चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी॥
जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना॥
cakka cakki jimi pura nara nārī| cahata prāta ura ārata bhārī||
jāgata saba nisi bhayau bihānā| bharata bolāe saciva sujānā||
Meaning नगरके नर-नारी चकवे-चकवीकी भाँति हदयमें अत्यन्त आर्त होकर प्रात:कालका होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजीने चतुर मन्त्रियोंको बुलवाया--॥ १॥
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू॥
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥
kaheu lehu sabu tilaka samājū| banahiṃ deba muni rāmahiṃ rājū||
begi calahu suni saciva johāre| turata turaga ratha nāga sam̐vāre||
Meaning और कहा--तिलकका सब सामान ले चलो। वनमें ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीको राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मन्त्रियोंने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये॥ २॥
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ॥
बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना॥
aruṃdhatī aru agini samāū| ratha caṛhi cale prathama munirāū||
bipra bṛṃda caṛhi bāhana nānā| cale sakala tapa teja nidhānā||
Meaning सबसे पहले मुनिराज वसिष्टजी अरुन्धती और अग्निहोत्रकी सब सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणोंके समूह, जो सब-के-सब तपस्या और तेजके भण्डार थे, अनेकों सवारियोंपर चढ़कर चले॥ ३॥
नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना॥
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी॥
nagara loga saba saji saji jānā| citrakūṭa kaham̐ kīnha payānā||
sibikā subhaga na jāhiṃ bakhānī| caṛhi caṛhi calata bhaī saba rānī||
Meaning नगरके सब लोग रथोंको सजा-सजाकर चित्रकूटको चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियोंपर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं॥ ४॥
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ॥ २८७॥
sauṃpi nagara suci sevakani sādara sakala calāi|
sumiri rāma siya carana taba cale bharata dou bhāi|| 287||
Meaning विश्वासपात्र सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजीके चरणोंको स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले॥ १८७॥
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥
बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥
rāma darasa basa saba nara nārī| janu kari karini cale taki bārī||
bana siya rāmu samujhi mana māhīṃ| sānuja bharata payādehiṃ jāhīṃ||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके वशमें हुए ( दर्शनकी अनन्य लालसासे ) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जलको तककर [ बड़ी तेजीसे बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखोंको छोड़कर] वनमें हैं, मनमें ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं॥ १॥
देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे॥
जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली॥
dekhi sanehu loga anurāge| utari cale haya gaya ratha tyāge||
jāi samīpa rākhi nija ḍolī| rāma mātu mṛdu bānī bolī||
Meaning उनका स्त्रेह देखकर लोग प्रेममें मग्र हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथोंको छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजी भरतजीके पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणीसे बोलीं--॥ २॥
तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥
तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥
tāta caṛhahu ratha bali mahatārī| hoihi priya parivāru dukhārī||
tumhareṃ calata calihi sabu logū| sakala soka kṛsa nahiṃ maga jogū||
Meaning हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथपर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सभी लोग पैदल चलेंगे। शोकके मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल रास्तेके (पैदल चलनेके) योग्य नहीं हैं॥ ३॥
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई॥
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू॥
sira dhari bacana carana siru nāī| ratha caṛhi calata bhae dou bhāī||
tamasā prathama divasa kari bāsū| dūsara gomati tīra nivāsū||
Meaning माताकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसापर वास (मुकाम) करके दूसरा मुकाम गोमतीके तीरपर किया॥ ४॥
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग॥ २८८॥
paya ahāra phala asana eka nisi bhojana eka loga|
karata rāma hita nema brata parihari bhūṣana bhoga|| 288||
Meaning कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रातको एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग-विलासको छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके लिये नियम और व्रत करते हैं॥ १८८॥
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥
समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥
saī tīra basi cale bihāne| sṛṃgaberapura saba niarāne||
samācāra saba sune niṣādā| hṛdayam̐ bicāra karai sabiṣādā||
Meaning रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब श्रुज़वेरपुरके समीप जा पहुँचे। निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा--॥ १॥
कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं॥
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥
kārana kavana bharatu bana jāhīṃ| hai kachu kapaṭa bhāu mana māhīṃ||
jauṃ pai jiyam̐ na hoti kuṭilāī| tau kata līnha saṃga kaṭakāī||
