सब बिधि सोचिअ पर अपकारी।
निज तनु पोषक निरदय भारी॥
saba bidhi socia para apakārī| nija tanu poṣaka niradaya bhārī||
सोचनीय सबहि बिधि सोई।
जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥
socanīya sabahi bidhi soī| jo na chāṛi chalu hari jana hoī||
Meaning सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता॥ २॥
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥
socanīya nahiṃ kosalarāū| bhuvana cāridasa pragaṭa prabhāū||
bhayau na ahai na aba honihārā| bhūpa bharata jasa pitā tumhārā||
Meaning कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है॥ ३॥
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा।
बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥
bidhi hari haru surapati disināthā| baranahiṃ saba dasaratha guna gāthā||
Meaning ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं॥ ४॥
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥ १७३॥
kahahu tāta kehi bhām̐ti kou karihi baṛāī tāsu|
rāma lakhana tumha satruhana sarisa suana suci jāsu|| 173||
Meaning हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न- सरीखे पवित्र पुत्र हैं 2॥ १७३॥
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥
saba prakāra bhūpati baṛabhāgī| bādi biṣādu karia tehi lāgī||
yahu suni samujhi socu pariharahū| sira dhari rāja rajāyasu karahū||
Meaning राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो॥ १॥
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥
rām̐ya rājapadu tumha kahum̐ dīnhā| pitā bacanu phura cāhia kīnhā||
taje rāmu jehiṃ bacanahi lāgī| tanu parihareu rāma birahāgī||
Meaning राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी॥ २॥
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥
करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥
nṛpahi bacana priya nahiṃ priya prānā| karahu tāta pitu bacana pravānā||
karahu sīsa dhari bhūpa rajāī| hai tumha kaham̐ saba bhām̐ti bhalāī||
Meaning राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है॥ ३॥
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥
parasurāma pitu agyā rākhī| mārī mātu loka saba sākhī||
tanaya jajātihi jaubanu dayaū| pitu agyām̐ agha ajasu na bhayaū||
Meaning परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ॥ ४॥
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥ १७४॥
anucita ucita bicāru taji je pālahiṃ pitu baina|
te bhājana sukha sujasa ke basahiṃ amarapati aina|| 174||
Meaning जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग) -में निवास करते हैं॥ १७४॥
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू॥
avasi naresa bacana phura karahū| pālahu prajā soku pariharahū||
surapura nṛpa pāihi paritoṣū| tumha kahum̐ sukṛta sujasu nahiṃ doṣū||
Meaning राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा॥ १॥
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥
करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥
beda bidita saṃmata sabahī kā| jehi pitu dei so pāvai ṭīkā||
karahu rāju pariharahu galānī| mānahu mora bacana hita jānī||
Meaning यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो॥ २॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥
कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥
suni sukhu lahaba rāma baidehīṃ| anucita kahaba na paṃḍita kehīṃ||
kausalyādi sakala mahatārīṃ| teu prajā sukha hohiṃ sukhārīṃ||
Meaning इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी॥ ३॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥
सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥
parama tumhāra rāma kara jānihi| so saba bidhi tumha sana bhala mānihi||
sauṃpehu rāju rāma kai āem̐| sevā karehu saneha suhāem̐||
Meaning जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्रेहसे उनकी सेवा करना॥ ४॥
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥ १७५॥
kījia gura āyasu avasi kahahiṃ saciva kara jori|
raghupati āem̐ ucita jasa tasa taba karaba bahori|| 175||
Meaning मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं--गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा॥ १७५॥
कौसल्या धरि धीरजु कहई।
पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥
kausalyā dhari dhīraju kahaī| pūta pathya gura āyasu ahaī||
सो आदरिअ करिअ हित मानी।
तजिअ बिषादु काल गति जानी॥
so ādaria karia hita mānī| tajia biṣādu kāla gati jānī||
Meaning कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं-हे पुत्र ! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। कालकी गतिको जानकर विषादका त्याग कर देना चाहिये॥ १॥
बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा॥
bana raghupati surapati naranāhū| tumha ehi bhām̐ti tāta kadarāhū||
parijana prajā saciva saba aṃbā| tumhahī suta saba kaham̐ avalaṃbā||
Meaning श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुट्म्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके-सबके एक तुम ही सहारे हो॥ २॥
