प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा॥
pramudita tīratharāja nivāsī| baikhānasa baṭu gṛhī udāsī||
kahahiṃ parasapara mili dasa pām̐cā| bharata saneha sīlu suci sām̐cā||
Meaning तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन (संन्यासी) सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस-पाँच मिलकर आपसभें कहते हैं कि भरतजीका प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है॥ १॥
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥
दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥
sunata rāma guna grāma suhāe| bharadvāja munibara pahiṃ āe||
daṃḍa pranāmu karata muni dekhe| mūratimaṃta bhāgya nija lekhe||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर गुणसमूहोंको सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीके पास आये। मुनिने भरतजीको दण्डवत्-प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मुूर्तिमानू सौभाग्य समझा॥ २॥
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥
dhāi uṭhāi lāi ura līnhe| dīnhi asīsa kṛtāratha kīnhe||
āsanu dīnha nāi siru baiṭhe| cahata sakuca gṛham̐ janu bhaji paiṭhe||
Meaning उन्होंने दौड़कर भरतजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनिने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोचके घरमें घुस जाना चाहते हैं॥ ३॥
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥
muni pūm̐chaba kachu yaha baṛa socū| bole riṣi lakhi sīlu sam̐kocū||
sunahu bharata hama saba sudhi pāī| bidhi karataba para kichu na basāī||
Meaning उनके मनमें यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [तो मैं क्या उत्तर दूँगा]। भरतजीके शील और संकोचको देखकर ऋषि बोले--भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाताके कर्तव्यपर कुछ वश नहीं चलता॥ ४॥
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥ २०६॥
tumha galāni jiyam̐ jani karahu samujhī mātu karatūti|
tāta kaikaihi dosu nahiṃ gaī girā mati dhūti|| 206||
Meaning माताकी करतूतको समझकर (याद करके) तुम हृदयमें ग्लानि मत करो। हे तात! कैकेयीका कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी॥ २०६॥
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ॥
तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥
yahau kahata bhala kahihi na koū| loku beda budha saṃmata doū||
tāta tumhāra bimala jasu gāī| pāihi lokau bedu baṛāī||
Meaning यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानोंको मान्य है। किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे॥ १॥
लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥
loka beda saṃmata sabu kahaī| jehi pitu dei rāju so lahaī||
rāu satyabrata tumhahi bolāī| deta rāju sukhu dharamu baṛāī||
Meaning यह लोक और वेद दोनोंको मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है। राजा सत्यब्रती थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती॥ २॥
राम गवनु बन अनरथ मूला।
जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥
rāma gavanu bana anaratha mūlā| jo suni sakala bisva bhai sūlā||
सो भावी बस रानि अयानी।
करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥
so bhāvī basa rāni ayānī| kari kucāli aṃtahum̐ pachitānī||
Meaning सारे अनर्थकी जड़ तो श्रीरामचन्द्रजीका वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसारको पीड़ा हुई। वह श्रीरामका वनगमन भी भावीवश हुआ। बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्तमें पछतायी॥ ३॥
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥
taham̐um̐ tumhāra alapa aparādhū| kahai so adhama ayāna asādhū||
karatehu rāju ta tumhahi na doṣū| rāmahi hota sunata saṃtoṣū||
Meaning उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता। सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको भी सन्तोष ही होता॥ ४॥
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥ २०७॥
aba ati kīnhehu bharata bhala tumhahi ucita mata ehu|
sakala sumaṃgala mūla jaga raghubara carana sanehu|| 207||
Meaning हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मड़लोंका मूल है॥ २०७॥
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥
यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥
so tumhāra dhanu jīvanu prānā| bhūribhāga ko tumhahi samānā||
yaha tamhāra ācaraju na tātā| dasaratha suana rāma priya bhrātā||
Meaning सो वह (श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम ) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिये यह आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजीके पुत्र और श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे भाई हो॥ १॥
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥
लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥
sunahu bharata raghubara mana māhīṃ| pema pātru tumha sama kou nāhīṃ||
lakhana rāma sītahi ati prītī| nisi saba tumhahi sarāhata bītī||
Meaning हे भरत! सुनो, श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तीनोंको सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेमके साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती॥ २॥
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥
jānā maramu nahāta prayāgā| magana hohiṃ tumhareṃ anurāgā||
