba subicārī| moreṃ saucu bharata kara bhārī||
gūṛha saneha bharata mana māhī| raheṃ nīka mohi lāgata nāhīṃ||
Meaning तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्र करें। मुझे भरतका अत्यधिक सोच है। भरतके मनमें गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहनेमें मुझे भलाई नहीं जान पड़ती (यह डर लगता है कि उनके प्राणोंको कोई भय न हो जाय)॥ २॥
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥
lakhi subhāu suni sarala subānī| saba bhai magana karuna rasa rānī||
nabha prasūna jhari dhanya dhanya dhuni| sithila saneham̐ siddha jogī muni||
Meaning कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणीको सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें निमय्र हो गयीं। आकाशसे पुष्पवर्षाकी झड़ी लग गयी और धन्य-धन्यकी ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि सख्रेहसे शिथिल हो गये॥ ३॥
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती॥
sabu ranivāsu bithaki lakhi raheū| taba dhari dhīra sumitrām̐ kaheū||
debi daṃḍa juga jāmini bītī| rāma mātu sunī uṭhī saprītī||
Meaning सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजीने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं॥ ४॥
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय॥ २८४॥
begi pāu dhāria thalahi kaha saneham̐ satibhāya|
hamareṃ tau aba īsa gati ke mithilesa sahāya|| 284||
Meaning और प्रेमसहित सद्धावसे बोलीं--अब आप शीघ्र डेरको पधारिये। हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं॥ २८४॥
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥
lakhi saneha suni bacana binītā| janakapriyā gaha pāya punītā||
debi ucita asi binaya tumhārī| dasaratha gharini rāma mahatārī||
Meaning कौसल्याजीके प्रेमको देखकर और उनके विनम्र वचनोंको सुनकर जनकजीकी प्रिय पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा--हे देवि! आप राजा दशरथजीकी रानी और श्रीरामजीकी माता हैं। आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है॥ १॥
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥
सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥
prabhu apane nīcahu ādarahīṃ| agini dhūma giri sira tinu dharahīṃ||
sevaku rāu karama mana bānī| sadā sahāya mahesu bhavānī||
Meaning प्रभु अपने नीच जनोंका भी आदर करते हैं। अग्ि धुएँको और पर्वत तृण (घास) को अपने सिरपर धारण करते हैं। हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणीसे आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव-पार्वतीजी हैं॥ २॥
रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै॥
रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥
raure aṃga jogu jaga ko hai| dīpa sahāya ki dinakara sohai||
rāmu jāi banu kari sura kājū| acala avadhapura karihahiṃ rājū||
Meaning आपका सहायक होने योग्य जगत्में कौन है ? दीपक सूर्यकी सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचन्द्रजी वनमें जाकर देवताओंका कार्य करके अवधपुरीमें अचल राज्य करेंगे॥ ३॥
अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल॥
यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥
amara nāga nara rāma bāhubala| sukha basihahiṃ apaneṃ apane thala||
yaha saba jāgabalika kahi rākhā| debi na hoi mudhā muni bhāṣā||
Meaning देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलपर अपने-अपने स्थानों (लोकों ) में सुखपूर्वक बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनिने पहलेहीसे कह रखा है। हे देवि! मुनिका कथन व्यर्थ (झूठा) नहीं हो सकता॥ ४॥
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥ २८५॥
asa kahi paga pari pema ati siya hita binaya sunāi|
siya sameta siyamātu taba calī suāyasu pāi|| 285||
Meaning ऐसा कहकर बड़े प्रेमसे पैरों पड़कर सीताजी [को साथ भेजने] के लिये विनती करके और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजीसमेत सीताजीकी माता डेरेको चलीं॥ २८५॥
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥
तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥
priya parijanahi milī baidehī| jo jehi jogu bhām̐ti tehi tehī||
tāpasa beṣa jānakī dekhī| bhā sabu bikala biṣāda biseṣī||
Meaning जानकीजी अपने प्यारे कुठुम्बियोंसे--जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजीको तपस्विनीके वेषमें देखकर सभी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १॥
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की॥
janaka rāma gura āyasu pāī| cale thalahi siya dekhī āī||