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥
lakhi bidhi bāma kālu kaṭhināī| dhīraju dharahu mātu bali jāī||
sira dhari gura āyasu anusarahū| prajā pāli parijana dukhu harahū||
Meaning विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुट्म्बियोंका दुःख हरो॥ ३॥
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥
gura ke bacana saciva abhinaṃdanu| sune bharata hiya hita janu caṃdanu||
sunī bahori mātu mṛdu bānī| sīla saneha sarala rasa sānī||
Meaning भरतजीने गुरुके वचनों और मन्त्रियोंके अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदयके लिये मानो चन्दनके समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्रेह और सरलताके रसमें सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी॥ ४॥
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्त्वत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥
sānī sarala rasa mātu bānī suni bharatu byākula bhae|
locana saroruha stvata sīṃcata biraha ura aṃkura nae||
दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवें सहज सनेह की॥
dasā dekhata samaya tehi bisarī sabahi sudhi deha kī|
tulasī sarāhata sakala sādara sīveṃ sahaja saneha kī||
Meaning सरलताके रसमें सनी हुई माताकी वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हदयके विरहरूपी नवीन अंकुरको सींचने लगे। (नेत्रोंके आँसुओंने उनके वियोग-दुःखको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीरकी सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं--स्वाभाविक प्रेमकी सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।
बचन अआअमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥ १७६॥
bharatu kamala kara jori dhīra dhuraṃdhara dhīra dhari|
bacana aāamiam̐ janu bori deta ucita uttara sabahi|| 176||
Meaning धैर्यकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमलके समान हाथोंको जोड़कर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे--॥ १७६॥
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥
mohi upadesu dīnha gura nīkā| prajā saciva saṃmata sabahī kā||
mātu ucita dhari āyasu dīnhā| avasi sīsa dhari cāhaum̐ kīnhā||
Meaning गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत है। माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ॥ १॥
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥
gura pitu mātu svāmi hita bānī| suni mana mudita karia bhali jānī||
ucita ki anucita kiem̐ bicārū| dharamu jāi sira pātaka bhārū||
Meaning [ क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहदू (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है॥ २॥
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें॥
tumha tau dehu sarala sikha soī| jo ācarata mora bhala hoī||
jadyapi yaha samujhata haum̐ nīkeṃ| tadapi hota paritoṣu na jī keṃ||
Meaning आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हदयको सन्तोष नहीं होता॥ ३॥
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥
aba tumha binaya mori suni lehū| mohi anuharata sikhāvanu dehū||
ūtaru deum̐ chamaba aparādhū| dukhita doṣa guna ganahiṃ na sādhū||
Meaning अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्यके दोष-गुणोंको नहीं गिनते॥ ४॥
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु॥ १७७॥
pitu surapura siya rāmu bana karana kahahu mohi rāju|
ehi teṃ jānahu mora hita kai āpana baṛa kāju|| 177||
Meaning पिताजी स्वर्गमें हैं, श्रीसीतारामजी वनमें हैं और मुझे आप राज्य करनेके लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [होनेकी आशा रखते हैं] ?॥ १७७॥
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई॥
मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं॥
hita hamāra siyapati sevakāī| so hari līnha mātu kuṭilāī||
maiṃ anumāni dīkha mana māhīṃ| āna upāyam̐ mora hita nāhīṃ||
Meaning मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है॥ १॥
सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥
बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू॥
soka samāju rāju kehi lekheṃ| lakhana rāma siya binu pada dekheṃ||
bādi basana binu bhūṣana bhārū| bādi birati binu brahma bicārū||
Meaning यह शोकका समुदाय राज्य लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके चरणोंको देखे बिना किस गिनतीमें है (इसका क्या मूल्य है) ? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ व्यर्थ है। वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है॥ २॥
सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥
जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥
saruja sarīra bādi bahu bhogā| binu haribhagati jāyam̐ japa jogā||
jāyam̐ jīva binu deha suhāī| bādi mora sabu binu raghurāī||
Meaning रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है॥ ३॥
जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू॥
मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥
jāum̐ rāma pahiṃ āyasu dehū| ekahiṃ ām̐ka mora hita ehū||
mohi nṛpa kari bhala āpana cahahū| sou saneha jaṛatā basa kahahū||
