एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥ '४२ ( ख )॥
evamastu muni sana kaheu kṛpāsiṃdhu raghunātha|
taba nārada mana haraṣa ati prabhu pada nāyau mātha|| '42 ( kha )||
Meaning कृपासागर श्रीरघुनाथजीने मुनिसे 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदजीने मनमें अत्यन्त हर्षित होकर प्रभुके चरणोंमें मस्तक नवाया॥ ४२ (ख)॥
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥
ati prasanna raghunāthahi jānī| puni nārada bole mṛdu bānī||
rāma jabahiṃ prereu nija māyā| mohehu mohi sunahu raghurāyā||
Meaning श्रीरघुनाथजीको अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले--हे रामजी! हे रघुनाथजी ! सुनिये, जब आपने अपनी मायाको प्रेरित करके मुझे मोहित किया था,॥ १॥
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
taba bibāha maiṃ cāhaum̐ kīnhā| prabhu kehi kārana karai na dīnhā||
sunu muni tohi kahaum̐ saharosā| bhajahiṃ je mohi taji sakala bharosā||
Meaning तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया ? [प्रभु बोले- हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं,॥ २॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥
karaum̐ sadā tinha kai rakhavārī| jimi bālaka rākhai mahatārī||
gaha sisu baccha anala ahi dhāī| taham̐ rākhai jananī aragāī||
Meaning मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालककी रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँपको पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे [ अपने हाथों। अलग करके बचा लेती है॥ ३॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥
prauṛha bhaem̐ tehi suta para mātā| prīti karai nahiṃ pāchili bātā||
more prauṛha tanaya sama gyānī| bālaka suta sama dāsa amānī||
Meaning सयाना हो जानेपर उस पुत्रपर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशुकी तरह फिर उसको बचानेकी चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह मातापर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्रके समान है और [ तुम्हारे- जैसा] अपने बलका मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्रके समान है॥ ४॥
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥
janahi mora bala nija bala tāhī| duhu kaham̐ kāma krodha ripu āhī||
yaha bicāri paṃḍita mohi bhajahīṃ| pāehum̐ gyāna bhagati nahiṃ tajahīṃ||
Meaning मेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानीको) अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं। [ भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है।] ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमानू लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते॥ ५॥
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥ ४३॥
kāma krodha lobhādi mada prabala moha kai dhāri|
tinha maham̐ ati dāruna dukhada māyārūpī nāri|| 43||
Meaning काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी (मायाकी साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है॥ ४३॥
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥
suni muni kaha purāna śruti saṃtā| moha bipina kahum̐ nāri basaṃtā||
japa tapa nema jalāśraya jhārī| hoi grīṣama soṣai saba nārī||
Meaning हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [को विकसित करने] के लिये स्त्री वसन्त ऋतुके समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जलके स्थानोंको स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है॥ १॥
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥
kāma krodha mada matsara bhekā| inhahi haraṣaprada baraṣā ekā||
durbāsanā kumuda samudāī| tinha kaham̐ sarada sadā sukhadāī||
Meaning काम, क्रोध, मद और मत्सर (डाह) आदि मेढक हैं। इनको वर्षा-ऋतु होकर हर्ष प्रदान करनेवाली एकमात्र यही (स्त्री) है। बुरी वासनाएँ कुमुदोंके समूह हैं। उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरदू ऋतु है॥ २॥
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥
dharma sakala sarasīruha bṛṃdā| hoi hima tinhahi dahai sukha maṃdā||
puni mamatā javāsa bahutāī| paluhai nāri sisira ritu pāī||
Meaning समस्त धर्म कमलोंके झुंड हैं। यह नीच (विषयजन्य) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवासका समूह (वन) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतुको पाकर हरा- भरा हो जाता है॥ ३॥
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥
pāpa ulūka nikara sukhakārī| nāri nibiṛa rajanī am̐dhiārī||
budhi bala sīla satya saba mīnā| banasī sama triya kahahiṃ prabīnā||
Meaning पापरूपी उल्लुओंके समूहके लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य--ये सब मछलियाँ हैं और उन [को फँसाकर नष्ट करने] के लिये स्त्री बंसीके समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं॥ ४॥
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥ ४४॥
avaguna mūla sūlaprada pramadā saba dukha khāni|
tāte kīnha nivārana muni maiṃ yaha jiyam̐ jāni|| 44||
Meaning युवती स्त्री अवगुणोंकी मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दु:खोंकी खान है। इसलिये हे मुनि! मैंने जीमें ऐसा जानकर तुमको विवाह करनेसे रोका था॥ ४४॥
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥
suni raghupati ke bacana suhāe| muni tana pulaka nayana bhari āe||
kahahu kavana prabhu kai asi rītī| sevaka para mamatā aru prītī||