Meaning क्या कारण है जो भरत वनको जा रहे हैं, मनमें कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मनमें कुटिलता न होती, तो साथमें सेना क्यों ले चले हैं॥ २॥
जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥
भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥
jānahiṃ sānuja rāmahi mārī| karaum̐ akaṃṭaka rāju sukhārī||
bharata na rājanīti ura ānī| taba kalaṃku aba jīvana hānī||
Meaning समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामको मारकर सुखसे निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरतने हृदयमें राजनीतिको स्थान नहीं दिया (राजनीतिका विचार नहीं किया)। तब (पहले) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा॥ ३॥
सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा॥
का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं॥
sakala surāsura jurahiṃ jujhārā| rāmahi samara na jītanihārā||
kā ācaraju bharatu asa karahīṃ| nahiṃ biṣa beli amia phala pharahīṃ||
Meaning सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायेँ, तो भी श्रीरामजीको रणमें जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विषकी बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं !॥ '४॥
अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु॥ १८९॥
asa bicāri guham̐ gyāti sana kaheu sajaga saba hohu|
hathavām̐sahu borahu tarani kījia ghāṭārohu|| 189||
Meaning ऐसा विचारकर गुह (निषादराज) ने अपनी जातिवालोंसे कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावोंको हाथमें (कब्जेमें) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटोंको रोक दो॥ १८९॥
होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥
hohu sam̐joila rokahu ghāṭā| ṭhāṭahu sakala marai ke ṭhāṭā||
sanamukha loha bharata sana leūm̐| jiata na surasari utarana deūm̐||
Meaning सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो (अर्थात् भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरतसे सामने (मैदानमें ) लोहा लूँगा ( मुठभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गड़ापार न उतरने दूँगा॥ १॥
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा॥
भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥
samara maranu puni surasari tīrā| rāma kāju chanabhaṃgu sarīrā||
bharata bhāi nṛpu mai jana nīcū| baṛeṃ bhāga asi pāia mīcū||
Meaning युद्धमें मरण, फिर गज़ाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभजुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाय); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा (उनके हाथसे मरना) और मैं नीच सेवक--बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है॥ २॥
स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥
svāmi kāja karihaum̐ rana rārī| jasa dhavalihaum̐ bhuvana dasa cārī||
tajaum̐ prāna raghunātha nihoreṃ| duhūm̐ hātha muda modaka moreṃ||
Meaning मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्चल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)॥ ३॥
साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥
जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥
sādhu samāja na jākara lekhā| rāma bhagata mahum̐ jāsu na rekhā||
jāyam̐ jiata jaga so mahi bhārū| jananī jaubana biṭapa kuṭhārū||
Meaning साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगतमें पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है॥ '४॥
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥ १९०॥
bigata biṣāda niṣādapati sabahi baṛhāi uchāhu|
sumiri rāma māgeu turata tarakasa dhanuṣa sanāhu|| 190||
Meaning [ इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा॥ १९०॥
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ॥
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा॥
begahu bhāihu sajahu sam̐joū| suni rajāi kadarāi na koū||
bhalehiṃ nātha saba kahahiṃ saharaṣā| ekahiṃ eka baṛhāvai karaṣā||
Meaning [उसने कहा--] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे। सब हर्षके साथ बोल उठे-टे नाथ! बहुत अच्छा; और आपसभें एक- दूसरेका जोश बढ़ाने लगे॥ १॥
चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं॥
cale niṣāda johāri johārī| sūra sakala rana rūcai rārī||
sumiri rāma pada paṃkaja panahīṃ| bhāthīṃ bām̐dhi caṛhāinhi dhanahīṃ||
Meaning निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भाधियाँ (छोटे-छोटे तरकस) बाँधकर धनुहियों (छोटे-छोटे धनुषों )-पर प्रत्यज्ञा चढ़ायीं॥ २॥
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥
am̐garī pahiri kūm̐ṛi sira dharahīṃ| pharasā bām̐sa sela sama karahīṃ||
eka kusala ati oṛana khām̐ṛe| kūdahi gagana manahum̐ chiti chām̐ṛe||
Meaning कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवारके वार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंगमें भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद (उछल) रहे हों॥ ३॥
निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई॥
देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने॥
nija nija sāju samāju banāī| guha rāutahi johāre jāī||
dekhi subhaṭa saba lāyaka jāne| lai lai nāma sakala sanamāne||
Meaning अपना-अपना साज-समाज (लड़ाईका सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की। निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले- लेकर सबका सम्मान किया॥ ४॥
भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥ १९१॥
