निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥
nija guna sahita rāma guna gāthā| sunata jāhiṃ sumirata raghunāthā||
tīratha muni āśrama suradhāmā| nirakhi nimajjahiṃ karahiṃ pranāmā||
Meaning [ इस प्रकार] अपने गुणोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके गुणों की कथा सुनते और श्रीरघुनाथजीको स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं। वे तीर्थ देखकर स्ान और मुनियोंके आश्रम तथा देवताओंके मन्दिर देखकर प्रणाम करते हैं,॥ १॥
मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू॥
मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी॥
manahīṃ mana māgahiṃ baru ehū| sīya rāma pada paduma sanehū||
milahiṃ kirāta kola banabāsī| baikhānasa baṭu jatī udāsī||
Meaning और मन-ही-मन यह वरदान माँगते हैं कि श्रीसीतारामजीके चरणकमलोंमें प्रेम हो। मार्गमें भील, कोल आदि वनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं॥ २॥
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही॥
ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं॥
kari pranāmu pūm̐chahiṃ jehiṃ tehī| kehi bana lakhanu rāmu baidehī||
te prabhu samācāra saba kahahīṃ| bharatahi dekhi janama phalu lahahīṃ||
Meaning उनमेंसे जिस-तिससे प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और जानकीजी किस वनमें हैं? वे प्रभुके सब समाचार कहते हैं और भरतजीको देखकर जन्मका फल पाते हैं॥ ३॥
जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥
je jana kahahiṃ kusala hama dekhe| te priya rāma lakhana sama lekhe||
ehi bidhi būjhata sabahi subānī| sunata rāma banabāsa kahānī||
Meaning जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम-लक्ष्मणके समान ही प्यारे मानते हैं। इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणीसे पूछते और श्रीरामजीके वनवासकी कहानी सुनते जाते हैं॥ ४॥
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ॥ २२४॥
tehi bāsara basi prātahīṃ cale sumiri raghunātha|
rāma darasa kī lālasā bharata sarisa saba sātha|| 224||
Meaning उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रात:काल ही श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके चले। साथके सब लोगोंको भी भरतजीके समान ही श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा [लगी हुई] है॥ २२४॥
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥
भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू॥
maṃgala saguna hohiṃ saba kāhū| pharakahiṃ sukhada bilocana bāhū||
bharatahi sahita samāja uchāhū| milihahiṃ rāmu miṭahi dukha dāhū||
Meaning सबको मज़्लसूचक शकुन हो रहे हैं। सुख देनेवाले [ पुरुषोंके दाहिने और स््त्रयोंके बायें। नेत्र और भुजाएँ फड़क रही हैं। समाजसहित भरतजीको उत्साह हो रहा है कि श्रीरामचन्द्रजी मिलेंगे और दुःखका दाह मिट जायगा॥ १॥
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके॥
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं॥
karata manoratha jasa jiyam̐ jāke| jāhiṃ saneha surām̐ saba chāke||
sithila aṃga paga maga ḍagi ḍolahiṃ| bihabala bacana pema basa bolahiṃ||
Meaning जिसके जाीमें जैसा है, वह वैसा ही मनोरथ करता है। सब स्रेहरूपी मदिरासे छके (प्रेममें मतवाले हुए) चले जा रहे हैं। अड्भ शिथिल हैं, रास्तेमें पैर डगमगा रहे हैं और प्रेमवश विह्नल वचन बोल रहे हैं॥ २॥
रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा॥
जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा॥
rāmasakhām̐ tehi samaya dekhāvā| saila siromani sahaja suhāvā||
jāsu samīpa sarita paya tīrā| sīya sameta basahiṃ dou bīrā||
Meaning रामसखा निषादराजने उसी समय स्वाभाविक ही सुहावना पर्वतशिरोमणि कामदगिरि दिखलाया, जिसके निकट ही पयस्विनी नदीके तटपर सीताजीसमेत दोनों भाई निवास करते हैं॥३॥
देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा॥
प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥
dekhi karahiṃ saba daṃḍa pranāmā| kahi jaya jānaki jīvana rāmā||
prema magana asa rāja samājū| janu phiri avadha cale raghurājū||
Meaning सब लोग उस पर्वतको देखकर * जानकी-जीवन श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो।' ऐसा कहकर दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। राजसमाज प्रेममें ऐसा मगर है मानो श्रीरघुनाथजी अयोध्याको लौट चले हों॥ ४॥
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥ २२५॥
bharata premu tehi samaya jasa tasa kahi sakai na seṣu|
kabihiṃ agama jimi brahmasukhu aha mama malina janeṣu|| 225||
Meaning भरतजीका उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कविके लिये तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्योंके लिये ब्रह्मानन्द !॥ २२५॥
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥
sakala saneha sithila raghubara keṃ| gae kosa dui dinakara ḍharakeṃ||
jalu thalu dekhi base nisi bīteṃ| kīnha gavana raghunātha pirīteṃ||
Meaning सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके मारे शिथिल होनेके कारण सूर्यास्त होनेतक (दिनभरमें) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थलका सुपास देखकर रातको वहीं [बिना खाये-पीये ही] रह गये। रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजीके प्रेमी भरतजीने आगे गमन किया॥ १॥
उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥
सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥
uhām̐ rāmu rajanī avaseṣā| jāge sīyam̐ sapana asa dekhā||
