तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही॥
taba kaha gīdha bacana dhari dhīrā| sunahu rāma bhaṃjana bhava bhīrā||
nātha dasānana yaha gati kīnhī| tehi khala janakasutā hari līnhī||
Meaning तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा--हे भव (जन्म-मृत्यु) के भयका नाश करनेवाले श्रीरामजी ! सुनिये। हे नाथ ! रावणने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्टन जानकीजीको हर लिया है॥ १॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई॥
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥
lai dacchina disi gayau gosāī| bilapati ati kurarī kī nāī||
darasa lāgī prabhu rākheṃum̐ prānā| calana cahata aba kṛpānidhānā||
Meaning हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशाको गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। हे प्रभो ! मैंने आपके दर्शनोंके लिये ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान! अब ये चलना ही चाहते हैं॥ २॥
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता॥
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा॥
rāma kahā tanu rākhahu tātā| mukha musakāi kahī tehiṃ bātā||
jā kara nāma marata mukha āvā| adhamau mukuta hoī śruti gāvā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने कहा--हे तात! शरीरको बनाये रखिये। तब उसने मुसकराते हुए मुँहसे यह बात कही--मरते समय जिनका नाम मुखमें आ जानेसे अधम (महान् पापी) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं--॥ ३॥
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥
जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई॥
so mama locana gocara āgeṃ| rākhauṃ deha nātha kehi khām̐geṃ||
jala bhari nayana kahahiṃ raghurāī| tāta karma nija te gatiṃ pāī||
Meaning वही (आप) मेरे नेत्रोंके विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी [की पूर्ति ] के लिये देहको रखूँ? नेत्रोंगें जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे-हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मोसे [दुर्लभ] गति पायी है॥ ४॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥
parahita basa jinha ke mana māhīṃ| tinha kahum̐ jaga durlabha kachu nāhīṃ||
tanu taji tāta jāhu mama dhāmā| deum̐ kāha tumha pūranakāmā||
Meaning जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत्में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)॥ ५॥
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ ३१॥
sītā harana tāta jani kahahu pitā sana jāi|
jauṃ maiṃ rāma ta kula sahita kahihi dasānana āi|| 31||
Meaning हे तात! सीताहरणकी बात आप जाकर पिताजीसे न कहियेगा। यदि मैं राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुम्बसहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा॥ ३१॥
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥
gīdha deha taji dhari hari rupā| bhūṣana bahu paṭa pīta anūpā||
syāma gāta bisāla bhuja cārī| astuti karata nayana bhari bārī||
Meaning जटायुने गीधकी देह त्यागकर हरिका रूप धारण किया और बहुत-से अनुपम (दिव्य) आभूषण और [दिव्य] पीताम्बर पहन लिये। श्याम शरीर है, विशाल चार भुजाएँ हैं और नेत्रोंमें [प्रेम तथा आनन्दके आँसुओंका] जल भरकर वह स्तुति कर रहा है--॥१॥
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥
पाथोद॒ गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥
jaya rāma rūpa anūpa nirguna saguna guna preraka sahī|
dasasīsa bāhu pracaṃḍa khaṃḍana caṃḍa sara maṃḍana mahī||
pāthoda gāta saroja mukha rājīva āyata locanaṃ|
nita naumi rāmu kṛpāla bāhu bisāla bhava bhaya mocanaṃ||
Meaning हे रामजी! आपकी जय हो। आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणोंके (मायाके) प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावणकी प्रचण्ड भुजाओंको खण्ड-खण्ड करनेके लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वीको सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघके समान श्याम शरीरवाले, कमलके समान मुख और [लाल] कमलके समान विशाल नेत्रोंबाले, विशाल भुजाओंवाले और भव-भयसे छुड़ानेवाले कृपालु श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥ १॥
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।
गोबिंद गोपर द्ंद्रहर बिग्यानघन धरनीधर॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥ २॥
balamaprameyamanādimajamabyaktamekamagocaraṃ|
gobiṃda gopara dṃdrahara bigyānaghana dharanīdhara||
je rāma maṃtra japaṃta saṃta anaṃta jana mana raṃjanaṃ|
nita naumi rāma akāma priya kāmādi khala dala gaṃjanaṃ|| 2||