bhāihu lāvahu dhokha jani āju kāja baṛa mohi|
suni saroṣa bole subhaṭa bīra adhīra na hohi|| 191||
Meaning [उसने कहा-] हे भाइयो! धोखा न लाना (अर्थात् मरनेसे न घबराना),आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे-टे वीर! अधीर मत हो॥ १९१॥
राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥
जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥
rāma pratāpa nātha bala tore| karahiṃ kaṭaku binu bhaṭa binu ghore||
jīvata pāu na pācheṃ dharahīṃ| ruṃḍa muṃḍamaya medini karahīṃ||
Meaning हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रतापसे और आपके बलसे हमलोग भरतकी सेनाको बिना वीर और बिना घोड़ेकी कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़ेको मार डालेंगे)। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वीको रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ोंसे छा देंगे)॥ १॥
दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥
एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥
dīkha niṣādanātha bhala ṭolū| kaheu bajāu jujhāū ḍholū||
etanā kahata chīṃka bhai bām̐e| kaheu sagunianha kheta suhāe||
Meaning निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर कहा--जुझाऊ (लड़ाईका) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारनेवालोंने कहा कि खेत सुन्दर हैं (जीत होगी)॥ २॥
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥
रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥
būṛhu eku kaha saguna bicārī| bharatahi milia na hoihi rārī||
rāmahi bharatu manāvana jāhīṃ| saguna kahai asa bigrahu nāhīṃ||
Meaning एक बूढ़ेने शकुन विचारकर कहा--भरतसे मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजीको मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है॥ ३॥
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥
suni guha kahai nīka kaha būṛhā| sahasā kari pachitāhiṃ bimūṛhā||
bharata subhāu sīlu binu būjheṃ| baṛi hita hāni jāni binu jūjheṃ||
Meaning यह सुनकर निषादराज गुहने कहा--बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दीमें (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजीका शील-स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करनेमें हितकी बहुत बड़ी हानि है॥ ४॥
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ॥ १९२॥
gahahu ghāṭa bhaṭa samiṭi saba leum̐ marama mili jāi|
būjhi mitra ari madhya gati tasa taba karihaum̐ āi|| 192||
Meaning अतएव हे वीरो! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटोंको रोक लो, मैं जाकर भरतजीसे मिलकर उनका भेद लेता हूँ। उनका भाव मित्रका है या शत्रुका या उदासीनका, यह जानकर तब आकर वैसा (उसीके अनुसार) प्रबन्ध करूँगा॥ १९२॥
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥
अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥
lakhana sanehu subhāyam̐ suhāem̐| bairu prīti nahiṃ duraim̐ durāem̐||
asa kahi bheṃṭa sam̐jovana lāge| kaṃda mūla phala khaga mṛga māge||
Meaning उनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्रेहको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये॥ १॥
मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥
mīna pīna pāṭhīna purāne| bhari bhari bhāra kahāranha āne||
milana sāju saji milana sidhāe| maṃgala mūla saguna subha pāe||
Meaning कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियोंके भार भर-भरकर लाये। भेंटका सामान सजाकर मिलनेके लिये चले तो मज़लदायक शुभ शकुन मिले॥ २॥
देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥
dekhi dūri teṃ kahi nija nāmū| kīnha munīsahi daṃḍa pranāmū||
jāni rāmapriya dīnhi asīsā| bharatahi kaheu bujhāi munīsā||
Meaning निषादराजने मुनिराज वसिष्टजीको देखकर अपना नाम बतलाकर दूरहीसे दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठतजीने उसको रामका प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजीको समझाकर कहा [कि यह श्रीरामजीका मित्र है]॥ ३॥
राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥
rāma sakhā suni saṃdanu tyāgā| cale utari umagata anurāgā||
gāum̐ jāti guham̐ nāum̐ sunāī| kīnha johāru mātha mahi lāī||
Meaning यह श्रीरामका मित्र है, इतना सुनते ही भरतजीने रथ त्याग दिया। वे रथसे उतरकर प्रेममें उमँगते हुए चले। निषादराज गुहने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वीपर माथा टेककर जोहार की॥ ४॥
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ॥ १९३॥
karata daṃḍavata dekhi tehi bharata līnha ura lāi|
manahum̐ lakhana sana bheṃṭa bhai prema na hṛdayam̐ samāi|| 193||
Meaning दण्डवत् करते देखकर भरतजीने उठाकर उसको छातीसे लगा लिया। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजीसे भेंट हो गयी हो॥ १९३॥
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥
bheṃṭata bharatu tāhi ati prītī| loga sihāhiṃ prema kai rītī||
dhanya dhanya dhuni maṃgala mūlā| sura sarāhi tehi barisahiṃ phūlā||
Meaning भरतजी गुहको अत्यन्त प्रेमसे गले लगा रहे हैं। प्रेमकी रीतिको सब लोग सिहा रहे हैं ( इर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं), मज़लकी मूल ' धन्य-धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं॥ १॥
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥
loka beda saba bhām̐tihiṃ nīcā| jāsu chām̐ha chui leia sīṃcā||
tehi bhari aṃka rāma laghu bhrātā| milata pulaka paripūrita gātā||