līnhi lāi ura janaka jānakī| pāhuna pāvana pema prāna kī||
Meaning जनकजी श्रीरामजीके गुरु वसिष्टजीकी आज्ञा पाकर डेरेको चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा। जनकजीने अपने पवित्र प्रेम और प्राणोंकी पाहुनी जानकीजीको हृदयसे लगा लिया॥ २॥
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥
ura umageu aṃbudhi anurāgū| bhayau bhūpa manu manahum̐ payāgū||
siya saneha baṭu bāṛhata johā| tā para rāma pema sisu sohā||
Meaning उनके हृदयमें [वात्सल्य] प्रेमका समुद्र उमड़ पड़ा। राजाका मन मानो प्रयाग हो गया। उस समुद्रके अंदर उन्होंने [आदिशक्ति] सीताजीके [अलौकिक] स्तरेहरूपी अक्षयवटको बढ़ते हुए देखा। उस (सीताजीके प्रेमरूपी वट) पर श्रीरामजीका प्रेमरूपी बालक (बालरूपधारी भगवान्) सुशोभित हो रहा है॥ ३॥
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥
मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥
cirajīvī muni gyāna bikala janu| būṛata laheu bāla avalaṃbanu||
moha magana mati nahiṃ bideha kī| mahimā siya raghubara saneha kī||
Meaning जनकजीका ज्ञानरूपी चिरंजीवी (मार्कण्डेय) मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया। वस्तुत: [ज्ञानिशिरोमणि] विदेहराजकी बुद्धि मोहमें मगर नहीं है। यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानीके ज्ञाको भी विकल कर दिया]॥ ४॥
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥ २८६॥
siya pitu mātu saneha basa bikala na sakī sam̐bhāri|
dharanisutām̐ dhīraju dhareu samau sudharamu bicāri|| 286||
Meaning पिता-माताके प्रेमके मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपनेको सँभाल न सकीं। [ परन्तु परम धैर्यवती] पृथ्वीकी कन्या सीताजीने समय और सुन्दर धर्मका विचार कर धैर्य धारण किया॥ २८६॥
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥
पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥
tāpasa beṣa janaka siya dekhī| bhayau pemu paritoṣu biseṣī||
putri pavitra kie kula doū| sujasa dhavala jagu kaha sabu koū||
Meaning सीताजीको तपस्विनी-वेषमें देखकर जनकजीको विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ। [उन्होंने कहा--. बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यशसे सारा जगत् उज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं॥ १॥
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥
jiti surasari kīrati sari torī| gavanu kīnha bidhi aṃḍa karorī||
gaṃga avani thala tīni baṛere| ehiṃ kie sādhu samāja ghanere||
Meaning तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गड़्ाजीको भी जीतकर [ जो एक ही ब्रह्माण्डमें बहती है] करोड़ों ब्रह्माण्डोंगें बह चली है। गड़्ाजीने तो पृथ्वीपर तीन ही स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज और गड़ासागर) को बड़ा (तीर्थ) बनाया है। पर तेरी इस काीर्तिनदीने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिये हैं॥ २॥
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥
pitu kaha satya saneham̐ subānī| sīya sakuca mahum̐ manahum̐ samānī||
puni pitu mātu līnha ura lāī| sikha āsiṣa hita dīnhi suhāī||
Meaning पिता जनकजीने तो स्त्रेहसे सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोचमें समा गयीं। पिता-माताने उन्हें फिर हदयसे लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशिष दी॥ ३॥
कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥
लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥
kahati na sīya sakuci mana māhīṃ| ihām̐ basaba rajanīṃ bhala nāhīṃ||
lakhi rukha rāni janāyau rāū| hṛdayam̐ sarāhata sīlu subhāū||
Meaning सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मनमें सकुचा रही हैं कि रातमें [ सासुओंकी सेवा छोड़कर] यहाँ रहना अच्छा नहीं है। रानी सुनयनाजीने जानकीजीका रुख देखकर (उनके मनकी बात समझकर) राजा जनकजीको जना दिया। तब दोनों अपने हृदयोंमें सीताजीके शील और स्वभावकी सराहना करने लगे॥ ४॥
बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥ २८७॥
bāra bāra mili bheṃṭa siya bidā kīnha sanamāni|
kahī samaya sira bharata gati rāni subāni sayāni|| 287||
Meaning राजा-रानीने बार-बार मिलकर और हदयसे लगाकर तथा सम्मान करके सीताजीको विदा किया। चतुर रानीने समय पाकर राजासे सुन्दर वाणीमें भरतजीकी दशाका वर्णन किया॥ २८७॥
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥
मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥
suni bhūpāla bharata byavahārū| sona sugaṃdha sudhā sasi sārū||
mūde sajala nayana pulake tana| sujasu sarāhana lage mudita mana||
