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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीदक्षिणकालिकाकवचम्

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प्रदर्शन

विनियोग 1

गुरुमण्डल रक्षा 8

काली सर्वाङ्ग रक्षा 2

बीजमन्त्र न्यास 3

मन्त्रराज एवं चक्रराज 1

यन्त्र-आवरण देवियाँ 3

अष्टमातृका रक्षा 2

अष्टभैरव रक्षा 3

वटुकभैरव एवं मातृका 4

योगिनी रक्षा 6

दिक्पाल रक्षा 3

कालिका सर्वत्र रक्षा 5

समापन 1

परिचय

श्यामारहस्य (उत्तरतन्त्र) में काली एवं भैरव के संवाद के रूप में वर्णित यह तन्त्रोक्त श्रीदक्षिणकालिकाकवच अद्वैतरूपिणी दक्षिणकाली की उपासना का रक्षाकवच है। इसमें गुरुमण्डल, मातृकाओं, अष्टभैरव, चौंसठ योगिनियों, वटुकभैरवों, दिक्पालों तथा स्वयं कालिका को शरीर के प्रत्येक अङ्ग, समस्त दिशाओं, धातुओं, सन्तान एवं धन की रक्षा हेतु आवाहित किया गया है।

यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।

स्रोत 2

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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