बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥
bidhi na sakeu sahi mora dulārā| nīca bīcu jananī misa pārā||
yahau kahata mohi āju na sobhā| apanīṃ samujhi sādhu suci ko bhā||
Meaning परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माताके बहाने [ मेरे और स्वामीके बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझसे कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है)॥ १॥
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली॥
mātu maṃdi maiṃ sādhu sucālī| ura asa ānata koṭi kucālī||
pharai ki kodava bāli susālī| mukutā prasava ki saṃbuka kālī||
Meaning माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़ दुराचारोंके समान है। कया कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है?॥ २॥
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥
sapanehum̐ dosaka lesu na kāhū| mora abhāga udadhi avagāhū||
binu samujheṃ nija agha paripākū| jārium̐ jāyam̐ janani kahi kākū||
Meaning स्वप्रमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कट वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया॥ ३॥
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥
hṛdayam̐ heri hāreum̐ saba orā| ekahi bhām̐ti bhalehiṃ bhala morā||
gura gosāim̐ sāhiba siya rāmū| lāgata mohi nīka parināmū||
Meaning मैं अपने हृदयमें सब ओर खोजकर हार गया (मेरी भलाईका कोई साधन नहीं सूझता)। एक ही प्रकार भले ही (निश्चय ही) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसीसे परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है॥ ४॥
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ॥ २६१॥
sādhu sabhā gura prabhu nikaṭa kahaum̐ suthala sati bhāu|
prema prapaṃcu ki jhūṭha phura jānahiṃ muni raghurāu|| 261||
Meaning साधुओंकी सभामें गुरुजी और स्वामीके समीप इस पवित्र तीर्थ-स्थानमें मैं सत्य भावसे कहता हूँ। यह प्रेम है या प्रपश्न (छल-कपट) ? झूठ है या सच? इसे [सर्वज्ञ] मुनि वसिष्टजी और [ अन्तरयमी ] श्रीरघुनाथजी जानते हैं॥ २६१॥
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥
देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी॥
bhūpati marana pema panu rākhī| jananī kumati jagatu sabu sākhī||
dekhi na jāhi bikala mahatārī| jarahiṃ dusaha jara pura nara nārī||
Meaning प्रेमके प्रणको निबाहकर महाराज (पिताजी ) का मरना और माताकी कुबुद्धि, दोनोंका सारा संसार साक्षी है। माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरीके नर-नारी दुःसह तापसे जल रहे हैं॥ १॥
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥
बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥
mahīṃ sakala anaratha kara mūlā| so suni samujhi sahium̐ saba sūlā||
suni bana gavanu kīnha raghunāthā| kari muni beṣa lakhana siya sāthā||
binu pānahinha payādehi pāem̐| saṃkaru sākhi raheum̐ ehi ghāem̐||
bahuri nihāra niṣāda sanehū| kulisa kaṭhina ura bhayau na behū||
Meaning मैं ही इन सारे अनर्थोंका मूल हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब दुःख सहा है। श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ मुनियोंका-सा वेष धारणकर बिना जूते पहने पाँव-प्यादे (पैदल) ही वनको चले गये, यह सुनकर, शड्रजी साक्षी हैं, इस घावसे भी मैं जीता रह गया (यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये) ! फिर निषादराजका प्रेम देखकर भी इस वज्रसे भी कठोर हृदयमें छेद नहीं हुआ (यह फटा नहीं )॥ २-३॥
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥
aba sabu ām̐khinha dekheum̐ āī| jiata jīva jaṛa sabai sahāī||
jinhahi nirakhi maga sām̐pini bīchī| tajahiṃ biṣama biṣu tāmasa tīchī||
Meaning अब यहाँ आकर सब आँखों देख लिया। यह जड़ जीव जीता रहकर सभी सहावेगा। जिनको देखकर रास्तेकी साँपिनी और बीछी भी अपने भयानक विष और तीबत्र क्रोधको त्याग देती हैं॥ ४॥
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि॥ २६२॥
tei raghunaṃdanu lakhanu siya anahita lāge jāhi|
tāsu tanaya taji dusaha dukha daiu sahāvai kāhi|| 262||
Meaning वे ही श्रीरघुनन्दन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयीके पुत्र मुझको छोड़कर दैव दु:सह दुःख और किसे सहावेगा ?॥ २६२॥
सुनि अति बिकल भरत बर बानी।
आरति प्रीति बिनय नय सानी॥
suni ati bikala bharata bara bānī| ārati prīti binaya naya sānī||
सोक मगन सब सभाँ खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥
soka magana saba sabhām̐ khabhārū| manahum̐ kamala bana pareu tusārū||
Meaning अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मगर हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया। मानो कमलके वनपर पाला पड़ गया हो॥ १॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥
बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥
kahi aneka bidhi kathā purānī| bharata prabodhu kīnha muni gyānī||
bole ucita bacana raghunaṃdū| dinakara kula kairava bana caṃdū||
Meaning तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी (ऐतिहासिक) कथाएँ कहकर भरतजीका समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले--॥ २॥
तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥
तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे॥
tāta jām̐ya jiyam̐ karahu galānī| īsa adhīna jīva gati jānī||
tīni kāla tibhuana mata moreṃ| punyasiloka tāta tara tore||
Meaning हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें [ भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं॥ ३॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई।
जाइ लोकु परलोकु नसाई॥
ura ānata tumha para kuṭilāī| jāi loku paraloku nasāī||
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई।
जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥
dosu dehiṃ jananihi jaṛa teī| jinha gura sādhu sabhā nahiṃ seī||
Meaning हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती )। माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है॥ ४॥
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥ २६३॥
miṭihahiṃ pāpa prapaṃca saba akhila amaṃgala bhāra|
loka sujasu paraloka sukhu sumirata nāmu tumhāra|| 263||
Meaning हे भरत! तुम्हारा नाम-स्मरण करते ही सब पाप, प्रप्न (अज्ञान) और समस्त अमज्लोंके समूह मिट जायेँगे तथा इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त होगा॥ २६३॥
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥
तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ॥
kahaum̐ subhāu satya siva sākhī| bharata bhūmi raha rāuri rākhī||
tāta kutaraka karahu jani jāem̐| baira pema nahi durai durāem̐||
Meaning हे भरत! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते॥ १॥
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥
muni gana nikaṭa bihaga mṛga jāhīṃ| bādhaka badhika biloki parāhīṃ||
hita anahita pasu pacchiu jānā| mānuṣa tanu guna gyāna nidhānā||
Meaning पक्षी और पशु मुनियोंके पास [ बेधड़क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकोंको देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है॥ २॥
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥
tāta tumhahi maiṃ jānaum̐ nīkeṃ| karauṃ kāha asamaṃjasa jīkeṃ||
rākheu rāyam̐ satya mohi tyāgī| tanu parihareu pema pana lāgī||
Meaning हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! कया करूँ ? जीमें बड़ा असमझ्जस (दुविधा) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया॥ ३॥
तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥
tāsu bacana meṭata mana socū| tehi teṃ adhika tumhāra sam̐kocū||
tā para gura mohi āyasu dīnhā| avasi jo kahahu cahaum̐ soi kīnhā||
Meaning उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ॥ ४॥
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु॥ २६४॥
manu prasanna kari sakuca taji kahahu karauṃ soi āju|
satyasaṃdha raghubara bacana suni bhā sukhī samāju|| 264||
Meaning तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरीमजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया॥ २६४॥
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥
बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥
sura gana sahita sabhaya surarājū| socahiṃ cāhata hona akājū||
banata upāu karata kachu nāhīṃ| rāma sarana saba ge mana māhīṃ||
Meaning देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये॥ श॥
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥
सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥
bahuri bicāri paraspara kahahīṃ| raghupati bhagata bhagati basa ahahīṃ||
sudhi kari aṃbarīṣa durabāsā| bhe sura surapati nipaṭa nirāsā||
Meaning फिर वे विचार करके आपसभमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये॥ २॥
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥
sahe suranha bahu kāla biṣādā| narahari kie pragaṭa prahalādā||
lagi lagi kāna kahahiṃ dhuni māthā| aba sura kāja bharata ke hāthā||
Meaning पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्मादने ही नूसिंहभगवान्को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब (इस बार) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है॥ ३॥
आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥
āna upāu na dekhia devā| mānata rāmu susevaka sevā||
hiyam̐ sapema sumirahu saba bharatahi| nija guna sīla rāma basa karatahi||