sahita samāja bharata janu āe| nātha biyoga tāpa tana tāe||
Meaning उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे। रातको सीताजीने ऐसा स्वप्न देखा [जिसे वे श्रीराीमजीको सुनाने लगीं] मानो समाजसहित भरतजी यहाँ आये हैं। प्रभुके वियोगकी अग्िसे उनका शरीर संतप्त है॥ २॥
सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥
sakala malina mana dīna dukhārī| dekhīṃ sāsu āna anuhārī||
suni siya sapana bhare jala locana| bhae socabasa soca bimocana||
Meaning सभी लोग मनमें उदास, दीन और दु:खी हैं। सासुओंको दूसरी ही सूरतमें देखा। सीताजीका स्वप्र सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्रोंगें जल भर आया और सबको सोचसे छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं [ लीलासे] सोचके वश हो गये॥ ३॥
लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥
अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने॥
lakhana sapana yaha nīka na hoī| kaṭhina kucāha sunāihi koī||
asa kahi baṃdhu sameta nahāne| pūji purāri sādhu sanamāne||
Meaning [ और बोले-] लक्ष्मण ! यह स्वप्र अच्छा नहीं है। कोई भीषण कुसमाचार (बहुत ही बुरी खबर) सुनावेगा। ऐसा कहकर उन्होंने भाईसहित स्तान किया और त्रिपुरारि महादेवजीका पूजन करके साधुओंका सम्मान किया॥ ४॥
सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥
sanamāni sura muni baṃdi baiṭhe utara disi dekhata bhae|
nabha dhūri khaga mṛga bhūri bhāge bikala prabhu āśrama gae||
tulasī uṭhe avaloki kāranu kāha cita sacakita rahe|
saba samācāra kirāta kolanhi āi tehi avasara kahe||
Meaning देवताओंका सम्मान (पूजन) और मुनियोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे। आकाशमें धूल छा रही है; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभुके आश्रमको आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है? वे चित्तमें आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार कहे।
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥ २२६॥
sunata sumaṃgala baina mana pramoda tana pulaka bhara|
sarada saroruha naina tulasī bhare saneha jala|| 226||
Meaning तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मज़ल वचन सुनते ही श्रीरामजीके मनमें बड़ा आनन्द हुआ। शरीरमें पुलकावली छा गयी, और शरद्-ऋतुके कमलके समान नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर गये॥ २२६॥
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥
एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥
bahuri socabasa bhe siyaravanū| kārana kavana bharata āgavanū||
eka āi asa kahā bahorī| sena saṃga caturaṃga na thorī||
Meaning सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुन: सोचके वश हो गये कि भरतके आनेका क्या कारण है? फिर एकने आकर ऐसा कहा कि उनके साथमें बड़ी भारी चतुरड़िणी सेना भी है॥ १॥
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही॥
so suni rāmahi bhā ati socū| ita pitu baca ita baṃdhu sakocū||
bharata subhāu samujhi mana māhīṃ| prabhu cita hita thiti pāvata nāhī||
Meaning यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिताके वचन और इधर भाई भरतजीका संकोच ! भरतजीके स्वभावको मनमें समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्तको ठहरानेके लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं॥ २॥
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥
samādhāna taba bhā yaha jāne| bharatu kahe mahum̐ sādhu sayāne||
lakhana lakheu prabhu hṛdayam̐ khabhārū| kahata samaya sama nīti bicārū||
Meaning तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहनेमें (आज्ञाकारी ) हैं। लक्ष्मणजीने देखा कि प्रभु श्रीरामजीके हृदयमें चिन्ता है तो वे समयके अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे--॥ ३॥
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई॥
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥
binu pūm̐cha kachu kahaum̐ gosāīṃ| sevaku samayam̐ na ḍhīṭha ḍhiṭhāī||
tumha sarbagya siromani svāmī| āpani samujhi kahaum̐ anugāmī||
Meaning हे स्वामी ! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समयपर ढिठाई करनेसे ढीठ नहीं समझा जाता ( अर्थात् आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा)। हे स्वामी ! आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं (सब जानते ही हैं)। मैं सेवक तो अपनी समझकी बात कहता हूँ॥ ४॥
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥ २२७॥
nātha suhrada suṭhi sarala cita sīla saneha nidhāna|
saba para prīti pratīti jiyam̐ jānia āpu samāna|| 227||
Meaning हे नाथ ! आप परम सुहद् (बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहदय तथा शील और स्तरेहके भण्डार हैं, आपका सभीपर प्रेम और विश्वास है और अपने हृदयमें सबको अपने ही समान जानते हैं॥ २२७॥
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥
भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना॥
biṣaī jīva pāi prabhutāī| mūṛha moha basa hohiṃ janāī||
bharatu nīti rata sādhu sujānā| prabhu pada prema sakala jagu jānā||
Meaning परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है॥ १॥
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥
कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी॥
teū āju rāma padu pāī| cale dharama marajāda meṭāī||
kuṭila kubaṃdha kuavasaru tākī| jāni rāma banavāsa ekākī||