Meaning आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त (निराकार), एक, अगोचर (अलक्ष्य), गोविन्द (वेदवाक्योंद्वारा जाननेयोग्य ), इन्द्रियोंसे अतीत, [ जन्म-मरण, सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंको हरनेवाले, विज्ञानकी घनमूर्ति और पृथ्वीके आधार हैं तथा जो संत राम-मन्त्रको जपते हैं, उन अनन्त सेवकोंके मनको आनन्द देनेवाले हैं। उन निष्कामप्रिय ( निष्कामजनोंके प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय) तथा काम आदि दुष्टों (दुष्ट-वृत्तियों) के दलका दलन करनेवाले श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥ २॥
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
करि ध्यानग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥
jehi śruti niraṃjana brahma byāpaka biraja aja kahi gāvahīṃ|
kari dhyānagyāna birāga joga aneka muni jehi pāvahīṃ||
प्रगट करुना कंद सोभा बूंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छवि सोहई॥ ३॥
pragaṭa karunā kaṃda sobhā būṃda aga jaga mohaī|
mama hṛdaya paṃkaja bhṛṃga aṃga anaṃga bahu chavi sohaī|| 3||
Meaning जिनको श्रुतियाँ निरज्ञन (मायासे परे ), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभाके समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगतूको मोहित कर रहे हैं। मेरे हदय-कमलके श्रमररूप उनके अंग-अंगमें बहुत-से कामदेवोंकी छवि शोभा पा रही है॥ ३॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति ज॑ जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥
jo agama sugama subhāva nirmala asama sama sītala sadā|
pasyaṃti ja jogī jatana kari karata mana go basa sadā||
राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥ ४॥
rāma ramā nivāsa saṃtata dāsa basa tribhuvana dhanī|
mama ura basau so samana saṃsṛti jāsu kīrati pāvanī|| 4||
Meaning जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल (शान्त) हैं। मन और इन्द्रियोंको सदा वशमें करते हुए योगी बहुत साधन करनेपर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकोंके स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासोंके वशमें रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमनको मिटानेवाली है॥ ४॥
अब्रिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कौीन््ही राम॥ ३२॥
abrirala bhagati māgi bara gīdha gayau haridhāma|
tehi kī kriyā jathocita nija kara kauीnhī rāma|| 32||
Meaning अखण्ड भक्तिका वर माँगकर गृध्रराज जटायु श्रीहरिकि परमधामको चला गया। श्रीरामचन्द्रजीने उसकी [दाहकर्म आदि सारी] क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथोंसे कीं॥ ३२॥
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी॥
komala cita ati dīnadayālā| kārana binu raghunātha kṛpālā||
gīdha adhama khaga āmiṣa bhogī| gati dīnhi jo jācata jogī||
Meaning श्रीरघुनाथजी अत्यन्त कोमल चित्तवाले, दीनदयालु और बिना ही कारण कृपालु हैं। गीध [ पक्षियोंमें भी] अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं॥ १॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥
sunahu umā te loga abhāgī| hari taji hohiṃ biṣaya anurāgī||
puni sītahi khojata dvau bhāī| cale bilokata bana bahutāī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती ! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान्को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीताजीको खोजते हुए आगे चले। वे वनकी सघनता देखते जाते हैं॥ २॥
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥
saṃkula latā biṭapa ghana kānana| bahu khaga mṛga taham̐ gaja paṃcānana||
āvata paṃtha kabaṃdha nipātā| tehiṃ saba kahī sāpa kai bātā||
Meaning वह सघन वन लताओं और वृक्षोंसे भरा है। उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्रीरामजीने रास्तेमें आते हुए कबंध राक्षसको मार डाला। उसने अपने शापकी सारी बात कही॥ ३॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥
durabāsā mohi dīnhī sāpā| prabhu pada pekhi miṭā so pāpā||
sunu gaṃdharba kahaum̐ mai tohī| mohi na sohāi brahmakula drohī||
Meaning [वह बोला--] दुर्वासाजीने मुझे शाप दिया था। अब प्रभुके चरणोंको देखनेसे वह पाप मिट गया। [श्रीरामजीने कहा-- हे गन्धर्व ! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुलसे द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता॥ ४॥
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥ ३३॥
mana krama bacana kapaṭa taji jo kara bhūsura seva|
mohi sameta biraṃci siva basa tākeṃ saba deva|| 33||
Meaning मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वशगें हो जाते हैं॥ ३३॥
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥
sāpata tāṛata paruṣa kahaṃtā| bipra pūjya asa gāvahiṃ saṃtā||
pūjia bipra sīla guna hīnā| sūdra na guna gana gyāna prabīnā||
Meaning शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुणसे हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणोंसे युक्त और ज्ञानमें निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है॥ १॥
