सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू॥
चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला॥
sīlasiṃdhu suni gura āgavanū| siya samīpa rākhe ripudavanū||
cale sabega rāmu tehi kālā| dhīra dharama dhura dīnadayālā||
Meaning गुरुका आगमन सुनकर शीलके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके पास शत्रुघ्नजीको रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेगके साथ चल पड़े॥ १॥
गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे॥
मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई॥
gurahi dekhi sānuja anurāge| daṃḍa pranāma karana prabhu lāge||
munibara dhāi lie ura lāī| prema umagi bheṃṭe dou bhāī||
Meaning गुरुजीके दर्शन करके लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेममें भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दौड़कर उन्हें हदयसे लगा लिया और प्रेममें उमँगकर वे दोनों भाइयोंसे मिले॥ २॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥
prema pulaki kevaṭa kahi nāmū| kīnha dūri teṃ daṃḍa pranāmū||
rāmasakhā riṣi barabasa bheṃṭā| janu mahi luṭhata saneha sameṭā||
Meaning फिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि वसिष्टजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा लिया। मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो॥ ३॥
रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥
raghupati bhagati sumaṃgala mūlā| nabha sarāhi sura barisahiṃ phūlā||
ehi sama nipaṭa nīca kou nāhīṃ| baṛa basiṣṭha sama ko jaga māhīṃ||
Meaning श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मड़लोंका मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे--जगत्में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन हैं 2॥ ४॥
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
jehi lakhi lakhanahu teṃ adhika mile mudita munirāu|
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ॥ २४३॥
so sītāpati bhajana ko pragaṭa pratāpa prabhāu|| 243||
Meaning जिस (निषाद) को देखकर मुनिराज वसिष्टजी लक्ष्मणजीसे भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले। यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजीके भजनका प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है॥ २४३॥
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥
ārata loga rāma sabu jānā| karunākara sujāna bhagavānā||
jo jehi bhāyam̐ rahā abhilāṣī| tehi tehi kai tasi tasi rukha rākhī||
Meaning दयाकी खान, सुजान भगवान् श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी (मिलनेके लिये व्याकुल) जाना। तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस-उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए (उसकी रुचिके अनुसार)॥ १॥
सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥
यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥
sānuja mili pala mahu saba kāhū| kīnha dūri dukhu dāruna dāhū||
yaha baṛi bātam̐ rāma kai nāhīṃ| jimi ghaṭa koṭi eka rabi chāhīṃ||
Meaning उन्होंने लक्ष्मणजीसहित पलभरमें सब किसीसे मिलकर उनके दुःख और कठिन संतापको दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक ही सूर्यकी [ पृथकू-पृथक्] छाया (प्रतिबिम्ब) एक साथ ही दीखती है॥ २॥
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥
देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥
mili kevaṭihi umagi anurāgā| purajana sakala sarāhahiṃ bhāgā||
dekhīṃ rāma dukhita mahatārīṃ| janu subeli avalīṃ hima mārīṃ||
Meaning समस्त पुरवासी प्रेममें उमँगकर केवटसे मिलकर [उसके] भाग्यकी सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओंको दुखी देखा। मानो सुन्दर लताओंकी पंक्तियोंको पाला मार गया हो॥ ३॥
प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई॥
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥
prathama rāma bheṃṭī kaikeī| sarala subhāyam̐ bhagati mati bheī||
paga pari kīnha prabodhu bahorī| kāla karama bidhi sira dhari khorī||
Meaning सबसे पहले रामजी कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्तिसे उसकी बुद्धिको तर कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल, कर्म और विधाताके सिर दोष मँढ़कर, श्रीरामजीने उनको सान्त्वना दी॥ ४॥
भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥ २४४॥
bheṭīṃ raghubara mātu saba kari prabodhu paritoṣu|
aṃba īsa ādhīna jagu kāhu na deia doṣu|| 244||
Meaning फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता! जगत् ईध्रके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये॥ २४४॥
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई॥
गंग गौरि सम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानी॥
guratiya pada baṃde duhu bhāī| sahita bipratiya je sam̐ga āī||
gaṃga gauri sama saba sanamānīṃ| dehiṃ asīsa mudita mṛdu bānī||
Meaning फिर दोनों भाइयोंने ब्राह्मणोंकी ख्योंसहित--जो भरतजीके साथ आयी थीं, गुरुजीकी पत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना की और उन सबका गड़ाजी तथा गौरीजीके समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणीसे आशीर्वाद देने लगीं॥ १॥
गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका॥
पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता॥
gahi pada lage sumitrā aṃkā| janu bheṭīṃ saṃpati ati raṃkā||
puni janani caranani dou bhrātā| pare pema byākula saba gātā||
Meaning तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजीकी गोदमें जा चिपटे। मानो किसी अत्यन्त दरिद्रको सम्पत्तिसे भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्याजीके चरणों में गिर पड़े। प्रेमके मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं॥ २॥
अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए॥
तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू॥
ati anurāga aṃba ura lāe| nayana saneha salila anhavāe||
tehi avasara kara haraṣa biṣādū| kimi kabi kahai mūka jimi svādū||
Meaning बड़े ही स्तरेहसे माताने उन्हें हदयसे लगा लिया और नेत्रोंसे बहे हुए प्रेमाश्रुओंके जलसे उन्हें नहला दिया। उस समयके हर्ष और विषादको कवि कैसे कहे ? जैसे गूँगा स्वादको कैसे बतावे ?॥ ३॥
मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ॥
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू॥
mili jananahi sānuja raghurāū| gura sana kaheu ki dhāria pāū||
purajana pāi munīsa niyogū| jala thala taki taki utareu logū||
Meaning श्रीसचुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित माता कौसल्यासे मिलकर गुरुसे कहा कि आश्रमपर पधारिये। तदनन्तर मुनीश्वर वसिष्ठनीकी आज्ञा पाकर अयोध्यावासी सब लोग जल और थलका सुभीता देख-देखकर उतर गये॥ '४॥
महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ। २५॥
mahisura maṃtrī mātu gura gane loga lie sātha|
pāvana āśrama gavanu kiya bharata lakhana raghunātha| 25||
Meaning ब्राह्मण, मन्त्री, माताएँ और गुरु आदि गिने-चुने लोगोंको साथ लिये हुए, भरतजी, लक्ष्मणजी और श्रीरघुनाथजी पवित्र आश्रमको चले॥ २४५॥
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥
गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥
sīya āi munibara paga lāgī| ucita asīsa lahī mana māgī||
gurapatinihi munitiyanha sametā| milī pemu kahi jāi na jetā||
Meaning सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके चरणों लगीं और उन्होंने मनमाँगी उचित आशिष पायी। फिर मुनियोंकी सख्त्रियोंसहित गुरुपत्री अरुन्धतीजीसे मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता॥ १॥
बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥
सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥
baṃdi baṃdi paga siya sabahī ke| āsirabacana lahe priya jī ke||
sāsu sakala jaba sīyam̐ nihārīṃ| mūde nayana sahami sukumārīṃ||
Meaning सीताजीने सभीके चरणोंकी अलग-अलग वन्दना करके अपने हृदयको प्रिय ( अनुकूल ) लगनेवाले आशीर्वाद पाये। जब सुकुमारी सीताजीने सब सासुओंको देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आँखें बंद कर लीं॥ २॥
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥
तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा॥
parīṃ badhika basa manahum̐ marālīṃ| kāha kīnha karatāra kucālīṃ||
tinha siya nirakhi nipaṭa dukhu pāvā| so sabu sahia jo daiu sahāvā||
Meaning [सासुओंकी बुरी दशा देखकर] उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियाँ बधिकके वशमें पड़ गयी हों। [मनमें सोचने लगीं कि] कुचाली विधाताने क्या कर डाला? उन्होंने भी सीताजीको देखकर बड़ा दुःख पाया। [सोचा] जो कुछ दैव सहावे, वह सब सहना ही पड़ता है॥ ३॥
जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा॥
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई॥
janakasutā taba ura dhari dhīrā| nīla nalina loyana bhari nīrā||
milī sakala sāsunha siya jāī| tehi avasara karunā mahi chāī||
Meaning तब जानकीजी हृदयमें धीरज धरकर, नील कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, सब सासुओंसे जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वीपर करुणा (करुण-रस) छा गयी॥ ४॥
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग॥ २४६॥
lāgi lāgi paga sabani siya bheṃṭati ati anurāga|
hṛdayam̐ asīsahiṃ pema basa rahiahu bharī sohāga|| 246||
Meaning सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्रेहवश हदयसे आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहागसे भरी रहो (अर्थात् सदा सौभाग्यवती रहो)॥ २४६॥
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥
bikala saneham̐ sīya saba rānīṃ| baiṭhana sabahi kaheu gura gyānīṃ||
kahi jaga gati māyika munināthā| kahe kachuka paramāratha gāthā||
Meaning सीताजी और सब रानियाँ सख्रेहके मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्की गतिको मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ (बातें ) कहीं॥ १॥
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥
मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी॥
nṛpa kara surapura gavanu sunāvā| suni raghunātha dusaha dukhu pāvā||
marana hetu nija nehu bicārī| bhe ati bikala dhīra dhura dhārī||
Meaning तदनन्तर वसिष्ठजीने राजा दशरथजीके स्वर्गगमनकी बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजीने दुः:सह दुःख पाया। और अपने प्रति उनके स्रेहको उनके मरनेका कारण विचारकर धीरधुरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ २॥