Meaning हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं ( अर्थात् उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं )। अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने-अपने हदयमें प्रेमसहित स्मरण करो॥ ४॥
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥ २६५॥
suni sura mata suragura kaheu bhala tumhāra baṛa bhāgu|
sakala sumaṃgala mūla jaga bharata carana anurāgu|| 265||
Meaning देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा--अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मड़लोंका मूल है॥ २६५॥
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥
sītāpati sevaka sevakāī| kāmadhenu saya sarisa suhāī||
bharata bhagati tumhareṃ mana āī| tajahu socu bidhi bāta banāī||
Meaning सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है। तुम्हारे मनमें भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाताने बात बना दी॥ १॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥
मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥
dekhu devapati bharata prabhāū| sahaja subhāyam̐ bibasa raghurāū||
mana thira karahu deva ḍaru nāhīṃ| bharatahi jāni rāma parichāhīṃ||
Meaning हे देवराज ! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशभमें हैं। हे देवताओ ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाईं (परछाईकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला ) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है॥ २॥
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥
निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥
suno suragura sura saṃmata socū| aṃtarajāmī prabhuhi sakocū||
nija sira bhāru bharata jiyam̐ jānā| karata koṭi bidhi ura anumānā||
Meaning देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति (आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों ) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे॥ ३॥
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥
kari bicāru mana dīnhī ṭhīkā| rāma rajāyasa āpana nīkā||
nija pana taji rākheu panu morā| chohu sanehu kīnha nahiṃ thorā||
Meaning सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ामें ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्त्रेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्रेह किया)॥ ४॥
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ॥ २६६॥
kīnha anugraha amita ati saba bidhi sītānātha|
kari pranāmu bole bharatu jori jalaja juga hātha|| 266||
Meaning श्रीजनकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले--॥ २६६॥
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥
kahauṃ kahāvauṃ kā aba svāmī| kṛpā aṃbunidhi aṃtarajāmī||
gura prasanna sāhiba anukūlā| miṭī malina mana kalapita sūlā||
Meaning हे स्वामी ! हे कृपाके समुद्र ! हे अन्तर्यामी ! अब मैं [ अधिक] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ ? गुरु महाराजको प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी॥ १॥
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥
मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥
apaḍara ḍareum̐ na soca samūleṃ| rabihi na dosu deva disi bhūleṃ||
mora abhāgu mātu kuṭilāī| bidhi gati biṣama kāla kaṭhināī||
Meaning मैं मिथ्या डरसे ही डर गया था। मेरे सोचकी जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और कालकी कठिनता,॥ २॥
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥
यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥
pāu ropi saba mili mohi ghālā| pranatapāla pana āpana pālā||
yaha nai rīti na rāuri hoī| lokahum̐ beda bidita nahiṃ goī||
Meaning इन सबने मिलकर पैर रोपकर (प्रण करके) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [शरणागतकी रक्षाका] प्रण निबाहा (मुझे बचा लिया)। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है॥ ३॥
जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥
jagu anabhala bhala eku gosāīṃ| kahia hoi bhala kāsu bhalāīṃ||
deu devataru sarisa subhāū| sanamukha bimukha na kāhuhi kāū||
Meaning सारा जगत् बुरा [ करनेवाला] हो; किन्तु हे स्वामी ! केवल एक आप ही भले (अनुकूल) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाईसे भला हो सकता है ? हे देव ! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख (अनुकूल) है, न विमुख (प्रतिकूल)॥ ४॥
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥ २६७॥
jāi nikaṭa pahicāni taru chāham̐ samani saba soca|
māgata abhimata pāva jaga rāu raṃku bhala poca|| 267||
Meaning उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं॥ २६७॥
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥
अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥
lakhi saba bidhi gura svāmi sanehū| miṭeu chobhu nahiṃ mana saṃdehū||
aba karunākara kījia soī| jana hita prabhu cita chobhu na hoī||
Meaning गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स््रेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा। हे दयाकी खान ! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चित्तमें क्षोभ (किसी प्रकारका विचार) न हो॥१॥
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची॥
सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई॥
jo sevaku sāhibahi sam̐kocī| nija hita cahai tāsu mati pocī||
sevaka hita sāhiba sevakāī| karai sakala sukha lobha bihāī||
Meaning जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे॥ २॥
स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका॥
यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु॥
svārathu nātha phireṃ sabahī kā| kiem̐ rajāi koṭi bidhi nīkā||
yaha svāratha paramāratha sāru| sakala sukṛta phala sugati siṃgāru||
Meaning हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका श्रृज्धार है॥ ३॥
देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥
तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥
deva eka binatī suni morī| ucita hoi tasa karaba bahorī||
tilaka samāju sāji sabu ānā| karia suphala prabhu jauṃ manu mānā||
Meaning हे देव ! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये (उसका उपयोग कीजिये)॥ ४॥
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ॥ २६८॥
sānuja paṭhaia mohi bana kījia sabahi sanātha|
nataru pheriahiṃ baṃdhu dou nātha calauṃ maiṃ sātha|| 268||
Meaning छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे वनमें भेज दीजिये और [ अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी (यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों) हे नाथ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूँ॥ २६८॥
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥
nataru jāhiṃ bana tīniu bhāī| bahuria sīya sahita raghurāī||
jehi bidhi prabhu prasanna mana hoī| karunā sāgara kījia soī||
Meaning अथवा हम तीनों भाई वन चले जायँँ और हे श्रीरघुनाथजी ! आप श्रीसीताजीसहित [ अयोध्याको] लौट जाइये। हे दयासागर ! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये॥ १॥
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु॥
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥
devam̐ dīnha sabu mohi abhāru| moreṃ nīti na dharama bicāru||
kahaum̐ bacana saba svāratha hetū| rahata na ārata keṃ cita cetū||
Meaning हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता॥ २॥
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥
utaru dei suni svāmi rajāī| so sevaku lakhi lāja lajāī||
asa maiṃ avaguna udadhi agādhū| svāmi saneham̐ sarāhata sādhū||
Meaning स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी (आप) स्तरेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं !॥ ३॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥
aba kṛpāla mohi so mata bhāvā| sakuca svāmi mana jāim̐ na pāvā||
prabhu pada sapatha kahaum̐ sati bhāū| jaga maṃgala hita eka upāū||
Meaning हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे। प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्के कल्याणके लिये एक यही उपाय है॥ ४॥
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
prabhu prasanna mana sakuca taji jo jehi āyasu deba|
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥ २६९॥
so sira dhari dhari karihi sabu miṭihi anaṭa avareba|| 269||
Meaning प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा-चढ़ाकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायेँगी॥ २६९॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥
असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥
bharata bacana suci suni sura haraṣe| sādhu sarāhi sumana sura baraṣe||
asamaṃjasa basa avadha nevāsī| pramudita mana tāpasa banabāsī||
Meaning भरतजीके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं॥ तपस्वी तथा वनवासी लोग [श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी आशासे] मनमें परम आनन्दित हुए॥ १॥
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥
जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥
cupahiṃ rahe raghunātha sam̐kocī| prabhu gati dekhi sabhā saba socī||
janaka dūta tehi avasara āe| muni basiṣṭham̐ suni begi bolāe||
Meaning किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभुकी यह स्थिति (मौन) देख सारी सभा सोचमें पड़ गयी। उसी समय जनकजीके दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्टजीने उन्हें तुरंत बुलवा लिया॥ २॥