Meaning [वे कहते हैं--] जो लोक और वेद दोनोंमें सब प्रकारसे नीचा माना जाता है, जिसकी छायाके छू जानेसे भी स्त्रान करना होता है, उसी निषादसे अँकवार भरकर (हृदयसे चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरतजी [ आनन्द और प्रेमवश] शरीरमें पुलकावलीसे परिपूर्ण हो मिल रहे हैं॥२॥
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥
rāma rāma kahi je jamuhāhīṃ| tinhahi na pāpa puṃja samuhāhīṃ||
yaha tau rāma lāi ura līnhā| kula sameta jagu pāvana kīnhā||
Meaning जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं ( अर्थात् आलस्यसे भी जिनके मुँहसे रामनामका उच्चारण हो जाता है), पापोंके समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुहको तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने हृदयसे लगा लिया और कुलसमेत इसे जगत्पावन (जगत्को पतित्र करनेवाला) बना दिया॥ ३॥
करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥
उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥
karamanāsa jalu surasari paraī| tehi ko kahahu sīsa nahiṃ dharaī||
ulaṭā nāmu japata jagu jānā| bālamīki bhae brahma samānā||
Meaning कर्मनाशा नदीका जल गड़ाजीमें पड़ जाता है (मिल जाता है), तब कहिये, उसे कौन सिरपर धारण नहीं करता ? जगत् जानता है कि उलटा नाम (मरा-मरा)जपते-जपते वालमीकिजी ब्रह्मके समान हो गये॥ ४॥
स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥ १९४॥
svapaca sabara khasa jamana jaṛa pāvam̐ra kola kirāta|
rāmu kahata pāvana parama hota bhuvana bikhyāta|| 194||
Meaning मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवनमें विख्यात हो जाते हैं॥ १९४॥
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥
राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं॥
nahiṃ aciraju juga juga cali āī| kehi na dīnhi raghubīra baṛāī||
rāma nāma mahimā sura kahahīṃ| suni suni avadhaloga sukhu lahahīṃ||
Meaning इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तरसे यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजीने किसको बड़ाई नहीं दी ? इस प्रकार देवता रामनामकी महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अयोध्याके लोग सुख पा रहे हैं॥ १॥
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥
देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥
rāmasakhahi mili bharata sapremā| pūm̐chī kusala sumaṃgala khemā||
dekhi bharata kara sīla sanehū| bhā niṣāda tehi samaya bidehū||
Meaning रामसखा निषादराजसे प्रेमके साथ मिलकर भरतजीने कुशल, मज़ल और क्षेम पूछी। भरतजीका शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया (प्रेममुग्ध होकर देहकी सुध भूल गया)॥ २॥
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥
sakuca sanehu modu mana bāṛhā| bharatahi citavata ekaṭaka ṭhāṛhā||
dhari dhīraju pada baṃdi bahorī| binaya saprema karata kara jorī||
Meaning उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजीको देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रेमके साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा--॥ ३॥
कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥
kusala mūla pada paṃkaja pekhī| maiṃ tihum̐ kāla kusala nija lekhī||
aba prabhu parama anugraha toreṃ| sahita koṭi kula maṃgala moreṃ||
Meaning हे प्रभो ! कुशलके मूल आपके चरणकमलोंके दर्शन कर मैंने तीनों कालोंमें अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रहसे करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों )-सहित मेरा मज़ल (कल्याण) हो गया॥ ४॥
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥ १९५॥
samujhi mori karatūti kulu prabhu mahimā jiyam̐ joi|
jo na bhajai raghubīra pada jaga bidhi baṃcita soi|| 195||
Meaning मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख (विचार)कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ! पर उन्होंने मुझ-जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया--यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगतमें विधाताके द्वारा ठगा गया है॥ १९५॥
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥
राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥
kapaṭī kāyara kumati kujātī| loka beda bāhera saba bhām̐tī||
rāma kīnha āpana jabahī teṃ| bhayaum̐ bhuvana bhūṣana tabahī teṃ||
Meaning मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनोंसे सब प्रकारसे बाहर हूँ। पर जबसे श्रीरामचन्द्रजीने मुझे अपनाया है, तभीसे मैं विश्वका भूषण हो गया॥ १॥
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥
कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥
dekhi prīti suni binaya suhāī| mileu bahori bharata laghu bhāī||
kahi niṣāda nija nāma subānīṃ| sādara sakala johārīṃ rānīṃ||
Meaning निषादराजकी प्रीतिको देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजीके छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषादने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर (नम्र और मधुर) वाणीसे सब रानियोंको आदरपूर्वक जोहार की॥ २॥
जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥
निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥
jāni lakhana sama dehiṃ asīsā| jiahu sukhī saya lākha barīsā||
nirakhi niṣādu nagara nara nārī| bhae sukhī janu lakhanu nihārī||
Meaning रानियाँ उसे लक्ष्मणजीके समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षोतक सुखपूर्वक जिओ। नगरके स्त्री-पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजीको देख रहे हों॥ ३॥