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥
kahi nija dharma tāhi samujhāvā| nija pada prīti dekhi mana bhāvā||
raghupati carana kamala siru nāī| gayau gagana āpani gati pāī||
Meaning श्रीरामजीने अपना धर्म ( भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणोंमें प्रेम देखकर वह उनके मनको भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्वका स्वरूप) पाकर आकाशमें चला गया॥ २॥
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥
tāhi dei gati rāma udārā| sabarī keṃ āśrama pagu dhārā||
sabarī dekhi rāma gṛham̐ āe| muni ke bacana samujhi jiyam̐ bhāe||
Meaning उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरीजीके आश्रममें पधारे। शबरीजीने श्रीरामचन्द्रजीको घरमें आये देखा, तब मुनि मतज़जीके वचनोंको याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥ ३॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥
sarasija locana bāhu bisālā| jaṭā mukuṭa sira ura banamālā||
syāma gaura suṃdara dou bhāī| sabarī parī carana lapaṭāī||
Meaning कमल-सदूश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिरपर जटाओंका मुकुट और हृदयपर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयोंके चरणोंमें शबरीजी लिपट पड़ीं॥ ४॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥
prema magana mukha bacana na āvā| puni puni pada saroja sira nāvā||
sādara jala lai carana pakhāre| puni suṃdara āsana baiṭhāre||
Meaning वे प्रेममें मग्र हो गयीं, मुखसे वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलोंमें सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयोंके चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनोंपर बैठाया॥ ५॥
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥ ३४॥
kaṃda mūla phala surasa ati die rāma kahum̐ āni|
prema sahita prabhu khāe bāraṃbāra bakhāni|| 34||
Meaning उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजीको दिये। प्रभुने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया॥ ३४॥
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥
pāni jori āgeṃ bhai ṭhāṛhī| prabhuhi biloki prīti ati bāṛhī||
kehi bidhi astuti karau tumhārī| adhama jāti maiṃ jaṛamati bhārī||
Meaning फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभुको देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [उन्होंने कहा--] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जातिकी और अत्यन्त मूढबुद्धि हूँ॥ १॥
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥
adhama te adhama adhama ati nārī| tinha maham̐ maiṃ matimaṃda aghārī||
kaha raghupati sunu bhāmini bātā| mānaum̐ eka bhagati kara nātā||
Meaning जो अधमसे भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन ! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजीने कहा--हे भामिनि! मेरी बात सुन। मैं तो केवल एक भक्तिहीका सम्बन्ध मानता हूँ॥ २॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
jāti pām̐ti kula dharma baṛāī| dhana bala parijana guna caturāī||
bhagati hīna nara sohai kaisā| binu jala bārida dekhia jaisā||
Meaning जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता--इन सबके होनेपर भी भक्तिसे रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [शोभाहीन] दिखायी पड़ता है॥ ३॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
navadhā bhagati kahaum̐ tohi pāhīṃ| sāvadhāna sunu dharu mana māhīṃ||
prathama bhagati saṃtanha kara saṃgā| dūsari rati mama kathā prasaṃgā||
Meaning मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर। पहली भक्ति है संतोंका सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंगमें प्रेम॥ '४॥
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥ ३५॥
gura pada paṃkaja sevā tīsari bhagati amāna|
cauthi bhagati mama guna gana karai kapaṭa taji gāna|| 35||
Meaning तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरुके चरणकमलोंकी सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहोंका गान करे॥ ३५॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
maṃtra jāpa mama dṛṛha bisvāsā| paṃcama bhajana so beda prakāsā||
chaṭha dama sīla birati bahu karamā| nirata niraṃtara sajjana dharamā||
Meaning मेरे (राम) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास--यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निय्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म (आचरण) में लगे रहना॥ १॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
sātavam̐ sama mohi maya jaga dekhā| moteṃ saṃta adhika kari lekhā||
āṭhavam̐ jathālābha saṃtoṣā| sapanehum̐ nahiṃ dekhai paradoṣā||
