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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीकालीकवचम्

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प्रस्तावना 4

कवच 9

फलश्रुति 2

समापन 1

परिचय

कालीकुलसर्वस्व (भैरवीतन्त्र) में वर्णित यह श्रीमद्दक्षिणकालिकाकवचम् महाकाली की उपासना का अङ्ग-रक्षा कवच है। भैरव के आग्रह पर देवी इसे अत्यन्त गुह्य रहस्य के रूप में प्रकट करती हैं। इसमें काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला आदि कालीशक्तियाँ तथा ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, वाराही, नारसिंही आदि मातृकाएँ साधक के सिर, नेत्र, नासिका, कर्ण, मुख, ग्रीवा, बाहु, उदर, नाभि, ऊरु, कटि, जानु, चरण एवं सन्धियों की — सिर से पैर तक — रक्षा हेतु आवाहित की गई हैं।

यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।

स्रोत 2

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।

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