Meaning वे भरत भी आज श्रीरामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्मकी मर्यादाको मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवासमें अकेले (असहाय) हैं,॥ २॥
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥
कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥
kari kumaṃtru mana sāji samājū| āe karai akaṃṭaka rājū||
koṭi prakāra kalapi kuṭalāī| āe dala baṭori dou bhāī||
Meaning अपने मनमें बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्यको निष्कण्टक करनेके लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों ) प्रकारकी कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं॥ ३॥
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥
भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥
jauṃ jiyam̐ hoti na kapaṭa kucālī| kehi sohāti ratha bāji gajālī||
bharatahi dosu dei ko jāem̐| jaga baurāi rāja padu pāem̐||
Meaning यदि इनके हृदयमें कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियोंकी कतार [ऐसे समय] किसे सुहाती ? परन्तु भरतको ही व्यर्थ कौन दोष दे ? राजपद पा जानेपर सारा जगत् ही पागल (मतवाला) हो जाता है॥ ४॥
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥ २२८॥
sasi gura tiya gāmī naghuṣu caṛheu bhūmisura jāna|
loka beda teṃ bimukha bhā adhama na bena samāna|| 228||
Meaning चन्द्रमा गुरुपल्लीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा। और राजा वेनके समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनोंसे विमुख हो गया॥ २२८॥
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥
sahasabāhu suranāthu trisaṃkū| kehi na rājamada dīnha kalaṃkū||
bharata kīnha yaha ucita upāū| ripu rina raṃca na rākhaba kāū||
Meaning सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमदने कल नहीं दिया ? भरतने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये॥ १॥
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई॥
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी॥
eka kīnhi nahiṃ bharata bhalāī| nidare rāmu jāni asahāī||
samujhi parihi sou āju biseṣī| samara saroṣa rāma mukhu pekhī||
Meaning हाँ, भरतने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी (आप) को असहाय जानकर उनका निरादर किया! पर आज संग्राममें श्रीरामजी (आप) का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझमें विशेषरूपसे आ जायगी (अर्थात् इस निरादरका फल भी वे अच्छी तरह पा जायूँगे)॥ २॥
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी॥
etanā kahata nīti rasa bhūlā| rana rasa biṭapu pulaka misa phūlā||
prabhu pada baṃdi sīsa raja rākhī| bole satya sahaja balu bhāṣī||
Meaning इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष पुलकावलीके बहानेसे फूल उठा (अर्थात् नीतिकी बात कहते-कहते उनके शरीरमें वीर-रस छा गया)। वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंकी वन्दना करके, चरण-रजको सिरपर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले॥ ३॥
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥
anucita nātha na mānaba morā| bharata hamahi upacāra na thorā||
kaham̐ lagi sahia rahia manu māreṃ| nātha sātha dhanu hātha hamāreṃ||
Meaning हे नाथ ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरतने हमें कम नहीं प्रचारा है (हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है)। आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथमें है!॥ ४॥
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥ २२९॥
chatri jāti raghukula janamu rāma anuga jagu jāna|
lātahum̐ māreṃ caṛhati sira nīca ko dhūri samāna|| 229||
Meaning क्षत्रिय जाति, रघुकुलमें जन्म और फिर मैं श्रीरामजी (आप) का अनुगामी (सेवक) हूँ, यह जगत् जानता है। [फिर भला कैसे सहा जाय ?] धूलके समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारनेपर सिर ही चढ़ती है॥ २२९॥
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥
uṭhi kara jori rajāyasu māgā| manahum̐ bīra rasa sovata jāgā||
bām̐dhi jaṭā sira kasi kaṭi bhāthā| sāji sarāsanu sāyaku hāthā||
Meaning यों कहकर लक्ष्मणजीने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी। मानो वीररस सोतेसे जाग उठा हो।सिरपर जटा बौधकर कमरमें तरकस कस लिया और धनुषको सजकर तथा बाणको हाथमें लेकर कहा--॥ १॥
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥
राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥
āju rāma sevaka jasu leūm̐| bharatahi samara sikhāvana deūm̐||
rāma nirādara kara phalu pāī| sovahum̐ samara seja dou bhāī||
Meaning आज मैं श्रीराम (आप) का सेवक होनेका यश लूँ और भरतको संग्राममें शिक्षा दूँ। श्रीरामचन्द्रजी (आप) के निरादरका फल पाकर दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न) रणशय्यापर सोवें !॥ २॥
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥
āi banā bhala sakala samājū| pragaṭa karaum̐ risa pāchila ājū||
jimi kari nikara dalai mṛgarājū| lei lapeṭi lavā jimi bājū||
Meaning अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचल डालता है और बाज जैसे लवेको लपेठमें ले लेता है॥३॥
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥
जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई॥
taisehiṃ bharatahi sena sametā| sānuja nidari nipātaum̐ khetā||
jauṃ sahāya kara saṃkaru āī| tau māraum̐ rana rāma dohāī||