Meaning सोनेमें सुगंध और [समुद्रसे निकली हुई] सुधामें चन्द्रमाके सार अमृतके समान भरतजीका व्यवहार सुनकर राजाने [प्रेमविह्लल होकर] अपने [प्रेमाश्रुओंके] जलसे भरे नेत्रोंको मूँद लिया (वे भरतजीके प्रेममें मानो ध्यानस्थ हो गये)। वे शरीरसे पुलकित हो गये और मनमें आनन्दित होकर भरतजीके सुन्दर यशकी सराहना करने लगे॥ १॥
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥
sāvadhāna sunu sumukhi sulocani| bharata kathā bhava baṃdha bimocani||
dharama rājanaya brahmabicārū| ihām̐ jathāmati mora pracārū||
Meaning [वे बोले- हे सुमुखि ! हे सुनयनी ! सावधान होकर सुनो। भरतजीकी कथा संसारके बन्धनसे छुड़ानेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रहमविचार--इन तीनों विषयोंमें अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी [ थोड़ी-बहुत] गति है (अर्थात् इनके सम्बन्धमें मैं कुछ जानता हूँ)॥ २॥
सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥
so mati mori bharata mahimāhī| kahai kāha chali chuati na chām̐hī||
bidhi ganapati ahipati siva sārada| kabi kobida budha buddhi bisārada||
Meaning वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश रखनेवाली) मेरी बुद्धि भरतजीकी महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छायातकको नहीं छू. पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमानू--॥ ३॥
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥
bharata carita kīrati karatūtī| dharama sīla guna bimala bibhūtī||
samujhata sunata sukhada saba kāhū| suci surasari ruci nidara sudhāhū||
Meaning सब किसीको भरतजीके चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझनेमें और सुननेमें सुख देनेवाले हैं और पवित्रतामें गड़ाजीका तथा स्वाद (मधुरता) में अमृतका भी तिरस्कार करनेवाले हैं॥ ४॥
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥ २८८॥
niravadhi guna nirupama puruṣu bharatu bharata sama jāni|
kahia sumeru ki sera sama kabikula mati sakucāni|| 288||
Meaning भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजीके समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वतको क्या सेरके बराबर कह सकते हैं ? इसलिये (उन्हें किसी पुरुषके साथ उपमा देनेमें) कविसमाजकी बुद्धि भी सकुचा गयी !॥ २८८॥
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥
agama sabahi baranata barabaranī| jimi jalahīna mīna gamu dharanī||
bharata amita mahimā sunu rānī| jānahiṃ rāmu na sakahiṃ bakhānī||
Meaning हे श्रेष्ठ वर्णवाली ! भरतजीकी महिमाका वर्णन करना सभीके लिये वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वीपर मछलीका चलना। हे रानी! सुनो, भरतजीकी अपरिमित महिमाको एक श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते॥ १॥
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥
barani saprema bharata anubhāū| tiya jiya kī ruci lakhi kaha rāū||
bahurahiṃ lakhanu bharatu bana jāhīṃ| saba kara bhala saba ke mana māhīṃ||
Meaning इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजीके प्रभावका वर्णन करके, फिर पत्नीके मनकी रुचि जानकर राजाने कहा-- लक्ष्मणजी लौट जायँ और भरतजी वनको जायेँ, इसमें सभीका भला है और यही सबके मनमें है॥ २॥
देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥
भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की॥
debi paraṃtu bharata raghubara kī| prīti pratīti jāi nahiṃ tarakī||
bharatu avadhi saneha mamatā kī| jadyapi rāmu sīma samatā kī||
Meaning परन्तु हे देवि ! भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका प्रेम और एक-दूसरेपर विश्वास, बुद्धि और विचारकी सीमामें नहीं आ सकता। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समताकी सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममताकी सीमा हैं॥ ३॥
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्ध राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥
paramāratha svāratha sukha sāre| bharata na sapanehum̐ manahum̐ nihāre||
sādhana siddha rāma paga nehū| mohi lakhi parata bharata mata ehū||
Meaning [ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनन्य प्रेमको छोड़कर] भरतजीने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखोंकी ओर स्वप्रमें भी मनसे भी नहीं ताका है। श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजीका बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है॥ ४॥
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥ २८९॥
bhorehum̐ bharata na pelihahiṃ manasahum̐ rāma rajāi|
karia na socu saneha basa kaheu bhūpa bilakhāi|| 289||