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥
kahahiṃ laheu ehiṃ jīvana lāhū| bheṃṭeu rāmabhadra bhari bāhū||
suni niṣādu nija bhāga baṛāī| pramudita mana lai caleu levāī||
Meaning सब कहते हैं कि जीवनका लाभ तो इसीने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीने भुजाओंमें बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्यकी बड़ाई सुनकर मनमें परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला॥ ४॥
सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ॥ १९६॥
sanakāre sevaka sakala cale svāmi rukha pāi|
ghara taru tara sara bāga bana bāsa banāenhi jāi|| 196||
Meaning उसने अपने सब सेवकोंको इशारेसे कह दिया। वे स्वामीका रुख पाकर चले और उन्होंने घरोंमें, वृक्षोंके नीचे, तालाबोंपर तथा बगीचों और जंगलों में ठहरनेके लिये स्थान बना दिये॥ १९६॥
सृंगबेरपुर भरत दीख जब।
भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥
sṛṃgaberapura bharata dīkha jaba| bhe saneham̐ saba aṃga sithila taba||
सोहत दिएँ निषादहि लागू।
जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥
sohata diem̐ niṣādahi lāgū| janu tanu dhareṃ binaya anurāgū||
Meaning भरतजीने जब श्रज़वेरपुरको देखा, तब उनके सब आड़ प्रेमके कारण शिथिल हो गये। वे निषादको लाग दिये ( अर्थात् उसके कंधेपर हाथ रखे चलते हुए) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों॥ १॥
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥
ehi bidhi bharata senu sabu saṃgā| dīkhi jāi jaga pāvani gaṃgā||
rāmaghāṭa kaham̐ kīnha pranāmū| bhā manu maganu mile janu rāmū||
Meaning इस प्रकार भरतजीने सब सेनाको साथमें लिये हुए जगत्को पवित्र करनेवाली गड़ाजीके दर्शन किये। श्रीरामघाटको [जहाँ श्रीरामजीने स्रान-सन्ध्या की थी] प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्दमग्र हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों॥ २॥
करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥
karahiṃ pranāma nagara nara nārī| mudita brahmamaya bāri nihārī||
kari majjanu māgahiṃ kara jorī| rāmacaṃdra pada prīti na thorī||
Meaning नगरके नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गड़ाजीके ब्रहरूप जलको देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गज़ाजीमें स्नानकर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणों में हमारा प्रेम कम न हो (अर्थात् बहुत अधिक हो)॥ ३॥
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥
जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥
bharata kaheu surasari tava renū| sakala sukhada sevaka suradhenū||
jori pāni bara māgaum̐ ehū| sīya rāma pada sahaja sanehū||
Meaning भरतजीने कहा--हे गड़े ! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवकके लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥ ४॥
एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ॥ १९७॥
ehi bidhi majjanu bharatu kari gura anusāsana pāi|
mātu nahānīṃ jāni saba ḍerā cale lavāi|| 197||
Meaning इस प्रकार भरतजी स्तरान कर और गुरुजीकी आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएँ स्रान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले॥ १९७॥
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥
सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥
jaham̐ taham̐ loganha ḍerā kīnhā| bharata sodhu sabahī kara līnhā||
sura sevā kari āyasu pāī| rāma mātu pahiṃ ge dou bhāī||
Meaning लोगोंने जहाँ-तहाँ डेरा डाल दिया। भरतजीने सभीका पता लगाया [कि सब लोग आकर आरामसे टिक गये हैं या नहीं]। फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीके पास गये॥ १॥
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥
carana cām̐pi kahi kahi mṛdu bānī| jananīṃ sakala bharata sanamānī||
bhāihi sauṃpi mātu sevakāī| āpu niṣādahi līnha bolāī||
Meaning चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजीने सब माताओंका सत्कार किया। फिर भाई शत्रु्तको माताओंकी सेवा सौंपकर आपने निषादको बुला लिया॥ २॥
चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें॥
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥
cale sakhā kara soṃ kara joreṃ| sithila sarīra saneha na thoreṃ||
pūm̐chata sakhahi so ṭhāum̐ dekhāū| neku nayana mana jarani juṛāū||
Meaning सखा निषादराजके हाथसे हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखासे पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ--और नेत्र और मनकी जलन कुछ ठंडी करो--॥ ३॥
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥
jaham̐ siya rāmu lakhanu nisi soe| kahata bhare jala locana koe||
bharata bacana suni bhayau biṣādū| turata tahām̐ lai gayau niṣādū||
Meaning जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रातको सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रोिंके कोयों में [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। भरतजीके वचन सुनकर निषादको बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया--॥ ४॥
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥ १९८॥
jaham̐ siṃsupā punīta tara raghubara kiya biśrāmu|
ati saneham̐ sādara bharata kīnheu daṃḍa pranāmu|| 198||
Meaning जहाँ पवित्र अशोकके वृक्षके नीचे श्रीरामजीने विश्राम किया था। भरतजीने वहाँ अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया॥ १९८॥
कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥
kusa sām̐tharīnihāri suhāī| kīnha pranāmu pradacchina jāī||