Meaning सातवीं भक्ति है जगतूभरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्रमें भी पराये दोषोंको न देखना॥ २॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
navama sarala saba sana chalahīnā| mama bharosa hiyam̐ haraṣa na dīnā||
nava mahum̐ ekau jinha ke hoī| nāri puruṣa sacarācara koī||
Meaning नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों मेंसे जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो--॥३॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
soi atisaya priya bhāmini more| sakala prakāra bhagati dṛṛha toreṃ||
jogi bṛṃda duralabha gati joī| to kahum̐ āju sulabha bhai soī||
Meaning हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है॥ ४॥
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥
mama darasana phala parama anūpā| jīva pāva nija sahaja sarūpā||
janakasutā kai sudhi bhāminī| jānahi kahu karibaragāminī||
Meaning मेरे दर्शनका परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकीकी कुछ खबर जानती हो तो बता॥ ५॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई।
तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
paṃpā sarahi jāhu raghurāī| taham̐ hoihi sugrīva mitāī||
सो सब कहिहि देव रघुबीरा।
जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥
so saba kahihi deva raghubīrā| jānatahūm̐ pūchahu matidhīrā||
Meaning [शबरीने कहा--] हे रघुनाथजी ! आप पंपा नामक सरोवरको जाइये, वहाँ आपकी सुग्रीवसे मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!॥ ६॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई।
प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥
bāra bāra prabhu pada siru nāī| prema sahita saba kathā sunāī||
Meaning बार-बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर, प्रेमसहित उसने सब कथा सुनायी॥ ७॥
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयें पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भड़ जहेँ नहिं फिरे॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
kahi kathā sakala biloki hari mukha hṛdayeṃ pada paṃkaja dhare|
taji joga pāvaka deha hari pada līna bhaṛa jahem̐ nahiṃ phire||
nara bibidha karma adharma bahu mata sokaprada saba tyāgahū|
bisvāsa kari kaha dāsa tulasī rāma pada anurāgahū||
Meaning सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत--ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यों ! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥ ३६॥
jāti hīna agha janma mahi mukta kīnhi asi nāri|
mahāmaṃda mana sukha cahasi aise prabhuhi bisāri|| 36||
Meaning जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, आअरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभुको भूलकर सुख चाहता है ?॥ ३६॥
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥
cale rāma tyāgā bana soū| atulita bala nara kehari doū||
birahī iva prabhu karata biṣādā| kahata kathā aneka saṃbādā||
Meaning श्रीरामचन्द्रजीने उस वनको भी छोड़ दिया और वे आगे चले। दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्योंमें सिंहके समान हैं। प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं--॥ १॥
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥
lachimana dekhu bipina kai sobhā| dekhata kehi kara mana nahiṃ chobhā||
nāri sahita saba khaga mṛga bṛṃdā| mānahum̐ mori karata hahiṃ niṃdā||
Meaning हे लक्ष्मण! जरा वनकी शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओंके समूह सभी स्त्रीसहित हैं। मानो वे मेरी निन््दा कर रहे हैं॥२॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥
hamahi dekhi mṛga nikara parāhīṃ| mṛgīṃ kahahiṃ tumha kaham̐ bhaya nāhīṃ||
tumha ānaṃda karahu mṛga jāe| kaṃcana mṛga khojana e āe||
Meaning हमें देखकर [जब डरके मारे] हिरनोंके झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं-- तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनोंसे पैदा हुए हो, अत: तुम आनन्द करो। ये तो सोनेका हिरन खोजने आये हैं॥ ३॥
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥
saṃga lāi karinīṃ kari lehīṃ| mānahum̐ mohi sikhāvanu dehīṃ||
sāstra suciṃtita puni puni dekhia| bhūpa susevita basa nahiṃ lekhia||
Meaning हाथी हथिनियोंको साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [कि स्त्रीको कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रको भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजाको वशमें नहीं समझना चाहिये॥ ४॥
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥
rākhia nāri jadapi ura māhīṃ| jubatī sāstra nṛpati basa nāhīṃ||
dekhahu tāta basaṃta suhāvā| priyā hīna mohi bhaya upajāvā||