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे॥
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता॥
kari pranāma tinha rāmu nihāre| beṣu dekhi bhae nipaṭa dukhāre||
dūtanha munibara būjhī bātā| kahahu bideha bhūpa kusalātā||
Meaning उन्होंने [ आकर] प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीको देखा। उनका [मुनियोंका-सा] वेष देखकर वे बहुत ही दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दूतोंसे बात पूछी कि राजा जनकका कुशल- समाचार कहो॥ ३॥
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा॥
बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं॥
suni sakucāi nāi mahi māthā| bole cara bara joreṃ hāthā||
būjhaba rāura sādara sāīṃ| kusala hetu so bhayau gosāīṃ||
Meaning यह (मुनिका कुशलप्रश्न) सुनकर सकुचाकर पृथ्वीपर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले-हे स्वामी ! आपका आदरके साथ पूछना, यही हे गोसाईं! कुशलका कारण हो गया॥ ४॥
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ॥ २७०॥
nāhi ta kosala nātha keṃ sātha kusala gai nātha|
mithilā avadha biseṣa teṃ jagu saba bhayau anātha|| 270||
Meaning नहीं तो हे नाथ! कुशल-क्षेम तो सब कोसलनाथ दशरथजीके साथ ही चली गयी। [उनके चले जानेसे] यों तो सारा जगत् ही अनाथ (स्वामीके बिना असहाय) हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेषरूपसे अनाथ हो गये॥ २७०॥
कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा॥
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥
kosalapati gati suni janakaurā| bhe saba loka soka basa baurā||
jehiṃ dekhe tehi samaya bidehū| nāmu satya asa lāga na kehū||
Meaning अयोध्यानाथकी गति (दशरथजीका मरण) सुनकर जनकपुरवासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये (सुध-बुध भूल गये)। उस समय जिन्होंने विदेहको [शोकमग्न] देखा, उनमेंसे किसीको ऐसा न लगा कि उनका विदेह (देहाभिमानरहित) नाम सत्य है! [क्योंकि देहाभिमानसे शून्य पुरुषको शोक कैसा ?]॥ १॥
रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥
भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥
rāni kucāli sunata narapālahi| sūjha na kachu jasa mani binu byālahi||
bharata rāja raghubara banabāsū| bhā mithilesahi hṛdayam̐ harām̐sū||
Meaning रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकजीको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको नहीं सूझता। फिर भरतजीको राज्य और श्रीरामचन्द्रजीको वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ॥ २॥
नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥
समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥
nṛpa būjhe budha saciva samājū| kahahu bicāri ucita kā ājū||
samujhi avadha asamaṃjasa doū| calia ki rahia na kaha kachu koū||
Meaning राजाने विद्वानों और मन्त्रियोंके समाजसे पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों प्रकारसे असमंजस जानकर *चलिये या रहिये ?' किसीने कुछ नहीं कहा॥ ३॥
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥
nṛpahi dhīra dhari hṛdayam̐ bicārī| paṭhae avadha catura cara cārī||
būjhi bharata sati bhāu kubhāū| āehu begi na hoi lakhāū||
Meaning [जब किसीने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजाने धीरज धर हदयमें विचारकर चार चतुर गुप्तरचर (जासूस) अयोध्याको भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुमलोग [ श्रीरामजीके प्रति] भरतजीके सद्धाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको तुम्हारा पता न लगने पावे॥ ४॥
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१॥
gae avadha cara bharata gati būjhi dekhi karatūti|
cale citrakūṭahi bharatu cāra cale terahūti|| 271||
Meaning गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिये॥ २७१॥
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥
dūtanha āi bharata kai karanī| janaka samāja jathāmati baranī||
suni gura parijana saciva mahīpati| bhe saba soca saneham̐ bikala ati||
Meaning [गुप्त] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिकि अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुट्म्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्त्रेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १॥
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥
घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥
dhari dhīraju kari bharata baṛāī| lie subhaṭa sāhanī bolāī||
ghara pura desa rākhi rakhavāre| haya gaya ratha bahu jāna sam̐vāre||
Meaning फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवायीं॥ २॥
दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला॥
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥
dugharī sādhi cale tatakālā| kie biśrāmu na maga mahīpālā||