carana rekha raja ām̐khinha lāī| banai na kahata prīti adhikāī||
Meaning कुशोंकी सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजीके चरण- चिह्लोंकी रज आँखोंमें लगायी। [उस समयके] प्रेमकी अधिकता कहते नहीं बनती॥ १॥
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥
kanaka biṃdu dui cārika dekhe| rākhe sīsa sīya sama lekhe||
sajala bilocana hṛdayam̐ galānī| kahata sakhā sana bacana subānī||
Meaning भरतजीने दो-चार स्वर्णविन्दु (सोनेके कण या तारे आदि जो सीताजीके गहने-कपड़ोंसे गिर पड़े थे) देखे तो उनको सीताजीके समान समझकर सिरपर रख लिया। उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुके] जलसे भरे हैं और हृदयमें ग्लानि भरी है। वे सखासे सुन्दर वाणीमें ये वचन बोले--॥ २॥
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥
पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥
śrīhata sīya biraham̐ dutihīnā| jathā avadha nara nāri bilīnā||
pitā janaka deum̐ paṭatara kehī| karatala bhogu jogu jaga jehī||
Meaning ये स्वर्णके कण या तारे भी सीताजीके विरहसे ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [ रामवियोगमें ] अयोध्याके नर-नारी विलीन (शोकके कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजीके पिता राजा जनक हैं, इस जगत्में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुद्टीमें हैं, उन जनकजीको मैं किसकी उपमा दूँ?॥ ३॥
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई॥
sasura bhānukula bhānu bhuālū| jehi sihāta amarāvatipālū||
prānanāthu raghunātha gosāī| jo baṛa hota so rāma baṛāī||
Meaning सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावतीके स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे (ईर्ष्यापूर्वक उनके-जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजीकी [दी हुई] बड़ाईसे ही होता है;॥ ४॥
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि॥ १९९॥
pati devatā sutīya mani sīya sām̐tharī dekhi|
biharata hradau na hahari hara pabi teṃ kaṭhina biseṣi|| 199||
Meaning उन श्रेष्ठ पतित्रता स्त्रियोंगें शिरोमणि सीताजीकी साथरी (कुशशय्या) देखकर मेरा हृदय हहराकर (दहलकर) फट नहीं जाता; हे शड्र! यह वज्रसे भी अधिक कठोर है!॥ १९९॥
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे॥
lālana jogu lakhana laghu lone| bhe na bhāi asa ahahiṃ na hone||
purajana priya pitu mātu dulāre| siya raghubarahi prānapiāre||
Meaning मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करनेयोग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसीके हुए, न हैं, न होनेके ही हैं। जो लक्ष्मण अवधके लोगोंको प्यारे, माता-पिताके दुलारे और श्रीसीतारामजी के प्राणप्यारे हैं;॥ १॥
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥
mṛdu mūrati sukumāra subhāū| tāta bāu tana lāga na kāū||
te bana sahahiṃ bipati saba bhām̐tī| nidare koṭi kulisa ehiṃ chātī||
Meaning जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीरमें कभी गरम हवा भी नहीं लगी, वे वनमें सब प्रकारकी विपत्तियाँ सह रहे हैं। [हाय!] इस मेरी छातीने [ कठोरतामें] करोड़ों व़्रोंका भी निरादर कर दिया [नहीं तो यह कभीकी फट गयी होती]॥ २॥
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥
पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥
rāma janami jagu kīnha ujāgara| rūpa sīla sukha saba guna sāgara||
purajana parijana gura pitu mātā| rāma subhāu sabahi sukhadātā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने जन्म ( अवतार) लेकर जगत्को प्रकाशित (परम सुशोभित) कर दिया। वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणोंके समुद्र हैं। पुरवासी, कुट्म्बी, गुरु, पिता-माता सभीको श्रीरामजीका स्वभाव सुख देनेवाला है॥ ३॥
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥
सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥
bairiu rāma baṛāī karahīṃ| bolani milani binaya mana harahīṃ||
sārada koṭi koṭi sata seṣā| kari na sakahiṃ prabhu guna gana lekhā||
Meaning शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते॥ ४॥
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान॥ २००॥
sukhasvarupa raghubaṃsamani maṃgala moda nidhāna|
te sovata kusa ḍāsi mahi bidhi gati ati balavāna|| 200||
Meaning जो सुखस्वरूप रघुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी मज़ल और आनन्दके भण्डार हैं, वे पृथ्वीपर कुशा बिछाकर सोते हैं। विधाताकी गति बड़ी ही बलवान् है॥ २००॥
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥
rāma sunā dukhu kāna na kāū| jīvanataru jimi jogavai rāū||
palaka nayana phani mani jehi bhām̐tī| jogavahiṃ janani sakala dina rātī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने कानोंसे भी कभी दु:ःखका नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन-वृक्षकी तरह उनकी सार-सँभाल किया करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रोंकी और साँप अपनी मणिकी करते हैं॥ १॥
ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी॥
धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला॥
te aba phirata bipina padacārī| kaṃda mūla phala phūla ahārī||
dhiga kaikeī amaṃgala mūlā| bhaisi prāna priyatama pratikūlā||
Meaning वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलोंमें पैदल फिरते हैं और कन्द-मूल तथा फल-फूलोंका भोजन करते हैं। अमज़लकी मूल कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रियतम पतिसे भी प्रतिकूल हो गयी॥ २॥