Meaning श्रीरघुनाथजीके सुन्दर वचन सुनकर मुनिका शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [प्रेमाश्रुओं के जलसे] भर आये। [वे मन-ही-मन कहने लगे-] कहो तो किस प्रभुकी ऐसी रीति है, जिसका सेवकपर इतना ममत्व और प्रेम हो॥ १॥
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥
पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥
je na bhajahiṃ asa prabhu bhrama tyāgī| gyāna raṃka nara maṃda abhāgī||
puni sādara bole muni nārada| sunahu rāma bigyāna bisārada||
Meaning जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले-हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी! सुनिये--॥ २॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥
saṃtanha ke lacchana raghubīrā| kahahu nātha bhava bhaṃjana bhīrā||
sunu muni saṃtanha ke guna kahaūm̐| jinha te maiṃ unha keṃ basa rahaūm̐||
Meaning हे रघुवीर! हे भव-भय (जन्म-मरणके भय) -का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये। [ श्रीरामजीने कहा--] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ॥ ३॥
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥
अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥
ṣaṭa bikāra jita anagha akāmā| acala akiṃcana suci sukhadhāmā||
amitabodha anīha mitabhogī| satyasāra kabi kobida jogī||
Meaning वे संत [ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर--इन] छः विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिदज्लन (सर्वत्यागी ), बाहर-भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ट, कवि, विद्वानू, योगी,॥ ४॥
सावधान मानद मदहीना।
धीर धर्म गति परम प्रबीना॥
sāvadhāna mānada madahīnā| dhīra dharma gati parama prabīnā||
Meaning सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण,॥ ५॥
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥ ४५॥
gunāgāra saṃsāra dukha rahita bigata saṃdeha|
taji mama carana saroja priya tinha kahum̐ deha na geha|| 45||
Meaning गुणोंके घर, संसारके दुःखोंसे रहित और सन्देहोंसे सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मे चरणकमलोंको छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही॥ ४५॥
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती॥
nija guna śravana sunata sakucāhīṃ| para guna sunata adhika haraṣāhīṃ||
sama sītala nahiṃ tyāgahiṃ nītī| sarala subhāu sabahiṃ sana prītī||
Meaning कानोंसे अपने गुण सुननेमें सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुननेसे विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, न्यायका कभी त्याग नहीं करते। सरलस्वभाव होते हैं और सभीसे प्रेम रखते हैं॥ १॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥
japa tapa brata dama saṃjama nemā| guru gobiṃda bipra pada premā||
śraddhā chamā mayatrī dāyā| muditā mama pada prīti amāyā||
Meaning वे जप, तप, ब्रत, दम, संयम और नियममें रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है॥ २॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥
birati bibeka binaya bigyānā| bodha jathāratha beda purānā||
daṃbha māna mada karahiṃ na kāū| bhūli na dehiṃ kumāraga pāū||
Meaning तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान ( परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद-पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते॥ ३॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥
gāvahiṃ sunahiṃ sadā mama līlā| hetu rahita parahita rata sīlā||
muni sunu sādhunha ke guna jete| kahi na sakahiṃ sārada śruti tete||
Meaning सदा मेरी लीलाओंको गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरोंके हितमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे मुनि! सुनो, संतोंके जितने गुण हैं, उनको सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते॥ ४॥
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥
सिर नाइ़ बारहिं तब्वार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए॥
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ़ जे हरि रेंग रए॥
kahi saka na sārada seṣa nārada sunata pada paṃkaja gahe|
asa dīnabaṃdhu kṛpāla apane bhagata guna nija mukha kahe||
sira nāi bārahiṃ tabvāra carananhi brahmapura nārada gae||
te dhanya tulasīdāsa āsa bihāi je hari reṃga rae||
Meaning 'शेष और शारदा भी नहीं कह सकते' यह सुनते ही नारदजीने श्रीरामजीके चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभुने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे अपने भक्तोंके गुण कहे। भगवान्के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मललोकको चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरिके रंगमें रंग गये हैं।
रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥ ४६ (क )॥
rāvanāri jasu pāvana gāvahiṃ sunahiṃ je loga|
rāma bhagati dṛṛha pāvahiṃ binu birāga japa joga|| 46 (ka )||
Meaning जो लोग रावणके शत्रु श्रीरामजीका पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योगके बिना ही श्रीरामजीकी दृढ़ भक्ति पावेंगे॥ ४६ (क)॥
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥ ४६ ( ख )॥
dīpa sikhā sama jubati tana mana jani hosi pataṃga|
bhajahi rāma taji kāma mada karahi sadā satasaṃga|| 46 ( kha )||
Meaning युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर॥ ४६ (ख)॥