Meaning और स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्तको तो देखो। प्रियाके बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है॥५॥
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥ ३७ ( क )॥
biraha bikala balahīna mohi jānesi nipaṭa akela|
sahita bipina madhukara khaga madana kīnha bagamela|| 37 ( ka )||
Meaning मुझे विरहसे व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौंरों और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया॥ ३७ (क)॥
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥ ३७ (ख )॥
dekhi gayau bhrātā sahita tāsu dūta suni bāta|
ḍerā kīnheu manahum̐ taba kaṭaku haṭaki manajāta|| 37 (kha )||
Meaning परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाईके साथ हूँ (अकेला नहीं हूँ), तब उसकी बात सुनकर कामदेवने मानो सेनाको रोककर डेरा डाल दिया है॥ ३७ (ख)॥
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥
कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका॥
biṭapa bisāla latā arujhānī| bibidha bitāna die janu tānī||
kadali tāla bara dhujā patākā| daikhi na moha dhīra mana jākā||
Meaning विशाल वृक्षोंमें लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकारके तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताकाके समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है॥ १॥
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥
bibidha bhām̐ti phūle taru nānā| janu bānaita bane bahu bānā||
kahum̐ kahum̐ sundara biṭapa suhāe| janu bhaṭa bilaga bilaga hoi chāe||
Meaning अनेकों वृक्ष नाना प्रकारसे फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं -कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धालोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों॥ २॥
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते॥
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥
kūjata pika mānahum̐ gaja māte| ḍheka mahokha ūm̐ṭa bisarāte||
mora cakora kīra bara bājī| pārāvata marāla saba tājī||
Meaning कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [चिग्घाड़ रहे] हैं। ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खबच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुन्दर ताजी (अरबी) घोड़े हैं॥ ३॥
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा॥
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥
tītira lāvaka padacara jūthā| barani na jāi manoja baruthā||
ratha giri silā duṃdubhī jharanā| cātaka baṃdī guna gana baranā||
Meaning तीतर और बटेर पैदल सिपाहियोंके झुंड हैं। कामदेवकी सेनाका वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतोंकी शिलाएँ रथ और जलके झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुणसमूह (विरदावली) का वर्णन करते हैं॥ ४॥
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥
madhukara mukhara bheri sahanāī| tribidha bayāri basīṭhīṃ āī||
caturaṃginī sena sam̐ga līnheṃ| bicarata sabahi cunautī dīnheṃ||
Meaning भौंरोंकी गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा मानो दूतका काम लेकर आयी है। इस प्रकार चतुरड्ञिंणी सेना साथ लिये कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है॥५॥
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥
एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥
lachimana dekhata kāma anīkā| rahahiṃ dhīra tinha kai jaga līkā||
ehi keṃ eka parama bala nārī| tehi teṃ ubara subhaṭa soi bhārī||
Meaning हे लक्ष्मण! कामदेवकी इस सेनाको देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगतमें उन्हींकी [ वीरोंमें ] प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेवके एक स्त्रीका बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है॥६॥
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥ ३८ ( क )॥
tāta tīni ati prabala khala kāma krodha aru lobha|
muni bigyāna dhāma mana karahiṃ nimiṣa mahum̐ chobha|| 38 ( ka )||
Meaning हे तात! काम, क्रोध और लोभ--ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं॥ ३८ (क)॥
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥ ३८ ( ख )॥
lobha keṃ icchā daṃbha bala kāma keṃ kevala nāri|
krodha ke paruṣa bacana bala munibara kahahiṃ bicāri|| 38 ( kha )||
Meaning लोभको इच्छा और दम्भका बल है, कामको केवल स्त्रीका बल है और क्रोधको कठोर वचनोंका बल है; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं॥ ३८ (ख)॥
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥
gunātīta sacarācara svāmī| rāma umā saba aṃtarajāmī||
kāminha kai dīnatā dekhāī| dhīranha keṃ mana birati dṛṛhāī||