bhorahiṃ āju nahāi prayāgā| cale jamuna utarana sabu lāgā||
Meaning वे दुघड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्रान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे,॥ ३॥
खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥
साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥
khabari lena hama paṭhae nāthā| tinha kahi asa mahi nāyau māthā||
sātha kirāta cha sātaka dīnhe| munibara turata bidā cara kīnhe||
Meaning तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा। उन्होंने (दूतोंने) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छः-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत विदा कर दिया॥ ४॥
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु॥ २७२॥
sunata janaka āgavanu sabu haraṣeu avadha samāju|
raghunaṃdanahi sakocu baṛa soca bibasa surarāju|| 272||
Meaning जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये॥ २७२॥
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥
अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥
garai galāni kuṭila kaikeī| kāhi kahai kehi dūṣanu deī||
asa mana āni mudita nara nārī| bhayau bahori rahaba dina cārī||
Meaning कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे ? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [ अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे] चार (कुछ) दिन और रहना हो गया॥ १॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥
ehi prakāra gata bāsara soū| prāta nahāna lāga sabu koū||
kari majjanu pūjahiṃ nara nārī| ganapa gauri tipurāri tamārī||
Meaning इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रात:काल सब कोई स्त्रान करने लगे। स्त्रान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं॥ २॥
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥
राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी॥
ramā ramana pada baṃdi bahorī| binavahiṃ aṃjuli aṃcala jorī||
rājā rāmu jānakī rānī| ānam̐da avadhi avadha rajadhānī||
Meaning फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर--॥ ३॥
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥
subasa basau phiri sahita samājā| bharatahi rāmu karahum̐ jubarājā||
ehi sukha sudhām̐ sīṃcī saba kāhū| deva dehu jaga jīvana lāhū||
Meaning फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगतमें जीनेका लाभ दीजिये॥ ४॥
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ॥ २७३॥
gura samāja bhāinha sahita rāma rāju pura hou|
achata rāma rājā avadha maria māga sabu kou|| 273||
Meaning गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते ही हमलोग अयोध्यामें मरें। सब कोई यही माँगते हैं॥ २७३॥
सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥
suni sanehamaya purajana bānī| niṃdahiṃ joga birati muni gyānī||
ehi bidhi nityakarama kari purajana| rāmahi karahiṃ pranāma pulaki tana||
Meaning अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन््दा करते हैं। अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं॥ १॥
ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥
सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥
ūm̐ca nīca madhyama nara nārī| lahahiṃ darasu nija nija anuhārī||
sāvadhāna sabahī sanamānahiṃ| sakala sarāhata kṛpānidhānahiṃ||
Meaning ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार श्रीरामजीका दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानीके साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं॥ २॥
लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥
सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥
larikāihi te raghubara bānī| pālata nīti prīti pahicānī||
sīla sakoca siṃdhu raghurāū| sumukha sulocana sarala subhāū||
Meaning श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं। वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले ], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं॥ ३॥
कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥
kahata rāma guna gana anurāge| saba nija bhāga sarāhana lāge||
hama sama punya puṃja jaga thore| jinhahi rāmu jānata kari more||
Meaning श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते-कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगतमें हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरीमजी अपना करके जानते हैं (ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं)॥ ४॥
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥ २७४॥
prema magana tehi samaya saba suni āvata mithilesu|
sahita sabhā saṃbhrama uṭheu rabikula kamala dinesu|| 274||