tumha para asa sanehu raghubara keṃ| sukha jīvana jaga jasa jaṛa nara keṃ||
Meaning प्रयागराजमें जब वे स्त्रान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेममें मग्र हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही ( अगाध) स्त्रेह है जैसा मूर्ख (विषयासक्त ) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है॥ ३॥
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥
yaha na adhika raghubīra baṛāī| pranata kuṭuṃba pāla raghurāī||
tumha tau bharata mora mata ehū| dhareṃ deha janu rāma sanehū||
Meaning यह श्रीरघुनाथजीकी बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागतके कुटुम्बभरको पालनेवाले हैं। हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजीके प्रेम ही हो॥ ४॥
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥ २०८॥
tumha kaham̐ bharata kalaṃka yaha hama saba kaham̐ upadesu|
rāma bhagati rasa siddhi hita bhā yaha samau ganesu|| 208||
Meaning हे भरत! तुम्हारे लिये (तुम्हारी समझमें) यह कलड्ल है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश (बड़ा शुभ) हुआ है॥ २०८॥
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥
nava bidhu bimala tāta jasu torā| raghubara kiṃkara kumuda cakorā||
udita sadā am̐thaihi kabahūm̐ nā| ghaṭihi na jaga nabha dina dina dūnā||
Meaning हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा॥ १॥
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥
निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥
koka tiloka prīti ati karihī| prabhu pratāpa rabi chabihi na harihī||
nisi dina sukhada sadā saba kāhū| grasihi na kaikai karatabu rāhū||
Meaning त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा। कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा॥ २॥
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥
राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥
pūrana rāma supema piyūṣā| gura avamāna doṣa nahiṃ dūṣā||
rāma bhagata aba amiam̐ aghāhūm̐| kīnhehu sulabha sudhā basudhāhūm̐||
Meaning यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतसे पूर्ण है। यह गुरुके अपमानरूपी दोषसे दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमाकी सृष्टि करके पृथ्वीपर भी अमृतको सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजीके भक्त इस अमृतसे तृप्त हो लें॥ ३॥
भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी॥
दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥
bhūpa bhagīratha surasari ānī| sumirata sakala suṃmagala khānī||
dasaratha guna gana barani na jāhīṃ| adhiku kahā jehi sama jaga nāhīṃ||
Meaning राजा भगीरथ गड़ाजीको लाये, जिन (गड़ाजी) का स्मरण ही सम्पूर्ण सुन्दर मड़लोंकी खान है। दशरथजीके गुणसमूहोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरीका जगत्में कोई नहीं है॥ ४॥
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥ २०९॥
jāsu saneha sakoca basa rāma pragaṭa bhae āi|
je hara hiya nayanani kabahum̐ nirakhe nahīṃ aghāi|| 209||
Meaning जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वशमें होकर स्वयं [सच्चिदानन्दघन] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदयके नेत्रोंसे कभी अघाकर नहीं देख पाये (अर्थात् जिनका स्वरूप हृदयमें देखते-देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए)॥ २०९॥
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥
तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥
kīrati bidhu tumha kīnha anūpā| jaham̐ basa rāma pema mṛgarūpā||
tāta galāni karahu jiyam̐ jāem̐| ḍarahu daridrahi pārasu pāem̐||
Meaning [परन्तु उनसे भी बढ़कर] तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमाको उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरनके [चिह्नके] रूपमें बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदयमें ग्लानि कर रहे हो। पारस पाकर भी तुम दरिद्रतासे डर रहे हो!॥ १॥
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥
sunahu bharata hama jhūṭha na kahahīṃ| udāsīna tāpasa bana rahahīṃ||
saba sādhana kara suphala suhāvā| lakhana rāma siya darasanu pāvā||
Meaning हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसीका पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसीकी मुँहदेखी नहीं कहते) और वनमें रहते हैं (किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनोंका उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका दर्शन प्राप्त हुआ॥ २॥
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ॥
tehi phala kara phalu darasa tumhārā| sahita payāga subhāga hamārā||
bharata dhanya tumha jasu jagu jayaū| kahi asa pema magana puni bhayaū||
Meaning [ सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फलका परम फल यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयागराजसमेत हमारा बड़ा भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत्को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेममें मगर हो गये॥ ३॥
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥
धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥
suni muni bacana sabhāsada haraṣe| sādhu sarāhi sumana sura baraṣe||
dhanya dhanya dhuni gagana payāgā| suni suni bharatu magana anurāgā||