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी।
बिलपत लखन सीय सब रानी॥
kulisa kaṭhora sunata kaṭu bānī| bilapata lakhana sīya saba rānī||
सोक बिकल अति सकल समाजू।
मानहुँ राजु अकाजेउ आजू॥
soka bikala ati sakala samājū| mānahum̐ rāju akājeu ājū||
Meaning व्रके समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गया! मानो राजा आज ही मरे हों॥३॥
मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥
munibara bahuri rāma samujhāe| sahita samāja susarita nahāe||
bratu niraṃbu tehi dina prabhu kīnhā| munihu kaheṃ jalu kāhum̐ na līnhā||
Meaning फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्टजीने श्रीरामजीको समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीजीमें स्तान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निर्जल व्रत किया। मुनि वसिष्टजीके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया॥ ४॥
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥ २४७१॥
bhoru bhaem̐ raghunaṃdanahi jo muni āyasu dīnha|
śraddhā bhagati sameta prabhu so sabu sādaru kīnha|| 2471||
Meaning दूसरे दिन सबेरा होनेपर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीको जो-जो आज्ञा दी, वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धा-भक्तिसहित आदरके साथ किया॥ २४७॥
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥
जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥
kari pitu kriyā beda jasi baranī| bhe punīta pātaka tama taranī||
jāsu nāma pāvaka agha tūlā| sumirata sakala sumaṃgala mūlā||
Meaning वेदोंगें जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार पिताकी क्रिया करके, पापरूपी अन्धकारके नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूईके [तुरंत जला डालनेके। लिये अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मड़लोंका मूल है,॥ १॥
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते॥
suddha so bhayau sādhu saṃmata asa| tīratha āvāhana surasari jasa||
suddha bhaem̐ dui bāsara bīte| bole gura sana rāma pirīte||
Meaning वे [नित्य शुद्ध-बुद्ध] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओंकी ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थोंके आवाहनसे गड़ाजी शुद्ध होती हैं! (गड़ाजी तो स्वभावसे ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थोंका आवाहन किया जाता है उलटे वे ही गज्ाजीके सम्पर्कमें आनेसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्गसे कर्म ही शुद्ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीतिके साथ गुरुजीसे बोले--॥ २॥
नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी॥
सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता॥
nātha loga saba nipaṭa dukhārī| kaṃda mūla phala aṃbu ahārī||
sānuja bharatu saciva saba mātā| dekhi mohi pala jimi juga jātā||
Meaning हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। कन्द, मूल, फल और जलका ही आहार करते हैं। भाई शत्रुष्नसहित भरतको, मन्त्रियोंको और सब माताओंको देखकर मुझे एक-एक पल युगके समान बीत रहा है॥ ३॥
सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ॥
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥
saba sameta pura dhāria pāū| āpu ihām̐ amarāvati rāū||
bahuta kaheum̐ saba kiyaum̐ ḍhiṭhāī| ucita hoi tasa karia gosām̐ī||
Meaning अतः: सबके साथ आप अयोध्यापुरीको पधारिये (लौट जाइये)। आप यहाँ हैं, और राजा अमरावती (स्वर्ग) में हैं (अयोध्या सूनी है) ! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढिठाई की है। हे गोसाई! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये॥ ४॥
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम॥ २४८॥
dharma setu karunāyatana kasa na kahahu asa rāma|
loga dukhita dina dui darasa dekhi lahahum̐ biśrāma|| 248||
Meaning [ वसिष्टजीने कहा--] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो ? लोग दुखी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें॥ २४८॥
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला॥
rāma bacana suni sabhaya samājū| janu jalanidhi mahum̐ bikala jahājū||
suni gura girā sumaṃgala mūlā| bhayau manahum̐ māruta anukulā||
Meaning श्रीरामजीके वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्टजीकी श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाजके लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी॥ १॥
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं॥
मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥
pāvana payam̐ tihum̐ kāla nahāhīṃ| jo biloki aṃgha ogha nasāhīṃ||
maṃgalamūrati locana bhari bhari| nirakhahiṃ haraṣi daṃḍavata kari kari||
Meaning सब लोग पवित्र पयस्विनी नदीमें [ अथवा पयस्विनी नदीके पवित्र जलमें ] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्त्रान करते हैं, जिसके दर्शनसे ही पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं और मज़लमूर्ति श्रीरामचन्द्रजीको दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं॥ २॥
राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥
झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥
rāma saila bana dekhana jāhīṃ| jaham̐ sukha sakala sakala dukha nāhīṃ||
jharanā jharihiṃ sudhāsama bārī| tribidha tāpahara tribidha bayārī||
Meaning सब श्रीरामचन्द्रजीके पर्वत (कामदगिरि) और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दु:खोंका अभाव है। झरने अमृतके समान जल झरते हैं और तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकारके (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तापोंको हर लेती है॥३॥
बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥
biṭapa beli tṛna aganita jātī| phala prasūna pallava bahu bhām̐tī||
suṃdara silā sukhada taru chāhīṃ| jāi barani bana chabi kehi pāhīṃ||
Meaning असंख्य जातिके वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरहके फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएँ हैं। वृक्षोंकी छाया सुख देनेवाली है। वनकी शोभा किससे वर्णन की जा सकती है 2॥ ४॥
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥ २४९॥
sarani saroruha jala bihaga kūjata guṃjata bhṛṃga|
baira bigata biharata bipina mṛga bihaṃga bahuraṃga|| 249||
Meaning तालाबोंमें कमल खिल रहे हैं, जलके पक्षी कूज रहे हैं, भौरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगोंके पक्षी और पशु वनमें वैररहित होकर विहार कर रहे हैं॥ २४९॥
कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥
भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥
kola kirāta bhilla banabāsī| madhu suci suṃdara svādu sudhā sī||
bhari bhari parana puṭīṃ raci rurī| kaṃda mūla phala aṃkura jūrī||
Meaning कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदिकी जूड़ियों (अँटियों) को॥ १॥
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥
sabahi dehiṃ kari binaya pranāmā| kahi kahi svāda bheda guna nāmā||
dehiṃ loga bahu mola na lehīṃ| pherata rāma dohāī dehīṃ||
Meaning सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं॥ २॥
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥
kahahiṃ saneha magana mṛdu bānī| mānata sādhu pema pahicānī||
tumha sukṛtī hama nīca niṣādā| pāvā darasanu rāma prasādā||
Meaning प्रेममें मगर हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं॥ ३॥
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥
राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥
hamahi agama ati darasu tumhārā| jasa maru dharani devadhuni dhārā||
rāma kṛpāla niṣāda nevājā| parijana prajau cahia jasa rājā||
Meaning हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गड़्ाजीकी धारा दुर्लभ है! [ देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये॥ ४॥
यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥ २५०॥
yaha jiṃyam̐ jāni sam̐kocu taji karia chohu lakhi nehu|
hamahi kṛtāratha karana lagi phala tṛna aṃkura lehu|| 250||
Meaning हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये॥ २५०॥
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई॥
tumha priya pāhune bana pagu dhāre| sevā jogu na bhāga hamāre||
deba kāha hama tumhahi gosām̐ī| īdhanu pāta kirāta mitāī||
Meaning आप प्रिय पाहुने वनमें पधारे हैं। आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी ! हम आपको क्या देंगे ? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईंधन (लकड़ी) और पत्तोंहीतक है॥ १॥
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई॥
हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥
yaha hamāri ati baṛi sevakāī| lehi na bāsana basana corāī||
hama jaṛa jīva jīva gana ghātī| kuṭila kucālī kumati kujātī||
Meaning हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवोंकी हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं॥ २॥
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं॥
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥
pāpa karata nisi bāsara jāhīṃ| nahiṃ paṭa kaṭi nahi peṭa aghāhīṃ||
saponehum̐ dharama buddhi kasa kāū| yaha raghunaṃdana darasa prabhāū||
Meaning हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्रमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी ? यह सब तो श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है॥ ३॥
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥
बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे॥
jaba teṃ prabhu pada paduma nihāre| miṭe dusaha dukha doṣa hamāre||
bacana sunata purajana anurāge| tinha ke bhāga sarāhana lāge||
Meaning जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियोंके वचन सुनकर अयोध्याके लोग प्रेममें भर गये और उनके भाग्यकी सराहना करने लगे॥ ४॥
लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥
नरनारि निद्रहिं नेहु निज सुनि कोल भशिल्लनि की गिरा।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह ले लौका तिरा॥
lāge sarāhana bhāga saba anurāga bacana sunāvahīṃ|
bolani milani siya rāma carana sanehu lakhi sukhu pāvahīṃ||
naranāri nidrahiṃ nehu nija suni kola bhaśillani kī girā|
tulasī kṛpā raghubaṃsamani kī loha le laukā tirā||