Meaning [शिवजी कहते हैं--]] हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणोंसे परे), चराचर जगत्के स्वामी और सबके अन्तरकी जाननेवाले हैं। [ उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगोंकी दीनता ( बेबसी ) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषोंके मनमें वैराग्यको दृढ़ किया है॥ १॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया।
छूटहिं सकल राम कीं दाया॥
krodha manoja lobha mada māyā| chūṭahiṃ sakala rāma kīṃ dāyā||
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला।
जा पर होइ सो नट अनुकूला॥
so nara iṃdrajāla nahiṃ bhūlā| jā para hoi so naṭa anukūlā||
Meaning क्रोध, काम, लोभ, मद और माया-सये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं। वह नट (नटराजभगवान्) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता॥ २॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥
umā kahaum̐ maiṃ anubhava apanā| sata hari bhajanu jagata saba sapanā||
puni prabhu gae sarobara tīrā| paṃpā nāma subhaga gaṃbhīrā||
Meaning हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ--हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्र [की भाँति झूठा] है। फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये॥ ३॥
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥
saṃta hṛdaya jasa nirmala bārī| bām̐dhe ghāṭa manohara cārī||
jaham̐ taham̐ piahiṃ bibidha mṛga nīrā| janu udāra gṛha jācaka bhīrā||
Meaning उसका जल संतोंके हृदय-जैसा निर्मल है। मनको हरनेवाले सुन्दर चार घाट बँधे हुए हैं। भाँति-भाँतिके पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं। मानो उदार दानी पुरुषोंके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो!॥ ४॥
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म॥
puraini sabana oṭa jala begi na pāia marma|
māyāchanna na dekhiai jaise nirguna brahma||
Meaning घनी पुरइनों (कमलके पत्तों) -की आड़में जलका जल्दी पता नहीं मिलता। जैसे मायासे ढके रहनेके कारण निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता॥ ३९ (क)॥
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं॥ ३९ (ख )॥
sukhi mīna saba ekarasa ati agādha jala māhiṃ|
jathā dharmasīlanha ke dina sukha saṃjuta jāhiṃ|| 39 (kha )||
Meaning उस सरोवरके अत्यन्त अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एकरस (एक समान) सुखी रहती हैं। जैसे धर्मशील पुरुषोंके सब दिन सुखपूर्वक बीतते हैं॥ ३९ (ख)॥
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥
bikase sarasija nānā raṃgā| madhura mukhara guṃjata bahu bhṛṃgā||
bolata jalakukkuṭa kalahaṃsā| prabhu biloki janu karata prasaṃsā||
Meaning उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। बहुत-से भौंरे मधुर स्वरसे गुंजार कर रहे हैं। जलके मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभुको देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों॥ १॥
चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥
cakravāka baka khaga samudāī| dekhata banai barani nahiṃ jāī||
sundara khaga gana girā suhāī| jāta pathika janu leta bolāī||
Meaning चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियोंका समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर पक्षियोंकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [रास्तेमें] जाते हुए पथिकको बुलाये लेती हो॥ २॥
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए॥
चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला॥
tāla samīpa muninha gṛha chāe| cahu disi kānana biṭapa suhāe||
caṃpaka bakula kadaṃba tamālā| pāṭala panasa parāsa rasālā||
Meaning उस झील (पंपासरोवर) के समीप मुनियोंने आश्रम बना रखे हैं। उसके चारों ओर वनके सुन्दर वृक्ष हैं। चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम आदि--॥३॥
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना॥
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ॥
nava pallava kusumita taru nānā| caṃcarīka paṭalī kara gānā||
sītala maṃda sugaṃdha subhāū| saṃtata bahai manohara bāū||
Meaning बहुत प्रकारके वृक्ष नये-नये पत्तों और [ सुगन्धित] पुष्पोंसे युक्त हैं, [ जिनपर] भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं। स्वभावसे ही शीतल, मन्द, सुगन्धित एवं मनको हरनेवाली हवा सदा बहती रहती है॥ ४॥
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं।
सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥
kuhū kuhū kokila dhuni karahīṃ| suni rava sarasa dhyāna muni ṭarahīṃ||
Meaning कोयलें कुहू' 'कुदू' का शब्द कर रही हैं। उनकी रसीली बोली सुनकर मुनियोंका भी ध्यान टूट जाता है॥५॥
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥ ४०॥
phala bhārana nami biṭapa saba rahe bhūmi niarāi|
para upakārī puruṣa jimi navahiṃ susaṃpati pāi|| 40||