Meaning भरद्वाज मुनिके वचन सुनकर सभासद् हर्षित हो गये। ' साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। आकाशमें और प्रयागराजमें ' धन्य, धन्य ' की ध्वनि सुन-सुनकर भरतजी प्रेममें मगर हो रहे हैं॥ ४॥
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥ २४१०॥
pulaka gāta hiyam̐ rāmu siya sajala saroruha naina|
kari pranāmu muni maṃḍalihi bole gadagada baina|| 2410||
Meaning भरतजीका शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीतारामजी हैं और कमलके समान नेत्र [प्रेमाश्रुके जलसे भरे हैं। वे मुनियोंकी मण्डलीको प्रणाम करके गदूद वचन बोले--॥ २१०॥
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥
एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥
muni samāju aru tīratharājū| sām̐cihum̐ sapatha aghāi akājū||
ehiṃ thala jauṃ kichu kahia banāī| ehi sama adhika na agha adhamāī||
Meaning मुनियोंका समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खानेसे भी भरपूर हानि होती है। इस स्थानमें यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी॥ १॥
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥
मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥
tumha sarbagya kahaum̐ satibhāū| ura aṃtarajāmī raghurāū||
mohi na mātu karataba kara socū| nahiṃ dukhu jiyam̐ jagu jānihi pocū||
Meaning मैं सच्चे भावसे कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयीकी करनीका कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मनमें इसी बातका दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा॥ २॥
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥
सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥
nāhina ḍaru bigarihi paralokū| pitahu marana kara mohi na sokū||
sukṛta sujasa bhari bhuana suhāe| lachimana rāma sarisa suta pāe||
Meaning न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजीके मरनेका ही मुझे शोक है। क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश विश्वभरमें सुशोभित है। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण-सरीखे पुत्र पाये॥ ३॥
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही॥
rāma biraham̐ taji tanu chanabhaṃgū| bhūpa soca kara kavana prasaṃgū||
rāma lakhana siya binu paga panahīṃ| kari muni beṣa phirahiṃ bana banahī||
Meaning फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें अपने क्षणभज्ुर शरीरको त्याग दिया, ऐसे राजाके लिये सोच करनेका कौन प्रसंग है ? [सोच इसी बातका है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरोंमें बिना जूतीके मुनियोंका वेष बनाये वन-वनमें फिरते हैं॥ ४॥
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात॥ २४११॥
ajina basana phala asana mahi sayana ḍāsi kusa pāta|
basi taru tara nita sahata hima ātapa baraṣā bāta|| 2411||
Meaning वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलोंका भोजन करते हैं, पृथ्वीपर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षोंके नीचे निवास करके नित्य सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं॥ २११॥
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥
एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥
ehi dukha dāham̐ dahai dina chātī| bhūkha na bāsara nīda na rātī||
ehi kuroga kara auṣadhu nāhīṃ| sodheum̐ sakala bisva mana māhīṃ||
Meaning इसी दुःखकी जलनसे निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिनमें भूख लगती है, न रातको नींद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्वको खोज डाला, पर इस कुरोगकी औषध कहीं नहीं है॥ १॥
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु॥
mātu kumata baṛhaī agha mūlā| tehiṃ hamāra hita kīnha bam̐sūlā||
kali kukāṭha kara kīnha kujaṃtrū| gāṛi avadhi paṛhi kaṭhina kumaṃtru||
Meaning माताका कुमत (बुरा विचार) पापोंका मूल बढ़ई है। उसने हमारे हितका बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठका कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षकी अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्रको गाड़ दिया। [यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है]॥ २॥
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥
mohi lagi yahu kuṭhāṭu tehiṃ ṭhāṭā| ghālesi saba jagu bārahabāṭā||
miṭai kujogu rāma phiri āem̐| basai avadha nahiṃ āna upāem̐||
Meaning मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट (बुरा साज) रचा और सारे जगत्को बारहबाट (छिन्न-भिन्न) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं॥ ३॥
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई॥
तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी॥
bharata bacana suni muni sukhu pāī| sabahiṃ kīnha bahu bhām̐ti baṛāī||
tāta karahu jani socu biseṣī| saba dukhu miṭahi rāma paga dekhī||
Meaning भरतजीके वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सभीने उनकी बहुत प्रकारसे बड़ाई की। [मुनिने कहा-- हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा॥ ४॥
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥ २१२॥
kari prabodha munibara kaheu atithi pemapriya hohu|
kaṃda mūla phala phūla hama dehiṃ lehu kari chohu|| 212||
Meaning इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीने उनका समाधान करके कहा--अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये॥ २१२॥
सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥
जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥
suni muni bacana bharata hiṃya socū| bhayau kuavasara kaṭhina sam̐kocū||
jāni garui gura girā bahorī| carana baṃdi bole kara jorī||
Meaning मुनिके वचन सुनकर भरतके हृदयमें सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेढब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनोंकी वाणीको महत्त्वपूर्ण (आदरणीय) समझकर, चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--॥ १॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा॥
भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए॥
sira dhari āyasu karia tumhārā| parama dharama yahu nātha hamārā||
bharata bacana munibara mana bhāe| suci sevaka siṣa nikaṭa bolāe||
Meaning हे नाथ! आपकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है। भरतजीके ये वचन मुनिश्रेष्ठके मनको अच्छे लगे। उन्होंने विधासपात्र सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया॥ २॥
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई॥
भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥
cāhie kīnha bharata pahunāī| kaṃda mūla phala ānahu jāī||
bhalehīṃ nātha kahi tinha sira nāe| pramudita nija nija kāja sidhāe||
Meaning [और कहा कि] भरतकी पहुनई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने कामको चल दिये॥ ३॥
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता॥
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई॥
munihi soca pāhuna baṛa nevatā| tasi pūjā cāhia jasa devatā||
suni ridhi sidhi animādika āī| āyasu hoi so karahiṃ gosāī||
Meaning मुनिको चिन्ता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमानको न्योता है। अब जैसा देवता हो, वैसी ही उसकी पूजा भी होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमादि सिद्धियाँ आ गयीं [और बोलीं-] हे गोसाईं! जो आपकी आज्ञा हो सो हम करें॥ ४॥
राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज॥ २१३॥
rāma biraha byākula bharatu sānuja sahita samāja|
pahunāī kari harahu śrama kahā mudita munirāja|| 213||
Meaning मुनिराजने प्रसन्न होकर कहा-छोटे भाई शत्रुष्न और समाजसहित भरतजी श्रीरामचन्द्रजी के विरहमें व्याकुल हैं, इनकी पहुनाई (आतिथ्य-सत्कार) करके इनके श्रमको दूर करो॥ २१३॥
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥
कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥
ridhi sidhi sira dhari munibara bānī| baṛabhāgini āpuhi anumānī||
kahahiṃ parasapara sidhi samudāī| atulita atithi rāma laghu bhāī||
Meaning ऋद्धि-सिद्धिने मुनिराजकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर अपनेको बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपसभमें कहने लगीं--श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलनामें कोई नहीं आ सकता॥ १॥
मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू॥
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना॥
muni pada baṃdi karia soi ājū| hoi sukhī saba rāja samājū||
asa kahi raceu rucira gṛha nānā| jehi biloki bilakhāhiṃ bimānā||
Meaning अतः मुनिके चरणोंकी वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी विलखते हैं (लजा जाते हैं)॥ २॥
भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे॥
दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें॥
bhoga bibhūti bhūri bhari rākhe| dekhata jinhahi amara abhilāṣe||
dāsīṃ dāsa sāju saba līnheṃ| jogavata rahahiṃ manahi manu dīnheṃ||
Meaning उन घरोंगें बहुत-से भोग (इन्द्रियोंके विषय) और ऐश्वर्य (ठाट-बाट) का सामान भरकर रख दिया, जिन्हें देखकर देवता भी ललचा गये। दासी-दास सब प्रकारकी सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनोंको देखते रहते हैं ( अर्थात् उनके मनकी रुचिके अनुसार करते रहते हैं)॥ ३॥
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं॥
प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही॥
saba samāju saji sidhi pala māhīṃ| je sukha surapura sapanehum̐ nāhīṃ||
prathamahiṃ bāsa die saba kehī| suṃdara sukhada jathā ruci jehī||
Meaning जो सुखके सामान स्वर्गमें भी स्वप्रमें भी नहीं हैं ऐसे सब सामान सिद्धियोंने पलभरमें सज दिये। पहले तो उन्होंने सब किसीको, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवासस्थान दिये॥ ४॥
बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥ २४४॥
bahuri saparijana bharata kahum̐ riṣi asa āyasu dīnha|
bidhi bisamaya dāyaku bibhava munibara tapabala kīnha|| 244||
Meaning और फिर कुटुम्बसहित भरतजीको दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजीने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [ भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियोंको आराम मिले, इसलिये उनके मनकी बात जानकर मुनिने पहले उन लोगोंको स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजीको स्थान देनेके लिये आज्ञा दी थी।] मुनिश्रेष्ठने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया॥ २१४॥
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी॥
muni prabhāu jaba bharata bilokā| saba laghu lage lokapati lokā||
sukha samāju nahiṃ jāi bakhānī| dekhata birati bisārahīṃ gyānī||
Meaning जब भरतजीने मुनिके प्रभावको देखा तो उसके सामने उन्हें [ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि] सभी लोकपालोंके लोक तुच्छ जान पड़े। सुखकी सामग्रीका वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं॥ १॥
आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना॥
सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना॥
āsana sayana subasana bitānā| bana bāṭikā bihaga mṛga nānā||
surabhi phūla phala amia samānā| bimala jalāsaya bibidha bidhānā||
Meaning आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चँदोवे, वन, बगीचे, भाँति-भाँतिके पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृतके समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकारके (तालाब, कुएँ, बावली आदि) निर्मल जलाशय,॥ २॥
असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥
asana pāna suca amia amī se| dekhi loga sakucāta jamī se||
sura surabhī surataru sabahī keṃ| lakhi abhilāṣu suresa sacī keṃ||
Meaning तथा अमृतके भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पानके पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों (विरक्त मुनियों) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभीके डेरोंमें [ मनोवाज्छित वस्तु देनेवाले ] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणीको भी अभिलाषा होती है (उनका भी मन ललचा जाता है)॥ ३॥
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥
ritu basaṃta baha tribidha bayārī| saba kaham̐ sulabha padāratha cārī||
straka caṃdana banitādika bhogā| dekhi haraṣa bisamaya basa logā||
Meaning वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकारकी हवा बह रही है। सभीको [ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगोंको देखकर सब लोग हर्ष और विषादके वश हो रहे हैं। [ हर्ष तो भोग-सामग्रियोंको और मुनिके तप:प्रभावको देखकर होता है और विषाद इस बातसे होता है कि श्रीरामके वियोगमें नियम-ब्रतसे रहनेवाले हमलोग भोग-विलासमें क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-ब्रतोंको न त्याग दे]॥ ४॥
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥ २१५॥
saṃpata cakaī bharatu caka muni āyasa khelavāra|
tehi nisi āśrama piṃjarām̐ rākhe bhā bhinusāra|| 215||
Meaning सम्पत्ति ( भोग-विलासकी सामग्री ) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनिकी आज्ञा खेल है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें दोनोंको बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। [जैसे किसी बहेलियेके द्वारा एक पिंजड़ेमें रखे जानेपर भी चकवी-चकवेका रातको संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजीकी आज्ञासे रातभर भोग-सामग्रियोंके साथ रहनेपर भी भरतजीने मनसे भी उनका स्पर्शतक नहीं किया।]॥ २१५॥
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा।
नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी।
करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥
kīnha nimajjanu tīratharājā| nāi munihi siru sahita samājā|| riṣi āyasu asīsa sira rākhī| kari daṃḍavata binaya bahu bhāṣī||
Meaning [ प्रात: काल] भरतजीने तीर्थराजमें स्रान किया और समाजसहित मुनिको सिर नवाकर और ऋषिकी आज्ञा तथा आशीर्वादको सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की॥ १॥
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥
रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥
patha gati kusala sātha saba līnhe| cale citrakūṭahiṃ citu dīnheṃ||
rāmasakhā kara dīnheṃ lāgū| calata deha dhari janu anurāgū||
Meaning तदनन्तर रास्तेकी पहचान रखनेवाले लोगों (कुशल पथप्रदर्शकों ) के साथ सब लोगोंको लिये हुए भरतजी चित्रकूटमें चित्त लगाये चले। भरतजी रामसखा गुहके हाथमें हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो॥ २॥
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया॥
लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी॥
nahiṃ pada trāna sīsa nahiṃ chāyā| pemu nemu bratu dharamu amāyā||
lakhana rāma siya paṃtha kahānī| pūm̐chata sakhahi kahata mṛdu bānī||
Meaning न तो उनके पैरोंमें जूते हैं और न सिरपर छाया है। उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट (सच्चा) है। वे सखा निषादराजसे लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीसे कहता है॥ ३॥
राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं॥
दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला॥
rāma bāsa thala biṭapa bilokeṃ| ura anurāga rahata nahiṃ rokaiṃ||
daikhi dasā sura barisahiṃ phūlā| bhai mṛdu mahi magu maṃgala mūlā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके ठहरनेकी जगहों और वृक्षोंको देखकर उनके हृदयमें प्रेम रोके नहीं रुकता। भरतजीकी यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो गयी और मार्ग मड़लका मूल बन गया॥ ४॥
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥ २१६॥
kiem̐ jāhiṃ chāyā jalada sukhada bahai bara bāta|
tasa magu bhayau na rāma kaham̐ jasa bhā bharatahi jāta|| 216||
Meaning बादल छाया किये जा रहे हैं, सुख देनेवाली सुन्दर हवा बह रही है। भरतजीके जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्रीरामचन्द्रजीको भी नहीं हुआ था॥ २१६॥
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥
ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥
jaṛa cetana maga jīva ghanere| je citae prabhu jinha prabhu here||
te saba bhae parama pada jogū| bharata darasa meṭā bhava rogū||