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥
maiṃ dhiga dhiga agha udadhi abhāgī| sabu utapātu bhayau jehi lāgī||
kula kalaṃku kari sṛjeu bidhātām̐| sāim̐doha mohi kīnha kumātām̐||
Meaning मुझ पापोंके समुद्र और अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया॥ ३॥
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥
suni saprema samujhāva niṣādū| nātha karia kata bādi biṣādū||
rāma tumhahi priya tumha priya rāmahi| yaha nirajosu dosu bidhi bāmahi||
Meaning यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा--हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद किसलिये करते हैं ? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजीको प्यारे हैं। यही निचोड़ (निश्चित सिद्धान्त) है, दोष तो प्रतिकूल विधाताको है॥ ४॥
बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी।
तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥
तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ।
परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥
bidhi bāma kī karanī kaṭhina jehiṃ mātu kīnhī bāvarī|
tehi rāti puni puni karahiṃ prabhu sādara sarahanā rāvarī||
tulasī na tumha so rāma prītamu kahatu hauṃ sauṃheṃ kiem̐|
parināma maṃgala jāni apane ānie dhīraju hiem̐||
Meaning प्रतिकूल विधाताकी करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयीको बावली बना दिया (उसकी मति फेर दी)। उस रातको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी बार-बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे। तुलसीदासजी कहते हैं--[ निषादराज कहता है कि-]श्रीरामचन्द्रजीको आपके समान अतिशय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाममें मज़ल होगा, यह जानकर आप अपने हृदयमें धे्य धारण कीजिये।
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।
चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥ २०॥
aṃtarajāmī rāmu sakuca saprema kṛpāyatana|
calia karia biśrāmu yaha bicāri dṛṛha āni mana|| 20||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपाके धाम हैं, यह विचारकर और मनमें दूृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये॥ २०१॥
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥
यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥
sakhā bacana suni ura dhari dhīrā| bāsa cale sumirata raghubīrā||
yaha sudhi pāi nagara nara nārī| cale bilokana ārata bhārī||
Meaning सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए भरतजी डेरेको चले। नगरके सारे स्त्री-पुरुष यह ( श्रीरामजीके ठहरनेके स्थानका) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थानको देखने चले॥ १॥
परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥
भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं॥
paradakhinā kari karahiṃ pranāmā| dehiṃ kaikaihi khori nikāmā||
bharī bhari bāri bilocana leṃhīṃ| bāma bidhātāhi dūṣana dehīṃ||
Meaning वे उस स्थानकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको बहुत दोष देते हैं। नेत्रोंमें जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाताको दूषण देते हैं॥ २॥
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥
निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥
eka sarāhahiṃ bharata sanehū| kou kaha nṛpati nibāheu nehū||
niṃdahiṃ āpu sarāhi niṣādahi| ko kahi sakai bimoha biṣādahi||
Meaning कोई भरतजीके स्तरेहकी सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजाने अपना प्रेम खूब निबाहा। सब अपनी निन््दा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं। उस समयके विमोह और विषादकों कौन कह सकता है?॥ ३॥
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥
गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥
ehi bidhi rāti logu sabu jāgā| bhā bhinusāra gudārā lāgā||
gurahi sunāvam̐ caṛhāi suhāīṃ| naīṃ nāva saba mātu caṛhāīṃ||
Meaning इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे। सबेरा होते ही खेवा लगा। सुन्दर नावपर गुरुजीको चढ़ाकर फिर नयी नावपर सब माताओंको चढ़ाया॥ '४॥
दंड चारि महँ भा सबु पारा।
उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥
daṃḍa cāri maham̐ bhā sabu pārā| utari bharata taba sabahi sam̐bhārā||
Meaning चार घड़ीमें सब गड़ाजीके पार उतर गये। तब भरतजीने उतरकर सबको सँभाला॥ ५॥
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥ २०२॥
prātakriyā kari mātu pada baṃdi gurahi siru nāi|
āgeṃ kie niṣāda gana dīnheu kaṭaku calāi|| 202||
Meaning प्रात:कालकी क्रियाओंको करके माताके चरणोंकी वन्दना कर और गुरुजीको सिर नवाकर भरतजीने निषादगणोंको [रास्ता दिखलानेके लिये] आगे कर लिया और सेना चला दी॥ २०२॥
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥
kiyau niṣādanāthu aguāīṃ| mātu pālakīṃ sakala calāīṃ||
sātha bolāi bhāi laghu dīnhā| bipranha sahita gavanu gura kīnhā||
Meaning निषादराजको आगे करके पीछे सब माताओंकी पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई शत्रुघ्नजीको बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुजीने गमन किया॥ १॥
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू॥
गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥
āpu surasarihi kīnha pranāmū| sumire lakhana sahita siya rāmū||
gavane bharata payodehiṃ pāe| kotala saṃga jāhiṃ ḍoriāe||
Meaning तदनन्तर आप (भरतजी) ने गड़ाजीको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामजीका स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल (बिना सवारके) घोड़े बागडोरसे बँधे हुए चले जा रहे हैं॥ २॥