Meaning उस समय सब लोग प्रेममें मगर हैं। इतनेमें ही मिथिलापति जनकजीको आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दीसे उठ खड़े हुए॥ २७४॥
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं॥
bhāi saciva gura purajana sāthā| āgeṃ gavanu kīnha raghunāthā||
giribaru dīkha janakapati jabahīṃ| kari pranāma ratha tyāgeu tabahīṃ||
Meaning भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे (जनकजीकी अगवानीमें चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया)॥ १॥
राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥
rāma darasa lālasā uchāhū| patha śrama lesu kalesu na kāhū||
mana taham̐ jaham̐ raghubara baidehī| binu mana tana dukha sukha sudhi kehī||
Meaning श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं। बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो ?॥ २॥
आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती॥
आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे॥
āvata janaku cale ehi bhām̐tī| sahita samāja prema mati mātī||
āe nikaṭa dekhi anurāge| sādara milana parasapara lāge||
Meaning जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसभमें मिलने लगे॥ ३॥
लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि॥
lage janaka munijana pada baṃdana| riṣinha pranāmu kīnha raghunaṃdana||
bhāinha sahita rāmu mili rājahi| cale lavāi sameta samājahi||
Meaning जनकजी [वसिष्ट आदि अयोध्यावासी] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [ शतानन्द आदि जनकपुरवासी] ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले॥ ४॥
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ २७५॥
āśrama sāgara sāṃta rasa pūrana pāvana pāthu|
sena manahum̐ karunā sarita liem̐ jāhiṃ raghunāthu|| 275||
Meaning श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है। जनकजीकी सेना (समाज) मानो करुणा (करुणरस) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये] लिये जा रहे हैं॥ २७५॥
बोरति ग्यान बिराग करारे।
बचन ससोक मिलत नद नारे॥
borati gyāna birāga karāre| bacana sasoka milata nada nāre||
सोच उसास समीर तंरगा।
धीरज तट तरुबर कर भंगा॥
soca usāsa samīra taṃragā| dhīraja taṭa tarubara kara bhaṃgā||
Meaning यह करुणाकी नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें ) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरड़ें हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं॥ १॥
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥
biṣama biṣāda torāvati dhārā| bhaya bhrama bhavam̐ra abarta apārā||
kevaṭa budha bidyā baṛi nāvā| sakahiṃ na khei aika nahiṃ āvā||
Meaning भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है। भय और श्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं ), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है॥ २॥
बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥
आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई॥
banacara kola kirāta bicāre| thake biloki pathika hiyam̐ hāre||
āśrama udadhi milī jaba jāī| manahum̐ uṭheu aṃbudhi akulāī||
Meaning वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा)॥ ३॥
सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥
भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥
soka bikala dou rāja samājā| rahā na gyānu na dhīraju lājā||
bhūpa rūpa guna sīla sarāhī| rovahiṃ soka siṃdhu avagāhī||
Meaning दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो गये। किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथजीके रूप, गुण और शीलकी सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्रमें डुबकी लगा रहे हैं॥ ४॥
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
दे दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हों कहा॥
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सके सरित सनेह की॥
avagāhi soka samudra socahiṃ nāri nara byākula mahā|
de doṣa sakala saroṣa bolahiṃ bāma bidhi kīnhoṃ kahā||
sura siddha tāpasa jogijana muni dekhi dasā bideha kī|
tulasī na samarathu kou jo tari sake sarita saneha kī||
Meaning शोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया ? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मगर हुए बिना रह सके)।
किए अमित उपदेस जहंँ तह लोगन्ह मुनिबरन्ह।
धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ट बिदेह सन॥ २७६॥
kie amita upadesa jahaṃm̐ taha loganha munibaranha|
dhīraju dharia naresa kaheu basiṣṭa bideha sana|| 276||
Meaning जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको अपरिमित उपदेश दिये और वसिष्टजीने विदेह (जनकजी ) से कहा-हे राजन् ! आप धैर्य धारण कीजिये॥ २७६॥