Meaning वैसे ही भरतको सेनासमेत और छोटे भाईसहित तिरस्कार करके मैदानमें पछाड़ँगा। यदि शड्धरजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजीकी सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्धमें [ अवश्य] मार डालूँगा (छोड़ेंगा नहीं)॥ ४॥
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥ २३०॥
ati saroṣa mākhe lakhanu lakhi suni sapatha pravāna|
sabhaya loka saba lokapati cāhata bhabhari bhagāna|| 230||
Meaning लक्ष्मणजीको अत्यन्त क्रोधसे तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक (सत्य) सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबड़ाकर भागना चाहते हैं॥ २३०॥
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा॥
jagu bhaya magana gagana bhai bānī| lakhana bāhubalu bipula bakhānī||
tāta pratāpa prabhāu tumhārā| ko kahi sakai ko jānanihārā||
Meaning सारा जगत् भयमें डूब गया। तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलको प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई-हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान सकता है ?॥ १॥
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥
anucita ucita kāju kichu hoū| samujhi karia bhala kaha sabu koū||
sahasā kari pāchaiṃ pachitāhīṃ| kahahiṃ beda budha te budha nāhīṃ||
Meaning परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं॥ २१॥
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने॥
कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥
suni sura bacana lakhana sakucāne| rāma sīyam̐ sādara sanamāne||
kahī tāta tumha nīti suhāī| saba teṃ kaṭhina rājamadu bhāī||
Meaning देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [और कहा--] हे तात! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्यका मद सबसे कठिन मद है॥ ३॥
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥
सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥
jo acavam̐ta nṛpa mātahiṃ teī| nāhina sādhusabhā jehiṃ seī||
sunahu lakhana bhala bharata sarīsā| bidhi prapaṃca maham̐ sunā na dīsā||
Meaning जिन्होंने साधुओंकी सभाका सेवन (सत्सज्ध) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिराका आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी सृष्टिमें न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है॥ ४॥
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ॥ २३१॥
bharatahi hoi na rājamadu bidhi hari hara pada pāi|
kabahum̐ ki kām̐jī sīkarani chīrasiṃdhu binasāi|| 231||
Meaning [ अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है ] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका ! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता (फट सकता) है ?॥ २३१॥
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥
timiru taruna taranihi maku gilaī| gaganu magana maku meghahiṃ milaī||
gopada jala būṛahiṃ ghaṭajonī| sahaja chamā baru chāṛai chonī||
Meaning अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्नके) सूर्यको निगल जाय। आकाश चाहे बादलोंमें समाकर मिल जाय। गौके खुर-इतने जलमें अगस्त्यजी डूब जायँँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा (सहनशीलता) को छोड़ दे॥ १॥
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥
masaka phūm̐ka maku meru uṛāī| hoi na nṛpamadu bharatahi bhāī||
lakhana tumhāra sapatha pitu ānā| suci subaṃdhu nahiṃ bharata samānā||
Meaning मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरतके समान पवित्र और उत्तम भाई संसारमें नहीं है॥ २॥
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥
saguna khīru avaguna jalu tātā| milai racai parapaṃcu bidhātā||
bharatu haṃsa rabibaṃsa taṛāgā| janami kīnha guna doṣa bibhāgā||
Meaning हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जलको मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपश्न (जगत्) को रचता है। परन्तु भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोषका विभाग कर दिया (दोनोंको अलग-अलग कर दिया)॥ ३॥
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी॥
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ॥
gahi guna paya taji avaguna bārī| nija jasa jagata kīnhi ujiārī||
kahata bharata guna sīlu subhāū| pema payodhi magana raghurāū||
Meaning गुणरूपी दूधको ग्रहणकर और अवगुणरूपी जलको त्यागकर भरतने अपने यशसे जगतमें उजियाला कर दिया है। भरतजीके गुण, शील और स्वभावको कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्रमें मग्र हो गये॥ ४॥
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु॥ २३२॥
suni raghubara bānī bibudha dekhi bharata para hetu|
sakala sarāhata rāma so prabhu ko kṛpāniketu|| 232||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी वाणी सुनकर और भरतजीपर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [ और कहने लगे] कि श्रीरामचन्द्रजीके समान कृपाके धाम प्रभु और कौन हैं ?॥ २३२॥
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को॥
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा॥
jauṃ na hota jaga janama bharata ko| sakala dharama dhura dharani dharata ko||
kabi kula agama bharata guna gāthā| ko jānai tumha binu raghunāthā||
Meaning यदि जगत्में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता ? हे रघुनाथजी ! कविकुलके लिये अगम (उनकी कल्पनासे अतीत) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है ?॥ १॥