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥
रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥
kahahiṃ susevaka bārahiṃ bārā| hoia nātha asva asavārā||
rāmu payodehi pāyam̐ sidhāe| hama kaham̐ ratha gaja bāji banāe||
Meaning उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़ेपर सवार हो लीजिये। [ भरतजी जवाब देते हैं कि] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं॥ ३॥
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥
sira bhara jāum̐ ucita asa morā| saba teṃ sevaka dharamu kaṭhorā||
dekhi bharata gati suni mṛdu bānī| saba sevaka gana garahiṃ galānī||
Meaning मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिरके बल चलकर जाऊँ। सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजीकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानिके मारे गले जा रहे हैं॥ ४॥
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥ २०३॥
bharata tīsare pahara kaham̐ kīnha prabesu prayāga|
kahata rāma siya rāma siya umagi umagi anurāga|| 203||
Meaning प्रेममें उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजीने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया॥ २०३॥
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥
jhalakā jhalakata pāyanha kaiṃseṃ| paṃkaja kosa osa kana jaiseṃ||
bharata payādehiṃ āe ājū| bhayau dukhita suni sakala samājū||
Meaning उनके चरणोंमें छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया॥ १॥
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥
सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥
khabari līnha saba loga nahāe| kīnha pranāmu tribenihiṃ āe||
sabidhi sitāsita nīra nahāne| die dāna mahisura sanamāne||
Meaning जब भरतजीने यह पता पा लिया कि सब लोग स््रान कर चुके, तब त्रिवेणीपर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक [ गड़ा-यमुनाके] श्वेत और श्याम जलमें स्तान किया और दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया॥ २॥
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥
सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥
dekhata syāmala dhavala halore| pulaki sarīra bharata kara jore||
sakala kāma prada tīratharāū| beda bidita jaga pragaṭa prabhāū||
Meaning श्याम और सफेद (यमुनाजी और गड़ाजीकी) लहरोंको देखकर भरतजीका शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा-हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव. वेदोंमें प्रसिद्ध और संसारमें प्रकट है॥ ३॥
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥
अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥
māgaum̐ bhīkha tyāgi nija dharamū| ārata kāha na karai kukaramū||
asa jiyam̐ jāni sujāna sudānī| saphala karahiṃ jaga jācaka bānī||
Meaning मैं अपना धर्म (न माँगनेका क्षत्रियधर्म) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त्त मनुष्य कौन- सा कुकर्म नहीं करता ? ऐसा हृदयमें जानकर सुजान उत्तम दानी जगतमें माँगनेवालेकी वाणीको सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं)॥ ४॥
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥
aratha na dharama na kāma ruci gati na cahaum̐ nirabāna|
janama janama rati rāma pada yaha baradānu na āna||
Meaning मुझे न अर्थकी रुचि (इच्छा) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं॥ २०४॥
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥
सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
jānahum̐ rāmu kuṭila kari mohī| loga kahau gura sāhiba drohī||
sītā rāma carana rati moreṃ| anudina baṛhau anugraha toreṃ||
Meaning स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे॥ १॥
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई॥
jaladu janama bhari surati bisārau| jācata jalu pabi pāhana ḍārau||
cātaku raṭani ghaṭeṃ ghaṭi jāī| baṛhe premu saba bhām̐ti bhalāī||
Meaning मेघ चाहे जन्मभर चातककी सुधि भुला दे और जल माँगनेपर वह चाहे वत्र और पत्थर ( ओले ) ही गिरावे, पर चातककी रटन घटनेसे तो उसकी बात ही घट जायगी (प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी)। उसकी तो प्रेम बढ़नेमें ही सब तरहसे भलाई है॥ २॥
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥
kanakahiṃ bāna caṛhai jimi dāheṃ| timi priyatama pada nema nibāheṃ||
bharata bacana suni mājha tribenī| bhai mṛdu bāni sumaṃgala denī||
Meaning जैसे तपानेसे सोनेपर आब (चमक) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है। भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मज़ल देनेवाली कोमल वाणी हुई॥ ३॥
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥
बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥
tāta bharata tumha saba bidhi sādhū| rāma carana anurāga agādhū||
bāda galāni karahu mana māhīṃ| tumha sama rāmahi kou priya nāhīṃ||
Meaning हे तात भरत! तुम सब प्रकारसे साधु हो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्रको तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है॥ ४॥
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥ २०५॥
tanu pulakeu hiyam̐ haraṣu suni beni bacana anukūla|
bharata dhanya kahi dhanya sura haraṣita baraṣahiṃ phūla|| 205||
Meaning त्रिवेणीजीके अनुकूल वचन सुनकर भरतजीका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे॥ २०५॥