Meaning राजाने बिलखकर ( प्रेमसे गदद होकर) कहा--भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे। अत: सख्रेहके वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ २८९॥
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥
राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥
rāma bharata guna ganata saprītī| nisi daṃpatihi palaka sama bītī||
rāja samāja prāta juga jāge| nhāi nhāi sura pūjana lāge||
Meaning श्रीरामजी और भरतजीके गुणोंकी प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति-पत्नीको रात पलकके समान बीत गयी। प्रात:काल दोनों राजसमाज जागे और नहा-नहाकर देवताओंकी पूजा करने लगे॥ १॥
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई॥
नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥
ge nahāi gura pahīṃ raghurāī| baṃdi carana bole rukha pāī||
nātha bharatu purajana mahatārī| soka bikala banabāsa dukhārī||
Meaning श्रीरघुनाथजी स्रान करके गुरु वसिष्ठतजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले--हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं॥ २॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा॥
sahita samāja rāu mithilesū| bahuta divasa bhae sahata kalesū||
ucita hoi soi kījia nāthā| hita sabahī kara raureṃ hāthā||
Meaning मिधथिलापति राजा जनकजीको भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये। इसलिये हे नाथ! जो उचित हो वही कीजिये। आपहीके हाथ सभीका हित है॥ ३॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥
asa kahi ati sakuce raghurāū| muni pulake lakhi sīlu subhāū||
tumha binu rāma sakala sukha sājā| naraka sarisa duhu rāja samājā||
Meaning ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [प्रेम और आनन्दसे] मुनि वसिष्टतजी पुलकित हो गये। [उन्होंने खुलकर कहा-] हे राम! तुम्हारे बिना [घर-बार आदि] सम्पूर्ण सुखोंके साज दोनों राजसमाजोंको नरकके समान हैं॥ ४॥
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम॥ २९०॥
prāna prāna ke jīva ke jiva sukha ke sukha rāma|
tumha taji tāta sohāta gṛha jinhahi tinhahiṃ bidhi bāma|| 290||
Meaning हे राम! तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माके भी आत्मा और सुखके भी सुख हो। हे तात! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है॥ २९०॥
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥
so sukhu karamu dharamu jari jāū| jaham̐ na rāma pada paṃkaja bhāū||
jogu kujogu gyānu agyānū| jaham̐ nahiṃ rāma pema paradhānū||
Meaning जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय। जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है॥ १॥
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥
राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥
tumha binu dukhī sukhī tumha tehīṃ| tumha jānahu jiya jo jehi kehīṃ||
rāura āyasu sira sabahī keṃ| bidita kṛpālahi gati saba nīkeṃ||
Meaning तुम्हारे बिना ही सब दुखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हींसे सुखी हैं। जिस किसीके जीमें जो कुछ है तुम सब जानते हो। आपकी आज्ञा सभीके सिरपर है। कृपालु (आप) को सभीकी स्थिति अच्छी तरह मालूम है॥ २॥
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥
āpu āśramahi dhāria pāū| bhayau saneha sithila munirāū||
kari pranāma taba rāmu sidhāe| riṣi dhari dhīra janaka pahiṃ āe||
Meaning अत: आप आश्रमको पधारिये। इतना कह मुनिराज स्तरेहसे शिथिल हो गये। तब श्रीरामजी प्रणाम करके चले गये और ऋषि वसिष्टजी धीरज धरकर जनकजीके पास आये॥ ३॥
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए॥
महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥
rāma bacana guru nṛpahi sunāe| sīla saneha subhāyam̐ suhāe||
mahārāja aba kījia soī| saba kara dharama sahita hita hoī||
Meaning गुरुजीने श्रीरामचन्द्रजीके शील और स्त्रेहसे युक्त स्वभावसे ही सुन्दर वचन राजा जनकजीको सुनाये [और कहा--] हे महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्मसहित हित हो॥ ४॥
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥ २९१४॥
gyāna nidhāna sujāna suci dharama dhīra narapāla|
tumha binu asamaṃjasa samana ko samaratha ehi kāla|| 2914||
Meaning हे राजन् ! तुम ज्ञानके भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्ममें धीर हो। इस समय तुम्हारे बिना इस दुविधाको दूर करनेमें और कौन समर्थ है ?॥ २९१॥
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही॥
suni muni bacana janaka anurāge| lakhi gati gyānu birāgu birāge||
sithila saneham̐ gunata mana māhīṃ| āe ihām̐ kīnha bhala nāhī||