Meaning रास्तेमें असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमेंसे जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखा वे सब [उसी समय] परमपदके अधिकारी हो गये। परन्तु अब भरतजीके दर्शनने तो उनका भव (जन्म-मरण)-रूपी रोग मिटा ही दिया। [श्रीरामदर्शनसे तो वे परमपदके अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरतदर्शनसे उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया]॥ १॥
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥
बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥
yaha baṛi bāta bharata kai nāhīṃ| sumirata jinahi rāmu mana māhīṃ||
bāraka rāma kahata jaga jeū| hota tarana tārana nara teū||
Meaning भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं। जगत्में जो भी मनुष्य एक बार ' राम' कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं!॥ २॥
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥
bharatu rāma priya puni laghu bhrātā| kasa na hoi magu maṃgaladātā||
siddha sādhu munibara asa kahahīṃ| bharatahi nirakhi haraṣu hiyam̐ lahahīṃ||
Meaning फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे। तब भला उनके लिये मार्ग मज़ल (सुख) दायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजीको देखकर हृदयमें हर्ष-लाभ करते हैं॥ ३॥
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥
dekhi prabhāu suresahi socū| jagu bhala bhalehi poca kahum̐ pocū||
gura sana kaheu karia prabhu soī| rāmahi bharatahi bheṃṭa na hoī||
Meaning भरतजीके [इस प्रेमके] प्रभावको देखकर देवराज इन्द्रको सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमबश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय]। संसार भलेके लिये भला और बुरेके लिये बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजीसे कहा--हे प्रभो ! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीकी भेंट ही न हो॥ ४॥
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥ २१७॥
rāmu sam̐kocī prema basa bharata sapema payodhi|
banī bāta begarana cahati karia jatanu chalu sodhi|| 217||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेमके वश हैं और भरतजी प्रेमके समुद्र हैं। बनी-बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये॥ २१७॥
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥
bacana sunata suraguru musakāne| sahasanayana binu locana jāne||
māyāpati sevaka sana māyā| karai ta ulaṭi parai surarāyā||
Meaning इन्द्रके वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये। उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको [ ज्ञानरूपी ] नेत्रोंसे रहित (मूर्ख) समझा और कहा--हे देवराज! मायाके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सेवकके साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है॥ १॥
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी॥
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥
taba kichu kīnha rāma rukha jānī| aba kucāli kari hoihi hānī||
sunu suresa raghunātha subhāū| nija aparādha risāhiṃ na kāū||
Meaning उस समय (पिछली बार) तो श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर कुछ किया था। परन्तु इस समय कुचाल करनेसे हानि ही होगी। हे देवराज ! श्रीरघुनाथजीका स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराधसे कभी रुष्ट नहीं होते॥ २॥
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥
jo aparādhu bhagata kara karaī| rāma roṣa pāvaka so jaraī||
lokahum̐ beda bidita itihāsā| yaha mahimā jānahiṃ durabāsā||
Meaning पर जो कोई उनके भक्तका अपराध करता है, वह श्रीरामकी क्रोधाग्िमें जल जाता है। लोक और वेद दोनोंमें इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमाको दुर्वासाजी जानते हैं॥ ३॥
भरत सरिस को राम सनेही।
जगु जप राम रामु जप जेही॥
bharata sarisa ko rāma sanehī| jagu japa rāma rāmu japa jehī||
Meaning सारा जगत् श्रीरामको जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं उन भरतजीके समान श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी कौन होगा ?॥ '४॥
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु॥ २१८॥
manahum̐ na ānia amarapati raghubara bhagata akāju|
ajasu loka paraloka dukha dina dina soka samāju|| 218||
Meaning हे देवराज! रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके भक्तका काम बिगाड़नेकी बात मनमें भी न लाइये। ऐसा करनेसे लोकमें अपयश और परलोकमें दुःख होगा और शोकका सामान दिनोंदिन बढ़ता ही चला जायगा॥ २१८॥
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥
मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई॥
sunu suresa upadesu hamārā| rāmahi sevaku parama piārā||
mānata sukhu sevaka sevakāī| sevaka baira bairu adhikāī||
Meaning हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्रीरामजीको अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवककी सेवासे सुख मानते हैं और सेवकके साथ वैर करनेसे बड़ा भारी वैर मानते हैं॥ १॥
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
jadyapi sama nahiṃ rāga na roṣū| gahahiṃ na pāpa pūnu guna doṣū||
karama pradhāna bisva kari rākhā| jo jasa karai so tasa phalu cākhā||
Meaning यद्यपि वे सम हैं--उनमें न राग है, न रोष है। और न वे किसीका पाप-पुण्य और गुण- दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है॥ २॥
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥
अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस॥
tadapi karahiṃ sama biṣama bihārā| bhagata abhagata hṛdaya anusārā||