Meaning सब उनके भाग्यकी सराहना करने लगे और प्रेमके वचन सुनाने लगे। उन लोगोंके बोलने और मिलनेका ढंग तथा श्रीसीतारामजीके चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलोंकी वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेमका निरादर करते हैं (उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा है कि लोहा नौकाको अपने ऊपर लेकर तैर गया।
बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥ २५१॥
biharahiṃ bana cahu ora pratidina pramudita loga saba|
jala jyoṃ dādura mora bhae pīna pāvasa prathama|| 251||
Meaning सब लोग दिनोंदिन परम आनन्दित होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वषकि जलसे मेढठक और मोर मोटे हो जाते हैं (प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं )॥ २५१॥
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥
सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥
pura jana nāri magana ati prītī| bāsara jāhiṃ palaka sama bītī||
sīya sāsu prati beṣa banāī| sādara karai sarisa sevakāī||
Meaning अयोध्यापुरीके पुरुष और स्त्री सभी प्रेममें अत्यन्त मग्र हो रहे हैं। उनके दिन पलके समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष (रूप) बनाकर सीताजी सब सासुओंकी आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं॥ १॥
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥
lakhā na maramu rāma binu kāhūm̐| māyā saba siya māyā māhūm̐||
sīyam̐ sāsu sevā basa kīnhīṃ| tinha lahi sukha sikha āsiṣa dīnhīṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके सिवा इस भेदको और किसीने नहीं जाना। सब मायाएँ [ पराशक्ति महामाया ] श्रीसीताजीकी मायामें ही हैं। सीताजीने सासुओंको सेवासे वशमें कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये॥ २॥
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥
अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥
lakhi siya sahita sarala dou bhāī| kuṭila rāni pachitāni aghāī||
avani jamahi jācati kaikeī| mahi na bīcu bidhi mīcu na deī||
Meaning सीताजीसमेत दोनों भाइयों ( श्रीराम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी। वह पृथ्वी तथा यमराजसे याचना करती है, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जानेके लिये रास्ता) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता॥ ३॥
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥
यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥
lokahum̐ beda bidita kabi kahahīṃ| rāma bimukha thalu naraka na lahahīṃ||
yahu saṃsau saba ke mana māhīṃ| rāma gavanu bidhi avadha ki nāhīṃ||
Meaning लोक और वेदमें प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजीसे विमुख हैं उन्हें नरकमें भी ठौर नहीं मिलती। सबके मनमें यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजीका अयोध्या जाना होगा या नहीं॥ ४॥
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥ २५२॥
nisi na nīda nahiṃ bhūkha dina bharatu bikala suci soca|
nīca kīca bica magana jasa mīnahi salila sam̐koca|| 252||
Meaning भरतजीको न तो रातको नींद आती है, न दिनमें भूख ही लगती है। वे पवित्र सोचमें ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे (तल) के कीचड़में डूबी हुई मछलीको जलकी कमीसे व्याकुलता होती है॥ २५२॥
कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥
kīnhī mātu misa kāla kucālī| īti bhīti jasa pākata sālī||
kehi bidhi hoi rāma abhiṣekū| mohi avakalata upāu na ekū||
Meaning [ भरतजी सोचते हैं कि] माताके मिससे कालने कुचाल की है। जैसे धानके पकते समय ईतिका भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता॥ १॥
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥
avasi phirahiṃ gura āyasu mānī| muni puni kahaba rāma ruci jānī||
mātu kahehum̐ bahurahiṃ raghurāū| rāma janani haṭha karabi ki kāū||
Meaning गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वसिष्टजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे (अर्थात् वे श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे)। माता कौसल्याजीके कहनेसे भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी ?॥ २॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥
mohi anucara kara ketika bātā| tehi maham̐ kusamau bāma bidhātā||
jauṃ haṭha karaum̐ ta nipaṭa kukaramū| haragiri teṃ guru sevaka dharamū||
Meaning मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है ? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं ) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है॥ ३॥
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥
ekau juguti na mana ṭhaharānī| socata bharatahi raini bihānī||
prāta nahāi prabhuhi sira nāī| baiṭhata paṭhae riṣayam̐ bolāī||
Meaning एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रात: काल स्त्रान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्टजीने उनको बुलवा भेजा॥ ४॥
गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥ २५३॥
gura pada kamala pranāmu kari baiṭhe āyasu pāi|
bipra mahājana saciva saba jure sabhāsada āi|| 253||
Meaning भरतजी गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये॥ २५३॥
बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥
धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥
bole munibaru samaya samānā| sunahu sabhāsada bharata sujānā||
dharama dhurīna bhānukula bhānū| rājā rāmu svabasa bhagavānū||
Meaning श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले--हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं॥ १॥
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू॥
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥
satyasaṃdha pālaka śruti setū| rāma janamu jaga maṃgala hetū||
gura pitu mātu bacana anusārī| khala dalu dalana deva hitakārī||
Meaning वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं। श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टोंकें दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं॥ २॥
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥
nīti prīti paramāratha svārathu| kou na rāma sama jāna jathārathu||
bidhi hari haru sasi rabi disipālā| māyā jīva karama kuli kālā||
Meaning नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको श्रीरामजीके समान यथार्थ (तत्त्वसे) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल॥ ३॥
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥
करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥
ahipa mahipa jaham̐ lagi prabhutāī| joga siddhi nigamāgama gāī||
kari bicāra jiṃyam̐ dekhahu nīkeṃ| rāma rajāi sīsa sabahī keṃ||
Meaning शेषजी और [पृथ्वी एवं पातालके अन्यान्य] राजा आदि जहाँतक प्रभुता है, और योगकी सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रोंगें गायी गयी हैं, हृदयमें अच्छी तरह विचार कर देखो, [तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि] श्रीरामजीकी आज्ञा इन सभीके सिरपर है (अर्थात् श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान् महेश्वर हैं)॥ ४॥
राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥ २५४॥
rākheṃ rāma rajāi rukha hama saba kara hita hoi|
samujhi sayāne karahu aba saba mili saṃmata soi|| 254||
Meaning अतएव श्रीरामजीकी आज्ञा और रुख रखनेमें ही हम सबका हित होगा। [इस तत्त्व और रहस्यको समझकर] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो॥ २५४॥
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥
saba kahum̐ sukhada rāma abhiṣekū| maṃgala moda mūla maga ekū||
kehi bidhi avadha calahiṃ raghurāū| kahahu samujhi soi karia upāū||
Meaning श्रीरामजीका राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मज़ल और आनन्दका मूल यही एक मार्ग है। [अब] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें ? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाय॥ १॥
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥
saba sādara suni munibara bānī| naya paramāratha svāratha sānī||
utaru na āva loga bhae bhore| taba siru nāi bharata kara jore||
Meaning मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीकी नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसीको कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचारशक्तिसे रहित) हो गये। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े॥ २॥
भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥
bhānubaṃsa bhae bhūpa ghanere| adhika eka teṃ eka baṛere||
janamu hetu saba kaham̐ pitu mātā| karama subhāsubha dei bidhātā||
Meaning [ और कहा--] सूर्यवंशमें एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभीके जन्मके कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोको (कर्मोका फल) विधाता देते हैं॥३॥
दलि दुख सजइ सकल कल्याना।
अस असीस राउरि जगु जाना॥
dali dukha sajai sakala kalyānā| asa asīsa rāuri jagu jānā||
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी।
सकइ को टारि टेक जो टेकी॥
so gosāim̐ bidhi gati jehiṃ cheṃkī| sakai ko ṭāri ṭeka jo ṭekī||
Meaning आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दु:खोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह जगत् जानता है। हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति (विधान) को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी (जो निश्चय कर दिया) उसे कौन टाल सकता है ?॥ ४॥
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥ २५५॥
būjhia mohi upāu aba so saba mora abhāgu|
suni sanehamaya bacana gura ura umagā anurāgu|| 255||
Meaning अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजीके प्रेममय वचनोंको सुनकर गुरुजीके हृदयमें प्रेम उमड़ आया॥ २५५॥
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥
सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥
tāta bāta phuri rāma kṛpāhīṃ| rāma bimukha sidhi sapanehum̐ nāhīṃ||
sakucaum̐ tāta kahata eka bātā| aradha tajahiṃ budha sarabasa jātā||
Meaning [वे बोले- हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही। रामविमुखको तो स्वप्रमें भी सिद्धि नहीं मिलती हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [ आधेकी रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं॥ १॥
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥
tumha kānana gavanahu dou bhāī| pheriahiṃ lakhana sīya raghurāī||