Meaning मुनि वसिष्टजीके वचन सुनकर जनकजी प्रेममें मग्र हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्यको भी वैराग्य हो गया (अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये)। वे प्रेमसे शिथिल हो गये और मनमें विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया॥ १॥
रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥
rāmahi rāyam̐ kaheu bana jānā| kīnha āpu priya prema pravānā||
hama aba bana teṃ banahi paṭhāī| pramudita phiraba bibeka baṛāī||
Meaning राजा दशरथजीने श्रीरामजीको वन जानेके लिये कहा और स्वयं अपने प्रियके प्रेमको प्रमाणित (सच्चा) कर दिया (प्रियवियोगमें प्राण त्याग दिये)। परन्तु हम अब इन्हें वनसे [और गहन] वनको भेजकर अपने विवेककी बड़ाईमें आनन्दित होते हुए लौटेंगे [कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजीको वनमें छोड़कर चले आये, दशरथजीकी तरह मरे नहीं !]॥ २॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥
समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा॥
tāpasa muni mahisura suni dekhī| bhae prema basa bikala biseṣī||
samau samujhi dhari dhīraju rājā| cale bharata pahiṃ sahita samājā||
Meaning तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये। समयका विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजीके पास चले॥ ३॥
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥
bharata āi āgeṃ bhai līnhe| avasara sarisa suāsana dīnhe||
tāta bharata kaha terahuti rāū| tumhahi bidita raghubīra subhāū||
Meaning भरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया (सामने आकर उनका स्वागत किया) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तिरहुतराज जनकजी कहने लगे-हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका स्वभाव मालूम ही है॥ ४॥
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु॥ २९२॥
rāma satyabrata dharama rata saba kara sīlu sanehu|
saṃkaṭa sahata sakoca basa kahia jo āyasu dehu|| 292||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और सख्रेह रखनेवाले हैं। इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय॥ २९२॥
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥
suni tana pulaki nayana bhari bārī| bole bharatu dhīra dhari bhārī||
prabhu priya pūjya pitā sama āpū| kulaguru sama hita māya na bāpū||
Meaning भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रोंगें जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले- हे प्रभो ! आप हमारे पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजीके समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं॥ १॥
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥
सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी॥
kausikādi muni saciva samājū| gyāna aṃbunidhi āpunu ājū||
sisu sevaka āyasu anugāmī| jāni mohi sikha deia svāmī||
Meaning विशधामित्रजी आदि मुनियों और मन्त्रियोंका समाज है। और आजके दिन ज्ञानके समुद्र आप भी उपस्थित हैं। हे स्वामी ! मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये॥ २॥
एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥
ehiṃ samāja thala būjhaba rāura| mauna malina maiṃ bolaba bāura||
choṭe badana kahaum̐ baṛi bātā| chamaba tāta lakhi bāma bidhātā||
Meaning इस समाज और [पुण्य] स्थलमें आप [जैसे ज्ञानी और पूज्य] का पूछना! इसपर यदि मैं मौन रहता हूँ तो मलिन समझा जाऊँगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुँह बड़ी बात कहता हूँ। हे तात! विधाताको प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा॥ ३॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥
āgama nigama prasiddha purānā| sevādharamu kaṭhina jagu jānā||
svāmi dharama svārathahi birodhū| bairu aṃdha premahi na prabodhū||
Meaning वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामिधर्ममें (स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें) और स्वार्थमें विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते)। वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनों में ही भूल होनेका भय है]॥ ४॥
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥ २९३॥
rākhi rāma rukha dharamu bratu parādhīna mohi jāni|
saba keṃ saṃmata sarba hita karia pemu pahicāni|| 293||
Meaning अतएव मुझे पराधीन जानकर (मुझसे न पूछकर) श्रीरामचन्द्रजीके रुख (रुचि), धर्म और [सत्यके] ब्रतको रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी हो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये॥ २९३॥