aguna alepa amāna ekarasa| rāmu saguna bhae bhagata pema basa||
Meaning तथापि वे भक्त और अभक्तके हदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं ( भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं)। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्तके प्रेमवबश ही सगुण हुए हैं॥ ३॥
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥
rāma sadā sevaka ruci rākhī| beda purāna sādhu sura sākhī||
asa jiyam̐ jāni tajahu kuṭilāī| karahu bharata pada prīti suhāī||
Meaning श्रीरामजी सदा अपने सेवकों ( भक्तों ) की रुचि रखते आये हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो॥ ४॥
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥ २१९॥
rāma bhagata parahita nirata para dukha dukhī dayāla|
bhagata siromani bharata teṃ jani ḍarapahu surapāla|| 219||
Meaning हे देवराज इन्द्र ! श्रीरामचन्द्रजीके भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, वे दूसरोंके दु:खसे दुःखी और दयालु होते हैं। फिर, भरतजी तो भक्तोंके शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो॥ २१९॥
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥
satyasaṃdha prabhu sura hitakārī| bharata rāma āyasa anusārī||
svāratha bibasa bikala tumha hohū| bharata dosu nahiṃ rāura mohū||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंका हित करनेवाले हैं। और भरतजी श्रीरामजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थके विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजीका कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है॥ १॥
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी॥
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ॥
suni surabara suragura bara bānī| bhā pramodu mana miṭī galānī||
baraṣi prasūna haraṣi surarāū| lage sarāhana bharata subhāū||
Meaning देवगुरु बृहस्पतिजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर इन्द्रके मनमें बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजीके स्वभावकी सराहना करने लगे॥ २॥
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥
जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा॥
ehi bidhi bharata cale maga jāhīṃ| dasā dekhi muni siddha sihāhīṃ||
jabahiṃ rāmu kahi lehiṃ usāsā| umagata pemu manaham̐ cahu pāsā||
Meaning इस प्रकार भरतजी मार्गमें ' चले ' जा रहे हैं। उनकी [ प्रेममयी। दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी राम कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है॥ ३॥
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना॥
बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए॥
dravahiṃ bacana suni kulisa paṣānā| purajana pemu na jāi bakhānā||
bīca bāsa kari jamunahiṃ āe| nirakhi nīru locana jala chāe||
Meaning उनके [प्रेम और दीनतासे पूर्ण] वचनोंको सुनकर वत्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं। अयोध्यावासियोंका प्रेम कहते नहीं बनता। बीचमें निवास (मुकाम) करके भरतजी यमुनाजीके तटपर आये। यमुनाजीका जल देखकर उनके नेत्रोंगें जल भर आया॥ ४॥
रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज॥ २२०॥
raghubara barana biloki bara bāri sameta samāja|
hota magana bāridhi biraha caṛhe bibeka jahāja|| 220||
Meaning श्रीरघुनाथजीके (श्याम) रंगका सुन्दर जल देखकर सारे समाजसहित भरतजी [। प्रेमविह्नल होकर श्रीरामजीके विरहरूपी समुद्रमें डूबते-डूबते विवेकरूपी जहाजपर चढ़ गये (अर्थात् यमुनाजीका श्यामवर्ण जल देखकर सब लोग श्यामवर्ण भगवान्के प्रेममें विह्लल हो गये और उन्हें न पाकर विरहव्यथासे पीड़ित हो गये; तब भरतजीको यह ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे, इस विवेकसे वे फिर उत्साहित हो गये)॥ २२०॥
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥
रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥
jamuna tīra tehi dina kari bāsū| bhayau samaya sama sabahi supāsū||
rātahiṃ ghāṭa ghāṭa kī taranī| āīṃ aganita jāhiṃ na baranī||
Meaning उस दिन यमुनाजीके किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये [खान-पान आदिकी सुन्दर व्यवस्था हुई। [ निषादराजका सड्ेत पाकर] रात-ही-रातमें घाट-घाटकी अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १॥
प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥
चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥
prāta pāra bhae ekahi kheṃvām̐| toṣe rāmasakhā kī sevām̐||
cale nahāi nadihi sira nāī| sātha niṣādanātha dou bhāī||
Meaning सबेरे एक ही खेवेमें सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजकी इस सेवासे सन्तुष्ट हुए। फिर स्नान करके और नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चले॥ २॥
आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें॥
तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें॥
āgeṃ munibara bāhana ācheṃ| rājasamāja jāi sabu pācheṃ||
tehiṃ pācheṃ dou baṃdhu payādeṃ| bhūṣana basana beṣa suṭhi sādeṃ||
Meaning आगे अच्छी-अच्छी सवारियोंपर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राजसमाज जा रहा है। उसके पीछे दोनों भाई बहुत सादे भूषण-वस्त्र और वेषसे पैदल चल रहे हैं॥३॥
सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥
sevaka suhrada sacivasuta sāthā| sumirata lakhanu sīya raghunāthā||
jaham̐ jaham̐ rāma bāsa biśrāmā| taham̐ taham̐ karahiṃ saprema pranāmā||