suni subacana haraṣe dou bhrātā| bhe pramoda paripūrana gātā||
Meaning अत: तुम दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न) वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्रको लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये॥ २॥
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥
mana prasanna tana teju birājā| janu jiya rāu rāmu bhae rājā||
bahuta lābha loganha laghu hānī| sama dukha sukha saba rovahiṃ rānī||
Meaning उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीरमें तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों ! अन्य लोगोंको तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियोंको दुःख-सुख समान ही थे (राम-लक्ष्मण वनमें रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रोंका वियोग तो रहेगा ही), यह समझकर वे सब रोने लगीं॥ ३॥
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥
कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू॥
kahahiṃ bharatu muni kahā so kīnhe| phalu jaga jīvanha abhimata dīnhe||
kānana karaum̐ janama bhari bāsū| ehiṃ teṃ adhika na mora supāsū||
Meaning भरतजी कहने लगे--मुनिने जो कहा, वह करनेसे जगत्भरके जीवोंको उनकी इच्छित वस्तु देनेका फल होगा। [चौदह वर्षकी कोई अवधि नहीं, ] मैं जन्मभर वनमें वास करूँगा। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है॥ ४॥
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥ २५६॥
am̐tarajāmī rāmu siya tumha sarabagya sujāna|
jo phura kahahu ta nātha nija kījia bacanu pravāna|| 256||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदयकी जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनोंको प्रमाण कीजिये (उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये)॥ २५६॥
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥
भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥
bharata bacana suni dekhi sanehū| sabhā sahita muni bhae bidehū||
bharata mahā mahimā jalarāsī| muni mati ṭhāṛhi tīra abalā sī||
Meaning भरतजीके वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्टजी विदेह हो गये (किसीको अपने देहकी सुधि न रही )। भरतजीकी महान् महिमा समुद्र है, मुनिकी बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्रीके समान खड़ी है॥ १॥
गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥
औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥
gā caha pāra jatanu hiyam̐ herā| pāvati nāva na bohitu berā||
auru karihi ko bharata baṛāī| sarasī sīpi ki siṃdhu samāī||
Meaning वह [उस समुद्रके] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हदयमें उपाय भी ढूँढ़े ! पर [उसे पार करनेका साधन] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजीकी बड़ाई और कौन करेगा ? तलैयाकी सीपीमें भी कहीं समुद्र समा सकता है ?॥ २॥
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥
bharatu munihi mana bhītara bhāe| sahita samāja rāma pahiṃ āe||
prabhu pranāmu kari dīnha suāsanu| baiṭhe saba suni muni anusāsanu||
Meaning मुनि वसिष्टजीके अन्तरात्माको भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजीके पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने प्रणामकर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनिकी आज्ञा सुनकर बेठ गये॥ ३॥
बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥
bole munibaru bacana bicārī| desa kāla avasara anuhārī||
sunahu rāma sarabagya sujānā| dharama nīti guna gyāna nidhānā||
Meaning श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसरके अनुसार विचार करके वचन बोले--हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भण्डार राम! सुनिये-॥ ४॥
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥ २५७॥
saba ke ura aṃtara basahu jānahu bhāu kubhāu|
purajana jananī bharata hita hoi so kahia upāu|| 257||
Meaning आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं। जिसमें पुरवासियोंका, माताओंका और भरतका हित हो, वही उपाय बतलाइये॥ २५७॥
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ॥
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥
ārata kahahiṃ bicāri na kāū| sūjha jūārihi āpana dāū||
suni muni bacana kahata raghurāū| nātha tumhārehi hātha upāū||
Meaning आर्त (दुखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है। मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे--हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है॥ १॥
सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई॥
saba kara hita rukha rāuri rākheṃ| āyasu kiem̐ mudita phura bhāṣeṃ||
prathama jo āyasu mo kahum̐ hoī| mātheṃ māni karau sikha soī||
Meaning आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माधेपर चढ़ाकर करूँ॥ २॥
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥
puni jehi kaham̐ jasa kahaba gosāīṃ| so saba bhām̐ti ghaṭihi sevakāīṃ||
kaha muni rāma satya tumha bhāṣā| bharata saneham̐ bicāru na rākhā||
Meaning फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरहसे सेवामें लग जायगा (आज्ञापालन करेगा)। मुनि वसिष्टजी कहने लगे--हे राम! तुमने सच कहा। पर भरतके प्रेमने विचारको नहीं रहने दिया॥ ३॥