Meaning फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [विनयसे] झुक जाते हैं॥ ४०॥
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥
dekhi rāma ati rucira talāvā| majjanu kīnha parama sukha pāvā||
dekhī suṃdara tarubara chāyā| baiṭhe anuja sahita raghurāyā||
Meaning श्रीरामजीने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्त्रान किया और परम सुख पाया। एक सुन्दर उत्तम वृक्षकी छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित बैठ गये॥ १॥
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥
taham̐ puni sakala deva muni āe| astuti kari nija dhāma sidhāe||
baiṭhe parama prasanna kṛpālā| kahata anuja sana kathā rasālā||
Meaning फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने-अपने धामको चले गये। कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजीसे रसीली कथाएँ कह रहे हैं॥ २॥
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥
birahavaṃta bhagavaṃtahi dekhī| nārada mana bhā soca biseṣī||
mora sāpa kari aṃgīkārā| sahata rāma nānā dukha bhārā||
Meaning भगवान्को विरहयुक्त देखकर नारदजीके मनमें विशेषरूपसे सोच हुआ। [उन्होंने विचार किया कि] मेरे ही शापको स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकारके दुःखोंका भार सह रहे हैं (दुःख उठा रहे हैं)॥ ३॥
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥
aise prabhuhi bilokaum̐ jāī| puni na banihi asa avasaru āī||
yaha bicāri nārada kara bīnā| gae jahām̐ prabhu sukha āsīnā||
Meaning ऐसे ( भक्तवत्सल) प्रभुको जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचारकर नारदजी हाथमें वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे॥ ४॥
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥
gāvata rāma carita mṛdu bānī| prema sahita bahu bhām̐ti bakhānī||
karata daṃḍavata lie uṭhāī| rākhe bahuta bāra ura lāī||
Meaning वे कोमल वाणीसे प्रेमके साथ बहुत प्रकारसे बखान-बखानकर रामचरितका गान कर [ते हुए चले आ.] रहे थे। दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने नारदजीको उठा लिया और बहुत देरतक हृदयसे लगाये रखा॥ ५॥
स्वागत पूँछि निकट बैठारे।
लछिमन सादर चरन पखारे॥
svāgata pūm̐chi nikaṭa baiṭhāre| lachimana sādara carana pakhāre||
Meaning फिर स्वागत (कुशल) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजीने आदरके साथ उनके चरण धोये॥ ६॥
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥ ४१॥
nānā bidhi binatī kari prabhu prasanna jiyam̐ jāni|
nārada bole bacana taba jori saroruha pāni|| 41||
Meaning बहुत प्रकारसे विनती करके और प्रभुको मनमें प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमलके समान हाथोंको जोड़कर वचन बोले--॥ ४१॥
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥
sunahu udāra sahaja raghunāyaka| suṃdara agama sugama bara dāyaka||
dehu eka bara māgaum̐ svāmī| jadyapi jānata aṃtarajāmī||
Meaning हे स्वभावसे ही उदार श्रीरघुनाथजी ! सुनिये। आप सुन्दर अगम और सुगम वरके देनेवाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि आप अन्तर्यामी होनेके नाते सब जानते ही हैं॥ १॥
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥
jānahu muni tumha mora subhāū| jana sana kabahum̐ ki karaum̐ durāū||
kavana bastu asi priya mohi lāgī| jo munibara na sakahu tumha māgī||
Meaning [ श्रीरामजीने कहा--] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तोंसे कभी कुछ छिपाव करता हूँ ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम नहीं माँग सकते ?॥ २॥
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥
तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥
jana kahum̐ kachu adeya nahiṃ moreṃ| asa bisvāsa tajahu jani bhoreṃ||
taba nārada bole haraṣāī| asa bara māgaum̐ karaum̐ ḍhiṭhāī||
Meaning मुझे भक्तके लिये कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले-मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ॥ ३॥
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
jadyapi prabhu ke nāma anekā| śruti kaha adhika eka teṃ ekā||
rāma sakala nāmanha te adhikā| hou nātha agha khaga gana badhikā||
Meaning यद्यपि प्रभुके अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से-एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामोंसे बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियोंके समूहके लिये यह वधिकके समान हो॥ ४॥
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम॥ ४२ (क )॥
rākā rajanī bhagati tava rāma nāma soi soma|
apara nāma uḍagana bimala basuhum̐ bhagata ura byoma|| 42 (ka )||
Meaning आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात्रि है; उसमें ' राम' नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें निवास करें॥ ४२ (क)॥