ॐ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ १॥
अर्थ सैकड़ों अपराध करके भी यदि कोई 'जगदम्बा' — ऐसा एक बार उच्चारण कर ले, तो वह जिस परम गति को प्राप्त करता है, उसे ब्रह्मा आदि देवता भी प्राप्त नहीं कर पाते।
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २॥
अर्थ हे जगदम्बिके! मैं अपराधी हूँ और आपकी शरण में आया हूँ। अब मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ; आप जैसा चाहें, मेरे साथ वैसा ही करें।
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ३॥
अर्थ हे देवी! अज्ञान, विस्मृति अथवा भ्रम के कारण मुझसे जो कुछ कम या अधिक हो गया हो, उस सबको क्षमा कीजिए; हे परमेश्वरी! प्रसन्न होइए।
कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ ४॥
अर्थ हे कामेश्वरी! हे जगन्माता! हे सच्चिदानन्दस्वरूपिणी! मेरी इस पूजा को प्रेमपूर्वक स्वीकार कीजिए; हे परमेश्वरी! प्रसन्न होइए।
सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् ।
अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम् ॥ ५॥
अर्थ देवी समस्त रूपों में व्याप्त हैं और यह सम्पूर्ण जगत् देवीमय है। इसीलिए हे परमेश्वरी! मैं विश्वरूपिणी आपको नमस्कार करता हूँ।
यदक्षरं परिभ्रष्टं मात्राहीनञ्च यद्भवेत् ।
पूर्णं भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥ ६॥
अर्थ हे महेश्वरी! (पाठ में) जो कोई अक्षर छूट गया हो अथवा मात्रा से रहित (त्रुटिपूर्ण) रह गया हो, आपकी कृपा से वह सब पूर्ण हो जाए।
यदत्र पाठे जगदम्बिके मया
विसर्गबिन्द्वक्षरहीनमीरितम् ।
तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रसादतः
सङ्कल्पसिद्धिश्च सदैव जायताम् ॥ ७॥
अर्थ हे जगदम्बिके! इस पाठ में मेरे द्वारा जो कुछ विसर्ग, बिन्दु (अनुस्वार) अथवा अक्षर से रहित उच्चारित हुआ हो, वह आपकी कृपा से पूर्णतम हो जाए; और मेरे संकल्प की सिद्धि सदा होती रहे।
यन्मात्राबिन्दुबिन्दुद्वितयपदपदद्वन्द्ववर्णादिहीनं
भक्त्याभक्त्यानुपूर्वं प्रसभकृतिवशात् व्यक्तमव्यक्तमम्ब ।
मोहादज्ञानतो वा पठितमपठितं साम्प्रतं ते स्तवेऽस्मिन्
तत् सर्वं साङ्गमास्तां भगवति वरदे त्वत्प्रसादात् प्रसीद ॥ ८॥
अर्थ हे माता! इस स्तवन में मुझसे जो कुछ मात्रा, बिन्दु (अनुस्वार), द्विबिन्दु (विसर्ग), पद, पदयुग्म तथा वर्ण आदि से रहित रह गया हो; जो भक्तिपूर्वक अथवा बिना भक्ति के, क्रमानुसार अथवा हड़बड़ी के वश, प्रकट रूप में या अप्रकट रूप में, मोह अथवा अज्ञान के कारण पढ़ा गया हो या न पढ़ा गया हो — हे वरदायिनी भगवती! वह सब आपकी कृपा से सांग (सम्पूर्ण अंगों सहित) पूर्ण हो जाए; प्रसन्न होइए।
प्रसीद भगवत्यम्ब प्रसीद भक्तवत्सले ।
प्रसादं कुरु मे देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ९॥
अर्थ हे भगवती माता! प्रसन्न होइए; हे भक्तवत्सले! प्रसन्न होइए। हे देवी! मुझ पर कृपा कीजिए; हे दुर्गा देवी! आपको नमस्कार है।