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥
मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥
tehi teṃ kahaum̐ bahori bahorī| bharata bhagati basa bhai mati morī||
moreṃ jāna bharata ruci rākhi| jo kījia so subha siva sākhī||
Meaning इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गयी है। मेरी समझमें तो भरतकी रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा॥ ४॥
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥ २५८॥
bharata binaya sādara sunia karia bicāru bahori|
karaba sādhumata lokamata nṛpanaya nigama nicori|| 258||
Meaning पहले भरतकी विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदोंका निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसीके अनुसार) कीजिये॥ २५८॥
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी॥
भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥
guru anurāga bharata para dekhī| rāma hdayam̐ ānaṃdu biseṣī||
bharatahi dharama dhuraṃdhara jānī| nija sevaka tana mānasa bānī||
Meaning भरतजीपर गुरुजीका स््रेह देखकर श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें विशेष आनन्द हुआ। भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर--॥ १॥
बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥
bole gura āyasa anukūlā| bacana maṃju mṛdu maṃgalamūlā||
nātha sapatha pitu carana dohāī| bhayau na bhuana bharata sama bhāī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी गुरुकी आज्ञाके अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याणके मूल वचन बोले-- हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजीके चरणोंकी दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विधभरमें भरतके समान भाई कोई हुआ ही नहीं॥ २॥
जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥
राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥
je gura pada aṃbuja anurāgī| te lokahum̐ bedahum̐ baṛabhāgī||
rāura jā para asa anurāgū| ko kahi sakai bharata kara bhāgū||
Meaning जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और वेदमें ( पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्त्रेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है?॥ ३॥
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥
lakhi laghu baṃdhu buddhi sakucāī| karata badana para bharata baṛāī||
bharatu kahahīṃ soi kiem̐ bhalāī| asa kahi rāma rahe aragāī||
Meaning छोटा भाई जानकर भरतके मुँहपर उसकी बड़ाई करनेमें मेरी बुद्धि सकुचाती है। (फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि) भरत जो कुछ कहें, वही करनेमें भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे॥ ४॥
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥ २५९॥
taba muni bole bharata sana saba sam̐kocu taji tāta|
kṛpāsiṃdhu priya baṃdhu sana kahahu hṛdaya kai bāta|| 259||
Meaning तब मुनि भरतजीसे बोले-हे तात! सब सड्ोच त्यागकर कृपाके समुद्र अपने प्यारे भाईसे अपने हृदयकी बात कहो॥ २५९॥
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥
लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥
suni muni bacana rāma rukha pāī| guru sāhiba anukūla aghāī||
lakhi apane sira sabu charu bhārū| kahi na sakahiṃ kachu karahiṃ bicārū||
Meaning मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर--गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर--सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे॥ १॥
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
pulaki sarīra sabhām̐ bhae ṭhāḍheṃ| nīraja nayana neha jala bāṛheṃ||
kahaba mora muninātha nibāhā| ehi teṃ adhika kahauṃ maiṃ kāhā||
Meaning शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये। कमलके समान नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी। [वे बोले-] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया (जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया)। इससे अधिक मैं क्या कहूँ 2॥ २॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥
maiṃ jānaum̐ nija nātha subhāū| aparādhihu para koha na kāū||
mo para kṛpā saneha biseṣī| khelata khunisa na kabahūm̐ dekhī||
Meaning अपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और सख्त्रेह है। मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस (अप्रसन्नता) नहीं देखी॥ ३॥
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥
sisupana tema parihareum̐ na saṃgū| kabahum̐ na kīnha mora mana bhaṃgū||
maiṃ prabhu kṛpā rīti jiyam̐ johī| hārehum̐ khela jitāvahiṃ mohī||
Meaning बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा (मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हदयमें भलीभाँति देखा (अनुभव किया है)। मेरे हारनेपर भी खेलमें प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं॥ ४॥
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥ २६०॥
mahūm̐ saneha sakoca basa sanamukha kahī na baina|
darasana tṛpita na āju lagi pema piāse naina|| 260||
Meaning मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक प्रभुके दर्शनसे तृप्त नहीं हुए॥ २६०॥