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥
इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥
lakhana rāma siyam̐ suni sura bānī| ati sukhu laheu na jāi bakhānī||
ihām̐ bharatu saba sahita sahāe| maṃdākinīṃ punīta nahāe||
Meaning लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र मन्दाकिनीमें स्रान किया॥ २॥
सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा॥
चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई॥
sarita samīpa rākhi saba logā| māgi mātu gura saciva niyogā||
cale bharatu jaham̐ siya raghurāī| sātha niṣādanāthu laghu bhāī||
Meaning फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्चको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे॥ ३॥
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं॥
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥
samujhi mātu karataba sakucāhīṃ| karata kutaraka koṭi mana māhīṃ||
rāmu lakhanu siya suni mama nāūm̐| uṭhi jani anata jāhiṃ taji ṭhāūm̐||
Meaning भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर (याद करके) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों (अनेकों ) कुतर्क करते हैं [ सोचते हैं--] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायेँ॥ ४॥
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर॥ २३३॥
mātu mate mahum̐ māni mohi jo kachu karahiṃ so thora|
agha avaguna chami ādarahiṃ samujhi āpanī ora|| 233||
Meaning मुझे माताके मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर (अपने विरद और सम्बन्धको देखकर) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे॥ २३३॥
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी॥
मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥
jauṃ pariharahiṃ malina manu jānī| jau sanamānahiṃ sevaku mānī||
moreṃ sarana rāmahi kī panahī| rāma susvāmi dosu saba janahī||
Meaning चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें (कुछ भी करें); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है॥ १॥
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥
अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥
jaga jasa bhājana cātaka mīnā| nema pema nija nipuna nabīnā||
asa mana gunata cale maga jātā| sakuca saneham̐ sithila saba gātā||
Meaning जगत्में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया बनाये रखनेमें निपुण हैं। ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं। उनके सब अडज्ञ संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं॥ २॥
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ
pherata manahum̐ mātu kṛta khorī| calata bhagati bala dhīraja dhorī||
jaba samujhata raghunātha subhāū| taba patha parata utāila pāū
Meaning माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते (स्मरण करते) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं॥ ३॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥
देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू॥
bharata dasā tehi avasara kaisī| jala prabāham̐ jala ali gati jaisī||
dekhi bharata kara socu sanehū| bhā niṣāda tehi samayam̐ bidehū||
Meaning उस समय भरतकी दशा कैसी है ? जैसी जलके प्रवाहमें जलके भौंरेकी गति होती है। भरतजीका सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया (देहकी सुध-बुध भूल गया)॥ '४॥
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु॥ २३४॥
lage hona maṃgala saguna suni guni kahata niṣādu|
miṭihi socu hoihi haraṣu puni parināma biṣādu|| 234||
Meaning मज़ल-शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा--सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्तमें दुःख होगा॥ २३४॥
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने॥
भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥
sevaka bacana satya saba jāne| āśrama nikaṭa jāi niarāne||
bharata dīkha bana saila samājū| mudita chudhita janu pāi sunājū||
Meaning भरतजीने सेवक (गुह) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रमके समीप जा पहुँचे। वहाँके वन और पर्वतोंके समूहको देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न ( भोजन) पा गया हो॥ १॥
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥
īti bhīti janu prajā dukhārī| tribidha tāpa pīṛita graha mārī||
jāi surāja sudesa sukhārī| hohiṃ bharata gati tehi anuhārī||
Meaning जैसे ईतिके भयसे दुःखी हुई और तीनों (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) तापों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियोंसे पीड़ित प्रजा किसी उत्तम देश और उत्तम राज्यमें जाकर सुखी हो जाय, भरतजीकी गति (दशा) ठीक उसी प्रकारकी हो रही है॥ २॥ [ अधिक जल बरसना, न बरसना, चूहोंका उत्पात, टिड्ियाँ, तोते और दूसरे राजाकी चढ़ाई-- खेतोंमें बाधा देनेवाले इन छः: उपद्रवोंको 'ईति' कहते हैं।]
राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥
rāma bāsa bana saṃpati bhrājā| sukhī prajā janu pāi surājā||
saciva birāgu bibeku naresū| bipina suhāvana pāvana desū||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके निवाससे वनकी सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजाको पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मन्त्री है॥ ३॥
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥
bhaṭa jama niyama saila rajadhānī| sāṃti sumati suci suṃdara rānī||
sakala aṃga saṃpanna surāū| rāma carana āśrita cita cāū||
Meaning यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्यके सब अड्डोंसे पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके आश्रित रहनेसे उसके चित्तमें चाव (आनन्द या उत्साह) है॥ ४॥ [ स्वामी, अमात्य, सुहददू, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना-राज्यके ये सात अड्भ हैं।]
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु॥ २३५॥
jīti moha mahipālu dala sahita bibeka bhuālu|
karata akaṃṭaka rāju puram̐ sukha saṃpadā sukālu|| 235||
Meaning मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके नगरमें सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान है॥ २३५॥
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥
bana pradesa muni bāsa ghanere| janu pura nagara gāum̐ gana khere||
bipula bicitra bihaga mṛga nānā| prajā samāju na jāi bakhānā||
Meaning वनरूपी प्रान्तोंमें जो मुनियोंके बहुत-से निवासस्थान हैं वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ोंका समूह है। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओंका समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १॥
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥
khagahā kari hari bāgha barāhā| dekhi mahiṣa bṛṣa sāju sarāhā||
bayaru bihāi carahiṃ eka saṃgā| jaham̐ taham̐ manahum̐ sena caturaṃgā||
Meaning गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलोंको देखकर राजाके साजको सराहते ही बनता है। ये सब आपसका वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरड़िणी सेना है॥ २॥
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥
jharanā jharahiṃ matta gaja gājahiṃ| manahum̐ nisāna bibidhi bidhi bājahiṃ||
caka cakora cātaka suka pika gana| kūjata maṃju marāla mudita mana||
Meaning पानीके झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेकों प्रकारके नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलोंके समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं॥३॥
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥
बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला॥
aligana gāvata nācata morā| janu surāja maṃgala cahu orā||
beli biṭapa tṛna saphala saphūlā| saba samāju muda maṃgala mūlā||
Meaning भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्यमें चारों ओर मज़ल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृुण सब फल और फूलोंसे युक्त हैं। सारा समाज आनन्द और मज़लका मूल बन रहा है॥ ४॥
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु॥ २३६॥
rāma saila sobhā nirakhi bharata hṛdayam̐ ati pemu|
tāpasa tapa phalu pāi jimi sukhī sirāneṃ nemu|| 236||
Meaning श्रीरामजीके पर्वतकी शोभा देखकर भरतजीके हृदयमें अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियमकी समासति होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है॥ २३६॥
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई।
कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥ नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।
पाकरि जंबु रसाल तमाला॥
taba kevaṭa ūm̐ceṃ caṛhi dhāī| kaheu bharata sana bhujā uṭhāī|| nātha dekhiahiṃ biṭapa bisālā| pākari jaṃbu rasāla tamālā||
Meaning तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजीसे कहने लगा--हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं,॥ १॥
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥
नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥
jinha tarubaranha madhya baṭu sohā| maṃju bisāla dekhi manu mohā||
nīla saghana pallva phala lālā| abirala chāham̐ sukhada saba kālā||
Meaning जिन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीचमें एक सुन्दर विशाल बड़का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर मन मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली है॥ २॥
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥
ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥
mānahum̐ timira arunamaya rāsī| biracī bidhi sam̐keli suṣamā sī||
e taru sarita samīpa gosām̐ī| raghubara paranakuṭī jaham̐ chāī||
Meaning मानो ब्रह्माजीने परम शोभाको एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि-सी रच दी है। हे गुसाई! ये वृक्ष नदीके समीप हैं, जहाँ श्रीरामकी पर्णकुटी छायी है॥ ३॥
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए॥
बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई॥
tulasī tarubara bibidha suhāe| kahum̐ kahum̐ siyam̐ kahum̐ lakhana lagāe||
baṭa chāyām̐ bedikā banāī| siyam̐ nija pāni saroja suhāī||
Meaning वहाँ तुलसीजीके बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजीने और कहीं लक्ष्मणजीने लगाये हैं। इसी बड़की छायामें सीताजीने अपने करकमलोंसे सुन्दर वेदी बनायी है॥ ४॥
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥ २३७॥
jahām̐ baiṭhi munigana sahita nita siya rāmu sujāna|
sunahiṃ kathā itihāsa saba āgama nigama purāna|| 237||
Meaning जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनियोंके वृन्दसमेत बैठकर नित्य शास्त्र, वेद और पुराणोंके सब कथा-इतिहास सुनते हैं॥ २३७॥
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥
करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥
sakhā bacana suni biṭapa nihārī| umage bharata bilocana bārī||
karata pranāma cale dou bhāī| kahata prīti sārada sakucāī||
Meaning सखाके वचन सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतजीके नेत्रोंगें जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेमका वर्णन करनेमें सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं॥ १॥
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥
haraṣahiṃ nirakhi rāma pada aṃkā| mānahum̐ pārasu pāyau raṃkā||
raja sira dhari hiyam̐ nayananhi lāvahiṃ| raghubara milana sarisa sukha pāvahiṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं॥ २॥
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥
सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥
dekhi bharata gati akatha atīvā| prema magana mṛga khaga jaṛa jīvā||
sakhahi saneha bibasa maga bhūlā| kahi supaṃtha sura baraṣahiṃ phūlā||
Meaning भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड़ (वृक्षादि) जीव प्रेममें मग्र हो गये। प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे॥ ३॥
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥
nirakhi siddha sādhaka anurāge| sahaja sanehu sarāhana lāge||
hota na bhūtala bhāu bharata ko| acara sacara cara acara karata ko||
Meaning भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [ अथवा प्रेम ] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता ?॥ ४॥
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥ २३८॥
pema amia maṃdaru birahu bharatu payodhi gam̐bhīra|
mathi pragaṭeu sura sādhu hita kṛpāsiṃdhu raghubīra|| 238||
Meaning प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है॥ २३८॥
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥
sakhā sameta manohara joṭā| lakheu na lakhana saghana bana oṭā||
bharata dīkha prabhu āśramu pāvana| sakala sumaṃgala sadanu suhāvana||
Meaning सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन वनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमज्जलोंके धाम और सुन्दर पवित्र आश्रमको देखा॥ १॥
करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥
देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥
karata prabesa miṭe dukha dāvā| janu jogīṃ paramārathu pāvā||
dekhe bharata lakhana prabhu āge| pūm̐che bacana kahata anurāge||
Meaning आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दु:ख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगीको परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बातका प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं)॥ २॥
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥
बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥
sīsa jaṭā kaṭi muni paṭa bām̐dheṃ| tūna kaseṃ kara saru dhanu kām̐dheṃ||
bedī para muni sādhu samājū| sīya sahita rājata raghurājū||
Meaning सिरपर जटा है। कमरमें मुनियोंका (वल्कल) वस्त्र बँधे हैं और उसीमें तरकस कसे हैं। हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है। वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं॥ ३॥
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा॥
कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥
balakala basana jaṭila tanu syāmā| janu muni beṣa kīnha rati kāmā||
kara kamalani dhanu sāyaku pherata| jiya kī jarani harata ham̐si herata||
Meaning श्रीरामजीके वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [ सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है।)॥ ४॥
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु॥ २३९॥
lasata maṃju muni maṃḍalī madhya sīya raghucaṃdu|
gyāna sabhām̐ janu tanu dhare bhagati saccidānaṃdu|| 239||
Meaning सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं॥ २३९॥
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई॥
sānuja sakhā sameta magana mana| bisare haraṣa soka sukha dukha gana||
pāhi nātha kahi pāhi gosāī| bhūtala pare lakuṭa kī nāī||
Meaning छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [प्रेममें] मग्न हो रहा है। हर्ष- शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। ' हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं ! रक्षा कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े॥ १॥
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥
बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥
bacana sapema lakhana pahicāne| karata pranāmu bharata jiyam̐ jāne||
baṃdhu saneha sarasa ehi orā| uta sāhiba sevā basa jorā||
Meaning प्रेमभे वचनोंसे लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजीका सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता॥ २॥
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥
mili na jāi nahiṃ gudarata banaī| sukabi lakhana mana kī gati bhanaī||
rahe rākhi sevā para bhārū| caṛhī caṃga janu khaiṃca khelārū||
Meaning न तो [क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथकू होकर ] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये (सेवाको ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो॥ ३॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥
उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥
kahata saprema nāi mahi māthā| bharata pranāma karata raghunāthā||
uṭhe rāmu suni pema adhīrā| kahum̐ paṭa kahum̐ niṣaṃga dhanu tīrā||
Meaning लक्ष्मणजीने प्रेमसहित पृथ्वीपर मस्तक नवाकर कहा--हे रघुनाथजी ! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण॥ '४॥
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥ २४०॥
barabasa lie uṭhāi ura lāe kṛpānidhāna|
bharata rāma kī milani lakhi bisare sabahi apāna|| 240||
Meaning कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी॥ २४०॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥
परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥
milani prīti kimi jāi bakhānī| kabikula agama karama mana bānī||
parama pema pūrana dou bhāī| mana budhi cita ahamiti bisarāī||
Meaning मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय ? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है। दोनों भाई ( भरतजी और श्रीरामजी ) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं॥ १॥
कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई॥
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥
kahahu supema pragaṭa ko karaī| kehi chāyā kabi mati anusaraī||
kabihi aratha ākhara balu sām̐cā| anuhari tāla gatihi naṭu nācā||
Meaning कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेमको कौन प्रकट करे ? कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे ? कविको तो अक्षर और अर्थका ही सच्चा बल है। नट तालकी गतिके अनुसार ही नाचता है!॥ २॥
अगम सनेह भरत रघुबर को।
जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥
agama saneha bharata raghubara ko| jaham̐ na jāi manu bidhi hari hara ko||
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती।
बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥
so maiṃ kumati kahauṃ kehi bhām̐tī| bāja surāga ki gām̐ḍara tām̐tī||
Meaning भरतजी और श्रीरघुनाथजीका प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेमको मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडरकी ताँतसे भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है?॥ ३॥ [तालाबों और झीलोंमें एक तरहकी घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी॥
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥
milani biloki bharata raghubara kī| suragana sabhaya dhakadhakī dharakī||
samujhāe suraguru jaṛa jāge| baraṣi prasūna prasaṃsana lāge||
Meaning भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके मिलनेका ढंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजीने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे॥ ४॥
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥ २४१॥
mili sapema ripusūdanahi kevaṭu bheṃṭeu rāma|
bhūri bhāyam̐ bheṃṭe bharata lachimana karata pranāma|| 241||
Meaning फिर श्रीरामजी प्रेमके साथ शत्रुघ्वसे मिलकर तब केवट (निषादराज) से मिले। प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजीसे भरतजी बड़े ही प्रेमसे मिले॥ २४१॥
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥
bheṃṭeu lakhana lalaki laghu bhāī| bahuri niṣādu līnha ura lāī||
puni munigana duhum̐ bhāinha baṃde| abhimata āsiṣa pāi anaṃde||
Meaning तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंगके साथ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले। फिर उन्होंने निषादराजको हृदयसे लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [ उपस्थित] मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए॥ १॥
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥
sānuja bharata umagi anurāgā| dhari sira siya pada paduma parāgā||
puni puni karata pranāma uṭhāe| sira kara kamala parasi baiṭhāe||
Meaning छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजी प्रेममें उमैगकर सीताजीके चरणकमलोंकी रज सिरपर धारणकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजीने उन्हें उठाकर उनके सिरको अपने करकमलसे स्पर्शकर (सिरपर हाथ फेरकर) उन दोनोंको बैठाया॥ २॥
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥
सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥
sīyam̐ asīsa dīnhi mana māhīṃ| magana saneham̐ deha sudhi nāhīṃ||
saba bidhi sānukūla lakhi sītā| bhe nisoca ura apaḍara bītā||
Meaning सीताजीने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्त्रेहमें मग्न हैं, उन्हें देहकी सुध-बुध नहीं है। सीताजीको सब प्रकारसे अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके हृदयका कल्पित भय जाता रहा॥ ३॥
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥
kou kichu kahai na kou kichu pūm̐chā| prema bharā mana nija gati chūm̐chā||
tehi avasara kevaṭu dhīraju dhari| jori pāni binavata pranāmu kari||
Meaning उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह अपनी गतिसे खाली है (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चाझ्ल्यसे शून्य है)। उस अवसरपर केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा--॥ ४॥
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥ २४२॥
nātha sātha muninātha ke mātu sakala pura loga|
sevaka senapa saciva saba āe bikala biyoga|| 242||
Meaning हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरनिवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री-सब आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं॥ २४२॥