Meaning मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजीके पास जाऊँ! एक ही आँक (निश्चयपूर्वक) मेरा हित इसीमें है। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्तरेहकी जड़ता (मोह) के वश होकर ही कह रहे हैं॥ ४॥
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज॥ १७८॥
kaikeī sua kuṭilamati rāma bimukha gatalāja|
tumha cāhata sukhu mohabasa mohi se adhama keṃ rāja|| 178||
Meaning कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधमके राज्यसे आप मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं॥ १७८॥
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥
kahaum̐ sām̐cu saba suni patiāhū| cāhia dharamasīla naranāhū||
mohi rāju haṭhi deihahu jabahīṃ| rasā rasātala jāihi tabahīṃ||
Meaning मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें धैँस जायगी॥ १॥
मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥
mohi samāna ko pāpa nivāsū| jehi lagi sīya rāma banabāsū||
rāyam̐ rāma kahum̐ kānanu dīnhā| bichurata gamanu amarapura kīnhā||
Meaning मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ ? राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया॥ २॥
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥
maiṃ saṭhu saba anaratha kara hetū| baiṭha bāta saba sunaum̐ sacetū||
binu raghubīra biloki abāsū| rahe prāna sahi jaga upahāsū||
Meaning और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोका कारण हूँ, होश-हवासमें बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥ ३॥
राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥
rāma punīta biṣaya rasa rūkhe| lolupa bhūmi bhoga ke bhūkhe||
kaham̐ lagi kahauṃ hṛdaya kaṭhināī| nidari kulisu jehiṃ lahī baṛāī||
Meaning [इसका यही कारण है कि ये प्राण] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ ? जिसने वद्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है॥ ४॥
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥ १७९॥
kārana teṃ kāraju kaṭhina hoi dosu nahi mora|
kulisa asthi teṃ upala teṃ loha karāla kaṭhora|| 179||
Meaning कारणसे कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा भयानक और कठोर होता है॥ १७९॥
कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥
kaikeī bhava tanu anurāge| pām̐vara prāna aghāi abhāge||
jauṃ priya biraham̐ prāna priya lāge| dekhaba sunaba bahuta aba āge||
Meaning कैकेयीसे उत्पन्न देहमें प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरहसे) आअभागे हैं। जब प्रियके वियोगमें भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा॥ १॥
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥
lakhana rāma siya kahum̐ banu dīnhā| paṭhai amarapura pati hita kīnhā||
līnha bidhavapana apajasu āpū| dīnheu prajahi soku saṃtāpū||
Meaning लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजीको तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पतिका कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजाको शोक और सन्ताप दिया;॥ २॥
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू॥
एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥
mohi dīnha sukhu sujasu surājū| kīnha kaikeīṃ saba kara kājū||
ehi teṃ mora kāha aba nīkā| tehi para dena kahahu tumha ṭīkā||
Meaning और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया! इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा ? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देनेको कहते हैं!॥ ३॥
कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥
kaikaī jaṭhara janami jaga māhīṃ| yaha mohi kaham̐ kachu anucita nāhīṃ||
mori bāta saba bidhihiṃ banāī| prajā pām̐ca kata karahu sahāī||
Meaning कैकेयीके पेटसे जगत्में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाताने ही बना दी है। [फिर] उसमें प्रजा और पंच (आप लोग) क्यों सहायता कर रहे हैं ?॥ ४॥
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ १८०॥
graha grahīta puni bāta basa tehi puni bīchī māra|
tehi piāia bārunī kahahu kāha upacāra|| 180||
Meaning जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो], फिर जो वायुरोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है!॥ १८०॥
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥
दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥
kaikai suana jogu jaga joī| catura biraṃci dīnha mohi soī||
dasaratha tanaya rāma laghu bhāī| dīnhi mohi bidhi bādi baṛāī||
Meaning कैकेयीके लड़केके लिये संसारमें जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर *दशरथजीका पुत्र' और *रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने व्यर्थ ही दी॥ १॥
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका॥
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥
tumha saba kahahu kaṛhāvana ṭīkā| rāya rajāyasu saba kaham̐ nīkā||
utaru deum̐ kehi bidhi kehi kehī| kahahu sukhena jathā ruci jehī||
Meaning आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं ! राजाकी आज्ञा सभीके लिये अच्छी है। मैं किस-किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूँ ? जिसकी जैसी रुचि हो, आपलोग सुखपूर्वक वही कहें॥ २॥
मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥
मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥
mohi kumātu sameta bihāī| kahahu kahihi ke kīnha bhalāī||
mo binu ko sacarācara māhīṃ| jehi siya rāmu prānapriya nāhīṃ||
Meaning मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया ? जड़-चेतन जगतमें मे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणोंके समान प्यारे न हों॥ ३॥
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू॥
संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥
parama hāni saba kaham̐ baṛa lāhū| adinu mora nahi dūṣana kāhū||
saṃsaya sīla prema basa ahahū| sabui ucita saba jo kachu kahahū||
Meaning जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेमके वश हैं॥ ४॥
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥ २८१॥
rāma mātu suṭhi saralacita mo para premu biseṣi|
kahai subhāya saneha basa mori dīnatā dekhi|| 281||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं॥ १८१॥
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥
gura bibeka sāgara jagu jānā| jinhahi bisva kara badara samānā||
mo kaham̐ tilaka sāja saja soū| bhaem̐ bidhi bimukha bimukha sabu koū||
Meaning गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं॥ १॥
परिहरि रामु सीय जग माहीं।
कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥
parihari rāmu sīya jaga māhīṃ| kou na kahihi mora mata nāhīṃ||
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी।
अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥
so maiṃ sunaba sahaba sukhu mānī| aṃtahum̐ kīca tahām̐ jaham̐ pānī||
Meaning श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है॥ २॥
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥
ḍaru na mohi jaga kahihi ki pocū| paralokahu kara nāhina socū||
ekai ura basa dusaha davārī| mohi lagi bhe siya rāmu dukhārī||
Meaning मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है। मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए॥ ३॥
जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥
मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥
jīvana lāhu lakhana bhala pāvā| sabu taji rāma carana manu lāvā||
mora janama raghubara bana lāgī| jhūṭha kāha pachitāum̐ abhāgī||
Meaning जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ 2॥ ४॥
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥ १८२॥
āpani dāruna dīnatā kahaum̐ sabahi siru nāi|
dekheṃ binu raghunātha pada jiya kai jarani na jāi|| 182||
Meaning सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शन किये बिना मेरे जीकी जलन न जायगी॥ १८२॥
आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥
एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥
āna upāu mohi nahi sūjhā| ko jiya kai raghubara binu būjhā||
ekahiṃ ām̐ka ihai mana māhīṃ| prātakāla calihaum̐ prabhu pāhīṃ||
Meaning मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजीके बिना मेरे हृदयकी बात कौन जान सकता है? मनमें एक ही आँक (निश्चयपूर्वक ) यही है कि प्रात: काल प्रभु श्रीरामजीके पास चल दूँगा॥ १॥
जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥
jadyapi maiṃ anabhala aparādhī| bhai mohi kārana sakala upādhī||
tadapi sarana sanamukha mohi dekhī| chami saba karihahiṃ kṛpā biseṣī||
Meaning यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरणमें सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे॥ २॥
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥
sīla sakuca suṭhi sarala subhāū| kṛpā saneha sadana raghurāū||
arihuka anabhala kīnha na rāmā| maiṃ sisu sevaka jadyapi bāmā||
Meaning श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और सख्रेहके घर हैं। श्रीरामजीने कभी शत्रुका भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही॥ ३॥
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥
tumha pai pām̐ca mora bhala mānī| āyasu āsiṣa dehu subānī||
jehiṃ suni binaya mohi janu jānī| āvahiṃ bahuri rāmu rajadhānī||
Meaning आप पंच (सब) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें॥ ४॥
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥ १८३॥
jadyapi janamu kumātu teṃ maiṃ saṭhu sadā sadosa|
āpana jāni na tyāgihahiṃ mohi raghubīra bharosa|| 183||
Meaning यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं॥ १८३॥
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥
लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥
bharata bacana saba kaham̐ priya lāge| rāma saneha sudhām̐ janu pāge||
loga biyoga biṣama biṣa dāge| maṃtra sabīja sunata janu jāge||
Meaning भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे॥ १॥
मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥
भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही॥
mātu saciva gura pura nara nārī| sakala saneham̐ bikala bhae bhārī||
bharatahi kahahi sarāhi sarāhī| rāma prema mūrati tanu āhī||
