ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यह-
मादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यह-
मिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ॥ १॥
oṃ ahaṃ rudrebhirvasubhiścarāmyaha-
mādityairuta viśvadevaiḥ |
ahaṃ mitrāvaruṇobhā bibharmyaha-
mindrāgnī ahamaśvinobhā || 1||
अर्थ (आदिशक्ति वाक् कहती हैं —) मैं ही रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूँ, मैं ही आदित्यों तथा विश्वेदेवों के साथ भी रहती हूँ। मैं ही मित्र और वरुण — इन दोनों को धारण करती हूँ, मैं ही इन्द्र और अग्नि को, तथा मैं ही दोनों अश्विनीकुमारों को धारण करती हूँ।
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं
त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते
सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥ २॥
ahaṃ somamāhanasaṃ bibharmyahaṃ
tvaṣṭāramuta pūṣaṇaṃ bhagam |
ahaṃ dadhāmi draviṇaṃ haviṣmate
suprāvye yajamānāya sunvate || 2||
अर्थ मैं ही उल्लासमय (आह्लादक) सोम को धारण करती हूँ, मैं ही त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। जो यजमान श्रद्धापूर्वक हवि अर्पित करता है और सोमरस निचोड़ता है, उसे धन-सम्पत्ति मैं ही प्रदान करती हूँ।
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां
चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा
भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥ ३॥
ahaṃ rāṣṭrī saṅgamanī vasūnāṃ
cikituṣī prathamā yajñiyānām |
tāṃ mā devā vyadadhuḥ purutrā
bhūristhātrāṃ bhūryāveśayantīm || 3||
अर्थ मैं ही समस्त लोकों की अधीश्वरी (राष्ट्री) हूँ, धन-वैभव को एकत्र करने वाली हूँ, सबको जानने वाली चेतनास्वरूपा हूँ, और यज्ञ के योग्य देवों में सर्वप्रथम पूज्य हूँ। देवताओं ने मुझे अनेक स्थानों में स्थापित किया है — मैं अनेक स्थानों में निवास करती और अनेक रूपों में प्रवेश करती हूँ।
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति
यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।
अमन्तवो मां त उपक्षियन्ति
श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि ॥ ४॥
mayā so annamatti yo vipaśyati
yaḥ prāṇiti ya īṃ śaृṇotyuktam |
amantavo māṃ ta upakṣiyanti
śrudhi śruta śraddhivaṃ te vadāmi || 4||
अर्थ मेरे ही द्वारा मनुष्य अन्न खाता है, मेरे ही आश्रय से वह देखता है, श्वास लेता है और कहे हुए वचन को सुनता है। जो मुझे नहीं जानते, वे भी (अनजाने ही) मुझमें ही स्थित रहते और मुझ पर ही आश्रित होते हैं। हे विख्यात! सुनो — मैं तुम्हें श्रद्धा के योग्य सत्य कहती हूँ।
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं
देवेभिरुत मानुषेभिः ।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि
तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥ ५॥
ahameva svayamidaṃ vadāmi juṣṭaṃ
devebhiruta mānuṣebhiḥ |
yaṃ kāmaye taṃ tamugraṃ kṛṇomi
taṃ brahmāṇaṃ tamṛṣiṃ taṃ sumedhām || 5||
अर्थ यह जो मैं कह रही हूँ, वह देवताओं और मनुष्यों — दोनों को प्रिय है, और इसे मैं स्वयं ही घोषित करती हूँ। मैं जिसे चाहती हूँ, उसी को उग्र (तेजस्वी और शक्तिशाली) बना देती हूँ, उसी को ब्रह्मा (ब्रह्मज्ञानी), उसी को ऋषि और उसी को श्रेष्ठ बुद्धिवाला (सुमेधा) बना देती हूँ।
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि
ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं
द्यावापृथिवी आ विवेश ॥ ६॥
ahaṃ rudrāya dhanurā tanomi
brahmadviṣe śarave hantavā u |
ahaṃ janāya samadaṃ kṛṇomyahaṃ
dyāvāpṛthivī ā viveśa || 6||
अर्थ मैं ही रुद्र के लिए धनुष चढ़ाती हूँ, ताकि उनका बाण ब्रह्म (वेद-ज्ञान) से द्वेष करने वाले का वध कर सके। मैं ही (धर्म की रक्षा हेतु) जनों में संग्राम उत्पन्न करती हूँ; मैं ही द्युलोक और पृथ्वी में व्याप्त होकर प्रवेश कर चुकी हूँ।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्
मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वो-
तामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥ ७॥
ahaṃ suve pitaramasya mūrdhan
mama yonirapsvantaḥ samudre |
tato vi tiṣṭhe bhuvanānu viśvo-
tāmūṃ dyāṃ varṣmaṇopa spṛśāmi || 7||
अर्थ मैं ही इस सृष्टि के शिखर पर (सबके) पिता को उत्पन्न करती हूँ; मेरा उद्गम-स्थान जल के भीतर, समुद्र में है। वहीं से मैं समस्त लोकों में व्याप्त होकर स्थित रहती हूँ, और अपने विराट् स्वरूप की ऊँचाई से उस सुदूर द्युलोक का भी स्पर्श करती हूँ।
अहमेव वात इव प्र वाम्या-
रभमाणा भुवनानि विश्वा ।
परो दिवा पर एना पृथिव्यै-
तावती महिना सं बभूव ॥ ८॥
ahameva vāta iva pra vāmyā-
rabhamāṇā bhuvanāni viśvā |
paro divā para enā pṛthivyai-
tāvatī mahinā saṃ babhūva || 8||
अर्थ मैं ही वायु के समान स्वयं प्रवाहित होती हूँ, और समस्त लोकों को गति देती एवं धारण करती हुई (सृष्टि का) आरम्भ करती हूँ। द्युलोक से परे, इस पृथ्वी से भी परे — मैं इतनी विशाल हूँ; अपनी महिमा से मैं इस समस्त विस्तार में व्याप्त हो गई हूँ।