Meaning सेवक, मित्र और मन्त्रीके पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजीने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं॥ ४॥
मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ॥ २२१॥
magabāsī nara nāri suni dhāma kāma taji dhāi|
dekhi sarūpa saneha saba mudita janama phalu pāi|| 221||
Meaning मार्गमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर और काम-काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप (सौन्दर्य) और प्रेमको देखकर वे सब जन्म लेनेका फल पाकर आनन्दित होते हैं॥ २२१॥
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं॥
बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली॥
kahahiṃ sapema eka eka pāhīṃ| rāmu lakhanu sakhi hohiṃ ki nāhīṃ||
baya bapu barana rūpa soi ālī| sīlu sanehu sarisa sama cālī||
Meaning गाँवोंकी स्त्रियाँ एक-दूसरीसे प्रेमपूर्वक कहती हैं--सखी ! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं ? हे सखी ! इनकी अवस्था, शरीर और रंग-रूप तो वही है। शील, स््रेह उन्हींके सदूृश है और चाल भी उन्हींके समान है॥ १॥
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥
beṣu na so sakhi sīya na saṃgā| āgeṃ anī calī caturaṃgā||
nahiṃ prasanna mukha mānasa khedā| sakhi saṃdehu hoi ehiṃ bhedā||
Meaning परन्तु हे सखी ! इनका न तो वह वेष (वल्कलवस्त्रधारी मुनिवेष) है, न सीताजी ही संग हैं। और इनके आगे चतुरड्िणी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मनमें खेद है। हे सखी! इसी भेदके कारण सन्देह होता है॥ २॥
तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी॥
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी॥
tāsu taraka tiyagana mana mānī| kahahiṃ sakala tehi sama na sayānī||
tehi sarāhi bānī phuri pūjī| bolī madhura bacana tiya dūjī||
Meaning उसका तर्क (युक्ति) अन्य स्त्रियोंके मन भाया। सब कहती हैं कि इसके समान सयानी (चतुर) कोई नहीं है। उसकी सराहना करके और “तेरी वाणी सत्य है' इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली॥ ३॥
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू॥
भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी॥
kahi sapema saba kathāprasaṃgū| jehi bidhi rāma rāja rasa bhaṃgū||
bharatahi bahuri sarāhana lāgī| sīla saneha subhāya subhāgī||
Meaning श्रीरामजीके राजतिलकका आनन्द जिस प्रकारसे भंग हुआ था वह सब कथाप्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री श्रीभरतजीके शील, स्नेह और स्वभावकी सराहना करने लगी॥ ४॥
चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु॥ २२२॥
calata payādeṃ khāta phala pitā dīnha taji rāju|
jāta manāvana raghubarahi bharata sarisa ko āju|| 222||
Meaning [वह बोली-] देखो, ये भरतजी पिताके दिये हुए राज्यको त्यागकर पैदल चलते और फलाहार करते हुए श्रीरामजीको मनानेके लिये जा रहे हैं। इनके समान आज कौन है ?॥ २२२॥
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥
जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई॥
bhāyapa bhagati bharata ācaranū| kahata sunata dukha dūṣana haranū||
jo kachu kahaba thora sakhi soī| rāma baṃdhu asa kāhe na hoī||
Meaning भरतजीका भाईपना, भक्ति और इनके आचरण कहने और सुननेसे दु:ख और दोषों के हरनेवाले हैं। हे सखी ! उनके सम्बन्धमें जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है। श्रीरामचन्द्रजी के भाई ऐसे क्यों न हों ?॥ १॥
हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें॥
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं॥
hama saba sānuja bharatahi dekheṃ| bhainha dhanya jubatī jana lekheṃ||
suni guna dekhi dasā pachitāhīṃ| kaikai janani jogu sutu nāhīṃ||
Meaning छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजीको देखकर हम सब भी आज धन्य (बड़भागिनी ) स्त्रियोंकी गिनतीमें आ गयीं। इस प्रकार भरतजीके गुण सुनकर और उनकी दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं और कहती हैं--यह पुत्र कैकेयी-जैसी माताके योग्य नहीं है॥ २॥
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन॥
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी॥
kou kaha dūṣanu rānihi nāhina| bidhi sabu kīnha hamahi jo dāhina||
kaham̐ hama loka beda bidhi hīnī| laghu tiya kula karatūti malīnī||
Meaning कोई कहती हैं--इसमें रानीका भी दोष नहीं है। यह सब विधाताने ही किया है, जो हमारे अनुकूल है। कहाँ तो हम लोक और वेद दोनोंकी विधि (मर्यादा) से हीन, कुल और करतूत दोनोंसे मलिन तुच्छ स्त्रियाँ,॥ ३॥
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा॥
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा॥
basahiṃ kudesa kugām̐va kubāmā| kaham̐ yaha darasu punya parināmā||
asa anaṃdu aciriju prati grāmā| janu marubhūmi kalapataru jāmā||
Meaning जो बुरे देश (जंगली प्रान्त) और बुरे गाँवमें बसती हैं और [स्त्रियोंगें भी] नीच स्त्रयाँ हैं! और कहाँ यह महान् पुण्योंका परिणामस्वरूप इनका दर्शन ! ऐसा ही आनन्द और आश्चर्य गाँव- गाँवमें हो रहा है। मानो मरुभूमिमें कल्पवृक्ष उग गया हो॥ ४॥
भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु॥ २२३॥
bharata darasu dekhata khuleu maga loganha kara bhāgu|
janu siṃghalabāsinha bhayau bidhi basa sulabha prayāgu|| 223||
Meaning भरतजीका स्वरूप देखते ही रास्तेमें रहनेवाले लोगोंके भाग्य खुल गये! मानो दैवयोगसे सिंहलद्वीपके बसनेवालोंको तीर्थराज प्रयाग सुलभ हो गया हो!॥ २२३॥