Meaning माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्तरेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है॥२॥
तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥
जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई॥
tāta bharata asa kāhe na kahahū| prāna samāna rāma priya ahahū||
jo pāvam̐ru apanī jaṛatāī| tumhahi sugāi mātu kuṭilāī||
Meaning हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मुूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा,॥ ३॥
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥
so saṭhu koṭika puruṣa sametā| basihi kalapa sata naraka niketā||
ahi agha avaguna nahi mani gahaī| harai garala dukha dārida dahaī||
Meaning वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दु:ख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है॥ ४॥
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
avasi calia bana rāmu jaham̐ bharata maṃtru bhala kīnha|
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह॥ १८४॥
soka siṃdhu būṛata sabahi tumha avalaṃbanu dīnha|| 184||
Meaning हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [बड़ा] सहारा दे दिया॥ १८४॥
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥
चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥
bhā saba keṃ mana modu na thorā| janu ghana dhuni suni cātaka morā||
calata prāta lakhi niranau nīke| bharatu prānapriya bhe sabahī ke||
Meaning सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ) ! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रात:काल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये॥ १॥
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥
धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥
munihi baṃdi bharatahi siru nāī| cale sakala ghara bidā karāī||
dhanya bharata jīvanu jaga māhīṃ| sīlu sanehu sarāhata jāhīṃ||
Meaning मुनि वसिष्ठतजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने- अपने घरको चले। जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्लेहकी सराहना करते जाते हैं॥ २॥
कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू॥
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥
kahahi parasapara bhā baṛa kājū| sakala calai kara sājahiṃ sājū||
jehi rākhahiṃ rahu ghara rakhavārī| so jānai janu garadani mārī||
Meaning आपसभमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी॥ ३॥
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू।
को न चहइ जग जीवन लाहू॥
kou kaha rahana kahia nahiṃ kāhū| ko na cahai jaga jīvana lāhū||
Meaning कोई-कोई कहते हैं--रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगतमें जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता 2॥ ४॥
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥ १८५॥
jarau so saṃpati sadana sukhu suhada mātu pitu bhāi|
sanamukha hota jo rāma pada karai na sahasa sahāi|| 185||
Meaning वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे॥ १८५॥
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना॥
भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू॥
ghara ghara sājahiṃ bāhana nānā| haraṣu hṛdayam̐ parabhāta payānā||
bharata jāi ghara kīnha bicārū| nagaru bāji gaja bhavana bham̐ḍārū||
Meaning घर-घर लोग अनेकों प्रकारकी सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदयमें [ बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजीने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि--॥ १॥
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥
saṃpati saba raghupati kai āhī| jau binu jatana calauṃ taji tāhī||
tau parināma na mori bhalāī| pāpa siromani sāim̐ dohāī||
Meaning सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है। यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है॥ २॥
करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥
अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥
karai svāmi hita sevaku soī| dūṣana koṭi dei kina koī||
asa bicāri suci sevaka bole| je sapanehum̐ nija dharama na ḍole||
Meaning सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्रमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे॥ ३॥
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा॥
करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे॥
kahi sabu maramu dharamu bhala bhāṣā| jo jehi lāyaka so tehiṃ rākhā||
kari sabu jatanu rākhi rakhavāre| rāma mātu pahiṃ bharatu sidhāre||
Meaning भरतजीने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया; और जो जिस योग्य था, उसे उसी कामपर नियुक्त कर दिया। सब व्यवस्था करके, रक्षकोंको रखकर भरतजी राममाता कौसल्याजीके पास गये॥ ४॥
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान॥
ārata jananī jāni saba bharata saneha sujāna|
kaheu banāvana pālakīṃ sajana sukhāsana jāna||
Meaning स्तरेहके सुजान (प्रेमके तत्त्वको जाननेवाले) भरतजीने सब माताओंको आर्त (दुखी) जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन यान (सुखपाल) सजानेके लिये कहा॥ १८६॥